Skip to main content

आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 42

अर्जुन का स्वर्गारोहण

लोकपालों के चले जाने पर मातलि द्वारा चलाया जाता हुआ, दिव्य अस्त्रों से भरा और दस हज़ार घोड़ों से खींचा जाने वाला इन्द्र का रथ आ पहुँचता है। मातलि अर्जुन को रथ पर चढ़ने को कहते हैं; अर्जुन पहले उन्हें अपने स्थान पर बैठने को कहते हैं, फिर गंगा में स्नान करके पितरों का तर्पण करते हैं और प्रेमपूर्वक मन्दर पर्वत से विदा लेते हैं। आकाश में ऊपर उठते हुए वे पुण्यात्माओं के स्वयंप्रकाशित लोक देखते हैं, जिनके विषय में मातलि बताते हैं कि पृथ्वी से वे ही तारे दिखते हैं; फिर द्वार पर ऐरावत को देखते हुए वे अन्त में इन्द्र की नगरी अमरावती के दर्शन करते हैं।

अध्याय 41अध्याय-सूचीअध्याय 43

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.42.1)

गतेषु लोकपालेषु पार्थः शत्रुनिबर्हणः । चिन्तयामास राजेन्द्र देवराजरथागमम् ॥

gateṣu lokapāleṣu pārthaḥ śatrunibarhaṇaḥ | cintayāmāsa rājendra devarājarathāgamam

हे राजेन्द्र, लोकपालों के चले जाने पर शत्रुनाशक पार्थ देवराज इन्द्र के रथ के आगमन के विषय में सोचने लगे।

श्लोक 2 (3.42.2)

तस्य चिन्तयमानस्य गुडाकेशस्य धीमतः । रथो मातलिसंयुक्त आजगाम महाप्रभः ॥

tasya cintayamānasya guḍākeśasya dhīmataḥ | ratho mātalisaṃyukta ājagāma mahāprabhaḥ

बुद्धिमान् गुडाकेश अर्जुन इस प्रकार सोच ही रहे थे कि मातलि से युक्त, महान प्रभा वाला रथ आ पहुँचा,

श्लोक 3 (3.42.3)

नभो वितिमिरं कुर्वञ्जलदान्पाटयन्निव । दिशः संपूरयन्नादैर्महामेघरवोपमैः ॥

nabho vitimiraṃ kurvañjaladānpāṭayanniva | diśaḥ saṃpūrayannādairmahāmegharavopamaiḥ

जो आकाश को अन्धकार से रहित करता हुआ, मानो बादलों को चीरता हुआ और महामेघों की गर्जना जैसे नाद से दिशाओं को भरता हुआ आया।

श्लोक 4 (3.42.4)

असयः शक्तयो भीमा गदाश्चोग्रप्रदर्शनाः । दिव्यप्रभावाः प्रासाश्च विद्युतश्च महाप्रभाः ॥

asayaḥ śaktayo bhīmā gadāścograpradarśanāḥ | divyaprabhāvāḥ prāsāśca vidyutaśca mahāprabhāḥ

उसमें तलवारें, भयंकर शक्तियाँ, देखने में उग्र गदाएँ, दिव्य प्रभाव वाले प्रास और अत्यन्त चमकीली विद्युत् थीं;

श्लोक 5 (3.42.5)

तथैवाशनयश्चैव चक्रयुक्तास्तुलागुडाः । वायुस्फोटाः सनिर्घाताः शङ्खमेघस्वनास्तथा ॥

tathaivāśanayaścaiva cakrayuktāstulāguḍāḥ | vāyusphoṭāḥ sanirghātāḥ śaṅkhameghasvanāstathā

वैसे ही वज्र, पहियों वाले तुलागुड (गोले फेंकने वाले यन्त्र), और वेग से आँधी उठाने वाले, वज्रपात की कड़क से युक्त, शंख और मेघ जैसी ध्वनि करने वाले अस्त्र भी थे।

श्लोक 6 (3.42.6)

तत्र नागा महाकाया ज्वलितास्याः सुदारुणाः । सिताभ्रकूटप्रतिमाः संहताश्च यथोपलाः ॥

tatra nāgā mahākāyā jvalitāsyāḥ sudāruṇāḥ | sitābhrakūṭapratimāḥ saṃhatāśca yathopalāḥ

