आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 46
अर्जुन के पराक्रम से धृतराष्ट्र का भय
व्यास से यह सुनकर कि अर्जुन इन्द्रलोक गए हैं, धृतराष्ट्र संजय से अपना भय प्रकट करते हैं — उनका उद्दण्ड पुत्र पृथ्वी का विनाश करा देगा, और कौरव पक्ष में भीष्म, द्रोण या कर्ण कोई भी अर्जुन के सामने नहीं टिक सकता। संजय उनसे सहमत होकर द्रौपदी के अपमान पर पाण्डवों के क्रोध, किरात-वेशधारी शिव से अर्जुन के युद्ध और पाशुपत अस्त्र की प्राप्ति, तथा दुर्योधन की जाँघ तोड़ने की भीम की प्रतिज्ञा का स्मरण कराते हैं। धृतराष्ट्र विलाप करते हैं कि उनका पुत्र उनकी बात नहीं सुनता, और कृष्ण जैसे मित्र वाले अर्जुन के सामने उनके पुत्रों का नाश निश्चित है।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (3.46.1)
अत्यद्भुतमिदं कर्म पार्थस्यामिततेजसः । धृतराष्ट्रो महातेजाः श्रुत्वा तत्र किमब्रवीत् ॥
atyadbhutamidaṃ karma pārthasyāmitatejasaḥ | dhṛtarāṣṭro mahātejāḥ śrutvā tatra kimabravīt
अपार तेज वाले पार्थ का यह कर्म अत्यन्त अद्भुत है। इसे सुनकर महातेजस्वी धृतराष्ट्र ने तब क्या कहा?
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 2 (3.46.2)
शक्रलोकगतं पार्थं श्रुत्वा राजाऽम्बिकासुतः । द्वैपायनादृषिश्रेष्ठात्संजयं वाक्यमब्रवीत् ॥
śakralokagataṃ pārthaṃ śrutvā rājā'mbikāsutaḥ | dvaipāyanādṛṣiśreṣṭhātsaṃjayaṃ vākyamabravīt
अम्बिकापुत्र राजा धृतराष्ट्र ने ऋषिश्रेष्ठ द्वैपायन से जब सुना कि पार्थ इन्द्रलोक चले गए हैं, तब उन्होंने संजय से यह बात कही।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 3 (3.46.3)
श्रुतं मे सूत कार्त्स्न्येन कर्म पार्थस्य धीमतः । कच्चित्तवापि विदितं याथातथ्येन सारथे ॥
śrutaṃ me sūta kārtsnyena karma pārthasya dhīmataḥ | kaccittavāpi viditaṃ yāthātathyena sārathe
सूत, मैंने बुद्धिमान पार्थ का कर्म पूरा-पूरा सुन लिया है। सारथि, क्या तुम्हें भी वह ठीक वैसा ही ज्ञात है जैसा वह हुआ?
श्लोक 4 (3.46.4)
प्रमत्तो ग्राम्यधर्मेषु मन्दात्मा पापनिश्चयः । मम पुत्रः सुदुर्बुद्धिः पृथिवीं घातयिष्यति ॥
pramatto grāmyadharmeṣu mandātmā pāpaniścayaḥ | mama putraḥ sudurbuddhiḥ pṛthivīṃ ghātayiṣyati
मेरा पुत्र विषय-भोगों में डूबा हुआ, मन्दबुद्धि, पाप में दृढ़ और अत्यन्त दुर्बुद्धि है; वह पृथ्वी का संहार करा देगा।
श्लोक 5 (3.46.5)
यस्य नित्यमृता वाचः स्वैरेष्वपि महात्मनः । त्रैलोक्यमपि तस्य स्याद्योद्धा यस्य धनंजयः ॥
yasya nityamṛtā vācaḥ svaireṣvapi mahātmanaḥ | trailokyamapi tasya syādyoddhā yasya dhanaṃjayaḥ
जिस महात्मा की वाणी हँसी-विनोद में भी सदा सत्य होती है और धनंजय जिसके लिए युद्ध करने वाले हैं, उसके तो तीनों लोक भी हो सकते हैं।
श्लोक 6 (3.46.6)
अस्यतः कर्णिनाराचांस्तीक्ष्णाग्रांश्च शिलाशितान् । नार्जुनस्याग्रतस्तिष्ठेदपि मृत्युर्जरातिगः ॥
