आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 48
धृतराष्ट्र का भय और वन में की गई प्रतिज्ञाएँ
पाण्डवों के विषय में सुनकर व्याकुल धृतराष्ट्र संजय से कहते हैं कि उन्हें चैन नहीं मिलता, और वे देखते हैं कि नकुल-सहदेव, भीम, अर्जुन और कृष्ण के नेतृत्व में वृष्णि उनकी सेना का नाश कर देंगे। संजय दुर्योधन को न रोकने के लिए उन्हें दोष देते हैं और बताते हैं कि गुप्तचर ने काम्यक वन में क्या सुना — क्रुद्ध कृष्ण ने दुर्योधन और उसके साथियों को मारकर युधिष्ठिर की खोई हुई समृद्धि लौटाने की प्रतिज्ञा की, पर युधिष्ठिर ने उनसे तेरह वर्ष पूरे होने तक रुकने को कहा, और धृष्टद्युम्न आदि वीरों ने द्रौपदी को प्रतिशोध का वचन दिया। अन्त में धृतराष्ट्र मान लेते हैं कि जुए के समय दी गई विदुर की चेतावनी सत्य होगी।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.48.1)
तेषां तच्चरितं श्रुत्वा मनुष्यातीतमद्भुतम् । चिन्ताशोकपरीतात्मा मन्युनाभिपरिप्लुतः ॥
teṣāṃ taccaritaṃ śrutvā manuṣyātītamadbhutam | cintāśokaparītātmā manyunābhipariplutaḥ
उनके अलौकिक और अद्भुत चरित्र को सुनकर धृतराष्ट्र का मन चिन्ता और शोक से घिर गया और वे व्यथा में डूब गए।
श्लोक 2 (3.48.2)
दीर्घमुष्णं च निःश्वस्य धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः । अब्रवीत्संजयं सूतमामन्त्र्य भरतर्षभ ॥
dīrghamuṣṇaṃ ca niḥśvasya dhṛtarāṣṭro'mbikāsutaḥ | abravītsaṃjayaṃ sūtamāmantrya bharatarṣabha
भरतश्रेष्ठ, अम्बिकापुत्र धृतराष्ट्र ने लम्बी और गर्म साँस लेकर सूत संजय को बुलाया और उससे कहा।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 3 (3.48.3)
न रात्रौ न दिवा सूत शान्तिं प्राप्नोमि वै क्षणम् । संचिन्त्य दुर्णयं घोरमतीतं द्यूतजं हि तत् ॥
na rātrau na divā sūta śāntiṃ prāpnomi vai kṣaṇam | saṃcintya durṇayaṃ ghoramatītaṃ dyūtajaṃ hi tat
सूत, जुए से उत्पन्न उस भयंकर बीते हुए अन्याय का स्मरण करके मुझे न रात में, न दिन में, क्षण भर भी शान्ति नहीं मिलती;
श्लोक 4 (3.48.4)
तेषामसह्यवीर्याणां शौर्यं धैर्यं धृतिं पराम् । अन्योन्यमनुरागं च भ्रातॄणामतिमानुषम् ॥
teṣāmasahyavīryāṇāṃ śauryaṃ dhairyaṃ dhṛtiṃ parām | anyonyamanurāgaṃ ca bhrātṝṇāmatimānuṣam
और उन असह्य पराक्रमी भाइयों के शौर्य, धैर्य, परम धृति तथा उनके परस्पर अलौकिक प्रेम का विचार करके भी।
श्लोक 5 (3.48.5)
देवपुत्रौ महाभागौ देवराजसमद्युती । नकुलः सहदेवश्च पाण्डवौ युद्धदुर्मदौ ॥
devaputrau mahābhāgau devarājasamadyutī | nakulaḥ sahadevaśca pāṇḍavau yuddhadurmadau
