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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 224

अग्नि का जल में छिपना और धिष्ण्य अग्नियाँ

मार्कण्डेय मुदिता से उत्पन्न अग्नियों का वर्णन करते हैं, जिनमें भूतों का स्वामी, गृहपति अग्नि और जलों का गर्भ-रूप अग्नि हैं। देवताओं द्वारा खोजा जाने पर अग्नि समुद्र में छिप जाता है, अथर्वा से अपने स्थान पर हव्य ढोने को कहता है और भेद बताने वाली मछलियों को शाप देता है; फिर देह त्यागकर वह पृथ्वी में प्रवेश करता है और धातुओं के रूप में प्रकट होता है। ऋषि उसे फिर जगाते हैं, वह दोबारा भागता है, और अन्त में अथर्वा के बुलाने पर लौटकर हव्य वहन करने लगता है। विचरते हुए वह धिष्ण्य अग्नियों को उत्पन्न करता है, जिनकी माताएँ बड़ी-बड़ी नदियाँ हैं। अन्त में मार्कण्डेय बताते हैं कि ये सभी अग्नियाँ वास्तव में एक ही अङ्गिरा हैं, जो अनेक रूपों में प्रकट हुआ है।

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मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 1 (3.224.1)

आपस्य मुदिता भार्या सा चास्य परमाप्रिया । भूपतिं भूतकर्तारं जनयामास पावकम् ॥

āpasya muditā bhāryā sā cāsya paramāpriyā | bhūpatiṃ bhūtakartāraṃ janayāmāsa pāvakam

मुदिता आप की पत्नी थी और उसे अत्यन्त प्रिय थी; उसने भूपति नामक अग्नि को जन्म दिया, जो प्राणियों का रचयिता है।

श्लोक 2 (3.224.2)

भूतानां साऽपि सर्वेषां यं प्राहुः पावकं पतिम् । आत्मा भुवनकर्ता च सोऽध्वरेषु द्विजातिभिः ॥

bhūtānāṃ sā'pi sarveṣāṃ yaṃ prāhuḥ pāvakaṃ patim | ātmā bhuvanakartā ca so'dhvareṣu dvijātibhiḥ

उसी ने उस अग्नि को भी जन्म दिया जिसे सब प्राणियों का स्वामी कहा जाता है; यज्ञों में द्विज उसे आत्मा और भुवनकर्ता कहते हैं।

श्लोक 3 (3.224.3)

महतां चैव भूतानां सर्वेषामिह यः पतिः । भगवान्स महातेजा नित्यं चरति पावकः ॥

mahatāṃ caiva bhūtānāṃ sarveṣāmiha yaḥ patiḥ | bhagavānsa mahātejā nityaṃ carati pāvakaḥ

जो यहाँ सब महान प्राणियों का स्वामी है, वह महातेजस्वी भगवान् अग्नि सदा विचरता रहता है।

श्लोक 4 (3.224.4)

अग्निर्गृहपतिर्नाम नित्यं यज्ञेषु पूज्यते । आज्यं वहतियो हव्यं सर्वलोकस्य पावकः ॥

agnirgṛhapatirnāma nityaṃ yajñeṣu pūjyate | ājyaṃ vahatiyo havyaṃ sarvalokasya pāvakaḥ

गृहपति नामक अग्नि की यज्ञों में सदा पूजा होती है; वही समस्त लोक के घृत और हव्य को वहन करने वाला अग्नि है।

श्लोक 5 (3.224.5)

अपांगर्भो महाभागः सत्वभुग्यो महाद्भुतः । भूपतिर्भूतकर्ता च महतः पतिरुच्यते ॥

apāṃgarbho mahābhāgaḥ satvabhugyo mahādbhutaḥ | bhūpatirbhūtakartā ca mahataḥ patirucyate

जलों का गर्भ, महाभाग और अत्यन्त अद्भुत, प्राणियों का भक्षक, पृथ्वी का स्वामी और भूतों का रचयिता अग्नि महत् का पति कहलाता है।

