आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 227
स्कन्द का जन्म
मार्कण्डेय बताते हैं कि स्वाहा ने अंगिरा की पत्नी शिवा का रूप धारण करके अग्नि का प्रेम पाया और पक्षिणी बनकर उनका वीर्य श्वेत पर्वत के एक स्वर्ण-कुण्ड में डाल दिया; सप्तर्षियों की पत्नियों का रूप धरकर उसने ऐसा छह बार किया, पर अरुन्धती का रूप वह न ले सकी। उस वीर्य से छह सिरों वाले स्कन्द का जन्म हुआ, जिसने शिव का धनुष, शक्ति और मुर्गा धारण किया और अपनी गर्जना से लोकों को भयभीत कर दिया। उसने बाणों से क्रौञ्च पर्वत को और शक्ति से श्वेत पर्वत के शिखर को विदीर्ण किया, और पर्वतों तथा पृथ्वी ने उसकी शरण ली।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 1 (3.227.1)
शिवा भार्या त्वङ्गिरसः शीलरूपगुणान्विता । तस्याः सा प्रथमं रूपं कृत्वा देवी जनाधिप ॥
śivā bhāryā tvaṅgirasaḥ śīlarūpaguṇānvitā | tasyāḥ sā prathamaṃ rūpaṃ kṛtvā devī janādhipa
हे जनाधिप, अंगिरा की पत्नी शिवा शील, रूप और गुणों से सम्पन्न थीं। देवी स्वाहा ने सबसे पहले उन्हीं का रूप धारण किया
श्लोक 2 (3.227.2)
जगाम पावकाभ्याशं तं चोवाच वराङ्गना । मामग्ने कामसंतप्तां त्वं कामयितुमर्हसि ॥
jagāma pāvakābhyāśaṃ taṃ covāca varāṅganā | māmagne kāmasaṃtaptāṃ tvaṃ kāmayitumarhasi
और अग्नि के पास गईं। उस सुन्दरी ने उनसे कहा — "हे अग्नि, मैं काम से संतप्त हूँ; तुम मुझसे प्रेम करो।
शिवोवाच
श्लोक 3 (3.227.3)
करिष्यसि न चेदेवं मृतां मामुपधारय । तवाप्यधर्मः सुमहान्भविता वै हुताशन ॥
kariṣyasi na cedevaṃ mṛtāṃ māmupadhāraya | tavāpyadharmaḥ sumahānbhavitā vai hutāśana
यदि तुम ऐसा नहीं करोगे तो मुझे मरी हुई समझो। हे हुताशन, इससे तुम्हें भी बड़ा अधर्म लगेगा।
श्लोक 4 (3.227.4)
अहमङ्गिरसो भार्या शिवा नाम हुताशन । सखीभिः सहिता प्राप्ता मन्त्रयित्वा विनिश्चयम् ॥
ahamaṅgiraso bhāryā śivā nāma hutāśana | sakhībhiḥ sahitā prāptā mantrayitvā viniścayam
हे हुताशन, मैं अंगिरा की पत्नी शिवा हूँ। अपनी सखियों से परामर्श करके और निश्चय करके मैं उनके साथ आई हूँ।"
अग्निरुवाच
श्लोक 5 (3.227.5)
कथं मां त्वं विजानीषे कामार्तमितराः कथम् । यास्त्वया कीर्तिताः सर्वाः सप्तर्षीणां प्रियाः स्त्रियः ॥
kathaṃ māṃ tvaṃ vijānīṣe kāmārtamitarāḥ katham | yāstvayā kīrtitāḥ sarvāḥ saptarṣīṇāṃ priyāḥ striyaḥ
"तुम कैसे जानती हो कि मैं काम से पीड़ित हूँ? और वे दूसरी स्त्रियाँ कैसे जानती हैं — सप्तर्षियों की वे सब प्रिय पत्नियाँ, जिनका तुमने नाम लिया?"
