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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 226

देवसेना का भावी पति और अग्नि की कामना

कन्या इन्द्र को बताती है कि वह प्रजापति की पुत्री देवसेना है, जिसकी बहन दैत्यसेना को केशी हर ले गया है, और उसका पति देवताओं और दानवों को जीतने वाला महाबली होगा। अमावास्या के प्रभात में चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि का अशुभ संयोग देखकर इन्द्र विचार करते हैं कि अग्नि से उत्पन्न पुत्र ही उसका पति होगा, और ब्रह्मा इसकी पुष्टि करते हैं — वह बालक इन्द्र का सेनापति और देवसेना का स्वामी होगा। सप्तर्षियों के यज्ञ में हवि ग्रहण करने के लिए अग्नि सूर्य-मण्डल से निकलकर आता है, ऋषि-पत्नियों को देखकर काम के वश हो जाता है, और उन्हें न पा सकने पर प्राण त्यागने का निश्चय करके वन में चला जाता है। दक्ष की पुत्री स्वाहा, जो बहुत समय से उसे चाहती थी, ऋषि-पत्नियों का रूप धरकर उसे पाने का निश्चय करती है।

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कन्योवाच

श्लोक 1 (3.226.1)

अहं प्रजापतेः कन्या देवसेनेति विश्रुता । भगिनी मे दैत्यसेना सा पूर्वं केशिना हृता ॥

ahaṃ prajāpateḥ kanyā devaseneti viśrutā | bhaginī me daityasenā sā pūrvaṃ keśinā hṛtā

"मैं प्रजापति की पुत्री हूँ, देवसेना नाम से प्रसिद्ध। मेरी बहन दैत्यसेना को केशी पहले ही हर ले गया है।

श्लोक 2 (3.226.2)

सहैवावां भगिन्यौ तु सखीभिः सह मानसम् । आगच्छावो विहारार्थमनुज्ञाप्य प्रजापतिम् ॥

sahaivāvāṃ bhaginyau tu sakhībhiḥ saha mānasam | āgacchāvo vihārārthamanujñāpya prajāpatim

हम दोनों बहनें अपनी सखियों के साथ प्रजापति से अनुमति लेकर विहार के लिए मानस पर्वत पर आई थीं।

श्लोक 3 (3.226.3)

नित्यं चावां प्रार्थयते हर्तुं केशी महासुरः । इच्छत्येनं दैत्यसेना न चाहं पाकशासन ॥

nityaṃ cāvāṃ prārthayate hartuṃ keśī mahāsuraḥ | icchatyenaṃ daityasenā na cāhaṃ pākaśāsana

महादानव केशी हमें हरने के लिए सदा हमसे याचना करता रहता था। हे पाकशासन, दैत्यसेना उसे चाहती है, पर मैं नहीं।

श्लोक 4 (3.226.4)

सा हृताऽनेन भगवन्मुक्ताऽहं त्वद्बलेन तु । त्वया देवेन्द्र निर्दिष्टं पतिमिच्छामि दुर्जयम् ॥

sā hṛtā'nena bhagavanmuktā'haṃ tvadbalena tu | tvayā devendra nirdiṣṭaṃ patimicchāmi durjayam

हे भगवन्, उसे तो वह हर ले गया, पर मैं आपके बल से छूट गई हूँ। हे देवेन्द्र, मैं आपके द्वारा बताया हुआ कोई अजेय पति चाहती हूँ।"

इन्द्र उवाच

श्लोक 5 (3.226.5)

मम मातृष्वसेयी त्वं माता दाक्षायणी मम । आख्यातुं त्वहमिच्छामि स्वयमात्मबलं त्वया ॥

mama mātṛṣvaseyī tvaṃ mātā dākṣāyaṇī mama | ākhyātuṃ tvahamicchāmi svayamātmabalaṃ tvayā

"तुम मेरी मौसी की पुत्री हो; मेरी माता दाक्षायणी, दक्ष की पुत्री, है। मैं चाहता हूँ कि तुम स्वयं अपने बल के बारे में मुझे बताओ।"

कन्योवाच

श्लोक 6 (3.226.6)