asyataḥ karṇinārācāṃstīkṣṇāgrāṃśca śilāśitān | nārjunasyāgratastiṣṭhedapi mṛtyurjarātigaḥ
जब अर्जुन पत्थर पर तेज किए हुए नुकीले कर्णी और नाराच बाण छोड़ते हैं, तब उनके सामने जरा से परे मृत्यु भी नहीं ठहर सकती।
श्लोक 7 (3.46.7)
मम पुत्रा दुरात्मानः सर्वे मृत्युवशंगताः । येषां युद्धं दुराधर्षैः पाण्डवैः समुपस्थितम् ॥
mama putrā durātmānaḥ sarve mṛtyuvaśaṃgatāḥ | yeṣāṃ yuddhaṃ durādharṣaiḥ pāṇḍavaiḥ samupasthitam
मेरे दुष्ट पुत्र सब मृत्यु के वश में जा पड़े हैं, क्योंकि उनके सामने दुर्जय पाण्डवों से युद्ध आ खड़ा हुआ है।
श्लोक 8 (3.46.8)
तस्यैव च न पश्यामि युधि गाण्डीवधन्वनः । अनिशं चिन्तयानोऽपि य एनमुदियाद्युधि ॥
tasyaiva ca na paśyāmi yudhi gāṇḍīvadhanvanaḥ | aniśaṃ cintayāno'pi ya enamudiyādyudhi
रात-दिन सोचते रहने पर भी मुझे ऐसा कोई नहीं दिखता जो युद्ध में उस गाण्डीवधारी का सामना कर सके।
श्लोक 9 (3.46.9)
द्रोणकर्णौ प्रतीयातां यदि भीष्मोऽपि वा रणे । महान्स्यात्संशयो लोके न तु पश्यामि नो जयम् ॥
droṇakarṇau pratīyātāṃ yadi bhīṣmo'pi vā raṇe | mahānsyātsaṃśayo loke na tu paśyāmi no jayam
यदि द्रोण और कर्ण, अथवा भीष्म भी, रण में उनका सामना करें, तो संसार में बड़ा संशय उत्पन्न होगा; पर मुझे अपनी विजय नहीं दिखती।
श्लोक 10 (3.46.10)
घृणी कर्णः प्रमादी च आचार्यः स्थविरो गुरुः । अमर्षी बलवान्पार्थः संरम्भी दृढविक्रमः ॥
ghṛṇī karṇaḥ pramādī ca ācāryaḥ sthaviro guruḥ | amarṣī balavānpārthaḥ saṃrambhī dṛḍhavikramaḥ
कर्ण दयालु और असावधान है; आचार्य वृद्ध और गुरु हैं। पर पार्थ अमर्षी, बलवान, उद्यमी और दृढ़ पराक्रमी हैं।
श्लोक 11 (3.46.11)
भवेत्सुतुमुलं युद्धं सर्वस्याप्यपराजितम् । सर्वे ह्यस्त्रविदः शूराः सर्वे प्राप्ता महद्यशः ॥
bhavetsutumulaṃ yuddhaṃ sarvasyāpyaparājitam | sarve hyastravidaḥ śūrāḥ sarve prāptā mahadyaśaḥ
बड़ा भयंकर युद्ध होगा, जिसमें कोई भी पराजित नहीं होगा; क्योंकि सभी अस्त्रविद्या के ज्ञाता हैं, सभी शूर हैं और सभी ने बड़ा यश पाया है।
श्लोक 12 (3.46.12)
अपि सर्वेश्वरत्वं हि न वाञ्छेरन्पराजिताः । वधे नूनं भवेच्छान्तिरेतेषां फल्गुनस्य वा ॥
api sarveśvaratvaṃ hi na vāñcheranparājitāḥ | vadhe nūnaṃ bhavecchāntireteṣāṃ phalgunasya vā
पराजित होकर तो वे सबका स्वामित्व भी नहीं चाहेंगे। निश्चय ही शान्ति तभी होगी जब या तो ये मारे जाएँ या फाल्गुन।
श्लोक 13 (3.46.13)
न तु हन्ताऽर्जुनस्यास्ति जेता वाऽस्य न विद्यते । मन्युस्तस्य कथं शाम्येन्मन्दान्प्रति समुत्थितः ॥
na tu hantā'rjunasyāsti jetā vā'sya na vidyate | manyustasya kathaṃ śāmyenmandānprati samutthitaḥ
किन्तु अर्जुन को मारने वाला कोई नहीं है, न उसे जीतने वाला कोई है। मेरे मूर्ख पुत्रों के प्रति उठा हुआ उसका क्रोध भला कैसे शान्त होगा?
