आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 234
सत्यभामा का प्रश्न और द्रौपदी का पतिव्रता-धर्म
वन में जब श्रीकृष्ण पाण्डवों और ब्राह्मणों के साथ बैठे हैं, तब सत्यभामा एकान्त में द्रौपदी से पूछती हैं कि वे किस व्रत, मन्त्र या औषधि से पाँचों पाण्डवों को अपने वश में रखती हैं। द्रौपदी मन्त्र-तन्त्र और औषधियों को दुष्ट स्त्रियों का मार्ग बताकर अस्वीकार करती हैं और अपना आचरण बताती हैं — विनम्रता, निरन्तर सेवा, कुन्ती की परिचर्या, और इन्द्रप्रस्थ में युधिष्ठिर के विशाल गृहस्थ और कोष का प्रबन्ध। सत्यभामा यह कहकर क्षमा माँगती हैं कि सखियों के बीच यह बात हँसी में कही गई थी।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.234.1)
उपासीनेषु विप्रेषु पाण्डवेषु च भारत । द्रौपदी सत्यभामा च विविशाते तदा समम् ॥
upāsīneṣu vipreṣu pāṇḍaveṣu ca bhārata | draupadī satyabhāmā ca viviśāte tadā samam
हे भारत, जब ब्राह्मण और पाण्डव साथ बैठे थे, तब द्रौपदी और सत्यभामा एक साथ भीतर गईं।
श्लोक 2 (3.234.2)
प्रविश्य चाश्रमं पुण्यमुभे ते परमस्त्रियौ । जाहस्यमाने सुप्रीते सुखं तत्र निषीदतुः ॥
praviśya cāśramaṃ puṇyamubhe te paramastriyau | jāhasyamāne suprīte sukhaṃ tatra niṣīdatuḥ
उस पवित्र आश्रम में प्रवेश करके वे दोनों श्रेष्ठ नारियाँ खिलखिलाती हुई, अत्यन्त प्रसन्न होकर वहाँ सुख से बैठ गईं।
श्लोक 3 (3.234.3)
चिरस्य दृष्ट्वा राजेन्द्र तेऽन्योन्यस्य प्रियंवदे । कथयामासतुश्चित्राः कथाः कुरुयदूचिताः ॥
cirasya dṛṣṭvā rājendra te'nyonyasya priyaṃvade | kathayāmāsatuścitrāḥ kathāḥ kuruyadūcitāḥ
हे राजेन्द्र, बहुत समय बाद एक-दूसरे को देखकर वे दोनों मधुरभाषिणी स्त्रियाँ कुरुओं और यदुओं से जुड़ी अनेक रोचक कथाएँ आपस में कहने लगीं।
श्लोक 4 (3.234.4)
अथाब्रवीत्सत्यभामा कृष्णस्य महिषी प्रिया । सात्राजिती याज्ञसेनीं रहसीदं सुमध्यमा ॥
athābravītsatyabhāmā kṛṣṇasya mahiṣī priyā | sātrājitī yājñasenīṃ rahasīdaṃ sumadhyamā
तब सत्राजित की पुत्री, श्रीकृष्ण की प्रिय पटरानी, सुन्दर कटि वाली सत्यभामा ने एकान्त में याज्ञसेनी (द्रौपदी) से यह कहा —
सत्यभामोवाच
श्लोक 5 (3.234.5)
केन द्रौपदि वृत्तेन पाण्डवानधितिष्ठसि । लोकपालोपमान्वीरान्नूनं परमसंमतान् ॥
kena draupadi vṛttena pāṇḍavānadhitiṣṭhasi | lokapālopamānvīrānnūnaṃ paramasaṃmatān
"द्रौपदी, तुम किस आचरण से पाण्डवों पर अधिकार रखती हो — उन लोकपालों के समान वीरों पर, जो निश्चय ही अत्यन्त सम्मानित हैं?
