आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 37
इन्द्र के अस्त्र पाने के लिए अर्जुन का प्रस्थान
व्यास के उपदेश का स्मरण कर युधिष्ठिर अर्जुन से कहते हैं कि कौरवों के आचार्य सम्पूर्ण धनुर्वेद के ज्ञाता हैं; वे अर्जुन को व्यास से मिली रहस्य-विद्या सिखाते हैं और इन्द्र से दिव्यास्त्र पाने के लिए उत्तर दिशा में भेजते हैं। ब्राह्मण, सिद्ध, भाई और द्रौपदी उन्हें आशीर्वाद देते हैं; नकुल-सहदेव इन्द्र के वचन का स्मरण कराते हैं, और द्रौपदी सभा में हुए अपमान को याद करते हुए उनके सकुशल लौटने की प्रार्थना करती है। अर्जुन हिमालय और गन्धमादन को पार कर इन्द्रकील पहुँचते हैं, जहाँ तपस्वी के वेश में इन्द्र उनकी दृढ़ता की परीक्षा लेते हैं और वचन देते हैं कि शिव के दर्शन के बाद वे उन्हें अस्त्र देंगे।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.37.1)
कस्यचित्त्वथ कालस्य धर्मराजो युधिष्ठिरः । संस्मृत्य मुनिसंदेशमिदं वचनमब्रवीत् ॥
kasyacittvatha kālasya dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | saṃsmṛtya munisaṃdeśamidaṃ vacanamabravīt
कुछ समय बीतने पर धर्मराज युधिष्ठिर ने मुनि (व्यास) के आदेश का स्मरण करके यह बात कही।
श्लोक 2 (3.37.2)
विविक्ते विदितप्रज्ञमर्जुनं पुरुषर्षभ । सान्त्वपूर्वं स्मितं कृत्वा पाणिना परिसंस्पृशन् ॥
vivikte viditaprajñamarjunaṃ puruṣarṣabha | sāntvapūrvaṃ smitaṃ kṛtvā pāṇinā parisaṃspṛśan
हे पुरुषश्रेष्ठ! एकान्त में उन्होंने मुस्कराकर और हाथ से धीरे से छूकर, अपनी बुद्धि के लिए प्रसिद्ध अर्जुन से स्नेहपूर्वक बात की।
श्लोक 3 (3.37.3)
स मुहूर्तमिव ध्यात्वा वनवासमरिंदमः । धनंजयं धर्मराजो रहसीदमुवाच ह ॥
sa muhūrtamiva dhyātvā vanavāsamariṃdamaḥ | dhanaṃjayaṃ dharmarājo rahasīdamuvāca ha
शत्रुदमन धर्मराज ने क्षण भर वनवास के विषय में सोचकर एकान्त में धनंजय से यह कहा —
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 4 (3.37.4)
भीष्मे द्रोणे कृपे कर्णे द्रोणपुत्रे च भारत । धनुर्वेदश्चतुष्पाद एतेष्वद्य प्रतिष्ठितः ॥
bhīṣme droṇe kṛpe karṇe droṇaputre ca bhārata | dhanurvedaścatuṣpāda eteṣvadya pratiṣṭhitaḥ
"हे भारत! भीष्म, द्रोण, कृप, कर्ण और द्रोणपुत्र (अश्वत्थामा) — इन सब में आज चारों अंगों वाला धनुर्वेद प्रतिष्ठित है।
श्लोक 5 (3.37.5)
दैवं ब्राह्मं चासुरं च सप्रयोगचिकित्सितम् । सर्वास्त्राणां प्रयोगं च अभिजानन्ति कृत्स्नशः ॥
daivaṃ brāhmaṃ cāsuraṃ ca saprayogacikitsitam | sarvāstrāṇāṃ prayogaṃ ca abhijānanti kṛtsnaśaḥ
वे दैव, ब्राह्म और आसुर अस्त्रों को, उनके प्रयोग और प्रतिकार सहित, तथा सभी अस्त्रों के प्रयोग को पूरी तरह जानते हैं।
श्लोक 6 (3.37.6)
ते सर्वे धृतराष्ट्रस्य पुत्रेण परिसान्त्विताः । संविभक्ताश्च तुष्टाश्च गुरुवत्तेषु वर्तते । सर्वयोधेषु चैवास्य सदा प्रीतिरनुत्तमा ॥
te sarve dhṛtarāṣṭrasya putreṇa parisāntvitāḥ | saṃvibhaktāśca tuṣṭāśca guruvatteṣu vartate | sarvayodheṣu caivāsya sadā prītiranuttamā
उन सबको धृतराष्ट्र के पुत्र ने मना-पतियाकर अपना बना लिया है; उसने उन्हें उनका भाग दिया है और वे संतुष्ट हैं; वह उनके साथ गुरुजनों जैसा व्यवहार करता है। अपने सभी योद्धाओं के प्रति भी उसका प्रेम सदा अनुपम रहता है।
श्लोक 7 (3.37.7)
आचार्या मानितास्तुष्टाः शान्तिं व्यवहरन्त्युत । शक्तिं न हापयिष्यन्ति ते काले प्रतिपूजिताः ॥
ācāryā mānitāstuṣṭāḥ śāntiṃ vyavaharantyuta | śaktiṃ na hāpayiṣyanti te kāle pratipūjitāḥ
सम्मानित और संतुष्ट आचार्य अभी से उसके कल्याण और शान्ति के लिए यत्न करते हैं; और उससे पूजित होकर वे समय आने पर अपनी शक्ति में कोई कमी नहीं आने देंगे।
श्लोक 8 (3.37.8)
अद्य चेयं मही कृत्स्ना दुर्योधनवशानुगा । सग्रामनगरा पार्थ ससागरवनाकरा । भवानेव प्रियोऽस्माकं त्वयि भारः समाहितः ॥
adya ceyaṃ mahī kṛtsnā duryodhanavaśānugā | sagrāmanagarā pārtha sasāgaravanākarā | bhavāneva priyo'smākaṃ tvayi bhāraḥ samāhitaḥ
और आज यह सारी पृथ्वी — गाँवों, नगरों, समुद्रों, वनों और खानों सहित — हे पार्थ, दुर्योधन के वश में है। हमें तुम्हीं प्रिय हो; सारा भार तुम पर ही टिका है।
श्लोक 9 (3.37.9)
अत्र कृत्यं प्रपश्यामि प्राप्तकालमरिंदम । कृष्णद्वैपायनात्तात गृहीतोपनिषन्मया ॥
atra kṛtyaṃ prapaśyāmi prāptakālamariṃdama | kṛṣṇadvaipāyanāttāta gṛhītopaniṣanmayā