देवताओं के पुत्र, महाभाग, देवराज के समान तेजस्वी पाण्डुपुत्र नकुल और सहदेव युद्ध में दुर्जय हैं;
श्लोक 6 (3.48.6)
दृढायुधौ दूरपातौ युद्धे च कृतनिश्चयौ । शीघ्रहस्तौ दृढक्रोधौ नित्ययुक्तौ रथे स्थितौ ॥
dṛḍhāyudhau dūrapātau yuddhe ca kṛtaniścayau | śīghrahastau dṛḍhakrodhau nityayuktau rathe sthitau
उनके अस्त्र दृढ़ हैं, वे दूर तक प्रहार करते हैं, युद्ध में दृढ़ निश्चय रखते हैं, फुर्तीले हाथों वाले, स्थिर क्रोध वाले, सदा तत्पर और रथ पर डटे रहने वाले हैं।
श्लोक 7 (3.48.7)
भीमार्जुनौ पुरोधाय यदा तौ रणमूर्धनि । स्थास्येते सिंहविक्रान्तावश्विनाविव दुःसहौ । निःशेषमिह पश्यामि मम सैन्यस्य संजय ॥
bhīmārjunau purodhāya yadā tau raṇamūrdhani | sthāsyete siṃhavikrāntāvaśvināviva duḥsahau | niḥśeṣamiha paśyāmi mama sainyasya saṃjaya
संजय, जब सिंह के समान पराक्रमी और अश्विनीकुमारों के समान दुःसह वे दोनों भीम और अर्जुन को आगे करके रण के मुहाने पर डटेंगे, तब मुझे यहाँ अपनी सेना का कुछ भी शेष नहीं दिखता।
श्लोक 8 (3.48.8)
तौ ह्यप्रतिरथौ युद्धे देवपुत्रौ महारथौ । द्रौपद्यास्तं परिक्लेशं न क्षंस्येतेऽत्यमर्षिणौ ॥
tau hyapratirathau yuddhe devaputrau mahārathau | draupadyāstaṃ parikleśaṃ na kṣaṃsyete'tyamarṣiṇau
युद्ध में अप्रतिम, देवपुत्र, महारथी और अत्यन्त अमर्षी वे दोनों द्रौपदी के उस क्लेश को कभी क्षमा नहीं करेंगे।
श्लोक 9 (3.48.9)
वृष्णयोऽथ महेष्वासाः पाञ्चाला वा महौजसः । युधि सत्याभिसन्धेन वासुदेवेन रक्षिताः । प्रधक्ष्यन्ति रणे पार्थाः पुत्राणां मम वाहिनीम् ॥
vṛṣṇayo'tha maheṣvāsāḥ pāñcālā vā mahaujasaḥ | yudhi satyābhisandhena vāsudevena rakṣitāḥ | pradhakṣyanti raṇe pārthāḥ putrāṇāṃ mama vāhinīm
महाधनुर्धर वृष्णि और महाबली पाञ्चाल भी साथ होंगे; और युद्ध में सत्यप्रतिज्ञ वासुदेव से रक्षित पार्थ रण में मेरे पुत्रों की सेना को भस्म कर डालेंगे।
श्लोक 10 (3.48.10)
रामकृष्णप्रणीतानां वृष्णीनां सूतनन्दन । न शक्यः सहितुं वेगः पर्वतैरपि दुःसहः ॥
rāmakṛṣṇapraṇītānāṃ vṛṣṇīnāṃ sūtanandana | na śakyaḥ sahituṃ vegaḥ parvatairapi duḥsahaḥ
सूतनन्दन, बलराम और कृष्ण के नेतृत्व में चलने वाले वृष्णियों का वेग सहा नहीं जा सकता; पर्वत भी उसे नहीं सह सकते।
श्लोक 11 (3.48.11)
तेषां मध्ये महेष्वासो भीमो भीमपराक्रमः । शैक्यया वीरघातिन्या गदया विचरिष्यति ॥
teṣāṃ madhye maheṣvāso bhīmo bhīmaparākramaḥ | śaikyayā vīraghātinyā gadayā vicariṣyati
उनके बीच भयंकर पराक्रमी महाधनुर्धर भीम छींके में रखी जाने वाली, वीरों का संहार करने वाली अपनी गदा लेकर विचरण करेंगे।
