आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 43
अमरावती में इन्द्र द्वारा अर्जुन का स्वागत
अर्जुन अमरावती और नन्दन वन में प्रवेश करते हैं, जो तप, यज्ञ और सदाचार से रहित लोगों के लिए अगम्य लोक है, और देवमार्ग पर देवता, गन्धर्व, सिद्ध और ऋषि उनका सम्मान करते हैं। वे अपने पिता इन्द्र से मिलते हैं, जो उन्हें गले लगाकर अपने ही सिंहासन पर बिठाते हैं और दुलारते हैं, जबकि गन्धर्व गाते और अप्सराएँ नाचती हैं। इन्द्र के भवन में रहकर वे वज्र सहित दिव्य अस्त्र सीखते हैं और पाँच वर्ष वहाँ रहते हैं; इन्द्र के कहने पर वे अपने मित्र गन्धर्व चित्रसेन से गायन, नृत्य और वादन सीखते हैं, फिर भी द्यूत, अपने भाइयों और माता कुन्ती का स्मरण करते हुए उन्हें शान्ति नहीं मिलती।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.43.1)
ददर्श स पुरीं रम्यां सिद्धचारणसेविताम् । सर्वर्तुकुसुमैः पुण्यैः पादपैरुपशोभिताम् ॥
dadarśa sa purīṃ ramyāṃ siddhacāraṇasevitām | sarvartukusumaiḥ puṇyaiḥ pādapairupaśobhitām
उन्होंने सिद्धों और चारणों से सेवित, सब ऋतुओं के फूलों से लदे पवित्र वृक्षों से सुशोभित उस रमणीय नगरी को देखा।
श्लोक 2 (3.43.2)
तत्र सौगन्धिकानां च पुष्पाणां पुण्यगन्धिनाम् । उपवीज्यमानो मिश्रेण वायुना पुण्यगन्धिना ॥
tatra saugandhikānāṃ ca puṣpāṇāṃ puṇyagandhinām | upavījyamāno miśreṇa vāyunā puṇyagandhinā
वहाँ सौगन्धिक कमलों और अन्य पवित्र सुगन्ध वाले पुष्पों की मिली-जुली, पवित्र गन्ध वाली वायु से पंखा झले जाते हुए,
श्लोक 3 (3.43.3)
नन्दनं च वनं दिव्यमप्सरोगणसेवितम् । ददर्श दिव्यकुसुमैराह्वयद्भिरिव द्रुमैः ॥
nandanaṃ ca vanaṃ divyamapsarogaṇasevitam | dadarśa divyakusumairāhvayadbhiriva drumaiḥ
उन्होंने अप्सराओं के समूहों से सेवित दिव्य नन्दन वन देखा, जिसके वृक्ष अपने दिव्य फूलों से मानो उन्हें बुला रहे थे।
श्लोक 4 (3.43.4)
नातप्ततपसा शक्यो द्रष्टुं नानाहिताग्निना । स लोकः पुण्यकर्तॄणां नापि युद्धे पराङ्मुखैः ॥
nātaptatapasā śakyo draṣṭuṃ nānāhitāgninā | sa lokaḥ puṇyakartṝṇāṃ nāpi yuddhe parāṅmukhaiḥ
पुण्यकर्मा लोगों का वह लोक न तो तप न करने वाले को दिखाई देता है, न अग्निहोत्र न करने वाले को, और न युद्ध से पीठ फेरने वालों को;
श्लोक 5 (3.43.5)
नायज्वभिर्नाव्रतिकैर्न वेदश्रुतिवर्जितैः । नानाप्लुताङ्गैस्तीर्थेषु यज्ञदानबहिष्कृतैः ॥
nāyajvabhirnāvratikairna vedaśrutivarjitaiḥ | nānāplutāṅgaistīrtheṣu yajñadānabahiṣkṛtaiḥ
न यज्ञ न करने वालों को, न व्रत न रखने वालों को, न वेद-श्रवण से रहित लोगों को, न तीर्थों में स्नान न करने वालों को, न यज्ञ और दान से बहिष्कृत लोगों को;
श्लोक 6 (3.43.6)