हे शत्रुदमन! इस विषय में मुझे वह कार्य दिखाई देता है जिसका समय आ पहुँचा है। तात, कृष्णद्वैपायन (व्यास) से मैंने एक रहस्य-विद्या प्राप्त की है।
श्लोक 10 (3.37.10)
गृहीतया तया सम्यग्जगत्सर्वं प्रकाशते । तेन त्वं ब्रह्मणा तात संयुक्तः सुसमाहितः ॥
gṛhītayā tayā samyagjagatsarvaṃ prakāśate | tena tvaṃ brahmaṇā tāta saṃyuktaḥ susamāhitaḥ
उसे भली-भाँति ग्रहण करने पर सारा जगत् स्पष्ट हो जाता है। तात, उस ब्रह्म-मन्त्र से युक्त होकर और मन को भली-भाँति एकाग्र करके
श्लोक 11 (3.37.11)
देवतानां यथाकालं प्रसादं प्रतिपालय । तपसा योजयात्मानमुग्रेण भरतर्षभ ॥
devatānāṃ yathākālaṃ prasādaṃ pratipālaya | tapasā yojayātmānamugreṇa bharatarṣabha
उचित समय पर देवताओं की कृपा की प्रतीक्षा करो। हे भरतश्रेष्ठ, अपने को उग्र तपस्या में लगाओ।
श्लोक 12 (3.37.12)
धनुष्मान्कवची खड्गी मुनिः साधुव्रते स्थितः । न कस्यचिद्ददन्मार्गं गच्छ तातोत्तरां दिशम् ॥
dhanuṣmānkavacī khaḍgī muniḥ sādhuvrate sthitaḥ | na kasyaciddadanmārgaṃ gaccha tātottarāṃ diśam
धनुष, कवच और खड्ग धारण करके, उत्तम व्रत में स्थित मुनि बनकर, किसी को मार्ग न देते हुए, तात, उत्तर दिशा को जाओ।
श्लोक 13 (3.37.13)
इन्द्रे ह्यस्त्राणि दिव्यानि समस्तानि धनंजय । वृत्राद्भीतैर्बलं देवैस्तदा शक्रे समर्पितम् ॥
indre hyastrāṇi divyāni samastāni dhanaṃjaya | vṛtrādbhītairbalaṃ devaistadā śakre samarpitam
हे धनंजय! सभी दिव्य अस्त्र इन्द्र के पास हैं; वृत्र से भयभीत देवताओं ने तब अपना बल शक्र को सौंप दिया था।
श्लोक 14 (3.37.14)
तान्येकस्थानि सर्वाणि ततस्त्वं प्रतिपत्स्यसे । अनेन ब्रह्मणा तात सर्वं संप्रतिपद्यते ॥
tānyekasthāni sarvāṇi tatastvaṃ pratipatsyase | anena brahmaṇā tāta sarvaṃ saṃpratipadyate
वे सब एक ही स्थान पर एकत्र हैं; वहाँ तुम उन्हें प्राप्त करोगे। तात, इस ब्रह्म-मन्त्र से सब कुछ सिद्ध हो जाता है।
श्लोक 15 (3.37.15)
शक्रमेव प्रपद्यस्व स तेऽस्त्राणि प्रदास्यति । दीक्षितोऽद्यैव गच्छ त्वं द्रष्टुं देवं पुरंदरम् ॥
śakrameva prapadyasva sa te'strāṇi pradāsyati | dīkṣito'dyaiva gaccha tvaṃ draṣṭuṃ devaṃ puraṃdaram
शक्र की ही शरण में जाओ; वे तुम्हें अस्त्र देंगे। दीक्षा लेकर आज ही देव पुरन्दर के दर्शन के लिए जाओ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 16 (3.37.16)
एवमुक्त्वा धर्मराजस्तमध्यापयत प्रभुः ॥
evamuktvā dharmarājastamadhyāpayata prabhuḥ
ऐसा कहकर समर्थ धर्मराज ने उन्हें वह विद्या सिखाई।
श्लोक 17 (3.37.17)
दीक्षितं विधिना तेन यतवाक्कायमानसम् । अनुजज्ञे तदा वीरं भ्राता भ्रातरमग्रजः ॥
dīkṣitaṃ vidhinā tena yatavākkāyamānasam | anujajñe tadā vīraṃ bhrātā bhrātaramagrajaḥ
तब बड़े भाई ने उस विधि से दीक्षित, वाणी, शरीर और मन को संयम में रखे हुए अपने वीर भाई को जाने की आज्ञा दी।
श्लोक 18 (3.37.18)
निदेशाद्धर्मराजस्य द्रष्टुकामः पुरंदरम् । धनुर्गाण्डीवमादाय तथाऽक्षय्ये महेषुधी ॥
nideśāddharmarājasya draṣṭukāmaḥ puraṃdaram | dhanurgāṇḍīvamādāya tathā'kṣayye maheṣudhī
धर्मराज के आदेश से पुरन्दर के दर्शन की इच्छा लेकर उन्होंने गाण्डीव धनुष और दोनों अक्षय महान् तरकश ले लिए।
श्लोक 19 (3.37.19)
कवची सतलत्राणो बद्धगोधाङ्गुलित्रवान् । हुत्वाऽग्निं ब्राह्मणान्निष्कैः स्वस्तिवाच्य महाभुजः ॥
kavacī satalatrāṇo baddhagodhāṅgulitravān | hutvā'gniṃ brāhmaṇānniṣkaiḥ svastivācya mahābhujaḥ
कवच और हस्तत्राण पहनकर, गोह-चर्म के अंगुलित्राण बाँधकर, उस महाबाहु ने अग्नि में आहुति दी और ब्राह्मणों को स्वर्ण-मुद्राएँ देकर उनसे स्वस्तिवाचन कराया।
श्लोक 20 (3.37.20)
प्रातिष्ठत महाबाहुः प्रगृहीतशरासनः । वधाय धार्तराष्ट्राणां निःश्वस्योर्ध्वमुदैक्षत ॥
prātiṣṭhata mahābāhuḥ pragṛhītaśarāsanaḥ | vadhāya dhārtarāṣṭrāṇāṃ niḥśvasyordhvamudaikṣata
फिर वह महाबाहु धनुष हाथ में लेकर चल पड़े; धृतराष्ट्र के पुत्रों के वध का संकल्प लिए, लंबी साँस भरकर उन्होंने ऊपर की ओर देखा।
श्लोक 21 (3.37.21)
तं दृष्ट्वा तत्र कौन्तेयं प्रगृहीतशरासनम् । अब्रुवन्ब्राह्मणाः सिद्धा भूतान्यन्तर्हितानि च ॥
taṃ dṛṣṭvā tatra kaunteyaṃ pragṛhītaśarāsanam | abruvanbrāhmaṇāḥ siddhā bhūtānyantarhitāni ca
वहाँ कुन्तीपुत्र को धनुष उठाए देखकर ब्राह्मणों, सिद्धों और अदृश्य प्राणियों ने कहा —
ब्राह्मणा ऊचुः
श्लोक 22 (3.37.22)
