आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 45
इन्द्र द्वारा लोमश को युधिष्ठिर के पास भेजना
देवताओं से सम्मानित अर्जुन इन्द्र के भवन में पाँच वर्ष रहकर वज्र आदि अस्त्र प्राप्त करते हैं और इन्द्र की इच्छा से चित्रसेन से नृत्य और संगीत सीखते हैं। इन्द्र से मिलने आए महर्षि लोमश को आश्चर्य होता है कि एक क्षत्रिय इन्द्र के आसन पर कैसे बैठा है; इन्द्र उन्हें बताते हैं कि अर्जुन और कृष्ण पुरातन ऋषि नर और नारायण हैं, जो पृथ्वी का भार उतारने के लिए जन्मे हैं, और अर्जुन को निवातकवच दानवों का संहार करना है। वे लोमश को काम्यक वन भेजते हैं, ताकि वे युधिष्ठिर को आश्वस्त करें, उन्हें तीर्थयात्रा के लिए प्रेरित करें और मार्ग में भाइयों की रक्षा करें; लोमश वहाँ पहुँचकर युधिष्ठिर को भाइयों और तपस्वियों से घिरा पाते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.45.1)
ततो देवाः सगन्धर्वाः समादायार्घ्यमुत्तमम् । शक्रस्य मतमाज्ञाय पार्थमानर्चुरञ्जसा ॥
tato devāḥ sagandharvāḥ samādāyārghyamuttamam | śakrasya matamājñāya pārthamānarcurañjasā
तब गन्धर्वों सहित देवताओं ने उत्तम अर्घ्य लेकर, इन्द्र का अभिप्राय जानकर, तुरन्त पार्थ का पूजन किया।
श्लोक 2 (3.45.2)
पाद्यमाचमनीयं च प्रतिग्राह्य नृपात्मजम् । प्रवेशयामासुरथो पुरन्दरनिवेशनम् ॥
pādyamācamanīyaṃ ca pratigrāhya nṛpātmajam | praveśayāmāsuratho purandaraniveśanam
राजकुमार को पाद्य और आचमन का जल ग्रहण कराकर वे उन्हें इन्द्र के भवन में ले गए।
श्लोक 3 (3.45.3)
एवं संपूजितो जिष्णुरुवास भवने पितुः । उपशिक्षन्महास्त्राणि ससंहाराणि पाण्डवः ॥
evaṃ saṃpūjito jiṣṇuruvāsa bhavane pituḥ | upaśikṣanmahāstrāṇi sasaṃhārāṇi pāṇḍavaḥ
इस प्रकार सम्मानित होकर जिष्णु (अर्जुन) अपने पिता के भवन में रहने लगे, और पाण्डुपुत्र संहार-विधि सहित महान अस्त्रों की शिक्षा लेते रहे।
श्लोक 4 (3.45.4)
स शक्रहस्ताद्दयितं वज्रमस्त्रं दुरुत्सहम् । अशनिं च महानादां मेघबृंहितलक्षणाम् ॥
sa śakrahastāddayitaṃ vajramastraṃ durutsaham | aśaniṃ ca mahānādāṃ meghabṛṃhitalakṣaṇām
इन्द्र के हाथ से उन्होंने उनका प्रिय, दुःसह वज्रास्त्र और मेघों की गर्जना से पहचाना जाने वाला भीषण नाद करने वाला अशनि-अस्त्र प्राप्त किया।
श्लोक 5 (3.45.5)
गृहीतास्त्रस्तु कौन्तेयो भ्रातॄन्सस्मार पाण्डवः । पुरन्दरनियोगाच्च पञ्चाब्दमवसत्सुखम् ॥
gṛhītāstrastu kaunteyo bhrātṝnsasmāra pāṇḍavaḥ | purandaraniyogācca pañcābdamavasatsukham
अस्त्र प्राप्त कर लेने पर कुन्तीपुत्र पाण्डव को अपने भाइयों का स्मरण हुआ; फिर भी इन्द्र के आदेश से वे पाँच वर्ष तक वहाँ सुखपूर्वक रहे।
श्लोक 6 (3.45.6)
ततः शक्रोऽब्रवीत्पार्थं कृतास्त्रं काल आगते । नृत्तं गीतं च कौन्तेय चित्रसेनादवाप्नुहि ॥