श्लोक 14 (3.46.14)
त्रिदशेशसमो वीरः खाण्डवेऽग्निमतर्पयत् । जिगाय पार्थिवान्सर्वान्राजसूये महाक्रतौ ॥
tridaśeśasamo vīraḥ khāṇḍave'gnimatarpayat | jigāya pārthivānsarvānrājasūye mahākratau
देवराज के समान उस वीर ने खाण्डव वन में अग्नि को तृप्त किया और महायज्ञ राजसूय में सब राजाओं को जीत लिया।
श्लोक 15 (3.46.15)
शेषं कुर्याद्गिरेर्वज्रो निपतन्मूर्ध्नि संजय । न तु कुर्युः शराः शेषं क्षिप्तास्तात किरीटिना ॥
śeṣaṃ kuryādgirervajro nipatanmūrdhni saṃjaya | na tu kuryuḥ śarāḥ śeṣaṃ kṣiptāstāta kirīṭinā
संजय, पर्वत के शिखर पर गिरा वज्र तो कुछ शेष छोड़ भी दे, पर तात, किरीटी के छोड़े बाण कुछ भी शेष नहीं छोड़ते।
श्लोक 16 (3.46.16)
यथा हि किरणा भानोस्तपन्तीह चराचरम् । तथा पार्थभुजोत्सृष्टाः शरास्तप्स्यन्ति मत्सुतान् ॥
yathā hi kiraṇā bhānostapantīha carācaram | tathā pārthabhujotsṛṣṭāḥ śarāstapsyanti matsutān
जैसे सूर्य की किरणें यहाँ सारे चराचर को तपाती हैं, वैसे ही पार्थ की भुजाओं से छूटे बाण मेरे पुत्रों को तपाएँगे।
श्लोक 17 (3.46.17)
अपि तद्रथघोषेण भयार्ता सव्यसाचिनः । प्रतिभाति विदीर्णेव सर्वतो भारती चमूः ॥
api tadrathaghoṣeṇa bhayārtā savyasācinaḥ | pratibhāti vidīrṇeva sarvato bhāratī camūḥ
सव्यसाची के रथ की गड़गड़ाहट से ही भरतवंशियों की सेना मुझे भय से पीड़ित और चारों ओर से छिन्न-भिन्न-सी जान पड़ती है।
श्लोक 18 (3.46.18)
समुद्धरन्प्रवपंश्चैव बाणान् । स्थाताऽऽततायी समरे किरीटी । सृष्टोऽन्तकः सर्वहरो विधात्रा । भवेद्यथा तद्वदवारणीयः ॥
samuddharanpravapaṃścaiva bāṇān | sthātā''tatāyī samare kirīṭī | sṛṣṭo'ntakaḥ sarvaharo vidhātrā | bhavedyathā tadvadavāraṇīyaḥ
बाणों को निकालते और छोड़ते हुए किरीटी धनुष ताने रणभूमि में डटे रहेंगे; विधाता के रचे सर्वसंहारक काल के समान वे अनिवार्य होंगे।
सञ्जय उवाच
श्लोक 19 (3.46.19)
यदेतत्कथितं राजंस्त्वया दुर्योधनं प्रति । सर्वमेतद्यथातत्त्वं न तु मिथ्या महीपते ॥
yadetatkathitaṃ rājaṃstvayā duryodhanaṃ prati | sarvametadyathātattvaṃ na tu mithyā mahīpate
राजन्, आपने दुर्योधन के विषय में जो कुछ कहा है, वह सब यथार्थ है; पृथ्वीपति, उसमें कुछ भी मिथ्या नहीं है।
श्लोक 20 (3.46.20)
मन्युना हि समाविष्टाः पाण्डवास्त्वमितौजसः । दृष्ट्वा कृष्णां सभां नीतां धर्मपत्नीं यशस्विनीं ॥
manyunā hi samāviṣṭāḥ pāṇḍavāstvamitaujasaḥ | dṛṣṭvā kṛṣṇāṃ sabhāṃ nītāṃ dharmapatnīṃ yaśasvinīṃ
