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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 277

देवताओं का वानर-ऋक्ष रूप में जन्म

रावण के अत्याचार से पीड़ित ऋषि और सिद्ध अग्नि को आगे करके ब्रह्मा की शरण में जाते हैं। ब्रह्मा बताते हैं कि रावण के वध के लिए विष्णु अवतार ले चुके हैं, और वे इन्द्र तथा देवताओं को आदेश देते हैं कि वानरियों और ऋक्षियों से विष्णु के सहायक पुत्र उत्पन्न करें; देवता, गन्धर्व आदि अपने ही समान पराक्रमी वानर और ऋक्ष योद्धा उत्पन्न करते हैं। ब्रह्मा गन्धर्वी दुन्दुभी को भी पृथ्वी पर कुबड़ी मन्थरा के रूप में जन्म लेने भेजते हैं, जो इधर-उधर घूमकर वैर भड़काने में लग जाती है।

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मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 1 (3.277.1)

ततो ब्रह्मर्षयः सर्वे सिद्धा देवर्षयस्तथा । हव्यवाहं पुरस्कृत्य ब्रह्माणं शरणं गताः ॥

tato brahmarṣayaḥ sarve siddhā devarṣayastathā | havyavāhaṃ puraskṛtya brahmāṇaṃ śaraṇaṃ gatāḥ

तब सभी ब्रह्मर्षि, सिद्ध और देवर्षि हव्यवाहन अग्नि को आगे करके ब्रह्मा की शरण में गए।

अग्निरुवाच

श्लोक 2 (3.277.2)

योसौ विश्रवसः पुत्रो दशग्रीवो महाबलः । अवध्यो वरदानेन कृतो भगवता पुरा ॥

yosau viśravasaḥ putro daśagrīvo mahābalaḥ | avadhyo varadānena kṛto bhagavatā purā

"भगवन्, विश्रवा का वह महाबली पुत्र दशग्रीव आपके वरदान से पहले ही अवध्य बना दिया गया है।

श्लोक 3 (3.277.3)

स बाधते प्रजाः सर्वा विप्रकारैर्महाबलः । ततो नस्त्रातु भगवान्नान्यस्त्राता हि विद्यते ॥

sa bādhate prajāḥ sarvā viprakārairmahābalaḥ | tato nastrātu bhagavānnānyastrātā hi vidyate

"वह महाबली तरह-तरह के उत्पातों से सारी प्रजा को सता रहा है। इसलिए भगवान् ही हमारी रक्षा करें, क्योंकि दूसरा कोई रक्षक नहीं है।"

ब्रह्मोवाच

श्लोक 4 (3.277.4)

न स देवासुरैः शक्यो युद्धे जेतुं विभावसो । विहितं तत्रयत्कार्यमभितस्तस्य निग्रहः ॥

na sa devāsuraiḥ śakyo yuddhe jetuṃ vibhāvaso | vihitaṃ tatrayatkāryamabhitastasya nigrahaḥ

"हे विभावसु, देवता और असुर उसे युद्ध में नहीं जीत सकते। इसके लिए जो करना है, उसका विधान हो चुका है; उसका दमन निकट ही है।

श्लोक 5 (3.277.5)

तदर्थमवतीर्णोऽसौ मन्नियोगाच्चतुर्भुजः । विष्णुः प्रहरतां श्रेष्ठः स तत्कर्म करिष्यति ॥

tadarthamavatīrṇo'sau manniyogāccaturbhujaḥ | viṣṇuḥ praharatāṃ śreṣṭhaḥ sa tatkarma kariṣyati

"इसी प्रयोजन से मेरे आदेश पर योद्धाओं में श्रेष्ठ चतुर्भुज विष्णु अवतीर्ण हो चुके हैं; वही यह कार्य पूरा करेंगे।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 6 (3.277.6)

