आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 268
जयद्रथ का द्रौपदी से प्रणय-निवेदन
कोटिकाश्य द्रौपदी से हुई बातचीत जयद्रथ को सुनाता है। उस पर मोहित जयद्रथ यह जानकर कि वह पाण्डवों की रानी है, छह साथियों के साथ आश्रम में जाता है। द्रौपदी अतिथि मानकर उसका सत्कार करती है और प्रातराश देने को कहती है, पर वह उसे अपने वनवासी, श्रीहीन पतियों को छोड़कर अपनी पत्नी बनने को कहता है। द्रौपदी पतियों के लौटने तक समय टालती हुई उसे फटकारती है और याद दिलाती है कि दुःशला का पति होने के नाते उसे भाई की तरह उसकी रक्षा करनी चाहिए; वह उत्तर देता है कि राजा ऐसी स्त्रियों को भी इच्छानुसार ग्रहण कर लेते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.268.1)
तथाऽऽसीनेषु सर्वेषु तेषु राजसु भारत । कोटिकाश्यो जगामाशु सिन्धुराजनिवेशनम् ॥
tathā''sīneṣu sarveṣu teṣu rājasu bhārata | koṭikāśyo jagāmāśu sindhurājaniveśanam
हे भारत! जब वे सब राजा इस प्रकार बैठे हुए थे, तब कोटिकाश्य शीघ्र ही सिन्धुराज के डेरे पर गया
श्लोक 2 (3.268.2)
यदुक्तं कृष्णया सार्धं तत्सर्वं प्रत्यवेदयत् । कोटिकाश्यवचः श्रुत्वा शैब्यं सौवीरकोऽब्रवीत् ॥
yaduktaṃ kṛṣṇayā sārdhaṃ tatsarvaṃ pratyavedayat | koṭikāśyavacaḥ śrutvā śaibyaṃ sauvīrako'bravīt
और कृष्णा के साथ जो बातें हुई थीं, वे सब उसे कह सुनाईं। कोटिकाश्य की बात सुनकर सौवीरराज (जयद्रथ) ने शैब्य से कहा—
जयद्रथ उवाच
श्लोक 3 (3.268.3)
यदा वाचं व्याहरन्त्यामस्यां मे रमते मनः । सीमन्तिनीनां मुख्यायां विनिवृत्तः कथं भवान् ॥
yadā vācaṃ vyāharantyāmasyāṃ me ramate manaḥ | sīmantinīnāṃ mukhyāyāṃ vinivṛttaḥ kathaṃ bhavān
"जब मेरा मन बातें करती हुई इस स्त्री में, जो सब नारियों में श्रेष्ठ है, रम गया है, तब तुम उसके पास से (उसे लाए बिना) कैसे लौट आए?"
श्लोक 4 (3.268.4)
एतां दृष्ट्वा स्त्रियो मेऽन्या यथा शाखामृगस्त्रियः । प्रतिभान्ति महाबाहो सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥
etāṃ dṛṣṭvā striyo me'nyā yathā śākhāmṛgastriyaḥ | pratibhānti mahābāho satyametadbravīmi te
"हे महाबाहु! इसे देख लेने के बाद अन्य स्त्रियाँ मुझे बंदरियों-सी लगती हैं; मैं तुमसे सच कहता हूँ।"
श्लोक 5 (3.268.5)
दर्शनादेव हि मनस्तया मेऽपहृतं भृशम् । तां समाचक्ष्व कल्याणीं यदि स्याच्छैब्य मानुषी ॥
darśanādeva hi manastayā me'pahṛtaṃ bhṛśam | tāṃ samācakṣva kalyāṇīṃ yadi syācchaibya mānuṣī
