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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 269

द्रौपदी की फटकार और उसका हरण

क्रोध से लाल हुई द्रौपदी जयद्रथ का तिरस्कार करती है और उसे चेताती है कि युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन और दोनों जुड़वाँ भाई उसका क्या हाल करेंगे। जयद्रथ अपने उच्च कुल की डींग मारकर उसे रथ पर चढ़ने का आदेश देता है; द्रौपदी उसे ऐसा धक्का देती है कि वह गिर पड़ता है, पर फिर पकड़ी जाने पर वह धौम्य के चरणों में प्रणाम करके रथ पर चढ़ जाती है। धौम्य जयद्रथ को पाण्डवों के प्रतिशोध की चेतावनी देकर सैनिकों के बीच पैदल उसके पीछे चल पड़ते हैं।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.269.1)

सरोषरागोपहतेन वल्गुना । सरागनेत्रेण नतोन्नतभ्रुवा । मुखेन विस्फूर्य सुवीरराष्ट्रपं । ततोऽब्रवीत्तं द्रुपदात्मजा पुनः ॥

saroṣarāgopahatena valgunā | sarāganetreṇa natonnatabhruvā | mukhena visphūrya suvīrarāṣṭrapaṃ | tato'bravīttaṃ drupadātmajā punaḥ

तब क्रोध की लाली से म्लान सुन्दर मुख, लाल आँखों और तनी हुई भौंहों वाली द्रुपदकुमारी ने सौवीरराज पर फुफकारते हुए फिर कहा—

द्रौपद्युवाच

श्लोक 2 (3.269.2)

यशस्विनस्तीक्ष्णविषान्महारथा- । नभिब्रुवन्मूढ न लज्जसे कथम् । महेन्द्रकल्पान्निरतान्स्वकर्मसु । स्थितान्समूहेष्वपि यक्षरक्षसाम् ॥

yaśasvinastīkṣṇaviṣānmahārathā- | nabhibruvanmūḍha na lajjase katham | mahendrakalpānniratānsvakarmasu | sthitānsamūheṣvapi yakṣarakṣasām

"अरे मूर्ख! उन यशस्वी, तीखे विष जैसे घातक, महेन्द्र के समान, अपने कर्मों में लगे रहने वाले और यक्ष-राक्षसों के झुण्डों के सामने भी अडिग रहने वाले महारथियों के विषय में ऐसा कहते तुम्हें लज्जा क्यों नहीं आती?"

श्लोक 3 (3.269.3)

न किंचिदार्याः प्रवदन्ति पापं । वनेचरं वा गृहमेधिनं वा । तपस्विनं संपरिपूर्णविद्यं । भजन्ति चैवं सुनराः सुवीर ॥

na kiṃcidāryāḥ pravadanti pāpaṃ | vanecaraṃ vā gṛhamedhinaṃ vā | tapasvinaṃ saṃparipūrṇavidyaṃ | bhajanti caivaṃ sunarāḥ suvīra

"हे सौवीर! श्रेष्ठ पुरुष किसी के विषय में बुरा नहीं कहते—चाहे वह वनवासी हो या गृहस्थ, या विद्या में पूर्ण तपस्वी; सज्जन ऐसे लोगों का आदर ही करते हैं।"

श्लोक 4 (3.269.4)

अहं तु मन्ये तव नास्ति कश्चि- । देतादृशे क्षत्रियसंनिवेशे । यस्त्वद्य पातालमुखे पतन्तं । पाणौ गृहीत्वा प्रतिसंहरेत ॥

ahaṃ tu manye tava nāsti kaści- | detādṛśe kṣatriyasaṃniveśe | yastvadya pātālamukhe patantaṃ | pāṇau gṛhītvā pratisaṃhareta

"मुझे लगता है, तुम्हारे इस क्षत्रिय-समूह में ऐसा कोई नहीं है जो आज पाताल के मुख में गिरते हुए तुम्हें हाथ पकड़कर खींच ले।"

