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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 273

जयद्रथ का अपमान और महादेव का वरदान

जयद्रथ भागता है, पर भीम उसे बालों से पकड़कर पीटते हैं, अचेत कर देते हैं, अर्धचन्द्राकार बाण से उसके सिर पर पाँच चोटियाँ बना देते हैं और उससे स्वयं को पाण्डवों का दास कहने की शर्त मनवाते हैं। युधिष्ठिर और द्रौपदी के कहने पर उसे छोड़ दिया जाता है और युधिष्ठिर उसे धिक्कारकर विदा करते हैं। लज्जित जयद्रथ गङ्गाद्वार में तप करके महादेव से यह वर पाता है कि वह एक दिन युद्ध में अर्जुन को छोड़कर शेष चार पाण्डवों को रोक सकेगा। महादेव इसका कारण बताते हैं — प्रलय-सागर पर विष्णु का शयन, ब्रह्मा का जन्म, और वराह, नृसिंह तथा वामन अवतार — और कहते हैं कि वही विष्णु कृष्ण के रूप में जन्म लेकर अर्जुन की रक्षा करते हैं।

अध्याय 272अध्याय-सूचीअध्याय 274

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.273.1)

जयद्रथस्तु संप्रेक्ष्यभ्रातरावुद्यतायुधौ । प्राद्रवत्तूर्णमव्यग्रो जीवितेप्सुः सुदुःखितः ॥

jayadrathastu saṃprekṣyabhrātarāvudyatāyudhau | prādravattūrṇamavyagro jīvitepsuḥ suduḥkhitaḥ

दोनों भाइयों को शस्त्र उठाए देखकर अत्यन्त दुःखी जयद्रथ अपने प्राण बचाने की इच्छा से बिना इधर-उधर देखे तेज़ी से भाग खड़ा हुआ।

श्लोक 2 (3.273.2)

लताभिः संवृते कक्षे किरीटं रत्नभास्वरम् । अपविध्यप्रधावन्तं निलीयन्तं वनान्तरे ॥

latābhiḥ saṃvṛte kakṣe kirīṭaṃ ratnabhāsvaram | apavidhyapradhāvantaṃ nilīyantaṃ vanāntare

लताओं से ढकी एक झाड़ी में उसने रत्नों से चमकता अपना मुकुट फेंक दिया और भागता हुआ वन के भीतर छिपने का प्रयास करने लगा।

श्लोक 3 (3.273.3)

भीमसेनस्तु तं कक्षे लीयमानं भयाकुलम् । मार्गमाणोऽवतीर्याशु रथाद्रत्नविभूषितात् । अभिद्रुत्य निजग्राहकेशपक्षे ह्यमर्षणः ॥

bhīmasenastu taṃ kakṣe līyamānaṃ bhayākulam | mārgamāṇo'vatīryāśu rathādratnavibhūṣitāt | abhidrutya nijagrāhakeśapakṣe hyamarṣaṇaḥ

भय से व्याकुल होकर झाड़ी में छिपे जयद्रथ को खोजते हुए भीमसेन तुरन्त अपने रत्नजटित रथ से उतरे और अपमान को सह न सकने के कारण दौड़कर उन्होंने उसे बालों से पकड़ लिया।

श्लोक 4 (3.273.4)

समुद्यम्य च तं भीमो निष्पिपेष महीतले । गले गृहीत्वाराजानं पातयामास चैव ह ॥

samudyamya ca taṃ bhīmo niṣpipeṣa mahītale | gale gṛhītvārājānaṃ pātayāmāsa caiva ha

भीम ने उसे ऊपर उठाकर धरती पर पटककर रगड़ डाला, और फिर राजा का गला पकड़कर उसे नीचे गिरा दिया।

श्लोक 5 (3.273.5)

पुनः स जीवमानस्य तस्योत्पतितुमिच्छतः । पदा मूर्ध्नि महाबाहुः प्राहरद्विलपिष्यतः ॥

punaḥ sa jīvamānasya tasyotpatitumicchataḥ | padā mūrdhni mahābāhuḥ prāharadvilapiṣyataḥ

जब वह जीवित ही था और विलाप करता हुआ फिर उठना चाहता था, तब महाबाहु भीम ने उसके सिर पर पैर से प्रहार किया।

श्लोक 6 (3.273.6)

तस्य जानू ददौ भीमो जघ्ने चैनमरत्निना । स मोहमगमद्राजा प्रहारवरपीडितः ॥

tasya jānū dadau bhīmo jaghne cainamaratninā | sa mohamagamadrājā prahāravarapīḍitaḥ

भीम ने उस पर घुटने टिका दिए और कोहनी से उस पर प्रहार किया; उन भारी प्रहारों से पीड़ित होकर राजा मूर्छित हो गया।

श्लोक 7 (3.273.7)

सरोषं भीमसेनं तु वारयामास फल्गुनः । दुःशलायाः कृतेराजा यत्त्वामाहेति कौरव ॥

saroṣaṃ bhīmasenaṃ tu vārayāmāsa phalgunaḥ | duḥśalāyāḥ kṛterājā yattvāmāheti kaurava

तब फाल्गुन (अर्जुन) ने क्रोध से भरे भीमसेन को रोका और कहा — "हे कौरव, दुःशला के लिए राजा ने तुमसे जो कहा था, उसे याद करो।"

भीम उवाच

श्लोक 8 (3.273.8)

नायं पापसमाचारो मत्तो जीवितुमर्हति । कृष्णायास्तदनर्हायाः परिक्लेष्टा नराधमः ॥

nāyaṃ pāpasamācāro matto jīvitumarhati | kṛṣṇāyāstadanarhāyāḥ parikleṣṭā narādhamaḥ

भीम बोले — "इस पापाचारी नराधम ने कृष्णा (द्रौपदी) को ऐसा कष्ट दिया है जिसकी वह कभी अधिकारी नहीं थी; यह मेरे हाथों जीवित बचने योग्य नहीं है।

श्लोक 9 (3.273.9)

किंनु शक्यं मया कर्तुं यद्राजा सततं घृणी । त्वं च बालिशया बुद्ध्या सदैवास्मान्प्रबाधसे ॥

kiṃnu śakyaṃ mayā kartuṃ yadrājā satataṃ ghṛṇī | tvaṃ ca bāliśayā buddhyā sadaivāsmānprabādhase

