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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 229

स्कन्द का देवसेनापति पद पर अभिषेक और देवसेना से विवाह

मार्कण्डेय शिशु की सात माताओं के नाम बताते हैं और श्री से सेवित, वैभव में विराजमान स्कन्द का वर्णन करते हैं। ऋषि उनसे इन्द्र बनने का आग्रह करते हैं, पर स्कन्द मना कर देते हैं; तब संसार के दो भागों में बँट जाने की आशंका से इन्द्र उन्हें देवसेना का सेनापति बनने के लिए मना लेते हैं। रुद्र और देवी उनका पूजन करते हैं, उनकी ध्वजा, शक्ति और कवच का वर्णन होता है, और इन्द्र देवसेना को उनकी पत्नी के रूप में देते हैं; वह षष्ठी कहलाती है, और श्री-पञ्चमी तथा षष्ठी पवित्र तिथियाँ बन गईं।

अध्याय 228अध्याय-सूचीअध्याय 230

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 1 (3.229.1)

ततः प्रकल्प्य पुत्रत्वे स्कन्दं मातृगणोऽगमत् । काकी च हलिमा चैव माता चाथ हली तथा । आर्या बाला च धात्री च सप्तैताः शिशुमातरः ॥

tataḥ prakalpya putratve skandaṃ mātṛgaṇo'gamat | kākī ca halimā caiva mātā cātha halī tathā | āryā bālā ca dhātrī ca saptaitāḥ śiśumātaraḥ

स्कन्द को अपना पुत्र मानकर मातृगण चला गया। काकी, हलिमा, माता, हली, आर्या, बाला और धात्री — ये सात शिशु की माताएँ हैं।

श्लोक 2 (3.229.2)

एतासां वीर्यसंपन्नः शिशुर्नामातिदारुणः । स्कन्दप्रसादजः पुत्रो लोहिताक्षो भयंकरः ॥

etāsāṃ vīryasaṃpannaḥ śiśurnāmātidāruṇaḥ | skandaprasādajaḥ putro lohitākṣo bhayaṃkaraḥ

इनका शिशु नाम का पुत्र पराक्रम से भरा और अत्यन्त भयंकर है; वह स्कन्द की कृपा से उत्पन्न हुआ, लाल नेत्रों वाला और भयावह।

श्लोक 3 (3.229.3)

एष वीरोऽष्टमः प्रोक्तः स्कन्दो मातृगणोद्भवः । छागवक्त्रेण सहितो नवमः परिकीर्त्यते ॥

eṣa vīro'ṣṭamaḥ proktaḥ skando mātṛgaṇodbhavaḥ | chāgavaktreṇa sahito navamaḥ parikīrtyate

मातृगण से उत्पन्न यह वीर स्कन्द आठवाँ कहा जाता है; बकरे के मुख वाले के साथ उसे नौवाँ गिना जाता है।

श्लोक 4 (3.229.4)

षष्ठं छागमयं वक्त्रं स्कन्दस्यैवेति विद्धि तम् । षट्शिरोभ्यन्तरं राजन्नित्यं मातृगणार्चितम् ॥

ṣaṣṭhaṃ chāgamayaṃ vaktraṃ skandasyaiveti viddhi tam | ṣaṭśirobhyantaraṃ rājannityaṃ mātṛgaṇārcitam

हे राजन्, जान लो कि वह छठा बकरे-जैसा मुख स्कन्द का ही है; वह छह सिरों के बीच स्थित है और मातृगण सदा उसकी पूजा करता है।

श्लोक 5 (3.229.5)

षण्णां तु प्रवरं तस्य शीर्षाणामिह शब्द्यते । शक्तिं येनासृजद्दिव्यां भद्रशाख इति स्म ह ॥

ṣaṇṇāṃ tu pravaraṃ tasya śīrṣāṇāmiha śabdyate | śaktiṃ yenāsṛjaddivyāṃ bhadraśākha iti sma ha

उसके छह सिरों में जो श्रेष्ठ है, उसे यहाँ भद्रशाख कहा जाता है; उसी से उसने दिव्य शक्ति (भाला) की रचना की।

श्लोक 6 (3.229.6)

इत्येतद्द्विविधाकारं वृत्तं शुक्लस्य पञ्चमीम् । तत्र युद्धं महाघोरं वृत्तं षष्ठ्यां जनाधिप ॥

ityetaddvividhākāraṃ vṛttaṃ śuklasya pañcamīm | tatra yuddhaṃ mahāghoraṃ vṛttaṃ ṣaṣṭhyāṃ janādhipa

