आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 35
भीम का बिना प्रतीक्षा युद्ध का आग्रह
भीमसेन युधिष्ठिर से आग्रह करते हैं कि वे वनवास के तेरह वर्ष पूरे होने की प्रतीक्षा न करें: आयु हर क्षण घट रही है, वैर का बदला न लेने वाले क्षत्रिय का जीवन व्यर्थ है, और राजा की दयालुता क्षत्रिय की नहीं, ब्राह्मण की-सी है। वे कहते हैं कि प्रसिद्ध पाण्डव और द्रौपदी अज्ञातवास में छिप ही नहीं सकते, और वन में बिताए तेरह महीनों को ही तेरह वर्षों का प्रतिनिधि मान लिया जाए। अन्त में वे राजा से शत्रुवध का निश्चय करने को कहते हैं, क्योंकि क्षत्रिय का एकमात्र धर्म युद्ध है।
भीमसेन उवाच
श्लोक 1 (3.35.1)
सन्धिं कृत्वैव कालेन ह्यन्तकेन पतत्रिणा । अनन्तेनाप्रमेयेण स्रोतसा सर्वहारिणा ॥
sandhiṃ kṛtvaiva kālena hyantakena patatriṇā | anantenāprameyeṇa srotasā sarvahāriṇā
आप ऐसा व्यवहार कर रहे हैं मानो आपने काल से सन्धि कर ली हो — उस काल से जो अन्तक है, बाण-सा तीव्रगामी है, अनन्त और अपरिमेय है, और सब कुछ बहा ले जाने वाली धारा है।
श्लोक 2 (3.35.2)
प्रत्यक्षं मन्यसे कालं मर्त्यः सन्कालबन्धनः । फेनधर्मा महाराज फलधर्मा तथैव च ॥
pratyakṣaṃ manyase kālaṃ martyaḥ sankālabandhanaḥ | phenadharmā mahārāja phaladharmā tathaiva ca
हे महाराज, आप स्वयं मरणशील और काल के बन्धन में बँधे हुए हैं, फिर भी काल को मानो आँखों के सामने देख रहे हैं। मनुष्य तो फेन के समान निःसार है और पके फल की भाँति गिरने वाला है।
श्लोक 3 (3.35.3)
निमेषादपि कौन्तेय यस्यायुरपचीयते । सूच्येवाञ्जनचूर्णानि किमिति प्रतिपालयेत् ॥
nimeṣādapi kaunteya yasyāyurapacīyate | sūcyevāñjanacūrṇāni kimiti pratipālayet
हे कुन्तीनन्दन, जिस मनुष्य की आयु पलक झपकने भर में भी उसी तरह घटती जाती है जैसे सुई की नोक से अंजन का चूर्ण थोड़ा-थोड़ा कम होता जाता है, वह भला प्रतीक्षा क्यों करे?
श्लोक 4 (3.35.4)
यो नूनममितायुः स्यादथवाऽऽयुःप्रमाणवित् । स कालं वै प्रतीक्षेत सर्वप्रत्यक्षदर्शिवान् ॥
yo nūnamamitāyuḥ syādathavā''yuḥpramāṇavit | sa kālaṃ vai pratīkṣeta sarvapratyakṣadarśivān
समय की बाट तो वही जोहे जिसकी आयु सचमुच असीम हो, या जो अपनी आयु का परिमाण जानता हो और सब कुछ प्रत्यक्ष देखता हो।
श्लोक 5 (3.35.5)
प्रतीक्ष्यमाणः कालो नः समा राजंस्त्रयोदश । आयुषोऽपचयं कृत्वा मरणायोपनेष्यति ॥
pratīkṣyamāṇaḥ kālo naḥ samā rājaṃstrayodaśa | āyuṣo'pacayaṃ kṛtvā maraṇāyopaneṣyati
हे राजन्, जिस तेरह वर्ष के समय की हम प्रतीक्षा कर रहे हैं, वह हमारी आयु को घटाकर हमें मृत्यु के निकट पहुँचा देगा।
श्लोक 6 (3.35.6)
शरीरिणां हि मरणं शरीरे नित्यमाश्रितम् । प्रागेव मरणात्तस्माद्राज्यायैव घटामहे ॥
śarīriṇāṃ hi maraṇaṃ śarīre nityamāśritam | prāgeva maraṇāttasmādrājyāyaiva ghaṭāmahe
देहधारियों के शरीर में मृत्यु सदा ही निवास करती है। इसलिए मृत्यु आने से पहले ही हमें राज्य के लिए प्रयत्न करना चाहिए।
श्लोक 7 (3.35.7)