शिवोवाच
श्लोक 6 (3.227.6)
अस्माकं त्वं प्रियो नित्यं बिभीमस्तु वयं तव । त्वच्चित्तमिङ्गितैर्ज्ञात्वा प्रेषिताऽस्मि तवान्तिकम् ॥
asmākaṃ tvaṃ priyo nityaṃ bibhīmastu vayaṃ tava | tvaccittamiṅgitairjñātvā preṣitā'smi tavāntikam
"तुम हमें सदा प्रिय रहे हो, पर हम तुमसे डरती हैं। संकेतों से तुम्हारे मन की बात जानकर उन्होंने मुझे तुम्हारे पास भेजा है।
श्लोक 7 (3.227.7)
मैथुनायेह संप्राप्ता कामाच्चैव द्रुतं च माम् । उपयन्तुं महावीर्य पूर्वमेव त्वमर्हसि । जामयो मां प्रतीक्षन्ते गमिष्यामि हुताशन ॥
maithunāyeha saṃprāptā kāmāccaiva drutaṃ ca mām | upayantuṃ mahāvīrya pūrvameva tvamarhasi | jāmayo māṃ pratīkṣante gamiṣyāmi hutāśana
मैं काम से प्रेरित होकर यहाँ तुम्हारे साथ समागम के लिए आई हूँ; मुझे शीघ्र स्वीकार करो। हे महापराक्रमी, तुम्हें अभी मुझे अपना लेना चाहिए। मेरी बहनें मेरी प्रतीक्षा कर रही हैं; हे हुताशन, मुझे लौटना है।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 8 (3.227.8)
ततोऽग्निरुपयेमे तां शिवां प्रीतिमुदायुतः । प्रीत्या देवी समायुक्ता शुक्रं जग्राह पाणिना ॥
tato'gnirupayeme tāṃ śivāṃ prītimudāyutaḥ | prītyā devī samāyuktā śukraṃ jagrāha pāṇinā
तब प्रसन्नता और आनन्द से भरे अग्नि ने शिवा को अंगीकार किया; और प्रेम से उनसे मिली देवी ने उनका वीर्य अपने हाथ में ले लिया।
श्लोक 9 (3.227.9)
साऽचिन्तयन्ममेदं ये रूपं द्रक्ष्यन्ति कानने । ते ब्राह्मणीनामनृतं दोषं वक्ष्यन्ति पावके ॥
sā'cintayanmamedaṃ ye rūpaṃ drakṣyanti kānane | te brāhmaṇīnāmanṛtaṃ doṣaṃ vakṣyanti pāvake
उसने सोचा — "जो लोग वन में मेरा यह रूप देखेंगे, वे अग्नि को लेकर ब्राह्मणियों पर झूठा दोष लगाएँगे।
शिवोवाच
श्लोक 10 (3.227.10)
तस्मादेतद्रक्षमाणा गरुडी संभवाम्यहम् । वनान्निर्गमनं चैव सुखं मम भविष्यति ॥
tasmādetadrakṣamāṇā garuḍī saṃbhavāmyaham | vanānnirgamanaṃ caiva sukhaṃ mama bhaviṣyati
इसलिए इससे बचने के लिए मैं गरुड़ी (पक्षिणी) बन जाती हूँ; इस प्रकार वन से निकलना मेरे लिए सहज होगा।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 11 (3.227.11)
सुपर्णी सा तदा भूत्वा निर्जगाम महावनात् । अपश्यत्पर्वतं श्वेतं शरस्तम्बैः सुसंवृतम् ॥
suparṇī sā tadā bhūtvā nirjagāma mahāvanāt | apaśyatparvataṃ śvetaṃ śarastambaiḥ susaṃvṛtam
तब वह सुपर्णी (पक्षिणी) बनकर उस महावन से निकल गई और उसने सरकण्डों के झुरमुटों से घिरा श्वेत पर्वत देखा,
श्लोक 12 (3.227.12)
दृष्टीविषैः सप्तशीर्षैर्गुप्तं भोगिभिरद्भुतैः । रक्षोभिश्च पिशाचैश्च रौद्रैर्भूतगणैस्तथा ॥