"पर मैं क्या कर सकता हूँ, जब राजा सदा दया ही करते रहते हैं? और तुम भी अपनी बालबुद्धि से हमें सदा रोकते रहते हो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 10 (3.273.10)

एवमुक्त्वा सटास्तस्य पञ्चचक्रे वृकोदरः । अर्धचन्द्रेण बाणेन किंचिदब्रुवतस्तदा ॥

evamuktvā saṭāstasya pañcacakre vṛkodaraḥ | ardhacandreṇa bāṇena kiṃcidabruvatastadā

यह कहकर वृकोदर ने अर्धचन्द्राकार बाण से उसके केश मूँडकर पाँच चोटियाँ छोड़ दीं; उस समय जयद्रथ कुछ भी नहीं बोला।

श्लोक 11 (3.273.11)

विकल्पयित्वा राजानं ततः प्राह वृकोदरः । जीवितुं चेच्छसे मूढ हेतुं मे गदतः शृणु ॥

vikalpayitvā rājānaṃ tataḥ prāha vṛkodaraḥ | jīvituṃ cecchase mūḍha hetuṃ me gadataḥ śṛṇu

राजा को इस प्रकार विरूप करके वृकोदर ने उससे कहा — "मूर्ख, यदि तू जीना चाहता है तो मुझसे इसकी शर्त सुन।

भीम उवाच

श्लोक 12 (3.273.12)

दासोस्मीति त्वया वाच्यं संसत्सु च सभासु च । एवं चेज्जीवितं दद्यामेष युद्धजितो विधिः ॥

dāsosmīti tvayā vācyaṃ saṃsatsu ca sabhāsu ca | evaṃ cejjīvitaṃ dadyāmeṣa yuddhajito vidhiḥ

"तुझे सभाओं और जनसमूहों में कहना होगा कि 'मैं दास हूँ।' इसी शर्त पर मैं तुझे जीवनदान दूँगा; युद्ध में जीते गए के लिए यही नियम है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 13 (3.273.13)

एवमस्त्विति तं राजा कृच्छ्रप्राणो जयद्रथः । प्रोवाच पुरुषव्याघ्रं भीममाहवशोभिनम् ॥

evamastviti taṃ rājā kṛcchraprāṇo jayadrathaḥ | provāca puruṣavyāghraṃ bhīmamāhavaśobhinam

जिसके प्राण संकट में थे, उस राजा जयद्रथ ने युद्ध में शोभा पाने वाले पुरुषसिंह भीम से कहा — "ऐसा ही हो।"

श्लोक 14 (3.273.14)

तत एनं विचेष्टन्तं बद्ध्वा पार्थो वृकोदरः । रथमारोपयामास विसंज्ञं पांसुगुण्ठितम् ॥

tata enaṃ viceṣṭantaṃ baddhvā pārtho vṛkodaraḥ | rathamāropayāmāsa visaṃjñaṃ pāṃsuguṇṭhitam

तब पृथापुत्र वृकोदर ने छटपटाते हुए उसे बाँध लिया और धूल से सने, अचेत जयद्रथ को रथ पर डाल दिया।

श्लोक 15 (3.273.15)

ततस्तं रथमास्थाय भीमः पार्थानुगस्तदा । अग्र्यमाश्रममध्यस्थमभ्यगच्छद्युधिष्ठिरम् ॥

tatastaṃ rathamāsthāya bhīmaḥ pārthānugastadā | agryamāśramamadhyasthamabhyagacchadyudhiṣṭhiram

फिर भीम उसी रथ पर बैठकर, अर्जुन को साथ लिए, आश्रम के मध्य में बैठे ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिर के पास पहुँचे।

श्लोक 16 (3.273.16)

दर्शयामास भीमस्तु तदवस्थं जयद्रथम् । तं राजा प्राहसद्दृष्ट्वा मुच्यतामिति चाब्रवीत् ॥

darśayāmāsa bhīmastu tadavasthaṃ jayadratham | taṃ rājā prāhasaddṛṣṭvā mucyatāmiti cābravīt

भीम ने उस दशा में पड़े जयद्रथ को उन्हें दिखाया। उसे देखकर राजा हँस पड़े और बोले — "इसे छोड़ दो।"

श्लोक 17 (3.273.17)

राजानं चाब्रवीद्भीमो द्रौपद्यै कथयेति वै । दासभावं गतो ह्येष पाण्डूनां पापचेतनः ॥

rājānaṃ cābravīdbhīmo draupadyai kathayeti vai | dāsabhāvaṃ gato hyeṣa pāṇḍūnāṃ pāpacetanaḥ

भीम ने राजा से कहा — "द्रौपदी को बता दीजिए कि यह पापबुद्धि अब पाण्डवों का दास बन चुका है।"

श्लोक 18 (3.273.18)

तमुवाच ततो ज्येष्ठो भ्राता सप्रणयं वचः । मुञ्चेममधमाचारं प्रमाणा यदि ते वयम् ॥

tamuvāca tato jyeṣṭho bhrātā sapraṇayaṃ vacaḥ | muñcemamadhamācāraṃ pramāṇā yadi te vayam

तब बड़े भाई ने उनसे स्नेहपूर्वक कहा — "यदि हमारी बात तुम्हारे लिए प्रमाण है, तो इस अधम आचरण वाले को छोड़ दो।"

श्लोक 19 (3.273.19)

द्रौपदी चाब्रवीद्भीममभिप्रेक्ष्य युधिष्ठिरम् । दासोऽयंमुच्यतां राज्ञस्त्वयापञ्चशिखः कृतः ॥

draupadī cābravīdbhīmamabhiprekṣya yudhiṣṭhiram | dāso'yaṃmucyatāṃ rājñastvayāpañcaśikhaḥ kṛtaḥ

और द्रौपदी ने युधिष्ठिर की ओर देखकर भीम से कहा — "यह अब राजा का दास है, इसे छोड़ दो। तुमने इसके सिर पर पाँच चोटियाँ तो बना ही दी हैं।"

श्लोक 20 (3.273.20)