अबलाऽहं महाबाहो पतिस्तु बलवान्मम । वरदानात्पितुर्भावी सुरासुरनमस्कृतः ॥

abalā'haṃ mahābāho patistu balavānmama | varadānātpiturbhāvī surāsuranamaskṛtaḥ

"हे महाबाहो, मैं तो अबला हूँ, पर मेरा पति बलवान होगा। पिता के वरदान से वह देवताओं और असुरों द्वारा वन्दित होगा।"

इन्द्र उवाच

श्लोक 7 (3.226.7)

कीदृशं तु बलंदेवि पत्युस्तव भविष्यति । एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तव वाक्यमनिन्दिते ॥

kīdṛśaṃ tu balaṃdevi patyustava bhaviṣyati | etadicchāmyahaṃ śrotuṃ tava vākyamanindite

"हे देवि, तुम्हारे पति का बल कैसा होगा? हे अनिन्दिते, मैं यह तुम्हारे ही मुख से सुनना चाहता हूँ।"

कन्योवाच

श्लोक 8 (3.226.8)

देवदानवयक्षाणां किन्नरोरगरक्षसाम् । जेता यो दुष्टदैत्यानां महावीर्यो महाबलः ॥

devadānavayakṣāṇāṃ kinnaroragarakṣasām | jetā yo duṣṭadaityānāṃ mahāvīryo mahābalaḥ

"जो देवताओं, दानवों, यक्षों, किन्नरों, नागों और राक्षसों तथा दुष्ट दैत्यों को जीतने वाला, महापराक्रमी और महाबली होगा,

श्लोक 9 (3.226.9)

यस्तु सर्वाणि भूतानि त्वया सह विजेष्यति । स हि मे भविता भर्ता ब्रह्मण्यः कीर्तिवर्धनः ॥

yastu sarvāṇi bhūtāni tvayā saha vijeṣyati | sa hi me bhavitā bhartā brahmaṇyaḥ kīrtivardhanaḥ

जो आपके साथ मिलकर सब प्राणियों को जीत लेगा, वही ब्राह्मणों का हितैषी, कीर्ति बढ़ाने वाला मेरा पति होगा।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 10 (3.226.10)

इन्द्रस्तस्या वचः श्रुत्वा दुःखितोऽचिन्तयद्भृशम् । अस्या देव्याः पतिर्नास्ति यादृशं संप्रभाषते ॥

indrastasyā vacaḥ śrutvā duḥkhito'cintayadbhṛśam | asyā devyāḥ patirnāsti yādṛśaṃ saṃprabhāṣate

उसकी बात सुनकर इन्द्र दुःखी होकर गहरी चिन्ता में पड़ गए — "इस देवी के लिए जैसा वह बताती है, वैसा कोई पति नहीं है।"

श्लोक 11 (3.226.11)

अथापश्यत्स उदये भास्करं भास्करद्युतिः । सोमं चैव महाभागं प्रविशन्तं दिवाकरम् ॥

athāpaśyatsa udaye bhāskaraṃ bhāskaradyutiḥ | somaṃ caiva mahābhāgaṃ praviśantaṃ divākaram

तब सूर्य के समान तेजस्वी इन्द्र ने उदयाचल पर सूर्य को, और महाभाग सोम (चन्द्रमा) को सूर्य में प्रवेश करते देखा।

श्लोक 12 (3.226.12)

अमावास्यां प्रवृत्तायां मुहूर्ते रौद्र एव तु । देवासुरं च संग्रामं सोऽपश्यदुदये गिरौ ॥

amāvāsyāṃ pravṛttāyāṃ muhūrte raudra eva tu | devāsuraṃ ca saṃgrāmaṃ so'paśyadudaye girau

अमावास्या आरम्भ हो चुकी थी, रौद्र मुहूर्त था, और उन्होंने उदयगिरि पर देवताओं और असुरों का संग्राम देखा।

श्लोक 13 (3.226.13)

लोहितैश्च घनैर्युक्तां पूर्वां संध्यां शतक्रतुः । अपश्यल्लोहितोदं च मघवान्वरुणालयम् ॥

lohitaiśca ghanairyuktāṃ pūrvāṃ saṃdhyāṃ śatakratuḥ | apaśyallohitodaṃ ca maghavānvaruṇālayam

शतक्रतु ने पूर्व की संध्या को लाल बादलों से घिरा देखा, और मघवा ने वरुण के निवास समुद्र का जल भी लाल देखा।

श्लोक 14 (3.226.14)

