आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 40
अर्जुन को पाशुपत अस्त्र की प्राप्ति
शिव अर्जुन को बताते हैं कि पूर्वजन्म में वे नारायण के सहचर नर थे, अपने निगले हुए गाण्डीव और अक्षय तूणीर उन्हें लौटाते हैं और वर माँगने को कहते हैं। अर्जुन भयंकर पाशुपत अस्त्र, ब्रह्मशिर, माँगते हैं ताकि वे युद्ध में भीष्म, द्रोण, कृप और कर्ण का सामना कर सकें; शिव उन्हें वह अस्त्र देते हैं, यह चेतावनी देकर कि वे इसे कभी किसी दुर्बल शत्रु पर जल्दबाजी में न छोड़ें, और उसे चलाने तथा लौटाने की विधि सिखाते हैं। जब वह अस्त्र मूर्तिमान होकर अर्जुन के पास स्थित होता है तो पृथ्वी काँप उठती है; शिव उनके शरीर को निर्दोष कर देते हैं, गाण्डीव लौटाते हैं, उन्हें स्वर्ग जाने की आज्ञा देते हैं और उमा के साथ चले जाते हैं।
देवदेव उवाच
श्लोक 1 (3.40.1)
नरस्त्वं पूर्वदेहे वै नारायणसहायवान् । बदर्यां तप्तवानुग्रं तपो वर्षायुतान्बहून् ॥
narastvaṃ pūrvadehe vai nārāyaṇasahāyavān | badaryāṃ taptavānugraṃ tapo varṣāyutānbahūn
"पूर्व देह में तुम नारायण के सहचर नर थे, और बदरी में तुमने हजारों-हजारों वर्षों तक उग्र तप किया था।
श्लोक 2 (3.40.2)
त्वयि वा परमं तेजो विष्णौ वा पुरुषोत्तमे । युवाभ्यां पुरुषाग्र्याभ्यां तेजसा धार्यते जगत् ॥
tvayi vā paramaṃ tejo viṣṇau vā puruṣottame | yuvābhyāṃ puruṣāgryābhyāṃ tejasā dhāryate jagat
"परम तेज तुममें है और पुरुषोत्तम विष्णु में है। तुम दोनों श्रेष्ठ पुरुषों के तेज से ही यह जगत् धारण किया जाता है।
श्लोक 3 (3.40.3)
शक्राभिषेके सुमहद्धनुर्जलदनिःस्वनम् । प्रगृह्य दानवाः शस्तास्त्वया कृष्णेन च प्रभो ॥
śakrābhiṣeke sumahaddhanurjaladaniḥsvanam | pragṛhya dānavāḥ śastāstvayā kṛṣṇena ca prabho
"हे प्रभो, इन्द्र के अभिषेक के समय तुमने और कृष्ण ने मेघ के समान गर्जन करने वाला महान धनुष लेकर दानवों का संहार किया था।
श्लोक 4 (3.40.4)
तदेतदेव गाण्डीवं तव पार्थ करोचितम् । मायामास्थाय तद्ग्रस्तं मया पुरुषसत्तम ॥
tadetadeva gāṇḍīvaṃ tava pārtha karocitam | māyāmāsthāya tadgrastaṃ mayā puruṣasattama
"हे पार्थ, यह वही गाण्डीव है जो तुम्हारे हाथ के योग्य है, और हे पुरुषश्रेष्ठ, जिसे मैंने माया का आश्रय लेकर निगल लिया था।
श्लोक 5 (3.40.5)
तूणौ चाप्यक्षयौ भूयस्तव पार्थ करोचितौ । भविष्यति शरीरं च नीरुजं कुरुनन्दन ॥
tūṇau cāpyakṣayau bhūyastava pārtha karocitau | bhaviṣyati śarīraṃ ca nīrujaṃ kurunandana
"हे पार्थ, तुम्हारे हाथ के योग्य तुम्हारे दोनों तूणीर भी फिर से अक्षय हो जाएँगे, और हे कुरुनन्दन, तुम्हारा शरीर भी नीरोग हो जाएगा।
श्लोक 6 (3.40.6)
प्रीतिमानस्मि वै पार्थ भवान्सत्यपराक्रमः । गृहाण वरमस्मत्तः काङ्क्षितं यन्नरर्षभ ॥
prītimānasmi vai pārtha bhavānsatyaparākramaḥ | gṛhāṇa varamasmattaḥ kāṅkṣitaṃ yannararṣabha
