आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 220
अङ्गिरा का अग्नि-पद ग्रहण करना
युधिष्ठिर मार्कण्डेय से पूछते हैं कि अग्नि वन में क्यों चले गए, ऋषि अङ्गिरा ने उनके स्थान पर हवि कैसे वहन की, एक ही अग्नि अनेक रूपों में क्यों दिखता है, और कुमार का जन्म कैसे हुआ। मार्कण्डेय बताते हैं कि जब क्रुद्ध अग्नि वन में तप कर रहे थे, तब अङ्गिरा इतने तेज से प्रज्वलित हुए कि वे संसार के अग्नि बन गए; अपना अग्नित्व खो जाने के भय से अग्नि उनके पास गए, और अङ्गिरा के अपना स्थान फिर ग्रहण करने का आग्रह करने पर भी अग्नि ने कहा कि प्रथम अग्नि अङ्गिरा ही हों। अङ्गिरा अग्नि का प्रथम पुत्र बनने का वर माँगते हैं; अग्नि मान जाते हैं, अङ्गिरा के पुत्र बृहस्पति का जन्म होता है, देवता अङ्गिरा का वचन स्वीकार करते हैं, और मार्कण्डेय अनेक प्रकार के अग्नियों का वर्णन आरम्भ करते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.220.1)
श्रुत्वेमां धर्मसंयुक्तां धर्मराजः कथां शुभाम् । पुनः पप्रच्छ तमृषिं मार्कण्डेयमिदं तदा ॥
śrutvemāṃ dharmasaṃyuktāṃ dharmarājaḥ kathāṃ śubhām | punaḥ papraccha tamṛṣiṃ mārkaṇḍeyamidaṃ tadā
धर्म से युक्त यह शुभ कथा सुनकर धर्मराज ने तब ऋषि मार्कण्डेय से फिर यह प्रश्न किया —
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 2 (3.220.2)
कथमग्निर्वनं यातः कथं चाप्यङ्गिराः पुरा । नष्टेऽग्नौ हव्यमवहदग्निर्भूत्वा महाद्युतिः ॥
kathamagnirvanaṃ yātaḥ kathaṃ cāpyaṅgirāḥ purā | naṣṭe'gnau havyamavahadagnirbhūtvā mahādyutiḥ
"अग्नि वन में कैसे चले गए? और पूर्वकाल में जब अग्नि लुप्त हो गए थे, तब महातेजस्वी अङ्गिरा ने स्वयं अग्नि बनकर हवि का वहन कैसे किया?
श्लोक 3 (3.220.3)
अग्निर्यदा चैक एव बहुत्वं चास्य कर्मसु । दृश्यते भगवन्सर्वमेतदिच्छामि वेदितुम् ॥
agniryadā caika eva bahutvaṃ cāsya karmasu | dṛśyate bhagavansarvametadicchāmi veditum
अग्नि एक ही है, फिर भी उसके कर्मों में उसकी अनेकता दिखाई देती है। हे भगवन्, मैं यह सब जानना चाहता हूँ —
श्लोक 4 (3.220.4)
कुमारश्च यथोत्पन्नो यथा चाग्नेः सुतोऽभवत् । यथा रुद्राच्च संभूतो गङ्गायां कृत्तिकासु च ॥
kumāraśca yathotpanno yathā cāgneḥ suto'bhavat | yathā rudrācca saṃbhūto gaṅgāyāṃ kṛttikāsu ca
और यह भी कि कुमार कैसे उत्पन्न हुए, वे अग्नि के पुत्र कैसे हुए, और रुद्र से, गङ्गा में तथा कृत्तिकाओं में उनका जन्म कैसे हुआ।
श्लोक 5 (3.220.5)
एतदिच्छाम्यहं त्वत्तः श्रोतुं भार्गवसत्तम । कौतूहलसमाविष्टो याथातथ्यं महामुने ॥
etadicchāmyahaṃ tvattaḥ śrotuṃ bhārgavasattama | kautūhalasamāviṣṭo yāthātathyaṃ mahāmune
हे भार्गवश्रेष्ठ, हे महामुनि, मैं कौतूहल से भरा हूँ; यह सब मैं आपसे यथार्थ रूप में सुनना चाहता हूँ।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 6 (3.220.6)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । यथा क्रुद्धो हुतवहस्तपस्तप्तुं वनं गतः ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | yathā kruddho hutavahastapastaptuṃ vanaṃ gataḥ