भृगुभिश्चाङ्गिरोभिश्च हुतं मन्त्रैः पृथग्विधैः । हव्यं गृहीत्वा वह्निं च प्रविशन्तं दिवाकरम् ॥

bhṛgubhiścāṅgirobhiśca hutaṃ mantraiḥ pṛthagvidhaiḥ | havyaṃ gṛhītvā vahniṃ ca praviśantaṃ divākaram

उन्होंने अग्नि को भी देखा, जो भृगुवंशियों और अङ्गिरावंशियों द्वारा नाना प्रकार के मन्त्रों से अर्पित हवि को लेकर सूर्य में प्रवेश कर रहा था।

श्लोक 15 (3.226.15)

पर्व चैव चतुर्विंशं तदा सूर्यमुपस्थितम् । तथा सूर्यं वह्निगतं सोमं सूर्यगतं च तम् ॥

parva caiva caturviṃśaṃ tadā sūryamupasthitam | tathā sūryaṃ vahnigataṃ somaṃ sūryagataṃ ca tam

उन्होंने देखा कि चौबीसवाँ पर्व सूर्य के पास उपस्थित है, सूर्य अग्नि में समाया है और सोम सूर्य में समाया है।

श्लोक 16 (3.226.16)

समालोक्यैकतामेव शशिनो भास्करस्य च । समवायं तु तं रौद्रं दृष्ट्वा शक्रोऽन्वचिन्तयत् ॥

samālokyaikatāmeva śaśino bhāskarasya ca | samavāyaṃ tu taṃ raudraṃ dṛṣṭvā śakro'nvacintayat

चन्द्रमा और सूर्य की एकता को देखकर और उस भयंकर संयोग को निहारकर इन्द्र ने विचार किया —

इन्द्र उवाच

श्लोक 17 (3.226.17)

सूर्याचन्द्रमसोर्घोरं दृश्यते परिवेषणम् । एतस्मिन्नेव रात्र्यन्ते महद्युद्धं तु शंसति ॥

sūryācandramasorghoraṃ dṛśyate pariveṣaṇam | etasminneva rātryante mahadyuddhaṃ tu śaṃsati

"सूर्य और चन्द्रमा के चारों ओर भयंकर परिवेश (मण्डल) दिखाई दे रहा है; यह इसी रात के अन्त में महान युद्ध की सूचना देता है।

श्लोक 18 (3.226.18)

सरित्सिन्धुरपीयं तु प्रत्यसृग्वाहिनी भृशम् । शृगालिन्यग्निवक्त्रा च प्रत्यादित्यं विराविणी ॥

saritsindhurapīyaṃ tu pratyasṛgvāhinī bhṛśam | śṛgālinyagnivaktrā ca pratyādityaṃ virāviṇī

यह सिन्धु नदी भी भारी मात्रा में रक्त बहा रही है, और अग्नि-जैसे मुख वाली गीदड़ी सूर्य की ओर मुँह करके चिल्ला रही है।

श्लोक 19 (3.226.19)

एष रौद्रश्चसंघातो महान्युक्तश्च तेजसा । सोमस्य वह्निसूर्याभ्यामद्भुतोऽयं समागमः ॥

eṣa raudraścasaṃghāto mahānyuktaśca tejasā | somasya vahnisūryābhyāmadbhuto'yaṃ samāgamaḥ

यह भयंकर संयोग महान है और तेज से युक्त है — सोम का अग्नि और सूर्य के साथ यह अद्भुत समागम है।

श्लोक 20 (3.226.20)

जनयेद्यं सुतं सोमः सोऽस्या देव्याः पतिर्भवेत् । अथानेकैर्गुणैश्चाग्निरग्निः सर्वाश्च देवताः ॥

janayedyaṃ sutaṃ somaḥ so'syā devyāḥ patirbhavet | athānekairguṇaiścāgniragniḥ sarvāśca devatāḥ

सोम जिस पुत्र को उत्पन्न करे, वही इस देवी का पति होगा। और अग्नि अनेक गुणों से युक्त है; अग्नि ही सब देवता है।

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 21 (3.226.21)

एष चेञ्जनयेद्गर्भं सोऽस्या देव्याः पतिर्भवेत् । एवं संचिन्त्य भगवान्ब्रह्मलोकं तदा गतः ॥

eṣa ceñjanayedgarbhaṃ so'syā devyāḥ patirbhavet | evaṃ saṃcintya bhagavānbrahmalokaṃ tadā gataḥ

