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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 231

स्वाहा की कामना और स्कन्द का जन्म-रहस्य

स्कन्द को अपना औरस पुत्र बताते हुए स्वाहा उनसे अग्नि के साथ स्थायी निवास का वर माँगती है; स्कन्द वर देते हैं कि अग्नि में दी जाने वाली हर आहुति "स्वाहा" कहकर दी जाएगी। फिर ब्रह्मा स्कन्द को बताते हैं कि वे वास्तव में रुद्र के पुत्र हैं — रुद्र के अग्नि में और उमा के स्वाहा में प्रवेश करने से उनका जन्म हुआ — और पाँच स्थानों पर गिरे वीर्य से उनके भयंकर पार्षद-गण उत्पन्न हुए। मार्कण्डेय उन गणों की पूजा-विधि, स्कन्द के घण्टों और लाल पताका की उत्पत्ति, तथा उस श्वेत पर्वत की शोभा का वर्णन करते हैं जहाँ सारा जगत् उनके दर्शन के लिए एकत्र होता है।

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मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 1 (3.231.1)

यदा स्कन्देन मातृणामेवमेतत्प्रियं कृतम् । अथैनमब्रवीत्स्वाहा मम पुत्रस्त्वमौरसः ॥

yadā skandena mātṛṇāmevametatpriyaṃ kṛtam | athainamabravītsvāhā mama putrastvamaurasaḥ

जब स्कन्द ने इस प्रकार माताओं का प्रिय कार्य कर दिया, तब स्वाहा ने उनसे कहा — "तुम मेरे औरस पुत्र हो।

श्लोक 2 (3.231.2)

इच्छाम्यहं त्वया दत्तां प्रीतिं परमदुर्लभाम् । तामब्रवीत्ततः स्कन्दः प्रीतिमिच्छसि कीदृशीम् ॥

icchāmyahaṃ tvayā dattāṃ prītiṃ paramadurlabhām | tāmabravīttataḥ skandaḥ prītimicchasi kīdṛśīm

मैं चाहती हूँ कि तुम मुझे वह प्रसन्नता प्रदान करो जो अत्यन्त दुर्लभ है।" तब स्कन्द ने उससे पूछा — "तुम किस प्रकार की प्रसन्नता चाहती हो?"

स्वाहोवाच

श्लोक 3 (3.231.3)

दक्षस्याहं प्रिया कन्या स्वाहा नाम महाभुज । बाल्यात्प्रभृति नित्यं च जातकामा हुताशने ॥

dakṣasyāhaṃ priyā kanyā svāhā nāma mahābhuja | bālyātprabhṛti nityaṃ ca jātakāmā hutāśane

हे महाबाहु, मैं दक्ष की प्रिय पुत्री हूँ और मेरा नाम स्वाहा है। बचपन से ही मैं सदा अग्निदेव से प्रेम करती आई हूँ।

श्लोक 4 (3.231.4)

न स मां कामिनीं पुत्र सम्यग्जानाति पावकः । इच्छामि शाश्वतं वासं वस्तुं पुत्र सहाग्निना ॥

na sa māṃ kāminīṃ putra samyagjānāti pāvakaḥ | icchāmi śāśvataṃ vāsaṃ vastuṃ putra sahāgninā

किन्तु हे पुत्र, पावक भली-भाँति नहीं जानते कि मैं उनकी कामना करती हूँ। पुत्र, मैं अग्नि के साथ सदा के लिए रहना चाहती हूँ।

स्कन्द उवाच

श्लोक 5 (3.231.5)

हव्यं कव्यंच यत्किंचिद्द्विजा मन्त्रसुसंस्तुतम् । होष्यन्त्यग्नौ सदा देवि स्वाहेत्युक्त्वासमुद्धृतम् ॥

havyaṃ kavyaṃca yatkiṃciddvijā mantrasusaṃstutam | hoṣyantyagnau sadā devi svāhetyuktvāsamuddhṛtam

हे देवि, द्विज मन्त्रों से अभिमन्त्रित करके जो भी हव्य (देवताओं के लिए) और कव्य (पितरों के लिए) अग्नि में होमेंगे, उसे वे सदा "स्वाहा" कहकर उठाकर अर्पित करेंगे।

श्लोक 6 (3.231.6)