tataḥ śakro'bravītpārthaṃ kṛtāstraṃ kāla āgate | nṛttaṃ gītaṃ ca kaunteya citrasenādavāpnuhi
तब समय आने पर इन्द्र ने अस्त्रविद्या में निपुण हो चुके पार्थ से कहा — "हे कौन्तेय, चित्रसेन से नृत्य और गान सीखो,
इन्द्र उवाच
श्लोक 7 (3.45.7)
वादित्रं दैवविहितं नृलोके यन्न विद्यते । मदाज्ञया च कौन्तेय श्रेयो वै ते भविष्यति ॥
vāditraṃ daivavihitaṃ nṛloke yanna vidyate | madājñayā ca kaunteya śreyo vai te bhaviṣyati
"और देवताओं द्वारा रचित वाद्य-संगीत भी, जो मनुष्यलोक में नहीं मिलता। हे कौन्तेय, मेरी आज्ञा से ऐसा करो; इसमें तुम्हारा कल्याण होगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 8 (3.45.8)
सखायं प्रददौ चास्य चित्रसेनं पुरन्दरः । स तेन सह संगम्य रेमे पार्थो निरामयः ॥
sakhāyaṃ pradadau cāsya citrasenaṃ purandaraḥ | sa tena saha saṃgamya reme pārtho nirāmayaḥ
इन्द्र ने चित्रसेन को उनका सखा बना दिया, और पार्थ उनके साथ मिलकर निश्चिन्त भाव से आनन्दपूर्वक रहने लगे।
श्लोक 9 (3.45.9)
कदाचिदटमानस्तु महर्षिरथ लोमशः । जगाम शक्रभवनं पुरंदरदिदृक्षया ॥
kadācidaṭamānastu maharṣiratha lomaśaḥ | jagāma śakrabhavanaṃ puraṃdaradidṛkṣayā
एक बार महर्षि लोमश घूमते हुए इन्द्र के दर्शन की इच्छा से इन्द्रभवन पहुँचे।
श्लोक 10 (3.45.10)
स समेत्य नमस्कृत्य देवराजं महामुनिः । ददर्शार्धासनगतं पाण्डवं वासवस्य हि ॥
sa sametya namaskṛtya devarājaṃ mahāmuniḥ | dadarśārdhāsanagataṃ pāṇḍavaṃ vāsavasya hi
महामुनि ने वहाँ पहुँचकर देवराज को नमस्कार किया और पाण्डुपुत्र को इन्द्र के आधे आसन पर बैठे देखा।
श्लोक 11 (3.45.11)
ततः शक्राभ्यनुज्ञात आसने विष्टरोत्तरे । निषसाद द्विजश्रेष्ठः पूज्यमानो महर्षिभिः ॥
tataḥ śakrābhyanujñāta āsane viṣṭarottare | niṣasāda dvijaśreṣṭhaḥ pūjyamāno maharṣibhiḥ
फिर इन्द्र की अनुमति से वे द्विजश्रेष्ठ कुश बिछे आसन पर बैठ गए, और महर्षियों ने उनका सत्कार किया।
श्लोक 12 (3.45.12)
तस्य दृष्ट्वाऽभवद्बुद्धिः पार्थमिन्द्रासने स्थितम् । कथं नु क्षत्रियः पार्थः शक्रासनमवाप्तवान् ॥
tasya dṛṣṭvā'bhavadbuddhiḥ pārthamindrāsane sthitam | kathaṃ nu kṣatriyaḥ pārthaḥ śakrāsanamavāptavān
पार्थ को इन्द्र के आसन पर बैठा देखकर उनके मन में विचार आया — "क्षत्रिय होकर पार्थ ने इन्द्र का आसन कैसे पा लिया?
श्लोक 13 (3.45.13)
किं त्वस्य सुकृतं कर्म के लोका वै विनिर्जिताः । स एवमनुसंप्राप्तः स्थानं देवनमस्कृतम् ॥
kiṃ tvasya sukṛtaṃ karma ke lokā vai vinirjitāḥ | sa evamanusaṃprāptaḥ sthānaṃ devanamaskṛtam
"इन्होंने कौन-सा पुण्यकर्म किया है, कौन-से लोक जीते हैं, जिससे ये देवताओं द्वारा वन्दित इस स्थान पर पहुँच गए हैं?"