"एक दृष्टि में ही उसने मेरा मन पूरी तरह हर लिया है। हे शैब्य! यदि वह मानवी है तो उस कल्याणी के विषय में मुझे बताओ।"
कोटिक उवाच
श्लोक 6 (3.268.6)
एषा वै द्रौपदी कृष्णा राजपुत्री यशस्विनी । पञ्चानां पाण्डुपुत्राणां महिषी संमता भृशम् ॥
eṣā vai draupadī kṛṣṇā rājaputrī yaśasvinī | pañcānāṃ pāṇḍuputrāṇāṃ mahiṣī saṃmatā bhṛśam
"यह यशस्विनी राजकुमारी कृष्णा द्रौपदी है, पाण्डु के पाँचों पुत्रों की अत्यन्त सम्मानित पटरानी।"
श्लोक 7 (3.268.7)
सर्वेषां चैव पार्थानां प्रिया बहुमता सती । तया समेत्य सौवीर सौवीराभिमुखो व्रज ॥
sarveṣāṃ caiva pārthānāṃ priyā bahumatā satī | tayā sametya sauvīra sauvīrābhimukho vraja
"वह सभी पार्थों की प्रिय, अत्यन्त मान्य और सती है। हे सौवीर! उससे मिल लिए, अब सौवीर देश की ओर लौट चलो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 8 (3.268.8)
एवमुक्तः प्रत्युवाच पश्यामि द्रौपदीमिति । पतिः सौवीरसिन्धूनां दुष्टभावो जयद्रथः ॥
evamuktaḥ pratyuvāca paśyāmi draupadīmiti | patiḥ sauvīrasindhūnāṃ duṣṭabhāvo jayadrathaḥ
ऐसा कहे जाने पर सौवीर और सिन्धु देशों के स्वामी, दुष्ट भाव वाले जयद्रथ ने उत्तर दिया—"मैं द्रौपदी को देखूँगा।"
श्लोक 9 (3.268.9)
स प्रविश्याश्रमं पुण्यं सिंहगोष्ठं वृको यथा । आत्मना सप्तमः कृष्णामिदं वचनमब्रवीत् ॥
sa praviśyāśramaṃ puṇyaṃ siṃhagoṣṭhaṃ vṛko yathā | ātmanā saptamaḥ kṛṣṇāmidaṃ vacanamabravīt
वह उस पवित्र आश्रम में ऐसे घुसा जैसे भेड़िया सिंह की माँद में घुसे, और छह साथियों के साथ, स्वयं सातवाँ होकर, उसने कृष्णा से यह वचन कहा—
जयद्रथ उवाच
श्लोक 10 (3.268.10)
कुशलं ते वरारोहे भर्तारस्तेऽप्यनामयाः । येषां कुशलकामासि तेऽपि कच्चिदनामयाः ॥
kuśalaṃ te varārohe bhartāraste'pyanāmayāḥ | yeṣāṃ kuśalakāmāsi te'pi kaccidanāmayāḥ
"हे सुन्दरी! तुम कुशल से तो हो? तुम्हारे पति भी स्वस्थ हैं? और जिनकी कुशल तुम चाहती हो, वे भी तो निरोग हैं?"
द्रौपद्युवाच
श्लोक 11 (3.268.11)
अपि ते कुशलं राजन्राष्ट्रे कोशे बले तथा । कच्चिदेकः शिबीनाढ्यान्सौवीरान्सह सिन्धुभिः । अनुतिष्ठसि धर्मेण ये चान्ये विदितास्त्वया ॥
api te kuśalaṃ rājanrāṣṭre kośe bale tathā | kaccidekaḥ śibīnāḍhyānsauvīrānsaha sindhubhiḥ | anutiṣṭhasi dharmeṇa ye cānye viditāstvayā
"हे राजन्! क्या तुम्हारे राष्ट्र, कोष और सेना में सब कुशल है? क्या तुम अकेले ही समृद्ध शिबियों, सिन्धुओं सहित सौवीरों तथा अपने अधीन अन्य प्रदेशों का धर्मपूर्वक पालन करते हो?"