क्षिप्रमाप्नुहि कौन्तेय मनसा यद्यदिच्छसि । संसाधयस्व कौन्तेय ध्रुवोऽस्तु विजयस्तव ॥
kṣipramāpnuhi kaunteya manasā yadyadicchasi | saṃsādhayasva kaunteya dhruvo'stu vijayastava
"हे कुन्तीनन्दन! जो-जो तुम मन में चाहते हो, उसे शीघ्र प्राप्त करो। हे कौन्तेय, अपना कार्य सिद्ध करो; तुम्हारी विजय निश्चित हो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 23 (3.37.23)
अब्रुवन्ब्राह्मणाः पार्थमिति कृत्वा जयाशिषः । सिद्धचारणसङ्घाश्च गन्धर्वाश्च तमब्रुवन् ॥
abruvanbrāhmaṇāḥ pārthamiti kṛtvā jayāśiṣaḥ | siddhacāraṇasaṅghāśca gandharvāśca tamabruvan
इस प्रकार ब्राह्मणों ने पार्थ को विजय का आशीर्वाद दिया; और सिद्धों व चारणों के समूहों तथा गन्धर्वों ने उनसे कहा —
सिद्धचारणगन्धर्वा ऊचुः
श्लोक 24 (3.37.24)
स्वस्तिव्रतमुपाधत्स्व सङ्कल्पस्तव सिद्ध्यताम् । मनोरथाश्च ते सर्वे समृद्ध्यन्तां महारथ ॥
svastivratamupādhatsva saṅkalpastava siddhyatām | manorathāśca te sarve samṛddhyantāṃ mahāratha
"हे महारथी! कल्याणकारी व्रत धारण करो; तुम्हारा संकल्प सिद्ध हो और तुम्हारे सभी मनोरथ पूरे हों।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 25 (3.37.25)
एवमुक्तोऽभिवाद्यैतान्बद्धाञ्जलिपुटस्तथा । तपोयोगमनाः पार्थः पुरोहितमवन्दत ॥
evamukto'bhivādyaitānbaddhāñjalipuṭastathā | tapoyogamanāḥ pārthaḥ purohitamavandata
ऐसा कहे जाने पर पार्थ ने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और तप व योग में मन लगाकर पुरोहित (धौम्य) की वन्दना की।
श्लोक 26 (3.37.26)
ततः प्रीतमना जिष्णुस्तावुभावभ्यवन्दत । सहोदरावतिरथौ युधिष्ठिरवृकोदरौ ॥
tataḥ prītamanā jiṣṇustāvubhāvabhyavandata | sahodarāvatirathau yudhiṣṭhiravṛkodarau
फिर प्रसन्नचित्त जिष्णु ने अपने सहोदर, अतिरथी दोनों भाइयों — युधिष्ठिर और वृकोदर (भीम) — को प्रणाम किया।
श्लोक 27 (3.37.27)
तं क्लान्तमनसौ तूर्णमभिगम्य महारथौ । यमौ गाण्डीवधन्वानमभ्यवादयतामुभौ ॥
taṃ klāntamanasau tūrṇamabhigamya mahārathau | yamau gāṇḍīvadhanvānamabhyavādayatāmubhau
उदास मन वाले दोनों महारथी यमज भाई (नकुल और सहदेव) शीघ्र गाण्डीवधारी के पास आए और दोनों ने उन्हें प्रणाम किया।
श्लोक 28 (3.37.28)
अभिवाद्य तु तौ वीरावूचतुः पाकशासनिम् । अवाप्तव्यानि सर्वाणि दिव्यान्यस्त्राणि वासवात् । अस्त्राण्याप्नुहि कौन्तेय मनसा यद्यदिच्छसि ॥
abhivādya tu tau vīrāvūcatuḥ pākaśāsanim | avāptavyāni sarvāṇi divyānyastrāṇi vāsavāt | astrāṇyāpnuhi kaunteya manasā yadyadicchasi
प्रणाम करके उन दोनों वीरों ने इन्द्रपुत्र से कहा — "सभी दिव्य अस्त्र वासव (इन्द्र) से प्राप्त करने हैं। हे कुन्तीनन्दन, जो-जो तुम मन में चाहते हो, वे अस्त्र प्राप्त करो।
यमावूचतुः
श्लोक 29 (3.37.29)
गिरो ह्यशिथिलाः सर्वा निर्दोषाः संमताः सताम् । त्वमेकः पाण्डवेष्वद्य संप्राप्तोऽसि धनञ्जय ॥
giro hyaśithilāḥ sarvā nirdoṣāḥ saṃmatāḥ satām | tvamekaḥ pāṇḍaveṣvadya saṃprāpto'si dhanañjaya
तुम्हारी सारी वाणी दृढ़, निर्दोष और सज्जनों द्वारा मान्य है। हे धनंजय, पाण्डवों में आज केवल तुम्हें ही यह अवसर मिला है।
श्लोक 30 (3.37.30)
न चाधर्मविदं देवा नासिद्धं नातपस्विनम् । द्रष्टुमिच्छन्ति कौन्तेय चलचित्तं शठं न च ॥
na cādharmavidaṃ devā nāsiddhaṃ nātapasvinam | draṣṭumicchanti kaunteya calacittaṃ śaṭhaṃ na ca
हे कुन्तीपुत्र! देवता उसे देखना नहीं चाहते जो धर्म नहीं जानता, जो सिद्ध नहीं है, जो तपस्वी नहीं है, जिसका मन चंचल है, और न ही किसी धूर्त को —
श्लोक 31 (3.37.31)
रोरूयमाणः कटुकमीर्ष्यकः कटुकाक्षरः । शठकः श्लाघकः क्षेप्ता हन्ता च विचिकित्सिता ॥
rorūyamāṇaḥ kaṭukamīrṣyakaḥ kaṭukākṣaraḥ | śaṭhakaḥ ślāghakaḥ kṣeptā hantā ca vicikitsitā
कटु विलाप करने वाला, ईर्ष्यालु, कठोर वचन बोलने वाला, शठ, आत्मप्रशंसक, निन्दक, हत्यारा, संशयी,
श्लोक 32 (3.37.32)
विश्वस्तहन्ता मायावी क्रोधनोऽनृतभाषिता । अत्याशी नास्तिकोऽदाता मित्रध्रुक्सर्वशङ्कितः ॥
viśvastahantā māyāvī krodhano'nṛtabhāṣitā | atyāśī nāstiko'dātā mitradhruksarvaśaṅkitaḥ
विश्वास करने वालों का घात करने वाला, मायावी, क्रोधी, असत्यवादी, अति भोजन करने वाला, नास्तिक, दान न देने वाला, मित्रद्रोही, सब पर संदेह करने वाला,
श्लोक 33 (3.37.33)
आक्रोष्टा चातिमानी च रौद्रो लुब्धोऽथ लोलुपः । स्तेनश्च मद्यपश्चैव भ्रूणहा गुरुतल्पगः ॥