श्लोक 6 (3.234.6)
कथं च वशगास्तुभ्यं न कुप्यन्ति च ते शुभे । तव वश्या हि सततं पाण्डवाः प्रियदर्शने ॥
kathaṃ ca vaśagāstubhyaṃ na kupyanti ca te śubhe | tava vaśyā hi satataṃ pāṇḍavāḥ priyadarśane
हे शुभे, वे कैसे तुम्हारे वश में रहते हैं और तुम पर कभी क्रोध नहीं करते? हे प्रियदर्शने, पाण्डव सदा तुम्हारे अधीन रहते हैं;
श्लोक 7 (3.234.7)
न चान्योन्यमसूयन्ते कथं वा ते सुमध्यमे । मुखप्रेक्षाश्च ते सर्वे तत्त्वमेतद्ब्रवीहि मे ॥
na cānyonyamasūyante kathaṃ vā te sumadhyame | mukhaprekṣāśca te sarve tattvametadbravīhi me
और हे सुमध्यमे, वे आपस में एक-दूसरे से ईर्ष्या क्यों नहीं करते? वे सब तुम्हारे मुख की ओर ही देखते रहते हैं। इसका रहस्य मुझे सच-सच बताओ।
श्लोक 8 (3.234.8)
व्रतचर्या तपो वाऽपि स्नानमन्त्रौषधानि वा । विद्यावीर्यं मूलवीर्यंजपहोमागदास्तथा ॥
vratacaryā tapo vā'pi snānamantrauṣadhāni vā | vidyāvīryaṃ mūlavīryaṃjapahomāgadāstathā
क्या यह व्रतों का पालन है, या तप, या स्नान, मन्त्र और औषधियाँ? विद्या का बल, जड़ी-बूटियों का बल, जप, होम या कोई औषधि?
श्लोक 9 (3.234.9)
ममाद्याचक्ष्वपाञ्चालि यशस्यं भगवेतनम् । येन कृष्णे भवेन्नित्यं मम कृष्णो वशानुगः ॥
mamādyācakṣvapāñcāli yaśasyaṃ bhagavetanam | yena kṛṣṇe bhavennityaṃ mama kṛṣṇo vaśānugaḥ
हे पाञ्चाली, आज मुझे वह यशस्वी और सौभाग्यदायक उपाय बताओ, जिससे हे कृष्णे, मेरे कृष्ण सदा मेरे वश में रहें।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 10 (3.234.10)
एवमुक्त्वासत्यभामा विरराम यशस्विनी । पतिव्रता महाभागा द्रौपदी प्रत्युवाच ताम् ॥
evamuktvāsatyabhāmā virarāma yaśasvinī | pativratā mahābhāgā draupadī pratyuvāca tām
यह कहकर यशस्विनी सत्यभामा चुप हो गईं। तब पतिव्रता, महाभाग्यशालिनी द्रौपदी ने उनसे कहा —
द्रौपद्युवाच
श्लोक 11 (3.234.11)
असत्स्त्रीणां समाचारं सत्ये मामनुपृच्छसि । असदाचरिते मार्गे कथं स्यादनुकीर्तनम् ॥
asatstrīṇāṃ samācāraṃ satye māmanupṛcchasi | asadācarite mārge kathaṃ syādanukīrtanam
"सत्ये, तुम मुझसे दुष्ट स्त्रियों के आचरण के विषय में पूछ रही हो। दुष्ट स्त्रियों के अपनाए मार्ग का वर्णन मैं कैसे करूँ?
श्लोक 12 (3.234.12)
अनुप्रश्नः संशयो वा नैष त्वय्युपपद्यते । कथं ह्युपेता बुद्ध्या त्वं कृष्णस्य महिषी प्रिया ॥
anupraśnaḥ saṃśayo vā naiṣa tvayyupapadyate | kathaṃ hyupetā buddhyā tvaṃ kṛṣṇasya mahiṣī priyā
ऐसा प्रश्न या ऐसा संदेह तुम्हें शोभा नहीं देता। तुम तो बुद्धिमती हो और श्रीकृष्ण की प्रिय पटरानी हो — फिर ऐसा क्यों?