पितामहस्ततस्तेषां संनिधौ शक्रमब्रवीत् । सर्वैर्देवगणैः सार्धं संभव त्वं महीतले ॥

pitāmahastatasteṣāṃ saṃnidhau śakramabravīt | sarvairdevagaṇaiḥ sārdhaṃ saṃbhava tvaṃ mahītale

फिर पितामह ब्रह्मा ने उन सबके सामने इन्द्र से कहा, "सारे देवगणों के साथ तुम पृथ्वी पर जन्म लो।

ब्रह्मोवाच

श्लोक 7 (3.277.7)

विष्णोः सहायानृक्षीषु वानरीषु च सर्वशः । जनयध्वं सुतान्वीरान्कामरूपबलान्वितान् ॥

viṣṇoḥ sahāyānṛkṣīṣu vānarīṣu ca sarvaśaḥ | janayadhvaṃ sutānvīrānkāmarūpabalānvitān

"विष्णु के सहायक बनने के लिए सब ओर ऋक्षियों और वानरियों से ऐसे वीर पुत्र उत्पन्न करो जो बलवान् हों और इच्छानुसार रूप धारण कर सकें।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 8 (3.277.8)

ते यथोक्ता भगवता तत्प्रतिश्रुत्य शासनम् । ससृजुर्देवगन्धर्वाः पुत्रान्वानररूपिणः ॥

te yathoktā bhagavatā tatpratiśrutya śāsanam | sasṛjurdevagandharvāḥ putrānvānararūpiṇaḥ

भगवान् के ऐसा कहने पर उन्होंने उनकी आज्ञा स्वीकार की, और देवताओं तथा गन्धर्वों ने वानर-रूप पुत्र उत्पन्न किए।

श्लोक 9 (3.277.9)

ततो भागानुभागेन देवगन्धर्वदानवाः । अवतर्तुं महीं सर्वे मन्त्रयामासुरञ्जसा ॥

tato bhāgānubhāgena devagandharvadānavāḥ | avatartuṃ mahīṃ sarve mantrayāmāsurañjasā

तब देवता, गन्धर्व और दानव, सबने तुरन्त आपस में परामर्श किया कि अपने-अपने अंश और उपांश से पृथ्वी पर कैसे अवतार लें।

श्लोक 10 (3.277.10)

अवतेरुर्महीं स्वर्गादंशैश्च सहिताः सुराः । ऋषयश्च महात्मानः सिद्धाश्च सह किन्नरैः । चारणाश्चासृजन्घोरान्वानरान्वनचारिणः ॥

avaterurmahīṃ svargādaṃśaiśca sahitāḥ surāḥ | ṛṣayaśca mahātmānaḥ siddhāśca saha kinnaraiḥ | cāraṇāścāsṛjanghorānvānarānvanacāriṇaḥ

देवता अपने अंशों के साथ स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरे; और महात्मा ऋषियों, किन्नरों सहित सिद्धों तथा चारणों ने वन में विचरने वाले भयंकर वानरों को उत्पन्न किया।

श्लोक 11 (3.277.11)

यस्य देवस्य यद्रूपं वेषस्तेजश्च यद्विधम् । अजायन्त समास्तेन तस्य तस्य सुतास्तदा ॥

yasya devasya yadrūpaṃ veṣastejaśca yadvidham | ajāyanta samāstena tasya tasya sutāstadā

जिस देवता का जैसा रूप, जैसा वेश और जैसा तेज था, उसके वैसे ही पुत्र तब उत्पन्न हुए।

श्लोक 12 (3.277.12)

तेषां समक्षं गन्धर्वी दुन्दुभीं नाम नामतः । शशास वरदो देवो गच्छ कार्यार्थसिद्धये ॥

teṣāṃ samakṣaṃ gandharvī dundubhīṃ nāma nāmataḥ | śaśāsa varado devo gaccha kāryārthasiddhaye

उन सबके सामने वरदायक देव ब्रह्मा ने दुन्दुभी नाम की गन्धर्वी को आदेश दिया, "कार्य की सिद्धि के लिए जाओ।"

