आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 39
किरातवेशधारी शिव और अर्जुन का युद्ध
ऋषियों के चले जाने पर शिव किरात (पर्वतीय शिकारी) का रूप धारण करके उमा और अपने गणों के साथ अर्जुन के पास आते हैं, ठीक उसी समय जब मूक नामक दानव सूअर के रूप में अर्जुन पर झपटता है। दोनों एक साथ सूअर पर बाण चलाते हैं, और शिकार को लेकर अर्जुन और किरात में विवाद होकर युद्ध छिड़ जाता है: किरात अर्जुन के सारे बाण निगल जाता है, उनका धनुष छीन लेता है, उनकी तलवार टूट जाती है और मल्लयुद्ध में वह अर्जुन को दबाकर अचेत कर देता है। जब अर्जुन शिव की माला से पूजा करते हैं और वही माला किरात के सिर पर देखते हैं, तो वे उसके चरणों में गिर पड़ते हैं; प्रसन्न शिव देवी सहित अपना रूप प्रकट करते हैं, उनके पराक्रम की प्रशंसा करते हैं और उन्हें एक अस्त्र देने का वचन देते हैं, और अर्जुन स्तुति करके क्षमा माँगते हैं, जिसे शिव आलिंगन करके स्वीकार करते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.39.1)
गतेषु तेषु सर्वेषु तपस्विषु महात्मसु । पिनाकपाणिर्भगवान्सर्वपापहरो हरः ॥
gateṣu teṣu sarveṣu tapasviṣu mahātmasu | pinākapāṇirbhagavānsarvapāpaharo haraḥ
जब वे सभी महात्मा तपस्वी चले गए, तब हाथ में पिनाक धारण करने वाले, सब पापों को हरने वाले भगवान हर ने
श्लोक 2 (3.39.2)
कैरातं वेषमास्थाय काञ्चनद्रुमसन्निभम् । विभ्राजमानो वपुषा गिरिर्मेरुरिवापरः ॥
kairātaṃ veṣamāsthāya kāñcanadrumasannibham | vibhrājamāno vapuṣā girirmerurivāparaḥ
किरात (पर्वतीय शिकारी) का वेश धारण किया। वे सोने के वृक्ष के समान चमक रहे थे और अपने शरीर से दूसरे मेरु पर्वत की भाँति दीप्त हो रहे थे।
श्लोक 3 (3.39.3)
श्रीमद्धनुरुपादाय शरांश्चाशीविषोपमान् । निष्पपात महार्चिष्मान्दहन्कक्षमिवानलः ॥
śrīmaddhanurupādāya śarāṃścāśīviṣopamān | niṣpapāta mahārciṣmāndahankakṣamivānalaḥ
एक सुन्दर धनुष और विषैले सर्पों जैसे बाण लेकर वे सूखी झाड़ियों को जलाती हुई अग्नि के समान प्रचण्ड तेज से दमकते हुए निकल पड़े।
श्लोक 4 (3.39.4)
देव्या सहोमया श्रीमान्समानव्रतवेषया । नानावेषधरैर्हृष्टैर्भूतैरनुगतस्तदा ॥
devyā sahomayā śrīmānsamānavrataveṣayā | nānāveṣadharairhṛṣṭairbhūtairanugatastadā
उन श्रीमान के साथ देवी उमा थीं, जिन्होंने उन्हीं के समान व्रत और वेश धारण किया था, और नाना वेश धारण किए हुए प्रसन्न भूतगण उनके पीछे-पीछे चल रहे थे।
श्लोक 5 (3.39.5)
किरातवेषसंछन्नः स्त्रीभिश्चापि सहस्रशः । अशोभत तदा राजन्स देशोऽतीव भारत ॥
kirātaveṣasaṃchannaḥ strībhiścāpi sahasraśaḥ | aśobhata tadā rājansa deśo'tīva bhārata
हे राजन्, हे भारत, किरात के वेश में छिपे वे जब हजारों स्त्रियों के साथ आए, तब वह प्रदेश अत्यन्त शोभायमान हो उठा।
श्लोक 6 (3.39.6)
क्षणेन तद्वनं सर्वं निःशब्दमभवत्तदा । नादः प्रस्रवणानां च पक्षिणां चाप्युपारमत् ॥
kṣaṇena tadvanaṃ sarvaṃ niḥśabdamabhavattadā | nādaḥ prasravaṇānāṃ ca pakṣiṇāṃ cāpyupāramat
क्षण भर में वह सारा वन निःशब्द हो गया; झरनों का कलकल और पक्षियों का कलरव थम गया।
श्लोक 7 (3.39.7)
स सन्निकर्षमागम्य पार्थस्याक्लिष्टकर्मणः । मूकं नाम दितेः पुत्रं ददर्शाद्भुतदर्शनम् ॥
sa sannikarṣamāgamya pārthasyākliṣṭakarmaṇaḥ | mūkaṃ nāma diteḥ putraṃ dadarśādbhutadarśanam
अनथक कर्म करने वाले पार्थ के निकट पहुँचकर उन्होंने दिति के पुत्र मूक नामक दानव को देखा, जो अद्भुत दिखाई दे रहा था।
श्लोक 8 (3.39.8)
वाराहं रूपमास्थाय तर्जयन्तमिवार्जुनम् । हन्तुं परमदुष्टात्मा तमुवाचाथ फल्गुनः ॥
vārāhaṃ rūpamāsthāya tarjayantamivārjunam | hantuṃ paramaduṣṭātmā tamuvācātha phalgunaḥ
वह परम दुष्टात्मा सूअर का रूप धारण करके मानो अर्जुन को मार डालने के लिए धमका रहा था। तब फल्गुन (अर्जुन) ने उससे कहा,
श्लोक 9 (3.39.9)
गाण्डीवं धनुरादाय शरांश्चाशीविषोपमान् । सज्यं धनुर्वरं कृत्वा ज्याघोषेण निनादयन् ॥
