आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 271
द्रौपदी द्वारा अपने पतियों का परिचय
पाण्डवों के निकट आते ही हिम्मत हारता जयद्रथ द्रौपदी से पूछता है कि किस रथ पर उसका कौन-सा पति है। द्रौपदी तिरस्कारपूर्वक कहती है कि मरने वाले को सब जान लेना चाहिए, और एक-एक का वर्णन करती है: ध्वज पर नन्द-उपनन्द मृदंगों वाले युधिष्ठिर, जो शरण में आए शत्रु को भी प्राणदान देते हैं; कभी वैर न भूलने वाले भीम; युधिष्ठिर के भाई और शिष्य अर्जुन; सुन्दर नकुल; और बुद्धिमान् खड्गधारी सहदेव। तब पार्थ हाथ जोड़े पैदल सैनिकों को छोड़कर जयद्रथ की रथ-सेना को बाणों की वर्षा से ढक देते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.271.1)
ततो घोरतरः शब्दो वने समभवत्तदा । भीमसेनार्जुनौ दृष्ट्वा क्षत्रियाणाममर्षिणाम् ॥
tato ghorataraḥ śabdo vane samabhavattadā | bhīmasenārjunau dṛṣṭvā kṣatriyāṇāmamarṣiṇām
तब भीमसेन और अर्जुन को देखकर असहिष्णु क्षत्रियों का वन में अत्यन्त भयंकर कोलाहल उठा।
श्लोक 2 (3.271.2)
तेषां ध्वजाग्राण्यभिवीक्ष्य राजा । स्वयंदुरात्मा कुरुपुङ्गवानाम् । जयद्रथो याज्ञसेनीमुवाच । रथे स्थितां भानुमतीं हतौजाः ॥
teṣāṃ dhvajāgrāṇyabhivīkṣya rājā | svayaṃdurātmā kurupuṅgavānām | jayadratho yājñasenīmuvāca | rathe sthitāṃ bhānumatīṃ hataujāḥ
उन कुरुश्रेष्ठों के ध्वजों के अग्रभाग देखकर, तेजहीन हुए दुष्टात्मा राजा जयद्रथ ने अपने रथ पर खड़ी तेजस्विनी याज्ञसेनी से कहा—
जयद्रथ उवाच
श्लोक 3 (3.271.3)
आयान्तीमे पञ्चरथा महान्तो । मन्ये च कृष्णे पतयस्तवैते । सा जानती ख्यापय नः सुकेशि । परंपरं पाण्डवानां रथस्थम् ॥
āyāntīme pañcarathā mahānto | manye ca kṛṣṇe patayastavaite | sā jānatī khyāpaya naḥ sukeśi | paraṃparaṃ pāṇḍavānāṃ rathastham
"ये पाँच विशाल रथ आ रहे हैं; हे कृष्णे, मैं समझता हूँ ये तुम्हारे पति हैं। हे सुकेशी! तुम उन्हें जानती हो, इसलिए हमें बताओ कि किस रथ पर कौन-सा पाण्डव है।"
द्रौपद्युवाच
श्लोक 4 (3.271.4)
किं ते ज्ञातैर्मूढ महाधनुर्धरै- । रनायुष्यं कर्म कृत्वाऽतिघोरम् । एते वीराः पतयो मे समेता । न वः शेषः कश्चिदिहास्ति युद्धे ॥
kiṃ te jñātairmūḍha mahādhanurdharai- | ranāyuṣyaṃ karma kṛtvā'tighoram | ete vīrāḥ patayo me sametā | na vaḥ śeṣaḥ kaścidihāsti yuddhe
"अरे मूढ! आयु का नाश करने वाला यह अत्यन्त घोर कर्म करके अब इन महाधनुर्धरों को जानकर तुम्हें क्या मिलेगा? ये मेरे वीर पति एकत्र होकर आ गए हैं; इस युद्ध में तुममें से कोई भी नहीं बचेगा।"
श्लोक 5 (3.271.5)
आख्यातव्यं त्वेव सर्वं मुमूर्षो- । र्मया तुभ्यं पृष्टया धर्म एषः । न मे व्यथा विद्यते त्वद्भयं वा । संपश्यन्त्याः सानुजं धर्मराजम् ॥
ākhyātavyaṃ tveva sarvaṃ mumūrṣo- | rmayā tubhyaṃ pṛṣṭayā dharma eṣaḥ | na me vyathā vidyate tvadbhayaṃ vā | saṃpaśyantyāḥ sānujaṃ dharmarājam
"फिर भी, तुम पूछ रहे हो, तो मरने वाले को सब कुछ बता देना मेरा धर्म है। छोटे भाइयों सहित धर्मराज को देखकर मुझे न कोई व्यथा है, न तुम्हारा भय।"