श्लोक 6 (3.224.6)

मता वहन्तो हव्यानि तस्याग्नेरप्रजाऽभवन् । अग्निष्टोमस्तु नियतः क्रतुश्रेष्ठो भवत्युत ॥

matā vahanto havyāni tasyāgneraprajā'bhavan | agniṣṭomastu niyataḥ kratuśreṣṭho bhavatyuta

हव्य ढोने वाले माने जाने वाले अग्नि उसी अग्नि की सन्तान हुए; और नियत अग्निष्टोम का अग्नि है, जो यज्ञों में श्रेष्ठ है।

श्लोक 7 (3.224.7)

स वह्निः प्रथमो नित्यं देवैरन्विष्यते प्रभुः । आयान्तं नियतं दृष्ट्वाप्रविवेशार्णवं भयात् ॥

sa vahniḥ prathamo nityaṃ devairanviṣyate prabhuḥ | āyāntaṃ niyataṃ dṛṣṭvāpraviveśārṇavaṃ bhayāt

वह प्रधान, प्रभु अग्नि सदा देवताओं द्वारा खोजा जाता है। नियत को आते देखकर वह भय से समुद्र में प्रवेश कर गया।

श्लोक 8 (3.224.8)

देवास्तं नाधिगच्छन्ति मार्गमाणा यथातथम् । दृष्ट्वा त्वग्निरथर्वाणं ततो वचनमब्रवीत् ॥

devāstaṃ nādhigacchanti mārgamāṇā yathātatham | dṛṣṭvā tvagniratharvāṇaṃ tato vacanamabravīt

देवता उसे भली-भाँति खोजते रहे, पर उसे पा न सके। तब अग्नि ने अथर्वा को देखकर ये वचन कहे —

अग्निरुवाच

श्लोक 9 (3.224.9)

देवानां वह हव्यं त्वमहं वीर सुदुर्बलः । अथ त्वं गच्छ मध्वक्षं प्रियमेतत्कुरुष्व मे ॥

devānāṃ vaha havyaṃ tvamahaṃ vīra sudurbalaḥ | atha tvaṃ gaccha madhvakṣaṃ priyametatkuruṣva me

"हे वीर, तुम देवताओं का हव्य वहन करो; मैं बहुत दुर्बल हो गया हूँ। अब तुम जाकर मधु-जैसे नेत्रों वाले अग्नि बनो; मेरा यह प्रिय कार्य करो।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 10 (3.224.10)

प्रेष्य चाग्निरथर्वाणमन्यं देशं ततोऽगमत् । मत्स्यास्तस्य समाचख्युः क्रुद्धस्तानग्निरब्रवीत् । भक्ष्या वै विविधैर्भावैर्भविष्यथ शरीरिणाम् ॥

preṣya cāgniratharvāṇamanyaṃ deśaṃ tato'gamat | matsyāstasya samācakhyuḥ kruddhastānagnirabravīt | bhakṣyā vai vividhairbhāvairbhaviṣyatha śarīriṇām

अथर्वा को भेजकर अग्नि दूसरे स्थान पर चला गया। मछलियों ने उसका पता बता दिया, तब अग्नि ने क्रोधित होकर उनसे कहा — "तुम नाना प्रकार से देहधारियों का भोजन बनोगी।"

श्लोक 11 (3.224.11)

अथर्वाणं तथा चापि हव्यवाहोऽब्रवीद्वचः ॥

atharvāṇaṃ tathā cāpi havyavāho'bravīdvacaḥ

और हव्यवाहन ने अथर्वा से भी वैसे ही वचन कहे।

श्लोक 12 (3.224.12)

अनुनीयमानो हि भृशं देववाक्यान्वितेन सः । नैच्छद्वोढुं हविः सर्वं शरीरं चापि सोऽत्यजत् ॥

anunīyamāno hi bhṛśaṃ devavākyānvitena saḥ | naicchadvoḍhuṃ haviḥ sarvaṃ śarīraṃ cāpi so'tyajat