श्लोक 5 (3.269.5)

नागं प्रभिन्नं गिरिकूटकल्प- । मुपत्यकां हैमवतीं चरन्तम् । दण्डीव यूथादपसेधसि त्वं । यो जेतुमाशंससि धर्मराजम् ॥

nāgaṃ prabhinnaṃ girikūṭakalpa- | mupatyakāṃ haimavatīṃ carantam | daṇḍīva yūthādapasedhasi tvaṃ | yo jetumāśaṃsasi dharmarājam

"जो तुम धर्मराज को जीतने की आशा करते हो, वह ऐसा है मानो कोई केवल डंडा लिए हिमालय की तराई में घूमते, पर्वत-शिखर जैसे विशाल, मदमत्त हाथी को उसके झुण्ड से हाँकना चाहे।"

श्लोक 6 (3.269.6)

बाल्यात्प्रसुप्तस्य महाबलस्य । सिंहस्य पक्ष्माणि मुखाल्लुनासि । पदा समाहत्य पलायमानः । क्रुद्धं यदा द्रक्ष्यसि भीमसेनम् ॥

bālyātprasuptasya mahābalasya | siṃhasya pakṣmāṇi mukhāllunāsi | padā samāhatya palāyamānaḥ | kruddhaṃ yadā drakṣyasi bhīmasenam

"मूर्खतावश तुम सोए हुए महाबली सिंह को पैर से मारकर उसके मुख के बाल नोच रहे हो; जब तुम भीमसेन को क्रुद्ध देखोगे, तब भागते फिरोगे।"

श्लोक 7 (3.269.7)

महाबलं घोरतरं प्रवृद्धं । जातं हरिं पर्वतकन्दरेषु । प्रसुप्तमुग्रं प्रपदेन हंसि । यः क्रुद्धमायोत्स्यसि जिष्णुमुग्रम् ॥

mahābalaṃ ghorataraṃ pravṛddhaṃ | jātaṃ hariṃ parvatakandareṣu | prasuptamugraṃ prapadena haṃsi | yaḥ kruddhamāyotsyasi jiṣṇumugram

"जो तुम क्रुद्ध, उग्र जिष्णु (अर्जुन) से युद्ध करोगे, वह ऐसा है जैसे तुम पर्वत की गुफाओं में जन्मे, बलवान्, भयंकर, पूर्ण विकसित और सोए हुए उग्र सिंह पर पैर के पंजे से प्रहार करो।"

श्लोक 8 (3.269.8)

कृष्णोरगौ तीक्ष्णमुखौ द्विजिह्वौ । मत्तः पदा क्रामसि पुच्छदेशे । यः पाण्डवाभ्यां पुरुषोत्तमाभ्यां । जघन्यजाभ्यां प्रयुयुत्ससे त्वम् ॥

kṛṣṇoragau tīkṣṇamukhau dvijihvau | mattaḥ padā krāmasi pucchadeśe | yaḥ pāṇḍavābhyāṃ puruṣottamābhyāṃ | jaghanyajābhyāṃ prayuyutsase tvam

"जो तुम पाण्डवों में सबसे छोटे उन दोनों पुरुषश्रेष्ठों से युद्ध करना चाहते हो, वह ऐसा है जैसे कोई मतवाला तीखे मुख और दो जीभों वाले दो काले नागों की पूँछ पर पैर रख दे।"

श्लोक 9 (3.269.9)

यथा च वेणुः कदली नलो वा । फलन्त्यभावाय न भूतयेऽऽत्मनः । तथैव मां तैः परिरक्ष्यमाणा- । मादास्यसे कर्कटकीव गर्भम् ॥

yathā ca veṇuḥ kadalī nalo vā | phalantyabhāvāya na bhūtaye''tmanaḥ | tathaiva māṃ taiḥ parirakṣyamāṇā- | mādāsyase karkaṭakīva garbham