हे जनाधिप, यह सब, जो दो प्रकार का था, शुक्ल पक्ष की पञ्चमी को हुआ; और वहाँ अत्यन्त घोर युद्ध षष्ठी को हुआ।

श्लोक 7 (3.229.7)

उपविष्टं तु तं स्कन्दमामुक्तकवचस्रजम् । हिरण्यचूडमुकुटं हिरण्याक्षं महाप्रभम् ॥

upaviṣṭaṃ tu taṃ skandamāmuktakavacasrajam | hiraṇyacūḍamukuṭaṃ hiraṇyākṣaṃ mahāprabham

स्कन्द वहाँ बैठे थे — कवच और माला धारण किए, सोने की शिखा और मुकुट पहने, सुनहरे नेत्रों वाले और महान् तेज से युक्त;

श्लोक 8 (3.229.8)

लोहिताम्बरसंवीतं तीक्ष्णदंष्ट्रं मनोरमम् । सर्वलक्षणसंपन्नं त्रैलोक्यस्यापि सुप्रियम् ॥

lohitāmbarasaṃvītaṃ tīkṣṇadaṃṣṭraṃ manoramam | sarvalakṣaṇasaṃpannaṃ trailokyasyāpi supriyam

लाल वस्त्रों से ढके, तीखे दाँतों वाले, मनोहर, सब शुभ लक्षणों से सम्पन्न और तीनों लोकों के प्रिय।

श्लोक 9 (3.229.9)

ततस्तं वरदं शूरं युवानं मृष्टकुण्डलम् । अभजत्पद्मरूपा श्रीः स्वयमेव शरीरिणी ॥

tatastaṃ varadaṃ śūraṃ yuvānaṃ mṛṣṭakuṇḍalam | abhajatpadmarūpā śrīḥ svayameva śarīriṇī

तब कमल-सी रूपवती श्री (लक्ष्मी) स्वयं देह धारण करके उस वरदायक, शूरवीर, चमकते कुण्डलों वाले युवक के पास आ गईं।

श्लोक 10 (3.229.10)

श्रिया जुष्टः पृथुयशाः स कुमारो वरस्तदा । निषण्णो दृश्यते भूतैः पौर्णमास्यां यथा शशी ॥

śriyā juṣṭaḥ pṛthuyaśāḥ sa kumāro varastadā | niṣaṇṇo dṛśyate bhūtaiḥ paurṇamāsyāṃ yathā śaśī

श्री से सेवित, विशाल यश वाला वह श्रेष्ठ कुमार वहाँ बैठा हुआ सब प्राणियों को पूर्णिमा के चन्द्रमा जैसा दिखाई देता था।

श्लोक 11 (3.229.11)

अपूजयन्महात्मानो ब्राह्मणास्तं महाबलम् । इदमाहुस्तदा चैव स्कन्दं तत्र महर्षयः ॥

apūjayanmahātmāno brāhmaṇāstaṃ mahābalam | idamāhustadā caiva skandaṃ tatra maharṣayaḥ

महात्मा ब्राह्मणों ने उस महाबली का पूजन किया, और वहाँ महर्षियों ने स्कन्द से यह कहा।

ऋषय ऊचुः

श्लोक 12 (3.229.12)

हिरण्यवर्ण भद्रं ते लोकानां शंकरो भव । त्वया षड्रात्रजातेन सर्वे लोका वशीकृताः ॥

hiraṇyavarṇa bhadraṃ te lokānāṃ śaṃkaro bhava | tvayā ṣaḍrātrajātena sarve lokā vaśīkṛtāḥ

हे स्वर्णवर्ण, तुम्हारा कल्याण हो! तुम लोकों के लिए सुखदायक बनो। केवल छह रात्रि के होकर ही तुमने सारे लोक वश में कर लिए हैं।

श्लोक 13 (3.229.13)

अभयं च पुनर्दत्तं त्वयैवैषां सुरोत्तम । तस्मादिन्द्रो भवानस्तु त्रैलोक्यस्याभयंकरः ॥

abhayaṃ ca punardattaṃ tvayaivaiṣāṃ surottama | tasmādindro bhavānastu trailokyasyābhayaṃkaraḥ

हे सुरश्रेष्ठ, तुमने ही इन्हें फिर से अभय दिया है। इसलिए तीनों लोकों को निर्भय करने वाले तुम इन्द्र बनो।

स्कन्द उवाच

श्लोक 14 (3.229.14)

किमिन्द्रः सर्वलोकानां करोतीह तपोधनाः । कथं देवगणांश्चैव पाति नित्यं सुरेश्वरः ॥

kimindraḥ sarvalokānāṃ karotīha tapodhanāḥ | kathaṃ devagaṇāṃścaiva pāti nityaṃ sureśvaraḥ

हे तपोधनो, इन्द्र यहाँ सब लोकों के लिए क्या करता है? और देवताओं का वह स्वामी देवगणों की नित्य रक्षा कैसे करता है?