श्लोक 6 (3.271.6)
यस्य ध्वजाग्रे नदतो मृदङ्गौ । नन्दोपनन्दौ मधुरौ सुयुक्तौ । एनं स्वधर्मार्थविनिश्चयज्ञं । सदा जनाः कृत्यवन्तोऽनुयान्ति ॥
yasya dhvajāgre nadato mṛdaṅgau | nandopanandau madhurau suyuktau | enaṃ svadharmārthaviniścayajñaṃ | sadā janāḥ kṛtyavanto'nuyānti
"जिसके ध्वज के अग्रभाग पर नन्द और उपनन्द नामक दो मृदंग मधुर और सुसंगत स्वर में बजते हैं—वह अपने धर्म और अर्थ के निर्णय का ज्ञाता है, और प्रयोजन वाले लोग सदा उसका अनुसरण करते हैं।"
श्लोक 7 (3.271.7)
य एष जाम्बूनदशुद्धगौरः । प्रचण्डघोणस्तनुरायताक्षः । एतं कुरुश्रेष्ठतमं वदन्ति । युधिष्ठिरं धर्मसुतं पतिं मे ॥
ya eṣa jāmbūnadaśuddhagauraḥ | pracaṇḍaghoṇastanurāyatākṣaḥ | etaṃ kuruśreṣṭhatamaṃ vadanti | yudhiṣṭhiraṃ dharmasutaṃ patiṃ me
"जो शुद्ध सुवर्ण के समान गौरवर्ण, ऊँची नासिका वाला, छरहरा और विशाल नेत्रों वाला है—उसे कुरुओं में सर्वश्रेष्ठ कहा जाता है; वह धर्मपुत्र युधिष्ठिर मेरा पति है।"
श्लोक 8 (3.271.8)
अप्येष शत्रोः शरणागतस्य । दद्यात्प्राणान्धर्मचारी नृवीरः । परैह्येनं मूढ जवेन भूतये । त्वमात्मनः प्राञ्जलिर्न्यस्तशस्त्रः ॥
apyeṣa śatroḥ śaraṇāgatasya | dadyātprāṇāndharmacārī nṛvīraḥ | paraihyenaṃ mūḍha javena bhūtaye | tvamātmanaḥ prāñjalirnyastaśastraḥ
"धर्म पर चलने वाला वह नरवीर शरण में आए शत्रु को भी प्राणदान दे देता है। अरे मूढ! अपनी भलाई के लिए हथियार डालकर, हाथ जोड़कर शीघ्र उसकी शरण में जाओ।"
श्लोक 9 (3.271.9)
अथाप्येनं पश्यसि यं रथस्थं । महाभुजं सालमिव प्रवृद्धम् । संदष्टौष्ठं भ्रुकुटीसंहतभ्रुवं । वृकोदरो नाम पतिर्ममैषः ॥
athāpyenaṃ paśyasi yaṃ rathasthaṃ | mahābhujaṃ sālamiva pravṛddham | saṃdaṣṭauṣṭhaṃ bhrukuṭīsaṃhatabhruvaṃ | vṛkodaro nāma patirmamaiṣaḥ
"और रथ पर खड़ा जिसे तुम देख रहे हो—विशाल भुजाओं वाला, बढ़े हुए शाल वृक्ष-सा ऊँचा, होंठ चबाता और भौंहें ताने हुए—वह वृकोदर नाम का मेरा पति है।"
श्लोक 10 (3.271.10)
आजानेया बलिनः साधुदान्ता । महाबलाः शूरमुदावहन्ति । एतस्य कर्माण्यतिमानुषाणि । भीमेति शब्दोऽस्य ततः पृथिव्याम् ॥
ājāneyā balinaḥ sādhudāntā | mahābalāḥ śūramudāvahanti | etasya karmāṇyatimānuṣāṇi | bhīmeti śabdo'sya tataḥ pṛthivyām
"बलवान्, भली-भाँति सधे हुए, महाशक्तिशाली उत्तम जाति के घोड़े उस शूरवीर को ढोते हैं। उसके कर्म मनुष्य की शक्ति से परे हैं; इसीलिए पृथ्वी पर वह 'भीम' नाम से प्रसिद्ध है।"
श्लोक 11 (3.271.11)
नास्यापराद्धाः शेषमवाप्नुवन्ति । नायं वैरं विस्मरते कदाचित् । वैरस्यान्तं संविधायोपयाति । पश्चाच्छान्तिं न च तत्तप्यतीव ॥
nāsyāparāddhāḥ śeṣamavāpnuvanti | nāyaṃ vairaṃ vismarate kadācit | vairasyāntaṃ saṃvidhāyopayāti | paścācchāntiṃ na ca tattapyatīva
"जो उसका अपराध करते हैं, वे जीवित नहीं बचते; वह कभी वैर नहीं भूलता। वैर का अन्त करके ही वह शान्ति पाता है, और फिर उसके विषय में अधिक संताप नहीं करता।"