gāṇḍīvaṃ dhanurādāya śarāṃścāśīviṣopamān | sajyaṃ dhanurvaraṃ kṛtvā jyāghoṣeṇa ninādayan
गाण्डीव धनुष और विषैले सर्पों जैसे बाण लेकर, उस श्रेष्ठ धनुष पर डोरी चढ़ाकर और उसकी टंकार से दिशाओं को गुँजाते हुए —
अर्जुन उवाच
श्लोक 10 (3.39.10)
यन्मां प्रार्थयसे हन्तुमनागसमिहागतम् । तस्मात्त्वां पूर्वमेवाहं नेष्यामि यमसादनम् ॥
yanmāṃ prārthayase hantumanāgasamihāgatam | tasmāttvāṃ pūrvamevāhaṃ neṣyāmi yamasādanam
"मैं यहाँ आया हूँ और मैंने तुम्हारा कोई अपराध नहीं किया, फिर भी तुम मुझे मारना चाहते हो; इसलिए मैं पहले ही तुम्हें यमलोक भेज दूँगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 11 (3.39.11)
दृष्ट्वा तं प्रहरिष्यन्तं फल्गुनं दृढधन्विनम् । किरातरूपी सहसा वारयामास शंकरः ॥
dṛṣṭvā taṃ prahariṣyantaṃ phalgunaṃ dṛḍhadhanvinam | kirātarūpī sahasā vārayāmāsa śaṃkaraḥ
दृढ़ धनुर्धर फल्गुन को प्रहार करने के लिए उद्यत देखकर किरात रूपधारी शंकर ने सहसा उन्हें रोका
श्लोक 12 (3.39.12)
मयैष प्रार्थितः पूर्वं नीलमेघसमप्रभः । अनादृत्यैव तद्वाक्यं प्रजहाराथ फल्गुनः ॥
mayaiṣa prārthitaḥ pūrvaṃ nīlameghasamaprabhaḥ | anādṛtyaiva tadvākyaṃ prajahārātha phalgunaḥ
और कहा — "नीले मेघ के समान कान्ति वाले इस प्राणी को पहले मैंने अपना लक्ष्य बनाया था।" पर फल्गुन ने उनकी बात की उपेक्षा करके प्रहार कर दिया।
श्लोक 13 (3.39.13)
किरातश्च समं तस्मिन्नेकलक्ष्ये महाद्युतिः । प्रमुमोचाशनिप्रख्यं शरमग्निशिखोपमम् ॥
kirātaśca samaṃ tasminnekalakṣye mahādyutiḥ | pramumocāśaniprakhyaṃ śaramagniśikhopamam
उसी क्षण महातेजस्वी किरात ने भी उसी एक लक्ष्य पर वज्र के समान, अग्निशिखा जैसा बाण छोड़ा।
श्लोक 14 (3.39.14)
तौ मुक्तौ सायकौ ताभ्यां समं तत्र निपेततुः । मूकस्य गात्रे विस्तीर्णे शैलपृष्ठनिभे तदा ॥
tau muktau sāyakau tābhyāṃ samaṃ tatra nipetatuḥ | mūkasya gātre vistīrṇe śailapṛṣṭhanibhe tadā
दोनों के छोड़े हुए वे दोनों बाण एक साथ मूक के पर्वत की पीठ जैसे विशाल शरीर पर जा गिरे।
श्लोक 15 (3.39.15)
यथाऽशनेर्विनिष्पेषो वज्रस्येव च पर्वते । तथा तयोः सन्निपातः शरयोरभवत्तदा ॥
yathā'śanerviniṣpeṣo vajrasyeva ca parvate | tathā tayoḥ sannipātaḥ śarayorabhavattadā
जैसे बिजली की कड़क होती है, या पर्वत पर इन्द्र के वज्र का आघात होता है, वैसा ही उस समय उन दोनों बाणों का प्रहार हुआ।
श्लोक 16 (3.39.16)
स विद्धो बहुभिर्बाणैर्दीप्तास्यैः पन्नगैरिव । ममार राक्षसं रूपं भूयः कृत्वा सुदारुणम् ॥
sa viddho bahubhirbāṇairdīptāsyaiḥ pannagairiva | mamāra rākṣasaṃ rūpaṃ bhūyaḥ kṛtvā sudāruṇam
प्रज्वलित मुख वाले सर्पों जैसे बहुत-से बाणों से बिंधकर वह फिर से अपना भयंकर राक्षस-रूप धारण करके मर गया।
श्लोक 17 (3.39.17)
स ददर्श ततो जिष्णुः पुरुषं काञ्चनप्रभम् । किरातवेषसंछन्नं स्त्रीसहायममित्रहा ॥
sa dadarśa tato jiṣṇuḥ puruṣaṃ kāñcanaprabham | kirātaveṣasaṃchannaṃ strīsahāyamamitrahā
तब शत्रुनाशक जिष्णु (अर्जुन) ने सोने जैसी कान्ति वाले एक पुरुष को देखा, जो किरात के वेश में छिपा था और जिसके साथ स्त्रियाँ थीं।
श्लोक 18 (3.39.18)
तमब्रवीत्प्रीतमनाः कौन्तेयः प्रहसन्निव । को भवानटते शून्ये वने स्त्रीगणसंवृतः ॥
tamabravītprītamanāḥ kaunteyaḥ prahasanniva | ko bhavānaṭate śūnye vane strīgaṇasaṃvṛtaḥ
प्रसन्नचित्त कुन्तीपुत्र ने मुसकराते हुए उनसे कहा — "स्त्रियों के समूह से घिरे हुए तुम कौन हो, जो इस सूने वन में घूम रहे हो?
अर्जुन उवाच
श्लोक 19 (3.39.19)
न त्वमस्मिन्वने घोरे बिभेषि कनकप्रभ । किमर्थं च त्वया विद्धो मृगोऽयं मत्परिग्रहः ॥
na tvamasminvane ghore bibheṣi kanakaprabha | kimarthaṃ ca tvayā viddho mṛgo'yaṃ matparigrahaḥ
"हे स्वर्णकान्ति वाले, क्या तुम्हें इस भयानक वन में डर नहीं लगता? और तुमने मेरे अधिकार के इस पशु को क्यों बींधा?