"इस विषय में भी लोग एक पुरातन इतिहास सुनाते हैं — कि किस प्रकार हव्यवाहन अग्नि क्रोध करके तप करने के लिए वन में चले गए,
श्लोक 7 (3.220.7)
यथा च भगवानग्निः स्वयमेवाङ्गिराऽभवत् । संतापयंश्च प्रभया नाशयंस्तिमिरावलिम् ॥
yathā ca bhagavānagniḥ svayamevāṅgirā'bhavat | saṃtāpayaṃśca prabhayā nāśayaṃstimirāvalim
और किस प्रकार भगवान अङ्गिरा स्वयं अग्नि बन गए, जो अपनी प्रभा से तपाते हुए अन्धकार के समूह को नष्ट करते थे।
श्लोक 8 (3.220.8)
पुराङ्गिरा महाबाहो चचार तप उत्तमम् । आश्रमस्थो महाभागो हव्यवाहं विशेषयन् । यथाग्निर्भूत्वा तु तदा जगत्सर्वं व्यकाशयत् ॥
purāṅgirā mahābāho cacāra tapa uttamam | āśramastho mahābhāgo havyavāhaṃ viśeṣayan | yathāgnirbhūtvā tu tadā jagatsarvaṃ vyakāśayat
हे महाबाहु, पूर्वकाल में अङ्गिरा ने उत्तम तप किया। आश्रम में रहते हुए वे महाभाग हव्यवाहन से भी बढ़ गए, और अग्नि बनकर उन्होंने तब सारे जगत को प्रकाशित कर दिया।
श्लोक 9 (3.220.9)
तपश्चरंस्तु हुतभुक्संतप्तस्तस्य तेजसा । भृशं ग्लानश्च तेजस्वी न च किंचित्प्रजज्ञिवान् ॥
tapaścaraṃstu hutabhuksaṃtaptastasya tejasā | bhṛśaṃ glānaśca tejasvī na ca kiṃcitprajajñivān
तप करते हुए हुतभुक् अग्नि अङ्गिरा के तेज से संतप्त हो गए; वे तेजस्वी देव अत्यन्त क्लान्त हो गए और उन्हें कुछ सूझ नहीं पड़ा।
श्लोक 10 (3.220.10)
अथ संचिन्तयामास भगवान्हव्यवाहनः । अन्योऽग्निरिव लोकानां ब्रह्मणा संप्रकल्पितः ॥
atha saṃcintayāmāsa bhagavānhavyavāhanaḥ | anyo'gniriva lokānāṃ brahmaṇā saṃprakalpitaḥ
तब भगवान हव्यवाहन ने सोचा — 'मानो ब्रह्मा ने लोकों के लिए कोई दूसरा अग्नि रच दिया है।
श्लोक 11 (3.220.11)
अग्नित्वं विप्रनष्टं हि तप्यमानस्य मे तपः । कथमग्निः पुनरहं भवेयमिति चिन्त्य सः ॥
agnitvaṃ vipranaṣṭaṃ hi tapyamānasya me tapaḥ | kathamagniḥ punarahaṃ bhaveyamiti cintya saḥ
तप करते-करते मेरा अग्नित्व नष्ट हो गया है। मैं फिर से अग्नि कैसे बनूँ?' ऐसा सोचकर
श्लोक 12 (3.220.12)
अपश्यदग्निवल्लोकांस्तापयन्तं महामुनिम् । सोपासर्पच्छनैर्भीतस्तमुवाच तदाङ्गिराः ॥
apaśyadagnivallokāṃstāpayantaṃ mahāmunim | sopāsarpacchanairbhītastamuvāca tadāṅgirāḥ
उन्होंने देखा कि वे महामुनि अग्नि की भाँति लोकों को तपा रहे हैं, और वे डरते हुए धीरे-धीरे उनके पास गए। तब अङ्गिरा ने उनसे कहा —
अङ्गिरा उवाच
श्लोक 13 (3.220.13)
शीघ्रमेव भवस्वाग्निस्त्वं पुनर्लोकभावनः । विज्ञातश्चासि लोकेषु त्रिषु संस्थानचारिषु ॥
śīghrameva bhavasvāgnistvaṃ punarlokabhāvanaḥ | vijñātaścāsi lokeṣu triṣu saṃsthānacāriṣu
"हे लोकों के पालक, शीघ्र ही फिर से अग्नि बन जाइए। तीनों लोकों में, स्थावर और जङ्गम सबमें आप ही प्रसिद्ध हैं।
श्लोक 14 (3.220.14)
त्वमग्ने प्रथमः सृष्टो ब्रह्मणा तिमिरापहः । स्वस्थानं प्रतिपद्यस्व शीघ्रमेव तमो नुद ॥
