आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 232
स्कन्द द्वारा महिषासुर का वध
सेनापति-पद पर स्कन्द के अभिषेक के बाद शिव पार्वती के साथ सिंहों से जुते रथ पर भद्रवट की ओर चलते हैं; कुबेर, इन्द्र, यम, वरुण, उनके अपने आयुध, ऋषि, देवियाँ और स्वर्ग के सभी गण उनके साथ चलते हैं। वे स्कन्द को सातवें मारुत-स्कन्ध की रक्षा का भार सौंपकर विदा करते हैं। तभी एक भयानक दानव-सेना देवताओं पर टूट पड़ती है और इन्द्र के उत्साह दिलाने पर भी उन्हें खदेड़ देती है; दानव महिष पर्वत फेंककर रुद्र के रथ का कूबर पकड़ लेता है। शिव के स्मरण करने पर लाल वस्त्र और स्वर्ण-कवच धारण किए स्कन्द आते हैं, अपनी शक्ति से महिष का सिर काट देते हैं और उनके पार्षद शेष दानवों को खा जाते हैं। इन्द्र उनकी विजय की प्रशंसा करते हैं, स्कन्द एक ही दिन में त्रिलोक जीत लेते हैं, और अध्याय स्कन्द-जन्म के पाठ के फल के साथ समाप्त होता है।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 1 (3.232.1)
यदाऽभिषिक्तो भगवान्सैनापत्ये तु पावकिः । तदा संप्रस्थितः श्रीमान्हृष्टो भद्रवटं हरः ॥
yadā'bhiṣikto bhagavānsaināpatye tu pāvakiḥ | tadā saṃprasthitaḥ śrīmānhṛṣṭo bhadravaṭaṃ haraḥ
जब भगवान् पावकि (स्कन्द) का सेनापति-पद पर अभिषेक हो गया, तब श्रीमान् हर प्रसन्न होकर भद्रवट की ओर चल पड़े।
श्लोक 2 (3.232.2)
रथेनादित्यवर्णेन पार्वत्या सहितः प्रभुः । अनुयातः सुरैः सर्वैः सहस्राक्षपुरोगमैः ॥
rathenādityavarṇena pārvatyā sahitaḥ prabhuḥ | anuyātaḥ suraiḥ sarvaiḥ sahasrākṣapurogamaiḥ
सूर्य के समान वर्ण वाले रथ पर पार्वती के साथ वे प्रभु चले; सहस्राक्ष इन्द्र को आगे करके सभी देवता उनके पीछे-पीछे चले।
श्लोक 3 (3.232.3)
सहस्रं तस्य सिंहानां तस्मिन्युक्तं रथोत्तमे । उत्पपात दिवं शुभ्रं कालेनाभिप्रचोदितम् ॥
sahasraṃ tasya siṃhānāṃ tasminyuktaṃ rathottame | utpapāta divaṃ śubhraṃ kālenābhipracoditam
उस उत्तम रथ में एक हज़ार सिंह जुते थे। काल से प्रेरित होकर वह रथ उज्ज्वल आकाश में उड़ चला।
श्लोक 4 (3.232.4)
ते पिबन्त इवाकाशं त्रासयन्तश्चराचरान् । सिंहा नभस्यगच्छन्त नदन्तश्चारुकेसराः ॥
te pibanta ivākāśaṃ trāsayantaścarācarān | siṃhā nabhasyagacchanta nadantaścārukesarāḥ
सुन्दर अयालों वाले वे सिंह गर्जना करते हुए, मानो आकाश को पीते हुए और चराचर जगत् को भयभीत करते हुए आकाश में चले।
श्लोक 5 (3.232.5)
तस्मिन्रथे पशुपतिः स्थितो भात्युमया सह । विद्युता सहितः सूर्यः सेन्द्रचापे घने यथा ॥
tasminrathe paśupatiḥ sthito bhātyumayā saha | vidyutā sahitaḥ sūryaḥ sendracāpe ghane yathā
उस रथ पर उमा के साथ खड़े पशुपति ऐसे शोभित हुए, जैसे इन्द्रधनुष वाले मेघ में बिजली के साथ सूर्य।
श्लोक 6 (3.232.6)
अग्रतस्तस्य भगवान्धनेशो गुह्यकैः सह । आस्थाय रुचिरं याति पुष्पकं नरवाहनः ॥
agratastasya bhagavāndhaneśo guhyakaiḥ saha | āsthāya ruciraṃ yāti puṣpakaṃ naravāhanaḥ
उनके आगे गुह्यकों के साथ, मनुष्यों पर सवारी करने वाले धनपति भगवान् कुबेर सुन्दर पुष्पक विमान पर बैठकर चल रहे थे।
श्लोक 7 (3.232.7)
ऐरावतं समास्थाय शक्रश्चापि सुरैः सह । पृष्ठतोऽनुययौ यान्तं वरदं वृषभध्वजम् ॥
airāvataṃ samāsthāya śakraścāpi suraiḥ saha | pṛṣṭhato'nuyayau yāntaṃ varadaṃ vṛṣabhadhvajam
इन्द्र भी देवताओं के साथ ऐरावत पर सवार होकर, जाते हुए वरदायक वृषभध्वज के पीछे-पीछे चले।
श्लोक 8 (3.232.8)
जृम्भकैर्यक्षरक्षोभिः स्रग्विभिः समलंकृतः । यात्यमोघो महायक्षो दक्षिणं पक्षमास्थितः ॥
jṛmbhakairyakṣarakṣobhiḥ sragvibhiḥ samalaṃkṛtaḥ | yātyamogho mahāyakṣo dakṣiṇaṃ pakṣamāsthitaḥ
मालाओं से अलंकृत महायक्ष अमोघ जृम्भकों तथा यक्षों और राक्षसों के साथ दाहिने पक्ष में चल रहा था।
श्लोक 9 (3.232.9)
तस्य दक्षिणतो देवा बहवश्चित्रयोधिनः । गच्छन्ति वसुभिः सार्धं रुद्रैश्च सह संगताः ॥
tasya dakṣiṇato devā bahavaścitrayodhinaḥ | gacchanti vasubhiḥ sārdhaṃ rudraiśca saha saṃgatāḥ
उसके दाहिनी ओर विचित्र रीति से युद्ध करने वाले अनेक देवता वसुओं के साथ और रुद्रों से मिलकर चल रहे थे।
श्लोक 10 (3.232.10)