"जैसे बाँस, केला और नरकट अपने विनाश के लिए ही फलते हैं, अपनी उन्नति के लिए नहीं, वैसे ही उनके द्वारा रक्षित मुझे तुम ऐसे ग्रहण करोगे जैसे केकड़ी (अपने ही नाश के लिए) गर्भ धारण करती है।"

जयद्रथ उवाच

श्लोक 10 (3.269.10)

जानामि कृष्णे विदितं ममैत- । द्यथाविधास्ते नरदेवपुत्राः । न त्वेवमेतेन विभीषणेन । शक्या वयं त्रासयितुं त्वयाऽद्य ॥

jānāmi kṛṣṇe viditaṃ mamaita- | dyathāvidhāste naradevaputrāḥ | na tvevametena vibhīṣaṇena | śakyā vayaṃ trāsayituṃ tvayā'dya

"हे कृष्णे! मैं जानता हूँ, मुझे भली-भाँति पता है कि वे राजपुत्र कैसे हैं। पर इस प्रकार डराकर तुम आज हमें भयभीत नहीं कर सकतीं।"

श्लोक 11 (3.269.11)

वयं पुनः सप्तदशेषु कृष्णे । कुलेषु सर्वेऽनवमेषु जाताः । षड्भ्यो गुणेभ्योऽभ्यधिका विहीना- । न्मन्यामहे द्रौपदि पाण्डुपुत्रान् ॥

vayaṃ punaḥ saptadaśeṣu kṛṣṇe | kuleṣu sarve'navameṣu jātāḥ | ṣaḍbhyo guṇebhyo'bhyadhikā vihīnā- | nmanyāmahe draupadi pāṇḍuputrān

"हे कृष्णे! हम सब तो सत्रह उत्तम कुलों में जन्मे हैं; हे द्रौपदी, छह गुणों में बढ़े-चढ़े हम पाण्डुपुत्रों को अपने से हीन मानते हैं।"

श्लोक 12 (3.269.12)

सा क्षिप्रमातिष्ठ गजं रथं वा । न वाक्यमात्रेण वयं हि शक्याः । आशंस वा त्वं कृपणं वदन्ती । सौवीरराजस्य पुनः प्रसादम् ॥

sā kṣipramātiṣṭha gajaṃ rathaṃ vā | na vākyamātreṇa vayaṃ hi śakyāḥ | āśaṃsa vā tvaṃ kṛpaṇaṃ vadantī | sauvīrarājasya punaḥ prasādam

"इसलिए शीघ्र हाथी या रथ पर चढ़ो; हम केवल बातों से रोके नहीं जा सकते। अथवा दीन वचन बोलकर आगे के लिए सौवीरराज की कृपा की याचना करो।"

द्रौपद्युवाच

श्लोक 13 (3.269.13)

महाबला किंत्विह दुर्बलेव । सौवीरराजस्य मताऽहमस्मि । नाहं प्रमाथादिह संप्रतीता । सौवीरराजं कृपणं वदेयम् ॥

mahābalā kiṃtviha durbaleva | sauvīrarājasya matā'hamasmi | nāhaṃ pramāthādiha saṃpratītā | sauvīrarājaṃ kṛpaṇaṃ vadeyam

"मैं महाबलवती हूँ, फिर भी सौवीरराज मुझे यहाँ दुर्बल-सी समझता है। अपने पर भरोसा रखने वाली मैं बलप्रयोग के भय से सौवीरराज से दीन वचन नहीं कहूँगी।"

श्लोक 14 (3.269.14)

यस्या हि कृष्णौ पदवीं चरेतां । समास्थितावेकरथे समेतौ । इन्द्रोऽपि तां नापहरेत्कथंचि- । न्मनुष्यमात्रः कृपणः कुतोऽन्यः ॥

yasyā hi kṛṣṇau padavīṃ caretāṃ | samāsthitāvekarathe sametau | indro'pi tāṃ nāpaharetkathaṃci- | nmanuṣyamātraḥ kṛpaṇaḥ kuto'nyaḥ

"जिसके पीछे दोनों कृष्ण (श्रीकृष्ण और अर्जुन) एक ही रथ पर साथ बैठकर चलेंगे, उसे इन्द्र भी किसी प्रकार नहीं हर सकता; फिर कोई दीन मनुष्य तो कैसे हरेगा?"