dṛṣṭīviṣaiḥ saptaśīrṣairguptaṃ bhogibhiradbhutaiḥ | rakṣobhiśca piśācaiśca raudrairbhūtagaṇaistathā
जिसकी रक्षा दृष्टि से ही विष उगलने वाले अद्भुत सात फनों वाले नाग, राक्षस, पिशाच और भयंकर भूतगण करते थे;
श्लोक 13 (3.227.13)
राक्षसीभिश्च संपूर्णमनेकैश्च मृगद्विजैः । नदीप्रस्रवणोपेतं नानातरुलताचितम् ॥
rākṣasībhiśca saṃpūrṇamanekaiśca mṛgadvijaiḥ | nadīprasravaṇopetaṃ nānātarulatācitam
जो राक्षसियों तथा अनेक पशु-पक्षियों से भरा था, नदियों और झरनों से युक्त था और नाना प्रकार के वृक्षों और लताओं से ढका था।
श्लोक 14 (3.227.14)
सा तत्र सहसा गत्वा शैलपृष्ठं सुदुर्गमम् । प्राक्षिपत्काञ्चने कुण्डे शुक्रं सा त्वरिता शुभा ॥
sā tatra sahasā gatvā śailapṛṣṭhaṃ sudurgamam | prākṣipatkāñcane kuṇḍe śukraṃ sā tvaritā śubhā
उस दुर्गम पर्वत-शिखर पर तुरन्त पहुँचकर उस शुभा ने शीघ्रता से वह वीर्य एक स्वर्ण-कुण्ड में डाल दिया।
श्लोक 15 (3.227.15)
शिष्टानामपि सा देवी सप्तर्षीणां महात्मनाम् । पत्नीसरूपतां कृत्वा रमयामास पावकम् ॥
śiṣṭānāmapi sā devī saptarṣīṇāṃ mahātmanām | patnīsarūpatāṃ kṛtvā ramayāmāsa pāvakam
शेष महात्मा सप्तर्षियों की पत्नियों का रूप भी धारण करके देवी ने अग्नि के साथ रमण किया।
श्लोक 16 (3.227.16)
दिव्यरूपमरुन्धत्याः कर्तुं न शकितं तया । तस्यास्तपःप्रभावेण भर्तृशुश्रूषणेन च ॥
divyarūpamarundhatyāḥ kartuṃ na śakitaṃ tayā | tasyāstapaḥprabhāveṇa bhartṛśuśrūṣaṇena ca
किन्तु अरुन्धती का दिव्य रूप वह धारण न कर सकी — उनके तप के प्रभाव और पति-सेवा के कारण।
श्लोक 17 (3.227.17)
षट्कृत्वस्तत्तु निक्षिप्तमग्ने रेतः कुरुत्तम । तस्मिन्कुण्डे प्रतिपदि कामिन्या स्वाहया तदा ॥
ṣaṭkṛtvastattu nikṣiptamagne retaḥ kuruttama | tasminkuṇḍe pratipadi kāminyā svāhayā tadā
हे कुरुश्रेष्ठ, कामिनी स्वाहा ने प्रतिपदा के दिन छह बार अग्नि का वीर्य उस कुण्ड में डाला।
श्लोक 18 (3.227.18)
तत्स्कन्नं तेजसा तत्र संवृतं जनयत्सुतम् । ऋषिभिः पूजितं स्कन्नमनयन्स्कन्दतां ततः ॥
tatskannaṃ tejasā tatra saṃvṛtaṃ janayatsutam | ṛṣibhiḥ pūjitaṃ skannamanayanskandatāṃ tataḥ
वहाँ अपने तेज से आवृत उस स्खलित वीर्य ने पुत्र को जन्म दिया। ऋषियों ने उस 'स्कन्न' (स्खलित) का पूजन किया और इस प्रकार उसे 'स्कन्द' नाम दिया।
श्लोक 19 (3.227.19)
षट्शिरा द्विगुणश्रोत्रो द्वादशाक्षिभुजक्रमः । एकग्रीवस्त्वेककायः कुमारः समपद्यत ॥
ṣaṭśirā dviguṇaśrotro dvādaśākṣibhujakramaḥ | ekagrīvastvekakāyaḥ kumāraḥ samapadyata
एक बालक उत्पन्न हुआ जिसके छह सिर, उनसे दुगुने कान, क्रम से बारह नेत्र और बारह भुजाएँ थीं, पर गर्दन एक और शरीर एक ही था।