यमश्च मृत्युना सार्धं सर्वतः परिवारितः । घोरैर्व्याधिशतैर्याति घोररूपवपुस्तथा ॥
yamaśca mṛtyunā sārdhaṃ sarvataḥ parivāritaḥ | ghorairvyādhiśatairyāti ghorarūpavapustathā
यम भी मृत्यु के साथ, चारों ओर से सैकड़ों भयानक रोगों से घिरे, भयंकर रूप धारण किए चल रहे थे।
श्लोक 11 (3.232.11)
यमस्य पृष्ठतश्चैव घोरस्त्रिशिखरः शितः । विजयो नाम रुद्रस्य याति शूलः स्वलंकृतः ॥
yamasya pṛṣṭhataścaiva ghorastriśikharaḥ śitaḥ | vijayo nāma rudrasya yāti śūlaḥ svalaṃkṛtaḥ
यम के पीछे रुद्र का विजय नामक भयंकर, तीखा, तीन नोकों वाला सुसज्जित शूल चल रहा था।
श्लोक 12 (3.232.12)
तमुग्रपाशो वरुणो भगवान्सलिलेश्वरः । परिवार्य शनैर्याति यादोभिर्विविधैर्वृतः ॥
tamugrapāśo varuṇo bhagavānsalileśvaraḥ | parivārya śanairyāti yādobhirvividhairvṛtaḥ
उग्र पाश धारण करने वाले जलेश्वर भगवान् वरुण अनेक प्रकार के जलजन्तुओं से घिरे हुए उस शूल को घेरकर धीरे-धीरे चल रहे थे।
श्लोक 13 (3.232.13)
पृष्ठतोविजयस्यापि याति रुद्रस्य पट्टसः । गदामुसलशक्त्याद्यैर्वृतः प्रहरणोत्तमैः ॥
pṛṣṭhatovijayasyāpi yāti rudrasya paṭṭasaḥ | gadāmusalaśaktyādyairvṛtaḥ praharaṇottamaiḥ
विजय शूल के पीछे रुद्र का पट्टिश चल रहा था, जो गदा, मूसल, शक्ति आदि उत्तम आयुधों से घिरा था।
श्लोक 14 (3.232.14)
पट्टसं त्वन्वगाद्राजंश्छत्रं रौद्रं महाप्रभम् । कमण्डलुश्चाप्यनु तं महर्षिगणसेवितः ॥
paṭṭasaṃ tvanvagādrājaṃśchatraṃ raudraṃ mahāprabham | kamaṇḍaluścāpyanu taṃ maharṣigaṇasevitaḥ
हे राजन्, पट्टिश के पीछे रुद्र का महान् प्रभा वाला छत्र चला, और उसके पीछे महर्षियों के समूहों से सेवित कमण्डलु।
श्लोक 15 (3.232.15)
तस्य दक्षिणतो भाति दण्डो गच्छञ्श्रिया वृतः । भृग्वङ्गिरोभिः सहितो दैवतैश्चानुपूजितः ॥
tasya dakṣiṇato bhāti daṇḍo gacchañśriyā vṛtaḥ | bhṛgvaṅgirobhiḥ sahito daivataiścānupūjitaḥ
उसके दाहिनी ओर श्री से युक्त दण्ड चलता हुआ शोभित हो रहा था; भृगु और अंगिरा के वंशज उसके साथ थे और देवता उसका पूजन कर रहे थे।
श्लोक 16 (3.232.16)
एषां तु पृष्ठतो रुद्रो विमले स्यन्दने स्थितः । याति संहर्षयन्सर्वांस्तेजसा त्रिदिवौकसः ॥
eṣāṃ tu pṛṣṭhato rudro vimale syandane sthitaḥ | yāti saṃharṣayansarvāṃstejasā tridivaukasaḥ
इन सबके पीछे निर्मल रथ पर स्थित रुद्र अपने तेज से सभी स्वर्गवासियों को हर्षित करते हुए चल रहे थे।
श्लोक 17 (3.232.17)
ऋषयश्चापि देवाश्च गन्धर्वा भुजगास्तथा । नद्यो ह्रदाःसमुद्राश्चतथैवाप्सरसां गणाः ॥
ṛṣayaścāpi devāśca gandharvā bhujagāstathā | nadyo hradāḥsamudrāścatathaivāpsarasāṃ gaṇāḥ
ऋषि, देवता, गन्धर्व, नाग, नदियाँ, सरोवर, समुद्र तथा अप्सराओं के समूह,
श्लोक 18 (3.232.18)
नक्षत्राणि ग्रहाश्चैवदेवानां शिशवश्च ये । स्त्रियश्च विविधाकारा यान्ति रुद्रस्य पृष्ठतः ॥
nakṣatrāṇi grahāścaivadevānāṃ śiśavaśca ye | striyaśca vividhākārā yānti rudrasya pṛṣṭhataḥ
नक्षत्र, ग्रह, देवताओं के शिशु और विविध रूपों वाली स्त्रियाँ रुद्र के पीछे-पीछे चल रही थीं।
श्लोक 19 (3.232.19)
सृजन्त्यः पुष्पवर्षाणि चारुरूपा वराङ्गनाः । पर्जन्यश्चाप्यनुययौ नमस्कृत्य पिनाकिनम् ॥
sṛjantyaḥ puṣpavarṣāṇi cārurūpā varāṅganāḥ | parjanyaścāpyanuyayau namaskṛtya pinākinam
सुन्दर रूप वाली श्रेष्ठ स्त्रियाँ फूलों की वर्षा करती चल रही थीं। पर्जन्य भी पिनाकधारी को नमस्कार करके उनके पीछे चले।
श्लोक 20 (3.232.20)
छत्रं च पाण्डुरं सोमस्तस्य मूर्धन्यधारयत् । चामरे चापि वायुश्च गृहीत्वाऽग्निश्च विष्ठितौ ॥
chatraṃ ca pāṇḍuraṃ somastasya mūrdhanyadhārayat | cāmare cāpi vāyuśca gṛhītvā'gniśca viṣṭhitau
सोम ने उनके सिर पर श्वेत छत्र धारण किया, और वायु तथा अग्नि दो चँवर लेकर खड़े थे।
श्लोक 21 (3.232.21)
शक्रश्च पृष्ठतस्तस्य याति राजञ्छ्रिया वृतः । सहराजर्षिभिः सर्वैः स्तुवानो वृषकेतनम् ॥
śakraśca pṛṣṭhatastasya yāti rājañchriyā vṛtaḥ | saharājarṣibhiḥ sarvaiḥ stuvāno vṛṣaketanam
हे राजन्, उनके पीछे श्री से युक्त इन्द्र सभी राजर्षियों के साथ वृषध्वज की स्तुति करते हुए चल रहे थे।
श्लोक 22 (3.232.22)
गौरी विद्याऽथ गान्धारी केशिनी मित्रसाह्वया । सावित्र्या सह सर्वास्ताः पार्वत्या यान्ति पृष्ठतः ॥