उसमें विशाल शरीर वाले, जलते मुखों वाले, अत्यन्त भयानक नाग थे, जो श्वेत मेघों के ढेर के समान और पत्थर की तरह ठोस थे।

श्लोक 7 (3.42.7)

दशवाजिसहस्राणि हरीणां वातरंहसाम् । वहन्ति यं नेत्रमुषं दिव्यं मायामयं रथम् ॥

daśavājisahasrāṇi harīṇāṃ vātaraṃhasām | vahanti yaṃ netramuṣaṃ divyaṃ māyāmayaṃ ratham

वायु के समान वेगवान् दस हज़ार हरित-पीत घोड़े उस दिव्य, मायामय रथ को खींचते हैं, जो देखने वालों की आँखें चौंधिया देता है।

श्लोक 8 (3.42.8)

तत्रापश्यन्महानीलं वैजयन्तं महाप्रभम् । ध्वजमिन्दीवरश्यामं वंशं कनकभूषणम् ॥

tatrāpaśyanmahānīlaṃ vaijayantaṃ mahāprabham | dhvajamindīvaraśyāmaṃ vaṃśaṃ kanakabhūṣaṇam

उस पर उन्होंने गहरे नीले रंग की, अत्यन्त प्रभावान्, नीलकमल के समान श्याम वैजयन्ती ध्वजा देखी, जिसका दण्ड स्वर्ण से अलंकृत था।

श्लोक 9 (3.42.9)

तस्मिन्रथे स्थितं सूतं तप्तहेमविभूषितम् । दृष्ट्वा पार्थो महाबाहुर्देवराजमतर्कयत् ॥

tasminrathe sthitaṃ sūtaṃ taptahemavibhūṣitam | dṛṣṭvā pārtho mahābāhurdevarājamatarkayat

उस रथ पर तपाए हुए सोने के आभूषणों से विभूषित सारथि को खड़ा देखकर महाबाहु पार्थ ने अनुमान किया कि ये देवराज हैं।

श्लोक 10 (3.42.10)

तथा तर्कयतस्तस्य फल्गुनस्याथ मातलिः । सन्नतः प्रस्थितो भूत्वा वाक्यमर्जुनमब्रवीत् ॥

tathā tarkayatastasya phalgunasyātha mātaliḥ | sannataḥ prasthito bhūtvā vākyamarjunamabravīt

फाल्गुन इस प्रकार अनुमान कर ही रहे थे कि मातलि ने विनम्रता से झुककर, आगे बढ़कर अर्जुन से यह वचन कहा —

मातलिरुवाच

श्लोक 11 (3.42.11)

भोभो शक्रात्मज श्रीमञ्शक्रस्त्वां द्रष्टुमिच्छति । आरोहतु भवाञ्शीघ्रं रथमिन्द्रस्य संमतम् ॥

bhobho śakrātmaja śrīmañśakrastvāṃ draṣṭumicchati | ārohatu bhavāñśīghraṃ rathamindrasya saṃmatam

"हे श्रीमान् इन्द्रपुत्र! इन्द्र तुम्हें देखना चाहते हैं। आप शीघ्र इन्द्र के इस प्रिय रथ पर आरूढ़ हों।

श्लोक 12 (3.42.12)

आह माममरश्रेष्ठः पिता तव शतक्रतुः । कुन्तीसुतमिह प्राप्तं पश्यन्तु त्रिदशालयाः ॥

āha māmamaraśreṣṭhaḥ pitā tava śatakratuḥ | kuntīsutamiha prāptaṃ paśyantu tridaśālayāḥ

देवश्रेष्ठ, तुम्हारे पिता शतक्रतु इन्द्र ने मुझसे कहा है — "स्वर्गवासी देवता यहाँ आए कुन्तीपुत्र को देखें।"

श्लोक 13 (3.42.13)

एष शक्रः परिवृतो देवैर्ऋषिगणैस्तथा । गन्धर्वैरप्सरोभिश्च त्वां दिदृक्षुः प्रतीक्षते ॥

eṣa śakraḥ parivṛto devairṛṣigaṇaistathā | gandharvairapsarobhiśca tvāṃ didṛkṣuḥ pratīkṣate

