आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 221
अङ्गिरा की संतति और बृहस्पति के वंश के अग्नि
मार्कण्डेय ब्रह्मा के तीसरे पुत्र अङ्गिरा के सात पुत्रों और सात पुत्रियों के नाम बताते हैं और पुत्रियों के नामों का कारण समझाते हैं। फिर वे बृहस्पति और उनकी पत्नी चान्द्रमसी से उत्पन्न अग्नियों की वंश-परम्परा बताते हैं — शंयु और उनके वंशज भरद्वाज, भरत, पावक आदि — जिनमें प्रत्येक अग्नि का नाम यज्ञ-कर्म में उसके स्थान, उसकी शक्ति या उसके निवास के अनुसार है; इनमें निश्च्यवन, विपाप, निष्कृति, स्वन, विश्वजित्, विश्वभुक्, गोपति, ऊर्ध्वभाक् (समुद्र में रहने वाला वडवाग्नि), स्विष्टकृत्, काम, अमोघ और उक्थ्य भी हैं।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 1 (3.221.1)
ब्रह्मणो यस्तृतीयस्तु पुत्रः कुरुकुलोद्वह । तस्यापि वसुदा भार्या प्रजास्तस्यां च मे शृणु ॥
brahmaṇo yastṛtīyastu putraḥ kurukulodvaha | tasyāpi vasudā bhāryā prajāstasyāṃ ca me śṛṇu
"हे कुरुकुल को धारण करने वाले, ब्रह्मा के जो तीसरे पुत्र (अङ्गिरा) थे, उनकी पत्नी वसुदा थीं। उनसे उत्पन्न संतानों के बारे में मुझसे सुनिए —
श्लोक 2 (3.221.2)
बृहत्कीर्तिर्बृहज्ज्योतिर्बृहद्ब्रह्मा बृहन्मनाः । बृहन्मन्त्रो बृहद्भासस्तथा राजन्बृहस्पतिः ॥
bṛhatkīrtirbṛhajjyotirbṛhadbrahmā bṛhanmanāḥ | bṛhanmantro bṛhadbhāsastathā rājanbṛhaspatiḥ
हे राजन्, बृहत्कीर्ति, बृहज्ज्योति, बृहद्ब्रह्मा, बृहन्मना, बृहन्मन्त्र, बृहद्भास और बृहस्पति।
श्लोक 3 (3.221.3)
प्रजासु तासु सर्वासु रूपेणाप्रतिमाऽभवत् । देवी भानुमती नाम प्रथमाऽङ्गिरसः सुता ॥
prajāsu tāsu sarvāsu rūpeṇāpratimā'bhavat | devī bhānumatī nāma prathamā'ṅgirasaḥ sutā
उन सब संतानों में अङ्गिरा की पहली पुत्री भानुमती नाम की देवी थीं, जो रूप में अनुपम थीं।
श्लोक 4 (3.221.4)
भूतानामेव सर्वेषां यस्यां रागस्तदाऽभवत् । रागाद्रागेति यामाहुर्द्वितीयाऽङ्गिरसः सुता ॥
bhūtānāmeva sarveṣāṃ yasyāṃ rāgastadā'bhavat | rāgādrāgeti yāmāhurdvitīyā'ṅgirasaḥ sutā
अङ्गिरा की दूसरी पुत्री, जिनके प्रति उस समय सब प्राणियों में राग (प्रेम) उत्पन्न हुआ, उसी राग के कारण 'रागा' कहलाती हैं।
श्लोक 5 (3.221.5)
यां कपर्दिसुतामाहुर्दृश्यादृश्येति देहिनः । तनुत्वात्सा सिनीवाली तृतीयाऽङ्गिरसः सुता ॥
yāṃ kapardisutāmāhurdṛśyādṛśyeti dehinaḥ | tanutvātsā sinīvālī tṛtīyā'ṅgirasaḥ sutā
अङ्गिरा की तीसरी पुत्री, जिन्हें देहधारी कपर्दी की पुत्री और 'दृश्या-अदृश्या' कहते हैं, अपनी कृशता के कारण सिनीवाली कहलाती हैं।
श्लोक 6 (3.221.6)
