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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 272

जयद्रथ की पराजय और पलायन

जयद्रथ अपने सहयोगियों को उकसाता है, पर पाण्डव सिन्धु, सौवीर, शिबि और त्रिगर्त योद्धाओं का संहार कर देते हैं: भीम कोटिकाश्य को मारते हैं, युधिष्ठिर त्रिगर्तराज को, नकुल सुरथ के हाथी को गिराते हैं, और अर्जुन रणभूमि को शवों से पाट देते हैं। जयद्रथ द्रौपदी को उतारकर भाग जाता है; युधिष्ठिर उन्हें आश्रम ले जाते हैं और दुःशला तथा गान्धारी के कारण सिन्धुराज को न मारने को कहते हैं, जबकि द्रौपदी उसके वध की माँग करती हैं। भीम और अर्जुन उसका पीछा करते हैं, अर्जुन एक कोस दूर से उसके घोड़ों को मार गिराते हैं और भागते हुए उसे धिक्कारते हैं, और जब भीम उस पर झपटते हैं तो दयालु अर्जुन उन्हें उसे न मारने को कहते हैं।

अध्याय 271अध्याय-सूचीअध्याय 273

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.272.1)

संतिष्ठध्वं प्रहरत तूर्णं विपरिधावत । इति स्म सैन्धवो राजा चोदयामास तान्नृपान् ॥

saṃtiṣṭhadhvaṃ praharata tūrṇaṃ viparidhāvata | iti sma saindhavo rājā codayāmāsa tānnṛpān

"डटे रहो! प्रहार करो! शीघ्र धावा बोलो!" — इस प्रकार सिन्धुराज ने उन राजाओं को उकसाया।

श्लोक 2 (3.272.2)

ततो घोरतमः शब्दोरणे समभवत्तदा । भीमार्जुनयमान्दृष्ट्वा सैन्यानां सयुधिष्ठिरान् ॥

tato ghoratamaḥ śabdoraṇe samabhavattadā | bhīmārjunayamāndṛṣṭvā sainyānāṃ sayudhiṣṭhirān

तब युधिष्ठिर सहित भीम, अर्जुन और नकुल-सहदेव को देखकर सैनिकों में रणभूमि पर अत्यन्त भयंकर कोलाहल उठा।

श्लोक 3 (3.272.3)

शिबिसिंधुत्रिगर्तानां विषादश्चाप्यजायत । तान्दृष्ट्वापुरुषव्याघ्रान्व्याघ्रानिव बलोत्कटान् ॥

śibisiṃdhutrigartānāṃ viṣādaścāpyajāyata | tāndṛṣṭvāpuruṣavyāghrānvyāghrāniva balotkaṭān

व्याघ्रों के समान प्रचण्ड बलशाली उन पुरुषसिंहों को देखकर शिबि, सिन्धु और त्रिगर्त योद्धाओं में भी विषाद छा गया।

श्लोक 4 (3.272.4)

हेमबिन्दुं महोत्सेधां सर्वशैक्यायसीं गदाम् । प्रगृह्याभ्यद्रवद्भीमः सैन्धवं कालचोदितम् ॥

hemabinduṃ mahotsedhāṃ sarvaśaikyāyasīṃ gadām | pragṛhyābhyadravadbhīmaḥ saindhavaṃ kālacoditam

सोने की बिन्दियों से जड़ी, ऊँची और पूरी तरह शैक्य लोहे की बनी गदा उठाकर भीम काल से प्रेरित सिन्धुराज की ओर झपटे।

श्लोक 5 (3.272.5)

तदन्तरमथावृत्य कोटिकाश्योऽभ्यहारयत् । महता रथवंशेन परिवार्य वृकोदरम् ॥

tadantaramathāvṛtya koṭikāśyo'bhyahārayat | mahatā rathavaṃśena parivārya vṛkodaram

तब कोटिकाश्य ने घूमकर बीच में आकर प्रहार किया और रथों के विशाल समूह से वृकोदर को घेर लिया।

श्लोक 6 (3.272.6)

शक्तितोमरनाराचैर्वीरबाहुप्रचोदितैः । कीर्यमाणोपि बहुभिर्न स्म भीमोऽभ्यकम्पत ॥

śaktitomaranārācairvīrabāhupracoditaiḥ | kīryamāṇopi bahubhirna sma bhīmo'bhyakampata

वीरों की भुजाओं से चलाए गए शक्ति, तोमर और नाराचों की बहुतों द्वारा बौछार होने पर भी भीम विचलित नहीं हुए।

श्लोक 7 (3.272.7)

गजं तु सगजारोहं पदातींश्च चतुर्दश । जघान गदया भीमः सैन्धवध्वजिनीमुखे ॥

gajaṃ tu sagajārohaṃ padātīṃśca caturdaśa | jaghāna gadayā bhīmaḥ saindhavadhvajinīmukhe

सिन्धुराज की सेना के अग्रभाग में भीम ने गदा से सवार सहित एक हाथी को और चौदह पैदल सैनिकों को मार डाला।

