Skip to main content

आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 270

पाण्डवों का लौटना और पीछा

शिकार से लौटते समय युधिष्ठिर पशु-पक्षियों की बोली और बायीं ओर चिल्लाते सियार में अपशकुन देखते हैं, और भाई शीघ्र लौट पड़ते हैं। आश्रम में उन्हें द्रौपदी की दासी रोती हुई मिलती है; वह सारथि इन्द्रसेन को बताती है कि जयद्रथ द्रौपदी को हर ले गया है और पाण्डवों से आग्रह करती है कि उसके अपवित्र होने से पहले पीछा करें। युधिष्ठिर उसके कठोर वचनों को रोकते हैं, और भाई पहियों के निशानों पर चलकर सेना तक पहुँचते हैं, पैदल सैनिकों के बीच धौम्य को देखते हैं, और जयद्रथ के रथ पर द्रौपदी को देखकर गर्जना करते हुए सेना पर टूट पड़ते हैं।

अध्याय 269अध्याय-सूचीअध्याय 271

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.270.1)

ततो दिशः संपरिवृत्य पार्था । मृगान्वराहान्महिषांश्च हत्वा । धनुर्धराः श्रेष्ठतमाः पृथिव्यां । पृथक्चरन्तः सहिता बभूवुः ॥

tato diśaḥ saṃparivṛtya pārthā | mṛgānvarāhānmahiṣāṃśca hatvā | dhanurdharāḥ śreṣṭhatamāḥ pṛthivyāṃ | pṛthakcarantaḥ sahitā babhūvuḥ

तब पृथ्वी के श्रेष्ठतम धनुर्धर पार्थ अलग-अलग दिशाओं में घूमकर और हिरन, सूअर तथा भैंसों का शिकार करके फिर एकत्र हुए।

श्लोक 2 (3.270.2)

ततो मृगव्यालजनानुकीर्णं । महावनं तद्विहगोपघुष्टम् । भ्रातॄंश्च तानभ्यवदद्युधिष्ठिरः । श्रुत्वा गिरो व्याहरतां मृगाणाम् ॥

tato mṛgavyālajanānukīrṇaṃ | mahāvanaṃ tadvihagopaghuṣṭam | bhrātṝṃśca tānabhyavadadyudhiṣṭhiraḥ | śrutvā giro vyāharatāṃ mṛgāṇām

तब मृगों और हिंस्र जीवों से भरे तथा पक्षियों के कलरव से गूँजते उस महावन में जीवों की बोली सुनकर युधिष्ठिर ने अपने भाइयों से कहा—

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 3 (3.270.3)

आदित्यदीप्तां दिशमभ्युपेत्य । मृगा द्विजाः क्रूरमिमे वदन्ति । आयासमुग्रं प्रतिवेदयन्तो । महाभयं शत्रुभिर्वाऽवमानम् ॥

ādityadīptāṃ diśamabhyupetya | mṛgā dvijāḥ krūramime vadanti | āyāsamugraṃ prativedayanto | mahābhayaṃ śatrubhirvā'vamānam

"सूर्य से प्रदीप्त दिशा की ओर मुख करके ये पशु-पक्षी कठोर स्वर में बोल रहे हैं, मानो किसी घोर संकट, महान् भय या शत्रुओं द्वारा किए गए अपमान की सूचना दे रहे हों।"

श्लोक 4 (3.270.4)

क्षिप्रं निवर्तध्वमलं मृगैर्नो । मनो हि मे दूयति दह्यते च । बुद्धिं समाच्छाद्य च मे समन्यु- । रुद्धूयते प्राणपतिः शरीरे ॥

kṣipraṃ nivartadhvamalaṃ mṛgairno | mano hi me dūyati dahyate ca | buddhiṃ samācchādya ca me samanyu- | ruddhūyate prāṇapatiḥ śarīre

"शीघ्र लौट चलो, अब शिकार बहुत हुआ! मेरा मन दुःखी है और जल रहा है; शोक से भरा मेरा प्राण बुद्धि को ढककर शरीर में व्याकुल हो रहा है।"

श्लोक 5 (3.270.5)

सरः सुपर्णेन हृतोरगेन्द्र- । मराजकं राष्ट्रमिवेह शान्तम् । एवंविधं मे प्रतिभाति काम्यकं । शौण्डैर्यथा पीतसुरश्च कुम्भः ॥

saraḥ suparṇena hṛtoragendra- | marājakaṃ rāṣṭramiveha śāntam | evaṃvidhaṃ me pratibhāti kāmyakaṃ | śauṇḍairyathā pītasuraśca kumbhaḥ