"यदि यह अग्नि गर्भ उत्पन्न करे, तो वही इस देवी का पति होगा।" ऐसा विचारकर भगवान् इन्द्र तब ब्रह्मलोक को गए।

श्लोक 22 (3.226.22)

गृहीत्वा देवसेनां तां ववन्दे स पितामहम् । उवाच चास्या देव्यास्त्वं साधु शूरं पतिं दिश ॥

gṛhītvā devasenāṃ tāṃ vavande sa pitāmaham | uvāca cāsyā devyāstvaṃ sādhu śūraṃ patiṃ diśa

देवसेना को साथ लेकर उन्होंने पितामह ब्रह्मा को प्रणाम किया और कहा — "आप इस देवी के लिए कोई उत्तम, शूरवीर पति निर्धारित कीजिए।"

ब्रह्मोवाच

श्लोक 23 (3.226.23)

यथैतच्चिन्तितंकार्यं त्वया दानवसूदन । तथा स भविता गर्भो बलवानुरुविक्रमः ॥

yathaitaccintitaṃkāryaṃ tvayā dānavasūdana | tathā sa bhavitā garbho balavānuruvikramaḥ

"हे दानवसूदन, तुमने जैसा इस कार्य के विषय में सोचा है, वैसा ही वह गर्भ होगा — बलवान और महापराक्रमी।

श्लोक 24 (3.226.24)

स भविष्यति सेनानीस्त्वया सह शतक्रतो । अस्या देव्याः पतिश्चैव स भविष्यति वीर्यवान् ॥

sa bhaviṣyati senānīstvayā saha śatakrato | asyā devyāḥ patiścaiva sa bhaviṣyati vīryavān

हे शतक्रतु, वह तुम्हारे साथ सेनापति होगा, और वही पराक्रमी इस देवी का पति भी होगा।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 25 (3.226.25)

एतच्छ्रुत्वा नमस्तस्मै कृत्वाऽसौ सह कन्यया । तत्राभ्यगच्छद्देवेन्द्रो यत्र सप्तर्षयोऽभवन् ॥

etacchrutvā namastasmai kṛtvā'sau saha kanyayā | tatrābhyagacchaddevendro yatra saptarṣayo'bhavan

यह सुनकर देवराज इन्द्र ब्रह्मा को प्रणाम करके उस कन्या के साथ वहाँ गए जहाँ सप्तर्षि थे —

श्लोक 26 (3.226.26)

वसिष्ठप्रमुखा मुख्या विप्रेन्द्राः सुमहाप्रभाः । भागार्थं तपसोपात्तं तेषां सोमं तथाऽध्वरे ॥

vasiṣṭhapramukhā mukhyā viprendrāḥ sumahāprabhāḥ | bhāgārthaṃ tapasopāttaṃ teṣāṃ somaṃ tathā'dhvare

वसिष्ठ आदि प्रमुख, महान तेज वाले श्रेष्ठ ब्राह्मण। उनके यज्ञ में तप से प्राप्त सोम का अपना भाग पाने के लिए

श्लोक 27 (3.226.27)

पिपासवो ययुर्देवाः शतक्रतुपुरोगमाः । इष्टिं कृत्वा यथान्यायं सुसमिद्धे हुताशने ॥

pipāsavo yayurdevāḥ śatakratupurogamāḥ | iṣṭiṃ kṛtvā yathānyāyaṃ susamiddhe hutāśane

सोम-पान के इच्छुक देवता शतक्रतु को आगे करके वहाँ गए। विधिपूर्वक इष्टि करके, भली-भाँति प्रज्वलित अग्नि में

श्लोक 28 (3.226.28)

जुहुवुस्ते महात्मानो हव्यं सर्वदिवौकसाम् । समाहूतो हुतवहःसोऽद्भुतः सूर्यमण्डलात् ॥

juhuvuste mahātmāno havyaṃ sarvadivaukasām | samāhūto hutavahaḥso'dbhutaḥ sūryamaṇḍalāt

उन महात्माओं ने सब स्वर्गवासियों के लिए हवि की आहुति दी। आह्वान किए जाने पर हव्यवाहन अद्भुत अग्नि सूर्य-मण्डल से