श्लोक 8 (3.272.8)

पार्थः पञ्चशताञ्शूरान्पार्वतीयान्महारथान् । परीप्समानः सौवीरं जघान ध्वजिनीमुखे ॥

pārthaḥ pañcaśatāñśūrānpārvatīyānmahārathān | parīpsamānaḥ sauvīraṃ jaghāna dhvajinīmukhe

सौवीरराज को पकड़ने की इच्छा से पार्थ ने सेना के मुहाने पर पाँच सौ शूरवीर पर्वतीय महारथियों का वध किया।

श्लोक 9 (3.272.9)

राजा स्वयं सुवीराणां प्रवराणां प्रहारिणाम् । निमेषमात्रेण शतं जघान समरे तदा ॥

rājā svayaṃ suvīrāṇāṃ pravarāṇāṃ prahāriṇām | nimeṣamātreṇa śataṃ jaghāna samare tadā

स्वयं राजा युधिष्ठिर ने उस समय युद्ध में पलक झपकते ही प्रहार करने में कुशल सौ श्रेष्ठ सौवीर योद्धाओं को मार गिराया।

श्लोक 10 (3.272.10)

ददृशे नकुलस्तत्ररथात्प्रस्कन्द्य खड्गधृत् । शिरांसि पादरक्षाणां बीजवत्प्रवपन्मुहुः ॥

dadṛśe nakulastatrarathātpraskandya khaḍgadhṛt | śirāṃsi pādarakṣāṇāṃ bījavatpravapanmuhuḥ

वहाँ नकुल हाथ में तलवार लिए रथ से कूदकर पादरक्षक सैनिकों के सिर बीजों की भाँति बार-बार बोते हुए दिखाई दिए।

श्लोक 11 (3.272.11)

सहदेवस्तु संयाय रथेन गजयोधिनः । पातयामास नाराचैर्द्रुमेभ्य इव बर्हिणः ॥

sahadevastu saṃyāya rathena gajayodhinaḥ | pātayāmāsa nārācairdrumebhya iva barhiṇaḥ

सहदेव ने रथ से आगे बढ़कर हाथियों पर लड़ने वाले योद्धाओं को नाराचों से ऐसे गिरा दिया, जैसे वृक्षों से मोर गिराए जाते हैं।

श्लोक 12 (3.272.12)

ततस्त्रिगर्तः सधनुरवतीर्य महारथात् । गदया चतुरो वाहान्राज्ञस्तस्य तदाऽवधीत् ॥

tatastrigartaḥ sadhanuravatīrya mahārathāt | gadayā caturo vāhānrājñastasya tadā'vadhīt

तब त्रिगर्तराज धनुष लिए अपने महारथ से उतरा और उसने गदा से राजा युधिष्ठिर के चारों घोड़ों को मार डाला।

श्लोक 13 (3.272.13)

तमथाभ्यागतं राजा पदातिं कुन्तिनन्दनः । अर्धचन्द्रेण बाणेन विव्याधोरसि धर्मराट् ॥

tamathābhyāgataṃ rājā padātiṃ kuntinandanaḥ | ardhacandreṇa bāṇena vivyādhorasi dharmarāṭ

उसे पैदल ही पास आते देख कुन्तीनन्दन धर्मराज युधिष्ठिर ने अर्धचन्द्र बाण से उसकी छाती बींध दी।

श्लोक 14 (3.272.14)

स भिन्नहृदयो वीरो वक्त्राच्छोणितमुद्वमन् । पपाताभिमुखं प्राप्तश्छिन्नमूल इव द्रुमः ॥

sa bhinnahṛdayo vīro vaktrācchoṇitamudvaman | papātābhimukhaṃ prāptaśchinnamūla iva drumaḥ

हृदय फट जाने पर वह वीर मुँह से रक्त उगलता हुआ, जड़ से कटे वृक्ष की भाँति जहाँ आया था वहीं मुँह के बल गिर पड़ा।

श्लोक 15 (3.272.15)

इन्द्रसेनद्वितीयस्तु रथात्प्रस्कन्द्य धर्मराट् । हताश्वः सहदेवस्य प्रतिपेदे महारथम् ॥

indrasenadvitīyastu rathātpraskandya dharmarāṭ | hatāśvaḥ sahadevasya pratipede mahāratham

घोड़े मारे जाने पर धर्मराज इन्द्रसेन के साथ रथ से कूदकर सहदेव के महारथ पर जा चढ़े।

श्लोक 16 (3.272.16)

नकुलं त्वभिसंवार्य क्षेमंकरमहामुखौ । उभावुभयतस्तीक्ष्णैः शरवर्षैरवर्षताम् ॥

nakulaṃ tvabhisaṃvārya kṣemaṃkaramahāmukhau | ubhāvubhayatastīkṣṇaiḥ śaravarṣairavarṣatām

क्षेमंकर और महामुख ने नकुल को घेरकर दोनों ओर से उन पर तीखे बाणों की झड़ी लगा दी।

श्लोक 17 (3.272.17)