श्लोक 15 (3.269.15)

यथा किरीटी परवीरघाती । निघ्नन्रथस्थो द्विषतां मनांसि । मदन्तरे त्वद्ध्वजिनीं प्रवेष्टा । कक्षं दहन्नग्निरिवोष्णगेषु ॥

yathā kirīṭī paravīraghātī | nighnanrathastho dviṣatāṃ manāṃsi | madantare tvaddhvajinīṃ praveṣṭā | kakṣaṃ dahannagnirivoṣṇageṣu

"जब शत्रुवीरों का संहार करने वाले किरीटी रथ पर खड़े होकर शत्रुओं के हृदयों को बेधते हुए मेरे लिए तुम्हारी सेना में ऐसे घुसेंगे जैसे ग्रीष्म में आग सूखे घास-फूस को जलाती है,"

श्लोक 16 (3.269.16)

जनार्दनः सान्धकवृष्णिवीरो । महेष्वासाः केकयाश्चापि सर्वे । एते हि सर्वे मम राजपुत्राः । प्रहृष्टरूपाः पदवीं चरेयुः ॥

janārdanaḥ sāndhakavṛṣṇivīro | maheṣvāsāḥ kekayāścāpi sarve | ete hi sarve mama rājaputrāḥ | prahṛṣṭarūpāḥ padavīṃ careyuḥ

"तब अन्धक और वृष्णि वीरों सहित जनार्दन तथा सभी महाधनुर्धर केकय—ये सभी राजपुत्र प्रसन्न होकर मेरे मार्ग पर चलेंगे।"

श्लोक 17 (3.269.17)

मौर्वीविसृष्टाः स्तनयित्नुघोषा । गाण्डीवमुक्तास्त्वतिवेगवन्तः । हस्तं समाहत्य धनंजयस्य । भीमाः शब्दं घोरतरं नदन्ति ॥

maurvīvisṛṣṭāḥ stanayitnughoṣā | gāṇḍīvamuktāstvativegavantaḥ | hastaṃ samāhatya dhanaṃjayasya | bhīmāḥ śabdaṃ ghorataraṃ nadanti

"धनंजय के हाथ से टकराती प्रत्यंचा से छूटे, मेघ-गर्जना जैसी ध्वनि वाले, गाण्डीव से निकले अत्यन्त वेगवान् भयंकर बाण घोर शब्द करते हैं।"

श्लोक 18 (3.269.18)

गाण्डीवमुक्तांश्च महाशरौघान् । पतङ्गसङ्घानिव शीघ्रवेगान् । यदा द्रष्टास्यर्जुनं वीर्यशालिनं । तदा स्वबुद्धिं प्रतिनिन्दितासि ॥

gāṇḍīvamuktāṃśca mahāśaraughān | pataṅgasaṅghāniva śīghravegān | yadā draṣṭāsyarjunaṃ vīryaśālinaṃ | tadā svabuddhiṃ pratininditāsi

"जब तुम पराक्रमी अर्जुन को गाण्डीव से छूटते, टिड्डी-दलों जैसे शीघ्रगामी बाणों के महान् समूहों के साथ देखोगे, तब अपनी बुद्धि को कोसोगे।"

श्लोक 19 (3.269.19)

सशङ्खघोषः सतलत्रघोषो । गाण्डीवधन्वा मुहुरुद्वहंश्च । यदा शरानर्पयिता तवोरसि । तदा मनस्ते किमिवाभविष्यत् ॥

saśaṅkhaghoṣaḥ satalatraghoṣo | gāṇḍīvadhanvā muhurudvahaṃśca | yadā śarānarpayitā tavorasi | tadā manaste kimivābhaviṣyat

"जब शंखनाद और तलत्राण की ध्वनि के साथ गाण्डीवधारी बार-बार धनुष उठाकर तुम्हारी छाती में बाण गाड़ेंगे, तब तुम्हारे मन की क्या दशा होगी?"