श्लोक 12 (3.48.12)
तथा गाण्डीवनिर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः । गदावेगं च भीमस्य नालं सोढुं नराधिपाः ॥
tathā gāṇḍīvanirghoṣaṃ visphūrjitamivāśaneḥ | gadāvegaṃ ca bhīmasya nālaṃ soḍhuṃ narādhipāḥ
वज्र की कड़क के समान गाण्डीव की टंकार और भीम की गदा का वेग — इन्हें कोई भी राजा सह नहीं सकेगा।
श्लोक 13 (3.48.13)
ततोऽहं सुहृदां वाचो दुर्योधनवशानुगः । स्मरणीयाः स्मरिष्यामि मया या न कृताः पुरा ॥
tato'haṃ suhṛdāṃ vāco duryodhanavaśānugaḥ | smaraṇīyāḥ smariṣyāmi mayā yā na kṛtāḥ purā
तब दुर्योधन की इच्छा के अधीन चलने वाला मैं अपने हितैषियों के उन स्मरणीय वचनों को याद करूँगा, जिनका मैंने पहले पालन नहीं किया।
सञ्जय उवाच
श्लोक 14 (3.48.14)
व्यतिक्रमोऽयं सुमहांस्त्वया राजन्नुपेक्षितः । समर्थेनापि यन्मोहात्पुत्रस्ते न निवारितः ॥
vyatikramo'yaṃ sumahāṃstvayā rājannupekṣitaḥ | samarthenāpi yanmohātputraste na nivāritaḥ
राजन्, आपने यह बहुत बड़ा अपराध होने दिया कि समर्थ होते हुए भी मोहवश आपने अपने पुत्र को नहीं रोका।
श्लोक 15 (3.48.15)
श्रुत्वाऽयं निर्जितान्द्यूते पाण्डवान्मधुसूदनः । त्वरितः काम्यके पार्थान्समभावयदच्युतः ॥
śrutvā'yaṃ nirjitāndyūte pāṇḍavānmadhusūdanaḥ | tvaritaḥ kāmyake pārthānsamabhāvayadacyutaḥ
जब मधुसूदन ने सुना कि पाण्डव जुए में हार गए हैं, तो अच्युत तुरन्त काम्यक वन जाकर पार्थों से मिले और उनका सम्मान किया।
श्लोक 16 (3.48.16)
द्रुपदस्य तथा पुत्रा धृष्टद्युम्नपुरोगमाः । विराटो धृष्टकेतुश्च केकयाश्च महारथाः ॥
drupadasya tathā putrā dhṛṣṭadyumnapurogamāḥ | virāṭo dhṛṣṭaketuśca kekayāśca mahārathāḥ
इसी प्रकार धृष्टद्युम्न आदि द्रुपद के पुत्र, विराट, धृष्टकेतु और महारथी केकय भी वहाँ गए।
श्लोक 17 (3.48.17)
तैश्च यत्कथितं राजन्दृष्ट्वा पार्थान्पराजितान् । चारेण विदितं सर्वं तन्मया वेदितं च ते ॥
taiśca yatkathitaṃ rājandṛṣṭvā pārthānparājitān | cāreṇa viditaṃ sarvaṃ tanmayā veditaṃ ca te
राजन्, पार्थों को पराजित देखकर उन्होंने जो कुछ कहा, वह सब मैंने गुप्तचर के द्वारा जाना और आपको बता दिया है।
श्लोक 18 (3.48.18)
समागम्य वृतस्तत्र पाण्डवैर्मधुसूदनः । सारथ्ये फल्गुनस्याजौ तथेत्याह च तान्हरिः ॥
samāgamya vṛtastatra pāṇḍavairmadhusūdanaḥ | sārathye phalgunasyājau tathetyāha ca tānhariḥ
वहाँ मिलने पर जब पाण्डवों ने मधुसूदन से युद्ध में फाल्गुन का सारथि बनने की प्रार्थना की, तब हरि ने उनसे कहा — "ऐसा ही हो।"
श्लोक 19 (3.48.19)