यां तु दृष्ट्वा भगवतीं जनः कुहुकुहायते । एकानंशेति यामाहुश्चतुर्थ्यङ्गिरसः सुता ॥
yāṃ tu dṛṣṭvā bhagavatīṃ janaḥ kuhukuhāyate | ekānaṃśeti yāmāhuścaturthyaṅgirasaḥ sutā
अङ्गिरा की चौथी पुत्री वे भगवती हैं जिन्हें देखकर लोग 'कुहु-कुहु' पुकार उठते हैं और जिन्हें एकानंशा कहते हैं।
श्लोक 7 (3.221.7)
पञ्चम्यर्चिष्मती नाम्ना हविर्भिश्च हविष्मती । षष्ठीमङ्गिरसः कन्यां पुण्यामाहुर्महिष्मतीम् ॥
pañcamyarciṣmatī nāmnā havirbhiśca haviṣmatī | ṣaṣṭhīmaṅgirasaḥ kanyāṃ puṇyāmāhurmahiṣmatīm
पाँचवीं का नाम अर्चिष्मती है, और हवियों के कारण वे हविष्मती भी कहलाती हैं। अङ्गिरा की छठी कन्या को पुण्यशीला महिष्मती कहते हैं।
श्लोक 8 (3.221.8)
महामखेष्वाङ्गिरसी दीप्तिमत्सु महीयती । महामतीति विख्याता सप्तमी कथ्यते सुता ॥
mahāmakheṣvāṅgirasī dīptimatsu mahīyatī | mahāmatīti vikhyātā saptamī kathyate sutā
सातवीं पुत्री आङ्गिरसी, जो तेजस्वी महायज्ञों में पूजित होती हैं, महामती नाम से विख्यात हैं।
श्लोक 9 (3.221.9)
बृहस्पतेश्चान्द्रमसी भार्याऽऽसीद्या यशस्विनी । अग्नीन्साऽजनयत्पुण्यान्षडेकां चापि पुत्रिकाम् ॥
bṛhaspateścāndramasī bhāryā''sīdyā yaśasvinī | agnīnsā'janayatpuṇyānṣaḍekāṃ cāpi putrikām
बृहस्पति की पत्नी यशस्विनी चान्द्रमसी थीं। उन्होंने छह पवित्र अग्नियों और एक पुत्री को जन्म दिया।
श्लोक 10 (3.221.10)
आहुतिष्वेव यस्याग्नेर्हविराज्यं विधीयते । सोग्निर्बृहस्पतेः पुत्रः शंयुर्नाम महाप्रभः ॥
āhutiṣveva yasyāgnerhavirājyaṃ vidhīyate | sognirbṛhaspateḥ putraḥ śaṃyurnāma mahāprabhaḥ
जिस अग्नि को आहुतियों में घृत की हवि दी जाती है, वह बृहस्पति का पुत्र महाप्रभाशाली शंयु है।
श्लोक 11 (3.221.11)
चातुर्मास्येषु यस्येष्टमश्वमेधाग्रभागभूत् । दीप्तिज्वालैरनेकाग्रैरग्निष्टोमोऽथ वीर्यवान् ॥
cāturmāsyeṣu yasyeṣṭamaśvamedhāgrabhāgabhūt | dīptijvālairanekāgrairagniṣṭomo'tha vīryavān
जिसके लिए चातुर्मास्य यज्ञों में यजन होता है, जो अश्वमेध में अग्रभाग का भागी है, अनेक शिखाओं वाली दीप्त ज्वालाओं से युक्त वह पराक्रमी अग्नि अग्निष्टोम भी है।
श्लोक 12 (3.221.12)
शंयोरप्रतिमा भार्या सत्या सत्याऽथ धर्मजा । अग्निस्तस्य सुतो दीप्तस्तिस्रः कन्याश्च सुव्रताः ॥
śaṃyorapratimā bhāryā satyā satyā'tha dharmajā | agnistasya suto dīptastisraḥ kanyāśca suvratāḥ
शंयु की पत्नी अनुपम सत्या थीं, जो सत्यनिष्ठ और धर्म की पुत्री थीं। उनका पुत्र एक दीप्त अग्नि था, और उनकी उत्तम व्रत वाली तीन कन्याएँ थीं।
श्लोक 13 (3.221.13)
