आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 41
लोकपालों द्वारा अर्जुन को दिव्यास्त्रों का दान
शिव के अन्तर्धान होने पर अर्जुन को विस्मय होता है कि उन्होंने महादेव के दर्शन किए और उनका स्पर्श किया। तब लोकपाल पर्वत पर उनके पास आते हैं — जलचरों के साथ वरुण, स्वर्णिम विमान में कुबेर, पितरों के साथ यम, और इन्द्राणी के साथ ऐरावत पर आरूढ़ इन्द्र। यम अर्जुन को बताते हैं कि वे प्राचीन ऋषि नर हैं, उन शत्रुओं की भविष्यवाणी करते हैं जिन्हें उन्हें जीतना है, और उन्हें अपना दण्ड देते हैं; वरुण अपने पाश और कुबेर अपना अन्तर्धान अस्त्र देते हैं। इन्द्र उन्हें स्वर्ग चलने के लिए तैयार होने को कहते हैं, जहाँ वे उन्हें अपने सब अस्त्र देंगे; फिर देवता लौट जाते हैं और अर्जुन कृतार्थ हो जाते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.41.1)
तस्य संपश्यतस्त्वेव पिनाकी गोवृषध्वजः । जगामादर्शनं भानुर्लोकस्येवास्तमीयिवान् ॥
tasya saṃpaśyatastveva pinākī govṛṣadhvajaḥ | jagāmādarśanaṃ bhānurlokasyevāstamīyivān
अर्जुन के देखते-देखते ही वृषभ-चिह्नित ध्वजा वाले पिनाकधारी शिव अदृश्य हो गए, जैसे संसार के देखते-देखते सूर्य अस्त हो जाता है।
श्लोक 2 (3.41.2)
ततोऽर्जुनः परं चक्रे विस्मयं परवीरहा । मया साक्षान्महादेवो दृष्ट इत्येव भारत ॥
tato'rjunaḥ paraṃ cakre vismayaṃ paravīrahā | mayā sākṣānmahādevo dṛṣṭa ityeva bhārata
तब शत्रु-वीरों का संहार करने वाले अर्जुन परम विस्मय से भर गए। हे भारत, वे सोचने लगे — "मैंने साक्षात् महादेव के दर्शन किए हैं!"
अर्जुन उवाच
श्लोक 3 (3.41.3)
धन्योस्म्यनुगृहीतोस्मि यन्मया त्र्यम्बको हरः । पिनाकी वरदो रूपी दृष्टः स्पृष्टश्च पाणिना ॥
dhanyosmyanugṛhītosmi yanmayā tryambako haraḥ | pinākī varado rūpī dṛṣṭaḥ spṛṣṭaśca pāṇinā
"मैं धन्य हूँ, मुझ पर अनुग्रह हुआ है, क्योंकि मैंने पिनाकधारी, वरदायक, त्रिनेत्र हर को साकार रूप में देखा है और अपने हाथ से उनका स्पर्श किया है।
श्लोक 4 (3.41.4)
कृतार्थं चावगच्छामि परमात्मानमात्मना । शत्रूंश्च विजितान्सर्वान्निर्वृत्तं च प्रयोजनम् ॥
kṛtārthaṃ cāvagacchāmi paramātmānamātmanā | śatrūṃśca vijitānsarvānnirvṛttaṃ ca prayojanam
अब मैं स्वयं को कृतार्थ और परम पद को प्राप्त हुआ समझता हूँ। मेरे सब शत्रु मानो जीत लिए गए और मेरा प्रयोजन पूरा हो गया।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 5 (3.41.5)
इत्येवं चिन्तयानस्य पार्थस्यामिततेजसः । ततो वैडूर्यवर्णाभो भासयन्सर्वतो दिशः । यादोगणवृतः श्रीमानाजगाम जलेश्वरः ॥
ityevaṃ cintayānasya pārthasyāmitatejasaḥ | tato vaiḍūryavarṇābho bhāsayansarvato diśaḥ | yādogaṇavṛtaḥ śrīmānājagāma jaleśvaraḥ
