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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 228

ऋषिपत्नियों का त्याग और इन्द्र-स्कन्द युद्ध

स्कन्द के जन्म पर उत्पात होने लगते हैं और वनवासी इसका दोष अग्नि के सप्तर्षियों की छह पत्नियों से समागम पर डालते हैं; स्वाहा के बालक को अपना बताने और सब कुछ देख चुके विश्वामित्र के पत्नियों को निर्दोष कहने पर भी ऋषि अरुन्धती को छोड़ अपनी सब पत्नियों का त्याग कर देते हैं। विश्वामित्र स्कन्द के जातकर्म आदि संस्कार करते हैं। देवता इन्द्र से बालक को मारने का आग्रह करते हैं, पर उसके विरुद्ध भेजी गई माताएँ उसे पुत्र रूप में अपना लेती हैं। इन्द्र देवसेना लेकर आक्रमण करते हैं; स्कन्द की अग्नि उन्हें जलाती है, और उसकी बगल पर इन्द्र के वज्र-प्रहार से विशाख तथा बालकों का हरण करने वाले कुमार और कन्याएँ उत्पन्न होते हैं। इन्द्र शरण लेकर अभय पाते हैं, और कन्याएँ संसार की माताएँ बनने का वर माँगती हैं।

अध्याय 227अध्याय-सूचीअध्याय 229

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 1 (3.228.1)

तस्मिञ्जाते महासत्त्वे महासेने महाबले । समुत्तस्थुर्महोत्पाता घोररूपाः पृथग्विधाः ॥

tasmiñjāte mahāsattve mahāsene mahābale | samuttasthurmahotpātā ghorarūpāḥ pṛthagvidhāḥ

उस महान् सत्त्वशाली, महाबली महासेन के जन्म लेते ही अनेक प्रकार के भयंकर उत्पात होने लगे।

श्लोक 2 (3.228.2)

स्त्रीपुंसोर्विपरीतं च तथा द्वन्द्वानि यानि च । ग्रहा दीप्ता दिशः खं च ररास च मही भृशम् ॥

strīpuṃsorviparītaṃ ca tathā dvandvāni yāni ca | grahā dīptā diśaḥ khaṃ ca rarāsa ca mahī bhṛśam

स्त्री-पुरुषों में परस्पर वैर हो गया, सर्दी-गर्मी जैसे द्वन्द्व भी उलट गए; ग्रह, दिशाएँ और आकाश जलने लगे और पृथ्वी जोर से गर्जने लगी।

श्लोक 3 (3.228.3)

ऋषयश्च महाघोरान्दृष्ट्वोत्पातान्समन्ततः । अकुर्वञ्शान्तिमुद्विग्ना लोकानां लोकभावनाः ॥

ṛṣayaśca mahāghorāndṛṣṭvotpātānsamantataḥ | akurvañśāntimudvignā lokānāṃ lokabhāvanāḥ

चारों ओर ये महाभयंकर उत्पात देखकर लोकों का पालन करने वाले ऋषि व्याकुल हो उठे और उन्होंने लोकों की शान्ति के लिए अनुष्ठान किए।

श्लोक 4 (3.228.4)

निवसन्ति वने ये तु तस्मिंश्चैत्ररथे जनाः । तेऽब्रुवन्नेष नोऽनर्थः पावकेनाहृतो महान् । संगम्य षड्भिः पत्नीभिः सप्तर्षीणामिति स्म ह ॥

nivasanti vane ye tu tasmiṃścaitrarathe janāḥ | te'bruvanneṣa no'narthaḥ pāvakenāhṛto mahān | saṃgamya ṣaḍbhiḥ patnībhiḥ saptarṣīṇāmiti sma ha

परन्तु उस चैत्ररथ वन में रहने वाले लोग कहने लगे — "यह महान् अनर्थ अग्नि ने सप्तर्षियों की छह पत्नियों से समागम करके हम पर ला दिया है।"

श्लोक 5 (3.228.5)

अपरे गरुडीमाहुस्तयाऽनर्थोऽयमाहृतः । यैर्दृष्टा सा तदा देवी तस्या रूपेण गच्छती ॥

apare garuḍīmāhustayā'nartho'yamāhṛtaḥ | yairdṛṣṭā sā tadā devī tasyā rūpeṇa gacchatī