अद्यप्रभृति दास्यन्ति सुवृत्ताः सत्पथे स्थिताः । एवमग्निस्त्वया सार्धं सदा वत्स्यति शोभने ॥

adyaprabhṛti dāsyanti suvṛttāḥ satpathe sthitāḥ | evamagnistvayā sārdhaṃ sadā vatsyati śobhane

आज से सदाचारी और सन्मार्ग पर चलने वाले लोग इसी प्रकार आहुति देंगे। हे शोभने, इस प्रकार अग्नि सदा तुम्हारे साथ निवास करेंगे।

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 7 (3.231.7)

एवमुक्ता ततः स्वाहा तुष्टास्कन्देन पूजिता । पावकेन समायुक्ता भर्त्रा स्कन्दमपूजयत् ॥

evamuktā tataḥ svāhā tuṣṭāskandena pūjitā | pāvakena samāyuktā bhartrā skandamapūjayat

ऐसा कहे जाने पर स्कन्द से सम्मानित स्वाहा संतुष्ट हुई और अपने पति पावक से युक्त होकर उसने स्कन्द का पूजन किया।

श्लोक 8 (3.231.8)

ततो ब्रह्मा महासेनं प्रजापतिरथाब्रवीत् । अभिगच्छ महादेवं पितरं त्रिपुरार्दनम् ॥

tato brahmā mahāsenaṃ prajāpatirathābravīt | abhigaccha mahādevaṃ pitaraṃ tripurārdanam

तब प्रजापति ब्रह्मा ने महासेन से कहा — "अपने पिता, त्रिपुर का नाश करने वाले महादेव के पास जाओ।

ब्रह्मोवाच

श्लोक 9 (3.231.9)

रुद्रेणाग्निं समाविश्य स्वाहामाविश्य चोमया । हितार्थं सर्वलोकानां जातस्त्वमपराजितः ॥

rudreṇāgniṃ samāviśya svāhāmāviśya comayā | hitārthaṃ sarvalokānāṃ jātastvamaparājitaḥ

रुद्र ने अग्नि में और उमा ने स्वाहा में प्रवेश किया, और इस प्रकार समस्त लोकों के हित के लिए तुम अपराजित का जन्म हुआ।

श्लोक 10 (3.231.10)

उमायोन्यां च रुद्रेण शुक्रं सिक्तं महात्मना । अस्मिन्गिरौ निपतितं मिञ्जिकामिञ्जिकं यतः ॥

umāyonyāṃ ca rudreṇa śukraṃ siktaṃ mahātmanā | asmingirau nipatitaṃ miñjikāmiñjikaṃ yataḥ

महात्मा रुद्र ने उमा की योनि में जो वीर्य सींचा था, वह इस पर्वत पर गिरा, और उससे मिञ्जिका और मिञ्जिक का जोड़ा उत्पन्न हुआ।

श्लोक 11 (3.231.11)

मिथुनं वै महाभाग तत्र तद्रुद्रसंभवम् । संभूतं लोहितोदे तु शुक्रशेषमवापतत् ॥

mithunaṃ vai mahābhāga tatra tadrudrasaṃbhavam | saṃbhūtaṃ lohitode tu śukraśeṣamavāpatat

हे महाभाग, वहाँ रुद्र से वह जोड़ा उत्पन्न हुआ। शेष वीर्य लोहित सागर में गिरा और वहाँ भी उससे प्राणी उत्पन्न हुए;

श्लोक 12 (3.231.12)

सूर्यरश्मिषु चाप्यन्यदन्यच्चैवापतद्भुवि । आसक्तमन्यद्वृक्षेषु तदेवं पञ्चधाऽपतत् ॥

sūryaraśmiṣu cāpyanyadanyaccaivāpatadbhuvi | āsaktamanyadvṛkṣeṣu tadevaṃ pañcadhā'patat

एक अंश सूर्य की किरणों में गिरा, एक पृथ्वी पर गिरा और एक वृक्षों पर जा लगा। इस प्रकार वह पाँच स्थानों पर गिरा।

श्लोक 13 (3.231.13)

तत्र ते विविधाकारा गणा ज्ञेया मनीषिभिः । तव पारिषदा घोरा य एते पिशिताशिनः ॥

tatra te vividhākārā gaṇā jñeyā manīṣibhiḥ | tava pāriṣadā ghorā ya ete piśitāśinaḥ