अमर्षितो हि कृष्णोपि दृष्ट्वा पार्थांस्तदा गतान् । कृष्णाजिनोत्तरासङ्गानब्रवीच्च युधिष्ठिरम् ॥
amarṣito hi kṛṣṇopi dṛṣṭvā pārthāṃstadā gatān | kṛṣṇājinottarāsaṅgānabravīcca yudhiṣṭhiram
काले मृगचर्म को उत्तरीय बनाए वन में आए पार्थों को देखकर कृष्ण भी क्रोधित हुए और उन्होंने युधिष्ठिर से कहा —
वासुदेव उवाच
श्लोक 20 (3.48.20)
या सा समृद्धिः पार्थानामिन्द्रप्रस्थे बभूव ह । राजसूये मया दृष्टा नृपैरन्यैः सुदुर्लभा ॥
yā sā samṛddhiḥ pārthānāmindraprasthe babhūva ha | rājasūye mayā dṛṣṭā nṛpairanyaiḥ sudurlabhā
पार्थों की वह समृद्धि जो इन्द्रप्रस्थ में थी, जिसे मैंने राजसूय में देखा था और जो अन्य राजाओं के लिए अत्यन्त दुर्लभ है;
श्लोक 21 (3.48.21)
यत्र सर्वान्महीपालाञ्शस्त्रतेजोभयार्दितान् । सवङ्गाङ्गान्सपौण्ड्रौढ्रान्सचोलद्रविडान्ध्रकान् ॥
yatra sarvānmahīpālāñśastratejobhayārditān | savaṅgāṅgānsapauṇḍrauḍhrānsacoladraviḍāndhrakān
जहाँ मैंने तुम्हारे शस्त्रों के तेज के भय से पीड़ित सब राजाओं को देखा — वंग और अंग, पौण्ड्र और ओड्र, चोल, द्रविड और आन्ध्र,
श्लोक 22 (3.48.22)
सागरानूपकांश्चैव ये च पत्तनवासिनः । सिंहलान्बर्बरान्म्लेच्छान्ये च लङ्कानिवासिनः ॥
sāgarānūpakāṃścaiva ye ca pattanavāsinaḥ | siṃhalānbarbarānmlecchānye ca laṅkānivāsinaḥ
समुद्र-तट के अनूप प्रदेशों के निवासी और बन्दरगाह-नगरों में रहने वाले, सिंहल, बर्बर, म्लेच्छ और लंका के निवासी,
श्लोक 23 (3.48.23)
पश्चिमानि च राष्ट्राणि शतशः सागरान्तिकान् । पह्लवान्दरदान्सर्वान्किरातान्यवनाञ्शकान् ॥
paścimāni ca rāṣṭrāṇi śataśaḥ sāgarāntikān | pahlavāndaradānsarvānkirātānyavanāñśakān
समुद्र के पास के सैकड़ों पश्चिमी राष्ट्र, पह्लव, दरद, सब किरात, यवन और शक,
श्लोक 24 (3.48.24)
हारहूणांश्च चीनांश्च तुषारान्सैन्धवांस्तथा । जागुडान्रामठान्मुण्डान्स्त्रीराज्यमथ तङ्गणान् ॥
hārahūṇāṃśca cīnāṃśca tuṣārānsaindhavāṃstathā | jāguḍānrāmaṭhānmuṇḍānstrīrājyamatha taṅgaṇān
हारहूण, चीन, तुषार और सैन्धव, जागुड, रामठ, मुण्ड, स्त्रीराज्य और तंगण,
श्लोक 25 (3.48.25)
केकयान्मालवांश्चैव तथा काश्मीरकानपि । अद्राक्षमहमाहूतान्यज्ञे ते परिवेषकान् ॥
kekayānmālavāṃścaiva tathā kāśmīrakānapi | adrākṣamahamāhūtānyajñe te pariveṣakān
केकय, मालव तथा कश्मीर के लोग — इन सबको मैंने तुम्हारे यज्ञ में बुलाए जाकर भोजन परोसते देखा।
श्लोक 26 (3.48.26)
सा ते समृद्धिर्यैरात्ता चपला प्रतिसारिणी । आदाय जीवितं तेषामाहरिष्यामि तामहम् ॥
