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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 38

हिमालय पर अर्जुन की तपस्या

जनमेजय विस्तार से सुनना चाहते हैं कि अर्जुन ने दिव्यास्त्र कैसे पाए और शिव से युद्ध कैसे किया। वैशम्पायन बताते हैं कि दिव्य शुभ लक्षणों के बीच अर्जुन अकेले हिमालय के निर्जन वनों में गए और क्रमशः कठोरतर तप करते हुए अंत में पैरों के अँगूठों के बल खड़े होकर केवल वायु पर रहने लगे। उनके तप के ताप से व्याकुल महर्षि शिव के पास जाते हैं; शिव उन्हें निश्चिन्त होकर लौट जाने को कहते हैं, क्योंकि वे अर्जुन का संकल्प जानते हैं और उसी दिन उसे पूरा करेंगे।

अध्याय 37अध्याय-सूचीअध्याय 39

जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (3.38.1)

भगवञ्श्रोतुमिच्छामि पार्थस्याक्लिष्टकर्मणः । विस्तरेण कथामेतां यथाऽस्त्राण्युपलब्धवान् ॥

bhagavañśrotumicchāmi pārthasyākliṣṭakarmaṇaḥ | vistareṇa kathāmetāṃ yathā'strāṇyupalabdhavān

"भगवन्, मैं अनायास महान् कर्म करने वाले पार्थ की यह कथा विस्तार से सुनना चाहता हूँ — उन्होंने अस्त्र कैसे प्राप्त किए।

श्लोक 2 (3.38.2)

कथं च पुरुषव्याघ्रो दीर्घबाहुर्धनंजयः । वनं प्रविष्टस्तेजस्वी निर्मनुष्यमभीतवत् ॥

kathaṃ ca puruṣavyāghro dīrghabāhurdhanaṃjayaḥ | vanaṃ praviṣṭastejasvī nirmanuṣyamabhītavat

और वह पुरुषसिंह, दीर्घबाहु, तेजस्वी धनंजय उस निर्जन वन में निर्भय होकर कैसे प्रविष्ट हुए?

श्लोक 3 (3.38.3)

किंचानेन कृतं तत्र वसता ब्रह्मवित्तम । कथं च भगवान्स्थाणुर्देवराजश्च तोषितः ॥

kiṃcānena kṛtaṃ tatra vasatā brahmavittama | kathaṃ ca bhagavānsthāṇurdevarājaśca toṣitaḥ

हे ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ, वहाँ रहते हुए उन्होंने क्या किया? और भगवान् स्थाणु (शिव) तथा देवराज (इन्द्र) उनसे कैसे प्रसन्न हुए?

श्लोक 4 (3.38.4)

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं त्वत्प्रसादाद्द्विजोत्तम । त्वं हि सर्वज्ञ दिव्यं च मानुषं चैव वेत्थ ह ॥

etadicchāmyahaṃ śrotuṃ tvatprasādāddvijottama | tvaṃ hi sarvajña divyaṃ ca mānuṣaṃ caiva vettha ha

हे द्विजश्रेष्ठ, आपकी कृपा से मैं यह सुनना चाहता हूँ; क्योंकि आप सर्वज्ञ हैं और दिव्य तथा मानवीय सब कुछ जानते हैं।

श्लोक 5 (3.38.5)

अत्यद्भुतं महाप्राज्ञ रोमहर्षणमर्जुनः । भवेन सह संग्रामं चकाराप्रतिमं किल । पुरा प्रहरतां श्रेष्ठः संग्रामेष्वपराजितः ॥

atyadbhutaṃ mahāprājña romaharṣaṇamarjunaḥ | bhavena saha saṃgrāmaṃ cakārāpratimaṃ kila | purā praharatāṃ śreṣṭhaḥ saṃgrāmeṣvaparājitaḥ

हे महाप्राज्ञ, सुना है कि योद्धाओं में श्रेष्ठ, युद्ध में कभी पराजित न होने वाले अर्जुन ने पहले भव (शिव) के साथ अत्यन्त अद्भुत, रोमांचकारी और अनुपम युद्ध किया था।

श्लोक 6 (3.38.6)