श्लोक 20 (3.39.20)
मयाऽभिपन्नः पूर्वं हि राक्षसोऽयमिहागतः । कामात्परिभवाद्वाऽपि न मे जीवन्विमोक्ष्यसे ॥
mayā'bhipannaḥ pūrvaṃ hi rākṣaso'yamihāgataḥ | kāmātparibhavādvā'pi na me jīvanvimokṣyase
"यह राक्षस यहाँ आया था और पहले मैंने इसे अपना लक्ष्य बनाया था। तुमने यह मनमानी से किया हो या मेरा अपमान करने के लिए, तुम मुझसे जीवित नहीं बचोगे।
श्लोक 21 (3.39.21)
न ह्येष मृगयाधर्मो यस्त्वयाऽद्य कृतो मयि । तेन त्वां भ्रंशयिष्यामि जीवितात्पर्वताश्रयम् ॥
na hyeṣa mṛgayādharmo yastvayā'dya kṛto mayi | tena tvāṃ bhraṃśayiṣyāmi jīvitātparvatāśrayam
"आज तुमने मेरे साथ जो किया है, वह शिकार का धर्म नहीं है। इसलिए, हे पर्वतवासी, मैं तुम्हें प्राणों से वंचित कर दूँगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 22 (3.39.22)
इत्युक्तः पाण्डवेयेन किरातः प्रहसन्निव । उवाच श्लक्ष्णया वाचा पाण्डवं सव्यसाचिनम् ॥
ityuktaḥ pāṇḍaveyena kirātaḥ prahasanniva | uvāca ślakṣṇayā vācā pāṇḍavaṃ savyasācinam
पाण्डुपुत्र के ऐसा कहने पर किरात ने मुसकराते हुए सव्यसाची पाण्डव से मधुर वाणी में कहा —
किरात उवाच
श्लोक 23 (3.39.23)
न मत्कृते त्वया वीर भीः कार्या वनमन्तिकात् । इयं भूमिः सदाऽस्माकमुचिता वसतां वने ॥
na matkṛte tvayā vīra bhīḥ kāryā vanamantikāt | iyaṃ bhūmiḥ sadā'smākamucitā vasatāṃ vane
"हे वीर, वन के इस छोर पर तुम्हें मेरे कारण कोई भय नहीं करना चाहिए। यह भूमि सदा से हमारी है; हम वन में ही रहते हैं।
श्लोक 24 (3.39.24)
त्वया तु दुष्करः कस्मादिह वासः प्ररोचितः । वयं तु बहुसत्त्वेऽस्मिन्निवसामस्तपोधन ॥
tvayā tu duṣkaraḥ kasmādiha vāsaḥ prarocitaḥ | vayaṃ tu bahusattve'sminnivasāmastapodhana
"पर तुमने यहाँ रहने का यह कठिन मार्ग क्यों चुना? हम तो, हे तपोधन, इस अनेक प्राणियों से भरे स्थान में रहते ही हैं।
श्लोक 25 (3.39.25)
भवांस्तु कृष्णवर्त्माभः सुकुमारः सुखोचितः । कथं शून्यमिमं देशमेकाकी विचरिष्यति ॥
bhavāṃstu kṛṣṇavartmābhaḥ sukumāraḥ sukhocitaḥ | kathaṃ śūnyamimaṃ deśamekākī vicariṣyati
"पर तुम तो अग्नि के समान तेजस्वी, सुकुमार और सुख में पले हुए हो; इस सूने प्रदेश में अकेले कैसे विचरोगे?"
अर्जुन उवाच
श्लोक 26 (3.39.26)
गाण्डीवमाश्रयं कृत्वा नाराचांश्चाग्निसन्निभान् । निवसामि महारण्ये द्वितीय इव पावकः ॥
gāṇḍīvamāśrayaṃ kṛtvā nārācāṃścāgnisannibhān | nivasāmi mahāraṇye dvitīya iva pāvakaḥ
"गाण्डीव को अपना आश्रय बनाकर और अग्नि के समान नाराच बाणों के साथ मैं इस महावन में दूसरी अग्नि की भाँति रहता हूँ।
श्लोक 27 (3.39.27)
एष चापि मया जन्तुर्मृगरूपं समाश्रितः । राक्षसो निहतो घोरो हन्तुं मामिह चागतः ॥
eṣa cāpi mayā janturmṛgarūpaṃ samāśritaḥ | rākṣaso nihato ghoro hantuṃ māmiha cāgataḥ
"और यह प्राणी, जिसने पशु का रूप धारण किया था, एक भयंकर राक्षस था जो मुझे मारने यहाँ आया था; इसे मैंने मारा है।"
किरात उवाच
श्लोक 28 (3.39.28)
मयैष धन्वनिर्मुक्तैस्ताडितः पूर्वमेव हि । बाणैरभिहतः शेते नीतश्च यमसादनम् ॥
mayaiṣa dhanvanirmuktaistāḍitaḥ pūrvameva hi | bāṇairabhihataḥ śete nītaśca yamasādanam
"इसे पहले मैंने ही अपने धनुष से छूटे बाणों से मारा था। मेरे बाणों से आहत होकर यह यहाँ पड़ा है और यमलोक पहुँच चुका है।
श्लोक 29 (3.39.29)
ममैवायं लक्ष्यभूतः पूर्वमेव परिग्रहः । ममैव च प्रहारेण जीविताद्व्यवरोपितः ॥
mamaivāyaṃ lakṣyabhūtaḥ pūrvameva parigrahaḥ | mamaiva ca prahāreṇa jīvitādvyavaropitaḥ
"यह पहले से ही मेरा लक्ष्य और मेरा शिकार था, और मेरे ही प्रहार से इसके प्राण गए हैं।
श्लोक 30 (3.39.30)
दोषान्स्वान्नार्हसेऽन्यस्मै वक्तुं स्वबलदर्पितः । अभिषक्तोस्मि मन्दात्मन्न मे जीवन्विमोक्ष्यसे ॥
doṣānsvānnārhase'nyasmai vaktuṃ svabaladarpitaḥ | abhiṣaktosmi mandātmanna me jīvanvimokṣyase
"अपने बल के घमण्ड में तुम्हें अपने दोष दूसरे पर नहीं डालने चाहिए। अरे मूर्ख, तुमने मेरा अपराध किया है; तुम मुझसे जीवित नहीं बचोगे।
श्लोक 31 (3.39.31)
स्थिरो भव विमोक्ष्यामि सायकानशनीनिव । घटस्व परया शक्त्या मुञ्च त्वमपि सायकान् ॥
sthiro bhava vimokṣyāmi sāyakānaśanīniva | ghaṭasva parayā śaktyā muñca tvamapi sāyakān
"स्थिर हो जाओ! मैं वज्र जैसे बाण छोड़ूँगा। तुम भी अपनी पूरी शक्ति लगाओ और बाण छोड़ो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 32 (3.39.32)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा किरातस्यार्जुनस्तदा । रोषमाहारयामास ताडयामास चेषुभिः ॥
tasya tadvacanaṃ śrutvā kirātasyārjunastadā | roṣamāhārayāmāsa tāḍayāmāsa ceṣubhiḥ
किरात के ये वचन सुनकर अर्जुन क्रोध में भर गए और उन पर बाणों से प्रहार करने लगे।
श्लोक 33 (3.39.33)
ततो हृष्टेन मनसा प्रतिजग्राह सायकान् । भूयोभूय इति प्राह मन्दमन्देत्युवाच ह ॥
tato hṛṣṭena manasā pratijagrāha sāyakān | bhūyobhūya iti prāha mandamandetyuvāca ha
किरात ने प्रसन्न मन से उन बाणों को ग्रहण किया और बार-बार कहा — "और, और!" तथा "अरे मूर्ख, मूर्ख!"