gaurī vidyā'tha gāndhārī keśinī mitrasāhvayā | sāvitryā saha sarvāstāḥ pārvatyā yānti pṛṣṭhataḥ
गौरी, विद्या, गान्धारी, केशिनी और मित्रा नाम वाली देवी — ये सब सावित्री के साथ पार्वती के पीछे चल रही थीं।
श्लोक 23 (3.232.23)
तत्र विद्यागणाः सर्वेये केचित्कविभिः स्मृताः । तस्य कुर्वन्ति वचनं सेन्द्रा देवाश्चमूमुखे ॥
tatra vidyāgaṇāḥ sarveye kecitkavibhiḥ smṛtāḥ | tasya kurvanti vacanaṃ sendrā devāścamūmukhe
वहाँ कवियों द्वारा स्मरण की गई समस्त विद्याओं के समूह चल रहे थे, और इन्द्र सहित देवता सेना के अग्रभाग में उनकी आज्ञा का पालन करते थे।
श्लोक 24 (3.232.24)
गृहीत्वा तु पताकां वै यात्यग्रे राक्षसो ग्रहः । व्यापृतस्तु श्मशाने यो नित्यं रुद्रस्य वै सखा । पिङ्गलो नाम यक्षेन्द्रो लोकस्यानन्ददायकः ॥
gṛhītvā tu patākāṃ vai yātyagre rākṣaso grahaḥ | vyāpṛtastu śmaśāne yo nityaṃ rudrasya vai sakhā | piṅgalo nāma yakṣendro lokasyānandadāyakaḥ
पताका लेकर राक्षस ग्रह आगे-आगे चल रहा था — वह जो सदा श्मशान में लगा रहता है और रुद्र का सखा है, लोक को आनन्द देने वाला पिङ्गल नामक यक्षराज।
श्लोक 25 (3.232.25)
एभिश्च सहितो देवस्तत्रयाति यथासुखम् । अग्रतः पृष्ठतश्चैवं न हि तस्य गतिर्ध्रुवा ॥
ebhiśca sahito devastatrayāti yathāsukham | agrataḥ pṛṣṭhataścaivaṃ na hi tasya gatirdhruvā
इन सबके साथ वे देव वहाँ सुखपूर्वक चल रहे थे — कभी आगे, कभी पीछे; क्योंकि उनकी गति निश्चित नहीं है।
श्लोक 26 (3.232.26)
रुद्रं सत्कर्मभिर्मर्त्याः पूजयन्तीह दैवतम् । शिवमित्येव यं प्राहुरीशं रुद्रं पिनाकिनम् ॥
rudraṃ satkarmabhirmartyāḥ pūjayantīha daivatam | śivamityeva yaṃ prāhurīśaṃ rudraṃ pinākinam
मनुष्य यहाँ सत्कर्मों द्वारा जिन रुद्रदेव की पूजा करते हैं, उन्हीं को वे शिव, ईश, रुद्र और पिनाकी कहते हैं।
श्लोक 27 (3.232.27)
एवं सर्वे सुरगणास्तदा वै प्रीतमानसाः । भावैस्तु विविधाकारैः पूजयन्ति महेश्वरम् ॥
evaṃ sarve suragaṇāstadā vai prītamānasāḥ | bhāvaistu vividhākāraiḥ pūjayanti maheśvaram
इसी प्रकार सभी देवगण उस समय प्रसन्न मन से अनेक प्रकार के भावों से महेश्वर की पूजा करते हैं।
श्लोक 28 (3.232.28)
देवसेनापतिस्त्वेवं देवसेनाभिरावृतः । अनुगच्छति देवेशं ब्रह्मण्यः कृत्तिकासुतः ॥
devasenāpatistvevaṃ devasenābhirāvṛtaḥ | anugacchati deveśaṃ brahmaṇyaḥ kṛttikāsutaḥ
इस प्रकार देवसेनाओं से घिरे हुए, ब्राह्मणों के हितैषी, कृत्तिकाओं के पुत्र देवसेनापति देवेश्वर के पीछे-पीछे चल रहे थे।
श्लोक 29 (3.232.29)
अथाब्रवीन्महासेनं महादेवो बृहद्वचः । सप्तमं मारुतस्कन्धं रक्ष नित्यमतन्द्रितः ॥
athābravīnmahāsenaṃ mahādevo bṛhadvacaḥ | saptamaṃ mārutaskandhaṃ rakṣa nityamatandritaḥ
तब महादेव ने महासेन से गम्भीर वचन कहा — "तुम सदा सावधान रहकर सातवें मारुत-स्कन्ध की रक्षा करो।"
स्कन्द उवाच
श्लोक 30 (3.232.30)
सप्तमं मारुतस्कन्धं पालयिष्याम्यहं प्रभो । यदन्यदपि मे कार्यं देव तद्वद माचिरम् ॥
saptamaṃ mārutaskandhaṃ pālayiṣyāmyahaṃ prabho | yadanyadapi me kāryaṃ deva tadvada māciram
प्रभो, मैं सातवें मारुत-स्कन्ध की रक्षा करूँगा। हे देव, मेरे लिए जो अन्य कार्य हो, वह भी शीघ्र बताइए।
रुद्र उवाच
श्लोक 31 (3.232.31)
कार्येष्वहं त्वया पुत्र संद्रष्टव्यः सदैव हि । दर्शनान्मम भक्त्या च श्रेयः परमवाप्स्यसि ॥
kāryeṣvahaṃ tvayā putra saṃdraṣṭavyaḥ sadaiva hi | darśanānmama bhaktyā ca śreyaḥ paramavāpsyasi
पुत्र, सभी कार्यों में तुम्हें सदा मेरा ही ध्यान रखना चाहिए। मेरे दर्शन और भक्ति से तुम परम कल्याण प्राप्त करोगे।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 32 (3.232.32)
इत्युक्त्वा विससर्जैनं परिष्वज्य महेश्वरः । स्कन्दं सहोमया प्रीतो ज्वलन्तमिव तेजसा ॥
ityuktvā visasarjainaṃ pariṣvajya maheśvaraḥ | skandaṃ sahomayā prīto jvalantamiva tejasā
ऐसा कहकर महेश्वर ने उन्हें हृदय से लगाया और उमा के साथ प्रसन्न होकर तेज से प्रज्वलित-से स्कन्द को विदा किया।
श्लोक 33 (3.232.33)
विसर्जिते ततः स्कन्दे बभूवौत्पातिकं महत् । सहसैव महाराजदेवान्सर्वान्प्रमोहयत् ॥