"जैसे वह सरोवर जिसके नागराज को गरुड़ उठा ले गया हो, जैसे राजा से रहित सूना पड़ा राज्य, और जैसे मद्यपों द्वारा खाली किया गया मदिरा का घड़ा—वैसा ही यह काम्यक वन मुझे लग रहा है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 6 (3.270.6)

ते सैन्धवैरग्न्यनिलोग्रवेगै- । र्महाजवैर्वाजिभिरुह्यमानाः । युक्तैर्बृहद्भिः सुरथैर्नृवीरा- । स्तदाश्रमायाभिमुखा बभूवुः ॥

te saindhavairagnyanilogravegai- | rmahājavairvājibhiruhyamānāḥ | yuktairbṛhadbhiḥ surathairnṛvīrā- | stadāśramāyābhimukhā babhūvuḥ

वे नरवीर अग्नि और वायु के समान प्रचण्ड वेग वाले, बड़े वेगवान् सिन्धुदेशी घोड़ों से जुते विशाल सुन्दर रथों पर सवार होकर आश्रम की ओर चल पड़े।

श्लोक 7 (3.270.7)

तेषां तु गोमायुरनल्पघोषो । निवर्ततां वाममुपेत्य पार्श्वम् । प्रव्याहरत्तत्प्रविमृश्य राजा । प्रोवाच भीमं च धनंजयं च ॥

teṣāṃ tu gomāyuranalpaghoṣo | nivartatāṃ vāmamupetya pārśvam | pravyāharattatpravimṛśya rājā | provāca bhīmaṃ ca dhanaṃjayaṃ ca

उनके लौटते समय एक सियार उनकी बायीं ओर आकर ज़ोर से चिल्लाया। उस पर विचार करके राजा ने भीम और धनंजय से कहा—

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 8 (3.270.8)

यथा वदत्येष विहीनयोनिः । सालावृको वाममुपेत्य पार्श्वम् । सुव्यक्तमस्मानवमत्य पापैः । कृतोऽभिमर्दः कुरुभिः प्रसह्य ॥

yathā vadatyeṣa vihīnayoniḥ | sālāvṛko vāmamupetya pārśvam | suvyaktamasmānavamatya pāpaiḥ | kṛto'bhimardaḥ kurubhiḥ prasahya

"जिस प्रकार यह नीच योनि का सियार हमारी बायीं ओर आकर बोल रहा है, उससे स्पष्ट है कि पापी कौरवों ने हमारा तिरस्कार करके बलपूर्वक कोई आक्रमण किया है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 9 (3.270.9)

एत्याथ ते तद्वनमाविशन्तो । महत्यरण्ये मृगयां चरित्वा । बालामपश्यन्त तदा रुदन्तीं । धात्रेयिकां प्रेष्यवधूं प्रियायाः ॥

etyātha te tadvanamāviśanto | mahatyaraṇye mṛgayāṃ caritvā | bālāmapaśyanta tadā rudantīṃ | dhātreyikāṃ preṣyavadhūṃ priyāyāḥ

विशाल वन में शिकार करके वे लौटे और उस वन में प्रवेश करते ही उन्होंने अपनी प्रिया की धाय की बेटी, उसकी दासी, उस बाला को रोते हुए देखा।

श्लोक 10 (3.270.10)

तामिन्द्रसेनस्त्वरितोऽभिसृत्य । रथादवप्लुत्य ततोऽभ्यधावत् । प्रोवाच चैनां वचनं नरेन्द्र । धात्रेयिकामार्ततरस्तदानीम् ॥

tāmindrasenastvarito'bhisṛtya | rathādavaplutya tato'bhyadhāvat | provāca caināṃ vacanaṃ narendra | dhātreyikāmārtatarastadānīm

हे राजन्! इन्द्रसेन तुरंत रथ से कूदकर उसकी ओर दौड़ा और अत्यन्त व्याकुल होकर उस दासी से यह वचन बोला—

इन्द्रसेन उवाच

श्लोक 11 (3.270.11)