यच्छ्रुत्वा नरसिंहानां दैन्यहर्षातिविस्मयात् । शूराणामपि पार्थानां हृदयानि चकम्पिरे ॥

yacchrutvā narasiṃhānāṃ dainyaharṣātivismayāt | śūrāṇāmapi pārthānāṃ hṛdayāni cakampire

जिसे सुनकर नरसिंह, शूरवीर पार्थों के हृदय भी विषाद, हर्ष और अत्यन्त विस्मय से काँप उठे थे।

श्लोक 7 (3.38.7)

यद्यच्च कृतवानन्यत्पार्थस्तदखिलं वद ॥

yadyacca kṛtavānanyatpārthastadakhilaṃ vada

और पार्थ ने जो कुछ भी अन्य कार्य किए, वे सब कहिए।

श्लोक 8 (3.38.8)

न ह्यस्य निन्दितं जिष्णोः सुसूक्ष्ममपि लक्षये । चरितं यस्य शूरस्य तन्मे सर्वं प्रकीर्तय ॥

na hyasya ninditaṃ jiṣṇoḥ susūkṣmamapi lakṣaye | caritaṃ yasya śūrasya tanme sarvaṃ prakīrtaya

क्योंकि मुझे जिष्णु में तनिक-सी भी निन्दनीय बात नहीं दिखती। उस शूरवीर का सारा चरित मुझे सुनाइए।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 9 (3.38.9)

कथयिष्यामि ते तात कथामेतां महात्मनः । दिव्यां कौरवशार्दूल महतीमद्भुतोपमाम् ॥

kathayiṣyāmi te tāta kathāmetāṃ mahātmanaḥ | divyāṃ kauravaśārdūla mahatīmadbhutopamām

तात, हे कुरुश्रेष्ठ, मैं तुम्हें उस महात्मा की यह दिव्य, महान् और अद्भुत कथा सुनाऊँगा।

श्लोक 10 (3.38.10)

गात्रसंस्पर्शसंबद्धां त्र्यम्बकेण महाहवे । पार्थस्य देवदेवेन शृणु सम्यक्समागमम् ॥

gātrasaṃsparśasaṃbaddhāṃ tryambakeṇa mahāhave | pārthasya devadevena śṛṇu samyaksamāgamam

उस महायुद्ध में, जिसमें शरीर से शरीर का स्पर्श हुआ, त्र्यम्बक देवाधिदेव के साथ पार्थ के समागम का वृत्तान्त भली-भाँति सुनो।

श्लोक 11 (3.38.11)

युधिष्ठिरनियोगात्स जगामामितविक्रमः । शक्रं सुरेश्वरं द्रष्टुं देवदेवं च शंकरम् ॥

yudhiṣṭhiraniyogātsa jagāmāmitavikramaḥ | śakraṃ sureśvaraṃ draṣṭuṃ devadevaṃ ca śaṃkaram

युधिष्ठिर की आज्ञा से वह अपार पराक्रमी देवेश्वर शक्र और देवाधिदेव शंकर के दर्शन के लिए गए।

श्लोक 12 (3.38.12)

दिव्यं तद्धनुरादाय खड्गं च पुरुषर्षभः । महाबलो महाबाहुरर्जुनः कार्यसिद्धये ॥

divyaṃ taddhanurādāya khaḍgaṃ ca puruṣarṣabhaḥ | mahābalo mahābāhurarjunaḥ kāryasiddhaye

वह दिव्य धनुष और खड्ग लेकर, महाबली, महाबाहु पुरुषश्रेष्ठ अर्जुन अपने कार्य की सिद्धि के लिए

श्लोक 13 (3.38.13)

दिशं ह्युदीचीं कौरव्यो हिमवच्छिखरं प्रति । ऐन्द्रिः स्थिरमना राजन्सर्वलोकमहारथः ॥

diśaṃ hyudīcīṃ kauravyo himavacchikharaṃ prati | aindriḥ sthiramanā rājansarvalokamahārathaḥ

उत्तर दिशा में हिमालय के शिखर की ओर चले — हे राजन्, वह कुरुवंशी, स्थिरचित्त इन्द्रपुत्र, जो सारे संसार में महारथी थे।