visarjite tataḥ skande babhūvautpātikaṃ mahat | sahasaiva mahārājadevānsarvānpramohayat
हे महाराज, स्कन्द के विदा होते ही सहसा एक बड़ा उत्पात हुआ, जिसने सब देवताओं को मोहित कर दिया।
श्लोक 34 (3.232.34)
जज्वाल खं सनक्षत्रं प्रमूढं भुवनं भृशम् । चचाल व्यनदच्चोर्वी तमोभूतं जगत्प्रभो ॥
jajvāla khaṃ sanakṣatraṃ pramūḍhaṃ bhuvanaṃ bhṛśam | cacāla vyanadaccorvī tamobhūtaṃ jagatprabho
नक्षत्रों सहित आकाश जलने लगा, सारा भुवन अत्यन्त मोहग्रस्त हो गया; पृथ्वी काँपने और गरजने लगी, और हे प्रभो, जगत् अन्धकारमय हो गया।
श्लोक 35 (3.232.35)
ततस्तद्दारुणं दृष्ट्वा क्षुभितः शंकरस्तदा । उमा चैवमहाभाग देवाश्च समहर्षयः ॥
tatastaddāruṇaṃ dṛṣṭvā kṣubhitaḥ śaṃkarastadā | umā caivamahābhāga devāśca samaharṣayaḥ
वह भयानक दृश्य देखकर शंकर क्षुब्ध हो उठे; हे महाभाग, उमा तथा महर्षियों सहित देवता भी विचलित हो गए।
श्लोक 36 (3.232.36)
ततस्तेषु प्रमूढेषु पर्वताम्बुदसन्निभम् । नानाप्रहरणं घोरमदृश्यत महद्बलम् ॥
tatasteṣu pramūḍheṣu parvatāmbudasannibham | nānāpraharaṇaṃ ghoramadṛśyata mahadbalam
तब उनके मोहित रहते हुए पर्वतों और मेघों के समान एक विशाल, भयंकर सेना दिखाई दी, जो अनेक प्रकार के आयुध लिए हुए थी।
श्लोक 37 (3.232.37)
तद्वै घोरमसङ्ख्येयं गर्जच्च विविधा गिरः । अभ्यद्रवद्रणे देवान्भगवन्तं च शंकरम् ॥
tadvai ghoramasaṅkhyeyaṃ garjacca vividhā giraḥ | abhyadravadraṇe devānbhagavantaṃ ca śaṃkaram
वह भयंकर, असंख्य सेना नाना प्रकार की गर्जना करती हुई युद्ध में देवताओं और भगवान् शंकर पर टूट पड़ी।
श्लोक 38 (3.232.38)
तैर्विसृष्टान्यनीकेषु बाणजालान्यनेकशः । पर्वताश्च शतघ्न्यश्च प्रासासिपरिघा गदाः ॥
tairvisṛṣṭānyanīkeṣu bāṇajālānyanekaśaḥ | parvatāśca śataghnyaśca prāsāsiparighā gadāḥ
उन्होंने सेनाओं पर बार-बार बाणों के जाल, पर्वत-शिलाएँ, शतघ्नियाँ, प्रास, तलवारें, परिघ और गदाएँ छोड़ीं।
श्लोक 39 (3.232.39)
निपतद्भिश्च तैर्घोरैर्देवानीकं महायुधैः । क्षणेन व्यद्रवत्सर्वं विमुखं चाप्यदृश्यत ॥
nipatadbhiśca tairghorairdevānīkaṃ mahāyudhaiḥ | kṣaṇena vyadravatsarvaṃ vimukhaṃ cāpyadṛśyata
उन भयंकर महान् आयुधों के गिरने से देवताओं की सारी सेना क्षण भर में भाग खड़ी हुई और पीठ फेरती दिखाई दी।
श्लोक 40 (3.232.40)
निकृत्तयोधनागाश्वं कृत्तायुधमहारथम् । दानवैरर्दितं सैन्यं देवानां विमुखं बभौ ॥
nikṛttayodhanāgāśvaṃ kṛttāyudhamahāratham | dānavairarditaṃ sainyaṃ devānāṃ vimukhaṃ babhau
योद्धा, हाथी और घोड़े कट जाने से तथा आयुध और महारथ टूट जाने से, दानवों से पीड़ित देवताओं की सेना पराङ्मुख दिखाई देने लगी।
श्लोक 41 (3.232.41)
असुरैर्वध्यमानं तत्पावकैरिव काननम् । अपतद्दग्धभूयिष्ठं महाद्रुमवनं तथा ॥
asurairvadhyamānaṃ tatpāvakairiva kānanam | apataddagdhabhūyiṣṭhaṃ mahādrumavanaṃ tathā
असुरों द्वारा मारी जाती हुई वह सेना वैसे ही गिर पड़ी, जैसे आग से अधिकांश जला हुआ विशाल वृक्षों का वन।
श्लोक 42 (3.232.42)
ते विभिन्नशिरोदेहाः प्राद्रवन्तो दिवौकसः । न नाथमधिगच्छन्ति वध्यमाना महारणे ॥
te vibhinnaśirodehāḥ prādravanto divaukasaḥ | na nāthamadhigacchanti vadhyamānā mahāraṇe
जिनके सिर और शरीर फट गए थे, वे स्वर्गवासी भागने लगे; उस महासंग्राम में मारे जाते हुए उन्हें कोई रक्षक न मिला।
श्लोक 43 (3.232.43)
अथ तद्विद्रुतं सैन्यं दृष्ट्वा देवः पुरंदरः । आश्वासयन्नुवाचेदं बलभिद्दानवार्दितम् ॥
atha tadvidrutaṃ sainyaṃ dṛṣṭvā devaḥ puraṃdaraḥ | āśvāsayannuvācedaṃ balabhiddānavārditam
तब उस भागती हुई, दानवों से पीड़ित सेना को देखकर बल का संहार करने वाले देव पुरन्दर ने उसे आश्वासन देते हुए यह कहा —
इन्द्र उवाच
श्लोक 44 (3.232.44)
भयं त्यजत भद्रं वः शूराः शस्त्राणि गृह्णत । कुरुध्वंविक्रमे बुद्धिं मा वः काचिद्व्यथा भवेत् ॥
bhayaṃ tyajata bhadraṃ vaḥ śūrāḥ śastrāṇi gṛhṇata | kurudhvaṃvikrame buddhiṃ mā vaḥ kācidvyathā bhavet
"वीरो, भय छोड़ो, तुम्हारा कल्याण हो; शस्त्र उठाओ। पराक्रम में मन लगाओ, तुम्हें किसी प्रकार की व्यथा न हो।
श्लोक 45 (3.232.45)
