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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 274

युधिष्ठिर का मार्कण्डेय से प्रश्न

जनमेजय पूछते हैं कि द्रौपदी-हरण के बाद पाण्डवों ने क्या किया। मुनियों के बीच बैठे युधिष्ठिर मार्कण्डेय से पूछते हैं कि यज्ञवेदी से उत्पन्न निर्दोष द्रौपदी पर ऐसी विपत्ति कैसे आ पड़ी। वे जयद्रथ के अपराध और उसके दण्ड तथा वनवास के कष्टों का वर्णन करके पूछते हैं कि क्या मुनि ने उनसे अधिक अभागे किसी मनुष्य को देखा या सुना है।

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जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (3.274.1)

एवं हृतायां कृष्णायां प्राप्य क्लेशमनुत्तमम् । अत ऊर्ध्वं नरव्याघ्राः किमकुर्वत पाण्डवाः ॥

evaṃ hṛtāyāṃ kṛṣṇāyāṃ prāpya kleśamanuttamam | ata ūrdhvaṃ naravyāghrāḥ kimakurvata pāṇḍavāḥ

इस प्रकार कृष्णा (द्रौपदी) के हरे जाने पर घोर क्लेश सहने के बाद नरश्रेष्ठ पाण्डवों ने आगे क्या किया?

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 2 (3.274.2)

एवं कृष्णां मोक्षयित्वाविनिर्जित्य जयद्रथम् । आसांचक्रे मुनिगणैर्धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥

evaṃ kṛṣṇāṃ mokṣayitvāvinirjitya jayadratham | āsāṃcakre munigaṇairdharmarājo yudhiṣṭhiraḥ

इस प्रकार कृष्णा को छुड़ाकर और जयद्रथ को पराजित करके धर्मराज युधिष्ठिर मुनियों के समूह के बीच बैठे।

श्लोक 3 (3.274.3)

तेषां मध्येमहर्षीणां शृण्वतामनुशोचताम् । मार्कण्डेयमिदं वाक्यमब्रवीत्पाण्डुनन्दनः ॥

teṣāṃ madhyemaharṣīṇāṃ śṛṇvatāmanuśocatām | mārkaṇḍeyamidaṃ vākyamabravītpāṇḍunandanaḥ

सुनते हुए और उनके दुःख में दुःखी उन महर्षियों के बीच पाण्डुनन्दन ने मार्कण्डेय से यह वचन कहा —

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 4 (3.274.4)

भगवन्देवर्षीणां त्वं ख्यातो भूतभविष्यवित् । संशयं परिपृच्छामि च्छिन्धि मे हृदि संस्थितम् ॥

bhagavandevarṣīṇāṃ tvaṃ khyāto bhūtabhaviṣyavit | saṃśayaṃ paripṛcchāmi cchindhi me hṛdi saṃsthitam

"भगवन्, देवर्षियों में आप भूत और भविष्य के ज्ञाता के रूप में प्रसिद्ध हैं। मेरे हृदय में जो संशय है, वह मैं आपसे पूछता हूँ; उसे दूर कीजिए।

श्लोक 5 (3.274.5)

द्रुपदस्य सुता ह्येषा वेदिमध्यात्समुत्थिता । अयोनिजा महाभागास्नुषा पाण्डोर्महात्मनः ॥

drupadasya sutā hyeṣā vedimadhyātsamutthitā | ayonijā mahābhāgāsnuṣā pāṇḍormahātmanaḥ

"द्रुपद की यह पुत्री यज्ञवेदी के मध्य से प्रकट हुई थी। यह अयोनिजा, परम सौभाग्यशालिनी और महात्मा पाण्डु की पुत्रवधू है।

श्लोक 6 (3.274.6)

मन्ये कालश्च भगवान्दैवं च दुरतिक्रमम् । भवितव्यं च भूतानां यस्य नास्ति व्यतिक्रमः ॥

manye kālaśca bhagavāndaivaṃ ca duratikramam | bhavitavyaṃ ca bhūtānāṃ yasya nāsti vyatikramaḥ

"मुझे लगता है कि काल ही भगवान् है, दैव का उल्लंघन कठिन है, और प्राणियों के लिए जो होनी है वह कभी टलती नहीं।