यो न याति प्रसंख्यानमस्पष्टो भूमिवर्धनः । अयातयित्वा वैराणि सोऽवसीदति गौरिव ॥
yo na yāti prasaṃkhyānamaspaṣṭo bhūmivardhanaḥ | ayātayitvā vairāṇi so'vasīdati gauriva
जो मनुष्य कोई कीर्ति नहीं पाता, अनजाना रहकर पृथ्वी पर बोझ बना रहता है और वैर का बदला नहीं लेता, वह कीचड़ में फँसे दुर्बल बैल की तरह डूब जाता है।
श्लोक 8 (3.35.8)
यो न यातयते वैरमल्पसत्त्वोद्यमः पुमान् । अफलं जन्म तस्याहं मन्ये दुर्जातजीविनः ॥
yo na yātayate vairamalpasattvodyamaḥ pumān | aphalaṃ janma tasyāhaṃ manye durjātajīvinaḥ
जो अल्प साहस और अल्प उद्यम वाला पुरुष वैर का बदला नहीं चुकाता, उस अभागे जीवन जीने वाले का जन्म मैं निष्फल मानता हूँ।
श्लोक 9 (3.35.9)
हैरण्यौ भवतो बाहू श्रुतिर्भवति पार्थिवी । हत्वा द्विषन्तं संग्रामे भुङ्क्ष्व बाहुजितं वसु ॥
hairaṇyau bhavato bāhū śrutirbhavati pārthivī | hatvā dviṣantaṃ saṃgrāme bhuṅkṣva bāhujitaṃ vasu
आपकी भुजाएँ स्वर्ण की स्वामिनी हैं और आपकी कीर्ति राजा पृथु के समान है। युद्ध में शत्रु को मारकर अपनी भुजाओं से जीते हुए धन का उपभोग कीजिए।
श्लोक 10 (3.35.10)
हत्वा वै पुरुषो राजन्निकर्तारमरिंदम । अह्नाय नरकं गच्छेत्स्वर्गेणास्य स संमितः ॥
hatvā vai puruṣo rājannikartāramariṃdama | ahnāya narakaṃ gacchetsvargeṇāsya sa saṃmitaḥ
हे शत्रुदमन राजन्, यदि कोई पुरुष अपने साथ छल करने वाले को मारकर तुरन्त नरक में भी चला जाए, तो वह नरक भी उसके लिए स्वर्ग के समान है।
श्लोक 11 (3.35.11)
अमर्षजो हि संतापः पावकाद्दीप्तिमत्तरः । येनाहमभिसंतप्तो न नक्तं न दिवा शये ॥
amarṣajo hi saṃtāpaḥ pāvakāddīptimattaraḥ | yenāhamabhisaṃtapto na naktaṃ na divā śaye
अपमान के क्रोध से उपजा सन्ताप अग्नि से भी अधिक जलाने वाला है। उससे सन्तप्त होकर मैं न रात को सो पाता हूँ, न दिन में।
श्लोक 12 (3.35.12)
अयं च पार्थो बीभत्सुर्वरिष्ठो ज्याविकर्षणे । आस्ते परमसंतप्तो नूनं सिंह इवाशये ॥
ayaṃ ca pārtho bībhatsurvariṣṭho jyāvikarṣaṇe | āste paramasaṃtapto nūnaṃ siṃha ivāśaye
और यह पार्थ बीभत्सु (अर्जुन), जो प्रत्यंचा खींचने में सबसे श्रेष्ठ है, अपनी माँद में बैठे सिंह की भाँति अत्यन्त सन्तप्त होकर बैठा है।
श्लोक 13 (3.35.13)
योऽयमेको नुदेत्सर्वांल्लोके राजन्धनुर्भृतः । सोऽयमात्मजमूष्माणं महाहस्तीव यच्छति ॥
yo'yameko nudetsarvāṃlloke rājandhanurbhṛtaḥ | so'yamātmajamūṣmāṇaṃ mahāhastīva yacchati
हे राजन्, जो अकेला ही संसार के सारे धनुर्धरों को खदेड़ सकता है, वही अपने भीतर उठती ज्वाला को एक महान् गजराज की भाँति रोके हुए है।
श्लोक 14 (3.35.14)
नकुलः सहदेवश्च वृद्धा माता च वीरसूः । तवैव प्रियमिच्छन्त आसते जडमूकवत् ॥
nakulaḥ sahadevaśca vṛddhā mātā ca vīrasūḥ | tavaiva priyamicchanta āsate jaḍamūkavat
नकुल और सहदेव तथा वीरों को जन्म देने वाली हमारी वृद्ध माता, केवल आपका प्रिय चाहते हुए जड़ और मूक की भाँति बैठे हैं।
श्लोक 15 (3.35.15)