किं रोदिषि त्वं पतिता धरण्यां । किं ते मुखं शुष्यति दीनवर्णम् । कच्चिन्न पापैः सुनृशंसकृद्भिः । प्रमाथिता द्रौपदी राजपुत्री । गतेष्वरण्यं हि सुतेषु पाण्डोः । कच्चित्परैर्नापकृतं वनेऽस्मिन् ॥

kiṃ rodiṣi tvaṃ patitā dharaṇyāṃ | kiṃ te mukhaṃ śuṣyati dīnavarṇam | kaccinna pāpaiḥ sunṛśaṃsakṛdbhiḥ | pramāthitā draupadī rājaputrī | gateṣvaraṇyaṃ hi suteṣu pāṇḍoḥ | kaccitparairnāpakṛtaṃ vane'smin

"तुम धरती पर गिरकर क्यों रो रही हो? तुम्हारा मुख सूखा और उदास क्यों है? कहीं क्रूर कर्म करने वाले पापियों ने राजकुमारी द्रौपदी का हरण तो नहीं कर लिया? पाण्डुपुत्रों के वन में चले जाने पर कहीं इस वन में शत्रुओं ने कोई अनिष्ट तो नहीं किया?"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 12 (3.270.12)

पर्याकुला साधु समीक्ष्य सूत- । मभ्यापतन्तं द्रुतमिन्द्रसेनम् । उरो घ्नती कष्टतरं तदानी- । मुच्चैः प्रचुक्रोश हृतेति देवी ॥

paryākulā sādhu samīkṣya sūta- | mabhyāpatantaṃ drutamindrasenam | uro ghnatī kaṣṭataraṃ tadānī- | muccaiḥ pracukrośa hṛteti devī

व्याकुल दासी ने दौड़कर आते हुए सारथि इन्द्रसेन को ध्यान से देखा और अत्यन्त दुःख से छाती पीटती हुई ज़ोर से चिल्लाई—"महारानी का हरण हो गया!"

इन्द्रसेन उवाच

श्लोक 13 (3.270.13)

अनिन्द्यरूपा तु विशालनेत्रा । शरीरतुल्या कुरुपुङ्गवानाम् । केनात्मनाशाय यदापनीता । छिद्रं समासाद्य नरेन्द्रपत्नी ॥

anindyarūpā tu viśālanetrā | śarīratulyā kurupuṅgavānām | kenātmanāśāya yadāpanītā | chidraṃ samāsādya narendrapatnī

"अनिन्द्य रूप वाली, विशाल नेत्रों वाली, कुरुश्रेष्ठों को अपने शरीर के समान प्रिय उस राजरानी को किसने अवसर पाकर अपने ही विनाश के लिए हर लिया है?"

श्लोक 14 (3.270.14)

यद्येव देवी पृथिवीं प्रविष्टा । दिवं प्रपन्नाऽप्यथवा समुद्रम् । तस्या गमिष्यन्ति पदे हि पार्था- । स्तथा हि संतप्यति धर्मराजः ॥

yadyeva devī pṛthivīṃ praviṣṭā | divaṃ prapannā'pyathavā samudram | tasyā gamiṣyanti pade hi pārthā- | stathā hi saṃtapyati dharmarājaḥ

"यदि महारानी धरती में समा गई हों, स्वर्ग चली गई हों या समुद्र में, तो भी पार्थ उनके पद-चिह्नों पर जाएँगे, क्योंकि धर्मराज इतने संतप्त हैं।"

श्लोक 15 (3.270.15)

को हीदृशानामरिमर्दनानां । क्लेशक्षमाणामपराजितानाम् । प्राणैः समामिष्टतमां जिहीर्षे- । दनुत्तमं रत्नमिव प्रमूढः ॥

ko hīdṛśānāmarimardanānāṃ | kleśakṣamāṇāmaparājitānām | prāṇaiḥ samāmiṣṭatamāṃ jihīrṣe- | danuttamaṃ ratnamiva pramūḍhaḥ

"ऐसे शत्रुमर्दन, कष्टसहिष्णु और अपराजित वीरों की प्राणों के समान प्रियतमा को अनुपम रत्न की भाँति हरने की चेष्टा कौन मूर्ख करेगा?"

श्लोक 16 (3.270.16)

न बुध्यते नाथवतीमिहाद्य । बहिश्चरं हृदयं पाण्डवानाम् । कस्याद्य कायं प्रतिभिद्य घोरा । महीं प्रवेक्ष्यन्ति शिताः शराग्र्याः ॥

na budhyate nāthavatīmihādya | bahiścaraṃ hṛdayaṃ pāṇḍavānām | kasyādya kāyaṃ pratibhidya ghorā | mahīṃ pravekṣyanti śitāḥ śarāgryāḥ

"वह नहीं समझता कि यहाँ उसके रक्षक हैं—वह तो पाण्डवों का शरीर से बाहर विचरता हृदय है। आज किसके शरीर को भेदकर ये भयंकर, तीखे, उत्तम बाण धरती में धँसेंगे?"