एवमुक्तः स भीमस्तु भ्रात्रा चैव च कृष्णया । मुमोच तं महापापं जयद्रथमचेतनम् ॥

evamuktaḥ sa bhīmastu bhrātrā caiva ca kṛṣṇayā | mumoca taṃ mahāpāpaṃ jayadrathamacetanam

भाई और कृष्णा के ऐसा कहने पर भीम ने उस महापापी, अचेत पड़े जयद्रथ को छोड़ दिया।

श्लोक 21 (3.273.21)

स मुक्तोऽभ्येत्यराजानमभिवाद्य युधिष्ठिरम् । ववन्दे विह्वलोराजातांश्च वृद्धान्मुनींस्तदा ॥

sa mukto'bhyetyarājānamabhivādya yudhiṣṭhiram | vavande vihvalorājātāṃśca vṛddhānmunīṃstadā

छूटने पर वह राजा युधिष्ठिर के पास आया और उन्हें प्रणाम किया; फिर काँपते हुए उसने वहाँ उपस्थित वृद्ध मुनियों को भी नमस्कार किया।

श्लोक 22 (3.273.22)

तमुवाच घृणी राजा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । तथाजयद्रथं दृष्ट्वा गृहीतं सव्यसाचिना ॥

tamuvāca ghṛṇī rājā dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ | tathājayadrathaṃ dṛṣṭvā gṛhītaṃ savyasācinā

जयद्रथ को सव्यसाची (अर्जुन) द्वारा इस प्रकार बन्दी बना देखकर दयालु धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर ने उससे कहा —

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 23 (3.273.23)

अदासो गच्छ मुक्तोसि मैवं कार्षीः पुनः क्वचित् । स्त्रीकामुक धिगस्तु त्वां क्षुद्रः क्षत्रसहायवान् ॥

adāso gaccha muktosi maivaṃ kārṣīḥ punaḥ kvacit | strīkāmuka dhigastu tvāṃ kṣudraḥ kṣatrasahāyavān

"जाओ, तुम दास नहीं हो, तुम मुक्त हो। फिर कभी ऐसा मत करना। हे स्त्रीलोलुप, तुम्हें धिक्कार है! क्षत्रिय साथियों के होते हुए भी तुम नीच हो।

श्लोक 24 (3.273.24)

एवंविधं हि कः कुर्यात्त्वदन्यः पुरुषाधमः । कर्म धर्मविरुद्धं वै लोकदुष्टं च दुर्मते ॥

evaṃvidhaṃ hi kaḥ kuryāttvadanyaḥ puruṣādhamaḥ | karma dharmaviruddhaṃ vai lokaduṣṭaṃ ca durmate

"हे दुर्बुद्धि, तुम्हारे सिवा और कौन नराधम ऐसा धर्मविरुद्ध और लोकनिन्दित कर्म करेगा?"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 25 (3.273.25)

गतसत्त्वमिव ज्ञात्वा कर्तारमशुभस्य तम् । संप्रेक्ष्यभरतश्रेष्ठः कृपां चक्रे नराधिपः ॥

gatasattvamiva jñātvā kartāramaśubhasya tam | saṃprekṣyabharataśreṣṭhaḥ kṛpāṃ cakre narādhipaḥ

उस अशुभ कर्म करने वाले को मानो निष्प्राण-सा देखकर भरतश्रेष्ठ राजा को उस पर दया आ गई।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 26 (3.273.26)

धर्मे ते वर्धतां बुद्धिर्मा चाधर्मे मनः कृथाः । साश्वः सरथपादातः स्वस्ति गच्छ जयद्रथ ॥

dharme te vardhatāṃ buddhirmā cādharme manaḥ kṛthāḥ | sāśvaḥ sarathapādātaḥ svasti gaccha jayadratha

"तुम्हारी बुद्धि धर्म में बढ़े; अधर्म में मन मत लगाओ। हे जयद्रथ, अपने घोड़ों, रथों और पैदल सैनिकों के साथ कुशलपूर्वक जाओ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 27 (3.273.27)

एवमुक्तस्तु सव्रीडं तूष्णीं किंचिदवाङ्मुखः । जगाम राजा दुःखार्तो गङ्गाद्वाराय भारत ॥

evamuktastu savrīḍaṃ tūṣṇīṃ kiṃcidavāṅmukhaḥ | jagāma rājā duḥkhārto gaṅgādvārāya bhārata

ऐसा कहे जाने पर लज्जित, मौन और कुछ सिर झुकाए वह राजा दुःख से व्याकुल होकर, हे भारत, गङ्गाद्वार चला गया।

श्लोक 28 (3.273.28)

स देवं शरणं गत्वा विरूपाक्षमुमापतिम् । तपश्चचार विपुलं तस्य प्रीतो वृषध्वजः ॥

sa devaṃ śaraṇaṃ gatvā virūpākṣamumāpatim | tapaścacāra vipulaṃ tasya prīto vṛṣadhvajaḥ

वहाँ उसने विरूपाक्ष उमापति महादेव की शरण लेकर घोर तपस्या की। वृषभध्वज भगवान् उस पर प्रसन्न हुए।

श्लोक 29 (3.273.29)

बलिं स्वयं प्रत्यगृह्णात्प्रीयमाणस्त्रिलोचनः । वरं चास्मै ददौ देवः स जग्राह च तच्छृणु ॥

baliṃ svayaṃ pratyagṛhṇātprīyamāṇastrilocanaḥ | varaṃ cāsmai dadau devaḥ sa jagrāha ca tacchṛṇu

प्रसन्न होकर त्रिनेत्र महादेव ने स्वयं उसकी भेंट स्वीकार की और उसे वर दिया। उसने जो वर माँगा, वह सुनो।

श्लोक 30 (3.273.30)

समस्तान्सरथान्पञ्चजयेयं युधि पाण्डवान् । इति राजाऽब्रवीद्देवं नेति देवस्तमब्रवीत् ॥

samastānsarathānpañcajayeyaṃ yudhi pāṇḍavān | iti rājā'bravīddevaṃ neti devastamabravīt

राजा ने देव से कहा — "मैं युद्ध में रथों सहित पाँचों पाण्डवों को जीत लूँ।" देव ने उत्तर दिया — "नहीं।"

महादेव उवाच

श्लोक 31 (3.273.31)