जयतैनान्सुदुर्वृत्तान्दानवान्घोरदर्शनान् । अभिद्रवत भद्रं वो मया सह महासुरान् ॥
jayatainānsudurvṛttāndānavānghoradarśanān | abhidravata bhadraṃ vo mayā saha mahāsurān
इन अत्यन्त दुराचारी, भयानक दिखने वाले दानवों को जीतो। तुम्हारा कल्याण हो, मेरे साथ इन महान् असुरों पर धावा बोलो।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 46 (3.232.46)
शक्रस्य वचनं श्रुत्वा समाश्वस्ता दिवौकसः । दानवान्प्रत्ययुध्यन्त शक्रं कृत्वा व्यपाश्रयम् ॥
śakrasya vacanaṃ śrutvā samāśvastā divaukasaḥ | dānavānpratyayudhyanta śakraṃ kṛtvā vyapāśrayam
इन्द्र के वचन सुनकर स्वर्गवासी आश्वस्त हो गए और इन्द्र का आश्रय लेकर दानवों से फिर लड़ने लगे।
श्लोक 47 (3.232.47)
ततस्ते त्रिदशाः सर्वेमरुतश्च महाबलाः । प्रत्युद्ययुर्महाभागाः साध्याश्च वसुभिः सह ॥
tataste tridaśāḥ sarvemarutaśca mahābalāḥ | pratyudyayurmahābhāgāḥ sādhyāśca vasubhiḥ saha
तब सभी देवता, महाबली मरुद्गण, और वसुओं के साथ महाभाग साध्यगण उनका सामना करने आगे बढ़े।
श्लोक 48 (3.232.48)
तैर्विसृष्टान्यनीकेषु क्रुद्धैः शस्त्राणि संयुगे । शराश्च दैत्यकायेषु पिबन्ति रुधिरं बहु ॥
tairvisṛṣṭānyanīkeṣu kruddhaiḥ śastrāṇi saṃyuge | śarāśca daityakāyeṣu pibanti rudhiraṃ bahu
युद्ध में क्रुद्ध होकर उन्होंने शत्रु-सेनाओं पर जो शस्त्र छोड़े, वे और उनके बाण दैत्यों के शरीरों से बहुत-सा रक्त पीने लगे।
श्लोक 49 (3.232.49)
तेषां देहान्विनिर्भिद्य शरास्ते निशितास्तदा । निपतन्तोऽभ्यदृश्यन्त नगेभ्य इव पन्नगाः ॥
teṣāṃ dehānvinirbhidya śarāste niśitāstadā | nipatanto'bhyadṛśyanta nagebhya iva pannagāḥ
वे तीखे बाण उनके शरीरों को भेदकर बाहर गिरते हुए ऐसे दिखाई देते थे, जैसे पर्वतों से सर्प निकल रहे हों।
श्लोक 50 (3.232.50)
तानि दैत्यशरीराणि निर्भिन्नानिस्म सायकैः । अपतन्भूतलेराजंश्छिन्नाभ्राणीव सर्वशः ॥
tāni daityaśarīrāṇi nirbhinnānisma sāyakaiḥ | apatanbhūtalerājaṃśchinnābhrāṇīva sarvaśaḥ
हे राजन्, बाणों से बिंधे हुए दैत्यों के शरीर फटे हुए बादलों की भाँति चारों ओर पृथ्वी पर गिर पड़े।
श्लोक 51 (3.232.51)
ततस्तद्दानवं सैन्यं सर्वैर्देवगणैर्युधि । त्रासितं विविधैर्बाणैः कृतंचैव पराङ्मुखम् ॥
tatastaddānavaṃ sainyaṃ sarvairdevagaṇairyudhi | trāsitaṃ vividhairbāṇaiḥ kṛtaṃcaiva parāṅmukham
तब सभी देवगणों ने युद्ध में अनेक प्रकार के बाणों से उस दानव-सेना को भयभीत कर दिया और उसे पीठ दिखाने पर विवश कर दिया।
श्लोक 52 (3.232.52)
अथोत्क्रुष्टं तदा हृष्टैः सर्वैर्देवैरुदायुधैः । संहतानि च तूर्याणि प्रावाद्यन्त ह्यनेकशः ॥
athotkruṣṭaṃ tadā hṛṣṭaiḥ sarvairdevairudāyudhaiḥ | saṃhatāni ca tūryāṇi prāvādyanta hyanekaśaḥ
तब सभी देवता हर्षित होकर शस्त्र उठाए जयघोष करने लगे, और एक साथ अनेक प्रकार के वाद्य बार-बार बजाए गए।
श्लोक 53 (3.232.53)
एवमन्योन्यसंयुक्तं युद्धमासीत्सुदारुणम् । देवानां दानवानां च मांसशोणितकर्दमम् ॥
evamanyonyasaṃyuktaṃ yuddhamāsītsudāruṇam | devānāṃ dānavānāṃ ca māṃsaśoṇitakardamam
इस प्रकार देवताओं और दानवों के बीच एक-दूसरे से गुँथा हुआ अत्यन्त भयानक युद्ध हुआ, जिसमें मांस और रक्त का कीचड़ हो गया।
श्लोक 54 (3.232.54)
अनयो देवलोकस्य सहसैवाभ्यदृश्यत । तथा हि दानवा घोरा विनिघ्नन्ति दिवौकसः ॥
anayo devalokasya sahasaivābhyadṛśyata | tathā hi dānavā ghorā vinighnanti divaukasaḥ
अचानक देवलोक पर विपत्ति आती दिखाई दी, क्योंकि भयानक दानव स्वर्गवासियों का संहार कर रहे थे।
श्लोक 55 (3.232.55)
ततस्तूर्यप्रणादाश्च भेरीणां च महास्वनाः । बभूवुर्दानवेन्द्राणां सिंहनादाश्च दारुणाः ॥
tatastūryapraṇādāśca bherīṇāṃ ca mahāsvanāḥ | babhūvurdānavendrāṇāṃ siṃhanādāśca dāruṇāḥ
तब तूर्यों का नाद, भेरियों का महान् घोष और दानवराजों के भयानक सिंहनाद होने लगे।
श्लोक 56 (3.232.56)
अथ दैत्यबलाद्घोरान्निष्पपात महाबलः । दानवो महिषो नाम प्रगृह्य विपुलं गिरिम् ॥
atha daityabalādghorānniṣpapāta mahābalaḥ | dānavo mahiṣo nāma pragṛhya vipulaṃ girim
तब उस भयानक दैत्य-सेना में से महिष नामक एक महाबली दानव एक विशाल पर्वत उठाए हुए निकल पड़ा।