श्लोक 17 (3.270.17)

मा त्वं शुचस्तां प्रति भीरु विद्धि । यथाऽद्य कृष्णा पुनरेष्यतीति । निहत्य सर्वान्द्विषतः समग्रा- । न्पार्थाः समेष्यन्त्यथ याज्ञसेन्या ॥

mā tvaṃ śucastāṃ prati bhīru viddhi | yathā'dya kṛṣṇā punareṣyatīti | nihatya sarvāndviṣataḥ samagrā- | npārthāḥ sameṣyantyatha yājñasenyā

"हे भीरु! उनके लिए शोक मत करो; जान लो कि कृष्णा आज ही लौट आएँगी। सब शत्रुओं को पूरी तरह मारकर पार्थ फिर याज्ञसेनी से मिलेंगे।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 18 (3.270.18)

अथाब्रवीच्चारुमुखं प्रमृज्य । धात्रेयिका सारथिमिन्द्रसेनम् । जयद्रथेनापहृता प्रमथ्य । पञ्चेन्द्रकल्पान्परिभूय कृष्णा ॥

athābravīccārumukhaṃ pramṛjya | dhātreyikā sārathimindrasenam | jayadrathenāpahṛtā pramathya | pañcendrakalpānparibhūya kṛṣṇā

तब दासी ने अपना सुन्दर मुख पोंछकर सारथि इन्द्रसेन से कहा—"इन्द्र के समान पाँचों वीरों का तिरस्कार करके जयद्रथ कृष्णा को बलपूर्वक हर ले गया है।

धात्रेयिकोवाच

श्लोक 19 (3.270.19)

तिष्ठन्ति वर्त्मानि नवान्यमूनि । वृक्षाश्च न म्लान्ति तथैव भग्नाः । आवर्तयध्वं ह्यनुयात शीघ्रं । न दूरयातैव हि राजपुत्री ॥

tiṣṭhanti vartmāni navānyamūni | vṛkṣāśca na mlānti tathaiva bhagnāḥ | āvartayadhvaṃ hyanuyāta śīghraṃ | na dūrayātaiva hi rājaputrī

"ये पहियों के निशान अभी नए हैं, और टूटे हुए पेड़ अभी मुरझाए नहीं हैं। रथ मोड़ो और शीघ्र पीछा करो; राजकुमारी अभी दूर नहीं गई होंगी।"

श्लोक 20 (3.270.20)

सन्नह्यध्वं सर्व एवेन्द्रकल्पा । महान्ति चारूणि च दंशनानि । गृह्णीत चापानि महाधनानि । शरांश्च शीघ्रं पदवीं व्रजध्वम् ॥

sannahyadhvaṃ sarva evendrakalpā | mahānti cārūṇi ca daṃśanāni | gṛhṇīta cāpāni mahādhanāni | śarāṃśca śīghraṃ padavīṃ vrajadhvam

"हे इन्द्र के समान वीरो! तुम सब अपने विशाल और सुन्दर कवच पहन लो, बहुमूल्य धनुष और बाण उठाओ और शीघ्र उसके मार्ग पर चलो।"

श्लोक 21 (3.270.21)

पुरा हि निर्भर्त्सनदण्डमोहिता । प्रमूढचित्ता वदनेन शुष्यता । ददाति कस्मैचिदनर्हते तनुं । वराज्यपूर्णामिव भस्मनि स्रुचम् ॥

purā hi nirbhartsanadaṇḍamohitā | pramūḍhacittā vadanena śuṣyatā | dadāti kasmaicidanarhate tanuṃ | varājyapūrṇāmiva bhasmani srucam

"शीघ्रता करो, इससे पहले कि धमकियों और दण्ड से घबराई, व्याकुल चित्त और सूखते मुख वाली वह किसी अयोग्य को अपना शरीर सौंप दे, जैसे उत्तम घी से भरी स्रुवा राख में उँडेल दी जाए;"

श्लोक 22 (3.270.22)

पुरा तुषाग्नाविव हूयते हविः । पुरा श्मशाने स्रगिवापविध्यते । पुरा च सोमोऽध्वरगोऽवलिह्यते । शुना यथा विप्रजने प्रमोहिते ॥

purā tuṣāgnāviva hūyate haviḥ | purā śmaśāne sragivāpavidhyate | purā ca somo'dhvarago'valihyate | śunā yathā viprajane pramohite

