आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 230
स्कन्द और मातृगण: बच्चों और मनुष्यों को पकड़ने वाले ग्रह
अपने पतियों द्वारा त्यागी गईं सप्तर्षियों की पत्नियाँ स्कन्द के पास आती हैं और वे उन्हें अपनी माताएँ स्वीकार करते हैं; इन्द्र अभिजित् नक्षत्र के आकाश से गिरने की बात बताते हैं और कृत्तिकाएँ उसका स्थान लेती हैं, तथा विनता को स्कन्द के साथ रहने का वचन मिलता है। मातृगण जगत् की पुरानी माताओं का स्थान लेने और मनुष्यों की सन्तान को खाने की अनुमति माँगता है, और स्कन्द उन्हें सोलह वर्ष तक के बच्चों को पीड़ा देने देते हैं तथा अपने शरीर से एक भयंकर पुरुष उन्हें देते हैं। फिर मार्कण्डेय बच्चों को पकड़ने वाले ग्रहों, उनकी शान्ति के उपायों और वयस्कों को उन्मत्त करने वाले ग्रहों का वर्णन करते हैं, जो महेश्वर के भक्तों को नहीं छूते।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 1 (3.230.1)
श्रिया जुष्टं महासेनं देवसेनापतीकृतम् । सप्तर्षिपत्नयः षड् देव्यस्तत्सकाशमथागमन् ॥
śriyā juṣṭaṃ mahāsenaṃ devasenāpatīkṛtam | saptarṣipatnayaḥ ṣaḍ devyastatsakāśamathāgaman
जब श्री से सेवित महासेन देवसेना के सेनापति बना दिए गए, तब सप्तर्षियों की छह पत्नियाँ, वे देवियाँ, उनके पास आईं।
श्लोक 2 (3.230.2)
ऋषिभिः संपरित्यक्ता धर्मयुक्ता महाव्रताः । द्रुतमागम्य चोचुस्ता देवसेनापतिं प्रभुम् ॥
ṛṣibhiḥ saṃparityaktā dharmayuktā mahāvratāḥ | drutamāgamya cocustā devasenāpatiṃ prabhum
ऋषियों द्वारा त्यागी गईं, धर्मपरायण और महान् व्रतों वाली वे शीघ्र आकर देवसेनापति प्रभु से बोलीं —
ऋषिपत्न्य ऊचुः
श्लोक 3 (3.230.3)
वयं पुत्र परित्यक्ताः भर्तृभिर्देवसंमितैः । अकारणाद्रुषा तैस्तु पुण्यस्थानात्परिच्युताः ॥
vayaṃ putra parityaktāḥ bhartṛbhirdevasaṃmitaiḥ | akāraṇādruṣā taistu puṇyasthānātparicyutāḥ
हे पुत्र, देवताओं के समान हमारे पतियों ने हमें त्याग दिया है; बिना कारण क्रोध में आकर उन्होंने हमें पुण्य स्थान से गिरा दिया है।
श्लोक 4 (3.230.4)
अस्माभिः किल जातस्त्वमिति केनाप्युदाहृतम् । तत्सत्यमेतत्संश्रुत्य तस्मान्नस्त्रातुमर्हसि ॥
asmābhiḥ kila jātastvamiti kenāpyudāhṛtam | tatsatyametatsaṃśrutya tasmānnastrātumarhasi
किसी ने कह दिया कि तुम हमसे उत्पन्न हुए हो। इस बात को सच मानकर (उन्होंने हमें त्याग दिया); इसलिए तुम हमारी रक्षा करो।
श्लोक 5 (3.230.5)
अक्षयश्च भवेत्स्वर्गस्त्वत्प्रसादाद्धि नः प्रभो । त्वां पुत्रं चाप्यभीप्सामः कृत्वैतदनृणो भव ॥
akṣayaśca bhavetsvargastvatprasādāddhi naḥ prabho | tvāṃ putraṃ cāpyabhīpsāmaḥ kṛtvaitadanṛṇo bhava
हे प्रभो, तुम्हारी कृपा से हमें अक्षय स्वर्ग प्राप्त हो। हम तुम्हें पुत्र के रूप में भी पाना चाहती हैं; यह करके तुम ऋण से मुक्त हो जाओ।