श्लोक 13 (3.234.13)
यदैव भर्ता जानीयान्मन्त्रमूलपरां स्त्रियम् । उद्विजेत तदैवास्याः सर्पाद्वेश्मगतादिव ॥
yadaiva bhartā jānīyānmantramūlaparāṃ striyam | udvijeta tadaivāsyāḥ sarpādveśmagatādiva
जिस क्षण पति को पता चलता है कि उसकी पत्नी मन्त्रों और जड़ी-बूटियों में लगी है, उसी क्षण वह उससे वैसे ही डरने लगता है जैसे घर में घुसे साँप से।
श्लोक 14 (3.234.14)
उद्विग्नस्य कुतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् । न जातु वशगो भर्ता स्त्रियाः स्यान्मन्त्रकारणात् ॥
udvignasya kutaḥ śāntiraśāntasya kutaḥ sukham | na jātu vaśago bhartā striyāḥ syānmantrakāraṇāt
जो उद्विग्न है उसे शान्ति कहाँ, और जो अशान्त है उसे सुख कहाँ? मन्त्रों के बल से पति कभी पत्नी के वश में नहीं होता।
श्लोक 15 (3.234.15)
किमत्रप्रहिताश्चापि गदाः परमदारुणाः । मूलप्रवादैर्हि विषं प्रयच्छन्ति जिघांसवः ॥
kimatraprahitāścāpi gadāḥ paramadāruṇāḥ | mūlapravādairhi viṣaṃ prayacchanti jighāṃsavaḥ
इस विषय में और क्या कहूँ? ऐसे उपायों से अत्यन्त भयंकर रोग भी भेजे जाते हैं, क्योंकि जो मारना चाहते हैं वे जड़ी-बूटी के नाम पर विष दे देते हैं।
श्लोक 16 (3.234.16)
जिह्वया यानि पुरुषस्त्वचा वाप्युपसेवते । तत्र चूर्णानि दत्तानि हन्युः क्षिप्रमसंशयम् ॥
jihvayā yāni puruṣastvacā vāpyupasevate | tatra cūrṇāni dattāni hanyuḥ kṣipramasaṃśayam
पुरुष जिन वस्तुओं को जीभ से ग्रहण करता है या त्वचा से छूता है, उनमें डाले गए चूर्ण निःसंदेह उसे शीघ्र मार सकते हैं।
श्लोक 17 (3.234.17)
जलोदरसमायुक्ताः श्वित्रिणः पलितास्तथा । अपुमांसः कृताः स्त्रीभिर्जडान्धवधिरास्तथा ॥
jalodarasamāyuktāḥ śvitriṇaḥ palitāstathā | apumāṃsaḥ kṛtāḥ strībhirjaḍāndhavadhirāstathā
स्त्रियों ने पुरुषों को जलोदर, श्वेत कुष्ठ और असमय पके बालों से ग्रस्त किया है, उन्हें नपुंसक, जड़, अंधा और बहरा बना दिया है।
श्लोक 18 (3.234.18)
पापानुगास्तु पापास्ताः पतीनुपसृजन्त्युत । न जातु विप्रियं भर्तुः स्त्रिया कार्यं कथंचन ॥
pāpānugāstu pāpāstāḥ patīnupasṛjantyuta | na jātu vipriyaṃ bhartuḥ striyā kāryaṃ kathaṃcana
पाप के मार्ग पर चलने वाली वे पापिनी स्त्रियाँ अपने पतियों को दोषों से ग्रस्त कर देती हैं। स्त्री को किसी भी प्रकार पति का अप्रिय कभी नहीं करना चाहिए।
श्लोक 19 (3.234.19)
वर्ताम्यहं तु यां वृत्तिं पाण्डवेषु महात्मसु । तां सर्वां शृणु मे सत्यां सत्यभामे यशस्विनि ॥
vartāmyahaṃ tu yāṃ vṛttiṃ pāṇḍaveṣu mahātmasu | tāṃ sarvāṃ śṛṇu me satyāṃ satyabhāme yaśasvini
हे यशस्विनी सत्यभामा, अब मुझसे वह पूरा सत्य सुनो कि मैं महात्मा पाण्डवों के साथ कैसा आचरण करती हूँ।
श्लोक 20 (3.234.20)
अहंकारं विहायाहं कामक्रोधौ च सर्वदा । सदारान्पाण्डवान्नित्यं प्रयतोपचराम्यहम् ॥
ahaṃkāraṃ vihāyāhaṃ kāmakrodhau ca sarvadā | sadārānpāṇḍavānnityaṃ prayatopacarāmyaham
अहंकार को त्यागकर और काम-क्रोध को सदा दूर रखकर मैं पाण्डवों की और उनकी अन्य पत्नियों की भी सदा सावधानी से सेवा करती हूँ।
श्लोक 21 (3.234.21)
प्रणयं प्रतिसंहृत्य निधायात्मानमात्मनि । शुश्रूषुर्निरभीमाना पतीनां चित्तरक्षिणी ॥
praṇayaṃ pratisaṃhṛtya nidhāyātmānamātmani | śuśrūṣurnirabhīmānā patīnāṃ cittarakṣiṇī
ईर्ष्या को रोककर, मन को अपने भीतर संयमित रखकर, सेवा में तत्पर और अभिमान से रहित होकर मैं अपने पतियों के मन की रक्षा करती हूँ।