श्लोक 57 (3.232.57)
ते तं घनैरिवादित्यं दृष्ट्वासंपरिवारितम् । तमुद्यतगिरिं राजन्व्यद्रवन्त दिवौकसः ॥
te taṃ ghanairivādityaṃ dṛṣṭvāsaṃparivāritam | tamudyatagiriṃ rājanvyadravanta divaukasaḥ
हे राजन्, बादलों से घिरे सूर्य के समान उस पर्वत उठाए महिष को देखकर स्वर्गवासी भाग खड़े हुए।
श्लोक 58 (3.232.58)
अथाभिद्रुत्य महिषो देवांश्चिक्षेप तं गिरिम् । महाकायं महाराज सतोयमिव तोयदम् ॥
athābhidrutya mahiṣo devāṃścikṣepa taṃ girim | mahākāyaṃ mahārāja satoyamiva toyadam
महिष ने धावा बोलकर वह पर्वत देवताओं पर फेंका — हे महाराज, वह जल से भरे मेघ के समान विशाल था।
श्लोक 59 (3.232.59)
पतता तेन गिरिणा देवसैन्यस्य पार्थिव । भीमरूपेण निहतमयुतं प्रापतद्भुवि ॥
patatā tena giriṇā devasainyasya pārthiva | bhīmarūpeṇa nihatamayutaṃ prāpatadbhuvi
हे पृथ्वीपते, उस भयंकर रूप वाले गिरते हुए पर्वत से देवसेना के दस हज़ार योद्धा मारे जाकर भूमि पर गिर पड़े।
श्लोक 60 (3.232.60)
अथ तैर्दानवैः सार्धं महिषस्त्रासयन्सुरान् । अभ्यद्रवद्रणे तूर्णं सिंहः क्षुद्रमृगानिव ॥
atha tairdānavaiḥ sārdhaṃ mahiṣastrāsayansurān | abhyadravadraṇe tūrṇaṃ siṃhaḥ kṣudramṛgāniva
तब उन दानवों के साथ देवताओं को भयभीत करता हुआ महिष युद्ध में तेज़ी से ऐसे टूट पड़ा, जैसे सिंह छोटे मृगों पर।
श्लोक 61 (3.232.61)
तमापतन्तं महिषं दृष्ट्वा सेन्द्रा दिवौकसः । व्यद्रवन्तरणे भीता विकीर्णायुधकेतनाः ॥
tamāpatantaṃ mahiṣaṃ dṛṣṭvā sendrā divaukasaḥ | vyadravantaraṇe bhītā vikīrṇāyudhaketanāḥ
महिष को आते देख इन्द्र सहित स्वर्गवासी भयभीत होकर, अपने आयुध और ध्वज बिखेरते हुए, रणभूमि से भाग खड़े हुए।
श्लोक 62 (3.232.62)
ततःस महिषः क्रुद्धस्तूर्णं रुद्ररथं ययौ । अभिद्रुत्य च जग्राह रुद्रस्य रथकूवरम् ॥
tataḥsa mahiṣaḥ kruddhastūrṇaṃ rudrarathaṃ yayau | abhidrutya ca jagrāha rudrasya rathakūvaram
तब वह क्रुद्ध महिष तेज़ी से रुद्र के रथ की ओर गया और झपटकर उसने रुद्र के रथ का कूबर (जुए वाला डण्डा) पकड़ लिया।
श्लोक 63 (3.232.63)
यदा रुद्ररथं क्रुद्धो महिषः सहसा गतः । रेसतू रोदसी गाढं मुमुहुश्च महर्षयः ॥
yadā rudrarathaṃ kruddho mahiṣaḥ sahasā gataḥ | resatū rodasī gāḍhaṃ mumuhuśca maharṣayaḥ
जब क्रुद्ध महिष सहसा रुद्र के रथ तक पहुँच गया, तब आकाश और पृथ्वी ज़ोर से गूँज उठे और महर्षि मूर्च्छित हो गए।
श्लोक 64 (3.232.64)
अनदंश्चमहाकाया दैत्या जलधरोपमाः । आसीच्चनिश्चितं तेषां जितमस्माभिरित्युत ॥
anadaṃścamahākāyā daityā jaladharopamāḥ | āsīccaniścitaṃ teṣāṃ jitamasmābhirityuta
मेघों के समान विशालकाय दैत्य गरजने लगे, और उन्हें निश्चय हो गया कि "हम जीत गए।"
श्लोक 65 (3.232.65)
तथाभूते तु भगवानाहूय गुहमात्मजम् । दौरात्म्यं पश्य पुत्र त्वं दानवस्य दुरात्मनः । जहि शीघ्रं दुराचारं द्रष्टुमिच्छामि ते बलम् ॥
tathābhūte tu bhagavānāhūya guhamātmajam | daurātmyaṃ paśya putra tvaṃ dānavasya durātmanaḥ | jahi śīghraṃ durācāraṃ draṣṭumicchāmi te balam
ऐसी स्थिति में भगवान् शिव ने अपने पुत्र गुह को बुलाकर कहा — "पुत्र, इस दुष्टात्मा दानव की दुष्टता देखो। इस दुराचारी को शीघ्र मार डालो; मैं तुम्हारा बल देखना चाहता हूँ।"
श्लोक 66 (3.232.66)
इत्युक्त्वा भगवान्स्कन्दं परिपूज्य महेश्वरः । अयोजयन्निग्रहार्थं महिषस्य गतायुषः । सस्मार च तदा स्कन्दं मृत्युं तस्य दुरात्मनः ॥
ityuktvā bhagavānskandaṃ paripūjya maheśvaraḥ | ayojayannigrahārthaṃ mahiṣasya gatāyuṣaḥ | sasmāra ca tadā skandaṃ mṛtyuṃ tasya durātmanaḥ
ऐसा कहकर भगवान् महेश्वर ने स्कन्द का सम्मान किया और जिसकी आयु पूरी हो चुकी थी उस महिष के दमन के लिए उन्हें नियुक्त किया; और तब उन्होंने उस दुष्टात्मा की मृत्यु-रूप स्कन्द का स्मरण किया।
श्लोक 67 (3.232.67)
महिषोऽपि रथं दृष्ट्वा रौद्रं रुद्रस्य चानदत् । देवान्संत्रासयंश्चापि दैत्यांश्चापिप्रहर्षयत् ॥
mahiṣo'pi rathaṃ dṛṣṭvā raudraṃ rudrasya cānadat | devānsaṃtrāsayaṃścāpi daityāṃścāpipraharṣayat
महिष भी रुद्र के भयानक रथ को देखकर गरजा, जिससे देवता भयभीत हुए और दैत्य हर्षित हुए।
श्लोक 68 (3.232.68)