अमित तेजस्वी पार्थ जब इस प्रकार सोच ही रहे थे, तभी वैदूर्य मणि जैसी आभा वाले, सब दिशाओं को प्रकाशित करते हुए, जलचरों के समूहों से घिरे श्रीमान् जलेश्वर वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 6 (3.41.6)
नागैर्नदैर्नदीभिश्च दैत्यैः साध्यैर्मरुद्गणैः । वरुणो यादसांभर्ता वशी तं देशमागमत् ॥
nāgairnadairnadībhiśca daityaiḥ sādhyairmarudgaṇaiḥ | varuṇo yādasāṃbhartā vaśī taṃ deśamāgamat
जलचरों के स्वामी, जितेन्द्रिय वरुण नागों, नदों और नदियों, दैत्यों, साध्यों तथा मरुद्गणों के साथ उस स्थान पर आए।
श्लोक 7 (3.41.7)
अथ जाम्बूनदवपुर्विमानेन महार्चिषा । कुबेरः समनुप्राप्तो यक्षैरनुगतः प्रभुः ॥
atha jāmbūnadavapurvimānena mahārciṣā | kuberaḥ samanuprāpto yakṣairanugataḥ prabhuḥ
फिर स्वर्ण के समान कान्तिमान् शरीर वाले प्रभु कुबेर अत्यन्त तेजस्वी विमान पर, यक्षों से अनुगत होकर, वहाँ पहुँचे।
श्लोक 8 (3.41.8)
विद्योतयन्निवाकाशमद्भुतोपमदर्शनः । धनानामधिपः श्रीमानर्जुनं द्रष्टुमागतः ॥
vidyotayannivākāśamadbhutopamadarśanaḥ | dhanānāmadhipaḥ śrīmānarjunaṃ draṣṭumāgataḥ
मानो आकाश को आलोकित करते हुए, अद्भुत दर्शन वाले श्रीमान् धनाधिपति अर्जुन को देखने आए।
श्लोक 9 (3.41.9)
तथा लोकान्तकः श्रीमान्यमः साक्षात्प्रतापवान् । मर्त्यमूर्तिधरैः सार्धं पितृभिर्लोकभावनैः ॥
tathā lokāntakaḥ śrīmānyamaḥ sākṣātpratāpavān | martyamūrtidharaiḥ sārdhaṃ pitṛbhirlokabhāvanaiḥ
इसी प्रकार लोकों का अन्त करने वाले, प्रतापी श्रीमान् यम स्वयं, मनुष्य-रूप धारण करने वाले और लोकों का पालन करने वाले पितरों के साथ आए;
श्लोक 10 (3.41.10)
दण्डपाणिरचिन्त्यात्मा सर्वभूतविनाशकृत् । वैवस्वतो धर्मराजो विमानेनावभासयन् ॥
daṇḍapāṇiracintyātmā sarvabhūtavināśakṛt | vaivasvato dharmarājo vimānenāvabhāsayan
हाथ में दण्ड धारण करने वाले, अचिन्त्य स्वरूप, समस्त प्राणियों का विनाश करने वाले वैवस्वत धर्मराज अपने विमान से प्रकाशित करते हुए —
श्लोक 11 (3.41.11)
त्रील्लोकान्गुह्यकांश्चैव गन्धर्वाश्चैव पन्नगान् । द्वितीय इव मार्ताण्डो युगान्ते समुपस्थिते ॥
trīllokānguhyakāṃścaiva gandharvāścaiva pannagān | dvitīya iva mārtāṇḍo yugānte samupasthite
तीनों लोकों, गुह्यकों, गन्धर्वों और नागों को — युगान्त के समय उदित हुए दूसरे सूर्य के समान वहाँ आए।
श्लोक 12 (3.41.12)
भानुमन्ति विचित्राणि शिखराणि महागिरेः । समास्थायार्जुनं तत्र ददृशुस्तपसान्वितम् ॥
bhānumanti vicitrāṇi śikharāṇi mahāgireḥ | samāsthāyārjunaṃ tatra dadṛśustapasānvitam
उस महान पर्वत के चमकते हुए, विचित्र शिखरों पर स्थित होकर उन्होंने वहाँ तपस्या से युक्त अर्जुन को देखा।
श्लोक 13 (3.41.13)