श्लोक 34 (3.39.34)
प्रहरस्व शरानेतान्नाराचान्मर्मभेदिनः । इत्युक्तो बाणवर्षं स मुमोच सहसाऽर्जुनः ॥
praharasva śarānetānnārācānmarmabhedinaḥ | ityukto bāṇavarṣaṃ sa mumoca sahasā'rjunaḥ
"मर्मभेदी नाराच बाणों का प्रहार करो!" ऐसा कहे जाने पर अर्जुन ने सहसा बाणों की वर्षा कर दी।
श्लोक 35 (3.39.35)
ततस्तौ तत्रसंरब्धौ गर्जमानौ मुहुर्मुहुः । शरैराशीविषाकारैस्ततक्षाते परस्परम् ॥
tatastau tatrasaṃrabdhau garjamānau muhurmuhuḥ | śarairāśīviṣākāraistatakṣāte parasparam
तब वे दोनों क्रोध से भरकर बार-बार गरजते हुए विषैले सर्पों जैसे बाणों से एक-दूसरे को घायल करने लगे।
श्लोक 36 (3.39.36)
ततोऽर्जुनः शरवर्षं किराते समवासृजत् । तत्प्रसन्नेन मनसा प्रतिजग्राह शंकरः ॥
tato'rjunaḥ śaravarṣaṃ kirāte samavāsṛjat | tatprasannena manasā pratijagrāha śaṃkaraḥ
तब अर्जुन ने किरात पर बाणों की झड़ी लगा दी, और शंकर ने प्रसन्न मन से उसे ग्रहण कर लिया।
श्लोक 37 (3.39.37)
मुहूर्तं शरवर्षं तु प्रतिगृह्य पिनाकधृक् । अक्षतेन शरीरेण तस्थौ गिरिरिवाचलः ॥
muhūrtaṃ śaravarṣaṃ tu pratigṛhya pinākadhṛk | akṣatena śarīreṇa tasthau giririvācalaḥ
कुछ देर तक उस बाण-वर्षा को झेलकर पिनाकधारी शिव अक्षत शरीर से पर्वत की भाँति अचल खड़े रहे।
श्लोक 38 (3.39.38)
स दृष्ट्वा बाणवर्षं तु मोघीभूतं धनंजयः । परमं विस्मयं चक्रे साधुसाध्विति चाब्रवीत् ॥
sa dṛṣṭvā bāṇavarṣaṃ tu moghībhūtaṃ dhanaṃjayaḥ | paramaṃ vismayaṃ cakre sādhusādhviti cābravīt
अपनी बाण-वर्षा को व्यर्थ हुआ देखकर धनंजय अत्यन्त विस्मित हुए और बोले — "वाह, वाह!"
अर्जुन उवाच
श्लोक 39 (3.39.39)
अहोऽयं सुकुमाराङ्गो हिमवच्छिखराश्रयः । गाण्डीवमुक्तान्नाराचान्प्रतिगृह्णात्यविह्वलः ॥
aho'yaṃ sukumārāṅgo himavacchikharāśrayaḥ | gāṇḍīvamuktānnārācānpratigṛhṇātyavihvalaḥ
"अहो! हिमालय के शिखर पर रहने वाला यह सुकुमार अंगों वाला पुरुष गाण्डीव से छूटे नाराच बाणों को बिना विचलित हुए झेल रहा है!
