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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 36

व्यास द्वारा युधिष्ठिर को प्रतिस्मृति विद्या का दान

युधिष्ठिर भीम को उत्तर देते हैं कि दुस्साहस से आरम्भ किए काम विफल होते हैं, और कौरव पक्ष के भीष्म, द्रोण, कृप तथा विशेषकर कवचधारी कर्ण जैसे महारथियों का वर्णन करते हैं, जिन्हें बिना सहायता के नहीं जीता जा सकता; इस पर भीम शान्त हो जाते हैं। तभी व्यास आते हैं, राजा का भय दूर करने का वचन देते हैं और एकान्त में उन्हें प्रतिस्मृति नामक विद्या सिखाते हैं, जिसके द्वारा अर्जुन दिव्य अस्त्रों के लिए इन्द्र, रुद्र और लोकपालों के पास जा सकेंगे। व्यास की सलाह से पाण्डव द्वैतवन छोड़कर सरस्वती तट पर स्थित काम्यक वन में फिर से निवास करने लगते हैं।

अध्याय 35अध्याय-सूचीअध्याय 37

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.36.1)

भीमसेनवचः श्रुत्वा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । निःश्वस्य पुरुषव्याघ्रः संप्रदध्यौ परंतपः ॥

bhīmasenavacaḥ śrutvā kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | niḥśvasya puruṣavyāghraḥ saṃpradadhyau paraṃtapaḥ

भीमसेन के वचन सुनकर पुरुषसिंह, शत्रुओं को सन्तप्त करने वाले कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर लम्बी साँस लेकर गहरे विचार में डूब गए।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 2 (3.36.2)

श्रुता मे राजधर्माश्च वर्णानां च पृथक्पृथक् । आयत्यां च तदात्वे च यः पश्यति स पश्यति ॥

śrutā me rājadharmāśca varṇānāṃ ca pṛthakpṛthak | āyatyāṃ ca tadātve ca yaḥ paśyati sa paśyati

मैंने राजधर्म भी सुने हैं और सभी वर्णों के अलग-अलग धर्म भी। जो भविष्य और वर्तमान दोनों को देखता है, वही वास्तव में देखता है।

श्लोक 3 (3.36.3)

धर्मस्य जानमानोऽहं गतिमग्र्यां सुदुर्विदाम् । कथं बलात्करिष्यामि मेरोरिव विवर्तनम् ॥

dharmasya jānamāno'haṃ gatimagryāṃ sudurvidām | kathaṃ balātkariṣyāmi meroriva vivartanam

मैं धर्म की उस श्रेष्ठ गति को जानता हूँ जिसे समझना अत्यन्त कठिन है। फिर मैं बलपूर्वक कैसे कुछ करूँ? वह तो मेरु पर्वत को उलट देने जैसा होगा।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 4 (3.36.4)

स मुहूर्तमिव ध्यात्वा विनिश्चित्येतिकृत्यताम् । भीमसेनमिदं वाक्यमपदान्तरमब्रवीत् ॥

sa muhūrtamiva dhyātvā viniścityetikṛtyatām | bhīmasenamidaṃ vākyamapadāntaramabravīt

क्षण भर विचार करके और कर्तव्य का निश्चय करके उन्होंने बिना विलम्ब भीमसेन से यह वचन कहा।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 5 (3.36.5)

एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि भारत । इदमन्यत्समादत्स्व वाक्यं मे वाक्यकोविद ॥

evametanmahābāho yathā vadasi bhārata | idamanyatsamādatsva vākyaṃ me vākyakovida

हे महाबाहु भारत, तुम जैसा कहते हो, बात वैसी ही है। परन्तु हे वाक्यकुशल, अब मेरी यह दूसरी बात भी ग्रहण करो।

श्लोक 6 (3.36.6)

महापापानि कर्माणि यानि केवलसाहसात् । आरभ्यन्ते भीमसेन व्यथन्ते तानि भारत ॥

mahāpāpāni karmāṇi yāni kevalasāhasāt | ārabhyante bhīmasena vyathante tāni bhārata

हे भीमसेन, हे भारत, जो बड़े और संकटपूर्ण काम केवल दुस्साहस से आरम्भ किए जाते हैं, वे कष्ट ही देते हैं।

श्लोक 7 (3.36.7)

सुमन्त्रिते सुविक्रान्ते सुकृते सुविचारिते । सिध्यन्त्यर्था महाबाहो दैवं चात्र प्रदक्षिणम् ॥

sumantrite suvikrānte sukṛte suvicārite | sidhyantyarthā mahābāho daivaṃ cātra pradakṣiṇam