sā te samṛddhiryairāttā capalā pratisāriṇī | ādāya jīvitaṃ teṣāmāhariṣyāmi tāmaham
वह चंचल और नीचों के पीछे चलने वाली लक्ष्मी जिन लोगों ने तुमसे छीन ली है, उनके प्राण लेकर मैं उसे वापस ले आऊँगा।
श्लोक 27 (3.48.27)
रामेण सह कौरव्य भीमार्जुनयमैस्तथा । अक्रूरगदसाम्बैश्च प्रद्युम्नेनाहुकेन च ॥
rāmeṇa saha kauravya bhīmārjunayamaistathā | akrūragadasāmbaiśca pradyumnenāhukena ca
हे कौरव्य, बलराम के साथ, तथा भीम, अर्जुन और नकुल-सहदेव, अक्रूर, गद और साम्ब, प्रद्युम्न और आहुक के साथ,
श्लोक 28 (3.48.28)
धृष्टद्युम्नेन वीरेण शिशुपालात्मजेन च । दुर्योधनं रणे हत्वा सद्यः कर्णं च भारत । दुःशासनं सौबलेयं यश्चान्यः प्रतियोत्स्यति ॥
dhṛṣṭadyumnena vīreṇa śiśupālātmajena ca | duryodhanaṃ raṇe hatvā sadyaḥ karṇaṃ ca bhārata | duḥśāsanaṃ saubaleyaṃ yaścānyaḥ pratiyotsyati
वीर धृष्टद्युम्न और शिशुपाल के पुत्र के साथ मिलकर, हे भारत, मैं युद्ध में शीघ्र ही दुर्योधन, कर्ण, दुःशासन, सुबलपुत्र और जो कोई भी सामना करेगा, उसे मार डालूँगा।
श्लोक 29 (3.48.29)
ततस्त्वं हास्तिनपुरे भ्रातृभिः सहितो वसन् । धार्तराष्ट्रीं श्रियं प्राप्य प्रशाधि पृथिवीमिमां ॥
tatastvaṃ hāstinapure bhrātṛbhiḥ sahito vasan | dhārtarāṣṭrīṃ śriyaṃ prāpya praśādhi pṛthivīmimāṃ
तब तुम अपने भाइयों के साथ हस्तिनापुर में रहते हुए धृतराष्ट्र-पुत्रों की राजलक्ष्मी प्राप्त कर इस पृथ्वी का शासन करना।
सञ्जय उवाच
श्लोक 30 (3.48.30)
अथैनमब्रवीद्राजा तस्मिन्वीरसमागमे । शृण्वत्स्वेतेषु वीरेषु धृष्टद्युम्नमुखेषु च ॥
athainamabravīdrājā tasminvīrasamāgame | śṛṇvatsveteṣu vīreṣu dhṛṣṭadyumnamukheṣu ca
तब वीरों के उस समागम में, धृष्टद्युम्न आदि सब वीरों के सुनते हुए, राजा युधिष्ठिर ने उनसे कहा —
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 31 (3.48.31)
प्रतिगृह्णामि ते वाचमिमां सत्यां जनार्दन । अमित्रान्मे महाबाहो सानुबन्धान्हनिष्यसि ॥
pratigṛhṇāmi te vācamimāṃ satyāṃ janārdana | amitrānme mahābāho sānubandhānhaniṣyasi
जनार्दन, मैं तुम्हारी इस सत्य वाणी को स्वीकार करता हूँ। महाबाहो, तुम मेरे शत्रुओं को उनके अनुयायियों सहित मारोगे।
श्लोक 32 (3.48.32)
वर्षात्रयोदशादूर्ध्वं सत्यं मां कुरु केशव । प्रतिज्ञातो वने वासो राज्ञां मध्ये मया ह्ययम् ॥
varṣātrayodaśādūrdhvaṃ satyaṃ māṃ kuru keśava | pratijñāto vane vāso rājñāṃ madhye mayā hyayam
किन्तु केशव, तेरहवें वर्ष के बीतने तक मुझे सत्यवादी बने रहने दो; क्योंकि राजाओं के बीच मैंने इस वनवास की प्रतिज्ञा की है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 33 (3.48.33)
