आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 49
भीम का युद्ध के लिए आग्रह; बृहदश्व द्वारा नलकथा का आरम्भ
अर्जुन के अस्त्र-प्राप्ति के लिए इन्द्रलोक चले जाने पर पाण्डव काम्यक वन में शोक करते हैं। भीम युधिष्ठिर से आग्रह करते हैं कि वे वनवास छोड़कर बारह वर्ष पूरे होने से पहले ही दुर्योधन को मारें और राज्य वापस लें; उनका तर्क है कि छल का उत्तर छल से देना उचित है और वेद-वचन के अनुसार एक दिन एक वर्ष के बराबर माना जा सकता है। युधिष्ठिर प्रेम से समझाते हैं कि वे असत्य नहीं बोल सकते, पर तेरहवें वर्ष के बाद भीम अवश्य दुर्योधन का वध करेंगे। तभी महर्षि बृहदश्व आते हैं, और जब युधिष्ठिर कहते हैं कि उनसे अधिक अभागा कोई राजा नहीं, तो ऋषि राजा नल की कथा आरम्भ करते हैं, जो जुए में राज्य हारकर अपनी पत्नी के साथ अकेले वन में रहे।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (3.49.1)
अस्त्रहेतोर्गते पार्थे शक्रलोकं महात्मनि । युधिष्ठिरप्रभृतयः किमकुर्वत पाण्डवाः ॥
astrahetorgate pārthe śakralokaṃ mahātmani | yudhiṣṭhiraprabhṛtayaḥ kimakurvata pāṇḍavāḥ
जब महात्मा पार्थ अस्त्र पाने के लिए इन्द्रलोक चले गए, तब युधिष्ठिर आदि पाण्डवों ने क्या किया?
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 2 (3.49.2)
अस्त्रहेतोर्गते पार्थे शक्रलोकं महात्मनि । न्यवसन्कृष्णया सार्धं काम्यके भरतर्षभाः ॥
astrahetorgate pārthe śakralokaṃ mahātmani | nyavasankṛṣṇayā sārdhaṃ kāmyake bharatarṣabhāḥ
जब महात्मा पार्थ अस्त्रों के लिए इन्द्रलोक चले गए, तब वे भरतश्रेष्ठ कृष्णा (द्रौपदी) के साथ काम्यक वन में रहने लगे।
श्लोक 3 (3.49.3)
ततः कदाचिदेकान्ते विविक्ते मृदुशाद्वले । दुःखार्ता भरतश्रेष्ठा निषेदुः सह कृष्णया ॥
tataḥ kadācidekānte vivikte mṛduśādvale | duḥkhārtā bharataśreṣṭhā niṣeduḥ saha kṛṣṇayā
फिर एक दिन किसी निर्जन, एकान्त स्थान में कोमल घास पर वे भरतश्रेष्ठ दुःख से व्याकुल होकर द्रौपदी के साथ बैठे।
श्लोक 4 (3.49.4)
धनंजयं शोचमानाः साश्रुकण्ठाः सुदुःखिताः । तद्वियोगार्दितान्सर्वाञ्शोकः समभिपुप्लुवे ॥
dhanaṃjayaṃ śocamānāḥ sāśrukaṇṭhāḥ suduḥkhitāḥ | tadviyogārditānsarvāñśokaḥ samabhipupluve
वे धनंजय के लिए शोक कर रहे थे; उनके कण्ठ आँसुओं से रुँधे थे और वे अत्यन्त दुःखी थे। उसके वियोग से पीड़ित उन सबको शोक ने घेर लिया।
श्लोक 5 (3.49.5)
धनंजयवियोगाच्च राज्यभ्रंशाच्च दुःखिताः । अथ भीमो महाबाहुर्युधिष्ठिरमभाषत ॥