ākroṣṭā cātimānī ca raudro lubdho'tha lolupaḥ | stenaśca madyapaścaiva bhrūṇahā gurutalpagaḥ
गाली देने वाला, अत्यन्त अभिमानी, क्रूर, लोभी, लालची, चोर, मद्यपान करने वाला, भ्रूणहत्यारा, गुरुपत्नीगामी,
श्लोक 34 (3.37.34)
संभावितात्मा चात्यर्थं नृशंसः पुरुषश्च यः । नैते लोकानाप्नुवन्ति निर्लोकास्ते धनञ्जय ॥
saṃbhāvitātmā cātyarthaṃ nṛśaṃsaḥ puruṣaśca yaḥ | naite lokānāpnuvanti nirlokāste dhanañjaya
अपने को बहुत बड़ा समझने वाला और निर्दयी पुरुष — ये पुण्यलोकों को प्राप्त नहीं होते; हे धनंजय, ये लोकहीन रह जाते हैं।
श्लोक 35 (3.37.35)
आनृशंस्यमनुक्रोशः सत्यं करुणवेदिता । दमः स्थितिर्धृतिर्धर्मः क्षमा कृत्यमनुत्तमम् ॥
ānṛśaṃsyamanukrośaḥ satyaṃ karuṇaveditā | damaḥ sthitirdhṛtirdharmaḥ kṣamā kṛtyamanuttamam
अक्रूरता, करुणा, सत्य, दूसरों के दुःख की अनुभूति, इन्द्रिय-संयम, स्थिरता, धैर्य, धर्म और क्षमा — जो सर्वोत्तम कर्तव्य है —
श्लोक 36 (3.37.36)
दया शमश्च धर्मश्च गुरुपूजा कृतज्ञता । मैत्रता द्विजभक्तिश्च वसन्ति त्वयि फल्गुन । व्यपेक्षा सर्वभूतेषु कृपा दानं मतिः स्मृतिः ॥
dayā śamaśca dharmaśca gurupūjā kṛtajñatā | maitratā dvijabhaktiśca vasanti tvayi phalguna | vyapekṣā sarvabhūteṣu kṛpā dānaṃ matiḥ smṛtiḥ
दया, शान्ति, धर्म, गुरुजनों का पूजन, कृतज्ञता, मैत्री और द्विजों के प्रति भक्ति — ये सब, हे फाल्गुन, तुममें निवास करते हैं; और सब प्राणियों के प्रति अपेक्षा-भाव, कृपा, दान, बुद्धि और स्मृति भी।
श्लोक 37 (3.37.37)
तस्मात्कौरव्य शक्रेण समेष्यसि धनञ्जय । त्वादृशेन हि देवानां श्लाघनीयः समागमः ॥
tasmātkauravya śakreṇa sameṣyasi dhanañjaya | tvādṛśena hi devānāṃ ślāghanīyaḥ samāgamaḥ
इसलिए हे कुरुनन्दन धनंजय, तुम शक्र से मिलोगे; क्योंकि तुम जैसे व्यक्ति से मिलना देवताओं के लिए भी सराहनीय है।
श्लोक 38 (3.37.38)
सुहृदां सोदराणां च सर्वेषां भरतर्षभ । त्वं गतिः परमा तात वृत्रहा मरुतामिव ॥
suhṛdāṃ sodarāṇāṃ ca sarveṣāṃ bharatarṣabha | tvaṃ gatiḥ paramā tāta vṛtrahā marutāmiva
हे भरतश्रेष्ठ, तात! जैसे वृत्रहन्ता (इन्द्र) मरुद्गणों के आश्रय हैं, वैसे ही तुम अपने सुहृदों, भाइयों और हम सबके परम आश्रय हो।
श्लोक 39 (3.37.39)
तस्मिंस्त्रयोदशे वर्षे भ्रातरः सुहृदश्च ते । सर्वे हि संश्रयिष्यन्ति बाहुवीर्यं महाबल ॥
tasmiṃstrayodaśe varṣe bhrātaraḥ suhṛdaśca te | sarve hi saṃśrayiṣyanti bāhuvīryaṃ mahābala
हे महाबली! उस तेरहवें वर्ष में तुम्हारे भाई और सुहृद सब तुम्हारे बाहुबल का ही सहारा लेंगे।
श्लोक 40 (3.37.40)
स पार्थ पितरं गच्छ सहस्राक्षमरिन्दम । मुष्टिग्रहणमादत्स्व सर्वाण्यस्त्राणि वासवात् ॥
sa pārtha pitaraṃ gaccha sahasrākṣamarindama | muṣṭigrahaṇamādatsva sarvāṇyastrāṇi vāsavāt
इसलिए हे शत्रुदमन पार्थ, अपने पिता सहस्राक्ष (इन्द्र) के पास जाओ और वासव से सारे अस्त्र अपनी मुट्ठी में कर लो।
श्लोक 41 (3.37.41)
शतशृङ्गे महाबाहो मघवानिदमब्रवीत् । शृण्वतां सर्वभूतानां त्वामुपाघ्राय मूर्धनि ॥
śataśṛṅge mahābāho maghavānidamabravīt | śṛṇvatāṃ sarvabhūtānāṃ tvāmupāghrāya mūrdhani
हे महाबाहु! शतशृंग पर्वत पर मघवा (इन्द्र) ने सब प्राणियों के सुनते हुए तुम्हारा मस्तक सूँघकर यह कहा था —
श्लोक 42 (3.37.42)
विदितः सर्वभूतानां दिवं तात गमिष्यसि । प्राप्य पुण्यकृतां लोकान्रंस्यसे जयतां वर ॥
viditaḥ sarvabhūtānāṃ divaṃ tāta gamiṣyasi | prāpya puṇyakṛtāṃ lokānraṃsyase jayatāṃ vara
"तात, सब प्राणियों में विख्यात होकर तुम स्वर्ग जाओगे; हे विजेताओं में श्रेष्ठ, पुण्यात्माओं के लोकों को पाकर तुम वहाँ आनन्द करोगे।
श्लोक 43 (3.37.43)
मानितस्त्रिदशैः पार्थ विहृत्य सुसुखं दिवि । अवाप्य परमास्त्राणि पृथिवीं पुनरेष्यसि ॥
mānitastridaśaiḥ pārtha vihṛtya susukhaṃ divi | avāpya paramāstrāṇi pṛthivīṃ punareṣyasi
हे पार्थ, देवताओं से सम्मानित होकर, स्वर्ग में सुखपूर्वक विहार करके और श्रेष्ठ अस्त्र पाकर तुम फिर पृथ्वी पर लौटोगे।"
श्लोक 44 (3.37.44)
गुणांस्ते वासवस्तात खाण्डवं दहति त्वयि । शृण्वतां सर्वभूतानां पुनः पुनरभाषत ॥
guṇāṃste vāsavastāta khāṇḍavaṃ dahati tvayi | śṛṇvatāṃ sarvabhūtānāṃ punaḥ punarabhāṣata
तात, जब तुम खाण्डव वन जला रहे थे, तब वासव ने सब प्राणियों के सुनते हुए बार-बार तुम्हारे गुणों का बखान किया था।
श्लोक 45 (3.37.45)