प्रथमेनाज्यभागेन पूज्यते योऽग्निरध्वरे । अग्निस्तस्य भरद्वाजः प्रथमः पुत्र उच्यते ॥
prathamenājyabhāgena pūjyate yo'gniradhvare | agnistasya bharadvājaḥ prathamaḥ putra ucyate
यज्ञ में घृत के प्रथम भाग से जिस अग्नि की पूजा होती है, वह भरद्वाज अग्नि शंयु का प्रथम पुत्र कहलाता है।
श्लोक 14 (3.221.14)
पौर्णमासेषु सर्वेषु हविराज्यं ध्रुवोद्यतम् । भरतो नामतः सोग्निर्द्वितीयः शंयुतः सुतः ॥
paurṇamāseṣu sarveṣu havirājyaṃ dhruvodyatam | bharato nāmataḥ sognirdvitīyaḥ śaṃyutaḥ sutaḥ
सभी पौर्णमास यज्ञों में जिसके लिए ध्रुवा (स्रुक्) से घृत की हवि उठाई जाती है, वह भरत नाम का अग्नि शंयु का दूसरा पुत्र है।
श्लोक 15 (3.221.15)
तिस्रः कन्या भवन्त्यन्या यासां स भरतः पतिः । भारतस्तु सुतस्तस्य भारत्येका च पुत्रिका ॥
tisraḥ kanyā bhavantyanyā yāsāṃ sa bharataḥ patiḥ | bhāratastu sutastasya bhāratyekā ca putrikā
तीन अन्य कन्याएँ हैं, जिनके स्वामी भरत हैं। भरत का पुत्र भारत नाम का अग्नि है और उनकी एक पुत्री भारती है।
श्लोक 16 (3.221.16)
भारतो भरतस्याग्नेः पावकस्तु प्रजायते । महानत्यर्थमहितस्तथा भरतसत्तम ॥
bhārato bharatasyāgneḥ pāvakastu prajāyate | mahānatyarthamahitastathā bharatasattama
भरत अग्नि से भारत उत्पन्न हुआ; और हे भरतश्रेष्ठ, अत्यन्त पूजित महान पावक भी उत्पन्न होता है।
श्लोक 17 (3.221.17)
भरद्वाजस्य भार्या तु वीरा वीरश्च पिण्डदः । प्राहुराज्येन तस्येज्यां सोमस्येव द्विजाः शनैः ॥
bharadvājasya bhāryā tu vīrā vīraśca piṇḍadaḥ | prāhurājyena tasyejyāṃ somasyeva dvijāḥ śanaiḥ
भरद्वाज की पत्नी वीरा थीं, और पिण्ड देने वाला वीर उनका पुत्र था। ब्राह्मण कहते हैं कि सोम की भाँति धीरे-धीरे घृत से उसका यजन होता है।
श्लोक 18 (3.221.18)
हविषा यो द्वितीयेन सोमेन सह युज्यते । रथप्रभू रथध्वानः कुम्भरेताः स उच्यते ॥
haviṣā yo dvitīyena somena saha yujyate | rathaprabhū rathadhvānaḥ kumbharetāḥ sa ucyate
जो अग्नि दूसरी हवि में सोम के साथ संयुक्त होता है, वह रथप्रभु, रथध्वान और कुम्भरेता कहलाता है।
श्लोक 19 (3.221.19)
सरय्वां जनयत्सिद्धिं भानुं भाभिः समावृणोत् । आग्नेयमनयन्मिथ्यं मिथ्यो नामैव कथ्यते ॥
sarayvāṃ janayatsiddhiṃ bhānuṃ bhābhiḥ samāvṛṇot | āgneyamanayanmithyaṃ mithyo nāmaiva kathyate
उसने सरयू से सिद्धि को उत्पन्न किया और अपनी प्रभा से सूर्य को ढक दिया। अग्नि को आहुति पहुँचाने वाला वह मिथ्य नाम से कहा जाता है।
श्लोक 20 (3.221.20)
यस्तु न च्यवते नित्यं यशसा वर्चसा श्रिया । अग्निर्निश्च्यवनो नाम पृथिवीं स्तौति केवलम् ॥
