आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 225
इन्द्र द्वारा केशी से देवसेना की रक्षा
अग्नियों के वंशों का वर्णन करके मार्कण्डेय अद्भुत अग्नि के अद्भुत पुत्र कार्तिकेय के जन्म की कथा आरम्भ करते हैं। दानवों से बार-बार हारती देव-सेना के लिए सेनापति की खोज में इन्द्र मानस पर्वत पर जाते हैं और एक स्त्री की सहायता के लिए पुकार सुनते हैं। वे देखते हैं कि केशी दानव उसे हरकर ले जा रहा है; वज्र से उसकी गदा और फेंके हुए पर्वत-शिखर को काटकर वे उसे भगा देते हैं, और फिर कन्या से उसका परिचय पूछते हैं।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 1 (3.225.1)
अग्नीनां विविधा वंशाः कीर्तितास्ते मयाऽनघ । शृणु जन्म तु कौरव्य कार्तिकेयस्य धीमतः ॥
agnīnāṃ vividhā vaṃśāḥ kīrtitāste mayā'nagha | śṛṇu janma tu kauravya kārtikeyasya dhīmataḥ
हे निष्पाप, मैंने तुम्हें अग्नियों के विविध वंश बता दिए। अब हे कौरव, बुद्धिमान कार्तिकेय के जन्म की कथा सुनो।
श्लोक 2 (3.225.2)
अद्भुतस्याद्भुतं पुत्रं प्रवक्ष्याम्यमितौजसम् । जातं सप्तर्षिभार्याभिर्ब्रह्मण्यं कीर्तिवर्धनम् ॥
adbhutasyādbhutaṃ putraṃ pravakṣyāmyamitaujasam | jātaṃ saptarṣibhāryābhirbrahmaṇyaṃ kīrtivardhanam
मैं अद्भुत अग्नि के उस अद्भुत, अपार तेज वाले पुत्र का वर्णन करूँगा, जो सप्तर्षियों की पत्नियों से उत्पन्न हुआ, ब्राह्मणों का हितैषी और कीर्ति को बढ़ाने वाला है।
श्लोक 3 (3.225.3)
देवासुराः पुरा यत्ता विनिघ्नन्तः परस्परम् । तत्राजयन्सदा देवान्दानवा घोररूपिणः ॥
devāsurāḥ purā yattā vinighnantaḥ parasparam | tatrājayansadā devāndānavā ghorarūpiṇaḥ
प्राचीन काल में देवता और असुर युद्ध के लिए तत्पर होकर एक-दूसरे को मारते थे, और उसमें भयंकर रूप वाले दानव सदा देवताओं को पराजित कर देते थे।
श्लोक 4 (3.225.4)
वध्यमानं बलं दृष्ट्वा बहुशस्तैः पुरंदरः । स सैन्यनायकार्थाय चिन्तयामास वासवः ॥
vadhyamānaṃ balaṃ dṛṣṭvā bahuśastaiḥ puraṃdaraḥ | sa sainyanāyakārthāya cintayāmāsa vāsavaḥ
उनके द्वारा अपनी सेना को बार-बार मारी जाती देखकर पुरन्दर इन्द्र अपनी सेना के लिए नायक पाने की चिन्ता करने लगे।
इन्द्र उवाच
श्लोक 5 (3.225.5)
देवसेनां दानवैर्हि भग्नां दृष्ट्वा महाबलः । पालयेद्वीर्यमाश्रित्य स ज्ञेयः पुरुषो मया ॥
devasenāṃ dānavairhi bhagnāṃ dṛṣṭvā mahābalaḥ | pālayedvīryamāśritya sa jñeyaḥ puruṣo mayā
"मुझे ऐसा महाबली पुरुष खोजना है जो दानवों द्वारा भंग की गई देव-सेना को देखकर अपने पराक्रम के बल पर उसकी रक्षा करे।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 6 (3.225.6)
स शैलं मानसं गत्वा ध्यायन्नर्थमिमं भृशम् । शुश्रावार्तस्वरं घोरमथ मुक्तं स्त्रिया तदा ॥
sa śailaṃ mānasaṃ gatvā dhyāyannarthamimaṃ bhṛśam | śuśrāvārtasvaraṃ ghoramatha muktaṃ striyā tadā
मानस पर्वत पर जाकर इसी विषय पर गहराई से विचार करते हुए उन्होंने तब एक स्त्री का भयंकर आर्त स्वर सुना —
कन्योवाच
श्लोक 7 (3.225.7)
अभिधावतु मां कश्चित्पुरुषस्त्रातु चैव ह । पतिं च मे प्रदिशतु स्वयं वा पतिरस्तु मे ॥
abhidhāvatu māṃ kaścitpuruṣastrātu caiva ha | patiṃ ca me pradiśatu svayaṃ vā patirastu me
"कोई पुरुष दौड़कर मेरे पास आए और मेरी रक्षा करे! वह मुझे कोई पति बताए, या स्वयं मेरा पति बने!"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 8 (3.225.8)