श्लोक 14 (3.45.14)
तस्य विज्ञाय संकल्पं शक्रो वृत्रविमर्दनः । लोमशं प्रहसन्वाक्यमिदमाह शचीपतिः ॥
tasya vijñāya saṃkalpaṃ śakro vṛtravimardanaḥ | lomaśaṃ prahasanvākyamidamāha śacīpatiḥ
उनका विचार जानकर वृत्रासुर को कुचलने वाले शचीपति इन्द्र ने हँसते हुए लोमश से यह कहा —
इन्द्र उवाच
श्लोक 15 (3.45.15)
देवर्षे श्रूयतां यत्ते मनसैतद्विवक्षितम् । नायं केवलमर्त्योऽभूत्क्षत्रियत्वमुपागतः ॥
devarṣe śrūyatāṃ yatte manasaitadvivakṣitam | nāyaṃ kevalamartyo'bhūtkṣatriyatvamupāgataḥ
"हे देवर्षि, आप मन में जो पूछना चाहते हैं, उसका उत्तर सुनिए। यह क्षत्रिय-कुल में जन्मा कोई साधारण मनुष्य मात्र नहीं है।
श्लोक 16 (3.45.16)
महर्षे मम पुत्रोऽयं कुन्त्यां जातो महाभुजः । अस्त्रहेतोरिह प्राप्तः कस्माच्चित्कारणान्तरात् ॥
maharṣe mama putro'yaṃ kuntyāṃ jāto mahābhujaḥ | astrahetoriha prāptaḥ kasmāccitkāraṇāntarāt
"हे महर्षि, यह महाबाहु मेरा पुत्र है, जो कुन्ती से उत्पन्न हुआ है। किसी विशेष प्रयोजन से यह अस्त्रों के लिए यहाँ आया है।
श्लोक 17 (3.45.17)
अहो नैनं भवान्वेत्ति पुराणमृषिसत्तमम् । शृणु मे वदतो ब्रह्मन्योऽयं यच्चास्य कारणम् ॥
aho nainaṃ bhavānvetti purāṇamṛṣisattamam | śṛṇu me vadato brahmanyo'yaṃ yaccāsya kāraṇam
"अहो! आप इस पुरातन ऋषिश्रेष्ठ को नहीं पहचानते। हे ब्रह्मन्, यह कौन है और इसके यहाँ आने का कारण क्या है, मुझसे सुनिए।
श्लोक 18 (3.45.18)
नरनारायणौ यौ तौ पुराणावृषिसत्तमौ । ताविमावभिजानीहि हृषीकेशधनंजयौ ॥
naranārāyaṇau yau tau purāṇāvṛṣisattamau | tāvimāvabhijānīhi hṛṣīkeśadhanaṃjayau
"जो दो पुरातन श्रेष्ठ ऋषि नर और नारायण हैं, उन्हें आप यही हृषीकेश (कृष्ण) और धनंजय (अर्जुन) जानिए।
श्लोक 19 (3.45.19)
विख्यातौ त्रिषु लोकेषु नरनारायणावृषी । कार्यार्थमवतीर्णौ तौ पृथ्वीं पुण्यप्रतिश्रयाम् ॥
vikhyātau triṣu lokeṣu naranārāyaṇāvṛṣī | kāryārthamavatīrṇau tau pṛthvīṃ puṇyapratiśrayām
"तीनों लोकों में विख्यात ऋषि नर और नारायण किसी प्रयोजन से इस पुण्यमयी पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं।
श्लोक 20 (3.45.20)
यन्न शक्यं सुरैर्द्रष्टुमृषिभिर्वा महात्मभिः । तदाश्रमपदं पुण्यं बदरीनाम विश्रुतम् ॥
yanna śakyaṃ surairdraṣṭumṛṣibhirvā mahātmabhiḥ | tadāśramapadaṃ puṇyaṃ badarīnāma viśrutam
"वह पुण्य आश्रम, जो बदरी नाम से प्रसिद्ध है और जिसे देवता या महात्मा ऋषि भी नहीं देख पाते,
श्लोक 21 (3.45.21)
स निवासोऽभवद्विप्र विष्णोर्जिष्णोस्तथैव च । यतः प्रववृते गङ्गा सिद्धचारणसेविता ॥
sa nivāso'bhavadvipra viṣṇorjiṣṇostathaiva ca | yataḥ pravavṛte gaṅgā siddhacāraṇasevitā