yastu na cyavate nityaṃ yaśasā varcasā śriyā | agnirniścyavano nāma pṛthivīṃ stauti kevalam
जो अग्नि कभी यश, तेज और श्री से च्युत नहीं होता, वह निश्च्यवन नाम का है; वह केवल पृथ्वी की स्तुति करता है।
श्लोक 21 (3.221.21)
विपाप्मा कलुषैर्मुक्तो विशुद्धश्चार्चिषा ज्वलन् । विपापोऽग्निः सुतस्तस्य योज्यः समयकर्मसु ॥
vipāpmā kaluṣairmukto viśuddhaścārciṣā jvalan | vipāpo'gniḥ sutastasya yojyaḥ samayakarmasu
पापरहित, कलुषों से मुक्त, शुद्ध और ज्वाला से प्रज्वलित विपाप नामक अग्नि उसका पुत्र है, जिसे समय पर होने वाले कर्मों में लगाया जाता है।
श्लोक 22 (3.221.22)
आक्रोशतां हि भूतानां यः करोति हि निष्कृतिम् । अग्निः स निष्कृतिर्नाम शोभयत्यभिसेवितः ॥
ākrośatāṃ hi bhūtānāṃ yaḥ karoti hi niṣkṛtim | agniḥ sa niṣkṛtirnāma śobhayatyabhisevitaḥ
जो अग्नि पुकारते हुए दुखी प्राणियों का प्रायश्चित्त (निष्कृति) करता है, वह निष्कृति नाम का अग्नि है; सेवित होने पर वह शोभा प्रदान करता है।
श्लोक 23 (3.221.23)
अनुकूजन्ति येनेह वेदनार्ताः स्वयं जनाः । तस्य पुत्रः स्वनो नाम पावकः स रुजस्करः ॥
anukūjanti yeneha vedanārtāḥ svayaṃ janāḥ | tasya putraḥ svano nāma pāvakaḥ sa rujaskaraḥ
उसका पुत्र स्वन नाम का पावक है, जिसके कारण पीड़ा से व्याकुल लोग स्वयं कराहते हैं; वह रोग उत्पन्न करने वाला है।
श्लोक 24 (3.221.24)
यस्तु विश्वस्य जगतो बुद्धिमाक्रम्य तिष्ठति । तं प्राहुरध्यात्मविदो विश्वजिन्नाम पावकम् ॥
yastu viśvasya jagato buddhimākramya tiṣṭhati | taṃ prāhuradhyātmavido viśvajinnāma pāvakam
जो अग्नि सारे जगत की बुद्धि में व्याप्त होकर स्थित है, उसे अध्यात्म के ज्ञाता विश्वजित् नाम का पावक कहते हैं।
श्लोक 25 (3.221.25)
अन्तराग्निः स्मृतो यस्तु भुक्तं पचति देहिनाम् । स यज्ञे विश्वभुङ्नाम सर्वलोकेषु भारत ॥
antarāgniḥ smṛto yastu bhuktaṃ pacati dehinām | sa yajñe viśvabhuṅnāma sarvalokeṣu bhārata
हे भारत, जो अन्तराग्नि देहधारियों के खाए हुए अन्न को पचाता है, वह सभी लोकों में यज्ञ में विश्वभुक् नाम से प्रसिद्ध है।
श्लोक 26 (3.221.26)
ब्रह्मचारी यतात्मा च सततं विपुलप्रभः । ब्राह्मणाः पूजयन्त्येनं पाकयज्ञेषु पावकम् ॥
brahmacārī yatātmā ca satataṃ vipulaprabhaḥ | brāhmaṇāḥ pūjayantyenaṃ pākayajñeṣu pāvakam
ब्रह्मचारी, संयमी और सदा विपुल प्रभा वाले इस पावक की ब्राह्मण पाकयज्ञों में पूजा करते हैं।
श्लोक 27 (3.221.27)
प्रथितो गोपतिर्नाम नदी यस्याभवत्प्रिया । तस्मिन्कर्माणि सर्वाणि क्रियन्ते धर्मकर्तृभिः ॥