"इससे पहले कि हवि मानो भूसे की आग में डाल दी जाए, माला श्मशान में फेंक दी जाए, और ब्राह्मणों के असावधान रहते यज्ञ का सोमरस कुत्ता चाट जाए;"

श्लोक 23 (3.270.23)

पुरा हि पार्थाश्च दृतौ च कापिली । प्रसिच्यते क्षीरधारा यतध्वम् । महत्यरण्ये मृगयां चरित्वा । पुरा सृगालो नलिनीं विगाहते ॥

purā hi pārthāśca dṛtau ca kāpilī | prasicyate kṣīradhārā yatadhvam | mahatyaraṇye mṛgayāṃ caritvā | purā sṛgālo nalinīṃ vigāhate

"हे पार्थो, यत्न करो! इससे पहले कि कपिला गौ के दूध की धार चमड़े की मशक में उँडेल दी जाए, और इससे पहले कि तुम्हारे विशाल वन में शिकार करते रहते कोई सियार कमल-सरोवर में घुस जाए;"

श्लोक 24 (3.270.24)

पुरा हि मन्त्राहुतिपूजितायां । हुताग्निवेद्यां बलिभुङ्निलीयते । श्रुतिं च सम्यक्प्रसृतां महाध्वरे । ग्राम्यो जनो यद्वदसौ न नाशयेत् ॥

purā hi mantrāhutipūjitāyāṃ | hutāgnivedyāṃ balibhuṅnilīyate | śrutiṃ ca samyakprasṛtāṃ mahādhvare | grāmyo jano yadvadasau na nāśayet

"इससे पहले कि मन्त्रों और आहुतियों से पूजित अग्निवेदी पर कौआ आ बैठे। और जैसे किसी गँवार को महायज्ञ में विधिवत् गाई जा रही श्रुति को नष्ट नहीं करने देना चाहिए,"

श्लोक 25 (3.270.25)

मा वः प्रियायाः सुनसं सुलोचनं । चन्द्रप्रभाच्छं वदनं प्रसन्नम् । स्पृश्याच्छुभं कश्चिदकृत्यकारी । श्वा वै पुरोडाशमिवाध्वरस्थम् ॥

mā vaḥ priyāyāḥ sunasaṃ sulocanaṃ | candraprabhācchaṃ vadanaṃ prasannam | spṛśyācchubhaṃ kaścidakṛtyakārī | śvā vai puroḍāśamivādhvarastham

"वैसे ही कोई कुकर्मी तुम्हारी प्रिया के सुन्दर नासिका और सुन्दर नेत्रों वाले, चन्द्रमा की कान्ति-से निर्मल, प्रसन्न और शुभ मुख को ऐसे न छू पाए जैसे यज्ञवेदी पर रखे पुरोडाश को कुत्ता छू ले।"

श्लोक 26 (3.270.26)

एतानि वर्त्मान्यनुयात शीघ्रं । मा वः कालः क्षिप्रमिहात्यगाद्वै ॥

etāni vartmānyanuyāta śīghraṃ | mā vaḥ kālaḥ kṣipramihātyagādvai

"इन मार्गों पर शीघ्र पीछा करो; यहाँ समय व्यर्थ न जाने दो।"

श्लोक 27 (3.270.27)

शीघ्रं प्रधावध्वमितो नरेन्द्रा । यावन्न दूरं व्रजतीति पापः । प्रत्याहरध्वं द्विषतां सकाशा- । ल्लक्ष्मीमिव स्वां दयितां नृसिंहाः ॥

śīghraṃ pradhāvadhvamito narendrā | yāvanna dūraṃ vrajatīti pāpaḥ | pratyāharadhvaṃ dviṣatāṃ sakāśā- | llakṣmīmiva svāṃ dayitāṃ nṛsiṃhāḥ

"हे नरेन्द्रो! यहाँ से शीघ्र दौड़ो, इससे पहले कि वह पापी दूर निकल जाए। हे नरसिंहो! अपनी प्रिया को शत्रुओं के पास से ऐसे लौटा लाओ जैसे अपनी लक्ष्मी को।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 28 (3.270.28)

भद्रे प्रतिक्राम नियच्छ वाचं । माऽस्मत्सकाशे परुषाण्यवोचः । राजानो वा यदि वा राजपुत्रा । बलेन मत्ताः पञ्चतां प्राप्नुवन्ति ॥

bhadre pratikrāma niyaccha vācaṃ | mā'smatsakāśe paruṣāṇyavocaḥ | rājāno vā yadi vā rājaputrā | balena mattāḥ pañcatāṃ prāpnuvanti