तां प्रतिज्ञां नरश्रेष्ठ कर्तुमर्हसि वासवीम् । कंचिद्देशमितः प्राप्य तपोयोगमना भव ॥
tāṃ pratijñāṃ naraśreṣṭha kartumarhasi vāsavīm | kaṃciddeśamitaḥ prāpya tapoyogamanā bhava
हे नरश्रेष्ठ, तुम्हें इन्द्र की वह प्रतिज्ञा सत्य करनी चाहिए। यहाँ से किसी स्थान पर जाकर तप और योग में मन लगाओ।
श्लोक 46 (3.37.46)
कर्तुमर्हसि कौरव्य मघवद्वचनं हितम् । दीक्षित्वाऽद्यैव गच्छ त्वं द्रष्टाऽसि त्वं पुरन्दरम् ॥
kartumarhasi kauravya maghavadvacanaṃ hitam | dīkṣitvā'dyaiva gaccha tvaṃ draṣṭā'si tvaṃ purandaram
हे कुरुनन्दन, तुम्हें मघवा का हितकारी वचन पूरा करना चाहिए। दीक्षा लेकर आज ही जाओ; तुम पुरन्दर के दर्शन करोगे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 47 (3.37.47)
तौ परिष्वज्य बीभत्सुः कृष्णामामन्त्र्य चाप्युभौ । मनांस्यादाय सर्वेषां प्रयातः पुरुषर्षभः ॥
tau pariṣvajya bībhatsuḥ kṛṣṇāmāmantrya cāpyubhau | manāṃsyādāya sarveṣāṃ prayātaḥ puruṣarṣabhaḥ
बीभत्सु (अर्जुन) ने उन दोनों को गले लगाया और कृष्णा (द्रौपदी) से भी विदा ली; फिर सबका मन अपने साथ लिए वह पुरुषश्रेष्ठ चल पड़े।
श्लोक 48 (3.37.48)
तं तथा प्रस्थितं वीरं सिंहस्कन्धोरसं तदा । प्राञ्जलिः पाण्डवं कृष्णा देवानां कुर्वती नमः । वाग्भिः परमशुद्धाभिर्मङ्गलाभिरभाषत ॥
taṃ tathā prasthitaṃ vīraṃ siṃhaskandhorasaṃ tadā | prāñjaliḥ pāṇḍavaṃ kṛṣṇā devānāṃ kurvatī namaḥ | vāgbhiḥ paramaśuddhābhirmaṅgalābhirabhāṣata
सिंह जैसे कंधों और वक्ष वाले उस वीर को इस प्रकार प्रस्थान करते देख कृष्णा (द्रौपदी) ने हाथ जोड़कर, देवताओं को नमस्कार करते हुए, अत्यन्त पवित्र और मंगलमय वचनों में पाण्डव से कहा —
द्रौपद्युवाच
श्लोक 49 (3.37.49)
नमो धात्रे विधात्रे च स्वस्ति गच्छ वनाद्वनम् । धर्मस्त्वां जुषतां पार्थ भास्करश्च विभावसुः । ब्रह्मा त्वां ब्राह्मणाश्चैव पालयन्तु धनञ्जय ॥
namo dhātre vidhātre ca svasti gaccha vanādvanam | dharmastvāṃ juṣatāṃ pārtha bhāskaraśca vibhāvasuḥ | brahmā tvāṃ brāhmaṇāścaiva pālayantu dhanañjaya
"धाता और विधाता को नमस्कार! तुम सकुशल एक वन से दूसरे वन जाओ। हे पार्थ, धर्म, सूर्य और अग्नि तुम्हारा साथ दें; हे धनंजय, ब्रह्मा और ब्राह्मण तुम्हारी रक्षा करें।
श्लोक 50 (3.37.50)
ज्येष्ठापचायी ज्येष्ठस्य भ्रातुर्वचनमास्थितः । प्रपद्येथा वसून्रुद्रानादित्यान्समरुद्गणान् । विश्वेदेवांस्तथा साध्याञ्शान्त्यर्थं भरतर्षभ ॥
jyeṣṭhāpacāyī jyeṣṭhasya bhrāturvacanamāsthitaḥ | prapadyethā vasūnrudrānādityānsamarudgaṇān | viśvedevāṃstathā sādhyāñśāntyarthaṃ bharatarṣabha
तुम बड़ों का आदर करने वाले हो और बड़े भाई की आज्ञा पर चल रहे हो; हे भरतश्रेष्ठ, शान्ति के लिए वसुओं, रुद्रों, मरुद्गणों सहित आदित्यों, विश्वेदेवों और साध्यों की शरण लो।
श्लोक 51 (3.37.51)
स्वस्ति तेऽस्त्वान्तरिक्षेभ्यो दिव्येभ्यो भरतर्षभ । पार्थिवेभ्यश्च सर्वेभ्यो ये केचित्परिपन्थिनः ॥
svasti te'stvāntarikṣebhyo divyebhyo bharatarṣabha | pārthivebhyaśca sarvebhyo ye kecitparipanthinaḥ
हे भरतश्रेष्ठ, अन्तरिक्ष के, स्वर्ग के और पृथ्वी के — जो कोई भी तुम्हारे मार्ग में बाधक हों — उन सबसे तुम्हारा कल्याण हो।
श्लोक 52 (3.37.52)
अवरोधाद्वने वासात्सर्वस्वहरणादपि । इदं दुःखतरं मन्ये पुत्रेभ्यश्च विवासनात् ॥
avarodhādvane vāsātsarvasvaharaṇādapi | idaṃ duḥkhataraṃ manye putrebhyaśca vivāsanāt
बन्दी बनाए जाने, वन में रहने, सर्वस्व छिन जाने और पुत्रों से बिछुड़ने से भी बढ़कर मैं इस दुःख को मानती हूँ।
श्लोक 53 (3.37.53)
मास्माकं क्षत्रियकुले जातुचित्पुनरुद्भवः । ब्राह्मणेभ्यो नमस्यामि येषां नायुधजीविका ॥
māsmākaṃ kṣatriyakule jātucitpunarudbhavaḥ | brāhmaṇebhyo namasyāmi yeṣāṃ nāyudhajīvikā
हममें से किसी का फिर कभी क्षत्रिय कुल में जन्म न हो! मैं ब्राह्मणों को नमस्कार करती हूँ, जिनकी जीविका शस्त्रों पर नहीं चलती।
श्लोक 54 (3.37.54)
इदं मे परमं दुःखं यः स पापः सुयोधनः । दृष्ट्वा मां गौरिति प्राह प्रहसन्राजसंसदि ॥
idaṃ me paramaṃ duḥkhaṃ yaḥ sa pāpaḥ suyodhanaḥ | dṛṣṭvā māṃ gauriti prāha prahasanrājasaṃsadi
यही मेरा सबसे बड़ा दुःख है कि उस पापी सुयोधन ने राजसभा में मुझे देखकर हँसते हुए "गाय" कहा।
श्लोक 55 (3.37.55)
तस्माद्दुःखादिदं दुःखं गरीय इति मे मतिः । यत्तत्परिषदो मध्ये बह्वयुक्तमभाषत ॥