तौ शरैरभिवर्षन्तौ जीमूताविव वार्षिकौ । एकैकेन विपाठेन जघ्ने माद्रवतीसुतः ॥

tau śarairabhivarṣantau jīmūtāviva vārṣikau | ekaikena vipāṭhena jaghne mādravatīsutaḥ

वर्षा ऋतु के मेघों की भाँति बाण बरसाते उन दोनों को माद्रवतीपुत्र ने एक-एक विपाठ बाण से मार गिराया।

श्लोक 18 (3.272.18)

त्रिगर्तराजः सुरथस्तस्याथ गजधूर्गतः । रथमाक्षेपयामास गजेन गजयानवित् ॥

trigartarājaḥ surathastasyātha gajadhūrgataḥ | rathamākṣepayāmāsa gajena gajayānavit

तब हाथी चलाने में निपुण त्रिगर्तराज सुरथ ने हाथी के अग्रभाग पर बैठकर उस हाथी से नकुल का रथ उछाल फेंका।

श्लोक 19 (3.272.19)

नकुलस्त्वपभीस्तस्माद्रथाच्चर्मासिपाणिमान् । उद्भ्राम्य स्थानमास्थाय तस्थौ गिरिरिवाचलः ॥

nakulastvapabhīstasmādrathāccarmāsipāṇimān | udbhrāmya sthānamāsthāya tasthau giririvācalaḥ

निर्भय नकुल ढाल और तलवार हाथ में लिए उस रथ से कूद पड़े और तलवार घुमाते हुए एक स्थान पर जमकर पर्वत की भाँति अचल खड़े हो गए।

श्लोक 20 (3.272.20)

सुरथस्तं गजवरं वधाय नकुलस्य तु । प्रेषयामास सक्रोधमत्युच्छ्रितकरं ततः ॥

surathastaṃ gajavaraṃ vadhāya nakulasya tu | preṣayāmāsa sakrodhamatyucchritakaraṃ tataḥ

तब सुरथ ने नकुल का वध करने के लिए सूँड़ ऊँची उठाए उस श्रेष्ठ हाथी को क्रोधपूर्वक उनकी ओर बढ़ाया।

श्लोक 21 (3.272.21)

नकुलस्तस्य नागस्य समीपपरिवर्तिनः । सविषाणं भुजं मूले खड्गेन निरकृन्तत ॥

nakulastasya nāgasya samīpaparivartinaḥ | saviṣāṇaṃ bhujaṃ mūle khaḍgena nirakṛntata

पास आते उस हाथी की सूँड़ को नकुल ने तलवार से दाँतों सहित जड़ से काट डाला।

श्लोक 22 (3.272.22)

स विनद्यमहानादं गजः किङ्किणिभूषणः । पतन्नवाक्शिरा भूमौ हस्त्यारोहमपोथयत् ॥

sa vinadyamahānādaṃ gajaḥ kiṅkiṇibhūṣaṇaḥ | patannavākśirā bhūmau hastyārohamapothayat

घुँघरुओं से सजा वह हाथी भयानक चिंघाड़ करता हुआ सिर के बल भूमि पर गिरा और अपने सवार को कुचल डाला।

श्लोक 23 (3.272.23)

स तत्कर्म महत्कृत्वा शूरो माद्रवतीसुतः । भीमसेनरथं प्राप्य शर्म लेभे महारथः ॥

sa tatkarma mahatkṛtvā śūro mādravatīsutaḥ | bhīmasenarathaṃ prāpya śarma lebhe mahārathaḥ

वह महान कर्म करके शूरवीर महारथी माद्रवतीपुत्र भीमसेन के रथ पर पहुँचे और वहाँ उन्हें आश्रय मिला।

श्लोक 24 (3.272.24)

भीमस्त्वापततो राज्ञः कोटिकाश्यस्य संगरे । सूतस्य नुदतो वाहान्क्षुरेणापाहरच्छिरः ॥

bhīmastvāpatato rājñaḥ koṭikāśyasya saṃgare | sūtasya nudato vāhānkṣureṇāpāharacchiraḥ

युद्ध में आक्रमण करते राजा कोटिकाश्य के घोड़े हाँकते सारथि का सिर भीम ने क्षुर बाण से उड़ा दिया।

श्लोक 25 (3.272.25)

न बुबोध हतं सूतं स राजा बाहुशालिना । तस्याश्वा व्यद्रवन्सङ्ख्ये हतसूतास्ततस्ततः ॥

na bubodha hataṃ sūtaṃ sa rājā bāhuśālinā | tasyāśvā vyadravansaṅkhye hatasūtāstatastataḥ

राजा को पता भी न चला कि बलशाली भुजाओं वाले भीम ने उसके सारथि को मार दिया है; सारथि के मरते ही उसके घोड़े रणभूमि में इधर-उधर भाग चले।

श्लोक 26 (3.272.26)

विरथं हतसूतं तं भीमः प्रहरतांवरः । जघान तलयुक्तेन प्रासेनाभ्येत्य पाण्डवः ॥

virathaṃ hatasūtaṃ taṃ bhīmaḥ praharatāṃvaraḥ | jaghāna talayuktena prāsenābhyetya pāṇḍavaḥ