सर्वे ते प्रियमिच्छन्ति बान्धवाः सह सृञ्जयैः । अहमेकश्च संतप्तो माता च प्रतिबिन्ध्यतः ॥
sarve te priyamicchanti bāndhavāḥ saha sṛñjayaiḥ | ahamekaśca saṃtapto mātā ca pratibindhyataḥ
सृंजयों के साथ आपके सभी बन्धु-बान्धव आपका प्रिय ही चाहते हैं। केवल मैं और प्रतिविन्ध्य की माता (द्रौपदी) ही सन्ताप से जल रहे हैं।
श्लोक 16 (3.35.16)
प्रियमेव तु सर्वेषां यद्ब्रवीम्युत किंचन । सर्वे हि व्यसनं प्राप्ताः सर्वे युद्धाभिनन्दिनः ॥
priyameva tu sarveṣāṃ yadbravīmyuta kiṃcana | sarve hi vyasanaṃ prāptāḥ sarve yuddhābhinandinaḥ
फिर भी मैं जो कुछ भी कहता हूँ, वह सबको प्रिय ही लगता है; क्योंकि सभी विपत्ति में पड़े हैं और सभी युद्ध का स्वागत करने वाले हैं।
श्लोक 17 (3.35.17)
नातः पापीयसी काचिदापद्राजन्भविष्यति । यन्नो नीचैरल्पबलै राज्यमाच्छिद्य भुज्यते ॥
nātaḥ pāpīyasī kācidāpadrājanbhaviṣyati | yanno nīcairalpabalai rājyamācchidya bhujyate
हे राजन्, इससे बड़ी विपत्ति और कोई नहीं होगी कि नीच और अल्पबल लोग हमारा राज्य छीनकर उसका भोग कर रहे हैं।
श्लोक 18 (3.35.18)
शीलदोषाद्घृणाविष्ट आनृशंस्यात्परंतप । क्लेशांस्तितिक्षसे राजन्नान्यः कश्चित्प्रशंसति ॥
śīladoṣādghṛṇāviṣṭa ānṛśaṃsyātparaṃtapa | kleśāṃstitikṣase rājannānyaḥ kaścitpraśaṃsati
हे परन्तप राजन्, आप अपने स्वभाव के दोष से, कोमलता के कारण दया से भरकर ये कष्ट सह रहे हैं। इसकी प्रशंसा और कोई नहीं करता।
श्लोक 19 (3.35.19)
श्रोत्रियस्येव ते राजन्मन्दकस्याविपश्चितः । अनुवाकहता बुद्धिर्नैषा तत्त्वार्थदर्शिनी ॥
śrotriyasyeva te rājanmandakasyāvipaścitaḥ | anuvākahatā buddhirnaiṣā tattvārthadarśinī
हे राजन्, आपकी बुद्धि किसी मन्दबुद्धि, विवेकहीन वेदपाठी की भाँति केवल रटे हुए पाठ से कुण्ठित हो गई है; यह तत्त्व और अर्थ को नहीं देख पाती।
श्लोक 20 (3.35.20)
घृणी ब्राह्मणरूपोऽसि कथं क्षत्रेष्वजायथाः । अस्यां हि योनौ जायन्ते प्रायशः क्रूरबुद्धयः ॥
ghṛṇī brāhmaṇarūpo'si kathaṃ kṣatreṣvajāyathāḥ | asyāṃ hi yonau jāyante prāyaśaḥ krūrabuddhayaḥ
आप दयालु हैं, मानो ब्राह्मण का ही रूप हों। फिर आप क्षत्रियों में कैसे जन्मे? इस जाति में तो प्रायः कठोर बुद्धि वाले ही जन्म लेते हैं।
श्लोक 21 (3.35.21)
अश्रौषीस्त्वं राजधर्मान्यथा वै मनुरब्रवीत् । क्रूरान्निकृतिसंपन्नान्विहितानशमात्मकान् ॥
aśrauṣīstvaṃ rājadharmānyathā vai manurabravīt | krūrānnikṛtisaṃpannānvihitānaśamātmakān
आपने मनु के बताए हुए राजधर्मों को सुना है। धृतराष्ट्र के पुत्र क्रूर, छल-कपट से भरे और कभी शान्त न रहने वाले हैं;
श्लोक 22 (3.35.22)
धार्तराष्ट्रान्महाराज क्षमसे किं दुरात्मनः । कर्तव्ये पुरुषव्याघ्र किमास्से पीठसर्पवत् ॥
dhārtarāṣṭrānmahārāja kṣamase kiṃ durātmanaḥ | kartavye puruṣavyāghra kimāsse pīṭhasarpavat
तो हे महाराज, आप उन दुरात्माओं को क्षमा क्यों कर रहे हैं? हे पुरुषसिंह, जब कर्तव्य सामने है, तब आप अजगर की भाँति चुपचाप क्यों बैठे हैं?