श्लोक 40 (3.39.40)
कोऽयं देवो भवेत्साक्षाद्रुद्रो यक्षः सुरोऽसुरः । विद्यते हि गिरिश्रेष्ठे त्रिदशानां समागमः ॥
ko'yaṃ devo bhavetsākṣādrudro yakṣaḥ suro'suraḥ | vidyate hi giriśreṣṭhe tridaśānāṃ samāgamaḥ
"यह कौन है? क्या यह साक्षात् कोई देवता है — रुद्र, यक्ष, देव या असुर? क्योंकि इस श्रेष्ठ पर्वत पर देवताओं का समागम होता रहता है।
श्लोक 41 (3.39.41)
न हि मद्वाणजालानामुत्सृष्टानां सहस्रशः । शक्तोऽन्यः सहितुं वेगमृते देवं पिनाकिनम् ॥
na hi madvāṇajālānāmutsṛṣṭānāṃ sahasraśaḥ | śakto'nyaḥ sahituṃ vegamṛte devaṃ pinākinam
"मेरे हजारों की संख्या में छोड़े गए बाण-जालों के वेग को पिनाकधारी देव के सिवा और कोई सहन नहीं कर सकता।
श्लोक 42 (3.39.42)
देवो वा यदि वा यक्षो रुद्रादन्यो व्यवस्थितः । अहमेनं शरैस्तीक्ष्णैर्नयामि यमसादनम् ॥
devo vā yadi vā yakṣo rudrādanyo vyavasthitaḥ | ahamenaṃ śaraistīkṣṇairnayāmi yamasādanam
"यह देवता हो या यक्ष, यदि यह रुद्र के सिवा कोई और है, तो मैं इसे अपने तीखे बाणों से यमलोक भेज दूँगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 43 (3.39.43)
ततो हृष्टमना जिष्णुर्नाराचान्मर्मभेदिनः । व्यसृजच्छतधा राजन्मयूखानिव भास्करः ॥
tato hṛṣṭamanā jiṣṇurnārācānmarmabhedinaḥ | vyasṛjacchatadhā rājanmayūkhāniva bhāskaraḥ
हे राजन्, तब जिष्णु ने हर्षित मन से सैकड़ों मर्मभेदी नाराच बाण ऐसे छोड़े जैसे सूर्य अपनी किरणें बिखेरता है।
श्लोक 44 (3.39.44)
तान्प्रसन्नेन मनसा भगवाँल्लोकभावनः । शूलपाणिः प्रत्यगृह्णाच्छिलावर्षमिवाचलः ॥
tānprasannena manasā bhagavām̐llokabhāvanaḥ | śūlapāṇiḥ pratyagṛhṇācchilāvarṣamivācalaḥ
लोकों के पालक, त्रिशूलधारी भगवान ने उन्हें प्रसन्न मन से वैसे ही ग्रहण कर लिया जैसे पर्वत पत्थरों की वर्षा को झेल लेता है।
श्लोक 45 (3.39.45)
क्षणेन क्षीणबाणोऽथ संवृत्तः फल्गुनस्तदा । वित्रासं च जगामाथ तं दृष्ट्वा शरसंक्षयम् ॥
kṣaṇena kṣīṇabāṇo'tha saṃvṛttaḥ phalgunastadā | vitrāsaṃ ca jagāmātha taṃ dṛṣṭvā śarasaṃkṣayam
क्षण भर में फल्गुन के बाण समाप्त हो गए, और बाणों को चुका हुआ देखकर वे घबरा उठे।
श्लोक 46 (3.39.46)
चिन्तयामास जिष्णुस्तु भगवन्तं हुताशनम् । पुरस्तादक्षयौ दत्तौ तूणौ येनास्य खाण्डवे ॥
cintayāmāsa jiṣṇustu bhagavantaṃ hutāśanam | purastādakṣayau dattau tūṇau yenāsya khāṇḍave
जिष्णु ने भगवान अग्निदेव का स्मरण किया, जिन्होंने पहले खाण्डव वन में उन्हें दो अक्षय तूणीर दिए थे।
अर्जुन उवाच
श्लोक 47 (3.39.47)
किं नु मोक्ष्यामि धनुषा यन्मे बाणाः क्षयं गताः । अयं च पुरुषः कोपि बाणान्ग्रसति सर्वशः ॥
kiṃ nu mokṣyāmi dhanuṣā yanme bāṇāḥ kṣayaṃ gatāḥ | ayaṃ ca puruṣaḥ kopi bāṇāngrasati sarvaśaḥ
"अब मैं धनुष से क्या चलाऊँ, जब मेरे बाण समाप्त हो गए हैं? और यह पुरुष, जो भी हो, मेरे सारे बाण निगल जाता है।
श्लोक 48 (3.39.48)
अहमेनं धनुष्कोट्या शूलाग्रेणेव कुञ्जरम् । नयामि दण्डधारस्य यमस्य सदनं प्रति ॥
ahamenaṃ dhanuṣkoṭyā śūlāgreṇeva kuñjaram | nayāmi daṇḍadhārasya yamasya sadanaṃ prati
"जैसे भाले की नोक से हाथी को मारा जाता है, वैसे ही मैं धनुष की नोक से इस पर प्रहार करके इसे दण्डधारी यम के लोक पहुँचा दूँगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 49 (3.39.49)
प्रगृह्याथ धनुष्कोट्या ज्यापाशेनावकृष्य च । मुष्टिभिश्चापि हतवान्वज्रकल्पैर्महाद्युतिः ॥
pragṛhyātha dhanuṣkoṭyā jyāpāśenāvakṛṣya ca | muṣṭibhiścāpi hatavānvajrakalpairmahādyutiḥ
उस महातेजस्वी वीर ने धनुष की नोक से उन्हें पकड़कर और डोरी के फंदे से खींचकर वज्र जैसे मुक्कों से भी उन पर प्रहार किया।
श्लोक 50 (3.39.50)
संप्रायुध्यद्धनुष्कोट्या कौन्तेयः परवीरहा । तदप्यस्य धनुर्दिव्यं जग्राह गिरिगोचरः ॥
saṃprāyudhyaddhanuṣkoṭyā kaunteyaḥ paravīrahā | tadapyasya dhanurdivyaṃ jagrāha girigocaraḥ
शत्रुवीरों का संहार करने वाले कुन्तीपुत्र धनुष की नोक से लड़ते रहे, किन्तु उस पर्वतवासी ने उनका वह दिव्य धनुष भी छीन लिया।
श्लोक 51 (3.39.51)
ततोऽर्जुनो ग्रस्तधनुः खड्गपाणिरतिष्ठत । युद्धस्यान्तमभीप्सन्वै वेगेनाभिजगाम तम् ॥
tato'rjuno grastadhanuḥ khaḍgapāṇiratiṣṭhata | yuddhasyāntamabhīpsanvai vegenābhijagāma tam