स्कन्द उवाच
श्लोक 6 (3.230.6)
मातरो हि भवत्यो मे सुतो वोऽहमनिन्दिताः । यद्वापीच्छत तत्सर्वं संभविष्यति वस्तथा ॥
mātaro hi bhavatyo me suto vo'hamaninditāḥ | yadvāpīcchata tatsarvaṃ saṃbhaviṣyati vastathā
हे निर्दोष देवियो, आप मेरी माताएँ हैं और मैं आपका पुत्र हूँ। आप और जो कुछ भी चाहती हैं, वह सब आपको प्राप्त होगा।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 7 (3.230.7)
विवक्षन्तं ततः शक्रं किं कार्यमिति सोऽब्रवीत् । उक्तः स्कन्देन ब्रूहीति सोऽब्रवीद्वासवस्ततः ॥
vivakṣantaṃ tataḥ śakraṃ kiṃ kāryamiti so'bravīt | uktaḥ skandena brūhīti so'bravīdvāsavastataḥ
तब शक्र को कुछ कहने के इच्छुक देखकर स्कन्द ने पूछा — "क्या करना है?" स्कन्द के "कहिए" कहने पर इन्द्र बोले —
इन्द्र उवाच
श्लोक 8 (3.230.8)
अभिजित्स्पर्धमाना तु रोहिण्या कन्यसी स्वसा । इच्छन्ती ज्येष्ठतां देवी तपस्तप्तुं वनं गता ॥
abhijitspardhamānā tu rohiṇyā kanyasī svasā | icchantī jyeṣṭhatāṃ devī tapastaptuṃ vanaṃ gatā
रोहिणी की छोटी बहन देवी अभिजित् उससे होड़ करती हुई, ज्येष्ठ बनने की इच्छा से तप करने के लिए वन में चली गई है।
श्लोक 9 (3.230.9)
तत्र मूढोस्मि भद्रं ते नक्षत्रं गगनाच्च्युतम् । कालं त्विमं परं स्कन्द ब्रह्मणा सह चिन्तय ॥
tatra mūḍhosmi bhadraṃ te nakṣatraṃ gaganāccyutam | kālaṃ tvimaṃ paraṃ skanda brahmaṇā saha cintaya
तुम्हारा कल्याण हो; इस विषय में मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हूँ, क्योंकि एक नक्षत्र आकाश से गिर गया है। हे स्कन्द, ब्रह्मा के साथ मिलकर इस श्रेष्ठ काल-गणना पर विचार करो।
श्लोक 10 (3.230.10)
धनिष्ठादिस्तदा कालो ब्रह्मणा परिकल्पितः । रोहिणी ह्यभवत्पूर्वमेवं सङ्ख्या समाभवत् ॥
dhaniṣṭhādistadā kālo brahmaṇā parikalpitaḥ | rohiṇī hyabhavatpūrvamevaṃ saṅkhyā samābhavat
तब ब्रह्मा ने धनिष्ठा से आरम्भ होने वाली काल-गणना निर्धारित की थी; उससे पहले रोहिणी प्रथम थी; इस प्रकार नक्षत्रों की संख्या पूरी हुई थी।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 11 (3.230.11)
एवमुक्ते तु शक्रेण त्रिदिवं कृत्तिका गताः । नक्षत्रं शकटाकारं भाति तद्वह्निदैवतम् ॥
evamukte tu śakreṇa tridivaṃ kṛttikā gatāḥ | nakṣatraṃ śakaṭākāraṃ bhāti tadvahnidaivatam
शक्र के ऐसा कहने पर कृत्तिकाएँ स्वर्ग चली गईं; अग्नि जिसके देवता हैं, वह नक्षत्र गाड़ी के आकार में चमकता है।
श्लोक 12 (3.230.12)
विनता चाब्रवीत्स्कन्दं मम त्वं पिण्डदः सुतः । इच्छामि नित्यमेवाहं त्वया पुत्र सहासितुम् ॥
vinatā cābravītskandaṃ mama tvaṃ piṇḍadaḥ sutaḥ | icchāmi nityamevāhaṃ tvayā putra sahāsitum