हे महाबाहो, जब भली-भाँति मन्त्रणा की जाए, पूरे पराक्रम से काम किया जाए, ठीक ढंग से किया जाए और अच्छी तरह विचार लिया जाए, तब प्रयोजन सिद्ध होते हैं और दैव भी अनुकूल हो जाता है।

श्लोक 8 (3.36.8)

यत्तु केवलचापल्याद्बलदर्पोत्थितः स्वयम् । आरब्धव्यमिदं कार्यं मन्यसे शृणु तत्र मे ॥

yattu kevalacāpalyādbaladarpotthitaḥ svayam | ārabdhavyamidaṃ kāryaṃ manyase śṛṇu tatra me

और तुम जो केवल चंचलता से तथा बल के घमण्ड से उत्तेजित होकर यह मानते हो कि यह काम स्वयं आरम्भ कर देना चाहिए, उसके विषय में मेरी बात सुनो।

श्लोक 9 (3.36.9)

भूरिश्रवाः शलश्चैव जलसन्धश्च वीर्यवान् । भीष्मो द्रोणश्च कर्णश्च द्रोणपुत्रश्च वीर्यवान् ॥

bhūriśravāḥ śalaścaiva jalasandhaśca vīryavān | bhīṣmo droṇaśca karṇaśca droṇaputraśca vīryavān

भूरिश्रवा, शल, पराक्रमी जलसन्ध, भीष्म, द्रोण, कर्ण और पराक्रमी द्रोणपुत्र (अश्वत्थामा),

श्लोक 10 (3.36.10)

धार्तराष्ट्रा दुराधर्षा दुर्योधनपुरोगमाः । सर्व एव कृतास्त्राश्च सततं चाततायिनः ॥

dhārtarāṣṭrā durādharṣā duryodhanapurogamāḥ | sarva eva kṛtāstrāśca satataṃ cātatāyinaḥ

तथा दुर्योधन के नेतृत्व में दुर्जय धृतराष्ट्रपुत्र — ये सभी अस्त्रविद्या में निपुण हैं और सदा आक्रमण को उद्यत रहते हैं।

श्लोक 11 (3.36.11)

राजानः पार्थिवाश्चैव येऽस्माभिरुपतापिताः । ते श्रिताः कौरवं पक्षं जातस्नेहाश्च सांप्रतम् ॥

rājānaḥ pārthivāścaiva ye'smābhirupatāpitāḥ | te śritāḥ kauravaṃ pakṣaṃ jātasnehāśca sāṃpratam

और जिन राजाओं और भूपालों को हमने कभी पीड़ा पहुँचाई थी, वे कौरव पक्ष में जा मिले हैं और अब उससे स्नेह करने लगे हैं।

श्लोक 12 (3.36.12)

दुर्योधनहिते युक्ता न तथाऽस्मासु भारत । पूर्णकोशा बलोपेताः प्रयतिष्यन्ति रक्षणे ॥

duryodhanahite yuktā na tathā'smāsu bhārata | pūrṇakośā balopetāḥ prayatiṣyanti rakṣaṇe

हे भारत, वे दुर्योधन के हित में लगे हैं, हमारे हित में नहीं; भरे हुए कोश और सेना से सम्पन्न वे उसकी रक्षा में पूरा प्रयत्न करेंगे।

श्लोक 13 (3.36.13)

सर्वे कौरवसैन्यस्य सपुत्रामात्यसैनिकाः । संविभक्ता हि मात्राभिर्भोगैरपि च सर्वशः ॥

sarve kauravasainyasya saputrāmātyasainikāḥ | saṃvibhaktā hi mātrābhirbhogairapi ca sarvaśaḥ

कौरव सेना के सभी लोगों को, उनके पुत्रों, मन्त्रियों और सैनिकों सहित, धन के उचित भाग और सब प्रकार के भोग बाँटकर दिए गए हैं।

श्लोक 14 (3.36.14)

दुर्योधनेन ते वीरा मानिताश्च विशेषतः । प्राणांस्त्यक्ष्यन्ति संग्रामे इति मे निश्चिता मतिः ॥

duryodhanena te vīrā mānitāśca viśeṣataḥ | prāṇāṃstyakṣyanti saṃgrāme iti me niścitā matiḥ