ततो मुहूर्ताद्भगवानैरावतशिरोगतः । आजगाम सहेन्द्राण्या शक्रः सुरगणैर्वृतः ॥
tato muhūrtādbhagavānairāvataśirogataḥ | ājagāma sahendrāṇyā śakraḥ suragaṇairvṛtaḥ
फिर क्षण भर में भगवान् इन्द्र ऐरावत के मस्तक पर आरूढ़ होकर, इन्द्राणी के साथ, देवगणों से घिरे हुए वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 14 (3.41.14)
पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रियमाणेन मूर्धनि । शुशुभे नागराजस्थः सितमभ्रमिव स्थितः ॥
pāṇḍureṇātapatreṇa dhriyamāṇena mūrdhani | śuśubhe nāgarājasthaḥ sitamabhramiva sthitaḥ
सिर पर तने हुए श्वेत छत्र के साथ गजराज पर स्थित वे श्वेत मेघ के समान शोभा पा रहे थे।
श्लोक 15 (3.41.15)
संस्तूयमानो गन्धर्वैर्ऋषिभिश्च तपोधनैः । शृङ्गं गिरेः समासाद्य तस्थौ सूर्य इवोदितः ॥
saṃstūyamāno gandharvairṛṣibhiśca tapodhanaiḥ | śṛṅgaṃ gireḥ samāsādya tasthau sūrya ivoditaḥ
गन्धर्वों और तपोधन ऋषियों से स्तुति पाते हुए वे पर्वत के एक शिखर पर पहुँचकर उदित सूर्य के समान स्थित हो गए।
श्लोक 16 (3.41.16)
अथ मेघस्वनो धीमान्व्याजहार शुभां गिरम् । यमः परमधर्मज्ञो दक्षिणां दिशमास्थितः ॥
atha meghasvano dhīmānvyājahāra śubhāṃ giram | yamaḥ paramadharmajño dakṣiṇāṃ diśamāsthitaḥ
तब मेघ के समान गम्भीर स्वर वाले, परम धर्मज्ञ, बुद्धिमान् यम ने दक्षिण दिशा में स्थित होकर ये शुभ वचन कहे —
यम उवाच
श्लोक 17 (3.41.17)
अर्जुनार्जुन पश्यास्माँल्लोकपालान्समागतान् । दृष्टिं ते वितरामोऽद्य भवानर्हति दर्शनम् ॥
arjunārjuna paśyāsmām̐llokapālānsamāgatān | dṛṣṭiṃ te vitarāmo'dya bhavānarhati darśanam
"अर्जुन! अर्जुन! हम लोकपालों को देखो, जो यहाँ एकत्र हुए हैं। आज हम तुम्हें दिव्य दृष्टि देते हैं, क्योंकि तुम हमारे दर्शन के योग्य हो।
श्लोक 18 (3.41.18)
पूर्वर्षिरमितात्मा त्वं नरो नाम महाबलः । नियोगाद्ब्रह्मणस्तात मर्त्यतां समुपागतः ॥
pūrvarṣiramitātmā tvaṃ naro nāma mahābalaḥ | niyogādbrahmaṇastāta martyatāṃ samupāgataḥ
तुम अपरिमित आत्मबल वाले, नर नामक महाबली प्राचीन ऋषि हो। वत्स, ब्रह्मा की आज्ञा से तुमने मनुष्य-भाव ग्रहण किया है।
श्लोक 19 (3.41.19)
त्वया च वसुसंभूतो महावीर्यः पितामहः । भीष्मः परमधर्मात्मा जेतव्यश्च रणेऽनघ ॥
tvayā ca vasusaṃbhūto mahāvīryaḥ pitāmahaḥ | bhīṣmaḥ paramadharmātmā jetavyaśca raṇe'nagha
हे निष्पाप, वसुओं से उत्पन्न, महापराक्रमी, परम धर्मात्मा पितामह भीष्म को तुम्हें युद्ध में जीतना है।
श्लोक 20 (3.41.20)
क्षत्रं चाग्निसमस्पर्शं भारद्वाजेन रक्षितम् । निवातकवचाश्चैव संसाध्याः कुरुनन्दन ॥
kṣatraṃ cāgnisamasparśaṃ bhāradvājena rakṣitam | nivātakavacāścaiva saṃsādhyāḥ kurunandana