और विनता ने स्कन्द से कहा — "तुम मेरे पुत्र हो, मुझे पिण्ड देने वाले। पुत्र, मैं सदा तुम्हारे साथ रहना चाहती हूँ।"
स्कन्द उवाच
श्लोक 13 (3.230.13)
एवमस्तु नमस्तेऽस्तु पुत्रस्नेहात्प्रशाधि माम् । स्नुषया पूज्यमाना वै देवि वत्स्यसि नित्यदा ॥
evamastu namaste'stu putrasnehātpraśādhi mām | snuṣayā pūjyamānā vai devi vatsyasi nityadā
ऐसा ही हो; आपको प्रणाम है। पुत्र-स्नेह से मुझे आज्ञा दीजिए। हे देवि, आपकी पुत्रवधू आपका आदर करेगी और आप सदा (मेरे साथ) निवास करेंगी।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 14 (3.230.14)
अथ मातृगणः सर्वः स्कन्दं वचनमब्रवीत् । वयं सर्वस्य लोकस्य मातरः कविभिः स्तुताः । इच्छामो मातरस्तुभ्यं भवितुं पूजयस्व नः ॥
atha mātṛgaṇaḥ sarvaḥ skandaṃ vacanamabravīt | vayaṃ sarvasya lokasya mātaraḥ kavibhiḥ stutāḥ | icchāmo mātarastubhyaṃ bhavituṃ pūjayasva naḥ
तब सारे मातृगण ने स्कन्द से कहा — "हम सारे जगत् की माताएँ हैं, कवियों ने हमारी स्तुति की है। हम तुम्हारी माताएँ बनना चाहती हैं; हमारा पूजन करो।"
श्लोक 15 (3.230.15)
तासां तु वचनं श्रुत्वा स्कन्दो वचनमब्रवीत् ॥
tāsāṃ tu vacanaṃ śrutvā skando vacanamabravīt
उनकी बात सुनकर स्कन्द ने कहा —
स्कन्द उवाच
श्लोक 16 (3.230.16)
मातरो हि भवत्यो मे भवतीनामहं सुतः । उच्यतां यन्मया कार्यं भवतीनामथेप्सितम् ॥
mātaro hi bhavatyo me bhavatīnāmahaṃ sutaḥ | ucyatāṃ yanmayā kāryaṃ bhavatīnāmathepsitam
आप मेरी माताएँ हैं और मैं आपका पुत्र हूँ। बताइए, मुझे क्या करना है और आप क्या चाहती हैं।
मातर ऊचुः
श्लोक 17 (3.230.17)
यास्तु ता मातरः पूर्वं लोकस्यास्य प्रकल्पिताः । अस्माकं तु भवेत्स्थानं तासां चैव न तद्भवेत् ॥
yāstu tā mātaraḥ pūrvaṃ lokasyāsya prakalpitāḥ | asmākaṃ tu bhavetsthānaṃ tāsāṃ caiva na tadbhavet
जो माताएँ पहले इस लोक की माताएँ नियत की गई थीं, उनका स्थान हमें मिले और वह उनका न रहे।
श्लोक 18 (3.230.18)
भवेम पूज्या लोकस्य न ताः पूज्याः सुरर्षभ । प्रजाऽस्माकं हृतास्ताभिस्त्वत्कृते ताः प्रयच्छ नः ॥
bhavema pūjyā lokasya na tāḥ pūjyāḥ surarṣabha | prajā'smākaṃ hṛtāstābhistvatkṛte tāḥ prayaccha naḥ
हे सुरश्रेष्ठ, लोक में हमारी पूजा हो, उनकी नहीं। तुम्हारे कारण उन्होंने हमारी सन्तान छीन ली है; वह हमें लौटा दो।
स्कन्द उवाच
श्लोक 19 (3.230.19)
वृत्ताः प्रजा न ताः शक्या भवतीभिर्निषेवितुम् । अन्यां वः कां प्रयच्छामि प्रजां यां मनसेच्छथ ॥
vṛttāḥ prajā na tāḥ śakyā bhavatībhirniṣevitum | anyāṃ vaḥ kāṃ prayacchāmi prajāṃ yāṃ manasecchatha
जो सन्तान चली गई, उसका उपभोग आप नहीं कर सकतीं। बताइए, आपको और कौन-सी सन्तान दूँ, जिसे आप मन से चाहती हों?