अजय्यांश्चाप्यवध्यांश्च वारयिष्यसि तान्युधि । ऋतेऽर्जुनं महाबाहुं नरं नाम सुरेश्वरम् ॥

ajayyāṃścāpyavadhyāṃśca vārayiṣyasi tānyudhi | ṛte'rjunaṃ mahābāhuṃ naraṃ nāma sureśvaram

"वे अजेय और अवध्य हैं, फिर भी तुम युद्ध में उन्हें रोक सकोगे — केवल महाबाहु अर्जुन को छोड़कर, जो नर नामक देवश्रेष्ठ हैं,

श्लोक 32 (3.273.32)

बदर्यां तप्ततपसं नारायणसहायकम् । अजितं सर्वलोकानां देवैरपि दुरासदम् ॥

badaryāṃ taptatapasaṃ nārāyaṇasahāyakam | ajitaṃ sarvalokānāṃ devairapi durāsadam

"जिन्होंने बदरी में नारायण के साथ तप किया है, जिन्हें समस्त लोक नहीं जीत सकते और देवता भी जिनके सामने नहीं ठहर सकते।

श्लोक 33 (3.273.33)

मया दत्तं पाशुपतं दिव्यमप्रतिमं शरम् । अवाप लोकपालेभ्यो वज्रादीन्स महाशरान् ॥

mayā dattaṃ pāśupataṃ divyamapratimaṃ śaram | avāpa lokapālebhyo vajrādīnsa mahāśarān

"मैंने उसे दिव्य और अनुपम पाशुपत अस्त्र दिया है, और लोकपालों से उसने वज्र आदि महान् अस्त्र प्राप्त किए हैं।

श्लोक 34 (3.273.34)

देवदेवो ह्यनन्तात्मा विष्णुः सुरगुरुः प्रभुः । प्रधानपुरुषोऽव्यक्तोविश्वात्माविश्वमूर्तिमान् ॥

devadevo hyanantātmā viṣṇuḥ suraguruḥ prabhuḥ | pradhānapuruṣo'vyaktoviśvātmāviśvamūrtimān

"देवों के देव, अनन्तात्मा विष्णु देवताओं के गुरु और प्रभु हैं — वही प्रधान और पुरुष हैं, वही अव्यक्त हैं, वही विश्व के आत्मा हैं और विश्व ही उनका रूप है।

श्लोक 35 (3.273.35)

युगान्तकाले संप्राप्ते कालाग्निर्दहते जगत् । सपर्वतार्णवद्वीपं सशैलवनकाननम् । निर्दहन्नागलोकांश्चपातालतलचारिणः ॥

yugāntakāle saṃprāpte kālāgnirdahate jagat | saparvatārṇavadvīpaṃ saśailavanakānanam | nirdahannāgalokāṃścapātālatalacāriṇaḥ

"युग का अन्त आने पर वही कालाग्नि बनकर पर्वतों, समुद्रों, द्वीपों, शैलों, वनों और उपवनों सहित संसार को जला डालते हैं, और पाताल में रहने वाले नागों के लोकों को भी भस्म कर देते हैं।

श्लोक 36 (3.273.36)

अथान्तरिक्षे सुमहन्नानावर्णाः पयोधराः । घोरस्वरा विनदिनस्तटिन्मालावलम्बिनः । समुत्तिष्ठन्दिशः सर्वाविवर्षन्तः समन्ततः ॥

athāntarikṣe sumahannānāvarṇāḥ payodharāḥ | ghorasvarā vinadinastaṭinmālāvalambinaḥ | samuttiṣṭhandiśaḥ sarvāvivarṣantaḥ samantataḥ

"तब आकाश में अनेक रंगों के विशाल मेघ भयंकर गर्जना करते और बिजली की मालाएँ धारण किए सब दिशाओं में उठते हैं और चारों ओर वर्षा करते हैं।

श्लोक 37 (3.273.37)

ततोऽग्निं शमयामासुः संवर्ताग्निनियामकाः । अक्षमात्रैश्च धाराभिस्तिष्ठन्त्यापूर्य सर्वशः ॥

tato'gniṃ śamayāmāsuḥ saṃvartāgniniyāmakāḥ | akṣamātraiśca dhārābhistiṣṭhantyāpūrya sarvaśaḥ

"प्रलयाग्नि को वश में करने वाले वे मेघ रथ के धुरे जितनी मोटी धाराओं से उस अग्नि को शान्त कर देते हैं और सब ओर जल भरकर स्थित रहते हैं।

श्लोक 38 (3.273.38)

एकार्णवे तदातस्मिन्नुपशान्तचराचरे । नष्टचन्द्रार्कपवने ग्रहनक्षत्रवर्जिते । चतुर्युगसहस्रान्ते सलिलेनाप्लुता मही ॥

ekārṇave tadātasminnupaśāntacarācare | naṣṭacandrārkapavane grahanakṣatravarjite | caturyugasahasrānte salilenāplutā mahī

"तब उस एकार्णव में, जब समस्त चर-अचर शान्त हो जाते हैं, चन्द्रमा, सूर्य और वायु नहीं रहते और ग्रह-नक्षत्र भी लुप्त हो जाते हैं, एक हज़ार चतुर्युगों के अन्त में पृथ्वी जल में डूबी रहती है।

श्लोक 39 (3.273.39)

ततो नारायणाख्यस्तु सहस्राक्षः सहस्रपात् । सहस्रशीर्षा पुरुषः स्वप्तुकामस्त्वतीन्द्रियः ॥

tato nārāyaṇākhyastu sahasrākṣaḥ sahasrapāt | sahasraśīrṣā puruṣaḥ svaptukāmastvatīndriyaḥ

"तब इन्द्रियों से परे, सहस्र नेत्रों, सहस्र चरणों और सहस्र सिरों वाले नारायण नामक पुरुष शयन करने की इच्छा से —

श्लोक 40 (3.273.40)

फणासहस्रविकटं शेषं पर्यङ्कभोगिनम् । सहस्रमिव तिग्मांशुसंघातममितद्युतिम् । कुन्देन्दुहारगोक्षीरमृणालकुमुदप्रभम् ॥

phaṇāsahasravikaṭaṃ śeṣaṃ paryaṅkabhoginam | sahasramiva tigmāṃśusaṃghātamamitadyutim | kundenduhāragokṣīramṛṇālakumudaprabham