श्लोक 22 (3.234.22)
दुर्व्याहृताच्छङ्कमाना दुस्थिताद्दुरवेक्षितात् । दुरासिताद्दुर्व्रजितादिङ्गिताध्यासितादपि ॥
durvyāhṛtācchaṅkamānā dusthitādduravekṣitāt | durāsitāddurvrajitādiṅgitādhyāsitādapi
मैं अनुचित बोलने से, अनुचित ढंग से खड़े होने और देखने से, बुरी तरह बैठने और चलने से, तथा संकेत भरी चितवन से भी सदा सावधान रहती हूँ।
श्लोक 23 (3.234.23)
सूर्यवैश्वानरसमान्सोमकल्पान्महारथान् । सेवे चक्षुर्हणः पार्थानुग्रवीर्यप्रतापिनः ॥
sūryavaiśvānarasamānsomakalpānmahārathān | seve cakṣurhaṇaḥ pārthānugravīryapratāpinaḥ
मैं उन कुन्तीपुत्रों की सेवा करती हूँ, जो सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी, चन्द्रमा के समान सौम्य, महारथी, दृष्टि मात्र से शत्रुओं का नाश करने वाले और उग्र पराक्रम तथा प्रताप वाले हैं।
श्लोक 24 (3.234.24)
देवो मनुष्यो गन्धर्वो युवा चापि स्वलंकृतः । द्रव्यवानभिरूपो वा न मेऽन्यः पुरुषो मतः ॥
devo manuṣyo gandharvo yuvā cāpi svalaṃkṛtaḥ | dravyavānabhirūpo vā na me'nyaḥ puruṣo mataḥ
देवता हो, मनुष्य हो या गन्धर्व, युवा और सुन्दर वेशभूषा वाला, धनवान या रूपवान — कोई भी अन्य पुरुष मुझे नहीं भाता।
श्लोक 25 (3.234.25)
न भुक्तवति न स्नाते नासंविष्टे च भर्तरि । न संविशामि नाश्नामि न स्नाये कर्म कुर्वती ॥
na bhuktavati na snāte nāsaṃviṣṭe ca bhartari | na saṃviśāmi nāśnāmi na snāye karma kurvatī
जब तक पति भोजन, स्नान और शयन नहीं कर लेते, तब तक मैं काम में लगी रहती हूँ — न सोती हूँ, न खाती हूँ, न स्नान करती हूँ।
श्लोक 26 (3.234.26)
क्षेत्राद्वनाद्वा ग्रामाद्वा भर्तारं गृहमागतम् । अभ्युत्थायाभिनन्दामि आसनेनोदकेन च ॥
kṣetrādvanādvā grāmādvā bhartāraṃ gṛhamāgatam | abhyutthāyābhinandāmi āsanenodakena ca
जब पति खेत, वन या गाँव से घर लौटते हैं, तो मैं उठकर आसन और जल से उनका स्वागत करती हूँ।
श्लोक 27 (3.234.27)
प्रसन्नभाण्डा मृष्टान्ना काले भोजनदायिनी । संयता गुप्तधान्या च सुसंमृष्टनिवेशना ॥
prasannabhāṇḍā mṛṣṭānnā kāle bhojanadāyinī | saṃyatā guptadhānyā ca susaṃmṛṣṭaniveśanā
मेरे बर्तन स्वच्छ रहते हैं, भोजन अच्छी तरह बना होता है और मैं समय पर भोजन परोसती हूँ। मैं संयम से रहती हूँ, अन्न को सुरक्षित रखती हूँ और घर को भली-भाँति झाड़-बुहारकर रखती हूँ।
श्लोक 28 (3.234.28)
अतिरस्कृतसंभाषा दुःस्त्रियो नानुसेवती । अनुकूलवती नित्यं भवाम्यनलसा सदा ॥
atiraskṛtasaṃbhāṣā duḥstriyo nānusevatī | anukūlavatī nityaṃ bhavāmyanalasā sadā
मैं तिरस्कार भरी बात नहीं बोलती, दुष्ट स्त्रियों का संग नहीं करती, सदा अनुकूल रहती हूँ और कभी आलस्य नहीं करती।
श्लोक 29 (3.234.29)
अनर्म चापि हसितं द्वारि स्थानमभीक्ष्णशः । अवस्करे चिरस्थानं निष्कुटेषु च वर्जये ॥
anarma cāpi hasitaṃ dvāri sthānamabhīkṣṇaśaḥ | avaskare cirasthānaṃ niṣkuṭeṣu ca varjaye
मैं बिना बात के हँसने से, बार-बार द्वार पर खड़े होने से, और कूड़े के ढेर के पास या घर के उपवनों में देर तक ठहरने से बचती हूँ।
श्लोक 30 (3.234.30)
अत्यालापमसन्तोषं परव्यापारसंकथाः । अतिहासातिरोषौ च क्रोधस्थानं च वर्जये ॥
atyālāpamasantoṣaṃ paravyāpārasaṃkathāḥ | atihāsātiroṣau ca krodhasthānaṃ ca varjaye