ऋषय ऊचुः

श्लोक 15 (3.229.15)

इन्द्रो दधाति भूतानां बलं तेजः प्रजाः सुखम् । तुष्टः प्रयच्छति तथा सर्वान्कामान्सुरेश्वरः ॥

indro dadhāti bhūtānāṃ balaṃ tejaḥ prajāḥ sukham | tuṣṭaḥ prayacchati tathā sarvānkāmānsureśvaraḥ

इन्द्र प्राणियों को बल, तेज, सन्तान और सुख देता है; और प्रसन्न होकर देवराज उनकी सब कामनाएँ पूरी करता है।

श्लोक 16 (3.229.16)

दुर्वृत्तानां संहरति व्रतस्थानां प्रयच्छति । अनुशास्ति च भूतानि कार्येषु बलसूदनः ॥

durvṛttānāṃ saṃharati vratasthānāṃ prayacchati | anuśāsti ca bhūtāni kāryeṣu balasūdanaḥ

वह दुराचारियों का संहार करता है और व्रत में स्थित लोगों को देता है; बल का संहार करने वाला वह प्राणियों को उनके कर्तव्यों में अनुशासित करता है।

श्लोक 17 (3.229.17)

असूर्ये च भवेत्सूर्यस्तथाऽचन्द्रे च चन्द्रमाः । भवत्यग्निश्च वायुश्च पृथिव्यापश्च खं तथा ॥

asūrye ca bhavetsūryastathā'candre ca candramāḥ | bhavatyagniśca vāyuśca pṛthivyāpaśca khaṃ tathā

जहाँ सूर्य न हो वहाँ वह सूर्य बन जाता है, और जहाँ चन्द्रमा न हो वहाँ चन्द्रमा; वही अग्नि और वायु, पृथ्वी, जल और आकाश भी बनता है।

श्लोक 18 (3.229.18)

एतदिन्द्रेण कर्तव्यमिन्द्रे हि विपुलं बलम् । त्वं च वीर बली श्रेष्ठस्तस्मादिन्द्रो भवस्व नः ॥

etadindreṇa kartavyamindre hi vipulaṃ balam | tvaṃ ca vīra balī śreṣṭhastasmādindro bhavasva naḥ

यही सब इन्द्र को करना होता है, क्योंकि इन्द्र में विपुल बल होता है। हे वीर, तुम बलवान और श्रेष्ठ हो, इसलिए तुम हमारे इन्द्र बनो।

शक्र उवाच

श्लोक 19 (3.229.19)

भवस्वेन्द्रो महाबाहो सर्वेषां नः सुखावहः । अभिषिच्यस्व चैवाद्य प्राप्तरूपोऽसि सत्तम ॥

bhavasvendro mahābāho sarveṣāṃ naḥ sukhāvahaḥ | abhiṣicyasva caivādya prāptarūpo'si sattama

हे महाबाहु, तुम इन्द्र बनो और हम सबको सुख दो। हे सत्पुरुषों में श्रेष्ठ, आज ही अभिषेक कराओ; तुम इसके योग्य हो।

स्कन्द उवाच

श्लोक 20 (3.229.20)

शाधि त्वमेव त्रैलोक्यमव्यग्रो विजये रतः । अहं ते किंकरः शक्र न ममेन्द्रत्वमीप्सितम् ॥

śādhi tvameva trailokyamavyagro vijaye rataḥ | ahaṃ te kiṃkaraḥ śakra na mamendratvamīpsitam

हे शक्र, तुम स्वयं ही शान्त चित्त से विजय में तत्पर रहकर तीनों लोकों का शासन करो। मैं तुम्हारा सेवक हूँ; मुझे इन्द्रपद की इच्छा नहीं है।

शक्र उवाच

श्लोक 21 (3.229.21)

बलं तवाद्भुतं वीर त्वं देवानामरीञ्जहि । अवज्ञास्यन्ति मां लोका वीर्येण तव विस्मिताः ॥

balaṃ tavādbhutaṃ vīra tvaṃ devānāmarīñjahi | avajñāsyanti māṃ lokā vīryeṇa tava vismitāḥ