श्लोक 23 (3.35.23)
बुद्ध्या वीर्येण संयुक्तः श्रुतेनाभिजनेन च । तृणानां मुष्टिनैकेन हिमवन्तं च पर्वतम् । छन्नमिच्छसि कौन्तेय योऽस्मान्संवर्तुमिच्छसि ॥
buddhyā vīryeṇa saṃyuktaḥ śrutenābhijanena ca | tṛṇānāṃ muṣṭinaikena himavantaṃ ca parvatam | channamicchasi kaunteya yo'smānsaṃvartumicchasi
हे कुन्तीनन्दन, आप बुद्धि, पराक्रम, शास्त्रज्ञान और उत्तम कुल से सम्पन्न होकर भी हमें छिपाना चाहते हैं — यह तो वैसा ही है जैसे कोई एक मुट्ठी तिनकों से हिमालय पर्वत को ढकना चाहे।
श्लोक 24 (3.35.24)
अज्ञातचर्या गूढेन पृथिव्यां विश्रुतेन च । दिवीव पार्थ सूर्येण न शक्याऽऽचरितुं त्वया ॥
ajñātacaryā gūḍhena pṛthivyāṃ viśrutena ca | divīva pārtha sūryeṇa na śakyā''carituṃ tvayā
हे पार्थ, आप पृथ्वी भर में विख्यात हैं; जैसे आकाश में सूर्य छिप नहीं सकता, वैसे ही आपके लिए छिपकर अज्ञातवास करना सम्भव नहीं है।
श्लोक 25 (3.35.25)
बृहत्साल इवानूपे शाखापुष्पपलाशवान् । हस्ती श्वेत इवाज्ञातः कथं जिष्णुश्चरिष्यति ॥
bṛhatsāla ivānūpe śākhāpuṣpapalāśavān | hastī śveta ivājñātaḥ kathaṃ jiṣṇuścariṣyati
दलदली भूमि में शाखाओं, फूलों और पत्तों से लदे विशाल शाल वृक्ष की तरह, या श्वेत हाथी की तरह विशिष्ट जिष्णु (अर्जुन) भला अनजाने कैसे घूम सकेंगे?
श्लोक 26 (3.35.26)
इमौ च सिंहसंकाशौ भ्रातरौ सहितौ शिशू । नकुलः सहदेवश्च कथं पार्थ चरिष्यतः ॥
imau ca siṃhasaṃkāśau bhrātarau sahitau śiśū | nakulaḥ sahadevaśca kathaṃ pārtha cariṣyataḥ
और सिंह के समान ये दोनों छोटे भाई नकुल और सहदेव, जो सदा साथ रहते हैं — हे पार्थ, ये अनजाने कैसे विचरेंगे?
श्लोक 27 (3.35.27)
पुण्यकीर्ती राजपुत्री द्रौपदी वीरसूरियम् । विश्रुता कथमज्ञाता कृष्णा पार्थ चरिष्यति ॥
puṇyakīrtī rājaputrī draupadī vīrasūriyam | viśrutā kathamajñātā kṛṣṇā pārtha cariṣyati
पवित्र कीर्ति वाली, वीरों की जननी, सर्वत्र प्रसिद्ध यह राजकुमारी द्रौपदी — हे पार्थ, कृष्णा अज्ञात रहकर कैसे विचरेगी?