मैं अधिक बोलने, असन्तोष और दूसरों के कामकाज की चर्चा से बचती हूँ; अत्यधिक हँसी, अत्यधिक रोष और क्रोध के हर अवसर से भी दूर रहती हूँ।
श्लोक 31 (3.234.31)
निरताऽहं सदा सत्ये पापानां च विवर्जने । सर्वथा भर्तुरहितं न ममेष्टं कथंचन ॥
niratā'haṃ sadā satye pāpānāṃ ca vivarjane | sarvathā bharturahitaṃ na mameṣṭaṃ kathaṃcana
हे सत्ये, मैं सदा सत्य में और पापों के त्याग में लगी रहती हूँ; जो कुछ पति के हित में नहीं है, वह मुझे किसी प्रकार प्रिय नहीं।
श्लोक 32 (3.234.32)
यदा प्रवसते भर्ता कुटुम्बार्थेन केनचित् । सुमनोवर्णकापेता भवामि व्रतचारिणी ॥
yadā pravasate bhartā kuṭumbārthena kenacit | sumanovarṇakāpetā bhavāmi vratacāriṇī
जब पति किसी पारिवारिक कार्य से बाहर जाते हैं, तब मैं फूलों और अंगराग का त्याग करके व्रत का पालन करती हूँ।
श्लोक 33 (3.234.33)
यच्च भर्ता न पिबति यच्च भर्ता न सेवते । यच्च नाश्नाति मे भर्ता सर्वं तद्वर्जयाम्यहम् ॥
yacca bhartā na pibati yacca bhartā na sevate | yacca nāśnāti me bhartā sarvaṃ tadvarjayāmyaham
जो मेरे पति नहीं पीते, जिसका वे सेवन नहीं करते और जो वे नहीं खाते, उन सबका मैं त्याग कर देती हूँ।
श्लोक 34 (3.234.34)
यथोपदेशं नियता वर्तमाना वराङ्गने । स्वलंकृता सुप्रयता भर्तुः प्रियहिते रता ॥
yathopadeśaṃ niyatā vartamānā varāṅgane | svalaṃkṛtā suprayatā bhartuḥ priyahite ratā
हे सुन्दरी, मैं संयम से, जैसा सिखाया गया है वैसा आचरण करती हूँ; भली-भाँति सजी-सँवरी और सावधान रहकर पति के प्रिय और हित में लगी रहती हूँ।
श्लोक 35 (3.234.35)
ये च धर्माः कुटुम्बेषु श्वश्र्वामे कथिताः पुरा । अनुतिष्ठामि तान्सत्ये नित्यकालमतन्द्रिता ॥
ye ca dharmāḥ kuṭumbeṣu śvaśrvāme kathitāḥ purā | anutiṣṭhāmi tānsatye nityakālamatandritā
हे सत्ये, मेरी सास ने पहले मुझे परिवार के जो धर्म बताए थे, उनका मैं सदा बिना आलस्य के पालन करती हूँ —
श्लोक 36 (3.234.36)
भिक्षाबलिश्राद्धविधिस्थालीपाकाश्च पर्वसु । मान्यानां मानसत्कारा ये चान्ये विदिता मम ॥
bhikṣābaliśrāddhavidhisthālīpākāśca parvasu | mānyānāṃ mānasatkārā ye cānye viditā mama
भिक्षा देना, बलि, श्राद्ध की विधि, पर्वों पर स्थालीपाक, माननीय जनों का मान और सत्कार, तथा और भी जो कर्तव्य मुझे ज्ञात हैं —
श्लोक 37 (3.234.37)
तान्सर्वाननुवर्तामि दिवारात्रमतन्द्रिता । विनयान्नियमांश्चैव सदा सर्वात्मना श्रिता ॥
tānsarvānanuvartāmi divārātramatandritā | vinayānniyamāṃścaiva sadā sarvātmanā śritā
उन सबका मैं दिन-रात बिना थके पालन करती हूँ, और विनय तथा नियमों का सदा पूरे मन से आश्रय लेती हूँ।
श्लोक 38 (3.234.38)
मृदून्सतः सत्यशीलान्सत्यधर्मानुपालिनः । आशीविषानिव क्रुद्धान्पतीन्परिचराम्यहम् ॥
mṛdūnsataḥ satyaśīlānsatyadharmānupālinaḥ | āśīviṣāniva kruddhānpatīnparicarāmyaham
मेरे पति कोमल, सज्जन, सत्यशील और सत्य-धर्म का पालन करने वाले हैं, फिर भी मैं उनकी सेवा इतनी सावधानी से करती हूँ मानो वे क्रुद्ध विषधर सर्प हों।
श्लोक 39 (3.234.39)
पत्याश्रयो हि मे धर्मो मतः स्त्रीणां सनातनः । स देवः सा गतिर्नार्यास्तस्य काविप्रियं चरेत् ॥
patyāśrayo hi me dharmo mataḥ strīṇāṃ sanātanaḥ | sa devaḥ sā gatirnāryāstasya kāvipriyaṃ caret
क्योंकि मेरे मत में पति का आश्रय ही स्त्रियों का सनातन धर्म है। पति ही स्त्री का देवता है, वही उसकी गति है; कौन स्त्री उसका अप्रिय करेगी?