मातर ऊचुः
श्लोक 20 (3.230.20)
इच्छाम तासां मातॄणां प्रजा भोक्तुं प्रयच्छ नः । त्वया सह पृथग्भूता ये च तासामथेश्वराः ॥
icchāma tāsāṃ mātṝṇāṃ prajā bhoktuṃ prayaccha naḥ | tvayā saha pṛthagbhūtā ye ca tāsāmatheśvarāḥ
हम उन माताओं की सन्तान को खाना चाहती हैं; वह हमें दे दो — और उनके उन स्वामियों की भी, जो तुम्हारे कारण उनसे अलग हो गए हैं।
स्कन्द उवाच
श्लोक 21 (3.230.21)
प्रजा वो दद्मि कष्टं तु भवतीभिरुदाहृतम् । परिरक्षत भद्रं वः प्रजाः साधुनमस्कृताः ॥
prajā vo dadmi kaṣṭaṃ tu bhavatībhirudāhṛtam | parirakṣata bhadraṃ vaḥ prajāḥ sādhunamaskṛtāḥ
मैं आपको सन्तान देता हूँ, यद्यपि आपने जो माँगा है वह कष्टदायक है। आपका कल्याण हो; मेरे द्वारा सम्मानित होकर आप सन्तान की भली-भाँति रक्षा करें।
मातर ऊचुः
श्लोक 22 (3.230.22)
परिरक्षाम भद्रं ते प्रजाः स्कन्द यथेच्छसि । त्वया नो रोचते स्कन्द सहवासश्चिरं प्रभो ॥
parirakṣāma bhadraṃ te prajāḥ skanda yathecchasi | tvayā no rocate skanda sahavāsaściraṃ prabho
हे स्कन्द, तुम्हारा कल्याण हो; जैसा तुम चाहते हो, हम सन्तान की रक्षा करेंगी। हे प्रभो स्कन्द, हमें तुम्हारे साथ बहुत समय तक रहना अच्छा लगता है।
स्कन्द उवाच
श्लोक 23 (3.230.23)
यावत्षोडश वर्षाणि भवन्ति तरुणाः प्रजाः । प्रबाधत मनुष्याणां तावद्रूपैः पृथग्विधैः ॥
yāvatṣoḍaśa varṣāṇi bhavanti taruṇāḥ prajāḥ | prabādhata manuṣyāṇāṃ tāvadrūpaiḥ pṛthagvidhaiḥ
जब तक मनुष्यों की सन्तान सोलह वर्ष की होकर युवा न हो जाए, तब तक आप अपने अलग-अलग रूपों से उसे पीड़ा दें।
श्लोक 24 (3.230.24)
अहं च वः प्रदास्यामि रौद्रमात्मानमव्ययम् । परमं तेन सहिताः सुखं वत्स्यथ पूजिताः ॥
ahaṃ ca vaḥ pradāsyāmi raudramātmānamavyayam | paramaṃ tena sahitāḥ sukhaṃ vatsyatha pūjitāḥ
और मैं आपको अपना परम, अविनाशी रौद्र स्वरूप दूँगा; उससे युक्त होकर आप पूजित होती हुई सुख से रहेंगी।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 25 (3.230.25)
ततः शरीरात्स्कन्दस्य पुरुषः पावकप्रभः । भोक्तुं प्रजाः स मर्त्यानां निष्पपात महाबलः ॥
tataḥ śarīrātskandasya puruṣaḥ pāvakaprabhaḥ | bhoktuṃ prajāḥ sa martyānāṃ niṣpapāta mahābalaḥ
तब स्कन्द के शरीर से अग्नि के समान दीप्तिमान एक महाबली पुरुष मनुष्यों की सन्तान को खाने के लिए निकल पड़ा।
श्लोक 26 (3.230.26)
अपतत्सहसा भूमौ विसंज्ञोऽथ क्षुधार्दितः । स्कन्देन सोऽभ्यनुज्ञातो रौद्ररूपोऽभवद्ग्रहः ॥
apatatsahasā bhūmau visaṃjño'tha kṣudhārditaḥ | skandena so'bhyanujñāto raudrarūpo'bhavadgrahaḥ
वह सहसा भूख से व्याकुल होकर अचेत हो धरती पर गिर पड़ा। स्कन्द की अनुमति से वह भयानक रूप वाला ग्रह बन गया।
श्लोक 27 (3.230.27)
स्कन्दापस्मार इत्याहुर्ग्रहं तं द्विजसत्तमाः । विनता तु महारौद्रा कथ्यते शकुनिग्रहः ॥
skandāpasmāra ityāhurgrahaṃ taṃ dvijasattamāḥ | vinatā tu mahāraudrā kathyate śakunigrahaḥ
श्रेष्ठ द्विज उस ग्रह को स्कन्दापस्मार कहते हैं। अत्यन्त भयंकर विनता शकुनिग्रह कहलाती है।
श्लोक 28 (3.230.28)