दुर्योधन ने उन वीरों का विशेष सम्मान किया है; वे युद्ध में अपने प्राण तक दे देंगे — यह मेरा निश्चित मत है।

श्लोक 15 (3.36.15)

समा यद्यपि भीष्मस्य वृत्तिरस्मासु तेषु च । द्रोणस्य च महाबाहो कृपस्य च महात्मनः ॥

samā yadyapi bhīṣmasya vṛttirasmāsu teṣu ca | droṇasya ca mahābāho kṛpasya ca mahātmanaḥ

हे महाबाहो, यद्यपि भीष्म का, द्रोण का और महात्मा कृप का व्यवहार हमारे और उनके प्रति एक समान है,

श्लोक 16 (3.36.16)

अवश्यं राजपिण्डस्तैर्निर्वेश्य इति मे मतिः । तस्मात्त्यक्ष्यन्ति संग्रामे प्राणानपि सुदुस्त्यजान् ॥

avaśyaṃ rājapiṇḍastairnirveśya iti me matiḥ | tasmāttyakṣyanti saṃgrāme prāṇānapi sudustyajān

फिर भी मेरा मानना है कि वे राजा का खाया हुआ अन्न अवश्य चुकाना चाहेंगे; इसलिए वे युद्ध में अपने उन प्राणों को भी त्याग देंगे जिन्हें त्यागना अत्यन्त कठिन है।

श्लोक 17 (3.36.17)

सर्वे दिव्यास्त्रविद्वांसः सर्वे धर्मपरायणाः । अजेयाश्चेति मे बुद्धिरपि देवैः सवासवैः ॥

sarve divyāstravidvāṃsaḥ sarve dharmaparāyaṇāḥ | ajeyāśceti me buddhirapi devaiḥ savāsavaiḥ

वे सभी दिव्य अस्त्रों के ज्ञाता हैं और सभी धर्मपरायण हैं; मेरी समझ में तो इन्द्र सहित देवता भी उन्हें नहीं जीत सकते।

श्लोक 18 (3.36.18)

अमर्षी नित्यसंरब्धस्तत्र कर्णो महारथः । सर्वास्त्रविदनाधृष्यो ह्यभेद्यकवचावृतः ॥

amarṣī nityasaṃrabdhastatra karṇo mahārathaḥ | sarvāstravidanādhṛṣyo hyabhedyakavacāvṛtaḥ

उनमें महारथी कर्ण है, जो सदा अमर्ष और क्रोध से भरा रहता है, सभी अस्त्रों का ज्ञाता है, अजेय है और अभेद्य कवच से ढका हुआ है।

श्लोक 19 (3.36.19)

अनिर्जित्य रणे सर्वानेतान्पुरुषसत्तमान् । अशक्यो ह्यसहायेन हन्तुं दुर्योधनस्त्वया ॥

anirjitya raṇe sarvānetānpuruṣasattamān | aśakyo hyasahāyena hantuṃ duryodhanastvayā

युद्ध में इन सभी श्रेष्ठ पुरुषों को जीते बिना तुम अकेले दुर्योधन को नहीं मार सकते।

श्लोक 20 (3.36.20)

न निद्रामधिगच्छामि चिन्तयानो वृकोदर । अतिसर्वान्धनुर्ग्राहान्सूतपुत्रस्य लाघवम् ॥

na nidrāmadhigacchāmi cintayāno vṛkodara | atisarvāndhanurgrāhānsūtaputrasya lāghavam

हे वृकोदर, सूतपुत्र कर्ण की वह फुर्ती, जो सभी धनुर्धरों से बढ़कर है, सोचते-सोचते मुझे नींद नहीं आती।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 21 (3.36.21)

एतद्वचनमाज्ञाय भीमसेनोऽत्यमर्षणः । बभूव शान्तिसंयुक्तो गुरोर्वचनवारितः ॥

etadvacanamājñāya bhīmaseno'tyamarṣaṇaḥ | babhūva śāntisaṃyukto gurorvacanavāritaḥ

यह बात समझकर अत्यन्त असहनशील भीमसेन भी बड़े भाई के वचनों से रुककर शान्त हो गए।

श्लोक 22 (3.36.22)

तयोः संवदतोरेवं तदा पाण्डवयोर्द्वयोः । आजगाम महायोगी व्यासः सत्यवतीसुतः ॥

tayoḥ saṃvadatorevaṃ tadā pāṇḍavayordvayoḥ | ājagāma mahāyogī vyāsaḥ satyavatīsutaḥ