श्लोक 7 (3.274.7)

कथं हि पत्नीमस्माकं धर्मज्ञां धर्मचारिणीम् । संस्पृशेदीदृशो भावः शुचिं स्तैन्यमिवानृतम् ॥

kathaṃ hi patnīmasmākaṃ dharmajñāṃ dharmacāriṇīm | saṃspṛśedīdṛśo bhāvaḥ śuciṃ stainyamivānṛtam

"नहीं तो धर्म को जानने और धर्म का आचरण करने वाली हमारी पत्नी को ऐसी घटना कैसे छू सकती थी — जैसे किसी निर्दोष पर चोरी का झूठा कलंक लग जाए?

श्लोक 8 (3.274.8)

न हि पापं कृतंकिंचित्कर्म वा निन्दितं क्वचित् । द्रौपद्या ब्राह्मणेष्वेव धर्मः सुचरितो महान् ॥

na hi pāpaṃ kṛtaṃkiṃcitkarma vā ninditaṃ kvacit | draupadyā brāhmaṇeṣveva dharmaḥ sucarito mahān

"द्रौपदी ने न कोई पाप किया है और न कहीं कोई निन्दनीय कर्म; उलटे, उसने ब्राह्मणों के प्रति महान् धर्म का भलीभाँति पालन किया है।

श्लोक 9 (3.274.9)

तां जहार बलाद्राजा मूढबुद्धिर्जयद्रथः । तस्याः संहरणात्पापः शिरसः केशवापनम् ॥

tāṃ jahāra balādrājā mūḍhabuddhirjayadrathaḥ | tasyāḥ saṃharaṇātpāpaḥ śirasaḥ keśavāpanam

"फिर भी मूढ़बुद्धि राजा जयद्रथ उसे बलपूर्वक हर ले गया। उस हरण के कारण उस पापी का सिर मूँडा गया,

श्लोक 10 (3.274.10)

पराजयं च संग्रामे ससहायः समाप्तवान् । प्रत्याहृता तथाऽस्माभिर्हत्वा तत्सैन्धवं बलम् ॥

parājayaṃ ca saṃgrāme sasahāyaḥ samāptavān | pratyāhṛtā tathā'smābhirhatvā tatsaindhavaṃ balam

"और युद्ध में उसे अपने सहायकों सहित पराजय मिली। उस सिन्धुदेश की सेना का संहार करके हम उसे वापस ले आए।

श्लोक 11 (3.274.11)

तद्दारहरणं प्राप्तमस्माभिरवितर्कितम् । दुःखश्चायं वने वासो मृगयायां च जीविका ॥

taddāraharaṇaṃ prāptamasmābhiravitarkitam | duḥkhaścāyaṃ vane vāso mṛgayāyāṃ ca jīvikā

"फिर भी हमें पत्नी-हरण का यह दुःख भोगना पड़ा, जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की थी। वन का यह निवास दुःखदायी है, शिकार से जीविका चलती है,

श्लोक 12 (3.274.12)

हिंसा च मृगजातीनां वनौकोभिर्वनौकसाम् । ज्ञातिभिर्विप्रवासश्च मिथ्याव्यवसितैरियम् ॥

hiṃsā ca mṛgajātīnāṃ vanaukobhirvanaukasām | jñātibhirvipravāsaśca mithyāvyavasitairiyam

"वनवासी होकर हमें वन के प्राणियों की हिंसा करनी पड़ती है; और कपटपूर्ण निश्चय करने वाले अपने ही बन्धुओं ने हमें देश से निकाल दिया है।

श्लोक 13 (3.274.13)

अस्ति नूनं मया कश्चिदल्पभाग्यतरो नरः । भवता दृष्टपूर्वो वा श्रुतपूर्वोऽपि वा क्वचित् ॥

asti nūnaṃ mayā kaścidalpabhāgyataro naraḥ | bhavatā dṛṣṭapūrvo vā śrutapūrvo'pi vā kvacit

"क्या सचमुच कोई ऐसा मनुष्य है जो मुझसे भी अधिक अभागा हो? क्या आपने कभी ऐसा कोई देखा या सुना है?"

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