dhanaṃjayaviyogācca rājyabhraṃśācca duḥkhitāḥ | atha bhīmo mahābāhuryudhiṣṭhiramabhāṣata
धनंजय के वियोग और राज्य छिन जाने से दुःखी, महाबाहु भीम ने तब युधिष्ठिर से कहा —
भीम उवाच
श्लोक 6 (3.49.6)
निदेशात्ते महाराज गतोऽसौ भरतर्षभः । अर्जुनः पाण्डुपुत्राणां यस्मिन्प्राणाः प्रतिष्ठिताः ॥
nideśātte mahārāja gato'sau bharatarṣabhaḥ | arjunaḥ pāṇḍuputrāṇāṃ yasminprāṇāḥ pratiṣṭhitāḥ
महाराज, आपकी आज्ञा से वह भरतश्रेष्ठ अर्जुन चला गया है, जिसमें पाण्डुपुत्रों के प्राण बसे हैं।
श्लोक 7 (3.49.7)
यस्मिन्विनष्टे पाञ्चालाः सह पुत्रैस्तथा वयम् । सात्यकिर्वासुदेवश्च विनश्येयुर्न संशयाः ॥
yasminvinaṣṭe pāñcālāḥ saha putraistathā vayam | sātyakirvāsudevaśca vinaśyeyurna saṃśayāḥ
यदि उसका नाश हो जाए तो पुत्रों सहित पाञ्चाल, हम सब, सात्यकि और वासुदेव भी नष्ट हो जाएँगे — इसमें कोई संदेह नहीं।
श्लोक 8 (3.49.8)
योऽसौ गच्छति धर्मात्मा बहून्क्लेशान्विचिन्तयन् । भवन्नियोगाद्बीभत्सुस्ततो दुःखतरं नु किम् ॥
yo'sau gacchati dharmātmā bahūnkleśānvicintayan | bhavanniyogādbībhatsustato duḥkhataraṃ nu kim
वह धर्मात्मा बीभत्सु हमारे अनेक कष्टों का चिन्तन करता हुआ आपकी आज्ञा से चला गया है। इससे बढ़कर दुःख की बात और क्या होगी?
श्लोक 9 (3.49.9)
यस्य बाहू समाश्रित्य वयं सर्वे महात्मनः । मन्यामहे जितानाजौ परान्प्राप्तां च मेदिनीम् ॥
yasya bāhū samāśritya vayaṃ sarve mahātmanaḥ | manyāmahe jitānājau parānprāptāṃ ca medinīm
उस महात्मा की भुजाओं के भरोसे हम सब युद्ध में शत्रुओं को पराजित और पृथ्वी को प्राप्त हुई ही मानते हैं।
श्लोक 10 (3.49.10)
यस्य प्रभावाद्धि वयं सभामध्ये धनुष्मतः । जितान्मन्यामहे सर्वान्धार्तराष्ट्रान्ससौबलान् ॥
yasya prabhāvāddhi vayaṃ sabhāmadhye dhanuṣmataḥ | jitānmanyāmahe sarvāndhārtarāṣṭrānsasaubalān
उसके प्रभाव से हम धनुर्धर सभा के बीच ही शकुनि सहित सभी धृतराष्ट्र-पुत्रों को पराजित हुआ मानते हैं।
श्लोक 11 (3.49.11)
यस्य प्रभावान्न मया सभामध्ये महाबलाः । नीता लोकममुं सर्वे धार्तराष्ट्राः ससौबलाः ॥
yasya prabhāvānna mayā sabhāmadhye mahābalāḥ | nītā lokamamuṃ sarve dhārtarāṣṭrāḥ sasaubalāḥ
उसी के बल के सहारे मैं सभा के बीच ही शकुनि सहित सभी महाबली धृतराष्ट्र-पुत्रों को परलोक भेज सकता था, फिर भी मैंने नहीं भेजा।
श्लोक 12 (3.49.12)
ते वयं बाहुबलिनः क्रोधमुत्थितमात्मनः । सहामहे भवन्मूलं वासुदेवेन पालिताः ॥