देवताओं के वचनों से बहुत मनाए जाने पर भी उसने सारी हवि वहन करना स्वीकार नहीं किया, और अपना शरीर भी त्याग दिया।

श्लोक 13 (3.224.13)

स तच्छरीरं संत्यज्य प्रविवेश धरां तदा । भूमिं स्पृष्ट्वाऽसृजद्धातून्पृथक्पृथगतीव हि ॥

sa taccharīraṃ saṃtyajya praviveśa dharāṃ tadā | bhūmiṃ spṛṣṭvā'sṛjaddhātūnpṛthakpṛthagatīva hi

उस शरीर को त्यागकर उसने तब पृथ्वी में प्रवेश किया, और भूमि का स्पर्श करके अलग-अलग अनेक धातुओं की सृष्टि की।

श्लोक 14 (3.224.14)

आस्यात्सुगन्धं तेजश्च अस्थिभ्यो देवदारु च । श्लेष्मणः स्फाटिकं तस्य पित्तान्मारकतं तथा ॥

āsyātsugandhaṃ tejaśca asthibhyo devadāru ca | śleṣmaṇaḥ sphāṭikaṃ tasya pittānmārakataṃ tathā

उसके मुख से सुगन्धित पदार्थ और तेज, अस्थियों से देवदारु, कफ से स्फटिक और पित्त से मरकत (पन्ना) उत्पन्न हुए;

श्लोक 15 (3.224.15)

वातात्कृष्णायसं तस्य त्रिभिरेतैर्बहु प्रजाः । त्वचस्तस्याभ्रपटलं स्नायुजं चापि विद्रुमम् ॥

vātātkṛṣṇāyasaṃ tasya tribhiretairbahu prajāḥ | tvacastasyābhrapaṭalaṃ snāyujaṃ cāpi vidrumam

उसकी वायु से काला लोहा उत्पन्न हुआ, और इन तीनों से प्रजा समृद्ध होती है; उसकी त्वचा से अभ्रक और स्नायुओं से मूँगा उत्पन्न हुआ।

श्लोक 16 (3.224.16)

शरीरास्थिविधाश्चान्ये धातवोऽस्याभवन्नृप । एवं कृत्वा शरीरं च परमे तपसि स्थितः ॥

śarīrāsthividhāścānye dhātavo'syābhavannṛpa | evaṃ kṛtvā śarīraṃ ca parame tapasi sthitaḥ

हे राजन्, उसके शरीर और अस्थियों से अन्य अनेक प्रकार की धातुएँ भी उत्पन्न हुईं। इस प्रकार अपने शरीर का विसर्जन करके वह परम तप में स्थित हो गया।

श्लोक 17 (3.224.17)

भृग्वङ्गिरादिभिर्भूयस्तपसोत्थापितस्तदा । भृशं जज्वाल तेजस्वी तपसाऽऽप्यायितः शिखी ॥

bhṛgvaṅgirādibhirbhūyastapasotthāpitastadā | bhṛśaṃ jajvāla tejasvī tapasā''pyāyitaḥ śikhī

तब भृगु, अङ्गिरा आदि ऋषियों के तप से फिर जगाया जाकर वह तेजस्वी शिखाधारी अग्नि तप से पुष्ट होकर प्रचण्ड रूप से प्रज्वलित हो उठा।

श्लोक 18 (3.224.18)

दृष्ट्वा ऋषीन्भयाच्चापि प्रविवेश महार्णवम् । तस्मिन्नष्टे जगद्भीतमथर्वाणमथाश्रितम् । अर्चयामासुरेवैनमथर्वाणं सुरादयः ॥

dṛṣṭvā ṛṣīnbhayāccāpi praviveśa mahārṇavam | tasminnaṣṭe jagadbhītamatharvāṇamathāśritam | arcayāmāsurevainamatharvāṇaṃ surādayaḥ

किन्तु ऋषियों को देखकर वह भय से फिर महासागर में प्रवेश कर गया। उसके लुप्त हो जाने पर भयभीत जगत् ने अथर्वा का आश्रय लिया, और देवता आदि उसी अथर्वा की पूजा करने लगे।