हे कुरुनन्दन, भारद्वाज-पुत्र द्रोण द्वारा रक्षित, अग्नि के समान दाहक क्षत्रिय-सेना और निवातकवच भी तुम्हें ही जीतने हैं।
श्लोक 21 (3.41.21)
पितुर्ममांशो देवस्य सर्वलोकप्रतापिनः । कर्णश्च सुमहावीर्यस्त्वया वध्यो धनंजय ॥
piturmamāṃśo devasya sarvalokapratāpinaḥ | karṇaśca sumahāvīryastvayā vadhyo dhanaṃjaya
और हे धनंजय, सब लोकों को तपाने वाले मेरे पिता सूर्यदेव का अंश, महापराक्रमी कर्ण भी तुम्हारे हाथों मारा जाना है।
श्लोक 22 (3.41.22)
अंशाश्च क्षितिसंप्राप्ता देवगन्धर्वरक्षसाम् । त्वया निपातिता युद्धे स्वकर्मफलनिर्जिताम् । गतिं प्राप्स्यन्ति कौन्तेय यथास्वमरिकर्शन ॥
aṃśāśca kṣitisaṃprāptā devagandharvarakṣasām | tvayā nipātitā yuddhe svakarmaphalanirjitām | gatiṃ prāpsyanti kaunteya yathāsvamarikarśana
हे शत्रुसूदन कुन्तीपुत्र, देवताओं, गन्धर्वों और राक्षसों के जो अंश पृथ्वी पर आए हैं, वे युद्ध में तुम्हारे हाथों मारे जाकर अपने-अपने कर्मफल से अर्जित गति को यथायोग्य प्राप्त होंगे।
श्लोक 23 (3.41.23)
अक्षया तव कीर्तिश्च लोके स्थास्यति फल्गुन । त्वया साक्षान्महादेवस्तोषितो हि महामृधे ॥
akṣayā tava kīrtiśca loke sthāsyati phalguna | tvayā sākṣānmahādevastoṣito hi mahāmṛdhe
हे फाल्गुन, संसार में तुम्हारी कीर्ति अक्षय रहेगी, क्योंकि तुमने महायुद्ध में साक्षात् महादेव को सन्तुष्ट किया है।
श्लोक 24 (3.41.24)
लघ्वी वसुमती चापि कर्तव्या विष्णुना सह ॥
laghvī vasumatī cāpi kartavyā viṣṇunā saha
और विष्णु के साथ मिलकर तुम्हें पृथ्वी का भार हल्का करना है।
श्लोक 25 (3.41.25)
गृहाणास्त्रं महाबाहो दण्डमप्रतिवारणम् । अनेनास्त्रेण सुमहत्त्वं हि कर्म करिष्यसि ॥
gṛhāṇāstraṃ mahābāho daṇḍamaprativāraṇam | anenāstreṇa sumahattvaṃ hi karma kariṣyasi
हे महाबाहो, यह अस्त्र — मेरा अनिवार्य दण्ड — ग्रहण करो। इस अस्त्र से तुम अत्यन्त महान कर्म करोगे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 26 (3.41.26)
प्रतिजग्राह पार्थोपि विधिवत्कुरुनन्दनः । समन्त्रं सोपरोधं च समोक्षविनिवर्तनम् ॥
pratijagrāha pārthopi vidhivatkurunandanaḥ | samantraṃ soparodhaṃ ca samokṣavinivartanam
कुरुनन्दन पार्थ ने भी उसे मन्त्रों सहित, उसे रोकने की विधि सहित, और छोड़ने तथा लौटाने की विधि सहित विधिपूर्वक ग्रहण किया।
श्लोक 27 (3.41.27)
ततो जलधरश्यामो वरुणो यादसांपतिः । पश्चिमां दिशमास्थाय गिरमुच्चारयन्प्रभुः ॥
tato jaladharaśyāmo varuṇo yādasāṃpatiḥ | paścimāṃ diśamāsthāya giramuccārayanprabhuḥ
तब मेघ के समान श्याम वर्ण वाले, जलचरों के स्वामी प्रभु वरुण पश्चिम दिशा में स्थित होकर बोले —
वरुण उवाच
श्लोक 28 (3.41.28)
