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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 223

भानु के पुत्र और प्रायश्चित्त की अग्नियाँ

मार्कण्डेय और भी अग्नियों के नाम बताते हैं — पुष्टि देने वाला भरत, कल्याणकारी शिव, पुरन्दर, ऊष्मा, मनु, शम्भु और आवसथ्य। अङ्गिरा मनु और भानु (बृहद्भानु) को रचते हैं; भानु की पत्नी बृहद्भासा बलद, मन्युमान्, धृतिमान्, आग्रयण आदि अग्नियों को जन्म देती है, और मनु की पत्नी निशा वैश्वानर, विश्वपति, सन्निहित, सांख्य-प्रवर्तक कपिल और अग्रणी को। अन्त में वे उन अग्नियों को गिनाते हैं जिन्हें अग्निहोत्र के दूषित या बाधित होने पर प्रायश्चित्त के रूप में अष्टाकपाल इष्टि दी जाती है।

अध्याय 222अध्याय-सूचीअध्याय 224

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 1 (3.223.1)

गुरुभिर्नियमैर्युक्तो भरतो नाम पार्थिव । अग्निः पुष्टिमतिर्नाम तुष्टः पुष्टिं प्रयच्छति ॥

gurubhirniyamairyukto bharato nāma pārthiva | agniḥ puṣṭimatirnāma tuṣṭaḥ puṣṭiṃ prayacchati

हे राजन्, कठोर नियमों से युक्त भरत नामक अग्नि ही पुष्टिमति अग्नि है, जो प्रसन्न होने पर पुष्टि प्रदान करता है।

श्लोक 2 (3.223.2)

सततं भरतश्रेष्ठ पावकोयं महाप्रभः । अग्निर्यश्च शिवो नाम शक्तिपूजापरश्च सः । दुःखार्तानां स सर्वेषां शिवकृत्सततं शिवः ॥

satataṃ bharataśreṣṭha pāvakoyaṃ mahāprabhaḥ | agniryaśca śivo nāma śaktipūjāparaśca saḥ | duḥkhārtānāṃ sa sarveṣāṃ śivakṛtsatataṃ śivaḥ

हे भरतश्रेष्ठ, यह अग्नि सदा महान प्रभा वाला है। शिव नामक अग्नि शक्ति की पूजा में तत्पर रहता है; दुःख से पीड़ित सभी प्राणियों के लिए वह सदा कल्याणकारी और मंगल करने वाला है।

श्लोक 3 (3.223.3)

तपसस्तु फलं दृष्ट्वासंप्रवृत्तं तपोमयम् । उद्धर्तुकामो मतिमान्पुत्रो जज्ञे पुरंदरः ॥

tapasastu phalaṃ dṛṣṭvāsaṃpravṛttaṃ tapomayam | uddhartukāmo matimānputro jajñe puraṃdaraḥ

तप का फल प्रकट हुआ देखकर, जो पूरी तरह तपोमय था, उसे ऊपर उठाने की इच्छा से एक बुद्धिमान पुत्र पुरन्दर उत्पन्न हुआ।

श्लोक 4 (3.223.4)

उष्मा चैवोष्मणो जज्ञे सोऽग्निर्भूतेषु लक्ष्यते । अग्निश्चापि मनुर्नाम प्राजापत्यं सकारणम् ॥

uṣmā caivoṣmaṇo jajñe so'gnirbhūteṣu lakṣyate | agniścāpi manurnāma prājāpatyaṃ sakāraṇam

ऊष्मा से ऊष्मा नामक अग्नि उत्पन्न हुआ; वह अग्नि सब प्राणियों में दिखाई देता है। मनु नामक अग्नि भी है, जो प्रजापति से सम्बन्धित है और सृष्टि का कारण है।

श्लोक 5 (3.223.5)

शंभुमग्निमथ प्राहुर्ब्राह्मणा वेदपारगाः । आवसथ्यं द्विजाः प्राहुर्दीप्तमग्निं महाप्रभम् ॥