श्लोक 14 (3.38.14)

त्वरया परया युक्तस्तपसे धृतनिश्चयः । वनं कण्टकितं घोरमेक एवान्वपद्यत ॥

tvarayā parayā yuktastapase dhṛtaniścayaḥ | vanaṃ kaṇṭakitaṃ ghorameka evānvapadyata

अत्यन्त शीघ्रता से, तपस्या का दृढ़ निश्चय करके, वह अकेले ही एक काँटों भरे भयानक वन में प्रविष्ट हुए,

श्लोक 15 (3.38.15)

नानापुष्पफलोपेतं नानापक्षिनिनादितम् । नानामृगगणाकीर्णं सिद्धचारणसेवितम् ॥

nānāpuṣpaphalopetaṃ nānāpakṣinināditam | nānāmṛgagaṇākīrṇaṃ siddhacāraṇasevitam

जो नाना प्रकार के फूलों और फलों से भरा था, अनेक पक्षियों के कलरव से गूँजता था, अनेक मृग-समूहों से भरा था और सिद्धों व चारणों से सेवित था।

श्लोक 16 (3.38.16)

ततः प्रयाते बीभत्सौ वनं मानुषवर्जितम् । शङ्खानां पटहानां च शब्दः समभवद्दिवि ॥

tataḥ prayāte bībhatsau vanaṃ mānuṣavarjitam | śaṅkhānāṃ paṭahānāṃ ca śabdaḥ samabhavaddivi

जब बीभत्सु उस मनुष्यरहित वन में चले गए, तब आकाश में शंखों और नगाड़ों का शब्द होने लगा।

श्लोक 17 (3.38.17)

पुष्पवर्षं च सुमहन्निपपात महीतले । मेघजालं च सततं छादयामास सर्वतः ॥

puṣpavarṣaṃ ca sumahannipapāta mahītale | meghajālaṃ ca satataṃ chādayāmāsa sarvataḥ

पृथ्वी पर फूलों की भारी वर्षा हुई, और मेघों के अविरल समूह ने सब ओर से आकाश को ढक लिया।

श्लोक 18 (3.38.18)

सोऽतीत्य वनदुर्गाणि सन्निकर्षे महागिरेः । शुशुभे हिमवत्पृष्ठे वसमानोऽर्जुनस्तदा ॥

so'tītya vanadurgāṇi sannikarṣe mahāgireḥ | śuśubhe himavatpṛṣṭhe vasamāno'rjunastadā

वन के दुर्गम स्थानों को पार करके महापर्वत के समीप हिमालय के पृष्ठभाग पर रहते हुए अर्जुन तब शोभा पाने लगे।

श्लोक 19 (3.38.19)

तत्र तत्र द्रुमान्फुल्लान्विहगैर्वल्गुनादितान् । नदीश्च विपुलावर्ता वैदूर्यनीलसंनिभाः ॥

tatra tatra drumānphullānvihagairvalgunāditān | nadīśca vipulāvartā vaidūryanīlasaṃnibhāḥ

जहाँ-तहाँ पक्षियों के मधुर स्वर से गूँजते, फूलों से लदे वृक्ष थे, और नीलम-वैदूर्य जैसी आभा वाली, अनेक भँवरों वाली नदियाँ थीं,

श्लोक 20 (3.38.20)

हंसकारण्डवोद्गीताः सारसाभिरुतास्तथा । पुंस्कोकिलरुताश्चैव क्रौञ्चबर्हिणनादिताः ॥

haṃsakāraṇḍavodgītāḥ sārasābhirutāstathā | puṃskokilarutāścaiva krauñcabarhiṇanāditāḥ

जो हंसों और कारण्डवों के गान से, सारसों की बोली से, नर कोयलों की कूक से और क्रौंचों व मोरों के स्वर से गूँज रही थीं।

श्लोक 21 (3.38.21)

मनोहरवनोपेतास्तस्मिन्नतिरथोऽर्जुनः । पुण्यशीतामलजलाः पश्यन्प्रीतमनाऽभवत् ॥

manoharavanopetāstasminnatiratho'rjunaḥ | puṇyaśītāmalajalāḥ paśyanprītamanā'bhavat