रथहीन और सारथिहीन उस राजा को योद्धाओं में श्रेष्ठ पाण्डुपुत्र भीम ने पास जाकर मुट्ठी में थामे प्रास से मार डाला।

श्लोक 27 (3.272.27)

द्वादशानां तु सर्वेषां सौवीराणां धनंजयः । चकर्त निशितैर्भल्लैर्धनूंषि च शिरांसि च ॥

dvādaśānāṃ tu sarveṣāṃ sauvīrāṇāṃ dhanaṃjayaḥ | cakarta niśitairbhallairdhanūṃṣi ca śirāṃsi ca

धनंजय ने तीखे भल्ल बाणों से सभी बारह सौवीर योद्धाओं के धनुष और सिर काट डाले।

श्लोक 28 (3.272.28)

शिबीनिक्ष्वाकुमुख्यांश्च त्रिगर्तान्सैन्धवानपि । जघानातिरथः सङ्ख्ये बाणगोचरमागतान् ॥

śibīnikṣvākumukhyāṃśca trigartānsaindhavānapi | jaghānātirathaḥ saṅkhye bāṇagocaramāgatān

उस अतिरथी ने युद्ध में अपने बाणों की पहुँच में आए शिबि, प्रमुख इक्ष्वाकु, त्रिगर्त और सिन्धु योद्धाओं को भी मार डाला।

श्लोक 29 (3.272.29)

सूदिताः प्रत्यदृश्यन्त बहवः सव्यसाचिना । सपताकाश्च मातङ्गाः सध्वजाश्च महारथाः ॥

sūditāḥ pratyadṛśyanta bahavaḥ savyasācinā | sapatākāśca mātaṅgāḥ sadhvajāśca mahārathāḥ

सव्यसाची द्वारा मारे गए बहुत-से पताकाओं सहित हाथी और ध्वजाओं सहित महारथ दिखाई देने लगे।

श्लोक 30 (3.272.30)

प्रच्छाद्य पृथिवीं तस्थुः सर्वमायोधनं प्रति । शरीराण्यशिरस्कानि विदेहानि शिरांसि च ॥

pracchādya pṛthivīṃ tasthuḥ sarvamāyodhanaṃ prati | śarīrāṇyaśiraskāni videhāni śirāṃsi ca

सारी रणभूमि में बिना सिर के धड़ और बिना धड़ के सिर पृथ्वी को ढके पड़े थे।

श्लोक 31 (3.272.31)

श्वगृध्रकङ्ककाकोलभासगोमायुवायसाः । अतृप्यंस्तत्रवीराणां हतानां मांसशोणितैः ॥

śvagṛdhrakaṅkakākolabhāsagomāyuvāyasāḥ | atṛpyaṃstatravīrāṇāṃ hatānāṃ māṃsaśoṇitaiḥ

कुत्ते, गिद्ध, कंक, काकोल, भास पक्षी, सियार और कौए वहाँ मारे गए वीरों के मांस और रक्त से तृप्त हुए।

श्लोक 32 (3.272.32)

एवं तीक्ष्णशरज्वालैर्गाण्डीवानिलचोदितैः । सेनेन्धनं ददाहाशु सरोषः पार्थपावकः ॥

evaṃ tīkṣṇaśarajvālairgāṇḍīvānilacoditaiḥ | senendhanaṃ dadāhāśu saroṣaḥ pārthapāvakaḥ

इस प्रकार क्रोध से भरे पार्थरूपी अग्नि ने गाण्डीवरूपी वायु से प्रेरित तीखे बाणरूपी लपटों से सेनारूपी ईंधन को शीघ्र जला डाला।

श्लोक 33 (3.272.33)

चक्राणां पतितानां च युगानां च महीपते । तूणीराणां पताकानां ध्वजानां च रथैः सह ॥

cakrāṇāṃ patitānāṃ ca yugānāṃ ca mahīpate | tūṇīrāṇāṃ patākānāṃ dhvajānāṃ ca rathaiḥ saha

हे पृथ्वीपति! गिरे हुए पहियों और जुओं के, तरकशों, पताकाओं और रथों सहित ध्वजाओं के,

श्लोक 34 (3.272.34)

ईषाणामनुकर्षाणां त्रिवेणूनां तथैव च । अक्षाणामथ योक्त्राणां प्रतोदानां च राशयः ॥

īṣāṇāmanukarṣāṇāṃ triveṇūnāṃ tathaiva ca | akṣāṇāmatha yoktrāṇāṃ pratodānāṃ ca rāśayaḥ

ईषा-दण्डों, अनुकर्षों और त्रिवेणुओं के, धुरों, जोतों और चाबुकों के ढेर लग गए;

श्लोक 35 (3.272.35)