"— हज़ार फनों से विकराल, शय्या बनकर सेवा करने वाले शेषनाग पर विराजते हैं, जो एक साथ इकट्ठे हज़ार सूर्यों के समान अपार कान्ति वाले हैं और कुन्द, चन्द्रमा, मोतियों के हार, गोदुग्ध, कमलनाल तथा कुमुद के समान उज्ज्वल हैं।

श्लोक 41 (3.273.41)

तत्रासौ भगवान्देवः स्वपञ्जलनिधौ तदा । नैशेन तमसा व्याप्तां स्वां रात्रिंकुरुते विभुः ॥

tatrāsau bhagavāndevaḥ svapañjalanidhau tadā | naiśena tamasā vyāptāṃ svāṃ rātriṃkurute vibhuḥ

"वहाँ समुद्र पर शयन करते हुए वे सर्वव्यापी भगवान् रात्रि के अन्धकार से व्याप्त अपनी रात्रि रचते हैं।

श्लोक 42 (3.273.42)

सत्वोद्रेकात्प्रबुद्धस्तु शून्यं लोकमपश्यत । इमं चोदाहरन्त्यत्रश्लोकं नारायणं प्रति ॥

satvodrekātprabuddhastu śūnyaṃ lokamapaśyata | imaṃ codāharantyatraślokaṃ nārāyaṇaṃ prati

"सत्त्वगुण के उदय से जागकर उन्होंने संसार को शून्य देखा। नारायण के विषय में यहाँ यह श्लोक कहा जाता है —

श्लोक 43 (3.273.43)

आपो नारास्तत्तनव इत्यपां नाम शुश्रुम । अयनं तेन चैवास्ते तेन नारायणः स्मृतः ॥

āpo nārāstattanava ityapāṃ nāma śuśruma | ayanaṃ tena caivāste tena nārāyaṇaḥ smṛtaḥ

"'जल को नार कहते हैं, क्योंकि वे उन्हीं के शरीर हैं' — जल का यह नाम हमने सुना है। वही जल उनका अयन अर्थात् निवास है, उसी में वे रहते हैं; इसलिए वे नारायण कहलाते हैं।

श्लोक 44 (3.273.44)

प्रध्यानसमकालं तुप्रजाहेतोः सनातनः । ध्यातमात्रे तु भगवन्नाभ्यां पद्मः समुत्थितः ॥

pradhyānasamakālaṃ tuprajāhetoḥ sanātanaḥ | dhyātamātre tu bhagavannābhyāṃ padmaḥ samutthitaḥ

"जैसे ही उन सनातन ने प्रजा की सृष्टि का ध्यान किया, ध्यान करते ही भगवान् की नाभि से एक कमल प्रकट हुआ।

श्लोक 45 (3.273.45)

ततश्चतुर्मुखो ब्रह्मा नाभिपद्माद्विनिःसृतः । तत्रोपविष्टः सहसा ब्रह्मा लोकपितामहः ॥

tataścaturmukho brahmā nābhipadmādviniḥsṛtaḥ | tatropaviṣṭaḥ sahasā brahmā lokapitāmahaḥ

"तब नाभिकमल से चतुर्मुख ब्रह्मा प्रकट हुए, और लोकपितामह ब्रह्मा तुरन्त वहीं आसीन हो गए।

श्लोक 46 (3.273.46)

शून्यं दृष्ट्वा जगत्कृत्स्नं मानसानात्मनः समान् । ततो मरीचिप्रमुखान्महर्षीनसृजन्नव ॥

śūnyaṃ dṛṣṭvā jagatkṛtsnaṃ mānasānātmanaḥ samān | tato marīcipramukhānmaharṣīnasṛjannava

"समस्त जगत् को शून्य देखकर उन्होंने अपने ही समान मरीचि आदि नौ मानस महर्षियों की सृष्टि की।

श्लोक 47 (3.273.47)

तेऽसृजन्सर्वभूतानि त्रसानि स्थावराणि च । यक्षराक्षसभूतानि पिशाचोरगमानुषान् ॥

te'sṛjansarvabhūtāni trasāni sthāvarāṇi ca | yakṣarākṣasabhūtāni piśācoragamānuṣān

"उन्होंने चर और अचर सब प्राणियों की सृष्टि की — यक्ष, राक्षस, भूत, पिशाच, नाग और मनुष्य।

श्लोक 48 (3.273.48)

सृजते ब्रह्ममूर्तिस्तु रक्षते पौरुषी तनुः । रौद्री भावेन शमयेत्तिस्रोऽवस्थाः प्रजापतेः ॥

sṛjate brahmamūrtistu rakṣate pauruṣī tanuḥ | raudrī bhāvena śamayettisro'vasthāḥ prajāpateḥ

"ब्रह्मा के रूप में वे सृष्टि करते हैं, पुरुष-रूप से रक्षा करते हैं और रुद्र-भाव से संहार करते हैं — प्रजापति की ये तीन अवस्थाएँ हैं।

श्लोक 49 (3.273.49)

न श्रुतं ते सिन्धुपते विष्णोरद्भुतकर्मणः । कथ्यमानानि मुनिभिर्ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ॥

na śrutaṃ te sindhupate viṣṇoradbhutakarmaṇaḥ | kathyamānāni munibhirbrāhmaṇairvedapāragaiḥ

"हे सिन्धुराज, क्या तुमने अद्भुत कर्म करने वाले विष्णु के वे कर्म नहीं सुने, जिनका वर्णन मुनि और वेदपारंगत ब्राह्मण करते हैं?