दूसरे लोग, जिन्होंने उस समय देवी को पक्षिणी के रूप में जाते देखा था, कहने लगे कि यह अनर्थ उस गरुड़ी ने किया है।

श्लोक 6 (3.228.6)

न तु तत्स्वाहया कर्म कृतं जानाति वै जनः ॥

na tu tatsvāhayā karma kṛtaṃ jānāti vai janaḥ

किन्तु कोई नहीं जानता था कि वह कर्म स्वाहा ने किया था।

श्लोक 7 (3.228.7)

सुपर्णी तु वचः श्रुत्वा ममायं तनयस्त्विति । उपगम्य शनैः स्कन्दमाहाहं जननी तव ॥

suparṇī tu vacaḥ śrutvā mamāyaṃ tanayastviti | upagamya śanaiḥ skandamāhāhaṃ jananī tava

यह बात सुनकर उस सुपर्णी ने सोचा कि यह मेरा पुत्र है, और धीरे से स्कन्द के पास जाकर कहा — "मैं तुम्हारी माता हूँ।"

श्लोक 8 (3.228.8)

अथ सप्तर्षयः श्रुत्वा जातं पुत्रं महौजसम् । तत्यजुः षट् तदा पत्नीर्विना देवीमरुन्धतीम् । षड्भिरेव तदा जातमाहुस्तद्वनवासिनः ॥

atha saptarṣayaḥ śrutvā jātaṃ putraṃ mahaujasam | tatyajuḥ ṣaṭ tadā patnīrvinā devīmarundhatīm | ṣaḍbhireva tadā jātamāhustadvanavāsinaḥ

तब सप्तर्षियों ने महातेजस्वी पुत्र के जन्म का समाचार सुनकर देवी अरुन्धती को छोड़ अपनी छहों पत्नियों का त्याग कर दिया, क्योंकि वनवासी कहते थे कि यह बालक उन्हीं छह से उत्पन्न हुआ है।

श्लोक 9 (3.228.9)

सप्तर्षीनाह च स्वाहा मम पुत्रोऽयमित्युत । अहं हेतुर्नैतदेवमिति राजन्पुनः पुनः ॥

saptarṣīnāha ca svāhā mama putro'yamityuta | ahaṃ heturnaitadevamiti rājanpunaḥ punaḥ

हे राजन्, स्वाहा ने सप्तर्षियों से बार-बार कहा — "यह मेरा पुत्र है। इसका कारण मैं हूँ; बात वैसी नहीं है।"

श्लोक 10 (3.228.10)

विश्वामित्रस्तु कृत्वेष्टिं सप्तर्षीणां महामुनिः । पावकं कामसंतप्तमदृष्टः पृष्ठतोऽन्वगात् । तत्तेन निखिलं सर्वमवबुध्य यथातथम् ॥

viśvāmitrastu kṛtveṣṭiṃ saptarṣīṇāṃ mahāmuniḥ | pāvakaṃ kāmasaṃtaptamadṛṣṭaḥ pṛṣṭhato'nvagāt | tattena nikhilaṃ sarvamavabudhya yathātatham

महामुनि विश्वामित्र सप्तर्षियों का यज्ञ पूरा करके काम से संतप्त अग्नि के पीछे-पीछे अदृश्य रूप से गए थे, और इस प्रकार उन्होंने सारी बात ठीक-ठीक जान ली थी।

श्लोक 11 (3.228.11)

विश्वामित्रस्तु प्रथमं कुमारं शरणं गतः । स्तवं दिव्यं संप्रचक्रे महासेनस्य चापि सः ॥

viśvāmitrastu prathamaṃ kumāraṃ śaraṇaṃ gataḥ | stavaṃ divyaṃ saṃpracakre mahāsenasya cāpi saḥ

विश्वामित्र ही सबसे पहले कुमार की शरण में गए और उन्होंने महासेन की एक दिव्य स्तुति रची।

श्लोक 12 (3.228.12)

मङ्गलानि च सर्वाणि कौमाराणि त्रयोदश । जातकर्मादिकास्तस्य क्रियाश्चक्रे महामुनिः ॥

maṅgalāni ca sarvāṇi kaumārāṇi trayodaśa | jātakarmādikāstasya kriyāścakre mahāmuniḥ

उस महामुनि ने उसके लिए जातकर्म आदि बालक के सभी तेरह मंगल-संस्कार सम्पन्न किए।

श्लोक 13 (3.228.13)