श्लोक 19 (3.224.19)

अथर्वाणं श्रिताँल्लोकानात्मन्यालोच्य पावकः । मिषतां सर्वभूतानामुन्ममज्ज महार्णवात् ॥

atharvāṇaṃ śritām̐llokānātmanyālocya pāvakaḥ | miṣatāṃ sarvabhūtānāmunmamajja mahārṇavāt

यह विचारकर कि लोकों ने अथर्वा का आश्रय ले लिया है, अग्नि सब प्राणियों के देखते-देखते महासागर से बाहर निकल आया।

श्लोक 20 (3.224.20)

एवमग्निर्भगवता नष्टः पूर्वमथर्वणा । आहूतः सर्वभूतानां हव्यं वहति सर्वदा ॥

evamagnirbhagavatā naṣṭaḥ pūrvamatharvaṇā | āhūtaḥ sarvabhūtānāṃ havyaṃ vahati sarvadā

इस प्रकार पहले लुप्त हुआ अग्नि भगवान् अथर्वा द्वारा बुलाया गया, और तब से वह सब प्राणियों का हव्य सदा वहन करता है।

श्लोक 21 (3.224.21)

एवं त्वजनयद्धिष्ण्यान्वेदोक्तान्विबुधान्बहून् । विचरन्विविधान्देशान्भ्रममाणस्तु तत्र वै ॥

evaṃ tvajanayaddhiṣṇyānvedoktānvibudhānbahūn | vicaranvividhāndeśānbhramamāṇastu tatra vai

इसी प्रकार अनेक देशों में विचरते और घूमते हुए उसने वेदों में वर्णित अनेक धिष्ण्य अग्नियों को, जो देवता हैं, उत्पन्न किया।

श्लोक 22 (3.224.22)

सिन्धुवर्ज्याः पञ्च नद्यो देविकाऽथ सरस्वती । गङ्गा च शतकुम्भा च सरयू गण्डसाह्वया ॥

sindhuvarjyāḥ pañca nadyo devikā'tha sarasvatī | gaṅgā ca śatakumbhā ca sarayū gaṇḍasāhvayā

सिन्धु को छोड़कर पाँच नदियाँ; देविका, सरस्वती, गङ्गा, शतकुम्भा, सरयू और गण्डा नाम की नदी;

श्लोक 23 (3.224.23)

चर्मण्वती मही चैव मेध्या मेधासृतिस्तदा । इरावती वेत्रवती नद्यस्तिस्रोऽथ कौशिकी ॥

carmaṇvatī mahī caiva medhyā medhāsṛtistadā | irāvatī vetravatī nadyastisro'tha kauśikī

चर्मण्वती, मही, मेध्या, मेधासृति, इरावती, वेत्रवती, तीन नदियाँ और कौशिकी;

श्लोक 24 (3.224.24)

तमसा नर्मदा चैव नदी गोदावरी तथा । वेण्णा प्रवेणी भीमा च मरुदा चैव भारत ॥

tamasā narmadā caiva nadī godāvarī tathā | veṇṇā praveṇī bhīmā ca marudā caiva bhārata

हे भारत, तमसा, नर्मदा, गोदावरी नदी, वेण्णा, प्रवेणी, भीमा और मरुदा;

श्लोक 25 (3.224.25)

भारती सुप्रयोगा च कावेरी मज्जुरा तथा । तुङ्गवेणा कृष्णवेणा कपिला शोण एव च ॥

bhāratī suprayogā ca kāverī majjurā tathā | tuṅgaveṇā kṛṣṇaveṇā kapilā śoṇa eva ca

भारती, सुप्रयोगा, कावेरी, मज्जुरा, तुङ्गवेणा, कृष्णवेणा, कपिला और शोण —

श्लोक 26 (3.224.26)

एता नद्यस्तु धिष्ण्यानां मातरो याः प्रकीर्तिताः ॥

etā nadyastu dhiṣṇyānāṃ mātaro yāḥ prakīrtitāḥ

ये नदियाँ धिष्ण्य अग्नियों की माताएँ कही गई हैं।

श्लोक 27 (3.224.27)

