आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 222
पाँच ऋषियों से उत्पन्न पाञ्चजन्य अग्नि
मार्कण्डेय अग्नियों का वंश-वर्णन आगे बढ़ाते हैं। काश्यप, वासिष्ठ, पुत्र सहित प्राण, आङ्गिरस अग्नि और च्यवन — ये पाँच ऋषि पुत्र के लिए तप करते हैं, और महाव्याहृतियों के ध्यान से तेजस्वी, पाँच रंगों वाला पाञ्चजन्य अग्नि उत्पन्न होता है, जिसे तप भी कहते हैं। वह अपने शरीर से पितरों का अग्नि, देवताओं और प्राणियों को, पितरों के पाँच पुत्रों को तथा यज्ञ चुराने वाले पन्द्रह देवताओं को रचता है, जिन्हें अग्नि और मन्त्र ही यज्ञ से दूर रखते हैं। अन्त में उसके अग्नि-पुत्र बृहदुक्थ और रथन्तर का वर्णन है, और वह अपनी सन्तान से प्रसन्न होता है।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 1 (3.222.1)
काश्यपो ह्यथ वासिष्ठः प्राणश्च प्राणपुत्रकः । अग्निराङ्गिरसश्चैव च्यवनस्तीव्रवर्चकः ॥
kāśyapo hyatha vāsiṣṭhaḥ prāṇaśca prāṇaputrakaḥ | agnirāṅgirasaścaiva cyavanastīvravarcakaḥ
काश्यप, वासिष्ठ, प्राण और प्राण का पुत्र, आङ्गिरस अग्नि तथा तीव्र तेज वाले च्यवन —
श्लोक 2 (3.222.2)
अचरत्स तपस्तीव्रं पुत्रार्थे बहुवार्षिकम् । पुत्रं लभेयं धर्मिष्ठं यशसा ब्रह्मणा समम् ॥
acaratsa tapastīvraṃ putrārthe bahuvārṣikam | putraṃ labheyaṃ dharmiṣṭhaṃ yaśasā brahmaṇā samam
इन्होंने पुत्र की प्राप्ति के लिए बहुत वर्षों तक कठोर तप किया, यह सोचकर कि "मुझे ऐसा परम धर्मनिष्ठ पुत्र मिले जो यश में ब्रह्मा के समान हो।"
श्लोक 3 (3.222.3)
महाव्याहृतिभिर्ध्यातः पञ्चभिस्तैस्तदा त्वथ । जज्ञे तेजोमयार्चिष्मान्पञ्चवर्णः प्रभाकरः ॥
mahāvyāhṛtibhirdhyātaḥ pañcabhistaistadā tvatha | jajñe tejomayārciṣmānpañcavarṇaḥ prabhākaraḥ
तब उन पाँचों के द्वारा पाँच महाव्याहृतियों से ध्यान किए जाने पर एक तेजोमय, ज्वालाओं से युक्त, पाँच रंगों वाला, सूर्य के समान प्रकाशमान पुरुष उत्पन्न हुआ।
श्लोक 4 (3.222.4)
समिद्धोऽग्निः शिरस्तस्य बाहू सूर्यनिभौ तथा । त्वङ्नेत्रे च सुवर्णाभे कृष्णे जङ्घे च भारत ॥
samiddho'gniḥ śirastasya bāhū sūryanibhau tathā | tvaṅnetre ca suvarṇābhe kṛṣṇe jaṅghe ca bhārata
हे भारत, उसका सिर प्रज्वलित अग्नि था, भुजाएँ सूर्य के समान थीं, त्वचा और नेत्र सुवर्ण-सी आभा वाले थे और पिंडलियाँ काली थीं।
श्लोक 5 (3.222.5)
पञ्चवर्णः स तपसा कृतस्तैः पञ्चभिर्जनैः । पाञ्चजन्यः श्रुतो देवः पञ्चवंशकरस्तु सः ॥
pañcavarṇaḥ sa tapasā kṛtastaiḥ pañcabhirjanaiḥ | pāñcajanyaḥ śruto devaḥ pañcavaṃśakarastu saḥ
उन पाँच पुरुषों के तप से रचा गया वह पाँच रंगों वाला देव पाञ्चजन्य नाम से प्रसिद्ध है, और वही पाँच वंशों का प्रवर्तक हुआ।
श्लोक 6 (3.222.6)