हे वीर, तुम्हारा बल अद्भुत है; तुम देवताओं के शत्रुओं का संहार करो। तुम्हारे पराक्रम से चकित होकर लोक मेरा अनादर करेंगे।

श्लोक 22 (3.229.22)

इन्द्रत्वे तु स्थितं वीर बलहीनं पराजितम् । त्वत्तेजसाऽवमंस्यन्ति लोका मां सुरसत्तम ॥

indratve tu sthitaṃ vīra balahīnaṃ parājitam | tvattejasā'vamaṃsyanti lokā māṃ surasattama

हे वीर, इन्द्रपद पर रहते हुए भी लोक मुझे बलहीन और पराजित मानेंगे; हे सुरश्रेष्ठ, तुम्हारे तेज के कारण वे मेरा तिरस्कार करेंगे।

श्लोक 23 (3.229.23)

आवयोश्च मिथो भेदे प्रयतिष्यन्त्यतन्द्रिताः । भेदिते च त्वयि विभो लोको द्वैधमुपेष्यति ॥

āvayośca mitho bhede prayatiṣyantyatandritāḥ | bhedite ca tvayi vibho loko dvaidhamupeṣyati

वे अथक होकर हम दोनों में फूट डालने का प्रयत्न करेंगे; और हे विभो, तुम्हारे भिन्न हो जाने पर संसार दो भागों में बँट जाएगा।

श्लोक 24 (3.229.24)

द्विधाभूतेषु लोकेषु निश्चितेष्वावयोस्तथा । विग्रहः संप्रवर्तेत भूतभेदान्महाबल ॥

dvidhābhūteṣu lokeṣu niściteṣvāvayostathā | vigrahaḥ saṃpravarteta bhūtabhedānmahābala

हे महाबली, जब लोक दो भागों में बँटकर हम दोनों के पक्ष में निश्चित हो जाएँगे, तब प्राणियों के इस भेद से युद्ध छिड़ जाएगा।

श्लोक 25 (3.229.25)

तत्र त्वं मां रणे तात यथाश्रद्धं विजेष्यसि । तस्मादिन्द्रो भवानेव भविता मा विचारय ॥

tatra tvaṃ māṃ raṇe tāta yathāśraddhaṃ vijeṣyasi | tasmādindro bhavāneva bhavitā mā vicāraya

हे तात, उस युद्ध में तुम पूरे विश्वास के साथ मुझे जीत लोगे। इसलिए तुम ही इन्द्र बनोगे; इसमें सोच-विचार मत करो।

स्कन्द उवाच

श्लोक 26 (3.229.26)

त्वमेव राजा भद्रं ते त्रैलोक्यस्य ममैव च । करोमि किं च ते शक्र शासनात्तद्ब्रवीहि मे ॥

tvameva rājā bhadraṃ te trailokyasya mamaiva ca | karomi kiṃ ca te śakra śāsanāttadbravīhi me

तुम्हारा कल्याण हो; तीनों लोकों के और मेरे भी राजा तुम ही हो। हे शक्र, बताओ, तुम्हारी आज्ञा से मैं क्या करूँ?

इन्द्र उवाच

श्लोक 27 (3.229.27)

अहमिन्द्रो भविष्यामि तव वाक्यान्महाबल । यदि सत्यमिदं वाक्यं निश्चयाद्भाषितं त्वया ॥

ahamindro bhaviṣyāmi tava vākyānmahābala | yadi satyamidaṃ vākyaṃ niścayādbhāṣitaṃ tvayā

हे महाबली, यदि तुमने यह बात सच्चे मन से निश्चयपूर्वक कही है, तो तुम्हारे कहने से मैं ही इन्द्र रहूँगा।

श्लोक 28 (3.229.28)

यदि वा शासनं स्कन्द कर्तुमिच्छसि मे शृणु । अभिषिच्यस्व देवानां सैनापत्ये महाबल ॥

yadi vā śāsanaṃ skanda kartumicchasi me śṛṇu | abhiṣicyasva devānāṃ saināpatye mahābala

और हे स्कन्द, यदि तुम मेरी आज्ञा का पालन करना चाहते हो तो सुनो — हे महाबली, देवताओं के सेनापति के पद पर तुम्हारा अभिषेक हो।

स्कन्द उवाच

श्लोक 29 (3.229.29)

दानवानां विनाशाय देवानामर्थसिद्धये । गोब्राह्मणहितार्थाय सैनापत्येऽभिषिञ्च माम् ॥

dānavānāṃ vināśāya devānāmarthasiddhaye | gobrāhmaṇahitārthāya saināpatye'bhiṣiñca mām

