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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 275

रामोपाख्यान का आरम्भ: वैश्रवण का जन्म

मार्कण्डेय उत्तर देते हैं कि रावण द्वारा सीता के हरण से राम ने अनुपम दुःख पाया था, फिर भी वे उन्हें वापस ले आए। युधिष्ठिर के अनुरोध पर वे रामकथा आरम्भ करते हैं — अज और दशरथ से राम का वंश, उनके तीन भाई और उनकी माताएँ, तथा जनक की पुत्री सीता। फिर वे रावण के वंश का वर्णन करते हैं — ब्रह्मा के मानस पुत्र पुलस्त्य, पुलस्त्य के पुत्र वैश्रवण जो पिता को छोड़कर ब्रह्मा के पास चले गए, क्रोध से विश्रवा का जन्म, और ब्रह्मा द्वारा वैश्रवण को अमरत्व, धन का स्वामित्व, लङ्का और पुष्पक विमान का दान।

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मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 1 (3.275.1)

प्राप्तमप्रतिमं दुःखं रामेण भरतर्षभ । रक्षसा जानकी तस्य हृता भार्या बलीयसा ॥

prāptamapratimaṃ duḥkhaṃ rāmeṇa bharatarṣabha | rakṣasā jānakī tasya hṛtā bhāryā balīyasā

हे भरतश्रेष्ठ, राम ने अनुपम दुःख पाया था। उनकी पत्नी जानकी को एक बलवान् राक्षस हर ले गया था —

श्लोक 2 (3.275.2)

आश्रमाद्राक्षसेन्द्रेण रावणेन दुरात्मना । मायामास्थाय तरसा हत्वा गृध्रं जटायुषम् ॥

āśramādrākṣasendreṇa rāvaṇena durātmanā | māyāmāsthāya tarasā hatvā gṛdhraṃ jaṭāyuṣam

— राक्षसराज दुरात्मा रावण माया का सहारा लेकर और गिद्ध जटायु को वेग से मारकर उन्हें आश्रम से हर ले गया था।

श्लोक 3 (3.275.3)

प्रत्याजहार तां रामः सुग्रीवबलमाश्रितः । बद्ध्वा सेतुं समुद्रस्य दग्ध्वा लङ्कां शितैः शरैः ॥

pratyājahāra tāṃ rāmaḥ sugrīvabalamāśritaḥ | baddhvā setuṃ samudrasya dagdhvā laṅkāṃ śitaiḥ śaraiḥ

सुग्रीव की सेना का आश्रय लेकर, समुद्र पर सेतु बाँधकर और तीखे बाणों से लङ्का को जलाकर राम उन्हें वापस ले आए।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 4 (3.275.4)

कस्मिन्रामः कुले जातः किंवीर्यः किंपराक्रमः । रावणः कस्य पुत्रो वा किं वैरं तस्य तेन ह ॥

kasminrāmaḥ kule jātaḥ kiṃvīryaḥ kiṃparākramaḥ | rāvaṇaḥ kasya putro vā kiṃ vairaṃ tasya tena ha

राम किस कुल में जन्मे थे? उनका बल और पराक्रम कैसा था? रावण किसका पुत्र था, और उसका राम से क्या वैर था?

श्लोक 5 (3.275.5)

एतन्मे भगवन्सर्वं सम्यगाख्यातुमर्हसि । त्वया प्रत्यक्षतोदृष्टं यथासर्वमशेषतः । श्रोतुमिच्छामि चरितं रामस्याक्लिष्टकर्मणः ॥

etanme bhagavansarvaṃ samyagākhyātumarhasi | tvayā pratyakṣatodṛṣṭaṃ yathāsarvamaśeṣataḥ | śrotumicchāmi caritaṃ rāmasyākliṣṭakarmaṇaḥ

भगवन्, आप मुझे यह सब ठीक-ठीक बताइए — जैसा आपने स्वयं अपनी आँखों से देखा, वह सब पूरा-पूरा। मैं अनायास महान् कर्म करने वाले राम का चरित सुनना चाहता हूँ।

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 6 (3.275.6)

अजोनामाभवद्राजा महानिक्ष्वाकुवंशजः । तस्य पुत्रो दशरथःशश्वत्स्वाध्यायवाञ्छुचिः ॥

ajonāmābhavadrājā mahānikṣvākuvaṃśajaḥ | tasya putro daśarathaḥśaśvatsvādhyāyavāñchuciḥ

इक्ष्वाकुवंश में अज नामक एक महान् राजा हुए। उनके पुत्र दशरथ थे, जो पवित्र थे और सदा वेदों के स्वाध्याय में लगे रहते थे।

श्लोक 7 (3.275.7)

अभवंस्तस्य चत्वारः पुत्रा धर्मार्थकोविदाः । रामलक्ष्मणशत्रुघ्ना भरतश्च महाबलः ॥

abhavaṃstasya catvāraḥ putrā dharmārthakovidāḥ | rāmalakṣmaṇaśatrughnā bharataśca mahābalaḥ

उनके चार पुत्र हुए, जो धर्म और अर्थ के ज्ञाता थे — राम, लक्ष्मण, शत्रुघ्न और महाबली भरत।

श्लोक 8 (3.275.8)