tasmādduḥkhādidaṃ duḥkhaṃ garīya iti me matiḥ | yattatpariṣado madhye bahvayuktamabhāṣata
पर मेरे विचार में उस दुःख से भी भारी यह दुःख है — उन सब अनुचित बातों से भी भारी, जो उसने भरी सभा में कहीं।
श्लोक 56 (3.37.56)
ध्वंसितः स्वगृहेभ्यश्च राष्ट्राच्च भरतर्षभ । वने प्रतिष्ठितो भूत्वा सौहार्दादवतिष्ठसे ॥
dhvaṃsitaḥ svagṛhebhyaśca rāṣṭrācca bharatarṣabha | vane pratiṣṭhito bhūtvā sauhārdādavatiṣṭhase
हे भरतश्रेष्ठ, अपने घर और राज्य से निकाले जाकर तुमने वन में डेरा डाला है और प्रेमवश यहाँ टिके हुए हो।
श्लोक 57 (3.37.57)
जेता यः सर्वशत्रूणां यः पावकमतर्पयः । जनस्त्वां पश्यतीदानीं गच्छन्तं भरतर्षभ ॥
jetā yaḥ sarvaśatrūṇāṃ yaḥ pāvakamatarpayaḥ | janastvāṃ paśyatīdānīṃ gacchantaṃ bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, तुम जो सब शत्रुओं को जीतने वाले हो, जिसने अग्निदेव को तृप्त किया था — आज लोग तुम्हें जाते हुए देख रहे हैं।
श्लोक 58 (3.37.58)
अस्मिन्नूनं महारण्ये भ्रातरः सुहृदश्च ते । त्वत्कथाः कथयिष्यन्ति चारणा ऋषयस्तथा ॥
asminnūnaṃ mahāraṇye bhrātaraḥ suhṛdaśca te | tvatkathāḥ kathayiṣyanti cāraṇā ṛṣayastathā
निश्चय ही इस महावन में तुम्हारे भाई, सुहृद, चारण और ऋषि तुम्हारी ही कथाएँ कहेंगे।
श्लोक 59 (3.37.59)
यत्ते कुन्ती महाबाहो जातस्यैच्छद्धनञ्जय । तत्तेऽस्तु सर्वं कौन्तेय यथा च स्वयमिच्छसि ॥
yatte kuntī mahābāho jātasyaicchaddhanañjaya | tatte'stu sarvaṃ kaunteya yathā ca svayamicchasi
हे महाबाहु धनंजय, तुम्हारे जन्म के समय कुन्ती ने तुम्हारे लिए जो कुछ चाहा था, हे कौन्तेय, वह सब तुम्हें वैसा ही प्राप्त हो जैसा तुम स्वयं चाहते हो।
श्लोक 60 (3.37.60)
वसुदेवस्वसा देवी त्वामार्या पुनरागतम् । पश्यतु त्वां पृथा पार्थ सहस्राक्षमिवादितिः ॥
vasudevasvasā devī tvāmāryā punarāgatam | paśyatu tvāṃ pṛthā pārtha sahasrākṣamivāditiḥ
हे पार्थ, वसुदेव की बहन, आर्या देवी पृथा तुम्हें लौटकर आया हुआ वैसे ही देखें, जैसे अदिति ने सहस्राक्ष (इन्द्र) को देखा था।
श्लोक 61 (3.37.61)
नूनं ते भ्रातरः सर्वे त्वत्कथाभिः प्रजागरे । रंस्यन्ते तव कर्माणि कीर्तयन्तः पुनः पुनः ॥
nūnaṃ te bhrātaraḥ sarve tvatkathābhiḥ prajāgare | raṃsyante tava karmāṇi kīrtayantaḥ punaḥ punaḥ
निश्चय ही तुम्हारे सब भाई तुम्हारी कथाओं में रात जागते हुए बार-बार तुम्हारे कर्मों का बखान करके आनन्द पाएँगे।
श्लोक 62 (3.37.62)
न च नः पार्थ भोगेषु न धने नोत जीविते । तुष्टिर्बुद्धिर्भवित्री वा त्वयि दीर्घप्रवासिनि ॥
na ca naḥ pārtha bhogeṣu na dhane nota jīvite | tuṣṭirbuddhirbhavitrī vā tvayi dīrghapravāsini
हे पार्थ, तुम्हारे लंबे प्रवास में रहते हमें न भोगों में, न धन में और न जीवन में ही संतोष या मन की शान्ति मिलेगी।
श्लोक 63 (3.37.63)
त्वयि नः पार्थ सर्वेषां सुखदुःखे प्रतिष्ठिते । जीवितं मरणं चैव राज्यमैश्वर्यमेव च ॥
tvayi naḥ pārtha sarveṣāṃ sukhaduḥkhe pratiṣṭhite | jīvitaṃ maraṇaṃ caiva rājyamaiśvaryameva ca
हे पार्थ, हम सबके सुख-दुःख तुम पर ही टिके हैं — जीवन और मृत्यु, राज्य और ऐश्वर्य भी।
श्लोक 64 (3.37.64)
आपृष्टो नोऽसि कौन्तेय स्वस्ति प्राप्नुहि पाण्डव । कृतास्त्रं स्वस्तिमन्तं त्वां द्रक्ष्यामि पुनरागतम् ॥
āpṛṣṭo no'si kaunteya svasti prāpnuhi pāṇḍava | kṛtāstraṃ svastimantaṃ tvāṃ drakṣyāmi punarāgatam
हे कौन्तेय, हमने तुमसे विदा ले ली है; हे पाण्डव, तुम्हारा कल्याण हो। मैं तुम्हें अस्त्रों में निपुण और सकुशल लौटा हुआ देखूँ।
श्लोक 65 (3.37.65)
बलवद्भिर्विरुद्धं न कार्यमेतत्त्वयाऽनघ । प्रयाह्यविघ्नेनैवाशु विजयाय महाबल ॥
balavadbhirviruddhaṃ na kāryametattvayā'nagha | prayāhyavighnenaivāśu vijayāya mahābala
हे निष्पाप, तुम्हारा यह कार्य बलवानों द्वारा बाधित न हो; हे महाबली, बिना किसी विघ्न के शीघ्र विजय के लिए प्रस्थान करो।
श्लोक 66 (3.37.66)
ह्रीः श्रीः कीर्तिर्धृतिः पुष्टिरुमा लक्ष्मीः सरस्वती । इमा वै तव पान्थस्य पालयन्तु धनञ्जय ॥
hrīḥ śrīḥ kīrtirdhṛtiḥ puṣṭirumā lakṣmīḥ sarasvatī | imā vai tava pānthasya pālayantu dhanañjaya
ह्री (लज्जा), श्री, कीर्ति, धृति, पुष्टि, उमा, लक्ष्मी और सरस्वती — हे धनंजय, ये देवियाँ मार्ग में तुम्हारी रक्षा करें।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 67 (3.37.67)
एवमुक्त्वाऽऽशिषः कृष्णा विरराम यशस्विनी ॥