दानवों के विनाश के लिए, देवताओं के प्रयोजन की सिद्धि के लिए और गौओं तथा ब्राह्मणों के हित के लिए मुझे सेनापति पद पर अभिषिक्त करो।

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 30 (3.229.30)

सोऽभिषिक्तो मघवता सर्वैर्देवगणैः सह । अतीव शुशुभे तत्र पूज्यमानो महर्षिभिः ॥

so'bhiṣikto maghavatā sarvairdevagaṇaiḥ saha | atīva śuśubhe tatra pūjyamāno maharṣibhiḥ

सब देवगणों के साथ इन्द्र ने उनका अभिषेक किया; महर्षियों से पूजित होकर वे वहाँ अत्यन्त शोभायमान हुए।

श्लोक 31 (3.229.31)

तत्र तत्काञ्चनं छत्रं ध्रियमाणं व्यरोचत । तथैव सुसमिद्धस्य पावकस्यात्ममण्डलम् ॥

tatra tatkāñcanaṃ chatraṃ dhriyamāṇaṃ vyarocata | tathaiva susamiddhasya pāvakasyātmamaṇḍalam

वहाँ उनके ऊपर लगा वह सुनहरा छत्र प्रज्वलित अग्नि के मण्डल जैसा चमक रहा था।

श्लोक 32 (3.229.32)

विश्वकर्मकृता चास्य दिव्या माला हिरण्मयी । आबद्धा त्रिपुरघ्नेन स्वयमेव यशस्विना ॥

viśvakarmakṛtā cāsya divyā mālā hiraṇmayī | ābaddhā tripuraghnena svayameva yaśasvinā

विश्वकर्मा की बनाई हुई दिव्य स्वर्णमाला स्वयं यशस्वी त्रिपुरारि (शिव) ने उन्हें पहनाई।

श्लोक 33 (3.229.33)

आगम्य मनुजव्याघ्र सह देव्या परंतप । अर्चयामास सुप्रीतो भगवान्गोवृषध्वजः ॥

āgamya manujavyāghra saha devyā paraṃtapa | arcayāmāsa suprīto bhagavāngovṛṣadhvajaḥ

हे नरश्रेष्ठ, हे परंतप, वृषभ-ध्वज वाले भगवान् (शिव) देवी के साथ आए और अत्यन्त प्रसन्न होकर उनका पूजन किया।

श्लोक 34 (3.229.34)

रुद्रमग्निं द्विजाः प्राहू रुद्रसूनुस्ततस्तु सः । कीर्त्यते सुमहातेजाः कुमारोऽद्भुतदर्शनः ॥

rudramagniṃ dvijāḥ prāhū rudrasūnustatastu saḥ | kīrtyate sumahātejāḥ kumāro'dbhutadarśanaḥ

द्विज अग्नि को रुद्र कहते हैं; इसी कारण महान् तेज वाले, अद्भुत दर्शन वाले वह कुमार रुद्र के पुत्र कहलाते हैं।

श्लोक 35 (3.229.35)

रुद्रेण शुक्रमुत्सृष्टं तच्छ्वेतः पर्वतोऽभवत् । पावकस्येन्द्रियं श्वेते कृत्तिकाभिः कृतं नगे ॥

rudreṇa śukramutsṛṣṭaṃ tacchvetaḥ parvato'bhavat | pāvakasyendriyaṃ śvete kṛttikābhiḥ kṛtaṃ nage

रुद्र का छोड़ा हुआ वीर्य श्वेत पर्वत बन गया; और अग्नि का वीर्य कृत्तिकाओं ने उसी श्वेत पर्वत पर रखा।

श्लोक 36 (3.229.36)

पूज्यमानं तु रुद्रेण दृष्ट्वा सर्वे दिवौकसः । रुद्रसूनुं ततः प्राहुर्गुहं गुणवतां वरम् ॥

pūjyamānaṃ tu rudreṇa dṛṣṭvā sarve divaukasaḥ | rudrasūnuṃ tataḥ prāhurguhaṃ guṇavatāṃ varam

उन्हें रुद्र द्वारा पूजित देखकर सब स्वर्गवासियों ने गुणवानों में श्रेष्ठ गुह को रुद्र का पुत्र कहा।

श्लोक 37 (3.229.37)

अनुप्रविश्य रुद्रेण वह्निं जातो ह्ययं शिशुः । तत्र जातस्ततः स्कन्दो रुद्रसूनुस्ततोऽभवत् ॥

anupraviśya rudreṇa vahniṃ jāto hyayaṃ śiśuḥ | tatra jātastataḥ skando rudrasūnustato'bhavat