अपार पराक्रमी पाण्डव क्रोध से भरे हुए हैं, क्योंकि उन्होंने अपनी यशस्विनी धर्मपत्नी कृष्णा को सभा में लाई जाती देखा।
श्लोक 21 (3.46.21)
दुःशासनस्य ता वाचः श्रुत्वा वै कटुकोदयाः । कर्णस्य च महाराज न स्वप्स्यन्तीति मे मतिः ॥
duḥśāsanasya tā vācaḥ śrutvā vai kaṭukodayāḥ | karṇasya ca mahārāja na svapsyantīti me matiḥ
महाराज, दुःशासन और कर्ण के वे कटु परिणाम वाले वचन सुनकर वे चैन से नहीं सोएँगे — ऐसा मेरा मत है।
श्लोक 22 (3.46.22)
श्रुतं हि ते महाराज यथा पार्थेन संयुगे । एकादशतनुः स्थाणुर्धनुषा परितोषितः ॥
śrutaṃ hi te mahārāja yathā pārthena saṃyuge | ekādaśatanuḥ sthāṇurdhanuṣā paritoṣitaḥ
महाराज, आपने सुना ही है कि किस प्रकार युद्ध में पार्थ ने अपने धनुष से ग्यारह रूपों वाले स्थाणु (शिव) को प्रसन्न किया।
श्लोक 23 (3.46.23)
कैरातं वेषमास्थाय योधयामास फल्गुनम् । जिज्ञासुः सर्वदेवेशः कपर्दी भगवान्स्वयम् ॥
kairātaṃ veṣamāsthāya yodhayāmāsa phalgunam | jijñāsuḥ sarvadeveśaḥ kapardī bhagavānsvayam
सब देवताओं के स्वामी जटाधारी भगवान् शिव ने स्वयं उनकी परीक्षा लेने की इच्छा से किरात का वेश धारण कर फाल्गुन से युद्ध किया।
श्लोक 24 (3.46.24)
लेभे पाशुपतं चापि परमास्त्रं महाद्युतिः । तत्रैनं लोकपालास्ते दर्शयामासुरर्जुनम् । अस्त्रहेतोः पराक्रान्तं तपसा कौरवर्षभम् ॥
lebhe pāśupataṃ cāpi paramāstraṃ mahādyutiḥ | tatrainaṃ lokapālāste darśayāmāsurarjunam | astrahetoḥ parākrāntaṃ tapasā kauravarṣabham
उस महातेजस्वी ने परम अस्त्र पाशुपत भी प्राप्त किया। वहीं लोकपालों ने अस्त्रों के लिए तपस्या द्वारा पराक्रम करने वाले कुरुश्रेष्ठ अर्जुन को दर्शन दिए।
श्लोक 25 (3.46.25)
नैतदुत्सहते चान्यो लब्धुमन्यत्र फल्गुनात् । साक्षाद्दर्शनमेतेषामीश्वराणां नरो भुवि ॥
naitadutsahate cānyo labdhumanyatra phalgunāt | sākṣāddarśanameteṣāmīśvarāṇāṃ naro bhuvi
पृथ्वी पर फाल्गुन के सिवा कोई दूसरा मनुष्य इन ईश्वरों का साक्षात् दर्शन पाने का साहस नहीं कर सकता।
श्लोक 26 (3.46.26)
महेश्वरेण यो राजन्न जीर्णो ग्रस्तमूर्तिमान् । कस्तमुत्सहते वीरो युद्धे जरयितुं पुमान् ॥
maheśvareṇa yo rājanna jīrṇo grastamūrtimān | kastamutsahate vīro yuddhe jarayituṃ pumān
राजन्, महेश्वर ने जिसके शरीर को जकड़ लिया फिर भी जो क्षीण नहीं हुआ, उसे युद्ध में क्षीण करने का साहस कौन वीर पुरुष कर सकता है?