śaṃbhumagnimatha prāhurbrāhmaṇā vedapāragāḥ | āvasathyaṃ dvijāḥ prāhurdīptamagniṃ mahāprabham

वेदों के पारंगत ब्राह्मण एक अग्नि को शम्भु कहते हैं; और द्विज महान प्रभा वाले प्रदीप्त अग्नि को आवसथ्य कहते हैं।

श्लोक 6 (3.223.6)

ऊर्जस्करान्हव्यवाहान्सुवर्णसदृशप्रभान् । अग्निस्तपो ह्यजनयत्पञ्च यज्ञसुतानिह ॥

ūrjaskarānhavyavāhānsuvarṇasadṛśaprabhān | agnistapo hyajanayatpañca yajñasutāniha

तप नामक अग्नि ने यहाँ यज्ञ के पाँच पुत्र उत्पन्न किए — बल देने वाले, हव्य ढोने वाले और सुवर्ण के समान प्रभा वाले।

श्लोक 7 (3.223.7)

प्रततोऽग्निर्महाभाग परिश्रान्तो गवांपतिः । असुराञ्जनयन्घोरान्मर्त्यांश्चैव पृथग्विधान् ॥

pratato'gnirmahābhāga pariśrānto gavāṃpatiḥ | asurāñjanayanghorānmartyāṃścaiva pṛthagvidhān

हे महाभाग, सर्वत्र फैला हुआ गवाम्पति अग्नि भयंकर असुरों और नाना प्रकार के मनुष्यों को उत्पन्न करते हुए थक गया।

श्लोक 8 (3.223.8)

तपसश्च मनुं पुत्रं भानुं चाप्यङ्गिराः सृजत् । बृहद्भानुं तु तं प्राहुर्ब्राह्मणा वेदपारगाः ॥

tapasaśca manuṃ putraṃ bhānuṃ cāpyaṅgirāḥ sṛjat | bṛhadbhānuṃ tu taṃ prāhurbrāhmaṇā vedapāragāḥ

अङ्गिरा ने तप के पुत्रों के रूप में मनु और भानु को रचा; वेदों के पारंगत ब्राह्मण उस भानु को बृहद्भानु कहते हैं।

श्लोक 9 (3.223.9)

भानोर्भार्या महाराज बृहद्भासा तु सोमजा । षट्पुत्राञ्जनयामास तदा सा कन्यया सह । भानोराङ्गिरसस्याथ शृणु तस्य प्रजाविधिम् ॥

bhānorbhāryā mahārāja bṛhadbhāsā tu somajā | ṣaṭputrāñjanayāmāsa tadā sā kanyayā saha | bhānorāṅgirasasyātha śṛṇu tasya prajāvidhim

हे महाराज, भानु की पत्नी सोम की पुत्री बृहद्भासा थी। उसने तब एक कन्या सहित छह पुत्रों को जन्म दिया। अब अङ्गिरा-वंशी भानु की सन्तति का क्रम सुनो।

श्लोक 10 (3.223.10)

दुर्बलानां तु भूतानामसून् यः संप्रयच्छति । तमग्निं बलदं प्राहुः प्रथमं भानुजं सुतम् ॥

durbalānāṃ tu bhūtānāmasūn yaḥ saṃprayacchati | tamagniṃ baladaṃ prāhuḥ prathamaṃ bhānujaṃ sutam

जो अग्नि दुर्बल प्राणियों को प्राण प्रदान करता है, उसे बलद कहते हैं; वह भानु का पहला पुत्र है।

श्लोक 11 (3.223.11)

यः प्रशान्तेषु भूतेषु मन्युर्भवति दारुणः । अग्निः स मन्युमान्नाम द्वितीयो भानुजः सुतः ॥

yaḥ praśānteṣu bhūteṣu manyurbhavati dāruṇaḥ | agniḥ sa manyumānnāma dvitīyo bhānujaḥ sutaḥ