जब दोनों पाण्डव इस प्रकार बातें कर रहे थे, तभी सत्यवतीनन्दन महायोगी व्यास वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 23 (3.36.23)

सोऽभिगम्य यथान्यायं पाण्डवैः प्रतिपूजितः । युधिष्ठिरमिदं वाक्यमुवाच वदतां वरः ॥

so'bhigamya yathānyāyaṃ pāṇḍavaiḥ pratipūjitaḥ | yudhiṣṭhiramidaṃ vākyamuvāca vadatāṃ varaḥ

पाण्डवों ने उनके आने पर विधिपूर्वक उनका सत्कार किया; तब वक्ताओं में श्रेष्ठ व्यास ने युधिष्ठिर से यह वचन कहा।

व्यास उवाच

श्लोक 24 (3.36.24)

युधिष्ठिर महाबाहो वेद्मि ते हृदयस्थितम् । मनीषया तत क्षिप्रमागतोऽस्मि नरर्षभ ॥

yudhiṣṭhira mahābāho vedmi te hṛdayasthitam | manīṣayā tata kṣipramāgato'smi nararṣabha

हे महाबाहु युधिष्ठिर, तुम्हारे हृदय में जो है, उसे मैं जानता हूँ। हे वत्स, हे नरश्रेष्ठ, अपनी अन्तर्दृष्टि से उसे जानकर ही मैं शीघ्र यहाँ आया हूँ।

श्लोक 25 (3.36.25)

भीष्माद्द्रोणात्कृपात्कर्णाद्द्रोणपुत्राच्च भारत । दुर्योधनान्नृपसुतात्तथा दुःशासनादपि ॥

bhīṣmāddroṇātkṛpātkarṇāddroṇaputrācca bhārata | duryodhanānnṛpasutāttathā duḥśāsanādapi

हे भारत, भीष्म, द्रोण, कृप, कर्ण और द्रोणपुत्र से, राजकुमार दुर्योधन से और दुःशासन से भी —

श्लोक 26 (3.36.26)

यत्ते भयममित्रघ्न हृदि संपरिवर्तते । तत्तेऽहं नाशयिष्यामि विधिदृष्टेन हेतुना ॥

yatte bhayamamitraghna hṛdi saṃparivartate | tatte'haṃ nāśayiṣyāmi vidhidṛṣṭena hetunā

हे शत्रुनाशन, जो भय तुम्हारे हृदय में बार-बार उठता रहता है, उसे मैं शास्त्रविधि से देखे हुए उपाय द्वारा नष्ट कर दूँगा।

श्लोक 27 (3.36.27)

तच्छ्रुत्वा धृतिमास्थाय कर्मणा प्रतिपादय । प्रतिपाद्य तु राजेन्द्र ततः क्षिप्रं ज्वरं जहि ॥

tacchrutvā dhṛtimāsthāya karmaṇā pratipādaya | pratipādya tu rājendra tataḥ kṣipraṃ jvaraṃ jahi

इसे सुनकर धैर्य धारण करो और कर्म द्वारा इसे पूरा करो; और हे राजेन्द्र, इसे पूरा करके शीघ्र ही इस चिन्ता-ज्वर को त्याग दो।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 28 (3.36.28)

तत एकान्तमानाय्य पाराशर्यो युधिष्ठिरम् । अब्रवीदुपपन्नार्थमिदं वाक्यविशारदः ॥

tata ekāntamānāyya pārāśaryo yudhiṣṭhiram | abravīdupapannārthamidaṃ vākyaviśāradaḥ

तब वाक्यविशारद पराशरनन्दन व्यास युधिष्ठिर को एकान्त में ले गए और उनसे यह सारगर्भित वचन कहा।

व्यास उवाच

श्लोक 29 (3.36.29)

श्रेयसस्तेऽपरः कालः प्राप्तो भरतसत्तम । येनाभिभविता शत्रून्रणे पार्थो धनुर्धरः ॥

śreyasaste'paraḥ kālaḥ prāpto bharatasattama | yenābhibhavitā śatrūnraṇe pārtho dhanurdharaḥ

हे भरतश्रेष्ठ, अब तुम्हारे लिए कल्याण का एक नया समय आ पहुँचा है, जिसमें धनुर्धर पार्थ युद्ध में शत्रुओं को परास्त करेगा।

श्लोक 30 (3.36.30)