श्लोक 28 (3.35.28)
मां चापि राजञ्जानन्ति ह्याकुमारमिमाः प्रजाः । अज्ञातचर्यां पश्यन्ति मेरोरिव निगूहनम् ॥
māṃ cāpi rājañjānanti hyākumāramimāḥ prajāḥ | ajñātacaryāṃ paśyanti meroriva nigūhanam
हे राजन्, यहाँ की प्रजा बच्चों तक मुझे पहचानती है। मेरे लिए अज्ञातवास को वे मेरु पर्वत को छिपाने जैसा ही मानते हैं।
श्लोक 29 (3.35.29)
तथैव बहवोऽस्माभी राष्ट्रेभ्यो विप्रवासिताः । राजानो राजपुत्राश्च धार्तराष्ट्रमनुव्रताः ॥
tathaiva bahavo'smābhī rāṣṭrebhyo vipravāsitāḥ | rājāno rājaputrāśca dhārtarāṣṭramanuvratāḥ
इसी प्रकार हमने जिन बहुत-से राजाओं और राजकुमारों को उनके राज्यों से निकाल दिया था, वे अब धृतराष्ट्र के पुत्र के अनुयायी बन गए हैं।
श्लोक 30 (3.35.30)
न हि तेऽप्युपशाम्यन्ति निकृता वा निराकृताः । अवश्यं तैर्निकर्तव्यमस्माकं तत्प्रियैषिभिः ॥
na hi te'pyupaśāmyanti nikṛtā vā nirākṛtāḥ | avaśyaṃ tairnikartavyamasmākaṃ tatpriyaiṣibhiḥ
छले गए या अपमानित किए गए वे लोग कभी शान्त नहीं होंगे; उसका प्रिय चाहने वाले वे अवश्य ही हमारा अनिष्ट करेंगे।
श्लोक 31 (3.35.31)
तेऽप्यस्मासु प्रयुञ्जीरन्प्रच्छन्नान्सुबहूंश्चरान् । आचक्षीरंश्च नो ज्ञात्वा ततः स्यात्सुमहद्भयम् ॥
te'pyasmāsu prayuñjīranpracchannānsubahūṃścarān | ācakṣīraṃśca no jñātvā tataḥ syātsumahadbhayam
वे भी हम पर गुप्त रूप से बहुत-से गुप्तचर लगा देंगे और हमें पहचानकर सूचना दे देंगे; तब हम पर बड़ा भारी संकट आ जाएगा।
श्लोक 32 (3.35.32)
अस्माभिरुषिताः सम्यग्वने मासास्त्रयोदश । परिमाणेन तान्पश्य तावतः परिवत्सरान् ॥
asmābhiruṣitāḥ samyagvane māsāstrayodaśa | parimāṇena tānpaśya tāvataḥ parivatsarān
हम वन में पूरे तेरह महीने रह चुके हैं। परिमाण की दृष्टि से उन्हें उतने ही वर्ष मान लीजिए।
श्लोक 33 (3.35.33)
अस्ति मासः प्रतिनिधिर्यथा प्राहुर्मनीषिणः । पूतिकानिव सोमस्य तथेदं क्रियतामिति ॥
asti māsaḥ pratinidhiryathā prāhurmanīṣiṇaḥ | pūtikāniva somasya tathedaṃ kriyatāmiti
मनीषियों का कहना है कि मास भी (वर्ष का) प्रतिनिधि होता है, जैसे सोम के स्थान पर पूतिका लता काम में ली जाती है। यहाँ भी ऐसा ही किया जाए।
श्लोक 34 (3.35.34)
अथवाऽनडुहे राजन्साधवे साधुवाहिने । सौहित्यदानादेतस्मादेनसः प्रतिमुच्यते ॥
athavā'naḍuhe rājansādhave sādhuvāhine | sauhityadānādetasmādenasaḥ pratimucyate
अथवा हे राजन्, अच्छे और भार ढोने में समर्थ बैल को भरपेट भोजन देने से इस पाप से छुटकारा मिल जाता है।
श्लोक 35 (3.35.35)
तस्माच्छत्रुवधे राजन्क्रियतां निश्चयस्त्वया । क्षत्रियस्य हि सर्वस्य नान्यो धर्मोऽस्ति संयुगात् ॥
tasmācchatruvadhe rājankriyatāṃ niścayastvayā | kṣatriyasya hi sarvasya nānyo dharmo'sti saṃyugāt
इसलिए हे राजन्, आप शत्रुओं के वध का निश्चय कीजिए; क्योंकि किसी भी क्षत्रिय के लिए युद्ध के सिवा और कोई धर्म नहीं है।