रुद्र के अग्नि में प्रवेश करने पर ही यह बालक उत्पन्न हुआ; स्कन्द वहीं जन्मे, इसलिए वे रुद्र के पुत्र हुए।

श्लोक 38 (3.229.38)

रुद्रस्य वह्नेः स्वाहायाः षण्णां स्त्रीणां च तेजसा । जातः स्कन्दः सुरश्रेष्ठो रुद्रसूनुस्ततोऽभवत् ॥

rudrasya vahneḥ svāhāyāḥ ṣaṇṇāṃ strīṇāṃ ca tejasā | jātaḥ skandaḥ suraśreṣṭho rudrasūnustato'bhavat

रुद्र, अग्नि, स्वाहा और छह स्त्रियों के तेज से सुरश्रेष्ठ स्कन्द का जन्म हुआ; इसलिए वे रुद्र के पुत्र हुए।

श्लोक 39 (3.229.39)

अरजे वाससी रक्ते वसानः पावकात्मजः । भाति दीप्तवपुः श्रीमान्रक्ताभ्राभ्यामिवांशुमान् ॥

araje vāsasī rakte vasānaḥ pāvakātmajaḥ | bhāti dīptavapuḥ śrīmānraktābhrābhyāmivāṃśumān

दो निर्मल लाल वस्त्र पहने, दीप्त शरीर वाले श्रीमान् अग्निपुत्र ऐसे शोभित हुए जैसे दो लाल बादलों के बीच सूर्य।

श्लोक 40 (3.229.40)

कुक्कुटश्चाग्निना दत्तस्तस्य केतुरलंकृतः । रथे समुच्छ्रितो भाति कालाग्निरिव लोहितः ॥

kukkuṭaścāgninā dattastasya keturalaṃkṛtaḥ | rathe samucchrito bhāti kālāgniriva lohitaḥ

अग्नि का दिया हुआ मुर्गा उनकी सजी हुई ध्वजा बना; रथ पर ऊँचा उठा वह प्रलयकाल की अग्नि की भाँति लाल चमक रहा था।

श्लोक 41 (3.229.41)

या चेष्टा सर्वभूतानां प्रभा शक्तिर्बलं तथा । अग्रतस्तस्य सा शक्तिर्देवानां जयवर्धनी ॥

yā ceṣṭā sarvabhūtānāṃ prabhā śaktirbalaṃ tathā | agratastasya sā śaktirdevānāṃ jayavardhanī

जो सब प्राणियों की चेष्टा, प्रभा, शक्ति और बल है, वह शक्ति देवताओं की विजय बढ़ाती हुई उनके आगे चलती थी।

श्लोक 42 (3.229.42)

विवेश कवचं चास्य शरीरं सहजं तथा । युध्यमानस्य देवस्य प्रादुर्भवति तत्सदा ॥

viveśa kavacaṃ cāsya śarīraṃ sahajaṃ tathā | yudhyamānasya devasya prādurbhavati tatsadā

उनके शरीर के साथ ही उत्पन्न हुआ कवच उनके शरीर में प्रविष्ट हो गया; जब भी वे देव युद्ध करते हैं, वह सदा प्रकट हो जाता है।

श्लोक 43 (3.229.43)

शक्तिर्धर्मो बलं तेजः कान्तत्वं सत्यमुन्नतिः । ब्रह्मण्यत्वमसंमोहो भक्तानां परिरक्षणम् ॥

śaktirdharmo balaṃ tejaḥ kāntatvaṃ satyamunnatiḥ | brahmaṇyatvamasaṃmoho bhaktānāṃ parirakṣaṇam

शक्ति, धर्म, बल, तेज, कान्ति, सत्य, उन्नति, ब्राह्मणों के प्रति भक्ति, मोह का अभाव, भक्तों की रक्षा,

श्लोक 44 (3.229.44)

निकृन्तनं च शत्रूणां लोकानां चाभिरक्षणम् । स्कन्देन सह जातानि सर्वाण्येव जनाधिप ॥

nikṛntanaṃ ca śatrūṇāṃ lokānāṃ cābhirakṣaṇam | skandena saha jātāni sarvāṇyeva janādhipa

शत्रुओं का संहार और लोकों की रक्षा — हे जनाधिप, ये सब स्कन्द के साथ ही उत्पन्न हुए।

श्लोक 45 (3.229.45)

एवं देवगणैः सर्वैः सोऽभिषिक्तः स्वलंकृतः । बभौ प्रतीतः सुमनाः परिपूर्णेन्दुदर्शनः ॥

evaṃ devagaṇaiḥ sarvaiḥ so'bhiṣiktaḥ svalaṃkṛtaḥ | babhau pratītaḥ sumanāḥ paripūrṇendudarśanaḥ