tvamagne prathamaḥ sṛṣṭo brahmaṇā timirāpahaḥ | svasthānaṃ pratipadyasva śīghrameva tamo nuda
हे अग्नि, अन्धकार को दूर करने के लिए ब्रह्मा ने सबसे पहले आपकी ही सृष्टि की थी। अपना स्थान फिर ग्रहण कीजिए और शीघ्र ही अन्धकार को मिटाइए।"
अग्निरुवाच
श्लोक 15 (3.220.15)
नष्टकीर्तिरहं लोके भवाञ्जातो हुताशनः । भवन्तमेव ज्ञास्यन्ति पावकं न तु मां जनाः ॥
naṣṭakīrtirahaṃ loke bhavāñjāto hutāśanaḥ | bhavantameva jñāsyanti pāvakaṃ na tu māṃ janāḥ
"संसार में मेरी कीर्ति नष्ट हो गई है; हुताशन तो आप बन गए हैं। लोग आपको ही पावक जानेंगे, मुझे नहीं।
श्लोक 16 (3.220.16)
निक्षिपाम्यहमग्नित्वं त्वमग्निः प्रथमो भव । भविष्यामि द्वितीयोऽहं प्राजापत्यक एव च ॥
nikṣipāmyahamagnitvaṃ tvamagniḥ prathamo bhava | bhaviṣyāmi dvitīyo'haṃ prājāpatyaka eva ca
मैं अपना अग्नित्व त्यागता हूँ; आप प्रथम अग्नि बनिए। मैं दूसरा, प्राजापत्य अग्नि बनूँगा।"
अङ्गिरा उवाच
श्लोक 17 (3.220.17)
कुरु पुण्यं प्रजास्वर्ग्यं भवाग्निस्तिमिरापहः । मां च देव कुरुष्वाग्ने प्रथमं पुत्रमञ्जसा ॥
kuru puṇyaṃ prajāsvargyaṃ bhavāgnistimirāpahaḥ | māṃ ca deva kuruṣvāgne prathamaṃ putramañjasā
"प्रजाओं को स्वर्ग देने वाला पुण्य कर्म कीजिए; अन्धकार को दूर करने वाले अग्नि बनिए। और हे अग्निदेव, मुझे शीघ्र ही अपना प्रथम पुत्र बना लीजिए।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 18 (3.220.18)
तच्छ्रुत्वाङ्गिरसो वाक्यं जातवेदास्तथाऽकरोत् । राजन्बृहस्पतिर्नाम तस्याप्यङ्गिरसः सुतः ॥
tacchrutvāṅgiraso vākyaṃ jātavedāstathā'karot | rājanbṛhaspatirnāma tasyāpyaṅgirasaḥ sutaḥ
"अङ्गिरा के ये वचन सुनकर जातवेदा अग्नि ने वैसा ही किया। हे राजन्, उन अङ्गिरा के भी बृहस्पति नाम के पुत्र हुए।
श्लोक 19 (3.220.19)
ज्ञात्वा प्रथमजं तं तु वह्नेरङ्गिरसं सुतम् । उपेत्य देवाः पप्रच्छुः कारणं तत्र भारत ॥
jñātvā prathamajaṃ taṃ tu vahneraṅgirasaṃ sutam | upetya devāḥ papracchuḥ kāraṇaṃ tatra bhārata
हे भारत, जब देवताओं ने जाना कि अङ्गिरा अग्नि के प्रथम पुत्र बन गए हैं, तब उन्होंने उनके पास आकर इसका कारण पूछा।
श्लोक 20 (3.220.20)
स तु पृष्टस्तदा देवैस्ततः कारणमब्रवीत् । प्रत्यगृह्णन्त देवाश्च तद्वचोऽङ्गिरसस्तदा ॥
sa tu pṛṣṭastadā devaistataḥ kāraṇamabravīt | pratyagṛhṇanta devāśca tadvaco'ṅgirasastadā
देवताओं के पूछने पर उन्होंने तब कारण बताया, और देवताओं ने अङ्गिरा का वह वचन स्वीकार कर लिया।
श्लोक 21 (3.220.21)
तत्र नानाविधानग्नीन्प्रवक्ष्यामि महाप्रभान् । कर्मभिर्बहुभिः ख्यातान्नानार्थान्ब्राह्मणेष्विह ॥
tatra nānāvidhānagnīnpravakṣyāmi mahāprabhān | karmabhirbahubhiḥ khyātānnānārthānbrāhmaṇeṣviha
अब मैं आपको महान प्रभा वाले उन अनेक प्रकार के अग्नियों के बारे में बताऊँगा, जो अपने अनेक कर्मों से प्रसिद्ध हैं और ब्राह्मणों में जिनके भिन्न-भिन्न प्रयोजन हैं।"