षड्वक्त्रस्य तु माहात्म्यं कुक्कुटस्य तु साधनम् । शक्त्या देव्याः साधनं च तथा पारिषदामपि ॥

ṣaḍvaktrasya tu māhātmyaṃ kukkuṭasya tu sādhanam | śaktyā devyāḥ sādhanaṃ ca tathā pāriṣadāmapi

उन्होंने षडानन की महिमा का गान किया और मुर्गे, शक्ति देवी तथा पार्षदों का भी संस्कार किया।

श्लोक 14 (3.228.14)

विश्वामित्रश्चकारैतत्कर्म लोकहिताय वै । तस्मादृषिः कुमारस्य विश्वामित्रोऽभवत्प्रियः ॥

viśvāmitraścakāraitatkarma lokahitāya vai | tasmādṛṣiḥ kumārasya viśvāmitro'bhavatpriyaḥ

विश्वामित्र ने यह सब लोकहित के लिए किया; इसी कारण ऋषि विश्वामित्र कुमार के प्रिय हो गए।

श्लोक 15 (3.228.15)

अन्वजानाच्च स्वाहाया रूपान्यत्वं महामुनिः । अब्रवीच्च मुनीन्सर्वान्नापराध्यन्ति वै स्त्रियः । श्रुत्वा तु तत्वतस्तस्मात्ते पत्नीः सर्वतोऽत्यजन् ॥

anvajānācca svāhāyā rūpānyatvaṃ mahāmuniḥ | abravīcca munīnsarvānnāparādhyanti vai striyaḥ | śrutvā tu tatvatastasmātte patnīḥ sarvato'tyajan

महामुनि विश्वामित्र स्वाहा के रूप-परिवर्तन को जानते थे; उन्होंने सब मुनियों से कहा — "तुम्हारी पत्नियाँ निर्दोष हैं।" फिर भी उनसे सच्ची बात सुनकर भी उन्होंने अपनी पत्नियों को पूरी तरह त्याग दिया।

श्लोक 16 (3.228.16)

स्कन्दं श्रुत्वा तदा देवा वासवं सहिताऽब्रुवन् । अविषह्यबलं स्कन्दं जहि शक्राशु माचिरम् ॥

skandaṃ śrutvā tadā devā vāsavaṃ sahitā'bruvan | aviṣahyabalaṃ skandaṃ jahi śakrāśu māciram

स्कन्द के विषय में सुनकर देवताओं ने मिलकर इन्द्र से कहा — "हे शक्र, जिसका बल असह्य है उस स्कन्द को शीघ्र, बिना विलम्ब मार डालो।

देवा ऊचुः

श्लोक 17 (3.228.17)

यदि वा न निहंस्येनमद्येन्द्रोऽयं भविष्यति । त्रैलोक्यं सन्निगृह्यास्मांस्त्वां च शक्र महाबलः ॥

yadi vā na nihaṃsyenamadyendro'yaṃ bhaviṣyati | trailokyaṃ sannigṛhyāsmāṃstvāṃ ca śakra mahābalaḥ

हे शक्र, यदि तुम इसे नहीं मारोगे तो यह महाबली आज ही इन्द्र बन जाएगा और तीनों लोकों को, हमें और तुम्हें भी अपने वश में कर लेगा।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 18 (3.228.18)

स तानुवाच व्यथितो बालोऽयं सुमहाबलः । स्रष्टारमपि लोकानां युधि विक्रम्य नाशयेत् । न बालमुत्सहे हन्तुमिति शक्रः प्रभाषते ॥

sa tānuvāca vyathito bālo'yaṃ sumahābalaḥ | sraṣṭāramapi lokānāṃ yudhi vikramya nāśayet | na bālamutsahe hantumiti śakraḥ prabhāṣate

व्यथित होकर इन्द्र ने उनसे कहा — "यह बालक अत्यन्त बलवान है। युद्ध में यह पराक्रम करके लोकों के स्रष्टा को भी नष्ट कर सकता है। मैं बालक को मारने का साहस नहीं करता।" ऐसा शक्र ने कहा।

श्लोक 19 (3.228.19)

तेऽब्रुवन्नास्ति ते वीर्यं यत एवं प्रभाषसे । सर्वास्त्वद्याभिगच्छन्तु स्कन्दं लोकस्य मातरः ॥

te'bruvannāsti te vīryaṃ yata evaṃ prabhāṣase | sarvāstvadyābhigacchantu skandaṃ lokasya mātaraḥ