"हे पार्थ, मैं प्रसन्न हूँ; तुम सच्चे पराक्रमी हो। हे नरश्रेष्ठ, तुम जो वर चाहते हो, वह मुझसे ले लो।
श्लोक 7 (3.40.7)
न त्वया सदृशः कश्चित्पुमान्मर्त्येषु भारत । दिवि वा वर्तते क्षत्रं त्वत्प्रधानमरिंदम ॥
na tvayā sadṛśaḥ kaścitpumānmartyeṣu bhārata | divi vā vartate kṣatraṃ tvatpradhānamariṃdama
"हे भारत, मनुष्यों में तुम्हारे समान कोई पुरुष नहीं है, और हे शत्रुदमन, स्वर्ग में भी ऐसा कोई क्षत्रिय-समाज नहीं जिसमें तुम सर्वश्रेष्ठ न हो।"
अर्जुन उवाच
श्लोक 8 (3.40.8)
वरं ददासि चेन्मह्यं कामं प्रीत्या वृषध्वज । कामये दिव्यमस्त्रं तद्घोरं पाशुपतं प्रभो ॥
varaṃ dadāsi cenmahyaṃ kāmaṃ prītyā vṛṣadhvaja | kāmaye divyamastraṃ tadghoraṃ pāśupataṃ prabho
"हे वृषध्वज, यदि आप प्रेमपूर्वक मुझे इच्छानुसार वर देते हैं, तो हे प्रभो, मैं वह भयंकर दिव्य पाशुपत अस्त्र चाहता हूँ,
श्लोक 9 (3.40.9)
यत्तद्ब्रह्मशिरो नाम रौद्रं भीमपराक्रमम् । युगान्ते दारुणे प्राप्ते कृत्स्नं संहरते जगत् ॥
yattadbrahmaśiro nāma raudraṃ bhīmaparākramam | yugānte dāruṇe prāpte kṛtsnaṃ saṃharate jagat
"जो ब्रह्मशिर नाम से प्रसिद्ध, रौद्र और भयंकर पराक्रम वाला है, और जो युगान्त का दारुण समय आने पर सारे जगत् का संहार कर देता है।
श्लोक 10 (3.40.10)
कर्णभीष्मकृपद्रोणैर्भविता तु महाहवः । त्वत्प्रसादान्महादेव जयेयं तान्यथा युधि ॥
karṇabhīṣmakṛpadroṇairbhavitā tu mahāhavaḥ | tvatprasādānmahādeva jayeyaṃ tānyathā yudhi
"कर्ण, भीष्म, कृप और द्रोण के साथ महायुद्ध होगा; हे महादेव, आपकी कृपा से मैं युद्ध में उन्हें जीत सकूँ।
श्लोक 11 (3.40.11)
जयेयं येन संग्रामे दानवान्राक्षसांस्तथा । राज्ञश्चैव पिशाचांश्च गन्धर्वानथपन्नगान् ॥
jayeyaṃ yena saṃgrāme dānavānrākṣasāṃstathā | rājñaścaiva piśācāṃśca gandharvānathapannagān
"वह अस्त्र, जिससे मैं संग्राम में दानवों, राक्षसों, राजाओं, पिशाचों, गन्धर्वों और नागों को जीत सकूँ;
श्लोक 12 (3.40.12)
यस्मिञ्शूलसहस्राणि गदाश्चोग्रप्रदर्शनाः । शराश्चाशीविषाकाराः संभवन्त्यनुमन्त्रिताः ॥
yasmiñśūlasahasrāṇi gadāścograpradarśanāḥ | śarāścāśīviṣākārāḥ saṃbhavantyanumantritāḥ
"जिसके मन्त्र से अभिमन्त्रित होने पर हजारों शूल, भयंकर दिखने वाली गदाएँ और विषैले सर्पों जैसे बाण उत्पन्न हो जाते हैं;
श्लोक 13 (3.40.13)
युध्येयं येन भीष्मेण द्रोणेन च कृपेण च । सूतपुत्रेण च रणे नित्यं कटुकभाषिणा ॥
yudhyeyaṃ yena bhīṣmeṇa droṇena ca kṛpeṇa ca | sūtaputreṇa ca raṇe nityaṃ kaṭukabhāṣiṇā
"जिससे मैं रणभूमि में भीष्म, द्रोण, कृप और सदा कटु बोलने वाले सूतपुत्र (कर्ण) से युद्ध कर सकूँ।
श्लोक 14 (3.40.14)
एष मे प्रथमः कामो भगवन्भगनेत्रहन् । त्वत्प्रसादाद्विनिर्वृत्तः समर्थः स्यामहं यथा ॥