श्लोक 50 (3.273.50)

जलेन समनुप्राप्ते सर्वतः पृथिवीतले । तदा चैकार्णवे तस्मिन्नेकाकाशे प्रभुश्चरन् ॥

jalena samanuprāpte sarvataḥ pṛthivītale | tadā caikārṇave tasminnekākāśe prabhuścaran

"जब पृथ्वीतल चारों ओर से जल में डूब गया, तब उस एकार्णव में, जहाँ सब कुछ एक ही आकाश था, प्रभु विचरण करते हुए —

श्लोक 51 (3.273.51)

निशायामिव खद्योतः प्रावृट्‌काले समन्ततः । प्रतिष्ठानाय पृथिवीं मार्गमाणस्तदाऽभवत् ॥

niśāyāmiva khadyotaḥ prāvṛṭkāle samantataḥ | pratiṣṭhānāya pṛthivīṃ mārgamāṇastadā'bhavat

"वर्षा ऋतु की रात में जुगनू की भाँति सब ओर घूमते हुए, उसे स्थिर आधार देने के लिए पृथ्वी को खोजने लगे।

श्लोक 52 (3.273.52)

जले निमग्नां गां दृष्ट्वाचोद्धर्तुं मनसेच्छति । किंनु रूपमहं कृत्वासलिलादुद्धरे महीम् ॥

jale nimagnāṃ gāṃ dṛṣṭvācoddhartuṃ manasecchati | kiṃnu rūpamahaṃ kṛtvāsalilāduddhare mahīm

"पृथ्वी को जल में डूबी देखकर उन्होंने मन में उसे ऊपर उठाने का संकल्प किया — 'कौन-सा रूप धारण करके मैं पृथ्वी को जल से निकालूँ?'

श्लोक 53 (3.273.53)

एवं संचिन्त्य मनसा दृष्ट्वा दिव्येन चक्षुषा । जलक्रीडाभिरुचितं वाराहं रूपमस्मरत् ॥

evaṃ saṃcintya manasā dṛṣṭvā divyena cakṣuṣā | jalakrīḍābhirucitaṃ vārāhaṃ rūpamasmarat

"मन में ऐसा विचार करके और दिव्य दृष्टि से देखकर उन्होंने जलक्रीड़ा में रुचि रखने वाले वराह के रूप का स्मरण किया।

श्लोक 54 (3.273.54)

कृत्वा वराहवपुषं वाङ्मयं वेदसंमितम् । दशयोजनविस्तीर्णमायतं शतयोजनम् ॥

kṛtvā varāhavapuṣaṃ vāṅmayaṃ vedasaṃmitam | daśayojanavistīrṇamāyataṃ śatayojanam

"उन्होंने वाणीमय, वेद के प्रमाण वाला वराह-शरीर धारण किया, जो दस योजन चौड़ा और सौ योजन लम्बा था,

श्लोक 55 (3.273.55)

महापर्वतवर्ष्माभं तीक्ष्णदंष्ट्रंप्रदीप्तिमत् । महामेघौघनिर्घोषं नीलजीमूतसन्निभम् ॥

mahāparvatavarṣmābhaṃ tīkṣṇadaṃṣṭraṃpradīptimat | mahāmeghaughanirghoṣaṃ nīlajīmūtasannibham

"जिसका शरीर विशाल पर्वत के समान था, दाढ़ें तीखी थीं, जो दमक रहा था, जिसकी गर्जना महामेघों के समूह जैसी थी और जो नीले बादल के समान श्याम था।

श्लोक 56 (3.273.56)

भूत्वा यज्ञवराहो वै अपः संप्राविशत्प्रभुः । दंष्ट्रेणैकेन चोद्धृत्यस्वे स्थाने न्यविशन्महीम् ॥

bhūtvā yajñavarāho vai apaḥ saṃprāviśatprabhuḥ | daṃṣṭreṇaikena coddhṛtyasve sthāne nyaviśanmahīm

"यज्ञवराह बनकर प्रभु जल में प्रविष्ट हुए और एक ही दाढ़ से पृथ्वी को उठाकर उन्होंने उसे उसके अपने स्थान पर स्थापित कर दिया।

श्लोक 57 (3.273.57)

पुनरेव महाबाहुरपूर्वां तनुमाश्रितः । नरस्य कृत्वाऽर्धतनुं सिंहस्यार्धतनुं प्रभुः ॥

punareva mahābāhurapūrvāṃ tanumāśritaḥ | narasya kṛtvā'rdhatanuṃ siṃhasyārdhatanuṃ prabhuḥ

"फिर महाबाहु प्रभु ने एक अपूर्व शरीर धारण किया — आधा मनुष्य का और आधा सिंह का।

श्लोक 58 (3.273.58)

दैत्येन्द्रस्य सभां गत्वापाणिं संस्पृश्यपाणिना । दैत्यानामादिपुरुषः सुरारिर्दितिनन्दनः ॥

daityendrasya sabhāṃ gatvāpāṇiṃ saṃspṛśyapāṇinā | daityānāmādipuruṣaḥ surārirditinandanaḥ

"वे दैत्यराज की सभा में गए और हाथ से हाथ बजाकर ताल ठोकी। तब दैत्यों का आदिपुरुष, देवताओं का शत्रु, दिति का पुत्र —

श्लोक 59 (3.273.59)

दृष्ट्वा चापूर्ववपुषं क्रोधात्संरक्तलोचनः । शूलोद्यतकरः स्रग्वी हिरण्यकशिपुस्तदा ॥

dṛṣṭvā cāpūrvavapuṣaṃ krodhātsaṃraktalocanaḥ | śūlodyatakaraḥ sragvī hiraṇyakaśipustadā

"हिरण्यकशिपु ने उस अपूर्व शरीर को देखा; क्रोध से उसकी आँखें लाल हो गईं, गले में माला पहने और हाथ में त्रिशूल उठाए —

श्लोक 60 (3.273.60)

मेघस्तनितनिर्घोषो नीलाभ्रचयसन्निभः । देवारिर्दितिजो वीरो नृसिंहं समुपाद्रवत् ॥

meghastanitanirghoṣo nīlābhracayasannibhaḥ | devārirditijo vīro nṛsiṃhaṃ samupādravat

"मेघगर्जन के समान गरजता और काले बादलों के ढेर-सा दिखता वह वीर देवशत्रु दितिपुत्र नृसिंह पर टूट पड़ा।

श्लोक 61 (3.273.61)

समुत्पत्य ततस्तीक्ष्णैर्मृगेन्द्रेण बलीयसा । नारसिंहेन वपुषादारितः करजैर्भृशम् ॥

samutpatya tatastīkṣṇairmṛgendreṇa balīyasā | nārasiṃhena vapuṣādāritaḥ karajairbhṛśam

"तब उस अत्यन्त बलशाली मृगराज ने उछलकर नरसिंह-रूप से अपने तीखे नखों द्वारा उसे बुरी तरह चीर डाला।