वे बोले — "तुम ऐसा कहते हो, इससे स्पष्ट है कि तुममें पराक्रम नहीं है। आज संसार की सब माताएँ स्कन्द के पास जाएँ

श्लोक 20 (3.228.20)

कामवीर्या घ्नन्तु चैनं तथेत्युक्त्वा च ता ययुः । तमप्रतिबलं दृष्ट्वा विषण्णवदनास्तु ताः ॥

kāmavīryā ghnantu cainaṃ tathetyuktvā ca tā yayuḥ | tamapratibalaṃ dṛṣṭvā viṣaṇṇavadanāstu tāḥ

और इच्छानुसार पराक्रम वाली वे उसे मार डालें।" 'ऐसा ही हो' कहकर वे चली गईं। किन्तु उसे अप्रतिम बलशाली देखकर उनके मुख उदास हो गए।

श्लोक 21 (3.228.21)

अशक्योऽयं विचिन्त्यैवं तमेव शरणं ययुः । ऊचुश्चैनं त्वमस्माकं पुत्रोऽस्माभिर्धृतं जगत् ॥

aśakyo'yaṃ vicintyaivaṃ tameva śaraṇaṃ yayuḥ | ūcuścainaṃ tvamasmākaṃ putro'smābhirdhṛtaṃ jagat

'यह अजेय है' — ऐसा सोचकर वे उसी की शरण में गईं और उससे बोलीं — "तुम हमारे पुत्र हो। यह जगत् हमारे द्वारा धारण किया गया है।"

श्लोक 22 (3.228.22)

अभिनन्द्य ततः सर्वाः प्रस्नुताः स्नेहविक्लवाः । तासां तद्वचनं श्रुत्वा पातुकामः स्तनान्प्रभुः ॥

abhinandya tataḥ sarvāḥ prasnutāḥ snehaviklavāḥ | tāsāṃ tadvacanaṃ śrutvā pātukāmaḥ stanānprabhuḥ

फिर उन सबने उसका अभिनन्दन किया; स्नेह से विह्वल उनके स्तनों से दूध बहने लगा। उनकी बात सुनकर प्रभु स्कन्द ने उनका स्तनपान करना चाहा।

श्लोक 23 (3.228.23)

ताः संपूज्य महासेनः कामांश्चासां प्रदाय सः । अपश्यदग्निमायान्तं पितरं बलिनां बली ॥

tāḥ saṃpūjya mahāsenaḥ kāmāṃścāsāṃ pradāya saḥ | apaśyadagnimāyāntaṃ pitaraṃ balināṃ balī

महासेन ने उनका सम्मान किया और उनकी कामनाएँ पूरी कीं; तब बलवानों में सबसे बलवान उस बालक ने अपने पिता अग्नि को आते देखा।

श्लोक 24 (3.228.24)

स तु संपूजितस्तेन सह मातृगणेन ह । परिवार्य महासेनं रक्षमाणः स्थितः शिवः ॥

sa tu saṃpūjitastena saha mātṛgaṇena ha | parivārya mahāsenaṃ rakṣamāṇaḥ sthitaḥ śivaḥ

पुत्र द्वारा सम्मानित होकर मंगलमय अग्नि माताओं के समूह के साथ महासेन को घेरकर उसकी रक्षा करते हुए खड़े रहे।

श्लोक 25 (3.228.25)

सर्वासां या तु मातॄणां नारी क्रोधसमुद्भवा । धात्री स्वपुत्रवत्स्कन्दं शूलहस्ताऽभ्यरक्षत ॥

sarvāsāṃ yā tu mātṝṇāṃ nārī krodhasamudbhavā | dhātrī svaputravatskandaṃ śūlahastā'bhyarakṣata

सब माताओं में जो नारी क्रोध से उत्पन्न हुई थी, वह हाथ में शूल लिए धाय की भाँति अपने पुत्र के समान स्कन्द की रक्षा करने लगी।

श्लोक 26 (3.228.26)

लोहितस्योदधेः कन्या क्रूरा लोहितभोजना । परिष्वज्य महासेनं पुत्रवत्पर्यरक्षत ॥

lohitasyodadheḥ kanyā krūrā lohitabhojanā | pariṣvajya mahāsenaṃ putravatparyarakṣata