दशवर्षसहस्राणि तपस्तप्त्वा महातपाः । जनयत्पावकं घोरं पितॄणां स प्रजाः सृजन् ॥
daśavarṣasahasrāṇi tapastaptvā mahātapāḥ | janayatpāvakaṃ ghoraṃ pitṝṇāṃ sa prajāḥ sṛjan
दस हज़ार वर्षों तक तप करके उस महातपस्वी ने प्रजा की सृष्टि करते हुए पितरों के भयंकर अग्नि को उत्पन्न किया।
श्लोक 7 (3.222.7)
बृहद्रथंतरौ मूर्ध्ना वक्त्राच्च तपसा हरिम् । शिवं नाभ्यां बलादिन्द्रं प्राणाद्वायुं च भारत ॥
bṛhadrathaṃtarau mūrdhnā vaktrācca tapasā harim | śivaṃ nābhyāṃ balādindraṃ prāṇādvāyuṃ ca bhārata
हे भारत, उसने अपने मस्तक से बृहत् और रथन्तर साम, तप के बल से मुख से हरि, नाभि से शिव, बल से इन्द्र और प्राण से वायु को रचा;
श्लोक 8 (3.222.8)
बाहुभ्यामनुदात्तौ च विश्वे भूतानि चैव ह । एतान्सृष्ट्वा ततः पञ्च पितॄणामसृजत्सुतान् ॥
bāhubhyāmanudāttau ca viśve bhūtāni caiva ha | etānsṛṣṭvā tataḥ pañca pitṝṇāmasṛjatsutān
दोनों भुजाओं से दो अनुदात्तों, विश्वेदेवों और भूतों को रचा। इन्हें रचकर फिर उसने पितरों के पाँच पुत्रों की सृष्टि की —
श्लोक 9 (3.222.9)
बृहद्रथस्य प्रणिधिः काश्यपस्य महत्तरः । भानुरङ्गिरसो धीरः पुत्रो वर्चस्य सौरभः ॥
bṛhadrathasya praṇidhiḥ kāśyapasya mahattaraḥ | bhānuraṅgiraso dhīraḥ putro varcasya saurabhaḥ
बृहद्रथ का प्रतिनिधि, काश्यप का पुत्र महत्तर; अङ्गिरा का धीर पुत्र भानु; वर्च का पुत्र सौरभ;
श्लोक 10 (3.222.10)
प्राणस्य चानुदात्तस्तु व्याख्याताः पञ्च वंशजाः । देवान्यज्ञमुषश्चान्यान्सृजन्पञ्चदशोत्तरान् ॥
prāṇasya cānudāttastu vyākhyātāḥ pañca vaṃśajāḥ | devānyajñamuṣaścānyānsṛjanpañcadaśottarān
और प्राण का पुत्र अनुदात्त। इन पाँच वंशजों का वर्णन हो चुका। फिर उसने पन्द्रह अन्य देवताओं की सृष्टि की, जो यज्ञ को चुराने वाले हैं —
श्लोक 11 (3.222.11)
सुभीममतिभीमं च भीमं भीमबलाबलम् । एतान्यज्ञमुषः पञ्च देवानप्यसृजत्ततः ॥
subhīmamatibhīmaṃ ca bhīmaṃ bhīmabalābalam | etānyajñamuṣaḥ pañca devānapyasṛjattataḥ
सुभीम, अतिभीम, भीम, भीमबल और अबल — यज्ञ चुराने वाले इन पाँच देवताओं को उसने पहले रचा।
श्लोक 12 (3.222.12)
सुमित्रं मित्रवन्तं च मित्रज्ञं मित्रवर्धनम् । मित्रधर्माणमित्येतान्देवानभ्यसृजत्ततः ॥
sumitraṃ mitravantaṃ ca mitrajñaṃ mitravardhanam | mitradharmāṇamityetāndevānabhyasṛjattataḥ
सुमित्र, मित्रवान्, मित्रज्ञ, मित्रवर्धन और मित्रधर्मा — इन देवताओं को उसने उसके बाद रचा।
श्लोक 13 (3.222.13)
सुरप्रवीरं वीरं च सुरेशं च सुवर्चसम् । सुराणामपि भर्तारं पञ्चैतानसृजत्ततः ॥
surapravīraṃ vīraṃ ca sureśaṃ ca suvarcasam | surāṇāmapi bhartāraṃ pañcaitānasṛjattataḥ