इस प्रकार सब देवगणों द्वारा अभिषिक्त और भली-भाँति अलंकृत होकर वे प्रसन्न और प्रफुल्ल मन से पूर्ण चन्द्रमा जैसे सुशोभित हुए।

श्लोक 46 (3.229.46)

इष्टैः स्वाध्यायघोषैश्च देवतूर्यवरैरपि । देवगन्धर्वगीतैश्च सर्वैरप्सरसां गणैः ॥

iṣṭaiḥ svādhyāyaghoṣaiśca devatūryavarairapi | devagandharvagītaiśca sarvairapsarasāṃ gaṇaiḥ

प्रिय वेदपाठ के घोष, देवताओं के श्रेष्ठ वाद्य, देव-गन्धर्वों के गीत और अप्सराओं के सारे समूहों के साथ,

श्लोक 47 (3.229.47)

एतैश्चान्यैश्च बहुभिस्तुष्टैर्हृष्टैः स्वलंकृतः । सुसंवृतः पिशाचानां गणैर्देवगणैस्तथा । क्रीडन्भाति तदा देवैरभिषिक्तश्च पावकिः ॥

etaiścānyaiśca bahubhistuṣṭairhṛṣṭaiḥ svalaṃkṛtaḥ | susaṃvṛtaḥ piśācānāṃ gaṇairdevagaṇaistathā | krīḍanbhāti tadā devairabhiṣiktaśca pāvakiḥ

इनके और बहुत-से अन्य प्रसन्न और हर्षित जनों के साथ, सुन्दर अलंकरणों से युक्त, पिशाचों के गणों और देवगणों से घिरे, देवताओं द्वारा अभिषिक्त अग्निपुत्र क्रीड़ा करते हुए शोभित हो रहे थे।

श्लोक 48 (3.229.48)

अभिषिक्तं महासेनमपश्यन्त दिवौकसः । विनिहत्य तमः सूर्यं यथैवाभ्युदितं तथा ॥

abhiṣiktaṃ mahāsenamapaśyanta divaukasaḥ | vinihatya tamaḥ sūryaṃ yathaivābhyuditaṃ tathā

स्वर्गवासियों ने अभिषिक्त महासेन को ऐसे देखा जैसे अन्धकार को नष्ट करके उदित हुए सूर्य को।

श्लोक 49 (3.229.49)

अथैनमभ्ययुः सर्वा देवसेनाः सहस्रशः । अस्माकं त्वं पतिरिति ब्रुवाणाः सर्वतो दिशः ॥

athainamabhyayuḥ sarvā devasenāḥ sahasraśaḥ | asmākaṃ tvaṃ patiriti bruvāṇāḥ sarvato diśaḥ

तब देवताओं की सारी सेनाएँ हज़ारों की संख्या में सब दिशाओं से "तुम हमारे स्वामी हो" कहती हुई उनके पास आईं।

श्लोक 50 (3.229.50)

ताः समासाद्य भगवान्सर्वभूतगणैर्वृतः । अर्चितस्तु स्तुतश्चैव सान्त्वयामास ता अपि ॥

tāḥ samāsādya bhagavānsarvabhūtagaṇairvṛtaḥ | arcitastu stutaścaiva sāntvayāmāsa tā api

उनके पास पहुँचकर, सब भूतगणों से घिरे, पूजित और स्तुत भगवान् ने उन्हें भी सान्त्वना दी।

श्लोक 51 (3.229.51)

शतक्रतुश्चाभिषिच्य स्कन्दं सेनापतिं तदा । सस्मार तां देवसेनां या सा तेन विमोक्षिता ॥

śatakratuścābhiṣicya skandaṃ senāpatiṃ tadā | sasmāra tāṃ devasenāṃ yā sā tena vimokṣitā

स्कन्द को सेनापति पद पर अभिषिक्त करके शतक्रतु (इन्द्र) को तब उस देवसेना का स्मरण हुआ, जिसे उन्होंने छुड़ाया था।

श्लोक 52 (3.229.52)

अयं तस्याः पतिर्नूनं विहितो ब्रह्मणा स्वयम् । संचिन्त्य त्वानयामास देवसेनां ह्यलंकृताम् ॥

ayaṃ tasyāḥ patirnūnaṃ vihito brahmaṇā svayam | saṃcintya tvānayāmāsa devasenāṃ hyalaṃkṛtām