वहाँ उत्पन्न विविध रूपों वाले इन गणों को ज्ञानी तुम्हारे पार्षद जानें — ये भयंकर मांसभक्षी हैं।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 14 (3.231.14)

एवमस्त्विति चाप्युक्त्वा महासेनो महेश्वरम् । अपूजयदमेयात्मा पितरं पितृवत्सलः ॥

evamastviti cāpyuktvā mahāseno maheśvaram | apūjayadameyātmā pitaraṃ pitṛvatsalaḥ

"ऐसा ही हो" कहकर अपरिमित आत्मबल वाले, पितृभक्त महासेन ने अपने पिता महेश्वर का पूजन किया।

श्लोक 15 (3.231.15)

अर्कपुष्पैस्तु ते पञ्च गणाः पूज्या धनार्थिभिः । व्याधिप्रशमनार्थं चतेषां पूजां समाचरेत् ॥

arkapuṣpaistu te pañca gaṇāḥ pūjyā dhanārthibhiḥ | vyādhipraśamanārthaṃ cateṣāṃ pūjāṃ samācaret

धन की इच्छा रखने वालों को उन पाँच गणों की पूजा आक के फूलों से करनी चाहिए, और रोगों की शान्ति के लिए भी उनकी पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 16 (3.231.16)

मिञ्जिकामिञ्जिकं चैव मिथुनं रुद्रसंभवम् । नमस्कार्यं सदैवेह बालानां हितमिच्छता ॥

miñjikāmiñjikaṃ caiva mithunaṃ rudrasaṃbhavam | namaskāryaṃ sadaiveha bālānāṃ hitamicchatā

रुद्र से उत्पन्न मिञ्जिका और मिञ्जिक के जोड़े को भी, बालकों का हित चाहने वाले को यहाँ सदा नमस्कार करना चाहिए।

श्लोक 17 (3.231.17)

स्त्रियो मानुषमांसादा वृक्षका नाम नामतः । वृक्षेषु जातास्ता देव्यो नमस्कार्याः प्रजार्थिभिः ॥

striyo mānuṣamāṃsādā vṛkṣakā nāma nāmataḥ | vṛkṣeṣu jātāstā devyo namaskāryāḥ prajārthibhiḥ

मनुष्य का मांस खाने वाली, वृक्षका नाम से प्रसिद्ध, वृक्षों में उत्पन्न उन देवियों को सन्तान की कामना करने वालों को नमस्कार करना चाहिए।

श्लोक 18 (3.231.18)

एषामेव पिशाचानामसङ्ख्येयगणाः स्मृताः । घण्टायाः सपताकायाः शृणु मे संभवं नृप ॥

eṣāmeva piśācānāmasaṅkhyeyagaṇāḥ smṛtāḥ | ghaṇṭāyāḥ sapatākāyāḥ śṛṇu me saṃbhavaṃ nṛpa

इन्हीं पिशाचों के गण असंख्य बताए गए हैं। हे राजन्, अब मुझसे घण्टा और पताका की उत्पत्ति सुनो।

श्लोक 19 (3.231.19)

ऐरावतस्य घण्टे द्वे वैजयन्त्याविति श्रुते । गुहस्य ते स्वयं दत्ते क्रमेणानाय्य धीमता ॥

airāvatasya ghaṇṭe dve vaijayantyāviti śrute | guhasya te svayaṃ datte krameṇānāyya dhīmatā

ऐरावत के दो घण्टे थे, जो वैजयन्ती नाम से प्रसिद्ध थे। बुद्धिमान (इन्द्र) ने उन्हें क्रम से मँगवाकर स्वयं गुह को दे दिया।

श्लोक 20 (3.231.20)

एका तत्रविशाखस्य घण्टा स्कन्दस्य चापरा । पताका कार्तिकेयस्य विशाखस्य च लोहिता ॥

ekā tatraviśākhasya ghaṇṭā skandasya cāparā | patākā kārtikeyasya viśākhasya ca lohitā

उनमें से एक घण्टा विशाख का हुआ और दूसरा स्कन्द का। कार्तिकेय और विशाख की पताका लाल रंग की थी।

श्लोक 21 (3.231.21)