धर्मराजस्य वचनं प्रतिश्रुत्य सभासदः । धृष्टद्युम्नपुरोगास्ते समयामासुरञ्जसा ॥
dharmarājasya vacanaṃ pratiśrutya sabhāsadaḥ | dhṛṣṭadyumnapurogāste samayāmāsurañjasā
धर्मराज के वचन सुनकर धृष्टद्युम्न आदि सभासदों ने तुरन्त उन्हें उचित बताया,
श्लोक 34 (3.48.34)
केशवं मधुरैर्वाक्यैः कालयुक्तैरमर्षितम् । पाञ्चालीं प्राहुरक्लिष्टां वासुदेवस्य शृण्वतः ॥
keśavaṃ madhurairvākyaiḥ kālayuktairamarṣitam | pāñcālīṃ prāhurakliṣṭāṃ vāsudevasya śṛṇvataḥ
और मधुर तथा समयोचित वचनों से क्रुद्ध केशव को समझाया; फिर वासुदेव के सुनते हुए उन्होंने निर्मल पाञ्चाली से कहा —
धृष्टद्युम्नादय ऊचुः
श्लोक 35 (3.48.35)
दुर्योधनस्तव क्रोधाद्देवि त्यक्ष्यति जीवितम् । प्रतिजानीम ते सत्यं मा शुचो वरवर्णिनि ॥
duryodhanastava krodhāddevi tyakṣyati jīvitam | pratijānīma te satyaṃ mā śuco varavarṇini
देवि, तुम्हारे क्रोध के कारण दुर्योधन अपने प्राण गँवाएगा। हम तुमसे सच्ची प्रतिज्ञा करते हैं; सुन्दरी, शोक मत करो।
श्लोक 36 (3.48.36)
ये स्म ते कुरवः कृष्णे दृष्ट्वा त्वां प्राहसंस्तदा । मांसानि तेषां खादन्तो हरिष्यन्ति वृकद्विजाः ॥
ye sma te kuravaḥ kṛṣṇe dṛṣṭvā tvāṃ prāhasaṃstadā | māṃsāni teṣāṃ khādanto hariṣyanti vṛkadvijāḥ
कृष्णे, जिन कौरवों ने उस समय तुम्हें देखकर हँसी उड़ाई थी, उनका मांस भेड़िये और पक्षी खाते हुए नोच ले जाएँगे।
श्लोक 37 (3.48.37)
पास्यन्ति रुधिरं तेषां गृध्रा गोमायवस्तथा । उत्तमाङ्गानि कर्षन्तो यैः कृष्टाऽसि सभातले ॥
pāsyanti rudhiraṃ teṣāṃ gṛdhrā gomāyavastathā | uttamāṅgāni karṣanto yaiḥ kṛṣṭā'si sabhātale
जिन्होंने तुम्हें सभा-भवन में घसीटा था, उनके सिर घसीटते हुए गिद्ध और सियार उनका रक्त पिएँगे।
श्लोक 38 (3.48.38)
तेषां द्रक्ष्यसि पाञ्चालि गात्राणि पृथिवीतले । क्रव्यादैः कृष्यमाणानि भक्ष्यमाणानि चासकृत् ॥
teṣāṃ drakṣyasi pāñcāli gātrāṇi pṛthivītale | kravyādaiḥ kṛṣyamāṇāni bhakṣyamāṇāni cāsakṛt
पाञ्चाली, तुम उनके शरीर धरती पर पड़े देखोगी, जिन्हें मांसभक्षी जीव बार-बार घसीटेंगे और खाएँगे।
श्लोक 39 (3.48.39)
परिक्लिष्टाऽसि यैस्तत्र यैश्चासि समुपेक्षिता । तेषामुत्कृत्तशिरसां भूमिः पास्यति शोणितम् ॥
parikliṣṭā'si yaistatra yaiścāsi samupekṣitā | teṣāmutkṛttaśirasāṃ bhūmiḥ pāsyati śoṇitam
जिन्होंने वहाँ तुम्हें क्लेश दिया और जिन्होंने तुम्हारी उपेक्षा की, उनके सिर कटेंगे और धरती उनका रक्त पिएगी।
सञ्जय उवाच
श्लोक 40 (3.48.40)