"हे विप्र, वही विष्णु और जिष्णु का निवास था, जहाँ से सिद्धों और चारणों द्वारा सेवित गंगा निकलती है।
श्लोक 22 (3.45.22)
तौ मन्नियोगाद्ब्रह्मर्षे क्षितौ जातौ महाद्युती । भूमेर्भारावतरणं महावीर्यौ करिष्यतः ॥
tau manniyogādbrahmarṣe kṣitau jātau mahādyutī | bhūmerbhārāvataraṇaṃ mahāvīryau kariṣyataḥ
"हे ब्रह्मर्षि, मेरे अनुरोध से वे दोनों महातेजस्वी पृथ्वी पर जन्मे हैं; वे महापराक्रमी पृथ्वी का भार उतारेंगे।
श्लोक 23 (3.45.23)
उद्वृत्ता ह्यसुराः केचिन्निवातकवचा इति । विप्रियेषु स्थिताऽस्माकं वरदानेन मोहिताः ॥
udvṛttā hyasurāḥ kecinnivātakavacā iti | vipriyeṣu sthitā'smākaṃ varadānena mohitāḥ
"निवातकवच नाम के कुछ उद्दण्ड असुर हैं, जो वरदान के मद में मोहित होकर हमारा अहित करने में लगे हैं।
श्लोक 24 (3.45.24)
तर्कयन्ते सुरान्हन्तुं बलदर्पसमन्विताः । देवान्न गणयन्त्येते तथा दत्तवरा हि ते ॥
tarkayante surānhantuṃ baladarpasamanvitāḥ | devānna gaṇayantyete tathā dattavarā hi te
"बल के घमण्ड में चूर वे देवताओं को मारने का विचार करते हैं; उन्हें ऐसा वर मिला है कि वे देवताओं को कुछ नहीं गिनते।
श्लोक 25 (3.45.25)
पातालवासिनो रौद्रा दनोः पुत्रा महाबलाः । सर्वे देवनिकाया हि नालं योधयितुं हि तान् ॥
pātālavāsino raudrā danoḥ putrā mahābalāḥ | sarve devanikāyā hi nālaṃ yodhayituṃ hi tān
"वे पाताल में रहने वाले भयंकर और महाबली दनु के पुत्र हैं; देवताओं के सारे समूह मिलकर भी उनसे युद्ध करने में समर्थ नहीं हैं।
श्लोक 26 (3.45.26)
योसौ भूमिगतः श्रीमान्विष्णुर्मधुनिषूदनः । कपिलो नाम देवोसौ भगवानजितो हरिः ॥
yosau bhūmigataḥ śrīmānviṣṇurmadhuniṣūdanaḥ | kapilo nāma devosau bhagavānajito hariḥ
"जो श्रीमान् मधुसूदन विष्णु पृथ्वी पर गए हैं — वही कपिल नामक देव, अजेय भगवान हरि —
श्लोक 27 (3.45.27)
येन पूर्वंमहात्मानः खनमाना रसातलम् । दर्शनादेव निहताः सगरस्यात्मजा विभो ॥
yena pūrvaṃmahātmānaḥ khanamānā rasātalam | darśanādeva nihatāḥ sagarasyātmajā vibho
"हे विभो, जिन्होंने प्राचीन काल में रसातल खोदते हुए सगर के महात्मा पुत्रों को केवल दृष्टि से ही मार डाला था —
श्लोक 28 (3.45.28)
तेन कार्यं महत्कार्यमस्माकं द्विजसत्तम । पार्थेन च महायुद्धे समेताभ्यामसंशयम् ॥
tena kāryaṃ mahatkāryamasmākaṃ dvijasattama | pārthena ca mahāyuddhe sametābhyāmasaṃśayam
"हे द्विजश्रेष्ठ, उन्हीं के और पार्थ के द्वारा, जब दोनों महायुद्ध में साथ होंगे, हमारा यह महान कार्य निःसन्देह सिद्ध होगा।
श्लोक 29 (3.45.29)