श्लोक 29 (3.226.29)

विनिःसृत्य ययौ वह्निः पार्श्वतो विधिवत्प्रभुः । आगम्याहवनीयं वै तैर्द्विजैर्मन्त्रतो हुतम् ॥

viniḥsṛtya yayau vahniḥ pārśvato vidhivatprabhuḥ | āgamyāhavanīyaṃ vai tairdvijairmantrato hutam

निकलकर वह प्रभु अग्नि विधिपूर्वक उनके पास गया और उस आहवनीय अग्नि में आया जिसमें उन ब्राह्मणों ने मन्त्रों से आहुति दी थी।

श्लोक 30 (3.226.30)

सतत्र विविधं हव्यं प्रतिगृह्यहुताशनः । ऋषिभ्यो भरतश्रेष्ठ प्रायच्छत दिवौकसाम् ॥

satatra vividhaṃ havyaṃ pratigṛhyahutāśanaḥ | ṛṣibhyo bharataśreṣṭha prāyacchata divaukasām

हे भरतश्रेष्ठ, वहाँ अग्नि ने नाना प्रकार की हवि ग्रहण की और उसे ऋषियों से लेकर स्वर्गवासियों को दे दिया।

श्लोक 31 (3.226.31)

निष्क्रामंश्चाप्यपश्यत्स पत्नीस्तेषां महात्मनाम् । स्वेष्वासनेषूपविष्टाः स्नायन्तीश्च यथासुखम् ॥

niṣkrāmaṃścāpyapaśyatsa patnīsteṣāṃ mahātmanām | sveṣvāsaneṣūpaviṣṭāḥ snāyantīśca yathāsukham

बाहर निकलते हुए उसने उन महात्माओं की पत्नियों को देखा, जो अपने-अपने आसनों पर बैठी थीं या सुखपूर्वक स्नान कर रही थीं।

श्लोक 32 (3.226.32)

रुक्मवेदिनिभास्तास्तु चन्द्रलेखा इवामलाः । हुताशनार्चिःप्रतिमाः सर्वास्तारा इवाद्भुताः ॥

rukmavedinibhāstāstu candralekhā ivāmalāḥ | hutāśanārciḥpratimāḥ sarvāstārā ivādbhutāḥ

वे सुवर्ण की वेदियों के समान, चन्द्रमा की कला के समान निर्मल, अग्नि की ज्वालाओं के समान और तारों के समान अद्भुत थीं।

श्लोक 33 (3.226.33)

स तत्रतेन मनसा बभूव क्षुभितेन्द्रियः । पत्नीर्दृष्ट्वा द्विजेन्द्राणां वह्निः कामवशं ययौ ॥

sa tatratena manasā babhūva kṣubhitendriyaḥ | patnīrdṛṣṭvā dvijendrāṇāṃ vahniḥ kāmavaśaṃ yayau

वहाँ उनमें मन लग जाने से उसकी इन्द्रियाँ क्षुब्ध हो उठीं; श्रेष्ठ ब्राह्मणों की पत्नियों को देखकर अग्नि काम के वश में हो गया।

श्लोक 34 (3.226.34)

भूयः संचिन्तयामास न न्याय्यं क्षुभितो ह्यहम् । साध्व्यः पत्न्यो द्विजेन्द्राणामकामा कामयाम्यहम् ॥

bhūyaḥ saṃcintayāmāsa na nyāyyaṃ kṣubhito hyaham | sādhvyaḥ patnyo dvijendrāṇāmakāmā kāmayāmyaham

उसने फिर सोचा — "मेरा इस प्रकार क्षुब्ध होना उचित नहीं है। ये श्रेष्ठ ब्राह्मणों की साध्वी पत्नियाँ हैं; ये मुझे नहीं चाहतीं, फिर भी मैं इन्हें चाहता हूँ।

अग्निरुवाच

श्लोक 35 (3.226.35)

नैताः शक्या मया द्रष्टुं स्प्रष्टुं वाऽप्यनिमित्ततः । गार्हपत्यं समाविश्य तस्मात्पश्याम्यभीक्ष्णशः ॥

naitāḥ śakyā mayā draṣṭuṃ spraṣṭuṃ vā'pyanimittataḥ | gārhapatyaṃ samāviśya tasmātpaśyāmyabhīkṣṇaśaḥ