श्लोक 12 (3.268.12)
कौरव्यः कुशली राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । अहं च भ्रातरश्चास्य यांश्चान्यान्परिपृच्छसि ॥
kauravyaḥ kuśalī rājā kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | ahaṃ ca bhrātaraścāsya yāṃścānyānparipṛcchasi
"कुरुवंशी राजा कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर कुशल से हैं; मैं, उनके भाई और जिन-जिनके विषय में तुम पूछ रहे हो, वे सब भी कुशल हैं।"
श्लोक 13 (3.268.13)
पाद्यं प्रतिगृहाणेदमासनं च नृपात्मज । मृगान्विता मृगीश्चैव प्रातराशं ददानि ते ॥
pādyaṃ pratigṛhāṇedamāsanaṃ ca nṛpātmaja | mṛgānvitā mṛgīścaiva prātarāśaṃ dadāni te
"हे राजकुमार! यह पाद्य और आसन ग्रहण करो। मैं तुम्हें प्रातःकाल के भोजन के लिए हिरन और हिरनियाँ भी दूँगी—"
श्लोक 14 (3.268.14)
ऐणेयान्पृषतान्न्यङ्कून्हरिणाञ्शरभाञ्शशान् । ऋक्षान्रुरूञ्शम्बरांश्च गवयांश्च मृगान्बहून् ॥
aiṇeyānpṛṣatānnyaṅkūnhariṇāñśarabhāñśaśān | ṛkṣānrurūñśambarāṃśca gavayāṃśca mṛgānbahūn
"ऐणेय मृग, चितकबरे पृषत, न्यङ्कु, हरिण, शरभ और खरगोश, रीछ, रुरु, साँभर, गवय और बहुत-से अन्य पशु,"
श्लोक 15 (3.268.15)
वराहान्महिषांश्चैव याश्चान्या मृगजातयः । प्रदास्यति स्वयं तुभ्यं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥
varāhānmahiṣāṃścaiva yāścānyā mṛgajātayaḥ | pradāsyati svayaṃ tubhyaṃ kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ
"सूअर, भैंसे तथा अन्य सभी जातियों के पशु—ये सब कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर स्वयं तुम्हें देंगे।"
जयद्रथ उवाच
श्लोक 16 (3.268.16)
कुशलं प्रातराशस्य सर्वं मे दित्सितं त्वया । एहि मे रथमारोह सुखमाप्नुहि केवलम् ॥
kuśalaṃ prātarāśasya sarvaṃ me ditsitaṃ tvayā | ehi me rathamāroha sukhamāpnuhi kevalam
"प्रातराश तो ठीक है; तुमने मुझे सब कुछ देना चाहा। आओ, मेरे रथ पर चढ़ो और केवल सुख भोगो।"
श्लोक 17 (3.268.17)
गतश्रीकान्हृतराज्यान्कृपणान्गतचेतसः । अरण्यवासिनः पार्थान्नानुरोद्धुं त्वमर्हसि ॥
gataśrīkānhṛtarājyānkṛpaṇāngatacetasaḥ | araṇyavāsinaḥ pārthānnānuroddhuṃ tvamarhasi
"श्रीहीन, राज्य से वंचित, दीन, उदास और वनवासी पार्थों का साथ तुम्हें नहीं निभाना चाहिए।"
श्लोक 18 (3.268.18)
नैव प्राज्ञा गतश्रीकं भर्तारमुपयुञ्जते । युञ्जानमनुयुञ्जीत न श्रियः संक्षये वसेत् ॥
naiva prājñā gataśrīkaṃ bhartāramupayuñjate | yuñjānamanuyuñjīta na śriyaḥ saṃkṣaye vaset
"बुद्धिमती स्त्रियाँ श्रीहीन पति का साथ नहीं निभातीं। स्त्री को समृद्ध पुरुष का साथ देना चाहिए, श्री के क्षीण हो जाने पर वहाँ नहीं रहना चाहिए।"
श्लोक 19 (3.268.19)
श्रिया विहीना राष्ट्राच्च विनष्टाः शाश्वतीः समाः । अलं ते पाण्डुपुत्राणां भक्त्या क्लेशमुपासितुम् ॥
śriyā vihīnā rāṣṭrācca vinaṣṭāḥ śāśvatīḥ samāḥ | alaṃ te pāṇḍuputrāṇāṃ bhaktyā kleśamupāsitum
"श्री और राज्य से हीन होकर वे अनन्त वर्षों के लिए नष्ट हो चुके हैं। पाण्डुपुत्रों की भक्ति में कष्ट उठाना अब बहुत हुआ!"
श्लोक 20 (3.268.20)
भार्या मे भव सुश्रोणि त्यजैनान्सुखमाप्नुहि । अखिलान्सिन्धुसौवीरानाप्नुहि त्वं मया सह ॥
bhāryā me bhava suśroṇi tyajainānsukhamāpnuhi | akhilānsindhusauvīrānāpnuhi tvaṃ mayā saha
"हे सुश्रोणि! मेरी पत्नी बनो, इन्हें छोड़ो और सुख पाओ। मेरे साथ समस्त सिन्धु और सौवीर देश प्राप्त करो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 21 (3.268.21)
इत्युक्ता सिन्धुराजेन वाक्यं हृदयकम्पनम् । कृष्णा तस्मादपाक्रामद्देशात्सभ्रुकुटीमुखी ॥
ityuktā sindhurājena vākyaṃ hṛdayakampanam | kṛṣṇā tasmādapākrāmaddeśātsabhrukuṭīmukhī
सिन्धुराज के ऐसे हृदय कँपा देने वाले वचन सुनकर कृष्णा भौंहें तानकर उस स्थान से पीछे हट गई।
श्लोक 22 (3.268.22)
अवमत्यास्य तद्वाक्यमाक्षिप्य च सुमध्यमा । मैवमित्यब्रवीत्कृष्णा लज्जस्वेति च सैन्धवम् ॥
avamatyāsya tadvākyamākṣipya ca sumadhyamā | maivamityabravītkṛṣṇā lajjasveti ca saindhavam
उसकी बात का तिरस्कार करके और उसे झिड़ककर सुन्दर कटि वाली कृष्णा ने सैन्धव से कहा—"ऐसा मत कहो! लज्जा करो!"