सोऽसुरान्दर्शनादेव शक्तो हन्तुं सहानुगान् । निवातकवचान्सर्वान्नागानिव महाह्रदे ॥
so'surāndarśanādeva śakto hantuṃ sahānugān | nivātakavacānsarvānnāgāniva mahāhrade
"वे सब निवातकवच असुरों को उनके अनुचरों सहित केवल दृष्टि से ही मार सकते हैं, जैसे किसी विशाल सरोवर में नागों को।
श्लोक 30 (3.45.30)
किंतु नाल्पेन कार्येण प्रबोध्यो मधुसूदनः । तेजसः सुमहाराशिः प्रबुद्धः प्रदहेज्जगत् ॥
kiṃtu nālpena kāryeṇa prabodhyo madhusūdanaḥ | tejasaḥ sumahārāśiḥ prabuddhaḥ pradahejjagat
"किन्तु किसी छोटे काम के लिए मधुसूदन को जगाना उचित नहीं; वे तेज की महान राशि हैं, जाग उठने पर संसार को भस्म कर देंगे।
श्लोक 31 (3.45.31)
अयं तेषां समस्तानां शक्तः प्रतिसमासने । तान्निहत्यरणे शूरः पुनर्यास्यति मानुषान् ॥
ayaṃ teṣāṃ samastānāṃ śaktaḥ pratisamāsane | tānnihatyaraṇe śūraḥ punaryāsyati mānuṣān
"यह (अर्जुन) उन सबको परास्त करने में समर्थ है; युद्ध में उन्हें मारकर यह वीर फिर मनुष्यलोक लौट जाएगा।
श्लोक 32 (3.45.32)
भवानस्मन्नियोगेन यातु तावन्महीतलम् । काम्यके द्रक्ष्यसे वीरं निवसन्तं युधिष्ठिरम् ॥
bhavānasmanniyogena yātu tāvanmahītalam | kāmyake drakṣyase vīraṃ nivasantaṃ yudhiṣṭhiram
"आप मेरे अनुरोध से अभी पृथ्वी पर जाइए। काम्यक वन में आप वीर युधिष्ठिर को निवास करते पाएँगे।
श्लोक 33 (3.45.33)
सवाच्यो मम संदेशाद्धर्मात्मा सत्यसंगरः । नोत्कण्ठा फल्गुने कार्या कृतास्त्रः शीघ्रमेष्यति ॥
savācyo mama saṃdeśāddharmātmā satyasaṃgaraḥ | notkaṇṭhā phalgune kāryā kṛtāstraḥ śīghrameṣyati
"उन धर्मात्मा और सत्यप्रतिज्ञ से मेरा यह सन्देश कहिए — 'फल्गुन के लिए चिन्ता न करें; वह अस्त्रविद्या में निपुण होकर शीघ्र लौटेगा।
श्लोक 34 (3.45.34)
नाशुद्धबाहुवीर्येण नाकृतास्त्रेण वा रणे । भीष्मद्रोणादयो युद्धे शक्याः प्रतिसमासितुम् ॥
nāśuddhabāhuvīryeṇa nākṛtāstreṇa vā raṇe | bhīṣmadroṇādayo yuddhe śakyāḥ pratisamāsitum
"'बिना निखरे भुजबल के और बिना अस्त्र-ज्ञान के युद्ध में भीष्म, द्रोण आदि का सामना नहीं किया जा सकता।
श्लोक 35 (3.45.35)
गृहीतास्त्रो गुडाकेशो महाबाहुर्महामनाः । नृत्तवादित्रगीतानां दिव्यानां पारमीयिवान् ॥
gṛhītāstro guḍākeśo mahābāhurmahāmanāḥ | nṛttavāditragītānāṃ divyānāṃ pāramīyivān
"'महाबाहु, महामनस्वी गुडाकेश (अर्जुन) ने अस्त्र प्राप्त कर लिए हैं और दिव्य नृत्य, वाद्य और गान में भी पारंगत हो गए हैं।
श्लोक 36 (3.45.36)
भवानपि विविक्तानि तीर्थानि मनुजेश्वर । भ्रातृभिः सहितः सर्वैर्द्रष्टुमर्हत्यरिंदम ॥
bhavānapi viviktāni tīrthāni manujeśvara | bhrātṛbhiḥ sahitaḥ sarvairdraṣṭumarhatyariṃdama