मैं बिना किसी कारण के न इन्हें देख सकता हूँ, न छू सकता हूँ। इसलिए मैं गार्हपत्य अग्नि में प्रवेश करके इन्हें बार-बार देखूँगा।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 36 (3.226.36)

संस्पृशन्निव सर्वास्ताः शिखाभिः काञ्चनप्रभाः । पश्यमानश्च मुमुदे गार्हपत्यं समाश्रितः ॥

saṃspṛśanniva sarvāstāḥ śikhābhiḥ kāñcanaprabhāḥ | paśyamānaśca mumude gārhapatyaṃ samāśritaḥ

मानो अपनी सुनहरी ज्वालाओं से उन सबका स्पर्श करता हुआ, गार्हपत्य अग्नि में स्थित होकर वह उन्हें देखता हुआ आनन्दित होता रहा।

श्लोक 37 (3.226.37)

निरुध्य तत्रसुचिरमेवं वह्निर्वनं गतः । मनस्तासु विनिक्षिप्य कामयानो वराङ्गनाः ॥

nirudhya tatrasuciramevaṃ vahnirvanaṃ gataḥ | manastāsu vinikṣipya kāmayāno varāṅganāḥ

वहाँ बहुत समय तक अपने को रोके रहकर, उन सुन्दरियों में मन लगाए और उनकी कामना करते हुए अग्नि अन्त में वन को चला गया।

श्लोक 38 (3.226.38)

कामसंतप्तहृदयो देहत्यागे विनिश्चितः । अलाभे ब्राह्मणस्त्रीणामग्निर्वनमुपागमत् ॥

kāmasaṃtaptahṛdayo dehatyāge viniścitaḥ | alābhe brāhmaṇastrīṇāmagnirvanamupāgamat

काम से सन्तप्त हृदय वाला, ब्राह्मण-स्त्रियों को न पाने के कारण देह-त्याग का निश्चय किए हुए अग्नि वन में चला गया।

श्लोक 39 (3.226.39)

स्वाहा तं दक्षदुहिता प्रथमाऽकामयत्तदा । सा तस्य च्छिद्रमन्वैच्छच्चिरात्प्रभृतिभामिनी । अप्रमत्तस्य देवस्य न चापश्यदनिन्दिता ॥

svāhā taṃ dakṣaduhitā prathamā'kāmayattadā | sā tasya cchidramanvaicchaccirātprabhṛtibhāminī | apramattasya devasya na cāpaśyadaninditā

दक्ष की पुत्री स्वाहा पहले से ही उसकी कामना करती थी। वह सुन्दरी बहुत समय से उसमें कोई दुर्बलता ढूँढ़ रही थी, पर उस सदा सावधान देवता में उस अनिन्द्य स्त्री को कोई दुर्बलता नहीं दिखी।

श्लोक 40 (3.226.40)

सा तं ज्ञात्वा यथावत्तु वह्निं वनमुपागतम् । तत्त्वतः कामसंतप्तं चिन्तयामास भामिनी ॥

sā taṃ jñātvā yathāvattu vahniṃ vanamupāgatam | tattvataḥ kāmasaṃtaptaṃ cintayāmāsa bhāminī

यह भली-भाँति जानकर कि अग्नि काम से सन्तप्त होकर वन में चला गया है, उस सुन्दरी ने विचार किया —

स्वाहोवाच

श्लोक 41 (3.226.41)

अहं सप्तर्षिपत्नीनां कृत्वा रूपाणि पावकम् । कामयिष्यामि कामार्तं तासां रूपेण मोहितम् । एवं कृते प्रीतिरस्य कामावाप्तिश्च मे भवेत् ॥

ahaṃ saptarṣipatnīnāṃ kṛtvā rūpāṇi pāvakam | kāmayiṣyāmi kāmārtaṃ tāsāṃ rūpeṇa mohitam | evaṃ kṛte prītirasya kāmāvāptiśca me bhavet

"मैं सप्तर्षियों की पत्नियों के रूप धारण करके काम से पीड़ित और उनके रूप पर मोहित अग्नि से प्रेम करूँगी। ऐसा करने पर वह प्रसन्न होगा और मेरी कामना भी पूरी होगी।"

अध्याय 225अध्याय-सूचीअध्याय 227