नापि यज्ञहनैः क्षुद्रैर्द्रष्टुं शक्यः कथंचन । पानपैर्गुरुतल्पैश्च मांसादैर्वा दुरात्मभिः ॥
nāpi yajñahanaiḥ kṣudrairdraṣṭuṃ śakyaḥ kathaṃcana | pānapairgurutalpaiśca māṃsādairvā durātmabhiḥ
यज्ञ में बाधा डालने वाले क्षुद्र जन, मद्य पीने वाले, गुरुपत्नी-गामी, मांसभक्षी और दुष्टात्मा भी उसे किसी प्रकार नहीं देख सकते।
श्लोक 7 (3.43.7)
स तद्दिव्यं वनं पश्यन्दिव्यगीतनिनादितम् । प्रविवेश महाबाहुः शक्रस्य दयितां पुरीम् ॥
sa taddivyaṃ vanaṃ paśyandivyagītanināditam | praviveśa mahābāhuḥ śakrasya dayitāṃ purīm
दिव्य संगीत से गूँजते उस दिव्य वन को देखते हुए महाबाहु अर्जुन ने इन्द्र की प्रिय नगरी में प्रवेश किया।
श्लोक 8 (3.43.8)
तत्र देवविमानानि कामगानि सहस्रशः । संस्थितान्यभियातानि ददर्शायुतशस्तदा ॥
tatra devavimānāni kāmagāni sahasraśaḥ | saṃsthitānyabhiyātāni dadarśāyutaśastadā
वहाँ उन्होंने इच्छानुसार चलने वाले देवताओं के हज़ारों, बल्कि दसियों हज़ार विमान देखे, कुछ खड़े हुए और कुछ आते-जाते।
श्लोक 9 (3.43.9)
संस्तूयमानो गन्धर्वैरप्सरोभिश्च पाण्डवः । पुष्पगन्धवहैः पुण्यैर्वायुभिश्चानुवीजितः ॥
saṃstūyamāno gandharvairapsarobhiśca pāṇḍavaḥ | puṣpagandhavahaiḥ puṇyairvāyubhiścānuvījitaḥ
गन्धर्व और अप्सराएँ पाण्डुनन्दन की स्तुति कर रहे थे, और फूलों की सुगन्ध लिए पवित्र वायु उन पर पंखा झल रही थी।
श्लोक 10 (3.43.10)
ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः । हृष्टाः संपूजयामासुः पार्थमक्लिष्टकारिणम् ॥
tato devāḥ sagandharvāḥ siddhāśca paramarṣayaḥ | hṛṣṭāḥ saṃpūjayāmāsuḥ pārthamakliṣṭakāriṇam
तब गन्धर्वों सहित देवताओं, सिद्धों और परम ऋषियों ने हर्षित होकर अनायास महान कर्म करने वाले पार्थ का सम्मान किया।
श्लोक 11 (3.43.11)
आशीर्वादैः स्तूयमानो दिव्यवादित्रनिःस्वनैः । प्रतिपेदे महाबाहुः शङ्खदुन्दुभिनादितम् ॥
āśīrvādaiḥ stūyamāno divyavāditraniḥsvanaiḥ | pratipede mahābāhuḥ śaṅkhadundubhināditam
आशीर्वादों से स्तुति पाते हुए, दिव्य वाद्यों की ध्वनि के बीच महाबाहु अर्जुन शंख और दुन्दुभियों से गूँजते मार्ग पर पहुँचे।
श्लोक 12 (3.43.12)
नक्षत्रमार्गं विपुलं सुरवीथीति विश्रुतम् । इन्द्राज्ञया ययौ पार्थः स्तूयमानः समन्ततः ॥
nakṣatramārgaṃ vipulaṃ suravīthīti viśrutam | indrājñayā yayau pārthaḥ stūyamānaḥ samantataḥ
इन्द्र की आज्ञा से पार्थ चारों ओर से स्तुति पाते हुए उस विशाल नक्षत्र-मार्ग पर चले, जो सुरवीथी के नाम से प्रसिद्ध है।
श्लोक 13 (3.43.13)
तत्र साध्यास्तथा विश्वे मरुतोऽथाश्विनौ तथा । आदित्या वसवो रुद्रास्तथा ब्रह्मर्षयोऽमलाः ॥
tatra sādhyāstathā viśve maruto'thāśvinau tathā | ādityā vasavo rudrāstathā brahmarṣayo'malāḥ