eṣa me prathamaḥ kāmo bhagavanbhaganetrahan | tvatprasādādvinirvṛttaḥ samarthaḥ syāmahaṃ yathā
"हे भगवन्, हे भग के नेत्र नष्ट करने वाले, मेरी यही पहली कामना है कि आपकी कृपा से मैं कृतकृत्य होकर समर्थ बन जाऊँ।"
भव उवाच
श्लोक 15 (3.40.15)
ददामि तेऽस्त्रं दयितमहं पाशुपतं विभो । समर्थो धारणे मोक्षे संहारेऽपि च पाण्डव ॥
dadāmi te'straṃ dayitamahaṃ pāśupataṃ vibho | samartho dhāraṇe mokṣe saṃhāre'pi ca pāṇḍava
"हे सामर्थ्यवान, मैं तुम्हें अपना प्रिय पाशुपत अस्त्र देता हूँ। हे पाण्डव, तुम इसे धारण करने, छोड़ने और लौटाने में समर्थ हो।
श्लोक 16 (3.40.16)
न तद्वेद महेन्द्रोपि न यमो न च यक्षराट् । वरुणोप्यथवा वायुः कुतो वेत्स्यन्ति मानवाः ॥
na tadveda mahendropi na yamo na ca yakṣarāṭ | varuṇopyathavā vāyuḥ kuto vetsyanti mānavāḥ
"इसे न महेन्द्र जानते हैं, न यम, न यक्षराज कुबेर, न वरुण और न वायु; फिर मनुष्य इसे कैसे जानेंगे?
श्लोक 17 (3.40.17)
न त्वया सहसा पार्थ मोक्तव्यं पुरुषे क्वचित् । जगद्विनिर्दहेत्सर्वमल्पतेजसि पातितम् ॥
na tvayā sahasā pārtha moktavyaṃ puruṣe kvacit | jagadvinirdahetsarvamalpatejasi pātitam
"पर हे पार्थ, तुम्हें इसे कभी किसी पुरुष पर जल्दबाजी में नहीं छोड़ना चाहिए। अल्प तेज वाले पर चलाया जाने पर यह सारे जगत् को जला डालेगा।
श्लोक 18 (3.40.18)
अबध्यो नाम नास्त्यस्य त्रैलोक्ये सचराचरे । मनसा चक्षुषा वाचा धनुषा च निपात्यते ॥
abadhyo nāma nāstyasya trailokye sacarācare | manasā cakṣuṣā vācā dhanuṣā ca nipātyate
"चर-अचर सहित तीनों लोकों में ऐसा कोई नहीं जो इससे न मारा जा सके। यह मन से, दृष्टि से, वाणी से और धनुष से छोड़ा जाता है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 19 (3.40.19)
तच्छ्रुत्वा त्वरितः पार्थः शुचिर्भूत्वा समाहितः । उपसंगृह्य विश्वेशमधीष्वेत्यथ सोऽब्रवीत् ॥
tacchrutvā tvaritaḥ pārthaḥ śucirbhūtvā samāhitaḥ | upasaṃgṛhya viśveśamadhīṣvetyatha so'bravīt
यह सुनकर पार्थ ने तुरन्त पवित्र होकर, एकाग्रचित्त से विश्वेश्वर के चरण पकड़े और कहा — "मुझे सिखाइए।"
श्लोक 20 (3.40.20)
ततस्त्वध्यापयामास सरहस्यनिवर्तनम् । तदस्त्रं पाण्डवश्रेष्ठं मूर्तिमन्तमिवान्तकम् ॥
tatastvadhyāpayāmāsa sarahasyanivartanam | tadastraṃ pāṇḍavaśreṣṭhaṃ mūrtimantamivāntakam
तब उन्होंने पाण्डवश्रेष्ठ को मूर्तिमान काल के समान वह अस्त्र उसके रहस्य और उसे लौटाने की विधि सहित सिखाया।
श्लोक 21 (3.40.21)
उपतस्थे महात्मानं यथा त्र्यक्षमुमापतिम् । प्रतिजग्राह तच्चापि प्रीतिमानर्जुनस्तदा ॥
upatasthe mahātmānaṃ yathā tryakṣamumāpatim | pratijagrāha taccāpi prītimānarjunastadā
वह अस्त्र उस महात्मा की सेवा में वैसे ही उपस्थित हुआ जैसे त्रिनेत्र उमापति की सेवा में रहता है, और अर्जुन ने भी प्रसन्न होकर उसे ग्रहण किया।