लोहित सागर की क्रूर कन्या, जो रक्त का भोजन करती है, महासेन को गले लगाकर पुत्र की भाँति उसकी रक्षा करने लगी।

श्लोक 27 (3.228.27)

अग्निर्भूत्वा नैगमेयश्छागवक्त्रो बहुप्रजः । रमयामास शैलस्थं बालं क्रीडनकैरिव ॥

agnirbhūtvā naigameyaśchāgavaktro bahuprajaḥ | ramayāmāsa śailasthaṃ bālaṃ krīḍanakairiva

अग्नि ने बकरे के मुख वाले, बहुत संतानों वाले नैगमेय का रूप धारण किया और पर्वत पर स्थित उस बालक को मानो खिलौनों से बहलाने लगे।

श्लोक 28 (3.228.28)

ग्रहाः सोपग्रहाश्चैव ऋषयो मातरस्तथा । हुताशनमुखाश्चैव दृप्ताः पारिषदां गणाः ॥

grahāḥ sopagrahāścaiva ṛṣayo mātarastathā | hutāśanamukhāścaiva dṛptāḥ pāriṣadāṃ gaṇāḥ

ग्रह और उपग्रह, ऋषि और माताएँ, तथा अग्नि को अग्रणी मानने वाले गर्वीले पार्षद-गण —

श्लोक 29 (3.228.29)

एते चान्ये च बहवो घोरास्त्रिदिववासिनः । परिवार्य महासेनं स्थिता मातृगणैः सह ॥

ete cānye ca bahavo ghorāstridivavāsinaḥ | parivārya mahāsenaṃ sthitā mātṛgaṇaiḥ saha

ये तथा अन्य बहुत-से भयंकर स्वर्गवासी माताओं के समूहों के साथ महासेन को घेरकर खड़े थे।

श्लोक 30 (3.228.30)

संदिग्धं विजयं दृष्ट्वा विजयेप्सुः सुरेश्वरः । आरुह्यैरावतस्कन्धं प्रययौ दैवतैः सह ॥

saṃdigdhaṃ vijayaṃ dṛṣṭvā vijayepsuḥ sureśvaraḥ | āruhyairāvataskandhaṃ prayayau daivataiḥ saha

अपनी विजय को संदिग्ध देखकर विजय के इच्छुक देवराज इन्द्र ऐरावत के कन्धे पर चढ़कर देवताओं के साथ चल पड़े।

श्लोक 31 (3.228.31)

आदाय वज्रं बलवान्सर्वैर्देवगणैर्वृतः । विजिघांसुर्महासेनमिन्द्रस्तूर्णतरं ययौ ॥

ādāya vajraṃ balavānsarvairdevagaṇairvṛtaḥ | vijighāṃsurmahāsenamindrastūrṇataraṃ yayau

वज्र लेकर, सब देवगणों से घिरे बलवान इन्द्र महासेन को मारने की इच्छा से बड़ी तेजी से आगे बढ़े।

श्लोक 32 (3.228.32)

इन्द्रस्तस्य महावेगं दृष्ट्वाऽद्भुतपराक्रमम् । विस्मितश्चाभवद्राजन्देवानीकमचोदयत् ॥

indrastasya mahāvegaṃ dṛṣṭvā'dbhutaparākramam | vismitaścābhavadrājandevānīkamacodayat

हे राजन्, स्कन्द का महान् वेग और अद्भुत पराक्रम देखकर इन्द्र विस्मित हुए और उन्होंने देवसेना को आगे बढ़ाया —

श्लोक 33 (3.228.33)

उग्रं तं च महानादं देवानीकं महाप्रभम् । विचित्रध्वजसन्नाहं नानावाहनकार्मुकम् ॥

ugraṃ taṃ ca mahānādaṃ devānīkaṃ mahāprabham | vicitradhvajasannāhaṃ nānāvāhanakārmukam

वह उग्र, महानाद करती, अत्यन्त तेजस्वी देवसेना, जिसके ध्वज और कवच रंग-बिरंगे थे और जिसमें नाना प्रकार के वाहन और धनुष थे,

श्लोक 34 (3.228.34)

प्रवराम्बरसंवीतं श्रिया जुष्टमलंकृतम् । विजिघांसुं तमायान्तं कुमारः शक्रमन्वयात् ॥

pravarāmbarasaṃvītaṃ śriyā juṣṭamalaṃkṛtam | vijighāṃsuṃ tamāyāntaṃ kumāraḥ śakramanvayāt