"निश्चय ही स्वयं ब्रह्मा ने इसे उसका पति नियत किया है" — ऐसा सोचकर वे अलंकारों से सजी देवसेना को ले आए।

श्लोक 53 (3.229.53)

स्कन्दं प्रोवाच बलभिदियं कन्या सुरोत्तम । अजाते त्वयि निर्दिष्टा तव पत्नी स्वयंभुवा ॥

skandaṃ provāca balabhidiyaṃ kanyā surottama | ajāte tvayi nirdiṣṭā tava patnī svayaṃbhuvā

बल का संहार करने वाले इन्द्र ने स्कन्द से कहा — "हे सुरश्रेष्ठ, तुम्हारे जन्म से पहले ही स्वयम्भू ब्रह्मा ने इस कन्या को तुम्हारी पत्नी नियत कर दिया था।"

इन्द्र उवाच

श्लोक 54 (3.229.54)

तस्मात्त्वमस्या विधिवत्पाणिं मन्त्रपुरस्कृतम् । गृहाण दक्षिणं देव्याः पाणिना पद्मवर्चसा ॥

tasmāttvamasyā vidhivatpāṇiṃ mantrapuraskṛtam | gṛhāṇa dakṣiṇaṃ devyāḥ pāṇinā padmavarcasā

इसलिए विधिपूर्वक, मन्त्रों के साथ, अपने कमल-सी कान्ति वाले हाथ से इस देवी का दाहिना हाथ ग्रहण करो।

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 55 (3.229.55)

एवमुक्तः स जग्राह तस्याः पाणिं यथाविधि । बृहस्पतिर्मन्त्रविद्धि जजाप च जुहाव च ॥

evamuktaḥ sa jagrāha tasyāḥ pāṇiṃ yathāvidhi | bṛhaspatirmantraviddhi jajāpa ca juhāva ca

ऐसा कहे जाने पर उन्होंने विधिपूर्वक उसका हाथ ग्रहण किया, और मन्त्रों के ज्ञाता बृहस्पति ने मन्त्र जपे और आहुतियाँ दीं।

श्लोक 56 (3.229.56)

एवं स्कन्दस्य महिषीं देवसेनां विदुर्जनाः । षष्ठीं यां ब्राह्मणाः प्राहुर्लक्ष्मीमासां सुखप्रदाम् ॥

evaṃ skandasya mahiṣīṃ devasenāṃ vidurjanāḥ | ṣaṣṭhīṃ yāṃ brāhmaṇāḥ prāhurlakṣmīmāsāṃ sukhapradām

इस प्रकार लोग देवसेना को स्कन्द की पटरानी जानते हैं। ब्राह्मण उन्हें षष्ठी और इनको सुख देने वाली लक्ष्मी कहते हैं,

श्लोक 57 (3.229.57)

सिनीबालीं कुहूं चैव सद्वृत्तिमपराजिताम् । इत्येवमादिभिर्देवी नामभिः परिकीर्त्यते ॥

sinībālīṃ kuhūṃ caiva sadvṛttimaparājitām | ityevamādibhirdevī nāmabhiḥ parikīrtyate

और सिनीवाली, कुहू, सद्वृत्ति तथा अपराजिता भी — इन तथा ऐसे ही अन्य नामों से उस देवी का गुणगान होता है।

श्लोक 58 (3.229.58)

यदा स्कन्दः पतिर्लब्धः शाश्वतो देवसेनया । तदा तमाश्रयल्लक्ष्मीः स्वयं देवी शरीरिणी ॥

yadā skandaḥ patirlabdhaḥ śāśvato devasenayā | tadā tamāśrayallakṣmīḥ svayaṃ devī śarīriṇī

जब देवसेना ने स्कन्द को सदा के लिए पति रूप में पा लिया, तब स्वयं देवी लक्ष्मी देह धारण करके उनके आश्रय में आ गईं।

श्लोक 59 (3.229.59)

श्रीजुष्टः पञ्चमीं स्कन्दस्तस्माच्छ्रीः पञ्चमी स्मृता । षष्ठ्यां कृतार्थोऽभूद्यस्मात्तस्मात्षष्ठी महातिथिः ॥

śrījuṣṭaḥ pañcamīṃ skandastasmācchrīḥ pañcamī smṛtā | ṣaṣṭhyāṃ kṛtārtho'bhūdyasmāttasmātṣaṣṭhī mahātithiḥ

पञ्चमी को स्कन्द श्री से युक्त हुए, इसलिए वह श्री-पञ्चमी कहलाती है; और षष्ठी को वे कृतार्थ हुए, इसलिए षष्ठी महान् तिथि है।

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