ततस्तस्मिन्भये घोरे देवानां समुपस्थिते । आजगाम महासेनः क्रोधात्सूर्य इव ज्वलन् ॥
tatastasminbhaye ghore devānāṃ samupasthite | ājagāma mahāsenaḥ krodhātsūrya iva jvalan
तब देवताओं पर वह भयानक संकट आ पड़ने पर महासेन क्रोध से सूर्य के समान जलते हुए वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 69 (3.232.69)
लोहिताम्बरसंवीतो लोहितस्रग्विभूषणः । लोहिताश्वो महाबाहुर्हिरण्यकवचः प्रभुः ॥
lohitāmbarasaṃvīto lohitasragvibhūṣaṇaḥ | lohitāśvo mahābāhurhiraṇyakavacaḥ prabhuḥ
वे लाल वस्त्र पहने और लाल मालाओं से विभूषित थे; उनके घोड़े लाल थे; उन महाबाहु प्रभु ने स्वर्ण-कवच धारण किया था।
श्लोक 70 (3.232.70)
रथमादित्यसंकाशमास्थितः कनकप्रभम् । तं दृष्ट्वा दैत्यसेना सा व्यद्रवत्सहसा रणे ॥
rathamādityasaṃkāśamāsthitaḥ kanakaprabham | taṃ dṛṣṭvā daityasenā sā vyadravatsahasā raṇe
वे सूर्य के समान तेजस्वी, सोने-सी कान्ति वाले रथ पर आरूढ़ थे। उन्हें देखते ही दैत्य-सेना सहसा रणभूमि से भाग खड़ी हुई।
श्लोक 71 (3.232.71)
स चापि तां प्रज्वलितां महिषस्य विदारिणीम् । मुमोच शक्तिं राजेन्द्र महासेनो महाबलः ॥
sa cāpi tāṃ prajvalitāṃ mahiṣasya vidāriṇīm | mumoca śaktiṃ rājendra mahāseno mahābalaḥ
हे राजेन्द्र, महाबली महासेन ने महिष को विदीर्ण करने वाली वह प्रज्वलित शक्ति छोड़ी।
श्लोक 72 (3.232.72)
सा मुक्ताऽभ्यहरत्तस्य महिषस्य शिरो महत् । पपात भिन्ने शिरसि महिषस्त्यक्तजीवितः ॥
sā muktā'bhyaharattasya mahiṣasya śiro mahat | papāta bhinne śirasi mahiṣastyaktajīvitaḥ
छूटते ही उस शक्ति ने महिष का विशाल सिर काट गिराया; सिर फट जाने पर महिष प्राणहीन होकर गिर पड़ा।
श्लोक 73 (3.232.73)
पतता शिरसा तेन द्वारं षोडशयोजनम् । पर्वताभेन पिहितं तदाऽगम्यं ततोऽभवत् । उत्तराः कुरवस्तेन गच्छन्त्यद्य यथासुखम् ॥
patatā śirasā tena dvāraṃ ṣoḍaśayojanam | parvatābhena pihitaṃ tadā'gamyaṃ tato'bhavat | uttarāḥ kuravastena gacchantyadya yathāsukham
उस गिरते हुए पर्वताकार सिर से सोलह योजन चौड़ा एक द्वार ढक गया और तब से वह अगम्य हो गया; उसी के कारण उत्तरकुरु के लोग आज भी सुखपूर्वक विचरते हैं।
श्लोक 74 (3.232.74)
क्षिप्ताक्षिप्ता तु सा शक्तिर्हत्वा शत्रून्सहस्रशः । स्कन्दहस्तमनुप्राप्ता दृश्यते देवदानवैः ॥
kṣiptākṣiptā tu sā śaktirhatvā śatrūnsahasraśaḥ | skandahastamanuprāptā dṛśyate devadānavaiḥ
बार-बार फेंकी गई वह शक्ति हज़ारों शत्रुओं को मारकर फिर स्कन्द के हाथ में लौट आती थी — यह देवता और दानव देख रहे थे।
श्लोक 75 (3.232.75)
प्रायः शरैर्विनिहता महासेनेन धीमता । शेषा दैत्यगणा घोरा भीतास्त्रस्ता दुरासदैः । स्कन्दपारिषदैर्हत्वा भक्षिताश्च सहस्रशः ॥
prāyaḥ śarairvinihatā mahāsenena dhīmatā | śeṣā daityagaṇā ghorā bhītāstrastā durāsadaiḥ | skandapāriṣadairhatvā bhakṣitāśca sahasraśaḥ
अधिकांश दैत्य बुद्धिमान महासेन के बाणों से मारे गए। जो भयंकर दैत्य बचे थे, वे भयभीत और त्रस्त होकर स्कन्द के दुर्जय पार्षदों द्वारा मारे गए और हज़ारों की संख्या में खा लिए गए।
श्लोक 76 (3.232.76)
दानवान्भक्षयन्तस्ते प्रपिबन्तश्च शोणितम् । क्षणान्निर्दानवं सर्वमकार्षुर्भृशहर्षिताः ॥
dānavānbhakṣayantaste prapibantaśca śoṇitam | kṣaṇānnirdānavaṃ sarvamakārṣurbhṛśaharṣitāḥ
दानवों को खाते और उनका रक्त पीते हुए उन अत्यन्त हर्षित पार्षदों ने क्षण भर में सारे स्थान को दानवों से रहित कर दिया।
श्लोक 77 (3.232.77)
तमांसीवयथा सूर्यो वृक्षानग्निर्घनान्खगः । तथास्कन्दोऽजयच्छत्रून्स्वेन वीर्येण कीर्तिमान् ॥
tamāṃsīvayathā sūryo vṛkṣānagnirghanānkhagaḥ | tathāskando'jayacchatrūnsvena vīryeṇa kīrtimān
जैसे सूर्य अन्धकार को, अग्नि वृक्षों को और वायु मेघों को जीत लेता है, वैसे ही यशस्वी स्कन्द ने अपने पराक्रम से शत्रुओं को जीत लिया।
श्लोक 78 (3.232.78)
संपूज्यमानस्त्रिदशैरभिवाद्य महेश्वरम् । शुशुभे कृत्तिकापुत्रः प्रकीर्णांशुरिवांशुमान् ॥
saṃpūjyamānastridaśairabhivādya maheśvaram | śuśubhe kṛttikāputraḥ prakīrṇāṃśurivāṃśumān
देवताओं से पूजित होकर उन्होंने महेश्वर को प्रणाम किया; कृत्तिकाओं के पुत्र किरणें बिखेरते सूर्य के समान शोभित हुए।