evamuktvā''śiṣaḥ kṛṣṇā virarāma yaśasvinī
ये आशीर्वचन कहकर यशस्विनी कृष्णा मौन हो गई।
श्लोक 68 (3.37.68)
ततः प्रदक्षिणं कृत्वा भ्रातॄन्धौम्यं च पाण्डवः । प्रातिष्ठत महाबाहुः प्रगृह्य रुचिरं धनुः ॥
tataḥ pradakṣiṇaṃ kṛtvā bhrātṝndhaumyaṃ ca pāṇḍavaḥ | prātiṣṭhata mahābāhuḥ pragṛhya ruciraṃ dhanuḥ
फिर महाबाहु पाण्डव ने अपने भाइयों और धौम्य की प्रदक्षिणा की और अपना सुन्दर धनुष लेकर चल पड़े।
श्लोक 69 (3.37.69)
शनैरिव दिशं वीर उदीचीं भरतर्षभ । संहरंस्तरसा वृक्षाँल्लता वल्लीश्च भारत । असज्जमानो वृक्षेषु जगाम सुमहाबलः ॥
śanairiva diśaṃ vīra udīcīṃ bharatarṣabha | saṃharaṃstarasā vṛkṣām̐llatā vallīśca bhārata | asajjamāno vṛkṣeṣu jagāma sumahābalaḥ
हे भरतश्रेष्ठ, वह वीर मानो धीरे-धीरे उत्तर दिशा की ओर चले; हे भारत, अपने वेग से वृक्षों, लताओं और बेलों को हटाते हुए, वृक्षों में कहीं अटके बिना वह महाबली आगे बढ़ते गए।
श्लोक 70 (3.37.70)
तस्य मार्गादपाक्रामन्सर्वभूतानि गच्छतः । युक्तस्यैन्द्रेण योगेन पराक्रान्तस्य शुष्मिणः ॥
tasya mārgādapākrāmansarvabhūtāni gacchataḥ | yuktasyaindreṇa yogena parākrāntasya śuṣmiṇaḥ
इन्द्र के योग से युक्त, पराक्रमी और बलशाली अर्जुन जब चले, तो सब प्राणी उनके मार्ग से हट गए।
श्लोक 71 (3.37.71)
सोऽगच्छत्पर्वतांस्तात तपोधननिषेवितान् । दिव्यं हैमवतं पुण्यं देवजुष्टं परंतपः ॥
so'gacchatparvatāṃstāta tapodhananiṣevitān | divyaṃ haimavataṃ puṇyaṃ devajuṣṭaṃ paraṃtapaḥ
तात, वह शत्रुतापन तपस्वियों से सेवित पर्वतों की ओर — देवताओं के प्रिय, दिव्य और पवित्र हिमालय की ओर — गए।
श्लोक 72 (3.37.72)
अगच्छत्पर्वतं पुण्यमेकाह्नैव महामनाः । मनोजवगतिर्भूत्वा योगयुक्तो यथाऽनिलः ॥
agacchatparvataṃ puṇyamekāhnaiva mahāmanāḥ | manojavagatirbhūtvā yogayukto yathā'nilaḥ
मन के वेग से चलते हुए, योग से युक्त, वायु के समान वह महामना एक ही दिन में उस पवित्र पर्वत पर पहुँच गए।
श्लोक 73 (3.37.73)
हिमवन्तमतिक्रम्य गन्धमादनमेव च । अत्यक्रामत्स दुर्गाणि दिवारात्रमतन्द्रितः ॥
himavantamatikramya gandhamādanameva ca | atyakrāmatsa durgāṇi divārātramatandritaḥ
हिमालय और गन्धमादन को भी लाँघकर, दिन-रात बिना थके, वह दुर्गम स्थानों को पार करते गए।
श्लोक 74 (3.37.74)
इन्द्रकीलं समासाद्य ततोऽतिष्ठद्धनंजयः । गत्वा स षडहोरात्रान्सप्तमेऽहनि पाण्डवः ॥
indrakīlaṃ samāsādya tato'tiṣṭhaddhanaṃjayaḥ | gatvā sa ṣaḍahorātrānsaptame'hani pāṇḍavaḥ
इन्द्रकील पर पहुँचकर धनंजय वहाँ ठहर गए। छह दिन और रात चलकर सातवें दिन पाण्डव
श्लोक 75 (3.37.75)
प्रस्थेन्द्रकीलस्य शुभे तपोयोगपरोऽभवत् । ऊर्ध्वबाहुर्न चाङ्गानि प्रास्पन्दयत किंचन ॥
prasthendrakīlasya śubhe tapoyogaparo'bhavat | ūrdhvabāhurna cāṅgāni prāspandayata kiṃcana
इन्द्रकील के सुन्दर पठार पर तप और योग में लीन हो गए। भुजाएँ ऊपर उठाए हुए उन्होंने अपना कोई अंग तनिक भी नहीं हिलाया —
श्लोक 76 (3.37.76)
समाहितात्मा नियतः सहस्राक्षसुतोऽच्युतः । अन्तरिक्षे स शुश्राव तिष्ठेति स वचस्तदा ॥
samāhitātmā niyataḥ sahasrākṣasuto'cyutaḥ | antarikṣe sa śuśrāva tiṣṭheti sa vacastadā
सहस्राक्ष के वे पुत्र एकाग्रचित्त, संयमी और अडिग रहे। तब उन्होंने आकाश में "ठहरो!" यह वाणी सुनी।
श्लोक 77 (3.37.77)
तच्छ्रुत्वा सर्वतो दृष्टिं चारयामास पाण्डवः । अथापश्यत्सव्यसाची वृक्षमूले तपस्विनम् ॥
tacchrutvā sarvato dṛṣṭiṃ cārayāmāsa pāṇḍavaḥ | athāpaśyatsavyasācī vṛkṣamūle tapasvinam
यह सुनकर पाण्डव ने चारों ओर दृष्टि घुमाई, और सव्यसाची ने एक वृक्ष के नीचे एक तपस्वी को देखा,
श्लोक 78 (3.37.78)
ब्राह्म्या श्रिया दीप्यमानं पिङ्गलं जटिलं कृशम् । सोऽब्रवीदर्जुनं तत्रस्थितं दृष्ट्वा महातपाः ॥
brāhmyā śriyā dīpyamānaṃ piṅgalaṃ jaṭilaṃ kṛśam | so'bravīdarjunaṃ tatrasthitaṃ dṛṣṭvā mahātapāḥ
जो ब्राह्मतेज से दीप्त, पिंगल वर्ण, जटाधारी और दुबले थे। अर्जुन को वहाँ खड़ा देखकर उन महातपस्वी ने कहा —
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 79 (3.37.79)
कस्त्वं तातेह संप्राप्तो धनुष्मान्कवची शरी । निबद्धाऽसितलत्राणः क्षत्रधर्ममनुव्रतः ॥
kastvaṃ tāteha saṃprāpto dhanuṣmānkavacī śarī | nibaddhā'sitalatrāṇaḥ kṣatradharmamanuvrataḥ
"तात, तुम कौन हो जो धनुष, कवच और बाण लिए, तलवार और हस्तत्राण बाँधे, क्षात्रधर्म का पालन करते हुए यहाँ आए हो?