श्लोक 62 (3.273.62)

एवं निहत्य भगवान्दैत्येन्द्रं रिपुघातिनम् । भूयोऽन्यः पुण्डरीकाक्षः प्रभुर्लोकहिताय च । कश्यपस्यात्मजः श्रीमानदित्या गर्भधारितः ॥

evaṃ nihatya bhagavāndaityendraṃ ripughātinam | bhūyo'nyaḥ puṇḍarīkākṣaḥ prabhurlokahitāya ca | kaśyapasyātmajaḥ śrīmānadityā garbhadhāritaḥ

"इस प्रकार शत्रुओं का नाश करने वाले दैत्यराज का वध करके कमलनयन भगवान् लोकहित के लिए फिर दूसरे रूप में आए — कश्यप के तेजस्वी पुत्र बनकर, जिन्हें अदिति ने गर्भ में धारण किया।

श्लोक 63 (3.273.63)

पूर्णे वर्षसहस्रे तु प्रसूता गर्भमुत्तमम् ॥

pūrṇe varṣasahasre tu prasūtā garbhamuttamam

"पूरे एक हज़ार वर्ष बीतने पर अदिति ने उस उत्तम गर्भ को जन्म दिया।

श्लोक 64 (3.273.64)

दुर्दिनाम्भोदसदृशो दीप्ताक्षो वामनाकृतिः । दण्डी कमण्डलुधरः श्रीवत्सोरसि भूषितः । जटी यज्ञोपवीती च भगवान्बालरूपधृक् ॥

durdināmbhodasadṛśo dīptākṣo vāmanākṛtiḥ | daṇḍī kamaṇḍaludharaḥ śrīvatsorasi bhūṣitaḥ | jaṭī yajñopavītī ca bhagavānbālarūpadhṛk

"वर्षा के दिन के मेघ के समान श्याम, दीप्त नेत्रों वाले, वामन आकार के, दण्ड और कमण्डलु धारण किए, वक्ष पर श्रीवत्स से सुशोभित, जटाधारी और यज्ञोपवीत पहने भगवान् ने बालक का रूप धारण किया।

श्लोक 65 (3.273.65)

यज्ञवाटं गतः श्रीमान्दानवेन्द्रस्य वै तदा । बृहस्पतिसहायोऽसौ प्रविष्टो बलिनो मखे ॥

yajñavāṭaṃ gataḥ śrīmāndānavendrasya vai tadā | bṛhaspatisahāyo'sau praviṣṭo balino makhe

"वे श्रीमान् दानवराज के यज्ञस्थल पर गए, और बृहस्पति को साथ लेकर बलि के यज्ञ में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 66 (3.273.66)

तं दृष्ट्वावामनतनुं प्रहृष्टो बलिरब्रवीत् । प्रीतोस्मि दर्शने विप्र ब्रूहि त्वं किं ददानिते ॥

taṃ dṛṣṭvāvāmanatanuṃ prahṛṣṭo balirabravīt | prītosmi darśane vipra brūhi tvaṃ kiṃ dadānite

"वामन-शरीर वाले उन्हें देखकर बलि प्रसन्न हुआ और बोला — 'हे विप्र, आपके दर्शन से मैं प्रसन्न हूँ। बताइए, मैं आपको क्या दूँ?'

श्लोक 67 (3.273.67)

एवमुक्तस्तु बलिना वामनः प्रत्युवाच ह ॥

evamuktastu balinā vāmanaḥ pratyuvāca ha

"बलि के ऐसा कहने पर वामन ने उत्तर दिया।

श्लोक 68 (3.273.68)

स्वस्तीत्युक्त्वा बलिं देवः स्मयमानोऽभ्यभाषत । मेदिनीं दानवपते देहि मे विक्रमत्रयम् ॥

svastītyuktvā baliṃ devaḥ smayamāno'bhyabhāṣata | medinīṃ dānavapate dehi me vikramatrayam

"बलि को 'स्वस्ति' कहकर देव मुस्कराते हुए बोले — 'हे दानवपति, मुझे तीन पग भूमि दे दो।'

श्लोक 69 (3.273.69)

बलिर्ददौ प्रसन्नात्मा विप्रायामिततेजसे । ततो दिव्याद्भुततमं रूपं विक्रमतोहरेः ॥

balirdadau prasannātmā viprāyāmitatejase | tato divyādbhutatamaṃ rūpaṃ vikramatohareḥ

"बलि ने प्रसन्न मन से वह भूमि उस अपार तेजस्वी ब्राह्मण को दे दी। तब पग बढ़ाते हुए हरि का रूप अत्यन्त दिव्य और अद्भुत हो गया।

श्लोक 70 (3.273.70)

विक्रमैस्त्रिभिरक्षोभ्यो जहाराशु स मेदिनीम् । ददौ शक्राय च महीं विष्णुर्देवः सनातनः ॥

vikramaistribhirakṣobhyo jahārāśu sa medinīm | dadau śakrāya ca mahīṃ viṣṇurdevaḥ sanātanaḥ

"तीन पगों में उस अविचल ने शीघ्र ही पृथ्वी ले ली, और सनातन देव विष्णु ने वह पृथ्वी शक्र (इन्द्र) को दे दी।

श्लोक 71 (3.273.71)

एष ते वामनो नाम प्रादुर्भावः प्रकीर्तितः । तेन देवाः प्रादुरासन्वैष्णवं चोच्यते जगत् ॥

eṣa te vāmano nāma prādurbhāvaḥ prakīrtitaḥ | tena devāḥ prādurāsanvaiṣṇavaṃ cocyate jagat

"यह मैंने तुम्हें उनका वामन नामक प्राकट्य बताया। उसी से देवताओं का फिर से उदय हुआ, और यह जगत् वैष्णव कहलाता है।

श्लोक 72 (3.273.72)

असतां निग्रहार्थाय धर्मसंरक्षणाय च । अवतीर्णो मनुष्याणामजायत यदुक्षये । स एवं भगवान्विष्णुः कृष्णेति परिकीर्त्यते ॥

asatāṃ nigrahārthāya dharmasaṃrakṣaṇāya ca | avatīrṇo manuṣyāṇāmajāyata yadukṣaye | sa evaṃ bhagavānviṣṇuḥ kṛṣṇeti parikīrtyate