te vayaṃ bāhubalinaḥ krodhamutthitamātmanaḥ | sahāmahe bhavanmūlaṃ vāsudevena pālitāḥ
हम भुजबल से सम्पन्न हैं और वासुदेव हमारी रक्षा करते हैं, फिर भी आपके कारण हम अपने भीतर उठे क्रोध को सह रहे हैं।
श्लोक 13 (3.49.13)
मया हि सह कृष्णेन हत्वा कर्णमुखान्परान् । स्वबाहुविजितां कृत्स्नां प्रशाधीमां वसुंधराम् ॥
mayā hi saha kṛṣṇena hatvā karṇamukhānparān | svabāhuvijitāṃ kṛtsnāṃ praśādhīmāṃ vasuṃdharām
क्योंकि कृष्ण के साथ मैं कर्ण आदि शत्रुओं को मार सकता हूँ; तब आप अपनी भुजाओं से जीती हुई इस सम्पूर्ण पृथ्वी पर शासन कीजिए।
श्लोक 14 (3.49.14)
भवतो द्यूतदोषेण सर्वे वयमुपप्लुताः । अहीनपौरुषा राजन्बलिभिर्बलवत्तराः ॥
bhavato dyūtadoṣeṇa sarve vayamupaplutāḥ | ahīnapauruṣā rājanbalibhirbalavattarāḥ
आपके जुए के दोष से हम सब संकट में पड़ गए हैं, जबकि राजन्, हमारा पौरुष तनिक भी कम नहीं हुआ है और सामन्तों से मिले धन से हम और भी बलवान हैं।
श्लोक 15 (3.49.15)
क्षात्रं धर्मं महाराज त्वमवेक्षितुमर्हसि । न हि धर्मो महाराज क्षत्रियस्य वनाश्रयः ॥
kṣātraṃ dharmaṃ mahārāja tvamavekṣitumarhasi | na hi dharmo mahārāja kṣatriyasya vanāśrayaḥ
महाराज, आपको क्षत्रिय-धर्म पर ध्यान देना चाहिए। महाराज, वन में रहना क्षत्रिय का धर्म नहीं है।
श्लोक 16 (3.49.16)
राज्यमेव परं धर्मं क्षत्रियस्य विदुर्बुधाः । स क्षत्रधर्मविद्राजन्माधर्म्यान्नीनशः पथः ॥
rājyameva paraṃ dharmaṃ kṣatriyasya vidurbudhāḥ | sa kṣatradharmavidrājanmādharmyānnīnaśaḥ pathaḥ
बुद्धिमान लोग राज्य को ही क्षत्रिय का परम धर्म मानते हैं। राजन्, आप क्षत्रिय-धर्म के ज्ञाता हैं; धर्म के मार्गों को नष्ट न कीजिए।
श्लोक 17 (3.49.17)
प्राग्द्वादश समा राजन्धार्तराष्ट्रान्निहन्महि । निवर्त्य च वनात्पार्थमानाय्य च जनार्दनम् ॥
prāgdvādaśa samā rājandhārtarāṣṭrānnihanmahi | nivartya ca vanātpārthamānāyya ca janārdanam
राजन्, बारह वर्ष पूरे होने से पहले ही हम पार्थ को वन से लौटाकर और जनार्दन को बुलाकर धृतराष्ट्र-पुत्रों का वध कर दें।
श्लोक 18 (3.49.18)
व्यूढानीकान्महाराज जवेनैव महाहवे । धार्तराष्ट्रानमुं लोकं गमयाम विशांपते ॥
vyūḍhānīkānmahārāja javenaiva mahāhave | dhārtarāṣṭrānamuṃ lokaṃ gamayāma viśāṃpate
महाराज, प्रजानाथ! व्यूह में खड़ी सेनाओं वाले धृतराष्ट्र-पुत्रों को हम महायुद्ध में शीघ्र ही परलोक भेज दें।
श्लोक 19 (3.49.19)
सर्वानहं हनिष्यामि धार्तराष्ट्रान्ससौबलान् । दुर्योधनं च कर्णं च यो वाऽन्यः प्रतियोत्स्यते ॥