धनुष छिन जाने पर अर्जुन हाथ में तलवार लेकर खड़े हो गए और युद्ध का अन्त करने की इच्छा से वेग के साथ उन पर टूट पड़े।
श्लोक 52 (3.39.52)
तस्य मूर्ध्नि शितं खड्गमसक्तं पर्वतेष्वपि । मुमोच भुजवीर्येण विक्रम्य कुरुनन्दनः ॥
tasya mūrdhni śitaṃ khaḍgamasaktaṃ parvateṣvapi | mumoca bhujavīryeṇa vikramya kurunandanaḥ
कुरुनन्दन ने भुजाओं की पूरी शक्ति लगाकर, पराक्रम के साथ, अपनी वह तीखी तलवार, जो पत्थरों पर भी कुण्ठित नहीं होती थी, उनके सिर पर चलाई।
श्लोक 53 (3.39.53)
तस्य मूर्धानमासाद्य पफालासिवरो हि सः । ततो वृक्षैः शिलाभिश्च योधयामास फल्गुनः ॥
tasya mūrdhānamāsādya paphālāsivaro hi saḥ | tato vṛkṣaiḥ śilābhiśca yodhayāmāsa phalgunaḥ
पर उनके सिर से टकराते ही वह उत्तम तलवार टूटकर बिखर गई। तब फल्गुन वृक्षों और शिलाओं से लड़ने लगे।
श्लोक 54 (3.39.54)
तदा वृक्षान्महाकायः प्रत्यगृह्णादथो शिलाः । किरातरूपी भगवांस्ततः पार्थो महाबलः ॥
tadā vṛkṣānmahākāyaḥ pratyagṛhṇādatho śilāḥ | kirātarūpī bhagavāṃstataḥ pārtho mahābalaḥ
तब किरात रूपधारी विशालकाय भगवान ने उन वृक्षों और शिलाओं को भी पकड़ लिया। तब महाबली पार्थ ने
श्लोक 55 (3.39.55)
मुष्टिभिर्वज्रसंस्पर्शैर्धूममुत्पादयन्मुखे । प्रजहार दुराधर्षे किरातसमरूपिणि ॥
muṣṭibhirvajrasaṃsparśairdhūmamutpādayanmukhe | prajahāra durādharṣe kirātasamarūpiṇi
क्रोध से मुँह से धुआँ निकालते हुए, वज्र के समान कठोर मुक्कों से उस दुर्जय किरात रूपधारी पर प्रहार किया।
श्लोक 56 (3.39.56)
ततः शक्राशनिसमैर्मुष्टिभिर्भृशदारुणैः । किरातरूपी भगवानर्दयामास फल्गुनम् ॥
tataḥ śakrāśanisamairmuṣṭibhirbhṛśadāruṇaiḥ | kirātarūpī bhagavānardayāmāsa phalgunam
तब किरात रूपधारी भगवान ने इन्द्र के वज्र के समान अत्यन्त भयंकर मुक्कों से फल्गुन को पीड़ित किया।
श्लोक 57 (3.39.57)
ततश्चटचटाशब्दः सुघोरः समजायत । पाण्डवस्य च मुष्टीनां किरातस्य च युध्यतः ॥
tataścaṭacaṭāśabdaḥ sughoraḥ samajāyata | pāṇḍavasya ca muṣṭīnāṃ kirātasya ca yudhyataḥ
तब लड़ते हुए पाण्डव और किरात के मुक्कों से बड़ी भयंकर चटचट की ध्वनि उठने लगी।
श्लोक 58 (3.39.58)
सुमुहूर्तं तयोर्युद्धमभवल्लोमहर्षणम् । भुजप्रहारसंयुक्तं वृत्रवासवयोरिव ॥
sumuhūrtaṃ tayoryuddhamabhavallomaharṣaṇam | bhujaprahārasaṃyuktaṃ vṛtravāsavayoriva
बहुत देर तक उन दोनों का रोमांचकारी युद्ध चलता रहा, जिसमें भुजाओं से ही प्रहार हो रहे थे, जैसे वृत्रासुर और इन्द्र का युद्ध हुआ था।
श्लोक 59 (3.39.59)
महाराज ततो जिष्णुः किरातमुरसा बली । पाण्डवं च विचेष्टन्तं किरातोप्यहनद्बलात् ॥
mahārāja tato jiṣṇuḥ kirātamurasā balī | pāṇḍavaṃ ca viceṣṭantaṃ kirātopyahanadbalāt
हे महाराज, तब बलवान जिष्णु ने किरात पर अपनी छाती से प्रहार किया, और किरात ने भी छटपटाते पाण्डव पर बलपूर्वक प्रहार किया।
श्लोक 60 (3.39.60)
तयोर्भुजविनिष्पेषात्संघर्षेणोरसोस्तथा । समजायत गात्रेषु पावकोऽङ्गारधूमवान् ॥
tayorbhujaviniṣpeṣātsaṃgharṣeṇorasostathā | samajāyata gātreṣu pāvako'ṅgāradhūmavān
भुजाओं के परस्पर पिसने और छातियों की रगड़ से उनके शरीरों में अंगारों और धुएँ वाली आग उत्पन्न हो गई।
श्लोक 61 (3.39.61)
तत एनं महादेवः पीड्य गात्रैः सुपीडितम् । तेजसा व्याक्रमद्रोषाच्चेतस्तस्य विमोहयन् ॥
tata enaṃ mahādevaḥ pīḍya gātraiḥ supīḍitam | tejasā vyākramadroṣāccetastasya vimohayan
तब महादेव ने अपने अंगों से उन्हें कसकर दबाया और क्रोध में अपने तेज से उन पर आक्रमण करके उनकी चेतना को मोहित कर दिया।
श्लोक 62 (3.39.62)
ततोऽभिपीडितैर्गात्रैः पिण्डीकृत इवाबभौ । फल्गुनो गात्रसंरुद्धो देवदेवेन भारत ॥
tato'bhipīḍitairgātraiḥ piṇḍīkṛta ivābabhau | phalguno gātrasaṃruddho devadevena bhārata
हे भारत, तब देवाधिदेव द्वारा अंगों के दबाए जाने से जकड़े हुए फल्गुन मांस के एक पिण्ड जैसे दिखाई देने लगे।
श्लोक 63 (3.39.63)
निरुच्छ्वासोऽभवच्चैव सन्निरुद्धो महामनाः । ततः पपात संमूढस्ततः प्रीतोऽभवद्भवः ॥
nirucchvāso'bhavaccaiva sanniruddho mahāmanāḥ | tataḥ papāta saṃmūḍhastataḥ prīto'bhavadbhavaḥ
इस प्रकार जकड़े हुए वे महामना साँस न ले सके और अचेत होकर गिर पड़े। तब भव (शिव) प्रसन्न हुए।