श्लोक 22 (3.40.22)
ततश्चचाल पृथिवी सपर्वतवनद्रुमा । ससागरवनोद्देशा सग्रामनगराकरा ॥
tataścacāla pṛthivī saparvatavanadrumā | sasāgaravanoddeśā sagrāmanagarākarā
तब पर्वतों, वनों और वृक्षों सहित, सागरों और वनप्रदेशों सहित, गाँवों, नगरों और खानों सहित पृथ्वी काँप उठी।
श्लोक 23 (3.40.23)
शङ्खदुन्दुभिघोषाश्च भेरीणां च सहस्रशः । तस्मिन्मुहूर्ते संप्राप्ते निर्घातश्च महानभूत् ॥
śaṅkhadundubhighoṣāśca bherīṇāṃ ca sahasraśaḥ | tasminmuhūrte saṃprāpte nirghātaśca mahānabhūt
शंखों और दुन्दुभियों का तथा हजारों भेरियों का घोष होने लगा, और उसी क्षण बड़ा भारी वज्रपात जैसा शब्द हुआ।
श्लोक 24 (3.40.24)
अथास्त्रं जाज्वलद्घोरं पाण्डवस्यामितौजसः । मूर्तिमद्विष्ठितं पार्श्वे ददृशुर्देवदानवाः ॥
athāstraṃ jājvaladghoraṃ pāṇḍavasyāmitaujasaḥ | mūrtimadviṣṭhitaṃ pārśve dadṛśurdevadānavāḥ
तब देवताओं और दानवों ने अमित तेजस्वी पाण्डव के पास मूर्तिमान होकर स्थित उस प्रज्वलित, भयंकर अस्त्र को देखा।
श्लोक 25 (3.40.25)
स्पृष्टस्य त्र्यम्बकेणाथ फल्गुनस्यामितौजसः । यत्किंचिदशुभं देहे तत्सर्वं नाशमेयिवत् ॥
spṛṣṭasya tryambakeṇātha phalgunasyāmitaujasaḥ | yatkiṃcidaśubhaṃ dehe tatsarvaṃ nāśameyivat
त्र्यम्बक के स्पर्श से अमित तेजस्वी फल्गुन के शरीर में जो कुछ भी अशुभ था, वह सब नष्ट हो गया।
श्लोक 26 (3.40.26)
स्वर्गं गच्छेत्यनुज्ञातस्त्र्यम्बकेण तदाऽर्जुनः । प्रणम्य शिरसा राजन्प्राञ्जलिर्भवमैक्षत ॥
svargaṃ gacchetyanujñātastryambakeṇa tadā'rjunaḥ | praṇamya śirasā rājanprāñjalirbhavamaikṣata
"स्वर्ग जाओ" — त्र्यम्बक से ऐसी आज्ञा पाकर, हे राजन्, अर्जुन ने सिर झुकाकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर भव की ओर देखा।
श्लोक 27 (3.40.27)
ततः प्रभुस्त्रिदिवनिवासिनां वशी । महामतिर्गिरिश उमापतिः शिवः । धनुर्महद्दितिजपिशाचसूदनं । ददौ भवः पुरुषवराय गाण्डिवम् ॥
tataḥ prabhustridivanivāsināṃ vaśī | mahāmatirgiriśa umāpatiḥ śivaḥ | dhanurmahadditijapiśācasūdanaṃ | dadau bhavaḥ puruṣavarāya gāṇḍivam
तब स्वर्गवासियों के स्वामी, सबको वश में रखने वाले, महामति गिरिश, उमापति शिव भव ने उस श्रेष्ठ पुरुष को दैत्यों और पिशाचों का संहार करने वाला महान धनुष गाण्डीव दे दिया।
श्लोक 28 (3.40.28)
ततः शुभं गिरिवरमीश्वरस्तदा । सहोमयाऽसिततटसानुकन्दरम् । विहाय तं पतगमहर्षिसेवितं । जगाम स्वं पुरुषवरस्य पश्यतः ॥
tataḥ śubhaṃ girivaramīśvarastadā | sahomayā'sitataṭasānukandaram | vihāya taṃ patagamaharṣisevitaṃ | jagāma svaṃ puruṣavarasya paśyataḥ
तब भगवान ईश्वर उमा के साथ, पक्षियों और महर्षियों से सेवित, श्याम ढलानों, शिखरों और कन्दराओं वाले उस सुन्दर श्रेष्ठ पर्वत को छोड़कर उस श्रेष्ठ पुरुष के देखते-देखते अपने धाम को चले गए।