शिरसां पतितानां च कुण्डलोष्णीषधारिणाम् । भुजानां मकुटानां च हाराणामङ्गदैः सह ॥

śirasāṃ patitānāṃ ca kuṇḍaloṣṇīṣadhāriṇām | bhujānāṃ makuṭānāṃ ca hārāṇāmaṅgadaiḥ saha

कुण्डल और पगड़ी धारण किए गिरे हुए सिरों के, भुजाओं के, मुकुटों के और बाजूबन्दों सहित हारों के,

श्लोक 36 (3.272.36)

छत्राणां व्यजनानां च चर्मणां वर्मणां तथा । छिन्नानां कार्मुकाणां च पट्टसानां तथैव च ॥

chatrāṇāṃ vyajanānāṃ ca carmaṇāṃ varmaṇāṃ tathā | chinnānāṃ kārmukāṇāṃ ca paṭṭasānāṃ tathaiva ca

छत्रों और पंखों के, ढालों और कवचों के, टूटे धनुषों और पट्टिशों के भी,

श्लोक 37 (3.272.37)

शक्तीनामथ खड्गानां दण्डानां सह तोमरैः । राशयश्चात्रदृश्यन्ते तत्रतत्र विशांपते ॥

śaktīnāmatha khaḍgānāṃ daṇḍānāṃ saha tomaraiḥ | rāśayaścātradṛśyante tatratatra viśāṃpate

शक्तियों और तलवारों के, तोमरों सहित दण्डों के — हे प्रजानाथ! वहाँ जहाँ-तहाँ ऐसे ढेर दिखाई दे रहे थे।

श्लोक 38 (3.272.38)

पतितैश्चैव मातङ्गैः सयोधैः पर्वतोपमैः । हयैर्द्विधाकृतैः सार्धं सादिभिः सायुधैस्तथा ॥

patitaiścaiva mātaṅgaiḥ sayodhaiḥ parvatopamaiḥ | hayairdvidhākṛtaiḥ sārdhaṃ sādibhiḥ sāyudhaistathā

योद्धाओं सहित गिरे पर्वत-जैसे हाथियों से, सवारों और उनके शस्त्रों सहित दो टुकड़े हुए घोड़ों से,

श्लोक 39 (3.272.39)

विप्रविद्धै रथैश्चैव निहतैश्चपदातिभिः । अगम्यरूपा पृथिवी मांसशोणितकर्दमा ॥

vipraviddhai rathaiścaiva nihataiścapadātibhiḥ | agamyarūpā pṛthivī māṃsaśoṇitakardamā

टूटे-बिखरे रथों और मारे गए पैदल सैनिकों से भरी पृथ्वी मांस और रक्त की कीचड़ से अगम्य हो गई।

श्लोक 40 (3.272.40)

हतेषु तेषु वीरेषु सिन्धुराजो जयद्रथः । विमुच्य कृष्णां संत्रस्तः पलायनपरोऽभवत् ॥

hateṣu teṣu vīreṣu sindhurājo jayadrathaḥ | vimucya kṛṣṇāṃ saṃtrastaḥ palāyanaparo'bhavat

उन वीरों के मारे जाने पर भयभीत सिन्धुराज जयद्रथ कृष्णा को छोड़कर भागने को उद्यत हुआ।

श्लोक 41 (3.272.41)

स तस्मिन्संकुले सैन्ये द्रौपदीमवतार्य ताम् । प्राणप्रेप्सुरुपाधावद्वनं तत्र नराधमः ॥

sa tasminsaṃkule sainye draupadīmavatārya tām | prāṇaprepsurupādhāvadvanaṃ tatra narādhamaḥ

सेना की उस भगदड़ में वह नराधम द्रौपदी को रथ से उतारकर प्राण बचाने की इच्छा से वहीं वन की ओर भाग गया।

श्लोक 42 (3.272.42)

द्रौपदीं धर्मराजस्तु दृष्ट्वा धौम्यपुरस्कृताम् । माद्रीपुत्रेण वीरेण रथमारोपयत्तदा ॥

draupadīṃ dharmarājastu dṛṣṭvā dhaumyapuraskṛtām | mādrīputreṇa vīreṇa rathamāropayattadā

धौम्य को आगे लिए आती द्रौपदी को देखकर धर्मराज ने वीर माद्रीपुत्र के द्वारा उन्हें रथ पर चढ़वा लिया।

श्लोक 43 (3.272.43)

ततस्तद्विद्रुतं सैन्यमपयाते जयद्रथे । आदिश्यादिश्य नाराचैराजघान वृकोदरः ॥

tatastadvidrutaṃ sainyamapayāte jayadrathe | ādiśyādiśya nārācairājaghāna vṛkodaraḥ

जयद्रथ के भाग जाने पर वृकोदर उस भागती सेना को एक-एक को लक्ष्य करके नाराचों से मारने लगे।

श्लोक 44 (3.272.44)

सव्यसाची तु तं दृष्ट्वा पलायन्तं जयद्रथम् । वारयामास निघ्नन्तं भीमं सैन्धवसैनिकान् ॥

savyasācī tu taṃ dṛṣṭvā palāyantaṃ jayadratham | vārayāmāsa nighnantaṃ bhīmaṃ saindhavasainikān