यानि क्रीडनकान्यस्य देवैर्दत्तानि वै तदा । तैरेव रमते देवो महासेनो महाबलः ॥

yāni krīḍanakānyasya devairdattāni vai tadā | taireva ramate devo mahāseno mahābalaḥ

उस समय देवताओं ने उन्हें जो खिलौने दिए थे, उन्हीं से महाबली देव महासेन क्रीड़ा करते हैं।

श्लोक 22 (3.231.22)

स संवृतः पिशाचानां गणैर्देवगणैस्तथा । शुशुभे काञ्चने शैले दीप्यमानः श्रिया वृतः ॥

sa saṃvṛtaḥ piśācānāṃ gaṇairdevagaṇaistathā | śuśubhe kāñcane śaile dīpyamānaḥ śriyā vṛtaḥ

पिशाचों के गणों और देवताओं के गणों से घिरे हुए, श्री से सम्पन्न और देदीप्यमान वे उस स्वर्णमय पर्वत पर सुशोभित हुए।

श्लोक 23 (3.231.23)

तेन वीरेण शुशुभे स शैलः शुभकाननः । आदित्येनेवांशुमता मन्दरश्चारुकन्दरः ॥

tena vīreṇa śuśubhe sa śailaḥ śubhakānanaḥ | ādityenevāṃśumatā mandaraścārukandaraḥ

उस वीर से वह सुन्दर वनों वाला पर्वत ऐसा शोभित हुआ, जैसे किरणों वाले सूर्य से सुन्दर कन्दराओं वाला मन्दराचल।

श्लोक 24 (3.231.24)

संतानकवनैः फुल्लैः करवीरवनैरपि । पारिजातवनैश्चैव जपाशोकवनैस्तथा ॥

saṃtānakavanaiḥ phullaiḥ karavīravanairapi | pārijātavanaiścaiva japāśokavanaistathā

खिले हुए सन्तानक और करवीर के वनों से, पारिजात के वनों से तथा जपा और अशोक के वनों से,

श्लोक 25 (3.231.25)

कदम्बतरुषण्डैश्च दिव्यैर्मृगगणैरपि । दिव्यैः पक्षिगणैश्चैव शुशुभे श्वेतपर्वतः ॥

kadambataruṣaṇḍaiśca divyairmṛgagaṇairapi | divyaiḥ pakṣigaṇaiścaiva śuśubhe śvetaparvataḥ

कदम्ब वृक्षों के झुरमुटों से, दिव्य मृगों के झुंडों से और दिव्य पक्षियों के समूहों से वह श्वेत पर्वत शोभायमान हुआ।

श्लोक 26 (3.231.26)

तत्रदेवगणाः सर्वेसर्वे देवर्षयस्तथा । मेघतूर्यरवाश्चैव क्षुब्धोदधिसमस्वनाः ॥

tatradevagaṇāḥ sarvesarve devarṣayastathā | meghatūryaravāścaiva kṣubdhodadhisamasvanāḥ

वहाँ सभी देवगण और सभी देवर्षि उपस्थित थे; मेघों और तूर्यों का नाद क्षुब्ध समुद्र के गर्जन के समान गूँज रहा था।

श्लोक 27 (3.231.27)

तत्रदेवाश्च गन्धर्वा नृत्यन्तेऽप्सरसस्तथा । हृष्टानां तत्रभूतानां श्रूयते निनदो महान् ॥

tatradevāśca gandharvā nṛtyante'psarasastathā | hṛṣṭānāṃ tatrabhūtānāṃ śrūyate ninado mahān

वहाँ देवता और गन्धर्व थे तथा अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं; हर्षित प्राणियों का महान् कोलाहल सुनाई दे रहा था।

श्लोक 28 (3.231.28)

एवं सेन्द्रं जगत्सर्वं श्वेतपर्वतसंस्थितम् । प्रहृष्टं प्रेक्षते स्कन्दं न च ग्लायति दर्शनात् ॥

evaṃ sendraṃ jagatsarvaṃ śvetaparvatasaṃsthitam | prahṛṣṭaṃ prekṣate skandaṃ na ca glāyati darśanāt

इस प्रकार इन्द्र सहित सारा जगत् श्वेत पर्वत पर एकत्र होकर हर्ष से स्कन्द को निहारता रहा और उनके दर्शन से कभी तृप्त नहीं हुआ।

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