श्लोक 13 (3.277.13)

पितामहवचः श्रुत्वा गन्धर्वी दुन्दुभी ततः । मन्थरा मानुषे लोके कुब्जा समभवत्तदा ॥

pitāmahavacaḥ śrutvā gandharvī dundubhī tataḥ | mantharā mānuṣe loke kubjā samabhavattadā

पितामह के वचन सुनकर गन्धर्वी दुन्दुभी तब मनुष्यलोक में कुबड़ी मन्थरा के रूप में उत्पन्न हुई।

श्लोक 14 (3.277.14)

शक्रप्रभृतयश्चैव सर्वे ते सुरसत्तमाः । वानरर्क्षवरस्त्रीषु जनयामासुरात्मजान् ॥

śakraprabhṛtayaścaiva sarve te surasattamāḥ | vānararkṣavarastrīṣu janayāmāsurātmajān

इन्द्र आदि सभी श्रेष्ठ देवताओं ने श्रेष्ठ वानरियों और ऋक्षियों से पुत्र उत्पन्न किए।

श्लोक 15 (3.277.15)

तेऽन्ववर्तन्पितॄन्सर्वे यशसा च बलेन च । भेत्तारो गिरिशृङ्गाणां सालतालशिलायुधाः ॥

te'nvavartanpitṝnsarve yaśasā ca balena ca | bhettāro giriśṛṅgāṇāṃ sālatālaśilāyudhāḥ

वे सभी यश और बल में अपने पिताओं के समान थे; वे पर्वतों के शिखर तोड़ डालने वाले थे, और साल, ताड़ के वृक्ष तथा शिलाएँ उनके आयुध थे।

श्लोक 16 (3.277.16)

वज्रसंहननाः सर्वेसर्वेऽमोघबलास्तथा । कामवीर्यबलाश्चैवसर्वे बुद्धिविशारदाः ॥

vajrasaṃhananāḥ sarvesarve'moghabalāstathā | kāmavīryabalāścaivasarve buddhiviśāradāḥ

सबके शरीर वज्र के समान दृढ़ थे, सबका बल अचूक था; सबमें इच्छानुसार बल और पराक्रम था, और सभी बुद्धि में निपुण थे।

श्लोक 17 (3.277.17)

नागायुतसमप्राणा वायुवेगसमा जवे । यथेच्छविनिपाताश्च केचिदत्र वनौकसः ॥

nāgāyutasamaprāṇā vāyuvegasamā jave | yathecchavinipātāśca kecidatra vanaukasaḥ

उनमें दस हज़ार हाथियों का बल था और वेग में वे वायु के समान थे; और इन वनवासियों में कुछ ऐसे थे जो जहाँ चाहें वहाँ उतर पड़ते थे।

श्लोक 18 (3.277.18)

एवं विधाय तत्सर्वं भगवाँल्लोकभावनः । मन्थरां बोधयामास यद्यत्कार्यं त्वया तथा ॥

evaṃ vidhāya tatsarvaṃ bhagavām̐llokabhāvanaḥ | mantharāṃ bodhayāmāsa yadyatkāryaṃ tvayā tathā

यह सब व्यवस्था करके लोकों के रचयिता भगवान् ब्रह्मा ने मन्थरा को समझा दिया कि उसे क्या-क्या और कैसे करना है।

श्लोक 19 (3.277.19)

सा तद्वचनमाज्ञाय तथा चक्रे मनोजवा । इतश्चेतश्च गच्छन्ती वैरसंधुक्षणे रता ॥

sā tadvacanamājñāya tathā cakre manojavā | itaścetaśca gacchantī vairasaṃdhukṣaṇe ratā

उनके वचन समझकर मन की गति वाली मन्थरा ने वैसा ही किया; वह इधर-उधर जाती हुई वैर की आग भड़काने में लग गई।

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