गृहाणेमां मया प्रोक्तां सिद्धिं मूर्तिमतीमिव । विद्यां प्रतिस्मृतिं नाम प्रपन्नाय ब्रवीमि ते ॥

gṛhāṇemāṃ mayā proktāṃ siddhiṃ mūrtimatīmiva | vidyāṃ pratismṛtiṃ nāma prapannāya bravīmi te

मुझसे कही गई यह प्रतिस्मृति नामक विद्या ग्रहण करो, जो मानो साक्षात् मूर्तिमती सिद्धि है। तुम मेरी शरण में आए हो, इसलिए मैं तुम्हें यह बता रहा हूँ।

श्लोक 31 (3.36.31)

यामवाप्य महाबाहुरर्जुनः साधयिष्यति । अस्त्रहेतोर्महेन्द्रं च रुद्रं चैवाभिगच्छतु ॥

yāmavāpya mahābāhurarjunaḥ sādhayiṣyati | astrahetormahendraṃ ca rudraṃ caivābhigacchatu

इसे पाकर महाबाहु अर्जुन तुम्हारा प्रयोजन सिद्ध करेगा। वह अस्त्रों के लिए महेन्द्र और रुद्र के पास जाए,

श्लोक 32 (3.36.32)

वरुणं च कुबेरं च धर्मराजं च पाण्डव । शक्तो ह्येष सुरान्द्रष्टुं तपसा विक्रमेण च ॥

varuṇaṃ ca kuberaṃ ca dharmarājaṃ ca pāṇḍava | śakto hyeṣa surāndraṣṭuṃ tapasā vikrameṇa ca

और हे पाण्डुनन्दन, वरुण, कुबेर तथा धर्मराज (यम) के पास भी जाए; क्योंकि वह तप और पराक्रम से देवताओं का दर्शन करने में समर्थ है।

श्लोक 33 (3.36.33)

ऋषिरेष महातेजा नारायणसहायवान् । पुराणः शाश्वतो देवस्त्वजेयो जिष्णुरच्युतः ॥

ṛṣireṣa mahātejā nārāyaṇasahāyavān | purāṇaḥ śāśvato devastvajeyo jiṣṇuracyutaḥ

वह महातेजस्वी ऋषि है, जिसके सहायक नारायण हैं; वह पुरातन, शाश्वत, दिव्य, अजेय, विजयी और अच्युत है।

श्लोक 34 (3.36.34)

अस्त्राणीन्द्राच्च रुद्राच्च लोकपालेभ्य एव च । समादाय महाबाहुर्महत्कर्म करिष्यति ॥

astrāṇīndrācca rudrācca lokapālebhya eva ca | samādāya mahābāhurmahatkarma kariṣyati

इन्द्र, रुद्र और लोकपालों से अस्त्र प्राप्त करके वह महाबाहु महान् कर्म करेगा।

श्लोक 35 (3.36.35)

वनादस्माच्च कौन्तेय वनमन्यद्विचिन्त्यताम् । निवासार्थाय यद्युक्तं भवेद्वः पृथिवीपते ॥

vanādasmācca kaunteya vanamanyadvicintyatām | nivāsārthāya yadyuktaṃ bhavedvaḥ pṛthivīpate

हे कुन्तीनन्दन, हे पृथ्वीपते, इस वन से किसी दूसरे वन में जाने का विचार करो, जो तुम लोगों के निवास के लिए उपयुक्त हो।

श्लोक 36 (3.36.36)

एकत्र चिरवासो हि न प्रीतिजननो भवेत् । तापसानां च शान्तानां भवेदुद्वेगकारकः ॥

ekatra ciravāso hi na prītijanano bhavet | tāpasānāṃ ca śāntānāṃ bhavedudvegakārakaḥ

क्योंकि एक ही स्थान पर बहुत दिनों तक रहना सुखदायक नहीं होता, और इससे शान्त तपस्वियों को भी उद्वेग होने लगता है।

श्लोक 37 (3.36.37)

मृगाणामुपरोधश्च वीरुदोषधिसंक्षयः । बिभर्षि च बहून्विप्रान्वेदवेदाङ्गपारगान् ॥

mṛgāṇāmuparodhaśca vīrudoṣadhisaṃkṣayaḥ | bibharṣi ca bahūnviprānvedavedāṅgapāragān

यहाँ के मृगों को कष्ट होता है, लताएँ और ओषधियाँ समाप्त होती जाती हैं; और तुम वेद-वेदांगों में पारंगत बहुत-से ब्राह्मणों का भरण-पोषण भी करते हो।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 38 (3.36.38)