किन्तु जयद्रथ को भागते देख सव्यसाची ने सिन्धुराज के सैनिकों का संहार करते भीम को रोका।

अर्जुन उवाच

श्लोक 45 (3.272.45)

यस्यापचारात्प्राप्तोऽयमस्मान्क्लेशो दुरासदः । तमस्मिन्समरोद्देशे न पश्यामि जयद्रथम् ॥

yasyāpacārātprāpto'yamasmānkleśo durāsadaḥ | tamasminsamaroddeśe na paśyāmi jayadratham

जिसके अपराध से हम पर यह असह्य क्लेश आया, उस जयद्रथ को मैं इस रणभूमि में कहीं नहीं देख रहा।

श्लोक 46 (3.272.46)

मूढं नैकृतिकं दुष्टं द्रौपद्याः क्लेशकारिणम् । तमेवान्विष भद्रं ते किं ते योधैर्निपातितैः । अनामिषमिदं कर्म कथं वा मन्यते भवान् ॥

mūḍhaṃ naikṛtikaṃ duṣṭaṃ draupadyāḥ kleśakāriṇam | tamevānviṣa bhadraṃ te kiṃ te yodhairnipātitaiḥ | anāmiṣamidaṃ karma kathaṃ vā manyate bhavān

उसी मूढ़, कपटी, दुष्ट और द्रौपदी को क्लेश देने वाले को खोजो — तुम्हारा कल्याण हो! इन योद्धाओं को मार गिराने से तुम्हें क्या मिलेगा? यह कर्म निष्फल है; अथवा आप इसे कैसा समझते हैं?

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 47 (3.272.47)

इत्युक्तो भीमसेनस्तु गुडाकेशेन धीमता । युधिष्ठिरमभिप्रेत्य वाग्मी वचनमब्रवीत् ॥

ityukto bhīmasenastu guḍākeśena dhīmatā | yudhiṣṭhiramabhipretya vāgmī vacanamabravīt

बुद्धिमान गुडाकेश के ऐसा कहने पर वाक्पटु भीमसेन ने युधिष्ठिर की ओर उन्मुख होकर ये वचन कहे —

भीम उवाच

श्लोक 48 (3.272.48)

हतप्रवीरा रिपवो भूयिष्ठं विद्रुता दिशः । गृहीत्वा द्रौपदीं राजन्निवर्ततु भवानितः ॥

hatapravīrā ripavo bhūyiṣṭhaṃ vidrutā diśaḥ | gṛhītvā draupadīṃ rājannivartatu bhavānitaḥ

शत्रुओं के प्रमुख वीर मारे जा चुके हैं और अधिकांश दिशाओं में भाग गए हैं। हे राजन्! आप द्रौपदी को लेकर यहाँ से लौट जाइए।

श्लोक 49 (3.272.49)

यमाभ्यां सह राजेन्द्र धौम्येन च महात्मना । प्राप्याश्रमपदं राजन्द्रौपदीं परिसान्त्वय ॥

yamābhyāṃ saha rājendra dhaumyena ca mahātmanā | prāpyāśramapadaṃ rājandraupadīṃ parisāntvaya

हे राजेन्द्र! नकुल-सहदेव और महात्मा धौम्य के साथ आश्रम पहुँचकर द्रौपदी को सान्त्वना दीजिए।

श्लोक 50 (3.272.50)

न हि मे मोक्ष्यतेजीवन्मूढः सैन्धवको नृपः । पातालतलसंस्थोपि यदि शक्रोस्य सारथिः ॥

na hi me mokṣyatejīvanmūḍhaḥ saindhavako nṛpaḥ | pātālatalasaṃsthopi yadi śakrosya sārathiḥ

वह मूढ़ सिन्धुराज मुझसे जीवित नहीं छूटेगा, चाहे वह पाताल के तल में जा छिपे और चाहे स्वयं इन्द्र उसका सारथि बन जाए।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 51 (3.272.51)

न हन्तव्यो महाबाहो दुरात्माऽपि स सैन्धवः । दुःशलामभिसंस्मृत्य गान्धारीं च यशस्विनीम् ॥

na hantavyo mahābāho durātmā'pi sa saindhavaḥ | duḥśalāmabhisaṃsmṛtya gāndhārīṃ ca yaśasvinīm

हे महाबाहु! वह सिन्धुराज दुरात्मा होने पर भी मारा न जाए — दुःशला और यशस्विनी गान्धारी का स्मरण करो।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 52 (3.272.52)

तच्छ्रुत्वा द्रौपदी भीममुवाच व्याकुलेन्द्रिया । कुपिता ह्रीमती प्राज्ञा पती भीमार्जुनावुभौ ॥

tacchrutvā draupadī bhīmamuvāca vyākulendriyā | kupitā hrīmatī prājñā patī bhīmārjunāvubhau

यह सुनकर व्याकुल चित्त वाली, कुपित, लज्जाशील और बुद्धिमती द्रौपदी ने अपने दोनों पतियों भीम और अर्जुन से कहा —