श्लोक 23 (3.268.23)
सा काङ्क्षमाणा भर्तृणामुपयातमनिन्दिता । विलम्बयामास परं वाक्यैर्वाक्यानि युञ्जती ॥
sā kāṅkṣamāṇā bhartṛṇāmupayātamaninditā | vilambayāmāsa paraṃ vākyairvākyāni yuñjatī
अपने पतियों के लौटने की प्रतीक्षा करती हुई वह निर्दोष स्त्री बातों का उत्तर बातों से देती हुई उसे बहुत देर तक टालती रही।
द्रौपद्युवाच
श्लोक 24 (3.268.24)
नैवं वद महाबाहो न्याय्यं त्वं न च मन्यसे । पाण्डूनां धार्तराष्ट्राणां स्वसा चैव कनीयसी ॥
naivaṃ vada mahābāho nyāyyaṃ tvaṃ na ca manyase | pāṇḍūnāṃ dhārtarāṣṭrāṇāṃ svasā caiva kanīyasī
"हे महाबाहु! ऐसा मत कहो; तुम उचित बात नहीं सोच रहे हो। पाण्डवों और धृतराष्ट्र-पुत्रों की छोटी बहन
श्लोक 25 (3.268.25)
दुश्शला नाम तस्यास्त्वं भर्ता राजकुलोद्वह । मम भ्राता च न्याय्येन त्वया रक्ष्या महारथ ॥
duśśalā nāma tasyāstvaṃ bhartā rājakulodvaha | mama bhrātā ca nyāyyena tvayā rakṣyā mahāratha
दुःशला है, और हे राजकुल के धुरन्धर, तुम उसके पति हो। इस नाते तुम न्याय से मेरे भाई हो, और हे महारथी, मेरी रक्षा करना तुम्हारा कर्तव्य है।
श्लोक 26 (3.268.26)
धर्मिष्ठानां कुले जातो न धर्मं त्वमवेक्षसे ॥
dharmiṣṭhānāṃ kule jāto na dharmaṃ tvamavekṣase
धर्मात्माओं के कुल में जन्म लेकर भी तुम धर्म की ओर नहीं देखते।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 27 (3.268.27)
इत्युक्तः सिन्धुराजोऽथ वाक्यमुत्तरमब्रवीत् ॥
ityuktaḥ sindhurājo'tha vākyamuttaramabravīt
ऐसा कहे जाने पर सिन्धुराज ने यह उत्तर दिया—
जयद्रथ उवाच
श्लोक 28 (3.268.28)
राज्ञां धर्मं न जानीषे स्त्रियो रत्नानि चैव हि । साधारणानि लोकेऽस्मिन्प्रवदन्ति मनीषिणः ॥
rājñāṃ dharmaṃ na jānīṣe striyo ratnāni caiva hi | sādhāraṇāni loke'sminpravadanti manīṣiṇaḥ
"तुम राजाओं का धर्म नहीं जानतीं। मनीषी कहते हैं कि इस लोक में स्त्रियाँ और रत्न सबके साझे होते हैं।"
श्लोक 29 (3.268.29)
स्वसा च स्वस्रिया चैव भ्रातृभार्या तथैव च । सुखं गृह्णन्ति राजानस्ताश्च तत्र नृपोद्भवाः ॥
svasā ca svasriyā caiva bhrātṛbhāryā tathaiva ca | sukhaṃ gṛhṇanti rājānastāśca tatra nṛpodbhavāḥ
"बहन, भानजी और भाई की पत्नी को भी राजा सुखपूर्वक ग्रहण कर लेते हैं, और वे स्त्रियाँ भी राजकुल में जन्मी होती हैं।"