श्लोक 40 (3.234.40)
अहं पतीन्नातिशये नात्यश्ने नातिभूषये । नापि श्वश्रूं परिवदे सर्वदा परियन्त्रिता ॥
ahaṃ patīnnātiśaye nātyaśne nātibhūṣaye | nāpi śvaśrūṃ parivade sarvadā pariyantritā
मैं अपने पतियों से अधिक न सोती हूँ, न अधिक खाती हूँ, न उनसे अधिक शृंगार करती हूँ; न ही सास की निन्दा करती हूँ, और सदा संयम में रहती हूँ।
श्लोक 41 (3.234.41)
अवधानेन सुभगे नित्योत्थिततयैव च । भर्तारो वशगा मह्यं गुरुशुश्रूषयैव च ॥
avadhānena subhage nityotthitatayaiva ca | bhartāro vaśagā mahyaṃ guruśuśrūṣayaiva ca
हे सौभाग्यवती, सावधानी से, सदा तत्पर रहकर और गुरुजनों की सेवा करके ही मेरे पति मेरे वश में हैं।
श्लोक 42 (3.234.42)
नित्यमार्यामहं कुन्तीं वीरसूं सत्यवादिनीम् । स्वयं परिचराम्येतां पानाच्छादनभोजनैः ॥
nityamāryāmahaṃ kuntīṃ vīrasūṃ satyavādinīm | svayaṃ paricarāmyetāṃ pānācchādanabhojanaiḥ
मैं प्रतिदिन वीरमाता, सत्यवादिनी आर्या कुन्ती की स्वयं जल, वस्त्र और भोजन से सेवा करती हूँ।
श्लोक 43 (3.234.43)
नैतामतिशये जातु वस्त्रभूषणभोजनैः । न वदे चाप्यतिवाचा तां पृथां पृथिवीसमाम् ॥
naitāmatiśaye jātu vastrabhūṣaṇabhojanaiḥ | na vade cāpyativācā tāṃ pṛthāṃ pṛthivīsamām
वस्त्र, आभूषण और भोजन में मैं कभी उनसे बढ़कर नहीं रहती, और पृथ्वी के समान क्षमाशील उन पृथा से कभी बढ़-चढ़कर नहीं बोलती।
श्लोक 44 (3.234.44)
अष्टावग्रे ब्राह्मणानां सहस्राणि स्म नित्यदा । भुञ्जते रुक्मपात्रीषु युधिष्ठिरनिवेशने ॥
aṣṭāvagre brāhmaṇānāṃ sahasrāṇi sma nityadā | bhuñjate rukmapātrīṣu yudhiṣṭhiraniveśane
युधिष्ठिर के भवन में प्रतिदिन आठ हज़ार ब्राह्मण सोने की थालियों में भोजन करते थे।
श्लोक 45 (3.234.45)
अष्टाशीतिसहस्राणि स्नातका गृहमेधिनः । त्रिंशद्दासीक एकैको यान्विभर्ति युधिष्ठिरः ॥
aṣṭāśītisahasrāṇi snātakā gṛhamedhinaḥ | triṃśaddāsīka ekaiko yānvibharti yudhiṣṭhiraḥ
युधिष्ठिर अठासी हज़ार स्नातक गृहस्थों का भरण-पोषण करते थे, जिनमें से प्रत्येक के पास तीस दासियाँ थीं।
श्लोक 46 (3.234.46)
दशान्यानि सहस्राणि येषामन्नं सुसंस्कृतम् । ह्रियते रुक्मपात्रीभिर्यतीनामूर्ध्वरेतसाम् ॥
daśānyāni sahasrāṇi yeṣāmannaṃ susaṃskṛtam | hriyate rukmapātrībhiryatīnāmūrdhvaretasām
दस हज़ार अन्य ऊर्ध्वरेता यतियों के लिए भली-भाँति तैयार किया हुआ अन्न सोने की थालियों में पहुँचाया जाता था।
श्लोक 47 (3.234.47)
तान्सर्वानग्रहारेण ब्राह्मणान्वेदवादिनः । यथार्हं पूजयामि स्म पानाच्छादनभोजनैः ॥
tānsarvānagrahāreṇa brāhmaṇānvedavādinaḥ | yathārhaṃ pūjayāmi sma pānācchādanabhojanaiḥ
उन सभी वेदवादी ब्राह्मणों का मैं अन्न के अग्रभाग से तथा जल, वस्त्र और भोजन से यथायोग्य सत्कार करती थी।
श्लोक 48 (3.234.48)
शतं दासीसहस्राणि कौन्तेयस्य महात्मनः । कम्बुकेयूरधारिण्यो निष्ककण्ठ्यः स्वलंकृताः ॥