द्रौपद्युवाच

श्लोक 53 (3.272.53)

कर्तव्यं चेत्प्रियं मह्यं वध्यः स पुरुषाधमः । सैन्धवापशदः पापो दुर्मतिः कुलपांसनः ॥

kartavyaṃ cetpriyaṃ mahyaṃ vadhyaḥ sa puruṣādhamaḥ | saindhavāpaśadaḥ pāpo durmatiḥ kulapāṃsanaḥ

यदि मेरा प्रिय करना हो तो उस नराधम का वध होना चाहिए — वह सिन्धुराज नीच, पापी, दुर्बुद्धि और अपने कुल का कलंक है।

श्लोक 54 (3.272.54)

भार्याभिहर्ता वैरी यो यश्च राज्यहरो रिपुः । याचमानोऽपिसंग्रामे न मोक्तव्यः कथंचन ॥

bhāryābhihartā vairī yo yaśca rājyaharo ripuḥ | yācamāno'pisaṃgrāme na moktavyaḥ kathaṃcana

पत्नी का हरण करने वाला शत्रु और राज्य छीनने वाला वैरी — ये युद्ध में प्राणों की भीख माँगें, तब भी इन्हें किसी प्रकार नहीं छोड़ना चाहिए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 55 (3.272.55)

इत्युक्तौ तौ नरव्याघ्रौ ययतुर्यत्र सैन्धवः । राजा निववृतेकृष्णामादाय सपुरोहितः ॥

ityuktau tau naravyāghrau yayaturyatra saindhavaḥ | rājā nivavṛtekṛṣṇāmādāya sapurohitaḥ

ऐसा कहे जाने पर वे दोनों नरव्याघ्र जहाँ सिन्धुराज था, उधर चल पड़े, और राजा युधिष्ठिर कृष्णा को लेकर पुरोहित के साथ लौट आए।

श्लोक 56 (3.272.56)

स प्रविश्याश्रमपदमपविद्धवृसीकटम् । मार्कण्डेयादिभिर्विप्रैरनुकीर्णं ददर्श ह ॥

sa praviśyāśramapadamapaviddhavṛsīkaṭam | mārkaṇḍeyādibhirviprairanukīrṇaṃ dadarśa ha

आश्रम में प्रवेश करके उन्होंने देखा कि ऋषियों के आसन और चटाइयाँ इधर-उधर बिखरी पड़ी हैं और वह मार्कण्डेय आदि ब्राह्मणों से भरा है।

श्लोक 57 (3.272.57)

द्रौपदीमनुशोचद्भिर्ब्राह्मणैस्तैः समाहितैः । समेयाय महाप्राज्ञः सभार्यो भ्रातृमध्यगः ॥

draupadīmanuśocadbhirbrāhmaṇaistaiḥ samāhitaiḥ | sameyāya mahāprājñaḥ sabhāryo bhrātṛmadhyagaḥ

पत्नी सहित, भाइयों के बीच चलते वे महाज्ञानी राजा द्रौपदी के लिए शोक कर रहे उन संयमी ब्राह्मणों से जा मिले।

श्लोक 58 (3.272.58)

ते स्म तं मुदिता दृष्ट्वा पुनरप्यागतं नृपम् । जित्वा तान्सिन्धुसौवीरान्द्रौपदीं चाहृतां पुनः ॥

te sma taṃ muditā dṛṣṭvā punarapyāgataṃ nṛpam | jitvā tānsindhusauvīrāndraupadīṃ cāhṛtāṃ punaḥ

उन सिन्धु-सौवीरों को जीतकर और द्रौपदी को फिर से वापस लाकर लौटे राजा को देखकर वे ब्राह्मण आनन्दित हुए।

श्लोक 59 (3.272.59)

स तैः परिवृतो राजातत्रैवोपविवेश ह । प्रविवेशाश्रमं कृष्णा यमाभ्यां सह भामिनी ॥

sa taiḥ parivṛto rājātatraivopaviveśa ha | praviveśāśramaṃ kṛṣṇā yamābhyāṃ saha bhāminī

उनसे घिरे राजा वहीं बैठ गए, और सुन्दरी कृष्णा नकुल-सहदेव के साथ आश्रम के भीतर चली गईं।

श्लोक 60 (3.272.60)

भीमसेनार्जुनौ चापि श्रुत्वा क्रोशगतं रिपुम् । स्वयमश्वांस्तुदन्तौ तौ जवेनैवाभ्यधावताम् ॥

bhīmasenārjunau cāpi śrutvā krośagataṃ ripum | svayamaśvāṃstudantau tau javenaivābhyadhāvatām

उधर भीमसेन और अर्जुन यह सुनकर कि शत्रु एक कोस आगे निकल गया है, स्वयं घोड़ों को हाँकते हुए वेग से उसके पीछे दौड़े।

श्लोक 61 (3.272.61)