मातॄणां राक्षसं प्राहुस्तं विद्यात्पूतनाग्रहम् । कष्टा दारुणरूपेण घोररूपा निशाचरी ॥
mātṝṇāṃ rākṣasaṃ prāhustaṃ vidyātpūtanāgraham | kaṣṭā dāruṇarūpeṇa ghorarūpā niśācarī
माताओं में जिसे राक्षस कहा जाता है, उसे पूतनाग्रह जानना चाहिए। वह कष्ट देने वाली, दारुण रूप वाली, भयंकर निशाचरी है;
श्लोक 29 (3.230.29)
पिशाची दारुणाकारा कथ्यते शीतपूतना । गर्भान्सा मानुषीणां तु हरते घोरदर्शना ॥
piśācī dāruṇākārā kathyate śītapūtanā | garbhānsā mānuṣīṇāṃ tu harate ghoradarśanā
भयानक आकार वाली वह पिशाची शीतपूतना कहलाती है; डरावने रूप वाली वह मनुष्य-स्त्रियों के गर्भ हर लेती है।
श्लोक 30 (3.230.30)
अदितिं रेवतीं प्राहुर्ग्रहस्तस्यास्तु रैवतः । सोऽपि बालान्महाघोरो बाधते वै महाग्रहः ॥
aditiṃ revatīṃ prāhurgrahastasyāstu raivataḥ | so'pi bālānmahāghoro bādhate vai mahāgrahaḥ
अदिति को रेवती कहते हैं, और उसका ग्रह रैवत है; वह अत्यन्त भयंकर महाग्रह भी बच्चों को पीड़ा देता है।
श्लोक 31 (3.230.31)
दैत्यानां या दितिर्माता तामाहुर्मुखमण्डिकाम् । अत्यर्थं शिशुमांसेन संप्रहृष्टा दुरासदा ॥
daityānāṃ yā ditirmātā tāmāhurmukhamaṇḍikām | atyarthaṃ śiśumāṃsena saṃprahṛṣṭā durāsadā
दैत्यों की माता दिति को मुखमण्डिका कहते हैं; वह दुर्धर्ष है और बच्चों के मांस से अत्यन्त प्रसन्न होती है।
श्लोक 32 (3.230.32)
कुमाराश्च कुमार्यश्च ये प्रोक्ताः स्कन्दसंभवाः । तेऽपि गर्भभुजः सर्वे कौरव्य सुमहाग्रहाः ॥
kumārāśca kumāryaśca ye proktāḥ skandasaṃbhavāḥ | te'pi garbhabhujaḥ sarve kauravya sumahāgrahāḥ
हे कौरव्य, जो कुमार और कुमारियाँ स्कन्द से उत्पन्न बताए गए हैं, वे सब भी गर्भ को खाने वाले बड़े भारी ग्रह हैं।
श्लोक 33 (3.230.33)
तासामेव तु पत्नीनां पतयस्ते प्रकीर्तिताः । आजायमानान्गृह्णन्ति बालकान्रौद्रकर्मणः ॥
tāsāmeva tu patnīnāṃ patayaste prakīrtitāḥ | ājāyamānāngṛhṇanti bālakānraudrakarmaṇaḥ
वे इन्हीं पत्नियों के पति बताए गए हैं; क्रूर कर्म करने वाले वे जन्म लेते हुए बच्चों को पकड़ लेते हैं।
श्लोक 34 (3.230.34)
गवां माता तु या प्राज्ञैः कथ्यते सुरभिर्नृप । शकुनिस्तामथारुह्य सह भुङ्क्ते शिशून्भुवि ॥
gavāṃ mātā tu yā prājñaiḥ kathyate surabhirnṛpa | śakunistāmathāruhya saha bhuṅkte śiśūnbhuvi
हे राजन्, ज्ञानी जिसे गौओं की माता कहते हैं, वह सुरभि है; शकुनि उस पर सवार होकर उसके साथ पृथ्वी पर बच्चों को खाता है।
श्लोक 35 (3.230.35)
सरमा नाम या माता शुनां देवी जनाधिप । साऽपि गर्भान्समादत्ते मानुषीणां सदैव हि ॥
saramā nāma yā mātā śunāṃ devī janādhipa | sā'pi garbhānsamādatte mānuṣīṇāṃ sadaiva hi
हे जनाधिप, कुत्तों की माता सरमा नाम की देवी भी सदा मनुष्य-स्त्रियों के गर्भ हर लेती है।
श्लोक 36 (3.230.36)
पादपानां च या माता करञ्जनिलया हि सा । वरदा सा हि सौम्या च नित्यं भूतानुकम्पिनी ॥
pādapānāṃ ca yā mātā karañjanilayā hi sā | varadā sā hi saumyā ca nityaṃ bhūtānukampinī
वृक्षों की माता करञ्ज वृक्ष में निवास करती है; वह वर देने वाली, सौम्य और सदा प्राणियों पर दया करने वाली है।