सुरप्रवीर, वीर, सुरेश, सुवर्चा और सुरों का भर्ता — इन पाँचों को उसने फिर रचा।
श्लोक 14 (3.222.14)
त्रिविधं संस्थिता ह्येते पञ्चपञ्च पृथक्पृथक् । मुष्णन्त्यत्र स्थिता ह्येते स्वर्गतान्यज्ञयाजिनः ॥
trividhaṃ saṃsthitā hyete pañcapañca pṛthakpṛthak | muṣṇantyatra sthitā hyete svargatānyajñayājinaḥ
ये पाँच-पाँच करके अलग-अलग तीन वर्गों में स्थित हैं, और यहीं रहकर यज्ञ करके स्वर्ग गए लोगों का पुण्य चुराते हैं।
श्लोक 15 (3.222.15)
तेषामिष्टं हरन्त्येते निघ्नन्ति च महद्धविः । स्पर्धयाहव्यवाहानां निघ्नन्त्येते हरन्ति च ॥
teṣāmiṣṭaṃ harantyete nighnanti ca mahaddhaviḥ | spardhayāhavyavāhānāṃ nighnantyete haranti ca
ये उनके यज्ञ का फल हर लेते हैं और महान हवि को नष्ट करते हैं; हव्य ढोने वाली अग्नियों से होड़ करते हुए ये उसे नष्ट करते और हर ले जाते हैं।
श्लोक 16 (3.222.16)
बहिर्वेद्यां तदादानं कुशलैः संप्रवर्तितम् । तत्रैते नोपसर्पन्ति यत्र चाग्निः स्थितो भवेत् ॥
bahirvedyāṃ tadādānaṃ kuśalaiḥ saṃpravartitam | tatraite nopasarpanti yatra cāgniḥ sthito bhavet
इसीलिए कुशल याज्ञिकों ने उनका भाग वेदी के बाहर देने की रीति चलाई है; जहाँ अग्नि प्रतिष्ठित होता है, वहाँ ये पास नहीं आते।
श्लोक 17 (3.222.17)
चितोऽग्निरुद्वहन्यज्ञं पक्षाभ्यां तान्प्रबाधते । मन्त्रैः प्रशमिताह्येते नेष्टं मुष्णन्ति यज्ञियम् ॥
cito'gnirudvahanyajñaṃ pakṣābhyāṃ tānprabādhate | mantraiḥ praśamitāhyete neṣṭaṃ muṣṇanti yajñiyam
चयन किया हुआ अग्नि यज्ञ को वहन करता हुआ अपने दोनों पंखों से उन्हें दूर हटा देता है; मन्त्रों से शान्त किए गए ये यज्ञ की हवि नहीं चुरा पाते।
श्लोक 18 (3.222.18)
तपस्ये बृहदुक्थस्य पुत्रो भूमिमुपाश्रितः । अग्निहोत्रे हूयमाने पृथिव्यां सद्भिरीड्यते ॥
tapasye bṛhadukthasya putro bhūmimupāśritaḥ | agnihotre hūyamāne pṛthivyāṃ sadbhirīḍyate
तप का पुत्र बृहदुक्थ पृथ्वी पर आश्रय लेकर रहता है; अग्निहोत्र में आहुति दिए जाने पर पृथ्वी पर सज्जन उसकी स्तुति करते हैं।
श्लोक 19 (3.222.19)
रथन्तरश्चतपसः पुत्रोऽग्निः परिपठ्यते । मित्रविन्दा तथा भार्या हविरध्वर्यवो विदुः ॥
rathantaraścatapasaḥ putro'gniḥ paripaṭhyate | mitravindā tathā bhāryā haviradhvaryavo viduḥ
रथन्तर को तप का अग्नि-पुत्र कहा जाता है; मित्रविन्दा उसकी पत्नी है, और अध्वर्यु उसे हवि का पात्र जानते हैं।
श्लोक 20 (3.222.20)
एतैः सह महाभाग तपस्तेजस्विभिर्नृप । मुमुदे परमप्रीतः सह पुत्रैर्महायशाः ॥
etaiḥ saha mahābhāga tapastejasvibhirnṛpa | mumude paramaprītaḥ saha putrairmahāyaśāḥ
हे महाभाग राजन्, तप और तेज से सम्पन्न इन पुत्रों के साथ वह महायशस्वी अत्यन्त प्रसन्न होकर आनन्दित हुआ।