श्लोक 64 (3.39.64)
स मुहूर्तं तथा भूत्वा सचेताः पुनरुत्थितः । रुधिरेणाप्लुताङ्गस्तु पाण्डवो भृशदुःखितः ॥
sa muhūrtaṃ tathā bhūtvā sacetāḥ punarutthitaḥ | rudhireṇāplutāṅgastu pāṇḍavo bhṛśaduḥkhitaḥ
कुछ देर उसी दशा में रहकर वे फिर सचेत होकर उठ खड़े हुए; पाण्डव के अंग रक्त से लथपथ थे और वे अत्यन्त दुःखी थे।
श्लोक 65 (3.39.65)
शरण्यं शरणं गत्वा भगवन्तं पिनाकिनम् । मृन्मयं स्थण्डिलं कृत्वा माल्येनापूजयद्भवम् ॥
śaraṇyaṃ śaraṇaṃ gatvā bhagavantaṃ pinākinam | mṛnmayaṃ sthaṇḍilaṃ kṛtvā mālyenāpūjayadbhavam
शरणागतों के रक्षक पिनाकधारी भगवान की शरण में जाकर उन्होंने मिट्टी की वेदी बनाई और माला से भव का पूजन किया।
श्लोक 66 (3.39.66)
तच्च माल्यं तदा पार्थः किरातशिरसि स्थितम् । अपश्यत्पाण्डवश्रेष्ठो हर्षेण प्रकृतिं गतः ॥
tacca mālyaṃ tadā pārthaḥ kirātaśirasi sthitam | apaśyatpāṇḍavaśreṣṭho harṣeṇa prakṛtiṃ gataḥ
तब पाण्डवों में श्रेष्ठ पार्थ ने वही माला किरात के सिर पर देखी, और हर्ष से वे फिर स्वस्थ हो गए।
श्लोक 67 (3.39.67)
पपात पादयोस्तस्य ततः प्रीतोऽभवद्भवः । उवाच चैनं वचसा मेघगम्भीरगीर्हरः । जातविस्मयमालोक्य ततः क्षीणाङ्गसंहतिम् ॥
papāta pādayostasya tataḥ prīto'bhavadbhavaḥ | uvāca cainaṃ vacasā meghagambhīragīrharaḥ | jātavismayamālokya tataḥ kṣīṇāṅgasaṃhatim
वे उनके चरणों में गिर पड़े, तब भव प्रसन्न हुए। उन्हें विस्मय से भरा और थका-हारा देखकर मेघ के समान गम्भीर वाणी वाले हर ने उनसे कहा —
भव उवाच
श्लोक 68 (3.39.68)
भोभो फल्गुन तुष्टोस्मि कर्मणाऽप्रतिमेन ते । शौर्येणानेन धृत्या च क्षत्रियो नास्ति ते समः ॥
bhobho phalguna tuṣṭosmi karmaṇā'pratimena te | śauryeṇānena dhṛtyā ca kṣatriyo nāsti te samaḥ
"हे फल्गुन! मैं तुम्हारे इस अनुपम कर्म से सन्तुष्ट हूँ। इस शौर्य और धैर्य में तुम्हारे समान कोई क्षत्रिय नहीं है।
श्लोक 69 (3.39.69)
समं तेजश्च वीर्यं च ममाद्य तव चानघ । प्रीतस्तेऽहं महाबाहो पश्य मां भरतर्षभ ॥
samaṃ tejaśca vīryaṃ ca mamādya tava cānagha | prītaste'haṃ mahābāho paśya māṃ bharatarṣabha
"हे निष्पाप, आज तुम्हारा तेज और पराक्रम मेरे समान है। हे महाबाहु, मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। हे भरतश्रेष्ठ, मुझे देखो।
श्लोक 70 (3.39.70)
ददामि ते विशालाक्ष चक्षुः पूर्वं मुनिर्भवान् । विजेष्यसि रणे शत्रूनपि सर्वान्दिवौकसः ॥
dadāmi te viśālākṣa cakṣuḥ pūrvaṃ munirbhavān | vijeṣyasi raṇe śatrūnapi sarvāndivaukasaḥ
"हे विशाल नेत्रों वाले, मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि देता हूँ; पूर्वजन्म में तुम मुनि थे। तुम युद्ध में अपने सभी शत्रुओं को जीत लोगे, स्वर्ग के निवासियों को भी।
श्लोक 71 (3.39.71)
प्रीत्या च तेऽहं दास्यामि यदस्त्रमनिवारितम् । त्वं हि शक्तो मदीयं तदस्त्रं धारयितुं क्षणात् ॥
prītyā ca te'haṃ dāsyāmi yadastramanivāritam | tvaṃ hi śakto madīyaṃ tadastraṃ dhārayituṃ kṣaṇāt
"मैं प्रेमवश तुम्हें ऐसा अस्त्र दूँगा जिसका कोई निवारण नहीं कर सकता, क्योंकि तुम मेरे उस अस्त्र को तत्काल धारण करने में समर्थ हो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 72 (3.39.72)
ततो देवं महादेवं गिरिशं शूलपाणिनम् । ददर्श फल्गुनस्तत्र सह देव्या महाद्युतिम् ॥
tato devaṃ mahādevaṃ giriśaṃ śūlapāṇinam | dadarśa phalgunastatra saha devyā mahādyutim
तब फल्गुन ने वहाँ त्रिशूलधारी, महातेजस्वी, गिरिश महादेव को देवी के साथ देखा।
श्लोक 73 (3.39.73)
स जानुभ्यां महीं गत्वा शिरसा प्रणिपत्य च । प्रसादयामास हरं पार्थः परपुरंजयः ॥
sa jānubhyāṃ mahīṃ gatvā śirasā praṇipatya ca | prasādayāmāsa haraṃ pārthaḥ parapuraṃjayaḥ
शत्रुओं के नगर जीतने वाले पार्थ ने घुटनों के बल भूमि पर बैठकर और सिर झुकाकर प्रणाम करते हुए हर को प्रसन्न किया।
अर्जुन उवाच
श्लोक 74 (3.39.74)
कपर्दिन्सर्वभूतेश भगनेत्रनिपातन । देवदेव महादेव नीलग्रीव जटाधर ॥
kapardinsarvabhūteśa bhaganetranipātana | devadeva mahādeva nīlagrīva jaṭādhara
"हे कपर्दी (जटाजूटधारी), हे समस्त प्राणियों के ईश्वर, हे भग के नेत्र नष्ट करने वाले! हे देवाधिदेव, हे महादेव, हे नीलकण्ठ, हे जटाधारी!