श्लोक 37 (3.230.37)
करञ्जे तां नमस्यन्ति तस्मात्पुत्रार्थिनो नराः । इमे त्वष्टादशान्ये वै ग्रहा मांसमधुप्रियाः ॥
karañje tāṃ namasyanti tasmātputrārthino narāḥ | ime tvaṣṭādaśānye vai grahā māṃsamadhupriyāḥ
इसलिए पुत्र चाहने वाले मनुष्य करञ्ज वृक्ष में उसे प्रणाम करते हैं। ये अन्य अठारह ग्रह मांस और मधु के प्रेमी हैं।
श्लोक 38 (3.230.38)
द्विपञ्चरात्रं तिष्ठन्ति सततं सूतिकागृहे । कद्रूः सूक्ष्मवपुर्भूत्वा गर्भिणीं प्रविशत्यथ ॥
dvipañcarātraṃ tiṣṭhanti satataṃ sūtikāgṛhe | kadrūḥ sūkṣmavapurbhūtvā garbhiṇīṃ praviśatyatha
वे दस रात तक लगातार प्रसूति-गृह में रहते हैं। कद्रू सूक्ष्म शरीर धारण करके गर्भवती स्त्री में प्रवेश करती है;
श्लोक 39 (3.230.39)
भुङ्क्ते सा तत्र तं गर्भं सा तु नागं प्रसूयते । गन्धर्वाणां तु या माता सा गर्भं गृह्य गच्छति ॥
bhuṅkte sā tatra taṃ garbhaṃ sā tu nāgaṃ prasūyate | gandharvāṇāṃ tu yā mātā sā garbhaṃ gṛhya gacchati
वहाँ वह उस गर्भ को खा जाती है, और वह स्त्री सर्प को जन्म देती है। गन्धर्वों की माता गर्भ को लेकर चली जाती है;
श्लोक 40 (3.230.40)
ततो विलीनगर्भा सा मानुषी भुवि दृश्यते । या जनित्री त्वप्सरसां गर्भमास्ते प्रगृह्य सा ॥
tato vilīnagarbhā sā mānuṣī bhuvi dṛśyate | yā janitrī tvapsarasāṃ garbhamāste pragṛhya sā
तब वह स्त्री पृथ्वी पर ऐसी दिखाई देती है जिसका गर्भ विलीन हो गया हो। अप्सराओं को जन्म देने वाली गर्भ को पकड़कर बैठ जाती है;
श्लोक 41 (3.230.41)
उपविष्टं ततो गर्भं कथयन्ति मनीषिणः । लोहितस्योदधेः कन्या धात्री स्कन्दस्य सा स्मृता ॥
upaviṣṭaṃ tato garbhaṃ kathayanti manīṣiṇaḥ | lohitasyodadheḥ kanyā dhātrī skandasya sā smṛtā
तब मनीषी उस गर्भ को "बैठा हुआ" (रुका हुआ) कहते हैं। लोहित सागर की कन्या स्कन्द की धाय मानी जाती है;
श्लोक 42 (3.230.42)
लोहितायनिरित्येवं कदम्बे सा हि पूज्यते । पुरुषे तु यथा रुद्रस्तथाऽऽर्या प्रमदास्वपि ॥
lohitāyanirityevaṃ kadambe sā hi pūjyate | puruṣe tu yathā rudrastathā''ryā pramadāsvapi
लोहितायनी नाम से उसकी कदम्ब वृक्ष में पूजा होती है। जैसे पुरुषों में रुद्र हैं, वैसे ही स्त्रियों में आर्या हैं;
श्लोक 43 (3.230.43)
आर्या माता कुमारस्य पृथक्कामार्थमिज्यते । एवमेते कुमाराणां मया प्रोक्ता महाग्रहाः ॥
āryā mātā kumārasya pṛthakkāmārthamijyate | evamete kumārāṇāṃ mayā proktā mahāgrahāḥ
कुमार की माता आर्या की अलग से मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए पूजा की जाती है। इस प्रकार मैंने तुम्हें बच्चों के इन महाग्रहों के विषय में बताया।
श्लोक 44 (3.230.44)
यावत्षोडश वर्षाणि शिशूनां ह्यशिवास्ततः । ये च मातृगणाः प्रोक्ताः पुरुषाश्चैव ये ग्रहाः ॥
yāvatṣoḍaśa varṣāṇi śiśūnāṃ hyaśivāstataḥ | ye ca mātṛgaṇāḥ proktāḥ puruṣāścaiva ye grahāḥ
सोलह वर्ष की आयु तक ये बच्चों के लिए अमंगलकारी रहते हैं। और जो मातृगण बताए गए हैं, तथा जो पुरुष ग्रह हैं,
श्लोक 45 (3.230.45)