जो शान्त प्राणियों में भयंकर क्रोध बनकर प्रकट होता है, वह मन्युमान् नामक अग्नि भानु का दूसरा पुत्र है।

श्लोक 12 (3.223.12)

दर्शे च पौर्णमासे च यस्येह हविरुच्यते । विष्णुर्नामेह योऽग्निस्तु धृतिमान्नाम सोङ्गिराः ॥

darśe ca paurṇamāse ca yasyeha havirucyate | viṣṇurnāmeha yo'gnistu dhṛtimānnāma soṅgirāḥ

दर्श और पौर्णमास यज्ञों में जिसकी हवि बताई जाती है, जो यहाँ विष्णु नाम से जाना जाता है, वह अङ्गिरा-वंशी अग्नि धृतिमान् है।

श्लोक 13 (3.223.13)

इन्द्रेण सहितं यस्य हविराग्रयणं स्मृतम् । अग्निराग्रयणो नाम भानोरेवान्वयस्तु सः ॥

indreṇa sahitaṃ yasya havirāgrayaṇaṃ smṛtam | agnirāgrayaṇo nāma bhānorevānvayastu saḥ

इन्द्र के साथ जिसकी हवि आग्रयण (नवान्न की आहुति) कहलाती है, वह आग्रयण नामक अग्नि है; वह भी भानु का ही वंशज है।

श्लोक 14 (3.223.14)

चातुर्मास्येषु नित्यानां हविषां यो निरग्रहः । चतुर्भिः सहितः पुत्रैर्भानोरेवान्वयस्तु सः ॥

cāturmāsyeṣu nityānāṃ haviṣāṃ yo niragrahaḥ | caturbhiḥ sahitaḥ putrairbhānorevānvayastu saḥ

चातुर्मास्य यज्ञों में नियमित हवियाँ जिसकी होती हैं, वह निरग्रह अग्नि अपने चार पुत्रों सहित भानु का ही वंशज है।

श्लोक 15 (3.223.15)

निशा त्वजनयत्कन्यामग्नीषोमावुभौ तथा । मनोरेवाभवद्भार्या सुषुवे पञ्च पावकान् ॥

niśā tvajanayatkanyāmagnīṣomāvubhau tathā | manorevābhavadbhāryā suṣuve pañca pāvakān

निशा ने एक कन्या और अग्नि-सोम की जोड़ी को जन्म दिया; वह मनु की पत्नी थी, और उसने पाँच अग्नियों को जन्म दिया।

श्लोक 16 (3.223.16)

पूज्यते हविषा योऽग्रे चातुर्मास्येषु पावकः । पर्जन्यसहितः श्रीमानग्निर्वैश्वानरस्तु सः ॥

pūjyate haviṣā yo'gre cāturmāsyeṣu pāvakaḥ | parjanyasahitaḥ śrīmānagnirvaiśvānarastu saḥ

चातुर्मास्य यज्ञों में जिसकी सबसे पहले हवि से पूजा होती है, पर्जन्य के साथ रहने वाला वह श्रीमान् अग्नि वैश्वानर है।

श्लोक 17 (3.223.17)

अस्य लोकस्य सर्वस्य यः प्रभुः परिपठ्यते । सोऽग्निर्विश्वपतिर्नाम द्वितीयस्तापसः सुतः ॥

asya lokasya sarvasya yaḥ prabhuḥ paripaṭhyate | so'gnirviśvapatirnāma dvitīyastāpasaḥ sutaḥ

जो इस समस्त लोक का प्रभु कहा जाता है, वह विश्वपति नामक अग्नि तप का दूसरा पुत्र है।

श्लोक 18 (3.223.18)

कन्या या हरिणी नाम हिरण्यकशिपोः सुता । कर्मणाऽसौ बभौ भार्या स वह्निः स प्रजापतिः ॥

kanyā yā hariṇī nāma hiraṇyakaśipoḥ sutā | karmaṇā'sau babhau bhāryā sa vahniḥ sa prajāpatiḥ