sarvānahaṃ haniṣyāmi dhārtarāṣṭrānsasaubalān | duryodhanaṃ ca karṇaṃ ca yo vā'nyaḥ pratiyotsyate
मैं शकुनि सहित सभी धृतराष्ट्र-पुत्रों को मार डालूँगा — दुर्योधन को, कर्ण को और जो कोई दूसरा मुझसे लड़ने आएगा उसे भी।
श्लोक 20 (3.49.20)
मया प्रशमिते पश्चात्त्वमेष्यसि वनं पुनः । एवं कृते न ते दोषो भविष्यति विशांपते ॥
mayā praśamite paścāttvameṣyasi vanaṃ punaḥ | evaṃ kṛte na te doṣo bhaviṣyati viśāṃpate
जब मैं उन्हें शान्त कर दूँगा, उसके बाद आप फिर वन में चले जाइए। प्रजानाथ, ऐसा करने से आपको कोई दोष नहीं लगेगा।
श्लोक 21 (3.49.21)
यज्ञैश्च विविधैस्तात कृतं पापमरिंदम । अवधूय महाराज गच्छेम स्वर्गमुत्तमम् ॥
yajñaiśca vividhaistāta kṛtaṃ pāpamariṃdama | avadhūya mahārāja gacchema svargamuttamam
तात, शत्रुदमन महाराज! फिर अनेक प्रकार के यज्ञों से किए हुए पाप को धोकर हम उत्तम स्वर्ग को जा सकते हैं।
श्लोक 22 (3.49.22)
एवमेतद्भवेद्राजन्यदि राजा न बालिशः । अस्माकं दीर्घसूत्रः स्याद्भवान्धर्मपरायणः ॥
evametadbhavedrājanyadi rājā na bāliśaḥ | asmākaṃ dīrghasūtraḥ syādbhavāndharmaparāyaṇaḥ
राजन्, ऐसा ही होता, यदि हमारे राजा नासमझ और दीर्घसूत्री न होते; पर आप तो धर्मपरायण हैं।
श्लोक 23 (3.49.23)
निकृत्या निकृतिप्रज्ञा हन्तव्या इति निश्चयः । न हि नैकृतिकं हत्वा निकृत्या पापमुच्यते । तथा भारत धर्मेषु धर्मज्ञैरिह दृश्यते ॥
nikṛtyā nikṛtiprajñā hantavyā iti niścayaḥ | na hi naikṛtikaṃ hatvā nikṛtyā pāpamucyate | tathā bhārata dharmeṣu dharmajñairiha dṛśyate
छल में निपुण लोगों को छल से ही मारना चाहिए — यह निश्चित सिद्धान्त है। छली को छल से मारने में पाप नहीं कहा जाता। भारत, धर्म के विषयों में धर्मज्ञ लोग यही मानते हैं।
श्लोक 24 (3.49.24)
अहोरात्रं महाराज तुल्यं संवत्सरेण ह । तथैव वेदवचनं श्रूयते नित्यदा विभो । संवत्सरो महाराज पूर्णो भवति कृच्छ्रतः ॥
ahorātraṃ mahārāja tulyaṃ saṃvatsareṇa ha | tathaiva vedavacanaṃ śrūyate nityadā vibho | saṃvatsaro mahārāja pūrṇo bhavati kṛcchrataḥ
महाराज, एक दिन-रात एक वर्ष के बराबर है — प्रभो, ऐसा वेद-वचन सदा सुना जाता है। महाराज, कृच्छ्र व्रत से भी पूरा वर्ष सम्पन्न हो जाता है।
श्लोक 25 (3.49.25)
यदि वेदाः प्रमाणं ते दिवसादूर्ध्वमच्युत । त्रयोदशादितः कालो ज्ञायतां परिनिष्ठितः ॥
yadi vedāḥ pramāṇaṃ te divasādūrdhvamacyuta | trayodaśāditaḥ kālo jñāyatāṃ pariniṣṭhitaḥ