श्लोक 20 (3.227.20)
द्वितीयायामभिव्यक्तस्तृतीयायां शिशुर्बभौ । अङ्गप्रत्यङ्गसंभूतश्चतुर्थ्यामभवद्गुहः ॥
dvitīyāyāmabhivyaktastṛtīyāyāṃ śiśurbabhau | aṅgapratyaṅgasaṃbhūtaścaturthyāmabhavadguhaḥ
द्वितीया को वह प्रकट हुआ, तृतीया को शिशु रूप में शोभित हुआ और चतुर्थी को अंग-प्रत्यंगों से पूर्ण होकर गुह बन गया।
श्लोक 21 (3.227.21)
लोहिताभ्रेण महता संवृतः सह विद्युता । लोहिताभ्रे सुमहति भाति सूर्य इवोदितः ॥
lohitābhreṇa mahatā saṃvṛtaḥ saha vidyutā | lohitābhre sumahati bhāti sūrya ivoditaḥ
बिजली सहित एक विशाल लाल मेघ से घिरा हुआ वह उस विशाल लाल मेघ में उदित सूर्य के समान चमक रहा था।
श्लोक 22 (3.227.22)
गृहीतं तु धनुस्तेन विपुलं रोमहर्षणम् । न्यस्तं यत्त्रिपुरघ्नेन सुरारिविनिकृन्तनम् ॥
gṛhītaṃ tu dhanustena vipulaṃ romaharṣaṇam | nyastaṃ yattripuraghnena surārivinikṛntanam
उसने वह विशाल, रोमांचकारी धनुष उठा लिया जिसे त्रिपुरारि (शिव) ने रख छोड़ा था और जो देवशत्रुओं का संहार करने वाला था।
श्लोक 23 (3.227.23)
तद्गृहीत्वा धनुःश्रेष्ठं ननाद बलवांस्तदा । संमोहयन्निमाँल्लोकान्गुहस्त्रीन्सचराचरान् ॥
tadgṛhītvā dhanuḥśreṣṭhaṃ nanāda balavāṃstadā | saṃmohayannimām̐llokānguhastrīnsacarācarān
उस श्रेष्ठ धनुष को लेकर बलवान गुह ने गर्जना की, जिससे चर-अचर सहित ये तीनों लोक मोहित हो गए।
श्लोक 24 (3.227.24)
तस्य तं निनदं श्रुत्वा महामेघौघनिःस्वनम् । उत्पेततुर्महानागौ चित्रश्चैरावतश्च ह ॥
tasya taṃ ninadaṃ śrutvā mahāmeghaughaniḥsvanam | utpetaturmahānāgau citraścairāvataśca ha
महामेघों के समूह के गर्जन जैसा वह नाद सुनकर चित्र और ऐरावत नाम के दो महानाग उछलकर आ पहुँचे।
श्लोक 25 (3.227.25)
तावापतन्तौ संप्रेक्ष्य स बालोऽर्कसमद्युतिः । द्वाभ्यां गृहीत्वा पाणिभ्यां शक्तिं चान्येन पाणिना ॥
tāvāpatantau saṃprekṣya sa bālo'rkasamadyutiḥ | dvābhyāṃ gṛhītvā pāṇibhyāṃ śaktiṃ cānyena pāṇinā
उन्हें अपनी ओर झपटते देख सूर्य के समान तेजस्वी उस बालक ने दो हाथों से उन्हें पकड़ लिया, एक अन्य हाथ में शक्ति ले ली,
श्लोक 26 (3.227.26)
अपरेणाग्निदायादस्ताम्रचूडं भुजेन सः । महाकायमुपश्लिष्टं कुक्कुटं बलिनां वरम् । गृहीत्वा व्यनदद्भीमं चिक्रीड च महाभुजः ॥
apareṇāgnidāyādastāmracūḍaṃ bhujena saḥ | mahākāyamupaśliṣṭaṃ kukkuṭaṃ balināṃ varam | gṛhītvā vyanadadbhīmaṃ cikrīḍa ca mahābhujaḥ
और एक अन्य भुजा से अग्निपुत्र ने अपने से लिपटे, लाल कलगी वाले, विशालकाय, बलवानों में श्रेष्ठ मुर्गे को पकड़ लिया। उसे थामकर उस महाबाहु ने भयंकर गर्जना की और क्रीड़ा करने लगा।