देखो, देवताओं, ऋषिगणों, गन्धर्वों और अप्सराओं से घिरे इन्द्र तुम्हें देखने की इच्छा से प्रतीक्षा कर रहे हैं।

श्लोक 14 (3.42.14)

अस्माल्लोकाद्देवलोकं पाकशासनशासनात् । आरोह त्वं मया सार्धं लब्धास्त्रः पुनरेष्यसि ॥

asmāllokāddevalokaṃ pākaśāsanaśāsanāt | āroha tvaṃ mayā sārdhaṃ labdhāstraḥ punareṣyasi

पाकशासन इन्द्र की आज्ञा से मेरे साथ इस लोक से देवलोक को चलो। अस्त्र प्राप्त करके तुम फिर लौट आओगे।"

अर्जुन उवाच

श्लोक 15 (3.42.15)

मातले गच्छ शीघ्रं त्वमारोहस्व रथोत्तमम् । राजसूयाश्वमेधानां शतैरपि सुदुर्लभम् ॥

mātale gaccha śīghraṃ tvamārohasva rathottamam | rājasūyāśvamedhānāṃ śatairapi sudurlabham

"मातले, तुम शीघ्र जाओ और पहले इस उत्तम रथ पर चढ़ो, जो सैकड़ों राजसूय और अश्वमेध यज्ञों से भी अत्यन्त दुर्लभ है,

श्लोक 16 (3.42.16)

पार्थिवैः सुमहाभागैर्यज्वभिर्भूरिदक्षिणैः । दैवतैर्वा दुरारोहं दानवैर्वा रथोत्तमम् ॥

pārthivaiḥ sumahābhāgairyajvabhirbhūridakṣiṇaiḥ | daivatairvā durārohaṃ dānavairvā rathottamam

और जिस श्रेष्ठ रथ पर बहुत दक्षिणा देने वाले, यज्ञ करने वाले महाभाग राजाओं के लिए, तथा देवताओं और दानवों के लिए भी चढ़ना कठिन है।

श्लोक 17 (3.42.17)

नातप्ततपसा शक्य एष दिव्यो महारथः । द्रष्टुं वाऽप्यथवा स्प्रष्टुमारोढुं कुत एव च ॥

nātaptatapasā śakya eṣa divyo mahārathaḥ | draṣṭuṃ vā'pyathavā spraṣṭumāroḍhuṃ kuta eva ca

जिसने तप नहीं किया, वह इस दिव्य महारथ को देख या छू भी नहीं सकता, फिर उस पर चढ़ने की तो बात ही क्या!

श्लोक 18 (3.42.18)

त्वयि प्रतिष्ठिते साधो रथस्थे स्थिरवाजिनि । पश्चादहमथारोक्ष्ये सुकृती सत्पथं यथा ॥

tvayi pratiṣṭhite sādho rathasthe sthiravājini | paścādahamathārokṣye sukṛtī satpathaṃ yathā

हे साधु, जब तुम रथ पर स्थित हो जाओगे और घोड़े स्थिर हो जाएँगे, तब मैं तुम्हारे पीछे उस पर ऐसे चढ़ूँगा जैसे कोई पुण्यात्मा सन्मार्ग पर चढ़ता है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 19 (3.42.19)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा मातलिः शक्रसारथिः । आरुरोह रथं शीघ्रं हयाञ्जग्राह रश्मिभिः ॥

tasya tadvacanaṃ śrutvā mātaliḥ śakrasārathiḥ | āruroha rathaṃ śīghraṃ hayāñjagrāha raśmibhiḥ

उनकी यह बात सुनकर इन्द्र के सारथि मातलि शीघ्र रथ पर चढ़ गए और उन्होंने लगामों से घोड़ों को साध लिया।

श्लोक 20 (3.42.20)

ततोऽर्जुनो हृष्टमना गङ्गायामाप्लुतः शुचिः । जजाप जप्यं कौन्तेयो विधिवत्कुरुनन्दनः ॥

tato'rjuno hṛṣṭamanā gaṅgāyāmāplutaḥ śuciḥ | jajāpa japyaṃ kaunteyo vidhivatkurunandanaḥ

तब प्रसन्नचित्त कुन्तीपुत्र कुरुनन्दन अर्जुन ने गंगा में स्नान किया और पवित्र होकर विधिपूर्वक जप किया।