हिरण्यकशिपु की हरिणी नामक पुत्री अपने कर्मों से उसकी पत्नी बनी; वह अग्नि प्रजापति है।

श्लोक 19 (3.223.19)

प्राणानाश्रित्य यो देहं प्रवर्तयति देहिनाम् । तस्य सन्निहितो नाम शब्दरूपस्य साधनः ॥

prāṇānāśritya yo dehaṃ pravartayati dehinām | tasya sannihito nāma śabdarūpasya sādhanaḥ

जो प्राणों का आश्रय लेकर देहधारियों के शरीर को क्रियाशील करता है, उस अग्नि का नाम सन्निहित है; वह शब्द और रूप का साधन है।

श्लोक 20 (3.223.20)

शुक्लं कृष्णं वपुर्देवो यो बिभर्ति हुताशनः । अकल्मषः कल्मषाणां कर्ता क्रोधाश्रितस्तु सः ॥

śuklaṃ kṛṣṇaṃ vapurdevo yo bibharti hutāśanaḥ | akalmaṣaḥ kalmaṣāṇāṃ kartā krodhāśritastu saḥ

जो देव, हुताशन, श्वेत और कृष्ण दोनों प्रकार का शरीर धारण करता है, जो स्वयं निष्कलंक होकर भी कलुषों का कर्ता है, वह क्रोध में निवास करने वाला अग्नि है।

श्लोक 21 (3.223.21)

कपिलं परमर्षिं च यं प्राहुर्यतयः सदा । अग्निः स कपिलो नाम साङ्ख्ययोगप्रवर्तकः ॥

kapilaṃ paramarṣiṃ ca yaṃ prāhuryatayaḥ sadā | agniḥ sa kapilo nāma sāṅkhyayogapravartakaḥ

यति जिसे सदा परमर्षि कपिल कहते हैं, वह कपिल नामक अग्नि सांख्य-योग का प्रवर्तक है।

श्लोक 22 (3.223.22)

योऽन्तर्यच्छति भूतानि येन चेष्टन्ति नित्यदा । कर्मस्विह विचित्रेषु सोऽग्रणीर्वह्निरुच्यते ॥

yo'ntaryacchati bhūtāni yena ceṣṭanti nityadā | karmasviha vicitreṣu so'graṇīrvahnirucyate

जो भीतर से प्राणियों का नियमन करता है, जिसके द्वारा वे इस लोक में नाना प्रकार के कर्मों में सदा प्रवृत्त होते हैं, वह अग्रणी अग्नि कहलाता है।

श्लोक 23 (3.223.23)

इमानन्यान्समसृजत्पावकान्प्रथितौजसः । अग्निहोत्रस्य दुष्टस्य प्रायश्चित्तार्थमुल्बणान् ॥

imānanyānsamasṛjatpāvakānprathitaujasaḥ | agnihotrasya duṣṭasya prāyaścittārthamulbaṇān

उसने इन अन्य प्रसिद्ध पराक्रम वाले उग्र अग्नियों को अग्निहोत्र के दूषित होने पर प्रायश्चित्त के लिए रचा।

श्लोक 24 (3.223.24)

संस्पृशेयुर्यदाऽन्योन्यं कथंचिद्वायुनाऽग्नयः । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या वै शुचयेऽग्नये ॥

saṃspṛśeyuryadā'nyonyaṃ kathaṃcidvāyunā'gnayaḥ | iṣṭiraṣṭākapālena kāryā vai śucaye'gnaye

यदि किसी प्रकार वायु के कारण अग्नियाँ एक-दूसरे का स्पर्श कर लें, तो आठ कपालों में पकाए पुरोडाश से शुचि अग्नि के लिए इष्टि करनी चाहिए।

श्लोक 25 (3.223.25)