वहाँ साध्य, विश्वेदेव, मरुद्गण, दोनों अश्विनीकुमार, आदित्य, वसु, रुद्र और निर्मल ब्रह्मर्षि थे,
श्लोक 14 (3.43.14)
राजर्षयश्च बहवो दिलीपप्रमुखा नृपाः । तम्बुरुर्नारदश्चैव गन्धर्वौ च हाहा हूहूः ॥
rājarṣayaśca bahavo dilīpapramukhā nṛpāḥ | tambururnāradaścaiva gandharvau ca hāhā hūhūḥ
तथा दिलीप आदि बहुत-से राजर्षि राजा, तुम्बुरु और नारद, और हाहा तथा हूहू नामक दो गन्धर्व भी थे।
श्लोक 15 (3.43.15)
तान्स सर्वान्समागम्य विधिवत्कुरुनन्दनः । ततोऽपश्यद्देवराजं शतक्रतुमरिंदमः ॥
tānsa sarvānsamāgamya vidhivatkurunandanaḥ | tato'paśyaddevarājaṃ śatakratumariṃdamaḥ
उन सबसे विधिपूर्वक मिलकर शत्रुदमन कुरुनन्दन ने तब देवराज शतक्रतु इन्द्र को देखा।
श्लोक 16 (3.43.16)
ततः पार्थो महाबाहुरवतीर्य रथोत्तमात् । ददर्श साक्षाद्देवेशं पितरं पाकशासनम् ॥
tataḥ pārtho mahābāhuravatīrya rathottamāt | dadarśa sākṣāddeveśaṃ pitaraṃ pākaśāsanam
तब महाबाहु पार्थ ने उस उत्तम रथ से उतरकर साक्षात् देवेश्वर, अपने पिता पाकशासन इन्द्र को देखा,
श्लोक 17 (3.43.17)
पाण्डुरेणातपत्रेण हेमदण्डेन चारुणा । दिव्यगन्धाधिवासेन व्यजनेन विधूयता ॥
pāṇḍureṇātapatreṇa hemadaṇḍena cāruṇā | divyagandhādhivāsena vyajanena vidhūyatā
जिन पर सुन्दर स्वर्ण-दण्ड वाला श्वेत छत्र तना था और दिव्य सुगन्ध से सुवासित चँवर डुलाया जा रहा था,
श्लोक 18 (3.43.18)
विश्वावसुप्रभृतिभिर्गन्धर्वैः स्तुतिवन्दिभिः । स्तूयमानं द्विजाग्र्यैश्च ऋग्यजुःसामसंस्तवैः ॥
viśvāvasuprabhṛtibhirgandharvaiḥ stutivandibhiḥ | stūyamānaṃ dvijāgryaiśca ṛgyajuḥsāmasaṃstavaiḥ
और विश्वावसु आदि स्तुति-गायक गन्धर्व तथा श्रेष्ठ ब्राह्मण ऋग्, यजुः और साम के स्तोत्रों से जिनकी स्तुति कर रहे थे।
श्लोक 19 (3.43.19)
ततोऽभिगम्य कौन्तेयः शिरसाऽभ्यनमद्बली । स चैनं वृत्तपीनाभ्यां बाहुभ्यां प्रत्यगृह्णत ॥
tato'bhigamya kaunteyaḥ śirasā'bhyanamadbalī | sa cainaṃ vṛttapīnābhyāṃ bāhubhyāṃ pratyagṛhṇata
तब बलवान् कुन्तीपुत्र ने पास जाकर सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया, और इन्द्र ने अपनी गोल, पुष्ट भुजाओं से उन्हें थाम लिया।
श्लोक 20 (3.43.20)
ततः शक्रासने पुण्ये देवर्षिगणसेविते । शक्रः पाणौ गृहीत्वैनमुपावेशयदन्तिके ॥
tataḥ śakrāsane puṇye devarṣigaṇasevite | śakraḥ pāṇau gṛhītvainamupāveśayadantike
तब इन्द्र ने उनका हाथ पकड़कर देवर्षिगणों से सेवित अपने पवित्र सिंहासन पर उन्हें अपने पास बिठा लिया।
श्लोक 21 (3.43.21)
मूर्ध्नि चैनमुपाघ्राय देवेन्द्रः परवीरहा । अङ्कमारोपयामास प्रश्रयावनतं तदा ॥
mūrdhni cainamupāghrāya devendraḥ paravīrahā | aṅkamāropayāmāsa praśrayāvanataṃ tadā
शत्रुवीरों का नाश करने वाले देवराज ने विनय से झुके हुए अर्जुन का सिर सूँघा और उन्हें अपनी गोद में बिठा लिया।