prathito gopatirnāma nadī yasyābhavatpriyā | tasminkarmāṇi sarvāṇi kriyante dharmakartṛbhiḥ
गोपति नाम से प्रसिद्ध वह अग्नि है जिसकी प्रिया एक नदी थी; धर्म करने वाले लोग उसी में सब कर्म सम्पन्न करते हैं।
श्लोक 28 (3.221.28)
बडबाग्निः पिबत्यम्भो योसौ परमदारुणः । ऊर्ध्वभागूर्ध्वभाङ्नाम कविः प्राणाश्रितस्तु यः ॥
baḍabāgniḥ pibatyambho yosau paramadāruṇaḥ | ūrdhvabhāgūrdhvabhāṅnāma kaviḥ prāṇāśritastu yaḥ
जो अत्यन्त भयंकर वडवाग्नि जल को पीता है, वह ऊर्ध्वभाक् नाम का है — ऊर्ध्व भाग का भागी, प्राण में आश्रित कवि।
श्लोक 29 (3.221.29)
उदग्द्वारं हविर्यस्य गृहे नित्यं प्रदीयते । ततस्तुष्टो भवेद्ब्रह्मा स्विष्टकृत्परमः स्मृतः ॥
udagdvāraṃ haviryasya gṛhe nityaṃ pradīyate | tatastuṣṭo bhavedbrahmā sviṣṭakṛtparamaḥ smṛtaḥ
घर में जिसके लिए उत्तर द्वार पर सदा हवि दी जाती है, जिससे ब्रह्मा प्रसन्न होते हैं, वह परम अग्नि स्विष्टकृत् कहलाता है।
श्लोक 30 (3.221.30)
यः प्रशान्तेषु भूतेषु आविर्भवति पावकः । क्रुद्धस्य तु रसो जज्ञे मन्युतीव्रा च पुत्रिका ॥
yaḥ praśānteṣu bhūteṣu āvirbhavati pāvakaḥ | kruddhasya tu raso jajñe manyutīvrā ca putrikā
जो पावक शान्त प्राणियों में प्रकट होता है, उस क्रुद्ध अग्नि से रस उत्पन्न हुआ, और क्रोध से तीव्र एक पुत्री भी —
श्लोक 31 (3.221.31)
स्वाहेति दारुणा क्रूरा सर्वभूतेषु तिष्ठति । त्रिदिवे यस्य सदृशो नास्ति रूपेण कश्चन । अतुलत्वात्कृतो देवैर्नाम्ना कामस्तु पावकः ॥
svāheti dāruṇā krūrā sarvabhūteṣu tiṣṭhati | tridive yasya sadṛśo nāsti rūpeṇa kaścana | atulatvātkṛto devairnāmnā kāmastu pāvakaḥ
स्वाहा, जो दारुण और क्रूर है और सब प्राणियों में स्थित है। स्वर्ग में रूप में जिसके समान कोई नहीं, उस अग्नि को अतुलनीय होने के कारण देवताओं ने काम नाम दिया।
श्लोक 32 (3.221.32)
संहर्षाद्धारयन्क्रोधं धन्वी स्रग्वी रथे स्थितः । समरे नाशयेच्छत्रूनमोघो नाम पावकः ॥
saṃharṣāddhārayankrodhaṃ dhanvī sragvī rathe sthitaḥ | samare nāśayecchatrūnamogho nāma pāvakaḥ
जो हर्षपूर्वक क्रोध को धारण किए, धनुष लिए, माला पहने, रथ पर खड़ा होकर युद्ध में शत्रुओं का नाश करता है, वह अमोघ नाम का पावक है।
श्लोक 33 (3.221.33)
उक्थ्यो नाम महाभाग त्रिभिरुक्थैरभिष्टुतः । महावर्षं त्वजनयत्सकामाश्वं हि यं विदुः ॥
ukthyo nāma mahābhāga tribhirukthairabhiṣṭutaḥ | mahāvarṣaṃ tvajanayatsakāmāśvaṃ hi yaṃ viduḥ
हे महाभाग, तीन उक्थों से स्तुत उक्थ्य नाम के अग्नि ने महावर्ष को जन्म दिया, जिसे सकामाश्व के नाम से जानते हैं।"