पार्थ क्षत्रियमुख्यस्त्वं क्षत्रधर्मे व्यवस्थितः । पश्य मां पृथुताम्राक्ष वरुणोस्मि जलेश्वरः ॥
pārtha kṣatriyamukhyastvaṃ kṣatradharme vyavasthitaḥ | paśya māṃ pṛthutāmrākṣa varuṇosmi jaleśvaraḥ
"पार्थ, तुम क्षत्रियों में प्रमुख हो और क्षत्रिय-धर्म में दृढ़ स्थित हो। हे विशाल, ताम्रवर्ण नेत्रों वाले, मेरी ओर देखो — मैं जलों का स्वामी वरुण हूँ।
श्लोक 29 (3.41.29)
मया समुद्यतान्पाशान्वारुणाननिवारितान् । प्रतिगृह्णीष्व कौन्तेय सहरहस्यनिवर्तनान् ॥
mayā samudyatānpāśānvāruṇānanivāritān | pratigṛhṇīṣva kaunteya saharahasyanivartanān
हे कुन्तीनन्दन, मेरे द्वारा उठाए गए, किसी से न रोके जा सकने वाले ये वारुण पाश उनके रहस्य और लौटाने की विधि सहित ग्रहण करो।
श्लोक 30 (3.41.30)
एभिस्तदा मया वीर संग्रामे तारकामये । दैतेयानां सहस्राणि संयतानि महात्मनाम् ॥
ebhistadā mayā vīra saṃgrāme tārakāmaye | daiteyānāṃ sahasrāṇi saṃyatāni mahātmanām
वीर, इन्हीं से मैंने पूर्वकाल में तारकामय संग्राम में सहस्रों महाबली दैत्यों को बाँध लिया था।
श्लोक 31 (3.41.31)
तस्मादिमान्महासत्व मत्प्रसादसमुत्थितान् । गृहाण न हि ते मुच्येदन्तकोप्याततायिनः ॥
tasmādimānmahāsatva matprasādasamutthitān | gṛhāṇa na hi te mucyedantakopyātatāyinaḥ
इसलिए हे महाबली, मेरी कृपा से प्रकट हुए इन पाशों को ग्रहण करो। इनके रहते यदि स्वयं यमराज भी तुम पर आक्रमण करें तो तुमसे छूट नहीं सकेंगे।
श्लोक 32 (3.41.32)
अनेन त्वं यदाऽस्त्रेण संग्रामे विचरिष्यसि । तदा निःक्षत्रिया भूमिर्भविष्यति न संशयः ॥
anena tvaṃ yadā'streṇa saṃgrāme vicariṣyasi | tadā niḥkṣatriyā bhūmirbhaviṣyati na saṃśayaḥ
जब तुम इस अस्त्र के साथ संग्राम में विचरोगे, तब पृथ्वी क्षत्रियों से रहित हो जाएगी — इसमें कोई सन्देह नहीं।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 33 (3.41.33)
ततस्तान्वारुणानस्त्रान्दिव्यानस्त्रविदां वरः । प्रतिजग्राह विधिवद्वरुणाद्वासविस्तदा ॥
tatastānvāruṇānastrāndivyānastravidāṃ varaḥ | pratijagrāha vidhivadvaruṇādvāsavistadā
तब अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ इन्द्रपुत्र अर्जुन ने वरुण से वे दिव्य वारुण अस्त्र विधिपूर्वक ग्रहण किए।
श्लोक 34 (3.41.34)
ततः कैलासनिलयो धनाध्यक्षोऽभ्यभाषत । दत्तेष्वस्त्रेषु दिव्येषु वरुणेन यमेन च ॥
tataḥ kailāsanilayo dhanādhyakṣo'bhyabhāṣata | datteṣvastreṣu divyeṣu varuṇena yamena ca
वरुण और यम द्वारा दिव्य अस्त्र दे दिए जाने पर कैलासवासी धनाध्यक्ष कुबेर बोले —
कुबेर उवाच
श्लोक 35 (3.41.35)
प्रीतोऽहमपि ते प्राज्ञ पाण्डवेय महाबल । त्वया सह समागम्य अजितेन तथैव च ॥
prīto'hamapi te prājña pāṇḍaveya mahābala | tvayā saha samāgamya ajitena tathaiva ca