śataṃ dāsīsahasrāṇi kaunteyasya mahātmanaḥ | kambukeyūradhāriṇyo niṣkakaṇṭhyaḥ svalaṃkṛtāḥ
महात्मा कुन्तीपुत्र की एक लाख दासियाँ थीं, जो शंख के कंगन और बाजूबन्द पहनतीं, गले में स्वर्णहार धारण करतीं और भली-भाँति सजी रहती थीं;
श्लोक 49 (3.234.49)
महार्हमाल्याभरणाः सुवर्णाश्चन्दनोक्षिताः । मणीन्हेम च विभ्रत्यो नृत्तगीतविशारदाः ॥
mahārhamālyābharaṇāḥ suvarṇāścandanokṣitāḥ | maṇīnhema ca vibhratyo nṛttagītaviśāradāḥ
वे बहुमूल्य मालाएँ और आभूषण पहनतीं, सोने-सी गोरी, चन्दन से लिप्त, मणि और स्वर्ण धारण करने वाली तथा नृत्य और गीत में निपुण थीं।
श्लोक 50 (3.234.50)
तासां नाम च रूपंच भोजनाच्छादनानि च । सर्वासामेव वेदाहं कर्म चैव कृताकृतम् ॥
tāsāṃ nāma ca rūpaṃca bhojanācchādanāni ca | sarvāsāmeva vedāhaṃ karma caiva kṛtākṛtam
मैं उन सबके नाम और रूप, उनका भोजन और वस्त्र, तथा उनमें से प्रत्येक ने कौन-सा काम किया और कौन-सा नहीं — यह सब जानती थी।
श्लोक 51 (3.234.51)
शतं दासीसहस्राणि कुन्तीपुत्रस्य धीमतः । पात्रीहस्ता दिवारात्रमतिथीन्भोजयन्त्युत ॥
śataṃ dāsīsahasrāṇi kuntīputrasya dhīmataḥ | pātrīhastā divārātramatithīnbhojayantyuta
बुद्धिमान कुन्तीपुत्र की एक लाख दासियाँ हाथों में थालियाँ लिए दिन-रात अतिथियों को भोजन कराती थीं।
श्लोक 52 (3.234.52)
शतमश्वसहस्राणि दशनागायुतानि च । युधिष्ठिरस्यानुयात्रमिन्द्रप्रस्थनिवासिनः ॥
śatamaśvasahasrāṇi daśanāgāyutāni ca | yudhiṣṭhirasyānuyātramindraprasthanivāsinaḥ
जब युधिष्ठिर इन्द्रप्रस्थ में रहते थे, तब एक लाख घोड़े और दस अयुत (एक लाख) हाथी उनके साथ चलते थे।
श्लोक 53 (3.234.53)
एतदासीत्तदा राज्ञो यन्महीं पर्यपालयत् । येषां सङ्ख्याविधिं चैव प्रदिशामि शृणोमि च ॥
etadāsīttadā rājño yanmahīṃ paryapālayat | yeṣāṃ saṅkhyāvidhiṃ caiva pradiśāmi śṛṇomi ca
जब राजा पृथ्वी का पालन करते थे, तब उनका ऐसा ही वैभव था; और इन सबकी गिनती और व्यवस्था का निर्देश मैं ही देती थी और उनका हिसाब भी मैं ही सुनती थी।
श्लोक 54 (3.234.54)
अन्तःपुराणां सर्वेषां भृत्यानां चैव सर्वशः । आगोपालाविपालेभ्यः सर्वं वेद कृताकृतम् ॥
antaḥpurāṇāṃ sarveṣāṃ bhṛtyānāṃ caiva sarvaśaḥ | āgopālāvipālebhyaḥ sarvaṃ veda kṛtākṛtam
सारे अन्तःपुर और सभी सेवकों के — ग्वालों और गड़रियों तक के — सब किए और न किए कार्यों को मैं जानती थी।
श्लोक 55 (3.234.55)
सर्वं राज्ञः समुदयमायं च व्ययमेव च । एकाऽहंवेद्मि कल्याणि पाण्डवानां यशस्विनि ॥
sarvaṃ rājñaḥ samudayamāyaṃ ca vyayameva ca | ekā'haṃvedmi kalyāṇi pāṇḍavānāṃ yaśasvini
हे कल्याणी, हे यशस्विनी, पाण्डवों में राजा की समस्त आय, प्राप्ति और व्यय को केवल मैं ही जानती थी।
श्लोक 56 (3.234.56)
मयि सर्वं समासज्यकुटुम्बं भरतर्षभाः । उपासनरताः सर्वे घटयन्ति वरानने ॥