सर्वे स्कन्दग्रहा नाम ज्ञेया नित्यं शरीरिभिः । तेषां प्रशमनं कार्यं स्नानं धूपमथाञ्जनम् । बलिकर्मोपहाराश्च स्कन्दस्येज्या विशेषतः ॥
sarve skandagrahā nāma jñeyā nityaṃ śarīribhiḥ | teṣāṃ praśamanaṃ kāryaṃ snānaṃ dhūpamathāñjanam | balikarmopahārāśca skandasyejyā viśeṣataḥ
इन सबको देहधारियों को सदा स्कन्दग्रह जानना चाहिए। उनकी शान्ति के लिए स्नान, धूप और अञ्जन, बलिकर्म और उपहार, और विशेष रूप से स्कन्द की पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 46 (3.230.46)
एवमभ्यर्चिताः सर्वे प्रयच्छन्ति शुभं नृणाम् । आयुर्दीर्घं च राजेन्द्र सम्यक्पूजानमस्कृताः ॥
evamabhyarcitāḥ sarve prayacchanti śubhaṃ nṛṇām | āyurdīrghaṃ ca rājendra samyakpūjānamaskṛtāḥ
हे राजेन्द्र, इस प्रकार पूजे जाने पर, विधिवत् पूजा और नमस्कार से सम्मानित होकर वे सब मनुष्यों को शुभ और दीर्घ आयु प्रदान करते हैं।
श्लोक 47 (3.230.47)
ऊर्ध्वं तु षोडशाद्वर्षाद्ये भवन्ति ग्रहा नृणाम् । तानहं संप्रवक्ष्यामि नमस्कृत्य महेश्वरम् ॥
ūrdhvaṃ tu ṣoḍaśādvarṣādye bhavanti grahā nṛṇām | tānahaṃ saṃpravakṣyāmi namaskṛtya maheśvaram
अब महेश्वर को प्रणाम करके मैं उन ग्रहों का वर्णन करूँगा जो सोलह वर्ष के बाद मनुष्यों को लगते हैं।
श्लोक 48 (3.230.48)
यः पश्यति नरो देवाञ्जाग्रद्वा शयितोपि वा । उन्माद्यति स तु क्षिप्रं तं तु देवग्रहं विदुः ॥
yaḥ paśyati naro devāñjāgradvā śayitopi vā | unmādyati sa tu kṣipraṃ taṃ tu devagrahaṃ viduḥ
जो मनुष्य जागते या सोते हुए देवताओं को देखता है, वह शीघ्र ही उन्मत्त हो जाता है; उसे देवग्रह कहते हैं।
श्लोक 49 (3.230.49)
आसीनश्च शयानश्च यः पश्यति नरः पितॄन् । उन्माद्यति स तु क्षिप्रं स ज्ञेयस्तु पितृग्रहः ॥
āsīnaśca śayānaśca yaḥ paśyati naraḥ pitṝn | unmādyati sa tu kṣipraṃ sa jñeyastu pitṛgrahaḥ
जो मनुष्य बैठे या लेटे हुए पितरों को देखता है, वह शीघ्र ही उन्मत्त हो जाता है; उसे पितृग्रह जानना चाहिए।
श्लोक 50 (3.230.50)
अवमन्यति यः सिद्धान्क्रुद्धाश्चापि शपन्ति यम् । उन्माद्यति स तु क्षिप्रं ज्ञेयः सिद्धग्रहस्तु सः ॥
avamanyati yaḥ siddhānkruddhāścāpi śapanti yam | unmādyati sa tu kṣipraṃ jñeyaḥ siddhagrahastu saḥ
जो सिद्धों का अपमान करता है और जिसे वे क्रोध में शाप दे देते हैं, वह शीघ्र ही उन्मत्त हो जाता है; उसे सिद्धग्रह जानना चाहिए।
श्लोक 51 (3.230.51)
उपाघ्राति च यो गन्धान्रसांश्चापि पृथग्विधान् । उन्माद्यति स तु क्षिप्रं स ज्ञेयो राक्षसो ग्रहः ॥
upāghrāti ca yo gandhānrasāṃścāpi pṛthagvidhān | unmādyati sa tu kṣipraṃ sa jñeyo rākṣaso grahaḥ
जो तरह-तरह की गन्धों को सूँघता और रसों का स्वाद लेता है, वह शीघ्र ही उन्मत्त हो जाता है; उसे राक्षसग्रह जानना चाहिए।
श्लोक 52 (3.230.52)
गन्धर्वाश्चापि यं दिव्याः संविशन्ति नरं भुवि । उन्माद्यति स तु क्षिप्रं ग्रहो गान्धर्व एव सः ॥
gandharvāścāpi yaṃ divyāḥ saṃviśanti naraṃ bhuvi | unmādyati sa tu kṣipraṃ graho gāndharva eva saḥ