जो उत्तम वस्त्रों से सुसज्जित, शोभायुक्त और अलंकृत थी। मारने की इच्छा से आते हुए इन्द्र की ओर कुमार बढ़ चला।

श्लोक 35 (3.228.35)

वियत्पतिः स शक्रस्तु द्रुतमायान्महाबलः । संहर्षयन्देवसेनां जिघांसुः पावकात्मजम् ॥

viyatpatiḥ sa śakrastu drutamāyānmahābalaḥ | saṃharṣayandevasenāṃ jighāṃsuḥ pāvakātmajam

आकाश के स्वामी महाबली इन्द्र भी देवसेना को उत्साहित करते हुए, अग्निपुत्र को मारने की इच्छा से तेजी से आगे बढ़े।

श्लोक 36 (3.228.36)

संपूज्यमानस्त्रिदशैस्तथैव परमर्षिभिः । समीपमथ संप्राप्तो वह्निपुत्रस्य वासवः ॥

saṃpūjyamānastridaśaistathaiva paramarṣibhiḥ | samīpamatha saṃprāpto vahniputrasya vāsavaḥ

देवताओं और परमर्षियों से सम्मानित होते हुए इन्द्र अग्निपुत्र के समीप जा पहुँचे।

श्लोक 37 (3.228.37)

सिंहनादं ततश्चक्रे देवेशः सहितैः सुरैः । गुहोऽपि शब्दं तं श्रुत्वा व्यनदत्सागरो यथा ॥

siṃhanādaṃ tataścakre deveśaḥ sahitaiḥ suraiḥ | guho'pi śabdaṃ taṃ śrutvā vyanadatsāgaro yathā

तब देवराज ने देवताओं के साथ सिंहनाद किया; वह शब्द सुनकर गुह भी समुद्र के समान गरज उठा।

श्लोक 38 (3.228.38)

तस्य शब्देन महता समुद्धूतोदधिप्रभम् । बभ्राम तत्र तत्रैव दैवसैन्यमचेतनम् ॥

tasya śabdena mahatā samuddhūtodadhiprabham | babhrāma tatra tatraiva daivasainyamacetanam

उसके उस प्रचण्ड शब्द से, जो उमड़ते समुद्र के समान था, देवसेना वहीं की वहीं अचेत होकर चक्कर खाने लगी।

श्लोक 39 (3.228.39)

जिघांसूनुपसंप्राप्तान्देवान्दृष्ट्वा स पावकिः । विससर्ज मुखात्क्रुद्धः प्रवृद्धाः पावकार्चिषः ॥

jighāṃsūnupasaṃprāptāndevāndṛṣṭvā sa pāvakiḥ | visasarja mukhātkruddhaḥ pravṛddhāḥ pāvakārciṣaḥ

मारने की इच्छा से समीप आए देवताओं को देखकर क्रुद्ध अग्निपुत्र ने अपने मुख से प्रचण्ड अग्नि-ज्वालाएँ छोड़ीं,

श्लोक 40 (3.228.40)

अदहद्देवसैन्यानि वेपमानानि भूतले ॥

adahaddevasainyāni vepamānāni bhūtale

और भूमि पर काँपती हुई देवसेनाओं को जला डाला।

श्लोक 41 (3.228.41)

ते प्रदीप्तशिरोदेहाः प्रदीप्तायुधवाहनाः । प्रच्युताः सहसा भान्ति चित्रास्तारागणा इव ॥

te pradīptaśirodehāḥ pradīptāyudhavāhanāḥ | pracyutāḥ sahasā bhānti citrāstārāgaṇā iva

जलते सिरों और शरीरों वाले, प्रज्वलित अस्त्रों और वाहनों वाले वे सहसा गिरते हुए चित्र-विचित्र तारासमूहों के समान दिखाई दिए।

श्लोक 42 (3.228.42)

दह्यमानाः प्रपन्नास्ते शरणं पावकात्मजम् । देवा वज्रधरं त्यक्त्वा ततः शान्तिमुपागताः ॥

dahyamānāḥ prapannāste śaraṇaṃ pāvakātmajam | devā vajradharaṃ tyaktvā tataḥ śāntimupāgatāḥ

जलते हुए देवता वज्रधारी इन्द्र को छोड़कर अग्निपुत्र की शरण में गए; तब उन्हें शान्ति मिली।