mayi sarvaṃ samāsajyakuṭumbaṃ bharatarṣabhāḥ | upāsanaratāḥ sarve ghaṭayanti varānane
हे सुमुखी, भरतश्रेष्ठ पाण्डव गृहस्थी का सारा भार मुझ पर डालकर उपासना में लगे रहते और अपने कार्यों में तत्पर रहते थे।
श्लोक 57 (3.234.57)
तमहं भारमासक्तमनाधृष्यं दुरात्मभिः । सुखं सर्वंपरित्यज्यरात्र्यहानि घटामि वै ॥
tamahaṃ bhāramāsaktamanādhṛṣyaṃ durātmabhiḥ | sukhaṃ sarvaṃparityajyarātryahāni ghaṭāmi vai
मुझ पर रखे गए उस भार को, जिसे दुष्ट-हृदय लोग कभी नहीं उठा सकते, मैं सारे सुख छोड़कर रात-दिन सँभालती थी।
श्लोक 58 (3.234.58)
अधृष्यं वरुणस्येव निधिपूर्णमिवोदधिम् । एकाहं वेद्मि कोशं वै पतीनां धर्मचारिणाम् ॥
adhṛṣyaṃ varuṇasyeva nidhipūrṇamivodadhim | ekāhaṃ vedmi kośaṃ vai patīnāṃ dharmacāriṇām
अपने धर्मात्मा पतियों के उस कोष को, जो वरुण के कोष के समान अजेय और निधियों से भरे समुद्र के समान था, केवल मैं ही जानती थी।
श्लोक 59 (3.234.59)
अनिशायां निशायां च विहाय क्षुत्पिपासयोः । आराधयन्त्याः कौरव्यांस्तुल्या रात्रिरहश्च मे ॥
aniśāyāṃ niśāyāṃ ca vihāya kṣutpipāsayoḥ | ārādhayantyāḥ kauravyāṃstulyā rātrirahaśca me
दिन हो या रात, भूख-प्यास भुलाकर कौरवनन्दन पाण्डवों की आराधना करते हुए मेरे लिए रात और दिन एक समान थे।
श्लोक 60 (3.234.60)
प्रथमं प्रतिबुध्यामि चरमं संविशामि च । नित्यकालमहं सत्ये एतत्संवननं मम ॥
prathamaṃ pratibudhyāmi caramaṃ saṃviśāmi ca | nityakālamahaṃ satye etatsaṃvananaṃ mama
हे सत्ये, मैं सदा सबसे पहले जागती हूँ और सबसे बाद में सोती हूँ। यही मेरा वशीकरण है।
श्लोक 61 (3.234.61)
एतज्जानाम्यहं कर्तुं भर्तृसंवननं महत् । असत्स्त्रीणां समाचारं नाहं कुर्यां न कामये ॥
etajjānāmyahaṃ kartuṃ bhartṛsaṃvananaṃ mahat | asatstrīṇāṃ samācāraṃ nāhaṃ kuryāṃ na kāmaye
पति को वश में करने का यही महान उपाय मैं करना जानती हूँ। दुष्ट स्त्रियों का आचरण न मैं करूँगी, न उसकी इच्छा रखती हूँ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 62 (3.234.62)
तच्छ्रुत्वा धर्मसहितं व्याहृतं कृष्णया तदा । उवाच सत्या सत्कृत्य पाञ्चालीं धर्मचारिणीम् ॥
tacchrutvā dharmasahitaṃ vyāhṛtaṃ kṛṣṇayā tadā | uvāca satyā satkṛtya pāñcālīṃ dharmacāriṇīm
कृष्णा (द्रौपदी) के कहे इन धर्मयुक्त वचनों को सुनकर सत्यभामा ने धर्मपरायणा पाञ्चाली का सत्कार करते हुए कहा —
सत्यभामोवाच
श्लोक 63 (3.234.63)
अभिपन्नाऽस्मि पाञ्चालि याज्ञसेनि क्षमस्व मे । कामकारः सखीनां हि सोपहासं प्रभाषितम् ॥
abhipannā'smi pāñcāli yājñaseni kṣamasva me | kāmakāraḥ sakhīnāṃ hi sopahāsaṃ prabhāṣitam
"हे पाञ्चाली, हे याज्ञसेनी, मैं तुमसे विनती करती हूँ — मुझे क्षमा करो। सखियों के बीच तो हँसी-हँसी में मनमानी बातें कह दी जाती हैं।"