"'हे मनुजेश्वर, हे शत्रुदमन, आपको भी अपने सब भाइयों के साथ एकान्त पवित्र तीर्थों के दर्शन करने चाहिए।
श्लोक 37 (3.45.37)
तीर्थेष्वाप्लुत्य पुण्येषु विपाप्मा विगतज्वरः । राज्यं भोक्ष्यसि धर्मेण सुखी विगतकल्मषः ॥
tīrtheṣvāplutya puṇyeṣu vipāpmā vigatajvaraḥ | rājyaṃ bhokṣyasi dharmeṇa sukhī vigatakalmaṣaḥ
"'पवित्र तीर्थों में स्नान करके, पापरहित और सन्ताप-मुक्त होकर, आप सुखी और निष्कलंक रहकर धर्मपूर्वक राज्य भोगेंगे।'
श्लोक 38 (3.45.38)
भवांश्चैनं द्विजश्रेष्ठ पर्यटन्तं महीतलम् । त्रातुमर्हति विप्राग्र्य तपोबलसमन्वितः ॥
bhavāṃścainaṃ dvijaśreṣṭha paryaṭantaṃ mahītalam | trātumarhati viprāgrya tapobalasamanvitaḥ
"और हे द्विजश्रेष्ठ, हे विप्रवर, तपोबल से सम्पन्न आप पृथ्वी पर भ्रमण करते हुए उनकी रक्षा करें।
श्लोक 39 (3.45.39)
गिरिदुर्गेषु च सदा देशेषु विषमेषु च । वसन्ति राक्षसा रौद्रास्तेभ्योरक्षां विधास्यति ॥
giridurgeṣu ca sadā deśeṣu viṣameṣu ca | vasanti rākṣasā raudrāstebhyorakṣāṃ vidhāsyati
"क्योंकि पर्वतों के दुर्गम स्थानों और विषम प्रदेशों में सदा भयंकर राक्षस रहते हैं; उनसे आप रक्षा करेंगे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 40 (3.45.40)
एवमुक्ते महेन्द्रेण बीभत्सुरपि लोमशम् । उवाच प्रयतो वाक्यं रक्षेथाः पाण्डुनन्दनम् ॥
evamukte mahendreṇa bībhatsurapi lomaśam | uvāca prayato vākyaṃ rakṣethāḥ pāṇḍunandanam
महेन्द्र के ऐसा कहने पर बीभत्सु (अर्जुन) ने भी विनयपूर्वक लोमश से कहा — "पाण्डुनन्दन (युधिष्ठिर) की रक्षा कीजिए,
अर्जुन उवाच
श्लोक 41 (3.45.41)
यथा गुप्तस्त्वया राजा चरेत्तीर्थानि सत्तम । दानं दद्याद्यथा चैव तथा कुरु महामुने ॥
yathā guptastvayā rājā carettīrthāni sattama | dānaṃ dadyādyathā caiva tathā kuru mahāmune
"और हे सत्तम, हे महामुने, ऐसा कीजिए कि आपसे सुरक्षित होकर राजा तीर्थों में विचरण करें और दान दें।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 42 (3.45.42)
तथेति संप्रतिज्ञाय लोमशः सुमहातपाः । काम्यकं वनमुद्दिश्य समुपायान्महीतलम् ॥
tatheti saṃpratijñāya lomaśaḥ sumahātapāḥ | kāmyakaṃ vanamuddiśya samupāyānmahītalam
"ऐसा ही होगा" — यह वचन देकर महातपस्वी लोमश काम्यक वन की ओर लक्ष्य करके पृथ्वी पर आए।
श्लोक 43 (3.45.43)
ददर्श तत्र कौन्तेयं धर्मराजमरिंदमम् । तापसैर्भ्रातृभिश्चैव सर्वतः परिवारितम् ॥
dadarśa tatra kaunteyaṃ dharmarājamariṃdamam | tāpasairbhrātṛbhiścaiva sarvataḥ parivāritam
वहाँ उन्होंने शत्रुदमन धर्मराज कुन्तीपुत्र को तपस्वियों और भाइयों से चारों ओर घिरा हुआ देखा।