"हे बुद्धिमान्, महाबली पाण्डुनन्दन, तुमसे मिलकर मैं भी उसी प्रकार प्रसन्न हूँ जैसे अजित श्रीकृष्ण से मिलकर।
श्लोक 36 (3.41.36)
सव्यसाचिन्महाबाहो पूर्वदेव सनातन । सहास्माभिर्भवाञ्श्रान्तः पुराकल्पेषु नित्यशः ॥
savyasācinmahābāho pūrvadeva sanātana | sahāsmābhirbhavāñśrāntaḥ purākalpeṣu nityaśaḥ
हे सव्यसाची, महाबाहो, सनातन पूर्वदेव! पूर्वकल्पों में तुमने सदा हमारे साथ परिश्रम किया है।
श्लोक 37 (3.41.37)
दर्शनं ते त्विदं दिव्यं प्रदिशामि नरर्षभ । अमानुषान्महाबाहो दुर्जयानपि जेष्यसि ॥
darśanaṃ te tvidaṃ divyaṃ pradiśāmi nararṣabha | amānuṣānmahābāho durjayānapi jeṣyasi
हे नरश्रेष्ठ, मैं तुम्हें यह दिव्य दृष्टि देता हूँ। हे महाबाहो, इससे तुम दुर्जय अमानुष प्राणियों को भी जीत लोगे।
श्लोक 38 (3.41.38)
मत्तश्चैव भवानाशु गृह्णात्वस्त्रमनुत्तमम् । अनेन त्वमनीकानि धार्तराष्ट्रस्य धक्ष्यसि ॥
mattaścaiva bhavānāśu gṛhṇātvastramanuttamam | anena tvamanīkāni dhārtarāṣṭrasya dhakṣyasi
मुझसे भी तुम शीघ्र एक अनुपम अस्त्र ग्रहण करो। इससे तुम धृतराष्ट्र-पुत्र की सेनाओं को भस्म कर दोगे।
श्लोक 39 (3.41.39)
मत्तोऽपि त्वं गृहाणास्त्रमन्तर्धानं प्रियं मम । ओजस्तेजोद्युतिकरं प्रस्वापनमरातिनुत् ॥
matto'pi tvaṃ gṛhāṇāstramantardhānaṃ priyaṃ mama | ojastejodyutikaraṃ prasvāpanamarātinut
मुझसे मेरा प्रिय अन्तर्धान नामक अस्त्र भी ग्रहण करो, जो ओज, तेज और कान्ति देने वाला, शत्रु को सुला देने वाला और वैरियों को भगा देने वाला है।
श्लोक 40 (3.41.40)
महात्मना शंकरेण त्रिपुरं निहतं यदा । तदैतदस्त्रं निर्मुक्तं येन दग्धा महासुराः ॥
mahātmanā śaṃkareṇa tripuraṃ nihataṃ yadā | tadaitadastraṃ nirmuktaṃ yena dagdhā mahāsurāḥ
जब महात्मा शंकर ने त्रिपुर का विनाश किया था, तब उन्होंने यही अस्त्र छोड़ा था, जिससे बड़े-बड़े असुर भस्म हो गए थे।
श्लोक 41 (3.41.41)
त्वदर्थमुद्यतं चेदं मया सत्यपराक्रम । त्वमर्हो धारणे चास्य मेरुप्रतिमगौरव ॥
tvadarthamudyataṃ cedaṃ mayā satyaparākrama | tvamarho dhāraṇe cāsya merupratimagaurava
हे सत्यपराक्रमी, मैंने इसे तुम्हारे लिए ही प्रस्तुत किया है। हे मेरु पर्वत के समान गौरवशाली, तुम इसे धारण करने के योग्य हो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 42 (3.41.42)
ततोऽर्जुनो महाबाहुर्विधिवत्कुरुनन्दनः । कौबेरमधिजग्राह दिव्यमस्त्रं महाबलः ॥
tato'rjuno mahābāhurvidhivatkurunandanaḥ | kauberamadhijagrāha divyamastraṃ mahābalaḥ
तब महाबली, महाबाहु कुरुनन्दन अर्जुन ने कुबेर का दिव्य अस्त्र विधिपूर्वक ग्रहण किया।
श्लोक 43 (3.41.43)
ततोऽब्रवीद्देवराजः पार्थमक्लिष्टकारिणम् । सान्त्वयञ्श्लक्ष्णया वाचा दिव्यदुन्दुभिनिःस्वनः ॥