एवमुक्त्वा प्रपन्नाय शुचये भगवान्प्रभुः । प्रोवाच योगतत्त्वज्ञो योगविद्यामनुत्तमाम् ॥

evamuktvā prapannāya śucaye bhagavānprabhuḥ | provāca yogatattvajño yogavidyāmanuttamām

यह कहकर योग के तत्त्व को जानने वाले भगवान् प्रभु व्यास ने शरण में आए उस पवित्र पुरुष को सर्वोत्तम योगविद्या का उपदेश दिया —

श्लोक 39 (3.36.39)

धर्मराजाय धीमान्स व्यासः सत्यवतीसुतः । अनुज्ञाय च कौन्तेयं तत्रैवान्तरधीयत ॥

dharmarājāya dhīmānsa vyāsaḥ satyavatīsutaḥ | anujñāya ca kaunteyaṃ tatraivāntaradhīyata

बुद्धिमान् धर्मराज को। फिर सत्यवतीपुत्र व्यास कुन्तीनन्दन से विदा लेकर वहीं अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 40 (3.36.40)

युधिष्ठिरस्तु धर्मात्मा तद्ब्रह्म मनसा यतः । धारयामास मेधावी काले काले सदाऽभ्यसन् ॥

yudhiṣṭhirastu dharmātmā tadbrahma manasā yataḥ | dhārayāmāsa medhāvī kāle kāle sadā'bhyasan

धर्मात्मा और मेधावी युधिष्ठिर ने मन को संयत रखकर उस मन्त्र को हृदय में धारण कर लिया और समय-समय पर निरन्तर उसका अभ्यास करते रहे।

श्लोक 41 (3.36.41)

स व्यासवाक्यमुदितो वनाद्द्वैतवनात्ततः । ययौ सरस्वतीकूले काम्यकं नाम काननम् ॥

sa vyāsavākyamudito vanāddvaitavanāttataḥ | yayau sarasvatīkūle kāmyakaṃ nāma kānanam

व्यास के वचनों से प्रसन्न होकर वे द्वैतवन से निकलकर सरस्वती के तट पर स्थित काम्यक नामक वन में चले गए।

श्लोक 42 (3.36.42)

तमन्वयुर्महाराज शिक्षाक्षरविशारदाः । ब्राह्मणास्तपसा युक्ता देवेन्द्रमृषयो यथा ॥

tamanvayurmahārāja śikṣākṣaraviśāradāḥ | brāhmaṇāstapasā yuktā devendramṛṣayo yathā

हे महाराज, जैसे ऋषि देवराज इन्द्र के पीछे चलते हैं, वैसे ही शिक्षा और अक्षर-विद्या में निपुण, तपस्वी ब्राह्मण उनके पीछे-पीछे गए।

श्लोक 43 (3.36.43)

ततः काम्यकमासाद्य पुनस्ते भरतर्षभ । न्यविशन्त महात्मानः सामान्याः सपदानुगाः ॥

tataḥ kāmyakamāsādya punaste bharatarṣabha | nyaviśanta mahātmānaḥ sāmānyāḥ sapadānugāḥ

हे भरतश्रेष्ठ, फिर से काम्यक वन में पहुँचकर वे महात्मा अपने सभी अनुचरों के साथ वहाँ बस गए।

श्लोक 44 (3.36.44)

तत्र ते न्यवसन्राजन्कंचित्कालं मनस्विनः । धनुर्वेदपरा वीरा गृणाना वेदमुत्तमम् ॥

tatra te nyavasanrājankaṃcitkālaṃ manasvinaḥ | dhanurvedaparā vīrā gṛṇānā vedamuttamam

हे राजन्, वहाँ वे मनस्वी वीर कुछ समय तक रहे; वे धनुर्वेद के अभ्यास में लगे रहते और उत्तम वेद का पाठ करते थे।

श्लोक 45 (3.36.45)

चरन्तो मृगयां नित्यं शुद्धैर्बाणैर्मृगार्थिनः । पितृदैवतविप्रेभ्यो निर्वपन्तो यथाविधि ॥

caranto mṛgayāṃ nityaṃ śuddhairbāṇairmṛgārthinaḥ | pitṛdaivataviprebhyo nirvapanto yathāvidhi

वे प्रतिदिन शुद्ध बाणों से मृगया करते और विधिपूर्वक पितरों, देवताओं और ब्राह्मणों को उनका भाग अर्पित करते थे।

अध्याय 35अध्याय-सूचीअध्याय 37