श्लोक 21 (3.42.21)

ततः पितृन्यथान्यायं तर्पयित्वा यथाविधि । मन्दरं शैलराजं तमाप्रष्टुमुपचक्रमे ॥

tataḥ pitṛnyathānyāyaṃ tarpayitvā yathāvidhi | mandaraṃ śailarājaṃ tamāpraṣṭumupacakrame

फिर पितरों का यथोचित रीति से विधिपूर्वक तर्पण करके वे पर्वतराज मन्दर से विदा लेने लगे —

अर्जुन उवाच

श्लोक 22 (3.42.22)

साधूनां पुण्यशीलानां मुनीनां पुण्यकर्मणाम् । त्वं सदा संश्रयः शैल स्वर्गमार्गाभिकाङ्क्षिणाम् ॥

sādhūnāṃ puṇyaśīlānāṃ munīnāṃ puṇyakarmaṇām | tvaṃ sadā saṃśrayaḥ śaila svargamārgābhikāṅkṣiṇām

"हे पर्वत, तुम सदा साधुओं, पुण्यशील जनों और स्वर्ग का मार्ग चाहने वाले पुण्यकर्मा मुनियों के आश्रय हो।

श्लोक 23 (3.42.23)

त्वत्प्रसादात्सदा शैल ब्राह्मणाः क्षत्रिया विशः । स्वर्गं प्राप्ताश्चरन्ति स्म देवैः सह गतव्यथाः ॥

tvatprasādātsadā śaila brāhmaṇāḥ kṣatriyā viśaḥ | svargaṃ prāptāścaranti sma devaiḥ saha gatavyathāḥ

हे शैल, तुम्हारी कृपा से ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य सदा स्वर्ग पाकर, दुःख से मुक्त होकर देवताओं के साथ विचरते रहे हैं।

श्लोक 24 (3.42.24)

अद्रिराज महाशैल मुनिसंश्रय तीर्थवन् । गच्छाम्यामन्त्रयित्वा त्वां सुखमस्म्युषितस्त्वयि ॥

adrirāja mahāśaila munisaṃśraya tīrthavan | gacchāmyāmantrayitvā tvāṃ sukhamasmyuṣitastvayi

हे पर्वतराज, हे महाशैल, हे मुनियों के आश्रय, हे तीर्थों से सम्पन्न! मैं तुमसे विदा लेकर जा रहा हूँ। मैं तुम पर सुखपूर्वक रहा हूँ।

श्लोक 25 (3.42.25)

तव सानूनि कुञ्जाश्च नद्यः प्रस्रवणानि च । तीर्थानि च सुपुण्यानि मया दृष्टान्यनेकशः ॥

tava sānūni kuñjāśca nadyaḥ prasravaṇāni ca | tīrthāni ca supuṇyāni mayā dṛṣṭānyanekaśaḥ

तुम्हारे शिखर-तट, कुंज, नदियाँ, झरने और परम पवित्र तीर्थ मैंने अनेक बार देखे हैं।

श्लोक 26 (3.42.26)

सुसुगन्धाश्च वार्योघास्त्वच्छरीरविनिःसृताः । अमृतास्वादसदृशाः पीताः प्रस्रवणोदकाः ॥

susugandhāśca vāryoghāstvaccharīraviniḥsṛtāḥ | amṛtāsvādasadṛśāḥ pītāḥ prasravaṇodakāḥ

तुम्हारे शरीर से निकलने वाली सुगन्धित जलधाराओं, अमृत के समान स्वाद वाले झरनों के जल का मैंने पान किया है।

श्लोक 27 (3.42.27)

शिशुर्यथा पितुश्चाङ्के सुखं शेते तटे तथा । मया तवाङ्के ललितं शैलराज महाप्रभो ॥

śiśuryathā pituścāṅke sukhaṃ śete taṭe tathā | mayā tavāṅke lalitaṃ śailarāja mahāprabho

जैसे शिशु पिता की गोद में सुख से सोता है, वैसे ही हे पर्वतराज, हे महाप्रभो, मैंने तुम्हारी ढलानों पर, तुम्हारी गोद में क्रीड़ा की है।

श्लोक 28 (3.42.28)