पुरंदरस्तु तामाह मा भैर्नास्ति भयं तव । एवमुक्त्वा ततोऽपश्यत्केशिनं स्थितमग्रतः ॥
puraṃdarastu tāmāha mā bhairnāsti bhayaṃ tava | evamuktvā tato'paśyatkeśinaṃ sthitamagrataḥ
पुरन्दर ने उससे कहा — "डरो मत, तुम्हें कोई भय नहीं है।" यह कहकर उन्होंने अपने सामने केशी को खड़ा देखा,
श्लोक 9 (3.225.9)
किरीटिनं गदापाणिं धातुमन्तमिवाचलम् । हस्ते गृहीत्वा कन्यां तामथैनं वासवोऽब्रवीत् ॥
kirīṭinaṃ gadāpāṇiṃ dhātumantamivācalam | haste gṛhītvā kanyāṃ tāmathainaṃ vāsavo'bravīt
जो मुकुट धारण किए, हाथ में गदा लिए, धातुओं से युक्त पर्वत के समान था और उस कन्या का हाथ पकड़े हुए था। तब इन्द्र ने उससे कहा —
इन्द्र उवाच
श्लोक 10 (3.225.10)
अनार्यकर्मन्कस्मात्त्वमिमां कन्यां जिहीर्षसि । वज्रिणं मांविजानीहि विरमास्याः प्रबाधनात् ॥
anāryakarmankasmāttvamimāṃ kanyāṃ jihīrṣasi | vajriṇaṃ māṃvijānīhi viramāsyāḥ prabādhanāt
"हे नीच कर्म करने वाले, तू इस कन्या को क्यों हरना चाहता है? मुझे वज्रधारी इन्द्र जान। इसे पीड़ा देना छोड़ दे!"
केश्युवाच
श्लोक 11 (3.225.11)
विसृजस्व त्वमेवैनां शक्रैषा प्रार्थिता मया । क्षमं ते जीवतो गन्तुं स्वपुरं पाकशासन ॥
visṛjasva tvamevaināṃ śakraiṣā prārthitā mayā | kṣamaṃ te jīvato gantuṃ svapuraṃ pākaśāsana
"हे शक्र, तुम स्वयं ही इसे छोड़ दो; मैंने इसे पाने की इच्छा की है। हे पाकशासन, तुम्हारे लिए यही उचित है कि जीवित रहते हुए अपने नगर लौट जाओ।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 12 (3.225.12)
एवमुक्त्वा गदां केशी चिक्षेपेन्द्रवधाय वै । तामापतन्तीं चिच्छेद मध्ये वज्रेण वासवः ॥
evamuktvā gadāṃ keśī cikṣependravadhāya vai | tāmāpatantīṃ ciccheda madhye vajreṇa vāsavaḥ
यह कहकर केशी ने इन्द्र का वध करने के लिए अपनी गदा फेंकी; पर उसे आती देखकर इन्द्र ने वज्र से उसे बीच से काट डाला।
श्लोक 13 (3.225.13)
अथास्य शैलशिखरं केशी क्रुद्धो व्यवासृजत् । महामेघप्रतीकाशं चलत्पावकसंकुलम् ॥
athāsya śailaśikharaṃ keśī kruddho vyavāsṛjat | mahāmeghapratīkāśaṃ calatpāvakasaṃkulam
तब क्रोधित केशी ने उन पर एक पर्वत-शिखर फेंका, जो विशाल मेघ के समान था और चञ्चल अग्नि की ज्वालाओं से भरा था।
श्लोक 14 (3.225.14)
तदापतन्तं संप्रेक्ष्य शैलशृङ्गं शतक्रतुः । बिभेद राजन्वज्रेण भुवि तन्निपपात ह ॥
tadāpatantaṃ saṃprekṣya śailaśṛṅgaṃ śatakratuḥ | bibheda rājanvajreṇa bhuvi tannipapāta ha
हे राजन्, उस पर्वत-शिखर को अपनी ओर आता देखकर शतक्रतु इन्द्र ने वज्र से उसे तोड़ डाला, और वह पृथ्वी पर गिर पड़ा।
श्लोक 15 (3.225.15)
पतता तु तदा केशी तेन शृङ्गेण ताडितः । हित्वा कन्यां महाभागां प्राद्रवद्भृशपीडितः ॥
patatā tu tadā keśī tena śṛṅgeṇa tāḍitaḥ | hitvā kanyāṃ mahābhāgāṃ prādravadbhṛśapīḍitaḥ
उस गिरते हुए शिखर की चोट खाकर केशी उस महाभागा कन्या को छोड़कर अत्यन्त पीड़ित होकर भाग गया।
श्लोक 16 (3.225.16)
अपयातेऽसुरे तस्मिंस्तां कन्यां वासवोऽब्रवीत् । कासि कस्यासि किंचेह कुरुषे त्वं शुभानने ॥
apayāte'sure tasmiṃstāṃ kanyāṃ vāsavo'bravīt | kāsi kasyāsi kiṃceha kuruṣe tvaṃ śubhānane
उस असुर के चले जाने पर इन्द्र ने उस कन्या से कहा — "हे सुमुखि, तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो, और यहाँ क्या कर रही हो?"