श्लोक 22 (3.43.22)
सहस्राक्षनियोगात्स पार्थः शक्रासनं तदा । आरुरुक्षुरमेयात्मा द्वितीय इव वासवः ॥
sahasrākṣaniyogātsa pārthaḥ śakrāsanaṃ tadā | ārurukṣurameyātmā dvitīya iva vāsavaḥ
सहस्राक्ष इन्द्र की आज्ञा से अमित आत्मबल वाले पार्थ तब दूसरे इन्द्र के समान इन्द्र के सिंहासन पर आसीन होने चले।
श्लोक 23 (3.43.23)
ततः प्रेम्णा वृत्रशत्रुरर्जुनस्य शुभं मुखम् । पस्पर्श पुण्यगन्धेन करेण परिसान्त्वयन् ॥
tataḥ premṇā vṛtraśatrurarjunasya śubhaṃ mukham | pasparśa puṇyagandhena kareṇa parisāntvayan
तब वृत्रशत्रु इन्द्र ने प्रेमपूर्वक अपने पवित्र सुगन्ध वाले हाथ से अर्जुन के सुन्दर मुख का स्पर्श किया और उन्हें सान्त्वना दी।
श्लोक 24 (3.43.24)
प्रमार्जमानः शनकैर्बाहू चास्यायतौ शुभौ । ज्याशरक्षेपकठिनौ स्तम्भाविव हिरण्मयौ ॥
pramārjamānaḥ śanakairbāhū cāsyāyatau śubhau | jyāśarakṣepakaṭhinau stambhāviva hiraṇmayau
और धनुष की डोरी खींचने तथा बाण छोड़ने से कठोर हुई, सोने के खम्भों जैसी उनकी लम्बी, सुन्दर भुजाओं को धीरे-धीरे सहलाया;
श्लोक 25 (3.43.25)
वज्रग्रहणचिह्नेन करेण परिसान्त्वयन् । मुहुर्मुहुर्वज्रधरो बाहू चास्फोटयञ्शनैः ॥
vajragrahaṇacihnena kareṇa parisāntvayan | muhurmuhurvajradharo bāhū cāsphoṭayañśanaiḥ
वज्र पकड़ने के चिह्न से अंकित हाथ से सान्त्वना देते हुए वज्रधारी इन्द्र बार-बार धीरे-धीरे उनकी भुजाओं को थपथपाते रहे।
श्लोक 26 (3.43.26)
स्मयन्निव गुडाकेशं प्रेक्षमाणः सहस्रदृक् । हर्षेणोत्फुल्लनयनो न चातृप्यत वृत्रहा ॥
smayanniva guḍākeśaṃ prekṣamāṇaḥ sahasradṛk | harṣeṇotphullanayano na cātṛpyata vṛtrahā
सहस्रनेत्र वृत्रहन्ता इन्द्र मानो मुस्कुराते हुए हर्ष से खिली आँखों से गुडाकेश को देखते रहे और देखते-देखते तृप्त नहीं होते थे।
श्लोक 27 (3.43.27)
एकासनोपविष्टौ तौ शोभयांचक्रतुः सभाम् । सूर्याचन्द्रमसौ व्योम चतुर्दश्यामिवोदितौ ॥
ekāsanopaviṣṭau tau śobhayāṃcakratuḥ sabhām | sūryācandramasau vyoma caturdaśyāmivoditau
एक ही आसन पर बैठे वे दोनों उस सभा को ऐसे सुशोभित कर रहे थे जैसे चतुर्दशी के दिन आकाश में एक साथ उदित सूर्य और चन्द्रमा।
श्लोक 28 (3.43.28)
तत्र स्म गाथा गायन्ति साम्ना परमवल्गुना । गन्धर्वास्तुम्बुरुश्रेष्ठाः कुशला गीतसामसु ॥
tatra sma gāthā gāyanti sāmnā paramavalgunā | gandharvāstumburuśreṣṭhāḥ kuśalā gītasāmasu
वहाँ गीत और साम-गान में कुशल, तुम्बुरु आदि श्रेष्ठ गन्धर्व अत्यन्त मधुर स्वर में गाथाएँ गा रहे थे।
श्लोक 29 (3.43.29)
घृताची मेनका रम्भा पूर्वचित्तिः स्वयंप्रभा । उर्वशी मिश्रकेशी च दण्डगौरी वरूथिनी ॥
ghṛtācī menakā rambhā pūrvacittiḥ svayaṃprabhā | urvaśī miśrakeśī ca daṇḍagaurī varūthinī