श्लोक 79 (3.232.79)
नष्टशत्रुर्यदा स्कन्दः प्रयातस्तु महेश्वरम् । तदाऽब्रवीन्महासेनं परिष्वज्य पुरंदरः ॥
naṣṭaśatruryadā skandaḥ prayātastu maheśvaram | tadā'bravīnmahāsenaṃ pariṣvajya puraṃdaraḥ
शत्रुओं का नाश करके जब स्कन्द महेश्वर के पास गए, तब पुरन्दर ने महासेन को हृदय से लगाकर कहा —
इन्द्र उवाच
श्लोक 80 (3.232.80)
ब्रह्मदत्तवरः स्कन्द त्वयाऽयं महिषो हतः । अजय्यो युधि देवानां दानवः स महाबलः ॥
brahmadattavaraḥ skanda tvayā'yaṃ mahiṣo hataḥ | ajayyo yudhi devānāṃ dānavaḥ sa mahābalaḥ
"स्कन्द, तुमने ब्रह्मा से वर पाए इस महिष को मार डाला है — वह महाबली दानव युद्ध में देवताओं के लिए अजेय था।
श्लोक 81 (3.232.81)
देवास्तृणसमा यस्य बभूवुर्जयतांवर । सोऽयं त्वया महाबाहो शमितो देवकण्टकः ॥
devāstṛṇasamā yasya babhūvurjayatāṃvara | so'yaṃ tvayā mahābāho śamito devakaṇṭakaḥ
हे विजेताओं में श्रेष्ठ, उसके सामने देवता तिनके के समान थे। हे महाबाहु, तुमने देवताओं के इस काँटे को शान्त कर दिया है।
श्लोक 82 (3.232.82)
शतं महिषतुल्यानां दानवानां त्वया रणे । निहतंदेवशत्रूणां यैर्वयं पूर्वतापिताः ॥
śataṃ mahiṣatulyānāṃ dānavānāṃ tvayā raṇe | nihataṃdevaśatrūṇāṃ yairvayaṃ pūrvatāpitāḥ
तुमने युद्ध में महिष के समान बलवान सौ दानवों को मार डाला है — देवताओं के उन शत्रुओं को, जिन्होंने पहले हमें सताया था।
श्लोक 83 (3.232.83)
तावकैर्भक्षिताश्चान्ये दानवाः शतसङ्घशः । अजेयस्त्वं रणेऽरीणामुमापतिरिव प्रभुः ॥
tāvakairbhakṣitāścānye dānavāḥ śatasaṅghaśaḥ | ajeyastvaṃ raṇe'rīṇāmumāpatiriva prabhuḥ
तुम्हारे अनुचरों ने अन्य दानवों को सैकड़ों के झुंडों में खा डाला है। उमापति प्रभु के समान तुम युद्ध में शत्रुओं के लिए अजेय हो।
श्लोक 84 (3.232.84)
एतत्ते प्रथमं देव ख्यातं कर्म भविष्यति । त्रिषु लोकेषु कीर्तिश्च तवाक्षय्या भविष्यति । वशगाश्च भविष्यन्ति सुरास्तव महाभुज ॥
etatte prathamaṃ deva khyātaṃ karma bhaviṣyati | triṣu lokeṣu kīrtiśca tavākṣayyā bhaviṣyati | vaśagāśca bhaviṣyanti surāstava mahābhuja
हे देव, यह तुम्हारा पहला कर्म होगा जो प्रसिद्ध होगा, और तीनों लोकों में तुम्हारी अक्षय कीर्ति होगी। हे महाबाहु, देवता तुम्हारे वश में रहेंगे।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 85 (3.232.85)
महासेनमेवमुक्त्वा निवृत्तः सह दैवतैः । अनुज्ञातो भगवता त्र्यम्बकेण शचीपतिः ॥
mahāsenamevamuktvā nivṛttaḥ saha daivataiḥ | anujñāto bhagavatā tryambakeṇa śacīpatiḥ
महासेन से ऐसा कहकर शचीपति इन्द्र भगवान् त्र्यम्बक की अनुमति लेकर देवताओं के साथ लौट गए।
श्लोक 86 (3.232.86)
गतो भद्रवटंरुद्रो निवृत्ताश्च दिवौकसः । उक्ताश्च देवा रुद्रेण स्कन्दं पश्यत मामिव ॥
gato bhadravaṭaṃrudro nivṛttāśca divaukasaḥ | uktāśca devā rudreṇa skandaṃ paśyata māmiva
रुद्र भद्रवट को चले गए और स्वर्गवासी लौट आए। रुद्र ने देवताओं से कहा — "स्कन्द को मेरे ही समान देखना।"
श्लोक 87 (3.232.87)
स हत्वा दानवगणान्पूज्यमानो महर्षिभिः । एकाह्नैवाजयत्सर्वं त्रैलोक्यं वह्निनन्दनः ॥
sa hatvā dānavagaṇānpūjyamāno maharṣibhiḥ | ekāhnaivājayatsarvaṃ trailokyaṃ vahninandanaḥ
दानवों के समूहों को मारकर, महर्षियों से पूजित अग्निनन्दन स्कन्द ने एक ही दिन में सारे त्रिलोक को जीत लिया।
श्लोक 88 (3.232.88)
स्कन्दस्य य इदं विप्रः पठेज्जन्म समाहितः । शृणुयाद्ब्राह्मणेभ्यो यः श्रावयेद्वाविचेतनम् ॥
skandasya ya idaṃ vipraḥ paṭhejjanma samāhitaḥ | śṛṇuyādbrāhmaṇebhyo yaḥ śrāvayedvāvicetanam
जो ब्राह्मण एकाग्रचित्त होकर स्कन्द के इस जन्म-वृत्तान्त का पाठ करता है, या ब्राह्मणों से इसे सुनता है, या अनजान व्यक्ति को सुनाता है,
श्लोक 89 (3.232.89)
धनमायुर्यशो दीप्तिं पुत्राञ्शत्रुजयंतथा । सपुष्टिमिहसंप्राप्य स्कन्दसालोक्यमाप्नुयात् ॥
dhanamāyuryaśo dīptiṃ putrāñśatrujayaṃtathā | sapuṣṭimihasaṃprāpya skandasālokyamāpnuyāt
वह धन, आयु, यश, तेज, पुत्र और शत्रुओं पर विजय पाता है; और यहाँ समृद्धि प्राप्त करके वह स्कन्द के लोक को प्राप्त होता है।