एवं बहुविधा वाचस्त ऊचुः पुरुषर्षभाः । सर्वे तेजस्विनः शूराः सर्वे चाहतलक्षणाः ॥
evaṃ bahuvidhā vācasta ūcuḥ puruṣarṣabhāḥ | sarve tejasvinaḥ śūrāḥ sarve cāhatalakṣaṇāḥ
उन पुरुषश्रेष्ठों ने ऐसी अनेक बातें कहीं; वे सभी तेजस्वी, शूरवीर और विशिष्ट लक्षणों से युक्त थे।
श्लोक 41 (3.48.41)
ते धर्मराजेन वृता वर्षादूर्ध्वं त्रयोदशात् । पुरस्कृत्योपयास्यन्ति वासुदेवं महारथाः ॥
te dharmarājena vṛtā varṣādūrdhvaṃ trayodaśāt | puraskṛtyopayāsyanti vāsudevaṃ mahārathāḥ
तेरहवें वर्ष के बाद धर्मराज द्वारा वरण किए गए वे महारथी वासुदेव को आगे करके चढ़ाई करेंगे।
श्लोक 42 (3.48.42)
रामश्च कृष्णश्च धनंजयश्च । प्रद्युम्नसाम्बौ युयुधानभीमौ । माद्रीसुतौ केकयराजपुत्राः । पाञ्चालपुत्राः सह मत्स्यराज्ञा ॥
rāmaśca kṛṣṇaśca dhanaṃjayaśca | pradyumnasāmbau yuyudhānabhīmau | mādrīsutau kekayarājaputrāḥ | pāñcālaputrāḥ saha matsyarājñā
बलराम, कृष्ण और धनंजय, प्रद्युम्न और साम्ब, युयुधान और भीम, माद्री के दोनों पुत्र, केकयराज के पुत्र, और मत्स्यराज के साथ पाञ्चालराज के पुत्र —
श्लोक 43 (3.48.43)
एतान्सर्वाँल्लोकवीरानजेया- । न्महात्मनः सानुबन्धान्ससैन्यान् । को जीवितार्थी समरेऽभ्युदीया- । त्क्रुद्धान्सिंहान्केसरिणो यथैव ॥
etānsarvām̐llokavīrānajeyā- | nmahātmanaḥ sānubandhānsasainyān | ko jīvitārthī samare'bhyudīyā- | tkruddhānsiṃhānkesariṇo yathaiva
अपने बन्धुओं और सेनाओं सहित, क्रोध से अयाल फुलाए सिंहों के समान लोक के इन सब अजेय महात्मा वीरों का युद्ध में कौन जीवित रहने का इच्छुक सामना करेगा?
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 44 (3.48.44)
यन्माऽब्रवीद्विदुरो द्यूतकाले । त्वं पाण्डवाञ्जेष्यसि चेन्नरेन्द्र । ध्रुवं कुरूणामयमन्तकालो । महाभयो भविता शोणितौघः ॥
yanmā'bravīdviduro dyūtakāle | tvaṃ pāṇḍavāñjeṣyasi cennarendra | dhruvaṃ kurūṇāmayamantakālo | mahābhayo bhavitā śoṇitaughaḥ
जुए के समय विदुर ने मुझसे जो कहा था — "नरेन्द्र, यदि तुम पाण्डवों को जीतोगे, तो निश्चय ही यह कुरुओं का अन्तकाल होगा, महाभयंकर रक्त की बाढ़ आएगी" —
श्लोक 45 (3.48.45)
मन्ये यथा तद्भवितेति सूत । यथा क्षत्ता प्राह वचः पुरा माम् । असंशयं भविता युद्धमेत- । द्गते काले पाण्डवानां यथोक्तम् ॥
manye yathā tadbhaviteti sūta | yathā kṣattā prāha vacaḥ purā mām | asaṃśayaṃ bhavitā yuddhameta- | dgate kāle pāṇḍavānāṃ yathoktam
सूत, मुझे लगता है कि वैसा ही होगा जैसा विदुर ने पहले मुझसे कहा था। निःसन्देह पाण्डवों का समय बीतने पर यह युद्ध होगा, जैसा कहा गया था।