मनोहर वनों से घिरी, पवित्र, शीतल और निर्मल जल वाली उन नदियों को देखकर अतिरथी अर्जुन का मन प्रसन्न हो गया।

श्लोक 22 (3.38.22)

रमणीये वनोद्देशे रममाणोऽर्जुनस्तदा । तपस्युग्रे वर्तमान उग्रतेजा महामनाः ॥

ramaṇīye vanoddeśe ramamāṇo'rjunastadā | tapasyugre vartamāna ugratejā mahāmanāḥ

उस रमणीय वन-प्रदेश में रमते हुए उग्र तेज वाले महामना अर्जुन तब उग्र तपस्या में लग गए।

श्लोक 23 (3.38.23)

दर्भचीरं निवस्याथ दण्डाजिनविभूषितः । शीर्णं च पतितं भूमौ पर्णं समुपभुक्तवान् ॥

darbhacīraṃ nivasyātha daṇḍājinavibhūṣitaḥ | śīrṇaṃ ca patitaṃ bhūmau parṇaṃ samupabhuktavān

दर्भ (कुश) का वस्त्र पहनकर, दण्ड और मृगचर्म से सुशोभित होकर, वह भूमि पर गिरे सूखे पत्ते खाकर रहने लगे।

श्लोक 24 (3.38.24)

पूर्णे पूर्णे त्रिरात्रे तु मासमेकं फलाशनः । द्विगुणेनैव कालेन द्वितीयं मासमत्ययात् ॥

pūrṇe pūrṇe trirātre tu māsamekaṃ phalāśanaḥ | dviguṇenaiva kālena dvitīyaṃ māsamatyayāt

पहले महीने वह हर तीसरी रात पूरी होने पर फल खाते रहे; दूसरा महीना उन्होंने उससे दुगुने अन्तर पर आहार लेकर बिताया।

श्लोक 25 (3.38.25)

तृतीयमपि मासं स क्रमेणाहारमाचरन् । चतुर्थे त्वथ संप्राप्ते मासे भरतसत्तमः ॥

tṛtīyamapi māsaṃ sa krameṇāhāramācaran | caturthe tvatha saṃprāpte māse bharatasattamaḥ

तीसरा महीना भी उन्होंने क्रमशः और लंबे अन्तर पर आहार लेकर बिताया; और जब चौथा महीना आया, तब वह भरतश्रेष्ठ

श्लोक 26 (3.38.26)

वायुभक्षो महाबाहुरभवत्पाण्डुनन्दनः । ऊर्ध्वबाहुर्निरालम्बः पादाङ्गुष्ठाग्रविष्ठितः ॥

vāyubhakṣo mahābāhurabhavatpāṇḍunandanaḥ | ūrdhvabāhurnirālambaḥ pādāṅguṣṭhāgraviṣṭhitaḥ

महाबाहु पाण्डुनन्दन भुजाएँ ऊपर उठाए, बिना किसी सहारे के, पैरों के अँगूठों के अग्रभाग पर खड़े होकर केवल वायु पीकर रहने लगे।

श्लोक 27 (3.38.27)

सदोपस्पर्शनाच्चास्य बभूवुरमितौजसः । विद्युदम्भोरुहनिभा जटास्तस्य महात्मनः ॥

sadopasparśanāccāsya babhūvuramitaujasaḥ | vidyudambhoruhanibhā jaṭāstasya mahātmanaḥ

निरन्तर स्नान करते रहने से उस अपार तेजस्वी महात्मा की जटाएँ बिजली और कमल जैसी आभा वाली हो गईं।

श्लोक 28 (3.38.28)

ततो महर्षयः सर्वे जग्मुर्देवं पिनाकिनम् । निवेदयिषवः पार्थं तपस्युग्रे समास्थितम् ॥

tato maharṣayaḥ sarve jagmurdevaṃ pinākinam | nivedayiṣavaḥ pārthaṃ tapasyugre samāsthitam

तब सभी महर्षि पिनाकधारी महादेव के पास गए, ताकि उग्र तपस्या में लगे पार्थ के विषय में उन्हें बता सकें।

श्लोक 29 (3.38.29)