अद्भुतस्य प्रिया भार्या तस्याः पुत्रो विडूरथः । यावन्तः पावकाः प्रोक्ताः सोमास्तावन्त एव तु ॥

adbhutasya priyā bhāryā tasyāḥ putro viḍūrathaḥ | yāvantaḥ pāvakāḥ proktāḥ somāstāvanta eva tu

अद्भुत की प्रिय पत्नी थी, उसका पुत्र विडूरथ हुआ। जितने अग्नि बताए गए हैं, उतने ही सोम भी हैं।

श्लोक 28 (3.224.28)

अत्रेश्चाप्यन्वये जाता ब्रह्मणो मानसाः प्रजाः । अग्निः पुत्रान्स्रष्टुकामस्तानेवात्मन्यधारयत् ॥

atreścāpyanvaye jātā brahmaṇo mānasāḥ prajāḥ | agniḥ putrānsraṣṭukāmastānevātmanyadhārayat

अत्रि के वंश में ब्रह्मा की मानस सन्तानें उत्पन्न हुईं; पुत्रों की सृष्टि की इच्छा से अग्नि ने उन्हें अपने भीतर ही धारण कर लिया।

श्लोक 29 (3.224.29)

तस्य तद्ब्रह्मणः कायान्निर्हरन्ति हुताशनाः । एवमेते महात्मानः कीर्तितास्तेऽग्नयो यथा ॥

tasya tadbrahmaṇaḥ kāyānnirharanti hutāśanāḥ | evamete mahātmānaḥ kīrtitāste'gnayo yathā

ब्रह्मा के उस शरीर से हुताशन उन्हें बाहर निकालते हैं। इस प्रकार इन महात्मा अग्नियों का तुम्हें यथावत् वर्णन किया गया —

श्लोक 30 (3.224.30)

अप्रमेया यथोत्पन्नाः श्रीमन्तस्तिमिरापहाः । अद्भुतस्य तु माहात्म्यं यथा वेदेषु कीर्तितम् ॥

aprameyā yathotpannāḥ śrīmantastimirāpahāḥ | adbhutasya tu māhātmyaṃ yathā vedeṣu kīrtitam

वे अपरिमेय, श्रीमान् और अन्धकार को दूर करने वाले हैं, और जैसे वे उत्पन्न हुए। जैसे वेदों में अद्भुत की महिमा कही गई है,

श्लोक 31 (3.224.31)

तादृशं विद्धि सर्वेषामेको ह्येषु हुताशनः । एक एवैष भगवान्विज्ञेयः प्रथमोऽङ्गिराः ॥

tādṛśaṃ viddhi sarveṣāmeko hyeṣu hutāśanaḥ | eka evaiṣa bhagavānvijñeyaḥ prathamo'ṅgirāḥ

वैसी ही महिमा इन सबकी जानो, क्योंकि इनमें एक ही हुताशन है। यह भगवान् एक ही है, प्रथम अङ्गिरा, ऐसा जानना चाहिए,

श्लोक 32 (3.224.32)

बहुधा निःसृतः कायाज्ज्योतिष्टोमः क्रतुर्यथा । इत्येष वंशः सुमहानग्नीनां कीर्तितो मया । पावको विविधैर्मन्त्रैर्हव्यं वहति देहिनाम् ॥

bahudhā niḥsṛtaḥ kāyājjyotiṣṭomaḥ kraturyathā | ityeṣa vaṃśaḥ sumahānagnīnāṃ kīrtito mayā | pāvako vividhairmantrairhavyaṃ vahati dehinām

जो ज्योतिष्टोम यज्ञ की भाँति अपने शरीर से अनेक रूपों में निकला है। इस प्रकार मैंने तुमसे अग्नियों के इस महान वंश का वर्णन किया। नाना प्रकार के मन्त्रों से आहूत अग्नि देहधारियों का हव्य वहन करता है।

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