श्लोक 27 (3.227.27)
द्वाभ्यां भुजाभ्यां बलवान्गृहीत्वा शङ्खमुत्तमम् । प्राध्मापयत भूतानां त्रासनं बलिनामपि । द्वाभ्यां भुजाभ्यामाकाशं बहुशो निजघान सः ॥
dvābhyāṃ bhujābhyāṃ balavāngṛhītvā śaṅkhamuttamam | prādhmāpayata bhūtānāṃ trāsanaṃ balināmapi | dvābhyāṃ bhujābhyāmākāśaṃ bahuśo nijaghāna saḥ
दो भुजाओं से उस बलवान ने एक उत्तम शंख लेकर बजाया, जो बलवानों को भी भयभीत करने वाला था; और दो भुजाओं से वह बार-बार आकाश पर प्रहार करने लगा।
श्लोक 28 (3.227.28)
क्रीडन्भाति महासेनस्त्रींल्लोकान्वदनैः पिबन् । पर्वताग्रेऽप्रमेयात्मा रश्मिमानुदये यथा ॥
krīḍanbhāti mahāsenastrīṃllokānvadanaiḥ piban | parvatāgre'prameyātmā raśmimānudaye yathā
क्रीड़ा करता हुआ अपरिमेय आत्मा वाला महासेन पर्वत-शिखर पर ऐसे शोभित हुआ मानो अपने मुखों से तीनों लोकों का पान कर रहा हो, जैसे उदय होता हुआ सूर्य।
श्लोक 29 (3.227.29)
स तस्य पर्वतस्याग्रे निषण्णोऽद्भुतविक्रमः । व्यलोकयदमेयात्मा मुखैर्नानाविधैर्दिशः ॥
sa tasya parvatasyāgre niṣaṇṇo'dbhutavikramaḥ | vyalokayadameyātmā mukhairnānāvidhairdiśaḥ
उस पर्वत के शिखर पर बैठे अद्भुत पराक्रमी, अपरिमेय आत्मा वाले उस बालक ने अपने नाना प्रकार के मुखों से दिशाओं को देखा।
श्लोक 30 (3.227.30)
स पश्यन्विविधान्भावांश्चकार निनदं पुनः । तस्य तं निनदं श्रुत्वा न्यपतन्बहुधा जनाः । भीताश्चोद्विग्नमनसस्तमेव शरणं ययुः ॥
sa paśyanvividhānbhāvāṃścakāra ninadaṃ punaḥ | tasya taṃ ninadaṃ śrutvā nyapatanbahudhā janāḥ | bhītāścodvignamanasastameva śaraṇaṃ yayuḥ
नाना प्रकार के दृश्यों को देखकर उसने फिर गर्जना की। उस नाद को सुनकर बहुत-से लोग जहाँ-तहाँ गिर पड़े और भयभीत तथा व्याकुल मन से उसी की शरण में गए।
श्लोक 31 (3.227.31)
ये तु तं संश्रिता देवं नानावर्णास्तदा जनाः । तानप्याहुः पारिषदान्ब्राह्मणाः सुमहाबलान् ॥
ye tu taṃ saṃśritā devaṃ nānāvarṇāstadā janāḥ | tānapyāhuḥ pāriṣadānbrāhmaṇāḥ sumahābalān
उस समय जिन अनेक वर्णों वाले लोगों ने उस देव का आश्रय लिया, उन्हें ब्राह्मण उसके महाबलशाली पार्षद कहते हैं।
श्लोक 32 (3.227.32)
स तूत्थाय महाबाहुरुपसान्त्व्य च ताञ्जनान् । धनुर्विकृष्य व्यसृजद्बाणाञ्श्वेते महागिरौ ॥
sa tūtthāya mahābāhurupasāntvya ca tāñjanān | dhanurvikṛṣya vyasṛjadbāṇāñśvete mahāgirau
तब उस महाबाहु ने उठकर उन लोगों को सान्त्वना दी और धनुष खींचकर विशाल श्वेत पर्वत पर बाण छोड़े।
श्लोक 33 (3.227.33)
बिभेद स शरैः शैलं क्रौञ्चं हिमवतः सुतम् । तेन हंसाश्च गृध्राश्च मेरुं गच्छन्ति पर्वतम् ॥