श्लोक 27 (3.46.27)
आसादितमिदं घोरं तुमुलं रोमहर्षणम् । द्रौपदीं परिकर्षद्भिः कोपयद्भिश्च पाण्डवान् ॥
āsāditamidaṃ ghoraṃ tumulaṃ romaharṣaṇam | draupadīṃ parikarṣadbhiḥ kopayadbhiśca pāṇḍavān
द्रौपदी को घसीटने वालों और पाण्डवों को कुपित करने वालों ने ही यह घोर, भयानक और रोमांचकारी संकट बुलाया है।
श्लोक 28 (3.46.28)
यत्र विस्फुरमाणौष्ठो भीमः प्राह वचोऽर्थवत् । दृष्ट्वा दुर्योधनेनोरू द्रौपद्या दर्शितावुभौ ॥
yatra visphuramāṇauṣṭho bhīmaḥ prāha vaco'rthavat | dṛṣṭvā duryodhanenorū draupadyā darśitāvubhau
वहीं जब भीम ने देखा कि दुर्योधन ने द्रौपदी को अपनी दोनों जाँघें दिखाईं, तब फड़कते होठों से उन्होंने ये सार्थक वचन कहे —
भीम उवाच
श्लोक 29 (3.46.29)
ऊरुं भेत्स्यामि ते पाप गदया वज्रकल्पया । त्रयोदशानां वर्षाणामन्ते दुर्द्यूतदेविनः ॥
ūruṃ bhetsyāmi te pāpa gadayā vajrakalpayā | trayodaśānāṃ varṣāṇāmante durdyūtadevinaḥ
अरे पापी, कपट के जुए के खिलाड़ी! तेरह वर्ष बीतने पर मैं वज्र-सी गदा से तेरी जाँघ तोड़ डालूँगा।
सञ्जय उवाच
श्लोक 30 (3.46.30)
सर्वे प्रहरतां श्रेष्ठाः सर्वे चामिततेजसः । सर्वे सर्वास्त्रविद्वांसो देवैरपि सुदुर्जयाः ॥
sarve praharatāṃ śreṣṭhāḥ sarve cāmitatejasaḥ | sarve sarvāstravidvāṃso devairapi sudurjayāḥ
वे सब प्रहार करने वालों में श्रेष्ठ हैं, सब अपार तेजस्वी हैं, सब सम्पूर्ण अस्त्रों के ज्ञाता हैं और देवताओं के लिए भी दुर्जय हैं।
श्लोक 31 (3.46.31)
मन्ये मन्युसमुद्भूताः पुत्राणां तव संयुगे । अन्तं पार्थाः करिष्यन्ति वीर्यामर्षसमन्विताः ॥
manye manyusamudbhūtāḥ putrāṇāṃ tava saṃyuge | antaṃ pārthāḥ kariṣyanti vīryāmarṣasamanvitāḥ
मेरा विचार है कि क्रोध से उत्तेजित, पराक्रम और अमर्ष से भरे पार्थ युद्ध में आपके पुत्रों का अन्त कर देंगे।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 32 (3.46.32)
किं कृतं सूत कर्णेन वदता परुषं वचः । पर्याप्तं वैरमेतावद्यत्कृष्णा सा सभां गता ॥
kiṃ kṛtaṃ sūta karṇena vadatā paruṣaṃ vacaḥ | paryāptaṃ vairametāvadyatkṛṣṇā sā sabhāṃ gatā
सूत, कठोर वचन बोलकर कर्ण ने क्या पाया? इतना ही वैर बहुत था कि कृष्णा सभा में लाई गई।
श्लोक 33 (3.46.33)
अपीदानीं मम सुतास्तिष्ठेरन्मन्दचेतसः । येषां भ्राता गुरुर्ज्येष्ठो विनये नावतिष्ठते ॥
apīdānīṃ mama sutāstiṣṭheranmandacetasaḥ | yeṣāṃ bhrātā gururjyeṣṭho vinaye nāvatiṣṭhate
अब मेरे मन्दबुद्धि पुत्र भला कैसे टिक पाएँगे, जब उनका बड़ा भाई और मार्गदर्शक ही नीति के मार्ग पर नहीं चलता?