अच्युत, यदि वेद आपके लिए प्रमाण हैं, तो एक दिन को वर्ष मानकर जान लीजिए कि तेरह का समय पूरा हो चुका है।
श्लोक 26 (3.49.26)
कालो दुर्योधनं हन्तुं सानुबन्धमरिंदम । एकाग्रां पृथिवीं सर्वां पुरा राजन्करोति सः ॥
kālo duryodhanaṃ hantuṃ sānubandhamariṃdama | ekāgrāṃ pṛthivīṃ sarvāṃ purā rājankaroti saḥ
शत्रुदमन राजन्, यही समय है कि दुर्योधन को उसके साथियों सहित मार दिया जाए, इससे पहले कि वह सारी पृथ्वी को अपने एकछत्र अधीन कर ले।
श्लोक 27 (3.49.27)
द्यूतप्रियेण राजेन्द्र तथा तद्भवता कृतम् । प्रायेणाज्ञातचर्यायां वयं सर्वे निपातिताः ॥
dyūtapriyeṇa rājendra tathā tadbhavatā kṛtam | prāyeṇājñātacaryāyāṃ vayaṃ sarve nipātitāḥ
राजेन्द्र, जुए के प्रेमी आपने ही ऐसा कर दिया है; अज्ञातवास के समय तो हम सब लगभग गिरे हुए ही हैं।
श्लोक 28 (3.49.28)
न तं देशं प्रपश्यामि यत्र सोऽस्मान्सुदुर्जनः । न विज्ञास्यति दुष्टात्मा चारैरिति सुयोधनः ॥
na taṃ deśaṃ prapaśyāmi yatra so'smānsudurjanaḥ | na vijñāsyati duṣṭātmā cārairiti suyodhanaḥ
मुझे ऐसा कोई देश नहीं दिखता जहाँ वह महादुष्ट, दुरात्मा सुयोधन अपने गुप्तचरों द्वारा हमारा पता न लगा ले।
श्लोक 29 (3.49.29)
अधिगम्य च सर्वान्नो वनवासमिमं ततः । प्रव्राजयिष्यति पुनर्निकृत्याऽधमपूरुषः । यद्यस्मानभिगच्छेत पापः स हि कथंचन ॥
adhigamya ca sarvānno vanavāsamimaṃ tataḥ | pravrājayiṣyati punarnikṛtyā'dhamapūruṣaḥ | yadyasmānabhigaccheta pāpaḥ sa hi kathaṃcana
और यदि वह पापी किसी प्रकार हमारा पता पा ले, तो हम सबको खोज निकालकर वह अधम पुरुष छल से हमें फिर इसी वनवास में भेज देगा।
श्लोक 30 (3.49.30)
अज्ञातचर्यामुत्तीर्णान्दृष्ट्वा च पुनराह्वयेत् । द्यूतेन ते महाराज पुनर्युद्धं प्रवर्तते ॥
ajñātacaryāmuttīrṇāndṛṣṭvā ca punarāhvayet | dyūtena te mahārāja punaryuddhaṃ pravartate
या अज्ञातवास से पार हुआ देखकर वह फिर से हमें ललकारेगा; महाराज, जुए के द्वारा आपके लिए फिर से संघर्ष छिड़ जाएगा।
श्लोक 31 (3.49.31)
भवांश्च पुनराहूतो द्यूतेनैवापनेष्यति । स तथाऽक्षेषु कुशलो निश्चितो गतचेतनः ॥
bhavāṃśca punarāhūto dyūtenaivāpaneṣyati | sa tathā'kṣeṣu kuśalo niścito gatacetanaḥ
फिर से बुलाए जाने पर आप जुए में ही सब कुछ गँवा देंगे; वह पासों में इतना कुशल है, और आप एक बार ठान लेने पर सुध-बुध खो बैठते हैं;
श्लोक 32 (3.49.32)
चरिष्यसि महाराज वनेषु वसतीः पुनः ॥
cariṣyasi mahārāja vaneṣu vasatīḥ punaḥ
और महाराज, आप फिर से वनों में दिन काटते फिरेंगे।