श्लोक 12 (3.271.12)
धनुर्धराग्र्यो धृतिमान्यशस्वी । जितेन्द्रियो वृद्धसेवी नृवीरः । भ्राता च शिष्यश्च युधिष्ठिरस्य । धनंजयो नाम पतिर्ममैषः ॥
dhanurdharāgryo dhṛtimānyaśasvī | jitendriyo vṛddhasevī nṛvīraḥ | bhrātā ca śiṣyaśca yudhiṣṭhirasya | dhanaṃjayo nāma patirmamaiṣaḥ
"धनुर्धरों में अग्रणी, धैर्यवान्, यशस्वी, जितेन्द्रिय, बड़ों की सेवा करने वाला, नरवीर, युधिष्ठिर का भाई और शिष्य—यह धनंजय नाम का मेरा पति है।"
श्लोक 13 (3.271.13)
यो वै न कामान्न भयान्न लोभा- । त्त्यजेद्धर्मं न नृशंसं च कुर्यात् । स एष वैश्वानरतुल्यतेजाः । कुन्तीसुतः शत्रुसहः प्रमाथी ॥
yo vai na kāmānna bhayānna lobhā- | ttyajeddharmaṃ na nṛśaṃsaṃ ca kuryāt | sa eṣa vaiśvānaratulyatejāḥ | kuntīsutaḥ śatrusahaḥ pramāthī
"जो काम, भय या लोभ से कभी धर्म नहीं छोड़ता और न कोई क्रूर कर्म करता है—वह यह अग्नि के समान तेजस्वी, शत्रुओं को सहने और मथ डालने वाला कुन्तीपुत्र है।"
श्लोक 14 (3.271.14)
यः सर्वधर्मार्थविनिश्चयज्ञो । भयार्तानां भयहर्ता मनीषी । बन्धुप्रियः शस्त्रभृतां वरिष्ठो । महाहवेष्वप्रतिवार्यवीर्यः ॥
yaḥ sarvadharmārthaviniścayajño | bhayārtānāṃ bhayahartā manīṣī | bandhupriyaḥ śastrabhṛtāṃ variṣṭho | mahāhaveṣvaprativāryavīryaḥ
"जो सभी धर्मों और अर्थों के निर्णय को जानता है, भयभीतों का भय दूर करने वाला बुद्धिमान् है, बन्धुओं का प्रिय, शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ और महायुद्धों में जिसके पराक्रम को कोई रोक नहीं सकता,"
श्लोक 15 (3.271.15)
यस्योत्तमं रूपमाहुः पृथिव्यां । यं पाण्डवाः परिरक्षन्ति सर्वे । प्राणैर्गरीयांसमनुव्रतं वै । स एष वीरो नकुलः पतिर्मे ॥
yasyottamaṃ rūpamāhuḥ pṛthivyāṃ | yaṃ pāṇḍavāḥ parirakṣanti sarve | prāṇairgarīyāṃsamanuvrataṃ vai | sa eṣa vīro nakulaḥ patirme
"जिसके रूप को पृथ्वी पर सबसे उत्तम कहा जाता है, जिसकी सभी पाण्डव रक्षा करते हैं, जो उन्हें प्राणों से भी बढ़कर प्रिय और सदा अनुगत है—वह यह वीर नकुल मेरा पति है।"
श्लोक 16 (3.271.16)
यः खड्गयोधी लघुचित्रहस्तो । महांश्च धीमान्सहदेवोऽद्वितीयः । यस्याद्यकर्म द्रक्ष्यसे मूढसत्त्व । शतक्रतोर्वा दैत्यसेनासु सङ्ख्ये ॥
yaḥ khaḍgayodhī laghucitrahasto | mahāṃśca dhīmānsahadevo'dvitīyaḥ | yasyādyakarma drakṣyase mūḍhasattva | śatakratorvā daityasenāsu saṅkhye
"खड्ग से युद्ध करने वाला, फुर्तीले और कुशल हाथों वाला, महान्, बुद्धिमान् और अद्वितीय सहदेव—हे मूढबुद्धि! आज तुम युद्ध में उसका पराक्रम ऐसे देखोगे जैसे दैत्य-सेनाओं के बीच शतक्रतु (इन्द्र) का।"
श्लोक 17 (3.271.17)
शूरः कृतास्त्रो मतिमान्मनस्वी । प्रियंकरो धर्मसुतस्य राज्ञः । हुताशचन्द्रार्कसमानतेजा । जघन्यजः पाण्डवानां प्रियश्च ॥
śūraḥ kṛtāstro matimānmanasvī | priyaṃkaro dharmasutasya rājñaḥ | hutāśacandrārkasamānatejā | jaghanyajaḥ pāṇḍavānāṃ priyaśca