"दुष्टों का दमन करने और धर्म की रक्षा के लिए वे मनुष्यों के बीच अवतरित होकर यदुवंश के घर में जन्मे हैं। वही भगवान् विष्णु कृष्ण नाम से प्रसिद्ध हैं —

श्लोक 73 (3.273.73)

अनाद्यन्तमजं देवं प्रभुंलोकनमस्कृतम् । यं देवं विदुषोगान्ति तस्य कर्माणि सैन्धव ॥

anādyantamajaṃ devaṃ prabhuṃlokanamaskṛtam | yaṃ devaṃ viduṣogānti tasya karmāṇi saindhava

"हे सैन्धव, वे आदि-अन्त से रहित, अजन्मा, समस्त लोकों द्वारा वन्दित प्रभु हैं — वही देव, जिनके कर्मों का विद्वान् गान करते हैं;

श्लोक 74 (3.273.74)

यमाहुरजितंकृष्णं शङ्खचक्रगदाधरम् । श्रीवत्सधारिणं देवं पीतकौशेयवाससम् ॥

yamāhurajitaṃkṛṣṇaṃ śaṅkhacakragadādharam | śrīvatsadhāriṇaṃ devaṃ pītakauśeyavāsasam

"जिन्हें अजेय कृष्ण कहते हैं, जो शंख, चक्र और गदा धारण करते हैं, श्रीवत्स धारण करते हैं और पीले रेशमी वस्त्र पहनते हैं।

श्लोक 75 (3.273.75)

प्रधानं सोऽस्त्रविदुषां तेन कृष्णेन रक्ष्यते ॥

pradhānaṃ so'straviduṣāṃ tena kṛṣṇena rakṣyate

"उन्हीं कृष्ण के द्वारा अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ वह अर्जुन रक्षित है।

श्लोक 76 (3.273.76)

सहायः पुण्डरीकाक्षः श्रीमानतुलविक्रमः । समानस्यन्दने पार्थमास्थाय परवीरहा ॥

sahāyaḥ puṇḍarīkākṣaḥ śrīmānatulavikramaḥ | samānasyandane pārthamāsthāya paravīrahā

"उसके सहायक श्रीमान्, कमलनयन, अतुलनीय पराक्रमी और शत्रुवीरों का संहार करने वाले कृष्ण हैं, जो पार्थ के साथ एक ही रथ पर बैठते हैं।

श्लोक 77 (3.273.77)

न शक्यते तेन जेतुं त्रिदशैरपि दुःसहः । कः पुनर्मानुषो भावो रणे पार्थं विजेष्यति ॥

na śakyate tena jetuṃ tridaśairapi duḥsahaḥ | kaḥ punarmānuṣo bhāvo raṇe pārthaṃ vijeṣyati

"उनके कारण अर्जुन को जीता नहीं जा सकता; देवताओं के लिए भी वह दुःसह है। फिर कौन मनुष्य युद्ध में पार्थ को जीतेगा?

श्लोक 78 (3.273.78)

तमेकं वर्जयित्वातु सर्वंयौधिष्ठिरं बलम् । चतुरः पाण्डवान्राजन्दिनैकं जेष्यसे रिपून् ॥

tamekaṃ varjayitvātu sarvaṃyaudhiṣṭhiraṃ balam | caturaḥ pāṇḍavānrājandinaikaṃ jeṣyase ripūn

"हे राजन्, उस एक को छोड़कर तुम एक दिन के लिए युधिष्ठिर की समस्त सेना को और अपने चार शत्रुओं — पाण्डवों — को जीत लोगे।

श्लोक 79 (3.273.79)

तस्मात्त्वंपार्थरहितान्पाण्डवान्वारयिष्यसि । एतद्धि पुरुषव्याघ्र मया दत्तो वरस्तव ॥

tasmāttvaṃpārtharahitānpāṇḍavānvārayiṣyasi | etaddhi puruṣavyāghra mayā datto varastava

"अतः तुम अर्जुन को छोड़कर शेष पाण्डवों को रोक सकोगे। हे पुरुषसिंह, यही वर मैंने तुम्हें दिया है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 80 (3.273.80)

इत्येवमुक्त्वा नृपतिं सर्वपापहरो हरः । उमापतिः पशुपतिर्यज्ञहा त्रिपुरार्दनः ॥

ityevamuktvā nṛpatiṃ sarvapāpaharo haraḥ | umāpatiḥ paśupatiryajñahā tripurārdanaḥ

राजा से ऐसा कहकर सब पापों को हरने वाले हर, उमापति, पशुपति, यज्ञ का विध्वंस करने वाले और त्रिपुर का संहार करने वाले —

श्लोक 81 (3.273.81)

वामनैर्विकटैः कुब्जैरुग्रश्रवणदर्शनैः । वृतः पारिषदैर्घोरैर्नानाप्रहरणोद्यतैः ॥

vāmanairvikaṭaiḥ kubjairugraśravaṇadarśanaiḥ | vṛtaḥ pāriṣadairghorairnānāpraharaṇodyataiḥ

— बौने, विकराल, कुबड़े, सुनने और देखने में भयानक तथा नाना प्रकार के अस्त्र उठाए भयंकर पार्षदों से घिरे हुए —

श्लोक 82 (3.273.82)

त्र्यम्बको राजशार्दूल भगनेत्रनिपातनः । उमासहायो भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत ॥

tryambako rājaśārdūla bhaganetranipātanaḥ | umāsahāyo bhagavāṃstatraivāntaradhīyata

हे नृपश्रेष्ठ, भग के नेत्र नष्ट करने वाले त्र्यम्बक भगवान् उमा के साथ वहीं अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 83 (3.273.83)

एवमुक्तस्तु नृपतिः स्वमेव भवनं ययौ । पाण्डवाश्च वने तस्मिन्न्यवसन्काम्यके तथा ॥

evamuktastu nṛpatiḥ svameva bhavanaṃ yayau | pāṇḍavāśca vane tasminnyavasankāmyake tathā

यह वर पाकर राजा अपने भवन को लौट गया, और पाण्डव उसी काम्यक वन में रहते रहे।

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