श्लोक 34 (3.46.34)
ममापि वचनं सूत न शुश्रूषति मन्दभाक् । दृष्ट्वा मां चक्षुषा हीनं निर्विचेष्टमचेतसम् ॥
mamāpi vacanaṃ sūta na śuśrūṣati mandabhāk | dṛṣṭvā māṃ cakṣuṣā hīnaṃ nirviceṣṭamacetasam
सूत, वह अभागा मेरी बात भी नहीं सुनता, क्योंकि वह मुझे नेत्रहीन, निश्चेष्ट और विवेकहीन देखता है।
श्लोक 35 (3.46.35)
ये चास्य सचिवा मन्दाः कर्णसौबलकादयः । ते तस्य भूयसो दोषान्वर्धयन्ति विचेतसः ॥
ye cāsya sacivā mandāḥ karṇasaubalakādayaḥ | te tasya bhūyaso doṣānvardhayanti vicetasaḥ
और उसके जो मूर्ख मन्त्री हैं — कर्ण, सौबल आदि — वे विवेकहीन उसके बहुत-से दोषों को और बढ़ाते रहते हैं।
श्लोक 36 (3.46.36)
स्वैरं मुक्ता ह्यपि शराः पार्थेनामिततेजसा । निर्दहेयुर्मम सुतान्किंपुनर्मन्युनेरिताः ॥
svairaṃ muktā hyapi śarāḥ pārthenāmitatejasā | nirdaheyurmama sutānkiṃpunarmanyuneritāḥ
अपार तेजस्वी पार्थ के यों ही छोड़े हुए बाण भी मेरे पुत्रों को भस्म कर देंगे; फिर क्रोध से प्रेरित बाणों का तो कहना ही क्या!
श्लोक 37 (3.46.37)
पार्थबाहुबलोत्सृष्टा महाचापविनिःसृताः । दिव्यास्त्रमन्त्रमुदिताः सादयेयुः सुरानपि ॥
pārthabāhubalotsṛṣṭā mahācāpaviniḥsṛtāḥ | divyāstramantramuditāḥ sādayeyuḥ surānapi
पार्थ की भुजाओं के बल से छूटे, महान् धनुष से निकले और दिव्यास्त्रों के मन्त्रों से अभिमन्त्रित वे बाण देवताओं को भी धराशायी कर सकते हैं।
श्लोक 38 (3.46.38)
यस्य मन्त्री च गोप्ता च सुहृच्चैव जनार्दनः । हरिस्त्रैलोक्यनाथः स किंनु तस्य न निर्जितम् ॥
yasya mantrī ca goptā ca suhṛccaiva janārdanaḥ | haristrailokyanāthaḥ sa kiṃnu tasya na nirjitam
जिसके मन्त्री, रक्षक और सुहृद् त्रिलोकीनाथ हरि जनार्दन हैं, उसके लिए ऐसा क्या है जो जीता न गया हो?
श्लोक 39 (3.46.39)
इदं हि सुमहच्चित्रमर्जुनस्येह संजय । महादेवेन बाहुभ्यां यत्समेत इति श्रुतिः ॥
idaṃ hi sumahaccitramarjunasyeha saṃjaya | mahādevena bāhubhyāṃ yatsameta iti śrutiḥ
संजय, अर्जुन की यह बड़ी अद्भुत बात है कि उन्होंने महादेव से भुजाओं द्वारा भिड़न्त की — ऐसा सुना जाता है।
श्लोक 40 (3.46.40)
प्रत्यक्षं सर्वलोकस्य खाण्डवे यत्कृतं पुरा । फल्गुनेन सहायार्थे वह्नेर्दामोदरेण च ॥
pratyakṣaṃ sarvalokasya khāṇḍave yatkṛtaṃ purā | phalgunena sahāyārthe vahnerdāmodareṇa ca
और पहले खाण्डव वन में अग्नि की सहायता के लिए फाल्गुन और दामोदर ने जो किया, उसे सारे संसार ने प्रत्यक्ष देखा।
श्लोक 41 (3.46.41)
सर्वथा न हि मे पुत्राः सहामात्याः सबान्धवाः । क्रुद्धे पार्थे च भीमे च वासुदेवे च सात्वते ॥
sarvathā na hi me putrāḥ sahāmātyāḥ sabāndhavāḥ | kruddhe pārthe ca bhīme ca vāsudeve ca sātvate
पार्थ, भीम और सात्वतवंशी वासुदेव के क्रुद्ध होने पर मेरे पुत्र अपने मन्त्रियों और बन्धुओं सहित सर्वथा नष्ट ही हैं।