"शूर, अस्त्र-विद्या में निपुण, बुद्धिमान्, मनस्वी, धर्मपुत्र राजा का प्रिय करने वाला, अग्नि, चन्द्र और सूर्य के समान तेजस्वी, पाण्डवों में सबसे छोटा और उनका प्रिय,"
श्लोक 18 (3.271.18)
बुद्ध्या समो यस्य नरो न विद्यते । वक्ता तथा सत्सु विनिश्चयज्ञः । स एष शूरो नित्यममर्षणश्च । धीमान्प्राज्ञः सहदेवः पतिर्मे ॥
buddhyā samo yasya naro na vidyate | vaktā tathā satsu viniścayajñaḥ | sa eṣa śūro nityamamarṣaṇaśca | dhīmānprājñaḥ sahadevaḥ patirme
"बुद्धि में जिसकी बराबरी करने वाला कोई मनुष्य नहीं है, जो सज्जनों के बीच कुशल वक्ता और निर्णय का ज्ञाता है—वह यह सदा अन्याय न सहने वाला, धीमान् और प्राज्ञ शूर सहदेव मेरा पति है।"
श्लोक 19 (3.271.19)
त्यजेत्प्राणान्प्रविशेद्धव्यवाहं । न त्वेवैष व्याहरेद्धर्मबाह्यम् । सदा मनस्वी क्षत्रधर्मे रतश्च । कुन्त्याः प्राणैरिष्टतमो नृवीरः ॥
tyajetprāṇānpraviśeddhavyavāhaṃ | na tvevaiṣa vyāhareddharmabāhyam | sadā manasvī kṣatradharme rataśca | kuntyāḥ prāṇairiṣṭatamo nṛvīraḥ
"वह प्राण त्याग देगा या अग्नि में प्रवेश कर जाएगा, पर धर्म-विरुद्ध बात कभी नहीं कहेगा; सदा मनस्वी और क्षत्रिय-धर्म में रत वह नरवीर कुन्ती को प्राणों से भी अधिक प्रिय है।"
श्लोक 20 (3.271.20)
विशीर्यन्तीं नावमिवार्णवान्ते । रत्नाभिपूर्णां मकरस्य पृष्ठे । सेनां तवेमां हतसर्वयोधां । विक्षोभितां द्रक्ष्यसि पाण्डुपुत्रैः ॥
viśīryantīṃ nāvamivārṇavānte | ratnābhipūrṇāṃ makarasya pṛṣṭhe | senāṃ tavemāṃ hatasarvayodhāṃ | vikṣobhitāṃ drakṣyasi pāṇḍuputraiḥ
"जैसे रत्नों से भरी नाव समुद्र में मगर की पीठ पर टकराकर टूट-बिखर जाती है, वैसे ही तुम अपनी इस सेना को पाण्डुपुत्रों द्वारा मथी हुई और सब योद्धाओं के मारे जाने से नष्ट होती देखोगे।"
श्लोक 21 (3.271.21)
इत्येते वै कथिताः पाण्डुपुत्रा । यांस्त्वं मोहादवमत्य प्रवृत्तः । यद्येतेभ्यो मुच्यसे रिष्टदेहः । पुनर्जन्म प्राप्स्यसे जीवितं च ॥
ityete vai kathitāḥ pāṇḍuputrā | yāṃstvaṃ mohādavamatya pravṛttaḥ | yadyetebhyo mucyase riṣṭadehaḥ | punarjanma prāpsyase jīvitaṃ ca
"ये हैं वे पाण्डुपुत्र जिनका मैंने वर्णन किया, जिनका तुमने मोहवश तिरस्कार करके यह कर्म किया है। यदि घायल शरीर लेकर भी तुम इनसे छूट जाओ, तो समझना कि तुम्हें नया जन्म और जीवन मिल गया।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 22 (3.271.22)
ततः पार्थाः पञ्च पञ्चेन्द्रकल्पा- । स्त्यक्त्वा त्रस्तान्प्राञ्जलींस्तान्पदातीन् । रथानीकं शरवर्षान्धकारं । चक्रुः क्रुद्धाः सर्वतस्ते निगृह्य ॥
tataḥ pārthāḥ pañca pañcendrakalpā- | styaktvā trastānprāñjalīṃstānpadātīn | rathānīkaṃ śaravarṣāndhakāraṃ | cakruḥ kruddhāḥ sarvataste nigṛhya
तब पाँच इन्द्रों के समान पाँचों पार्थों ने हाथ जोड़े खड़े भयभीत पैदल सैनिकों को छोड़ दिया और क्रोध में भरकर रथ-सेना को चारों ओर से घेरकर बाणों की वर्षा से अन्धकारमय कर दिया।