दक्षिणाग्निर्यदा द्वाभ्यां संसृजेत तदा किल । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या वै वीतयेऽग्नये ॥

dakṣiṇāgniryadā dvābhyāṃ saṃsṛjeta tadā kila | iṣṭiraṣṭākapālena kāryā vai vītaye'gnaye

यदि दक्षिणाग्नि अन्य दो अग्नियों से मिल जाए, तो आठ कपालों में पकाए पुरोडाश से वीति अग्नि के लिए इष्टि करनी चाहिए।

श्लोक 26 (3.223.26)

यद्यग्नयो हि स्पृश्येयुर्निवेशस्था दवाग्निना । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या तु शुचयेऽग्नये ॥

yadyagnayo hi spṛśyeyurniveśasthā davāgninā | iṣṭiraṣṭākapālena kāryā tu śucaye'gnaye

यदि अपने स्थानों पर स्थापित अग्नियों का दावाग्नि से स्पर्श हो जाए, तो आठ कपालों में पकाए पुरोडाश से शुचि अग्नि के लिए इष्टि करनी चाहिए।

श्लोक 27 (3.223.27)

अग्निं रजस्वला वै स्त्री संस्पृशेदाग्निहौत्रिकम् । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या वसुमतेऽग्नये ॥

agniṃ rajasvalā vai strī saṃspṛśedāgnihautrikam | iṣṭiraṣṭākapālena kāryā vasumate'gnaye

यदि रजस्वला स्त्री अग्निहोत्र के अग्नि का स्पर्श कर ले, तो आठ कपालों में पकाए पुरोडाश से वसुमान् अग्नि के लिए इष्टि करनी चाहिए।

श्लोक 28 (3.223.28)

मृतः श्रूयेत यो जीवन्परासुरशुचिर्यथा । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या सुरभिमतेऽग्नये ॥

mṛtaḥ śrūyeta yo jīvanparāsuraśuciryathā | iṣṭiraṣṭākapālena kāryā surabhimate'gnaye

यदि कोई जीवित व्यक्ति मृत सुना जाए, मानो वह निष्प्राण और अशुद्ध हो, तो आठ कपालों में पकाए पुरोडाश से सुरभिमान् अग्नि के लिए इष्टि करनी चाहिए।

श्लोक 29 (3.223.29)

आर्तो न जुहुयादग्निं त्रिरात्रं यस्तु ब्राह्मणः । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या तन्तुमतेऽग्नये ॥

ārto na juhuyādagniṃ trirātraṃ yastu brāhmaṇaḥ | iṣṭiraṣṭākapālena kāryā tantumate'gnaye

यदि कोई ब्राह्मण पीड़ित होने के कारण तीन रात तक अग्नि में आहुति न दे, तो आठ कपालों में पकाए पुरोडाश से तन्तुमान् अग्नि के लिए इष्टि करनी चाहिए।

श्लोक 30 (3.223.30)

दर्शश्च पौर्णमासश्च यस्य तिष्ठेत्प्रतिष्ठितम् । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या पथिकृतेऽग्नये ॥

darśaśca paurṇamāsaśca yasya tiṣṭhetpratiṣṭhitam | iṣṭiraṣṭākapālena kāryā pathikṛte'gnaye

जिसके स्थापित दर्श और पौर्णमास यज्ञ रुक जाएँ, उसे आठ कपालों में पकाए पुरोडाश से पथिकृत् अग्नि के लिए इष्टि करनी चाहिए।

श्लोक 31 (3.223.31)

सूतिकाग्निर्यदा चाग्निं संस्पृशेदाग्निहौत्रिकम् । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या चाग्निमतेऽग्नये ॥

sūtikāgniryadā cāgniṃ saṃspṛśedāgnihautrikam | iṣṭiraṣṭākapālena kāryā cāgnimate'gnaye

जब सूतिका-गृह का अग्नि अग्निहोत्र के अग्नि का स्पर्श कर ले, तब आठ कपालों में पकाए पुरोडाश से अग्निमान् अग्नि के लिए इष्टि करनी चाहिए।

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