इदमत्यद्भुतं चात्र चकारातिरथोऽर्जुनः । क्रोशमात्रगतानश्वान्सैन्धवस्य जघान यत् ॥

idamatyadbhutaṃ cātra cakārātiratho'rjunaḥ | krośamātragatānaśvānsaindhavasya jaghāna yat

यहाँ अतिरथी अर्जुन ने एक अत्यन्त अद्भुत कार्य किया — एक कोस दूर निकल चुके सिन्धुराज के घोड़ों को उन्होंने मार गिराया।

श्लोक 62 (3.272.62)

स हि दिव्यास्त्रसंपन्नः कृच्छ्रकालेऽप्यसंभ्रमः । अकरोद्दुष्करं कर्म शरैरस्त्रानुमन्त्रितैः ॥

sa hi divyāstrasaṃpannaḥ kṛcchrakāle'pyasaṃbhramaḥ | akarodduṣkaraṃ karma śarairastrānumantritaiḥ

दिव्यास्त्रों से सम्पन्न और संकट के समय भी अविचलित रहने वाले अर्जुन ने अस्त्र-मन्त्रों से अभिमन्त्रित बाणों द्वारा यह दुष्कर कर्म किया।

श्लोक 63 (3.272.63)

ततोऽभ्यधावतां वीरावुभौ भीमधनंजयौ । हताश्वं सैन्धवं भीतमेकं व्याकुलचेतसम् ॥

tato'bhyadhāvatāṃ vīrāvubhau bhīmadhanaṃjayau | hatāśvaṃ saindhavaṃ bhītamekaṃ vyākulacetasam

तब दोनों वीर भीम और धनंजय उस अकेले, भयभीत, व्याकुल चित्त वाले और अश्वहीन सिन्धुराज की ओर दौड़े।

श्लोक 64 (3.272.64)

सैन्धवस्तु हतान्दृष्ट्वा तथाऽश्वान्स्वान्सुदुःखितः । रथात्प्रस्कन्द्य पद्भ्यां वै पलायनपरोऽभवत् ॥

saindhavastu hatāndṛṣṭvā tathā'śvānsvānsuduḥkhitaḥ | rathātpraskandya padbhyāṃ vai palāyanaparo'bhavat

अपने घोड़ों को मरा देखकर अत्यन्त दुःखी सिन्धुराज रथ से कूदकर पैदल ही भाग खड़ा हुआ।

श्लोक 65 (3.272.65)

दृष्ट्वा विक्रमकर्माणि कुर्वाणं च धनंजयम् । पलायनकृतोत्साहः प्राद्रवद्येन वै वनम् ॥

dṛṣṭvā vikramakarmāṇi kurvāṇaṃ ca dhanaṃjayam | palāyanakṛtotsāhaḥ prādravadyena vai vanam

धनंजय को पराक्रम के कार्य करते देख वह भागने का ही उत्साह लिए वन की ओर दौड़ पड़ा।

श्लोक 66 (3.272.66)

सैन्धवं त्वभिसंप्रेक्ष्यपराक्रान्तं पलायने । अनुयाय महाबाहुः फल्गुनो वाक्यमब्रवीत् ॥

saindhavaṃ tvabhisaṃprekṣyaparākrāntaṃ palāyane | anuyāya mahābāhuḥ phalguno vākyamabravīt

सिन्धुराज को भागने में पूरा बल लगाते देख महाबाहु फाल्गुन ने उसका पीछा करते हुए कहा —

अर्जुन उवाच

श्लोक 67 (3.272.67)

अनेन वीर्येण कथं स्त्रियं प्रार्थयसे बलात् । राजपुत्र निवर्तस्व न ते युक्तं पलायनम् ॥

anena vīryeṇa kathaṃ striyaṃ prārthayase balāt | rājaputra nivartasva na te yuktaṃ palāyanam

क्या इसी पराक्रम के बल पर तुम बलपूर्वक स्त्री को पाना चाहते थे? हे राजकुमार, लौटो! भागना तुम्हें शोभा नहीं देता।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 68 (3.272.68)

कथं ह्यनुचरान्हित्वा शत्रुमध्ये पलायसे । इत्युच्यमानः पार्थेन सैन्धवो न न्यवर्तत ॥

kathaṃ hyanucarānhitvā śatrumadhye palāyase | ityucyamānaḥ pārthena saindhavo na nyavartata

"अपने अनुचरों को छोड़कर तुम शत्रुओं के बीच से कैसे भाग रहे हो?" पार्थ के ऐसा कहने पर भी सिन्धुराज नहीं लौटा।

श्लोक 69 (3.272.69)

तिष्ठतिष्ठेति तं भीमः सहसाऽभ्यद्रवद्बली । मा वधीरिति पार्थस्तं दयावान्प्रत्यभाषत ॥

tiṣṭhatiṣṭheti taṃ bhīmaḥ sahasā'bhyadravadbalī | mā vadhīriti pārthastaṃ dayāvānpratyabhāṣata

तब बलवान भीम "ठहर, ठहर!" कहते हुए सहसा उस पर झपटे, किन्तु दयालु पार्थ ने उनसे कहा, "इसे मारना मत।"

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