श्लोक 75 (3.39.75)
कारणानां च परमं जाने त्वां त्र्यम्बकं विभुम् । देवानां च गतिं देवं त्वत्प्रसूतमिदं जगत् ॥
kāraṇānāṃ ca paramaṃ jāne tvāṃ tryambakaṃ vibhum | devānāṃ ca gatiṃ devaṃ tvatprasūtamidaṃ jagat
"मैं जानता हूँ कि तुम कारणों के भी परम कारण, सर्वव्यापी त्र्यम्बक और देवताओं के भी आश्रय देव हो। यह जगत् तुम्हीं से उत्पन्न हुआ है।
श्लोक 76 (3.39.76)
अजेयस्त्वं त्रिभिर्लोकैः सदेवासुरमानुषैः । शिवाय विष्णुरूपाय विष्णवे शिवरूपिणे ॥
ajeyastvaṃ tribhirlokaiḥ sadevāsuramānuṣaiḥ | śivāya viṣṇurūpāya viṣṇave śivarūpiṇe
"देवों, असुरों और मनुष्यों सहित तीनों लोक भी तुम्हें जीत नहीं सकते। विष्णुरूप शिव को, शिवरूप विष्णु को,
श्लोक 77 (3.39.77)
दक्षयज्ञविनाशाय हरिरूपाय ते नमः । ललाटाक्षाय शर्वाय मीढुषे शूलपाणये ॥
dakṣayajñavināśāya harirūpāya te namaḥ | lalāṭākṣāya śarvāya mīḍhuṣe śūlapāṇaye
"दक्ष के यज्ञ का विनाश करने वाले, हरिरूप तुम्हें नमस्कार है! ललाट में नेत्र वाले, शर्व, कृपा बरसाने वाले, त्रिशूलधारी को,
श्लोक 78 (3.39.78)
पिनाकगोप्त्रे सूर्याय मङ्गल्याय च वेधसे । प्रसादये त्वां भगवन्सर्वभूतमहेश्वर ॥
pinākagoptre sūryāya maṅgalyāya ca vedhase | prasādaye tvāṃ bhagavansarvabhūtamaheśvara
"पिनाक के रक्षक, सूर्यरूप, मंगलमय और विधाता को नमस्कार! हे भगवन्, हे समस्त प्राणियों के महेश्वर, मैं तुम्हें प्रसन्न करना चाहता हूँ —
श्लोक 79 (3.39.79)
गणेशं जगतः शम्भुं लोककारणकारणम् । प्रधानपुरुषातीतं परं सूक्ष्मतरं हरम् ॥
gaṇeśaṃ jagataḥ śambhuṃ lokakāraṇakāraṇam | pradhānapuruṣātītaṃ paraṃ sūkṣmataraṃ haram
"तुम गणों के स्वामी, जगत् के कल्याणकारी शम्भु, लोकों के कारणों के भी कारण, प्रधान (प्रकृति) और पुरुष से परे, परम, सूक्ष्म से भी सूक्ष्म हर हो।
श्लोक 80 (3.39.80)
व्यतिक्रमं मे भगवन्क्षन्तुमर्हसि शंकर । भगवन्दर्शनाकाङ्क्षी प्राप्तोस्मीमं महागिरिम् ॥
vyatikramaṃ me bhagavankṣantumarhasi śaṃkara | bhagavandarśanākāṅkṣī prāptosmīmaṃ mahāgirim
"हे भगवान शंकर, मेरा अपराध क्षमा करो। हे प्रभो, तुम्हारे दर्शन की इच्छा से ही मैं इस महान पर्वत पर आया था,
श्लोक 81 (3.39.81)
दयितं तव देवेश तापसालयमुत्तमम् । प्रसादये त्वां भगवन्सर्वलोकनमस्कृतम् ॥
dayitaṃ tava deveśa tāpasālayamuttamam | prasādaye tvāṃ bhagavansarvalokanamaskṛtam
"हे देवेश, जो तुम्हें प्रिय है और तपस्वियों का उत्तम निवास है। हे सब लोकों द्वारा वन्दित भगवन्, मैं तुम्हें प्रसन्न करना चाहता हूँ।
श्लोक 82 (3.39.82)
कृतो मयाऽयमज्ञानाद्विमर्दो यस्त्वया सह । शरणं प्रतिपन्नाय तत्क्षमस्वाद्य शंकर ॥
kṛto mayā'yamajñānādvimardo yastvayā saha | śaraṇaṃ pratipannāya tatkṣamasvādya śaṃkara
"तुम्हारे साथ यह संघर्ष मैंने अज्ञानवश किया है। मैं तुम्हारी शरण में आया हूँ; हे शंकर, अब इसे क्षमा कर दो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 83 (3.39.83)
तमुवाच महातेजाः प्रहसन्वृषभध्वजः । प्रगृह्य रुचिरं बाहुं क्षान्तमित्येव फल्गुनम् ॥
tamuvāca mahātejāḥ prahasanvṛṣabhadhvajaḥ | pragṛhya ruciraṃ bāhuṃ kṣāntamityeva phalgunam
महातेजस्वी वृषभध्वज ने मुसकराते हुए फल्गुन की सुन्दर भुजा पकड़ी और कहा — "क्षमा किया।"
श्लोक 84 (3.39.84)
परिष्वज्य च बाहुभ्यां प्रीतात्मा भगवान्हरः । पुनः पार्थं सान्त्वपूर्वमुवाच वृषभध्वजः ॥
pariṣvajya ca bāhubhyāṃ prītātmā bhagavānharaḥ | punaḥ pārthaṃ sāntvapūrvamuvāca vṛṣabhadhvajaḥ
और दोनों भुजाओं से उनका आलिंगन करके प्रसन्नचित्त भगवान हर वृषभध्वज ने पार्थ से फिर सान्त्वना भरे वचन कहे।
श्लोक 85 (3.39.85)
गङ्गाङ्कितजटः शर्वः पार्थस्यामिततेजसः । प्रगृह्य रुचिरं बाहुं वृत्तं ताम्रतलाङ्गुलिम् ॥
gaṅgāṅkitajaṭaḥ śarvaḥ pārthasyāmitatejasaḥ | pragṛhya ruciraṃ bāhuṃ vṛttaṃ tāmratalāṅgulim
गंगा से अंकित जटाओं वाले शर्व ने अमित तेजस्वी पार्थ की सुडौल, ताँबे जैसी लाल हथेली और उँगलियों वाली सुन्दर भुजा थाम ली।