अप्सरोगणसंकीर्णे ब्रह्मघोषानुनादिते । सुखमस्म्युषितः शैल तव सानुषु नित्यदा ॥

apsarogaṇasaṃkīrṇe brahmaghoṣānunādite | sukhamasmyuṣitaḥ śaila tava sānuṣu nityadā

हे शैल, अप्सराओं के समूहों से भरे और वेदध्वनि से गूँजते तुम्हारे शिखरों पर मैं सदा सुख से रहा हूँ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 29 (3.42.29)

एवमुक्त्वार्जुनः शैलमामन्त्र्य परवीरहा । आरुरोह रथं दिव्यं द्योतयन्निव भास्करः ॥

evamuktvārjunaḥ śailamāmantrya paravīrahā | āruroha rathaṃ divyaṃ dyotayanniva bhāskaraḥ

ऐसा कहकर और पर्वत से विदा लेकर शत्रुवीरों का नाश करने वाले अर्जुन सूर्य के समान प्रकाशित होते हुए उस दिव्य रथ पर चढ़ गए।

श्लोक 30 (3.42.30)

स तेनादित्यरूपेण दिव्येनाद्भुतकर्मणा । ऊर्ध्वमाचक्रमे धीमान्प्रहृष्टः कुरुनन्दनः ॥

sa tenādityarūpeṇa divyenādbhutakarmaṇā | ūrdhvamācakrame dhīmānprahṛṣṭaḥ kurunandanaḥ

सूर्य के समान रूप वाले, अद्भुत कर्म करने वाले उस दिव्य रथ से बुद्धिमान् कुरुनन्दन हर्षित होकर ऊपर की ओर चल पड़े।

श्लोक 31 (3.42.31)

सोऽदर्शनपथं यातो मर्त्यानां धर्मचारिणाम् । ददर्शाद्भुतरूपाणि विमानानि सहस्रशः ॥

so'darśanapathaṃ yāto martyānāṃ dharmacāriṇām | dadarśādbhutarūpāṇi vimānāni sahasraśaḥ

धर्माचरण करने वाले मनुष्यों की दृष्टि से परे पहुँचकर उन्होंने अद्भुत रूप वाले सहस्रों विमान देखे।

श्लोक 32 (3.42.32)

न तत्र सूर्यः सोमो वा द्योतते न च पावकः । स्वयैव प्रभया तत्र द्योतन्ते पुण्यलब्धया ॥

na tatra sūryaḥ somo vā dyotate na ca pāvakaḥ | svayaiva prabhayā tatra dyotante puṇyalabdhayā

वहाँ न सूर्य प्रकाश करता है, न चन्द्रमा, न अग्नि; वहाँ सब पुण्य से प्राप्त अपनी ही प्रभा से प्रकाशित होते हैं।

श्लोक 33 (3.42.33)

तारारूपाणि यानीह दृश्यन्ते द्युतिमन्ति वै । आकाशे विप्रकृष्टत्वात्तनूनि सुमहान्त्यपि ॥

tārārūpāṇi yānīha dṛśyante dyutimanti vai | ākāśe viprakṛṣṭatvāttanūni sumahāntyapi

जो ज्योतियाँ यहाँ से तारों के रूप में दिखाई देती हैं, वे अत्यन्त विशाल होने पर भी दूरी के कारण आकाश में छोटी दिखती हैं।

श्लोक 34 (3.42.34)

तानि तत्र प्रभास्वन्ति रूपवन्ति च पाण्डवः । ददर्श स्वेषु धिष्ण्येषु दीप्तिमन्ति स्वयाऽर्चिषा ॥

tāni tatra prabhāsvanti rūpavanti ca pāṇḍavaḥ | dadarśa sveṣu dhiṣṇyeṣu dīptimanti svayā'rciṣā

पाण्डुनन्दन ने उन्हें वहाँ अपने-अपने स्थानों पर अपनी ही ज्योति से दीप्त, प्रभायुक्त और रूपवान् देखा।

श्लोक 35 (3.42.35)

तत्र राजर्षयः सिद्धा वीराश्च निहता युधि । तपसा च जितं स्वर्गं संपेतुः शतसङ्घशः ॥

tatra rājarṣayaḥ siddhā vīrāśca nihatā yudhi | tapasā ca jitaṃ svargaṃ saṃpetuḥ śatasaṅghaśaḥ