श्लोक 20 (3.269.20)

गदाहस्तं भीममभिद्रवन्तं । माद्रीपुत्रौ संपतन्तौ दिशश्च । अमर्षजं क्रोधविषं वमन्तौ । दृष्ट्वा चिरं तापमुपैष्यसेऽधम ॥

gadāhastaṃ bhīmamabhidravantaṃ | mādrīputrau saṃpatantau diśaśca | amarṣajaṃ krodhaviṣaṃ vamantau | dṛṣṭvā ciraṃ tāpamupaiṣyase'dhama

"हे अधम! जब तुम गदा हाथ में लिए दौड़ते भीम को और चारों ओर से टूट पड़ते, असहिष्णुता से उपजे क्रोध-रूपी विष को उगलते माद्री के दोनों पुत्रों को देखोगे, तब बहुत समय तक पछताओगे।"

श्लोक 21 (3.269.21)

यथा वाऽहं नातिचरे कथंचि- । त्पतीन्महार्हान्मनसाऽपि जातु । तेनाद्य सत्येन वशीकृतं त्वां । द्रष्टास्मि पार्थैः परिकृष्यमाणम् ॥

yathā vā'haṃ nāticare kathaṃci- | tpatīnmahārhānmanasā'pi jātu | tenādya satyena vaśīkṛtaṃ tvāṃ | draṣṭāsmi pārthaiḥ parikṛṣyamāṇam

"जिस प्रकार मैंने अपने महान् पतियों का कभी मन से भी अतिक्रमण नहीं किया, उसी सत्य के बल से मैं आज तुम्हें पार्थों के वश में पड़ा और घसीटा जाता देखूँगी।"

श्लोक 22 (3.269.22)

न संभ्रमं गन्तुमहं हि शक्ष्ये । त्वया नृशंसेन विकृष्यमाणा । समागताऽहं हि कुरुप्रवीरैः । पुनर्वनं काम्यकमागताऽस्मि ॥

na saṃbhramaṃ gantumahaṃ hi śakṣye | tvayā nṛśaṃsena vikṛṣyamāṇā | samāgatā'haṃ hi kurupravīraiḥ | punarvanaṃ kāmyakamāgatā'smi

"हे क्रूर! तुम मुझे घसीटो, फिर भी मैं घबराऊँगी नहीं। मैं कुरुवीरों से मिलकर फिर से काम्यक वन में लौट आऊँगी।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 23 (3.269.23)

इत्येवमुक्तस्तु स सिन्धुनाथ- । स्तां द्रौपदीमाह विशालनेत्राम् । आरुह्यतामाशु रथं मदीयं । मा त्वां बलाद्द्रौपदि कर्षयेऽहम् ॥

ityevamuktastu sa sindhunātha- | stāṃ draupadīmāha viśālanetrām | āruhyatāmāśu rathaṃ madīyaṃ | mā tvāṃ balāddraupadi karṣaye'ham

ऐसा कहे जाने पर सिन्धुपति ने विशाल नेत्रों वाली द्रौपदी से कहा—"हे द्रौपदी! शीघ्र मेरे रथ पर चढ़ो, ताकि मुझे तुम्हें बलपूर्वक न खींचना पड़े।"

श्लोक 24 (3.269.24)