bibheda sa śaraiḥ śailaṃ krauñcaṃ himavataḥ sutam | tena haṃsāśca gṛdhrāśca meruṃ gacchanti parvatam
अपने बाणों से उसने हिमवान के पुत्र क्रौञ्च पर्वत को विदीर्ण कर दिया; उसी मार्ग से हंस और गिद्ध मेरु पर्वत को जाते हैं।
श्लोक 34 (3.227.34)
स विशीर्णोऽपतच्छैलो भृशमार्तस्वरान्रुवन् ॥
sa viśīrṇo'patacchailo bhṛśamārtasvarānruvan
विदीर्ण होकर वह पर्वत पीड़ा से जोर-जोर से चीत्कार करता हुआ गिर पड़ा।
श्लोक 35 (3.227.35)
तस्मिन्निपतिते त्वन्ये नेदुः शैला भृशं भयात् । घोरमार्तस्वरं चक्रुर्दृष्ट्वा क्रौञ्चं विदारितम् ॥
tasminnipatite tvanye neduḥ śailā bhṛśaṃ bhayāt | ghoramārtasvaraṃ cakrurdṛṣṭvā krauñcaṃ vidāritam
उसके गिरने पर दूसरे पर्वत भी अत्यन्त भय से चिल्ला उठे; क्रौञ्च को विदीर्ण देखकर उन्होंने भयंकर आर्तनाद किया।
श्लोक 36 (3.227.36)
स तं नादं भृशार्तानां श्रुत्वाऽपि बलिनां वरः । न प्राव्यधदमेयात्मा शक्तिमुद्यम्य चानदत् ॥
sa taṃ nādaṃ bhṛśārtānāṃ śrutvā'pi balināṃ varaḥ | na prāvyadhadameyātmā śaktimudyamya cānadat
अत्यन्त पीड़ितों का वह नाद सुनकर भी बलवानों में श्रेष्ठ उस अपरिमेय आत्मा ने उन पर प्रहार नहीं किया; उसने शक्ति उठाकर गर्जना की।
श्लोक 37 (3.227.37)
सा तदा विमला शक्तिः क्षिप्ता तेन महात्मना । बिभेद शिखरं घोरं श्वेतस्य तरसा गिरेः ॥
sā tadā vimalā śaktiḥ kṣiptā tena mahātmanā | bibheda śikharaṃ ghoraṃ śvetasya tarasā gireḥ
तब उस महात्मा द्वारा फेंकी गई उस निर्मल शक्ति ने वेग से श्वेत पर्वत के भयंकर शिखर को विदीर्ण कर दिया।
श्लोक 38 (3.227.38)
स तेनाभिहतो दीर्णो गिरिः श्वेतोऽचलैः सह । पलायत महीं त्यक्त्वा भीतस्तस्मान्महात्मनः ॥
sa tenābhihato dīrṇo giriḥ śveto'calaiḥ saha | palāyata mahīṃ tyaktvā bhītastasmānmahātmanaḥ
उससे आहत और विदीर्ण होकर श्वेत पर्वत अन्य पर्वतों सहित उस महात्मा के भय से पृथ्वी छोड़कर भाग गया।
श्लोक 39 (3.227.39)
ततः प्रव्यथिता भूमिर्व्यशीर्यत समन्ततः । आर्ता स्कन्दं समासाद्य पुनर्बलवती बभौ ॥
tataḥ pravyathitā bhūmirvyaśīryata samantataḥ | ārtā skandaṃ samāsādya punarbalavatī babhau
तब व्यथित पृथ्वी चारों ओर से फटने लगी; पीड़ित होकर वह स्कन्द के पास पहुँची और फिर से बलवती होकर शोभित हुई।
श्लोक 40 (3.227.40)
पर्वताश्च नमस्कृत्य तमेव पृथिवीं गताः । अथैनमभजल्लोकः स्कन्दं शुक्लस्य पञ्चमीम् ॥
parvatāśca namaskṛtya tameva pṛthivīṃ gatāḥ | athainamabhajallokaḥ skandaṃ śuklasya pañcamīm
पर्वत भी उसे प्रणाम करके फिर पृथ्वी पर लौट आए। तभी से लोग शुक्ल पक्ष की पंचमी को स्कन्द की उपासना करते हैं।