नीलकण्ठं महादेवमभिवाद्य प्रणम्य च । सर्वे निवेदयामासुः कर्म तत्फल्गुनस्य ह ॥

nīlakaṇṭhaṃ mahādevamabhivādya praṇamya ca | sarve nivedayāmāsuḥ karma tatphalgunasya ha

नीलकण्ठ महादेव को अभिवादन और प्रणाम करके उन सबने उन्हें फाल्गुन के उस कर्म के विषय में बताया।

ऋषय ऊचुः

श्लोक 30 (3.38.30)

एकः पार्थो महातेजा हिमवत्पृष्ठमाश्रितः । उग्रे तपसि दुष्पारे स्थितो धूमापयन्दिशः ॥

ekaḥ pārtho mahātejā himavatpṛṣṭhamāśritaḥ | ugre tapasi duṣpāre sthito dhūmāpayandiśaḥ

"महातेजस्वी पार्थ अकेले हिमालय के पृष्ठभाग पर, असह्य उग्र तपस्या में स्थित होकर दिशाओं को धुएँ से भर रहे हैं।

श्लोक 31 (3.38.31)

तस्य देवेश न वयं विद्मः सर्वे चिकीर्षितम् । संतापयति नः सर्वानसौ साधु निवार्यताम् ॥

tasya deveśa na vayaṃ vidmaḥ sarve cikīrṣitam | saṃtāpayati naḥ sarvānasau sādhu nivāryatām

हे देवेश, हममें से कोई नहीं जानता कि वह क्या करना चाहते हैं। वह हम सबको संतप्त कर रहे हैं; उन्हें भली-भाँति रोका जाए।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 32 (3.38.32)

तेषां तद्वचनं श्रुत्वा मुनीनां भावितात्मनाम् । उमापतिर्भूतपतिर्वाक्यमेतदुवाच ह ॥

teṣāṃ tadvacanaṃ śrutvā munīnāṃ bhāvitātmanām | umāpatirbhūtapatirvākyametaduvāca ha

शुद्ध अन्तःकरण वाले उन मुनियों की वह बात सुनकर उमापति भूतनाथ ने यह वचन कहा —

महेश्वर उवाच

श्लोक 33 (3.38.33)

न वो विषादः कर्तव्यः फल्गुनं प्रति सर्वशः । शीघ्रं गच्छत संहृष्टा यथागतमतन्द्रिताः ॥

na vo viṣādaḥ kartavyaḥ phalgunaṃ prati sarvaśaḥ | śīghraṃ gacchata saṃhṛṣṭā yathāgatamatandritāḥ

"फाल्गुन के विषय में तुम्हें किसी प्रकार का विषाद नहीं करना चाहिए। प्रसन्न और निश्चिन्त होकर जैसे आए थे वैसे ही शीघ्र लौट जाओ।

श्लोक 34 (3.38.34)

अहमस्य विजानामि संकल्पं मनसि स्थितम् । नास्य स्वर्गस्पृहा काचिन्नैश्वर्यस्य न चायुषः । यत्तस्य काङ्क्षितं प्राप्तुं तत्करिष्येऽहमद्य वै ॥

ahamasya vijānāmi saṃkalpaṃ manasi sthitam | nāsya svargaspṛhā kācinnaiśvaryasya na cāyuṣaḥ | yattasya kāṅkṣitaṃ prāptuṃ tatkariṣye'hamadya vai

मैं उसके मन में स्थित संकल्प को जानता हूँ। उसे न स्वर्ग की इच्छा है, न ऐश्वर्य की, न दीर्घ आयु की; वह जो पाना चाहता है, उसे मैं आज ही पूरा करूँगा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 35 (3.38.35)

तच्छ्रुत्वा शर्ववचनमृषयः सत्यवादिनः । प्रहृष्टमनसो जग्मुर्यथास्वं पुनराश्रमम् ॥

tacchrutvā śarvavacanamṛṣayaḥ satyavādinaḥ | prahṛṣṭamanaso jagmuryathāsvaṃ punarāśramam

शर्व (शिव) का वह वचन सुनकर सत्यवादी ऋषि प्रसन्नचित्त होकर अपने-अपने आश्रमों को लौट गए।

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