रामस्य माता कौसल्या कैकेयी भरतस्य तु । सुतौ लक्ष्मणशत्रुघ्नौ सुमित्रायाः परंतपौ ॥

rāmasya mātā kausalyā kaikeyī bharatasya tu | sutau lakṣmaṇaśatrughnau sumitrāyāḥ paraṃtapau

राम की माता कौसल्या थीं और भरत की कैकेयी, जबकि शत्रुओं को तपाने वाले लक्ष्मण और शत्रुघ्न सुमित्रा के पुत्र थे।

श्लोक 9 (3.275.9)

विदेहराजो जनकः सीता तस्यात्मजा विभो । यां चकार स्वयं त्वष्टा रामस्य महिषीं प्रियाम् ॥

videharājo janakaḥ sītā tasyātmajā vibho | yāṃ cakāra svayaṃ tvaṣṭā rāmasya mahiṣīṃ priyām

हे प्रभो, विदेह के राजा जनक थे और सीता उनकी पुत्री थीं, जिन्हें स्वयं त्वष्टा ने राम की प्रिय पटरानी होने के लिए रचा था।

श्लोक 10 (3.275.10)

एतद्रामस्य ते जन्म सीतायाश्च प्रकीर्तितम् । रावणस्यापि ते जन्म व्याख्यास्यामि जनेश्वर ॥

etadrāmasya te janma sītāyāśca prakīrtitam | rāvaṇasyāpi te janma vyākhyāsyāmi janeśvara

यह मैंने तुम्हें राम और सीता का जन्म-वृत्तान्त सुनाया। हे जनेश्वर, अब मैं तुम्हें रावण का जन्म भी बताऊँगा।

श्लोक 11 (3.275.11)

पितामहो रावणस्य साक्षाद्देवः प्रजापतिः । स्वयंभूः सर्वलोकानां प्रभुः स्रष्टा महातपाः ॥

pitāmaho rāvaṇasya sākṣāddevaḥ prajāpatiḥ | svayaṃbhūḥ sarvalokānāṃ prabhuḥ sraṣṭā mahātapāḥ

रावण के पितामह स्वयं देव प्रजापति थे — स्वयम्भू, समस्त लोकों के स्वामी और स्रष्टा, महान् तपस्वी।

श्लोक 12 (3.275.12)

पुलस्त्यो नाम तस्यासीन्मानसो दयितः सुतः । तस्य वैश्रवणो नाम गवि पुत्रोऽभवत्प्रभुः ॥

pulastyo nāma tasyāsīnmānaso dayitaḥ sutaḥ | tasya vaiśravaṇo nāma gavi putro'bhavatprabhuḥ

उनके पुलस्त्य नामक प्रिय मानस पुत्र थे। पुलस्त्य के गौ नामक पत्नी से वैश्रवण नामक प्रभावशाली पुत्र हुआ।

श्लोक 13 (3.275.13)

पितरं स समुत्सृज्य पितामहमुपस्थितः । तस्य कोपात्पिता राजन्ससर्जात्मानमात्मना ॥

pitaraṃ sa samutsṛjya pitāmahamupasthitaḥ | tasya kopātpitā rājansasarjātmānamātmanā

वैश्रवण अपने पिता को छोड़कर पितामह की सेवा में चले गए। हे राजन्, इस पर क्रुद्ध होकर उनके पिता ने स्वयं से अपना दूसरा रूप रच लिया।

श्लोक 14 (3.275.14)

स जज्ञे विश्रवा नाम तस्यात्मार्धेन वै द्विजः । प्रतीकाराय सक्रोधस्ततो वैश्रवणस्य वै ॥

sa jajñe viśravā nāma tasyātmārdhena vai dvijaḥ | pratīkārāya sakrodhastato vaiśravaṇasya vai

उनके आधे आत्मा से विश्रवा नामक ब्राह्मण उत्पन्न हुए, जो वैश्रवण से बदला लेने के लिए क्रोध से भरे थे।

श्लोक 15 (3.275.15)

पितामहस्तुप्रीतात्मा ददौ वैश्रवणस्य ह । अमरत्वं धनेशत्वं लोकपालत्वमेव च ॥

pitāmahastuprītātmā dadau vaiśravaṇasya ha | amaratvaṃ dhaneśatvaṃ lokapālatvameva ca

परन्तु पितामह ने प्रसन्न होकर वैश्रवण को अमरत्व, धन का स्वामित्व और लोकपाल का पद दिया,

श्लोक 16 (3.275.16)

ईशानेन तथा सख्यं पुत्रं च नलकूवरम् । राजधानीनिवेशं च लङ्कांरक्षोगणान्विताम् ॥

īśānena tathā sakhyaṃ putraṃ ca nalakūvaram | rājadhānīniveśaṃ ca laṅkāṃrakṣogaṇānvitām

ईशान (शिव) से मित्रता, नलकूबर नामक पुत्र और राक्षसों के समूहों से भरी लङ्का राजधानी के रूप में दी।

श्लोक 17 (3.275.17)

विमानं पुष्पकं नाम कामगं च ददौ प्रभुः । यक्षाणामाधिपत्यंच राजराजत्वमेव च ॥

vimānaṃ puṣpakaṃ nāma kāmagaṃ ca dadau prabhuḥ | yakṣāṇāmādhipatyaṃca rājarājatvameva ca

प्रभु ने उन्हें इच्छानुसार चलने वाला पुष्पक नामक विमान, यक्षों का आधिपत्य और राजराज का पद भी दिया।

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