घृताची, मेनका, रम्भा, पूर्वचित्ति, स्वयंप्रभा, उर्वशी, मिश्रकेशी, दण्डगौरी, वरूथिनी,
श्लोक 30 (3.43.30)
गोपाली सहजन्या च कुम्भयोनिः प्रजागरा । चित्रसेना चित्रलेखा सहा च मधुरस्वरा ॥
gopālī sahajanyā ca kumbhayoniḥ prajāgarā | citrasenā citralekhā sahā ca madhurasvarā
गोपाली, सहजन्या, कुम्भयोनि, प्रजागरा, चित्रसेना, चित्रलेखा, सहा और मधुरस्वरा —
श्लोक 31 (3.43.31)
एताश्चान्याश्च ननृतुस्तत्रतत्र शुचिस्मिताः । चित्तप्रमथने युक्ताः सिद्धानां पद्मलोचनाः ॥
etāścānyāśca nanṛtustatratatra śucismitāḥ | cittapramathane yuktāḥ siddhānāṃ padmalocanāḥ
ये और अन्य, मधुर मुस्कान वाली, कमलनयनी अप्सराएँ सिद्धों के चित्त को मथ डालने में लगी हुई जहाँ-तहाँ नाच रही थीं,
श्लोक 32 (3.43.32)
महाकटितटश्रोण्यः कम्पमानैः पयोधरैः । कटाक्षहावमाधुर्यैश्चेतोबुद्धिमनोहरैः ॥
mahākaṭitaṭaśroṇyaḥ kampamānaiḥ payodharaiḥ | kaṭākṣahāvamādhuryaiścetobuddhimanoharaiḥ
भारी कटि और नितम्बों वाली, हिलते हुए स्तनों वाली, वे चित्त, बुद्धि और मन को हर लेने वाले कटाक्षों, हाव-भावों और माधुर्य से युक्त थीं।
श्लोक 33 (3.43.33)
ततो देवाः सगन्धर्वाः समादायार्घ्यमुत्तमम् । शक्रस्य मतमाज्ञाय पार्थमानर्चुरञ्जसा ॥
tato devāḥ sagandharvāḥ samādāyārghyamuttamam | śakrasya matamājñāya pārthamānarcurañjasā
तब गन्धर्वों सहित देवताओं ने इन्द्र का अभिप्राय जानकर उत्तम अर्घ्य लेकर तुरन्त पार्थ का पूजन किया।
श्लोक 34 (3.43.34)
पाद्यमाचमनीयं च प्रतिग्राह्य नृपात्मजम् । प्रवेशयामासुरथो पुरंदरनिवेशनम् ॥
pādyamācamanīyaṃ ca pratigrāhya nṛpātmajam | praveśayāmāsuratho puraṃdaraniveśanam
राजकुमार को पाद्य और आचमनीय जल ग्रहण कराकर वे उन्हें पुरन्दर इन्द्र के भवन में ले गए।
श्लोक 35 (3.43.35)
एवं संपूजितो जिष्णुरुवास भवने पितुः । उपशिक्षन्महास्त्राणि ससंहाराणि पाण्डवः ॥
evaṃ saṃpūjito jiṣṇuruvāsa bhavane pituḥ | upaśikṣanmahāstrāṇi sasaṃhārāṇi pāṇḍavaḥ
इस प्रकार सम्मानित होकर जिष्णु अर्जुन अपने पिता के भवन में रहने लगे और पाण्डुनन्दन ने संहार (लौटाने) की विधि सहित महान अस्त्रों की शिक्षा ली।
श्लोक 36 (3.43.36)
शक्रस्य हस्ताद्दयितं वज्रमस्त्रं च दुःसहम् । अशनीश्च महानादा मेघबर्हिणलक्षणाः ॥
śakrasya hastāddayitaṃ vajramastraṃ ca duḥsaham | aśanīśca mahānādā meghabarhiṇalakṣaṇāḥ
उन्होंने इन्द्र के हाथ से उनका प्रिय, दुःसह वज्रास्त्र और मेघ तथा मयूर जिनके लक्षण हैं, ऐसी महान गर्जना वाली अशनियाँ प्राप्त कीं।
श्लोक 37 (3.43.37)
गृहीतास्त्रस्तु कौन्तेयो भ्रातॄन्सस्मार पाण्डवः । पुरंदरनियोगाच्च पञ्चाब्दानवसत्सुखी ॥
gṛhītāstrastu kaunteyo bhrātṝnsasmāra pāṇḍavaḥ | puraṃdaraniyogācca pañcābdānavasatsukhī