पृथ्वी पर जिस मनुष्य में दिव्य गन्धर्व प्रवेश कर जाते हैं, वह शीघ्र ही उन्मत्त हो जाता है; वह गान्धर्व ग्रह है।
श्लोक 53 (3.230.53)
अधिरोहन्ति यं नित्यं पिशाचाः पुरुषं प्रति । उन्माद्यति स तु क्षिप्रं ग्रहः पैशाच एव सः ॥
adhirohanti yaṃ nityaṃ piśācāḥ puruṣaṃ prati | unmādyati sa tu kṣipraṃ grahaḥ paiśāca eva saḥ
जिस पुरुष पर पिशाच निरन्तर सवार रहते हैं, वह शीघ्र ही उन्मत्त हो जाता है; वह पैशाच ग्रह है।
श्लोक 54 (3.230.54)
आविशन्ति च यं यक्षाः पुरुषं कालपर्यये । उन्माद्यति स तु क्षिप्रं ज्ञेयो यक्षग्रहस्तु सः ॥
āviśanti ca yaṃ yakṣāḥ puruṣaṃ kālaparyaye | unmādyati sa tu kṣipraṃ jñeyo yakṣagrahastu saḥ
समय के फेर से जिस पुरुष में यक्ष प्रवेश कर जाते हैं, वह शीघ्र ही उन्मत्त हो जाता है; उसे यक्षग्रह जानना चाहिए।
श्लोक 55 (3.230.55)
यस्य दोषैः प्रकुपितं चित्तं मुह्यति देहिनः । उन्माद्यति स तु क्षिप्रं साधनं तस्य शास्त्रतः ॥
yasya doṣaiḥ prakupitaṃ cittaṃ muhyati dehinaḥ | unmādyati sa tu kṣipraṃ sādhanaṃ tasya śāstrataḥ
जिस देहधारी का चित्त दोषों के प्रकोप से मोहग्रस्त हो जाता है, वह शीघ्र ही उन्मत्त हो जाता है; उसका उपचार शास्त्र के अनुसार करना चाहिए।
श्लोक 56 (3.230.56)
वैक्लव्याच्च भयाच्चैव घोराणां चापि दर्शनात् । उन्माद्यति स तु क्षिप्रं सान्त्वं तस्य तु साधनम् ॥
vaiklavyācca bhayāccaiva ghorāṇāṃ cāpi darśanāt | unmādyati sa tu kṣipraṃ sāntvaṃ tasya tu sādhanam
घबराहट से, भय से और भयानक दृश्यों को देखने से मनुष्य शीघ्र ही उन्मत्त हो जाता है; उसका उपचार सान्त्वना है।
श्लोक 57 (3.230.57)
कश्चित्क्रीडितुकामो वै भोक्तुकामस्तथाऽपरः । अभिकामस्तथैवान्य इत्येष त्रिविधो ग्रहः ॥
kaścitkrīḍitukāmo vai bhoktukāmastathā'paraḥ | abhikāmastathaivānya ityeṣa trividho grahaḥ
कोई क्रीड़ा करना चाहता है, दूसरा भोजन करना चाहता है, और कोई अन्य कामना-पूर्ति चाहता है — इस प्रकार ग्रह तीन प्रकार का है।
श्लोक 58 (3.230.58)
यावत्सप्ततिवर्षाणि भवन्त्येते ग्रहा नृणाम् । अतः परं देहिनां तु ग्रहतुल्या भवेज्जरा ॥
yāvatsaptativarṣāṇi bhavantyete grahā nṛṇām | ataḥ paraṃ dehināṃ tu grahatulyā bhavejjarā
ये ग्रह मनुष्यों को सत्तर वर्ष की आयु तक लगते हैं; उसके बाद देहधारियों के लिए बुढ़ापा ही ग्रह के समान होता है।
श्लोक 59 (3.230.59)
अप्रकीर्णेन्द्रियं दान्तं शुचिं नित्यमतन्द्रितम् । आस्तिकं श्रद्दधानं च वर्जयन्ति तदा ग्रहाः ॥
aprakīrṇendriyaṃ dāntaṃ śuciṃ nityamatandritam | āstikaṃ śraddadhānaṃ ca varjayanti tadā grahāḥ
जिसकी इन्द्रियाँ बिखरी हुई नहीं हैं, जो संयमी, पवित्र, सदा सावधान, आस्तिक और श्रद्धावान है, उसे ग्रह छोड़ देते हैं।
श्लोक 60 (3.230.60)
इत्येष ते ग्रहोद्देशो मानुषाणां प्रकीर्तितः । न स्पृशन्ति ग्रहा भक्तान्नरान्देवं महेश्वरम् ॥
ityeṣa te grahoddeśo mānuṣāṇāṃ prakīrtitaḥ | na spṛśanti grahā bhaktānnarāndevaṃ maheśvaram
इस प्रकार मैंने तुम्हें मनुष्यों के ग्रहों का यह विवरण सुनाया। जो मनुष्य भगवान् महेश्वर के भक्त हैं, उन्हें ग्रह स्पर्श नहीं करते।