श्लोक 43 (3.228.43)

त्यक्तो देवैस्ततः स्कन्दे वज्रं शक्रो न्यपातयत् ॥

tyakto devaistataḥ skande vajraṃ śakro nyapātayat

देवताओं द्वारा त्याग दिए जाने पर इन्द्र ने स्कन्द पर वज्र चलाया।

श्लोक 44 (3.228.44)

तद्विसृष्टं जघानाशु पार्श्वं स्कन्दस्य दक्षिणम् । बिभेद च महाराज पार्श्वं तस्य महात्मनः ॥

tadvisṛṣṭaṃ jaghānāśu pārśvaṃ skandasya dakṣiṇam | bibheda ca mahārāja pārśvaṃ tasya mahātmanaḥ

छोड़ा गया वह वज्र तुरन्त स्कन्द की दाहिनी पसली पर लगा और, हे महाराज, उसने उस महात्मा की बगल को चीर दिया।

श्लोक 45 (3.228.45)

वज्रप्रहारात्स्कन्दस्य संजातः पुरुषोऽपरः । युवा काञ्चनसन्नाहः शक्तिधृग्दिव्यकुण्डलः ॥

vajraprahārātskandasya saṃjātaḥ puruṣo'paraḥ | yuvā kāñcanasannāhaḥ śaktidhṛgdivyakuṇḍalaḥ

वज्र के प्रहार से स्कन्द से एक दूसरा पुरुष उत्पन्न हुआ — युवा, स्वर्ण-कवचधारी, शक्ति लिए हुए और दिव्य कुण्डल पहने हुए।

श्लोक 46 (3.228.46)

यद्वज्रविशनाज्जातो विशाखस्तेन सोऽभवत् ॥

yadvajraviśanājjāto viśākhastena so'bhavat

क्योंकि वह वज्र के प्रवेश से उत्पन्न हुआ था, इसलिए वह विशाख कहलाया।

श्लोक 47 (3.228.47)

तं जातमपरं दृष्ट्वा कालानलसमद्युतिम् । भयादिन्द्रस्तु तं स्कन्दं प्राञ्जलिः शरणं गतः ॥

taṃ jātamaparaṃ dṛṣṭvā kālānalasamadyutim | bhayādindrastu taṃ skandaṃ prāñjaliḥ śaraṇaṃ gataḥ

प्रलयाग्नि के समान तेजस्वी उस दूसरे पुरुष को उत्पन्न हुआ देखकर इन्द्र भयभीत होकर हाथ जोड़े स्कन्द की शरण में गए।

श्लोक 48 (3.228.48)

तस्याभयं ददौ स्कन्दः सहसैन्यस्य सत्तम । ततः प्रहृष्टास्त्रिदशा वादित्राण्यभ्यवादयन् ॥

tasyābhayaṃ dadau skandaḥ sahasainyasya sattama | tataḥ prahṛṣṭāstridaśā vāditrāṇyabhyavādayan

हे सत्तम, स्कन्द ने सेना सहित इन्द्र को अभयदान दिया; तब आनन्दित देवताओं ने बाजे बजाए।

श्लोक 49 (3.228.49)

स्कन्दपारिषदान्घोराञ्छृणुष्वाद्भुतदर्शनान् । वज्रप्रहारात्स्कन्दस्य जज्ञुस्तत्र कुमारकाः । ये हरन्ति शिशूञ्जातान्गर्भस्थांश्चैव दारुणाः ॥

skandapāriṣadānghorāñchṛṇuṣvādbhutadarśanān | vajraprahārātskandasya jajñustatra kumārakāḥ | ye haranti śiśūñjātāngarbhasthāṃścaiva dāruṇāḥ

अब स्कन्द के उन भयंकर, अद्भुत दिखने वाले पार्षदों के विषय में सुनो। स्कन्द पर हुए वज्र-प्रहार से वहाँ कुमार उत्पन्न हुए — वे क्रूर, जो नवजात शिशुओं और गर्भस्थ बालकों का भी हरण करते हैं।

श्लोक 50 (3.228.50)

वज्रप्रहारात्कन्याश्च जज्ञिरेऽस्य महाबलाः ॥

vajraprahārātkanyāśca jajñire'sya mahābalāḥ

वज्र-प्रहार से उसके महाबलशाली कन्याएँ भी उत्पन्न हुईं।

श्लोक 51 (3.228.51)