अस्त्र प्राप्त कर लेने पर कुन्तीपुत्र पाण्डव को अपने भाइयों की याद आई; फिर भी पुरन्दर की आज्ञा से वे वहाँ पाँच वर्ष तक सुखपूर्वक रहे।
श्लोक 38 (3.43.38)
ततः शक्रोऽब्रवीत्पार्थं कृतास्त्रं काल आगते । नृत्यं गीतं च कौन्तेय चित्रसेनादवाप्नुहि ॥
tataḥ śakro'bravītpārthaṃ kṛtāstraṃ kāla āgate | nṛtyaṃ gītaṃ ca kaunteya citrasenādavāpnuhi
तब समय आने पर इन्द्र ने अस्त्रविद्या में निपुण हो चुके पार्थ से कहा — "कुन्तीनन्दन, चित्रसेन से नृत्य और गीत सीखो।
इन्द्र उवाच
श्लोक 39 (3.43.39)
वादित्रं देवविहितं नृलोके यन्न विद्यते । तदर्जयस्व कौन्तेय श्रेयो वै ते भविष्यति ॥
vāditraṃ devavihitaṃ nṛloke yanna vidyate | tadarjayasva kaunteya śreyo vai te bhaviṣyati
हे कुन्तीपुत्र, देवताओं द्वारा रचा गया वह वाद्य-संगीत सीखो जो मनुष्यलोक में नहीं है; इससे तुम्हारा कल्याण होगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 40 (3.43.40)
सखायं प्रददौ चास्य चित्रसेनं पुरंदरः । स तेन सह संगम्य रेमे पार्थो निरामयः ॥
sakhāyaṃ pradadau cāsya citrasenaṃ puraṃdaraḥ | sa tena saha saṃgamya reme pārtho nirāmayaḥ
पुरन्दर ने चित्रसेन को उनका सखा बना दिया, और उनके साथ रहकर पार्थ निश्चिन्त होकर आनन्द से रहने लगे।
श्लोक 41 (3.43.41)
गीतवादित्रनृत्यानि भूय एवादिदेश ह । तथाऽपि नालभच्छर्म तरस्वी द्यूतकारितम् ॥
gītavāditranṛtyāni bhūya evādideśa ha | tathā'pi nālabhaccharma tarasvī dyūtakāritam
चित्रसेन उन्हें बार-बार गायन, वादन और नृत्य सिखाते रहे; फिर भी वे वेगवान् वीर द्यूत में हुए अन्याय के कारण शान्ति नहीं पाते थे,
श्लोक 42 (3.43.42)
दुःशासनवधामर्षी शकुनेः सौबलस्य च । ततस्तेनातुलां प्रीतिमुपागम्य क्वचित्क्वचित् । गान्धर्वमतुलं नृत्यं वादित्रं चोपलब्धवान् ॥
duḥśāsanavadhāmarṣī śakuneḥ saubalasya ca | tatastenātulāṃ prītimupāgamya kvacitkvacit | gāndharvamatulaṃ nṛtyaṃ vāditraṃ copalabdhavān
क्योंकि वे दुःशासन और सुबलपुत्र शकुनि के वध के लिए क्रोध से भरे थे। फिर कभी-कभी चित्रसेन के साथ अनुपम आनन्द पाते हुए उन्होंने गन्धर्वों का अतुलनीय नृत्य और वादन सीख लिया।
श्लोक 43 (3.43.43)
स शिक्षितो नृत्यगुणाननेका- । न्वादित्रगीतार्थगुणांश्च सर्वान् । न शर्म लेभे परवीरहन्ता । भ्रातॄन्स्मरन्मातरं चैव कुन्तीम् ॥
sa śikṣito nṛtyaguṇānanekā- | nvāditragītārthaguṇāṃśca sarvān | na śarma lebhe paravīrahantā | bhrātṝnsmaranmātaraṃ caiva kuntīm
नृत्य के अनेक गुणों और वादन तथा गीत के अर्थ के सब गुणों में शिक्षित हो जाने पर भी, शत्रुवीरों का संहार करने वाले अर्जुन को अपने भाइयों और माता कुन्ती का स्मरण करते हुए शान्ति नहीं मिली।