श्लोक 80 (3.37.80)
नेह शस्त्रेण कर्तव्यं शान्तानामेष आलयः । विनीतक्रोधहर्षाणां ब्राह्मणानां तपस्विनाम् ॥
neha śastreṇa kartavyaṃ śāntānāmeṣa ālayaḥ | vinītakrodhaharṣāṇāṃ brāhmaṇānāṃ tapasvinām
यहाँ शस्त्र का कोई काम नहीं। यह क्रोध और हर्ष को जीत चुके शान्त ब्राह्मण तपस्वियों का निवास है।
श्लोक 81 (3.37.81)
नेहास्ति धनुषा कार्यं न संग्रामोऽत्र कर्हिचित् । निक्षिपैतद्धनुस्तात प्राप्तोऽसि परमां गतिम् ॥
nehāsti dhanuṣā kāryaṃ na saṃgrāmo'tra karhicit | nikṣipaitaddhanustāta prāpto'si paramāṃ gatim
यहाँ धनुष का कोई प्रयोजन नहीं, और यहाँ कभी युद्ध नहीं होता। तात, यह धनुष रख दो; तुम परम गति को प्राप्त हो चुके हो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 82 (3.37.82)
इत्यनन्तौजसं वीरं यथा चान्यं पृथग्जनम् । तथा हसन्निवाभीक्ष्णं ब्राह्मणोऽर्जुनमब्रवीत् । न चैनं चालयामास धैर्यात्सुधृतनिश्चयम् ॥
ityanantaujasaṃ vīraṃ yathā cānyaṃ pṛthagjanam | tathā hasannivābhīkṣṇaṃ brāhmaṇo'rjunamabravīt | na cainaṃ cālayāmāsa dhairyātsudhṛtaniścayam
इस प्रकार वह ब्राह्मण मानो हँसते हुए, किसी साधारण मनुष्य की भाँति, अपार तेजस्वी वीर अर्जुन से बार-बार कहते रहे; पर दृढ़ निश्चय वाले अर्जुन को वे उनके धैर्य से डिगा न सके।
श्लोक 83 (3.37.83)
तमुवाच ततः प्रीतः स द्विजः प्रहसन्निव । वरं वृणीष्व भद्रं ते शक्रोऽहमरिसूदन ॥
tamuvāca tataḥ prītaḥ sa dvijaḥ prahasanniva | varaṃ vṛṇīṣva bhadraṃ te śakro'hamarisūdana
तब प्रसन्न होकर उस द्विज ने मुस्कराते हुए उनसे कहा — "तुम्हारा कल्याण हो, वर माँगो; हे शत्रुसूदन, मैं शक्र हूँ।"
श्लोक 84 (3.37.84)
एवमुक्तः सहस्राक्षं प्रत्युवाच धनंजयः । प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा शूरः कुरुकुलोद्वहः ॥
evamuktaḥ sahasrākṣaṃ pratyuvāca dhanaṃjayaḥ | prāñjaliḥ praṇato bhūtvā śūraḥ kurukulodvahaḥ
ऐसा कहे जाने पर कुरुकुल के धुरन्धर वीर धनंजय ने हाथ जोड़कर, झुककर सहस्राक्ष को उत्तर दिया —
अर्जुन उवाच
श्लोक 85 (3.37.85)
ईप्सितो ह्येष वै कामो वरं चैनं प्रयच्छ मे । त्वत्तोऽद्य भगवन्नस्त्रं कृत्स्नमिच्छामि वेदितुम् ॥
īpsito hyeṣa vai kāmo varaṃ cainaṃ prayaccha me | tvatto'dya bhagavannastraṃ kṛtsnamicchāmi veditum
"यही मेरी अभीष्ट कामना है; मुझे यही वर दीजिए। भगवन्, मैं आज आपसे सम्पूर्ण अस्त्र-विद्या जानना चाहता हूँ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 86 (3.37.86)
प्रत्युवाच महेन्द्रस्तं प्रीतात्मा प्रहसन्निव । इह प्राप्तस्य किं कार्यमस्त्रैस्तव धनंजय ॥
pratyuvāca mahendrastaṃ prītātmā prahasanniva | iha prāptasya kiṃ kāryamastraistava dhanaṃjaya
महेन्द्र ने प्रसन्नचित्त होकर मुस्कराते हुए उन्हें उत्तर दिया — "हे धनंजय, यहाँ आ पहुँचने पर तुम्हें अस्त्रों से क्या काम?
श्लोक 87 (3.37.87)
कामान्वृणीष्व लोकांस्त्वं प्राप्तोऽसि परमां गतिम् । एवमुक्तः प्रत्युवाच सहस्राक्षं धनंजयः ॥
kāmānvṛṇīṣva lokāṃstvaṃ prāpto'si paramāṃ gatim | evamuktaḥ pratyuvāca sahasrākṣaṃ dhanaṃjayaḥ
इच्छित भोग और लोक माँग लो; तुम परम गति को पा चुके हो।" ऐसा कहे जाने पर धनंजय ने सहस्राक्ष को उत्तर दिया —
अर्जुन उवाच
श्लोक 88 (3.37.88)
न लोभान्न पुनः कामान्न देवत्वं पुनः सुखम् । न च सर्वामरैश्वर्यं कामये त्रिदशाधिप ॥
na lobhānna punaḥ kāmānna devatvaṃ punaḥ sukham | na ca sarvāmaraiśvaryaṃ kāmaye tridaśādhipa
"हे देवराज, मैं लोभवश न भोगों की कामना करता हूँ, न देवत्व की, न सुख की — और न ही समस्त देवताओं के ऐश्वर्य की।
श्लोक 89 (3.37.89)
भ्रातॄंस्तान्विपिने त्यक्त्वा वैरमप्रतियात्य च । अकीर्तिं सर्वलोकेषु गच्छेयं शाश्वतीः समाः ॥
bhrātṝṃstānvipine tyaktvā vairamapratiyātya ca | akīrtiṃ sarvalokeṣu gaccheyaṃ śāśvatīḥ samāḥ
यदि मैं अपने भाइयों को वन में छोड़कर और वैर का बदला लिए बिना (चला जाऊँ), तो अनन्त वर्षों तक सब लोकों में मेरी अपकीर्ति होगी।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 90 (3.37.90)
एवमुक्तः प्रत्युवाच वृत्रहा पाण्डुनन्दनम् । सान्त्वयञ्श्लक्ष्णया वाचा सर्वलोकनमस्कृतः ॥
evamuktaḥ pratyuvāca vṛtrahā pāṇḍunandanam | sāntvayañślakṣṇayā vācā sarvalokanamaskṛtaḥ
ऐसा कहे जाने पर सब लोकों द्वारा वन्दित वृत्रहन्ता ने मधुर वाणी से सान्त्वना देते हुए पाण्डुनन्दन को उत्तर दिया —
शक्र उवाच
श्लोक 91 (3.37.91)
यदा द्रक्ष्यसि भूतेशं त्र्यक्षं शूलधरं शिवम् । तदा दाताऽस्मि ते तात दिव्यान्यस्त्राणि सर्वशः ॥
yadā drakṣyasi bhūteśaṃ tryakṣaṃ śūladharaṃ śivam | tadā dātā'smi te tāta divyānyastrāṇi sarvaśaḥ
"तात, जब तुम भूतों के स्वामी, त्रिनेत्र, त्रिशूलधारी शिव के दर्शन कर लोगे, तब मैं तुम्हें सभी दिव्य अस्त्र दूँगा।
श्लोक 92 (3.37.92)
क्रियतां दर्शने यत्नो देवस्य परमेष्ठिनः । दर्शनात्तस्य कौन्तेय संसिद्धः स्वर्गमेष्यसि ॥
kriyatāṃ darśane yatno devasya parameṣṭhinaḥ | darśanāttasya kaunteya saṃsiddhaḥ svargameṣyasi
परमेष्ठी देव के दर्शन का यत्न करो; हे कौन्तेय, उनके दर्शन से सिद्ध होकर तुम स्वर्ग पहुँचोगे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 93 (3.37.93)
इत्युक्त्वा फल्गुनं शक्रो जगामादर्शनं पुनः । अर्जुनोऽप्यथ तत्रैव तस्थौ योगसमन्वितः ॥
ityuktvā phalgunaṃ śakro jagāmādarśanaṃ punaḥ | arjuno'pyatha tatraiva tasthau yogasamanvitaḥ
फाल्गुन से ऐसा कहकर शक्र फिर अदृश्य हो गए, और अर्जुन भी वहीं योग में स्थित होकर रहने लगे।