tato'bravīddevarājaḥ pārthamakliṣṭakāriṇam | sāntvayañślakṣṇayā vācā divyadundubhiniḥsvanaḥ
तब दिव्य दुन्दुभि के समान स्वर वाले देवराज इन्द्र अनायास महान कर्म करने वाले पार्थ को मधुर वाणी से सान्त्वना देते हुए बोले —
इन्द्र उवाच
श्लोक 44 (3.41.44)
कुन्तीमातर्महाबाहो त्वमीशानः पुरातनः । परां सिद्धिमनुप्राप्तः साक्षाद्देवगतिं गतः ॥
kuntīmātarmahābāho tvamīśānaḥ purātanaḥ | parāṃ siddhimanuprāptaḥ sākṣāddevagatiṃ gataḥ
"हे कुन्तीनन्दन महाबाहो, तुम प्राचीन ईश्वर हो। तुमने परम सिद्धि पा ली है और साक्षात् देवगति प्राप्त कर ली है।
श्लोक 45 (3.41.45)
देवकार्यं तु सुमहत्त्वया कार्यमरिंदम । आरोढव्यस्त्वया स्वर्गः सज्जीभव महाद्युते ॥
devakāryaṃ tu sumahattvayā kāryamariṃdama | āroḍhavyastvayā svargaḥ sajjībhava mahādyute
परन्तु हे शत्रुदमन, देवताओं का एक बहुत बड़ा कार्य तुम्हें करना है। तुम्हें स्वर्ग चलना है; हे महातेजस्वी, तैयार हो जाओ।
श्लोक 46 (3.41.46)
रथो मातलिसंयुक्त आगतस्त्वत्कृते मम । तत्र तेऽहं प्रदास्यामि सर्वाण्यस्त्राणि कौरव ॥
ratho mātalisaṃyukta āgatastvatkṛte mama | tatra te'haṃ pradāsyāmi sarvāṇyastrāṇi kaurava
मातलि द्वारा जोता गया मेरा रथ तुम्हारे लिए आया है। हे कुरुनन्दन, वहाँ मैं तुम्हें सब अस्त्र दूँगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 47 (3.41.47)
तान्दृष्ट्वा लोकपालांस्तु समेतान्गिरिमूर्धनि । जगाम विस्मयं धीमान्कुन्तीपुत्रो धनंजयः ॥
tāndṛṣṭvā lokapālāṃstu sametāngirimūrdhani | jagāma vismayaṃ dhīmānkuntīputro dhanaṃjayaḥ
पर्वत के शिखर पर एकत्र उन लोकपालों को देखकर बुद्धिमान् कुन्तीपुत्र धनंजय विस्मित हो गए।
श्लोक 48 (3.41.48)
ततोऽर्जुनो महातेजा लोकपालान्समागतान् । पूजयामास विधिवद्वाग्भिरद्भिः फलैरपि ॥
tato'rjuno mahātejā lokapālānsamāgatān | pūjayāmāsa vidhivadvāgbhiradbhiḥ phalairapi
तब महातेजस्वी अर्जुन ने वहाँ आए लोकपालों का वाणी, जल और फलों से विधिपूर्वक पूजन किया।
श्लोक 49 (3.41.49)
ततः प्रतिययुर्देवाः प्रतिपूज्य धनंजयम् । यथागतेन विबुधाः सर्वे कामं मनोजवाः ॥
tataḥ pratiyayurdevāḥ pratipūjya dhanaṃjayam | yathāgatena vibudhāḥ sarve kāmaṃ manojavāḥ
तब मन के समान वेग वाले सब देवता बदले में धनंजय का सम्मान करके अपनी इच्छा से जैसे आए थे वैसे ही लौट गए।
श्लोक 50 (3.41.50)
ततोऽर्जुनो मुदं लेभे लब्धास्त्रः पुरुषर्षभः । कृतार्थमथ चात्मानं स मेने पूर्णमानसम् ॥
tato'rjuno mudaṃ lebhe labdhāstraḥ puruṣarṣabhaḥ | kṛtārthamatha cātmānaṃ sa mene pūrṇamānasam
तब अस्त्र पाकर पुरुषश्रेष्ठ अर्जुन आनन्दित हुए और उन्होंने स्वयं को कृतार्थ तथा पूर्णमनोरथ माना।