कुमारान्स विशाखं च पुत्रत्वे समकल्पयत् । स भूत्वा भगवान्सङ्ख्ये रक्षंश्छागमुखस्तदा ॥

kumārānsa viśākhaṃ ca putratve samakalpayat | sa bhūtvā bhagavānsaṅkhye rakṣaṃśchāgamukhastadā

उसने उन कुमारों और विशाख को अपने पुत्रों के रूप में स्वीकार किया। तब वह भगवान बकरे के मुख वाला बनकर युद्ध में उनकी रक्षा करता हुआ,

श्लोक 52 (3.228.52)

वृतः कन्यागणैः सर्वैरात्मीयैः सह पुत्रकैः । मातृणां प्रेषितानां च भद्रशाखश्च कोमलैः ॥

vṛtaḥ kanyāgaṇaiḥ sarvairātmīyaiḥ saha putrakaiḥ | mātṛṇāṃ preṣitānāṃ ca bhadraśākhaśca komalaiḥ

सब कन्याओं के समूहों, अपने पुत्रों और भेजी गई माताओं के कोमल बालकों से घिरा हुआ भद्रशाख कहलाया।

श्लोक 53 (3.228.53)

ततः कुमारं संजातं स्कन्दमाहुर्जना भुवि । रुद्रमग्निमुखां स्वाहां प्रदेशेषु महाबलाः ॥

tataḥ kumāraṃ saṃjātaṃ skandamāhurjanā bhuvi | rudramagnimukhāṃ svāhāṃ pradeśeṣu mahābalāḥ

तब पृथ्वी के लोगों ने उस नवजात स्कन्द को कुमार कहा। और अनेक प्रदेशों में महाबली लोग रुद्र की तथा अग्निमुखी स्वाहा की उपासना करते हैं —

श्लोक 54 (3.228.54)

यजन्ति पुत्रकामाश्च पुत्रिणश्च सदा जनाः । यास्तास्त्वजनयत्कन्यास्तपो नाम हुताशनः ॥

yajanti putrakāmāśca putriṇaśca sadā janāḥ | yāstāstvajanayatkanyāstapo nāma hutāśanaḥ

पुत्र की कामना करने वाले और पुत्रवान लोग सदा उनकी पूजा करते हैं। तप नामक अग्नि ने जिन कन्याओं को उत्पन्न किया था,

श्लोक 55 (3.228.55)

किं करोमीति ताः स्कन्दं संप्राप्ताः समभाषयन् ॥

kiṃ karomīti tāḥ skandaṃ saṃprāptāḥ samabhāṣayan

वे स्कन्द के पास आईं, और उनसे बात होने पर स्कन्द ने पूछा — "मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ?"

मातर ऊचुः

श्लोक 56 (3.228.56)

भवेम सर्वलोकस्य मातरो वयमुत्तमाः । प्रसादात्तव पूज्याश्च प्रियमेतत्कुरुष्व नः ॥

bhavema sarvalokasya mātaro vayamuttamāḥ | prasādāttava pūjyāśca priyametatkuruṣva naḥ

"हम आपकी कृपा से समस्त लोक की श्रेष्ठ माताएँ बनें और पूजनीय हों। हमारा यह प्रिय कार्य कीजिए।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 57 (3.228.57)

सोऽब्रवीद्बाढमित्येवं भविष्यध्वं पृथग्विधाः । शिवाश्चैवाशिवाश्चैव पुनः पुनरुदारधीः ॥

so'bravīdbāḍhamityevaṃ bhaviṣyadhvaṃ pṛthagvidhāḥ | śivāścaivāśivāścaiva punaḥ punarudāradhīḥ

उदारबुद्धि स्कन्द ने बार-बार कहा — "ऐसा ही हो। तुम अनेक प्रकार की होओगी — कल्याणकारी भी और अकल्याणकारी भी।"

श्लोक 58 (3.228.58)

अग्निर्भूत्वा ततश्चैनं छागवक्त्रो बहुप्रजः । रमयामास शैलस्थं बालं क्रीडनकैरिव ॥

agnirbhūtvā tataścainaṃ chāgavaktro bahuprajaḥ | ramayāmāsa śailasthaṃ bālaṃ krīḍanakairiva

तब अग्नि ने बकरे के मुख वाले, बहुत संतानों वाले का रूप धारण करके पर्वत पर स्थित उस बालक को मानो खिलौनों से बहलाया।

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