वहाँ राजर्षि, सिद्ध, युद्ध में वीरगति पाए वीर और तपस्या से स्वर्ग जीतने वाले सैकड़ों समूहों में एकत्र हो रहे थे।

श्लोक 36 (3.42.36)

गन्धर्वाणां सहस्राणि सूर्यज्वलिततेजसाम् । गुह्यकानामृषीणां च तथैवाप्सरसां गणान् ॥

gandharvāṇāṃ sahasrāṇi sūryajvalitatejasām | guhyakānāmṛṣīṇāṃ ca tathaivāpsarasāṃ gaṇān

उन्होंने सूर्य के समान प्रज्वलित तेज वाले सहस्रों गन्धर्वों को, और गुह्यकों, ऋषियों तथा अप्सराओं के समूहों को भी देखा।

श्लोक 37 (3.42.37)

लोकानात्मप्रभान्पश्यन्फल्गुनो विस्मयान्वितः । पप्रच्छ मातलिं प्रीत्या स चाप्येनमुवाच ह ॥

lokānātmaprabhānpaśyanphalguno vismayānvitaḥ | papraccha mātaliṃ prītyā sa cāpyenamuvāca ha

उन स्वयंप्रकाशित लोकों को देखकर विस्मित फाल्गुन ने प्रेमपूर्वक मातलि से पूछा, और मातलि ने उनसे कहा —

मातलिरुवाच

श्लोक 38 (3.42.38)

एते सुकृतिनः पार्थ स्वेषु धिष्ण्येष्ववस्थिताः । तान्दृष्टवानसि विभो तारारूपाणि भूतले ॥

ete sukṛtinaḥ pārtha sveṣu dhiṣṇyeṣvavasthitāḥ | tāndṛṣṭavānasi vibho tārārūpāṇi bhūtale

"पार्थ, ये पुण्यात्मा हैं जो अपने-अपने स्थानों में स्थित हैं। हे प्रभो, इन्हीं को तुमने पृथ्वी पर से तारों के रूप में देखा है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 39 (3.42.39)

ततोऽपश्यत्स्थितं द्वारि मत्तं विजयिनं गजम् । ऐरावतं चतुर्दन्तं कैलासमिव शृङ्गिणम् ॥

tato'paśyatsthitaṃ dvāri mattaṃ vijayinaṃ gajam | airāvataṃ caturdantaṃ kailāsamiva śṛṅgiṇam

तब उन्होंने द्वार पर खड़े, मदमत्त, विजयी, चार दाँतों वाले गजराज ऐरावत को देखा, जो शिखरों वाले कैलास पर्वत के समान था।

श्लोक 40 (3.42.40)

स सिद्धमार्गमाक्रम्य कुरुपाण्डवसत्तमः । व्यरोचत यथापूर्वं मान्धाता पार्थिवोत्तमः ॥

sa siddhamārgamākramya kurupāṇḍavasattamaḥ | vyarocata yathāpūrvaṃ māndhātā pārthivottamaḥ

सिद्धों के मार्ग पर चलते हुए कुरु-पाण्डवों में श्रेष्ठ अर्जुन वैसे ही शोभा पाने लगे जैसे पूर्वकाल में राजाओं में श्रेष्ठ मान्धाता शोभित हुए थे।

श्लोक 41 (3.42.41)

अभिचक्राम लोकान्स राज्ञां राजीवलोचनः ॥

abhicakrāma lokānsa rājñāṃ rājīvalocanaḥ

कमलनयन अर्जुन राजाओं के लोकों की ओर बढ़ते गए।

श्लोक 42 (3.42.42)

एवं स संक्रमंस्तत्र स्वर्गलोके महायशाः । ततो ददर्श शक्रस्य पुरीं ताममरावतीम् ॥

evaṃ sa saṃkramaṃstatra svargaloke mahāyaśāḥ | tato dadarśa śakrasya purīṃ tāmamarāvatīm

इस प्रकार स्वर्गलोक में आगे बढ़ते हुए उस महायशस्वी ने तब इन्द्र की नगरी अमरावती को देखा।

अध्याय 41अध्याय-सूचीअध्याय 43