सा ताननुप्रेक्ष्य विशालनेत्रा । जिघृक्षमाणानवभर्त्सयन्ती । प्रोवाच मा मा स्पृशतेति भीता । धौम्यं प्रचुक्रोश पुरोहितं सा ॥

sā tānanuprekṣya viśālanetrā | jighṛkṣamāṇānavabhartsayantī | provāca mā mā spṛśateti bhītā | dhaumyaṃ pracukrośa purohitaṃ sā

उसे पकड़ने को उद्यत उन लोगों को देखकर विशाल नेत्रों वाली द्रौपदी ने उन्हें फटकारा और भयभीत होकर कहा—"मुझे मत छुओ, मत छुओ!" और पुरोहित धौम्य को पुकारा।

श्लोक 25 (3.269.25)

जग्राह तामुत्तरवस्त्रदेशे । जयद्रथस्तं समवाक्षिपत्सा । तया समाक्षिप्ततनुः स पापः । पपात शाखीव निकृत्तमूलः ॥

jagrāha tāmuttaravastradeśe | jayadrathastaṃ samavākṣipatsā | tayā samākṣiptatanuḥ sa pāpaḥ | papāta śākhīva nikṛttamūlaḥ

जयद्रथ ने उसका उत्तरीय वस्त्र पकड़ लिया, पर उसने उसे झटक दिया; उसके धक्के से वह पापी जड़ से कटे वृक्ष की भाँति गिर पड़ा।

श्लोक 26 (3.269.26)

प्रगृह्यमाणा तु महाजवेन । मुहुर्विनिःश्वस्य च राजपुत्री । सा मृष्यमाणा रथमारुरोह । धौम्यस्य पादावभिवाद्य कृष्णा ॥

pragṛhyamāṇā tu mahājavena | muhurviniḥśvasya ca rājaputrī | sā mṛṣyamāṇā rathamāruroha | dhaumyasya pādāvabhivādya kṛṣṇā

किन्तु बड़े वेग से फिर पकड़ी जाने पर राजकुमारी कृष्णा बार-बार लम्बी साँसें लेती हुई, उसे सहती हुई, धौम्य के चरणों में प्रणाम करके रथ पर चढ़ गई।

धौम्य उवाच

श्लोक 27 (3.269.27)

नेयं शक्या त्वया नेतुमविजित्य महारथान् । धर्मं क्षत्रस्य पौराणमवेक्षस्व जयद्रथ ॥

neyaṃ śakyā tvayā netumavijitya mahārathān | dharmaṃ kṣatrasya paurāṇamavekṣasva jayadratha

"हे जयद्रथ! उन महारथियों को जीते बिना तुम इसे नहीं ले जा सकते। क्षत्रियों के सनातन धर्म का विचार करो।"

श्लोक 28 (3.269.28)

क्षुद्रं कृत्वा फलं पापं त्वं प्राप्स्यसि न संशयः । आसाद्य पाण्डवान्वीरान्धर्मराजपुरोगमान् ॥

kṣudraṃ kṛtvā phalaṃ pāpaṃ tvaṃ prāpsyasi na saṃśayaḥ | āsādya pāṇḍavānvīrāndharmarājapurogamān

"यह नीच कर्म करके, धर्मराज के नेतृत्व वाले वीर पाण्डवों से भिड़ने पर तुम निःसन्देह इसका पापमय फल पाओगे।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 29 (3.269.29)

इत्युक्त्वा ह्रियमाणां तां राजपुत्रीं यशस्विनीम् । अन्वगच्छत्तदा धौम्यः पदातिगणमध्यगः ॥

ityuktvā hriyamāṇāṃ tāṃ rājaputrīṃ yaśasvinīm | anvagacchattadā dhaumyaḥ padātigaṇamadhyagaḥ

ऐसा कहकर धौम्य हरी जा रही उस यशस्विनी राजकुमारी के पीछे-पीछे पैदल सैनिकों के बीच चलते हुए गए।

अध्याय 268अध्याय-सूचीअध्याय 270