"हे भद्रे! पीछे हटो और वाणी को रोको; हमारे सामने ऐसे कठोर वचन मत कहो। बल के मद में चूर राजा हों या राजपुत्र, वे मृत्यु को प्राप्त होते हैं।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 29 (3.270.29)

एतावदुक्त्वा प्रययुर्हि शीघ्रं । तान्येव वर्त्मान्यनुवर्तमानाः । मुहुर्मुहुर्व्यालवदुच्छ्वसन्तो । ज्यां विक्षिपन्तश्च महाधनुर्भ्यः ॥

etāvaduktvā prayayurhi śīghraṃ | tānyeva vartmānyanuvartamānāḥ | muhurmuhurvyālavaducchvasanto | jyāṃ vikṣipantaśca mahādhanurbhyaḥ

इतना कहकर वे उन्हीं मार्गों का अनुसरण करते हुए शीघ्र चल पड़े; वे बार-बार सर्पों की भाँति फुफकार रहे थे और अपने महान् धनुषों की प्रत्यंचाएँ खींच रहे थे।

श्लोक 30 (3.270.30)

ततोऽपश्यंस्तस्य सैन्यस्य रेणु- । मुद्धूतं वै वाजिखुरप्रणुन्नम् । पदातीनां मध्यगतं च धौम्यं । विक्रोशन्तं भीम पार्थेत्यभीक्ष्णम् ॥

tato'paśyaṃstasya sainyasya reṇu- | muddhūtaṃ vai vājikhurapraṇunnam | padātīnāṃ madhyagataṃ ca dhaumyaṃ | vikrośantaṃ bhīma pārthetyabhīkṣṇam

तब उन्होंने उस सेना की घोड़ों के खुरों से उड़ी धूल देखी, और पैदल सैनिकों के बीच धौम्य को देखा जो बार-बार पुकार रहे थे—"भीम! पार्थ!"

श्लोक 31 (3.270.31)

ते सान्त्व्य धौम्यं परिदीनसत्त्वाः । सुखं भवानेत्विति राजपुत्राः । श्येना यथैवामिषसंप्रयुक्ता । जवेन तत्सैन्यमथाभ्यधावन् ॥

te sāntvya dhaumyaṃ paridīnasattvāḥ | sukhaṃ bhavānetviti rājaputrāḥ | śyenā yathaivāmiṣasaṃprayuktā | javena tatsainyamathābhyadhāvan

अत्यन्त दुःखी राजकुमारों ने धौम्य को आश्वस्त किया—"आप निश्चिन्त होकर चलिए"—और मांस पर झपटते बाजों की भाँति वेग से उस सेना पर टूट पड़े।

श्लोक 32 (3.270.32)

तेषां महेन्द्रोपमविक्रमाणां । संरब्धानां धर्षणाद्याज्ञसेन्याः । क्रोधः प्रजज्वाल जयद्रथं च । दृष्ट्वा प्रियां तस्य रथे स्थितां च ॥

teṣāṃ mahendropamavikramāṇāṃ | saṃrabdhānāṃ dharṣaṇādyājñasenyāḥ | krodhaḥ prajajvāla jayadrathaṃ ca | dṛṣṭvā priyāṃ tasya rathe sthitāṃ ca

महेन्द्र के समान पराक्रमी वे वीर याज्ञसेनी के अपमान से पहले ही क्रोधित थे; जयद्रथ को और उसके रथ पर खड़ी अपनी प्रिया को देखकर उनका क्रोध भड़क उठा।

श्लोक 33 (3.270.33)

प्रचुक्रुशुश्चाप्यथ सिन्धुराजं । वृकोदरश्चैव धनंजयश्च । यमौ च राजा च महाधनुर्धरा- । स्ततो दिशः संमुमुहुः परेषाम् ॥

pracukruśuścāpyatha sindhurājaṃ | vṛkodaraścaiva dhanaṃjayaśca | yamau ca rājā ca mahādhanurdharā- | stato diśaḥ saṃmumuhuḥ pareṣām

वृकोदर, धनंजय, दोनों जुड़वाँ भाई और राजा—उन महाधनुर्धरों ने सिन्धुराज को ललकारा, जिससे शत्रुओं को दिशाओं का भी भ्रम हो गया।

अध्याय 269अध्याय-सूचीअध्याय 271