श्लोक 33 (3.49.33)
यद्यस्मान्सुमहाराज कृपणान्कर्तुमर्हसि । यावज्जीवमवेक्षस्व वेदधर्मांश्च कृत्स्नशः । निकृत्या निकृतिप्रज्ञो हन्तव्य इति निश्चयः ॥
yadyasmānsumahārāja kṛpaṇānkartumarhasi | yāvajjīvamavekṣasva vedadharmāṃśca kṛtsnaśaḥ | nikṛtyā nikṛtiprajño hantavya iti niścayaḥ
महाराज, यदि आप हमें इस दीन दशा में ही रखना चाहते हैं, तो भी जीवन भर सम्पूर्ण वेद-धर्म पर दृष्टि रखिए — छल में निपुण को छल से ही मारना चाहिए, यह निश्चित है।
श्लोक 34 (3.49.34)
अनुज्ञातस्त्वया गत्वा यावच्छक्ति सुयोधनम् । यथैव कक्षमुत्सृष्टो दहेदनिलसारथिः । हनिष्यामि तथा मन्दमनुजानातु मे भवान् ॥
anujñātastvayā gatvā yāvacchakti suyodhanam | yathaiva kakṣamutsṛṣṭo dahedanilasārathiḥ | haniṣyāmi tathā mandamanujānātu me bhavān
आपकी आज्ञा पाकर मैं जाऊँगा और अपनी पूरी शक्ति से उस मूर्ख सुयोधन को वैसे ही मार डालूँगा जैसे वायु जिसका सारथि है वह छोड़ी हुई आग सूखे तिनकों को जला डालती है। आप मुझे आज्ञा दीजिए।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 35 (3.49.35)
एवं ब्रुवाणं भीमं तु धर्मराजो युधिष्ठिरः । उवाच सान्त्वयन्राजा मूर्ध्न्युपाघ्राय पाण्डवम् ॥
evaṃ bruvāṇaṃ bhīmaṃ tu dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | uvāca sāntvayanrājā mūrdhnyupāghrāya pāṇḍavam
भीम के ऐसा कहने पर धर्मराज युधिष्ठिर ने पाण्डुपुत्र भीम का सिर सूँघकर उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा —
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 36 (3.49.36)
असंशयं महाबाहो हनिष्यसि सुयोधनम् । वर्षात्रयोदशादूर्ध्वं सह गाण्डीवधन्वना ॥
asaṃśayaṃ mahābāho haniṣyasi suyodhanam | varṣātrayodaśādūrdhvaṃ saha gāṇḍīvadhanvanā
महाबाहो, इसमें संदेह नहीं कि तेरहवें वर्ष के बाद तुम गाण्डीवधारी अर्जुन के साथ सुयोधन को मारोगे।
श्लोक 37 (3.49.37)
यत्त्वमाभाषसे पार्थ प्राप्तः काल इति प्रभो । अनृतं नोत्सहे वक्तुं न ह्येतन्मयि विद्यते ॥
yattvamābhāṣase pārtha prāptaḥ kāla iti prabho | anṛtaṃ notsahe vaktuṃ na hyetanmayi vidyate
पार्थ, प्रभो! तुम जो कहते हो कि समय आ गया है — मैं असत्य बोलने का साहस नहीं कर सकता; यह मुझमें है ही नहीं।
श्लोक 38 (3.49.38)
अन्तरेणापि कौन्तेय निकृतिं पापनिश्चयम् । हन्ता त्वमसि दुर्धर्ष सानुबन्धं सुयोधनम् ॥
antareṇāpi kaunteya nikṛtiṃ pāpaniścayam | hantā tvamasi durdharṣa sānubandhaṃ suyodhanam
कुन्तीनन्दन, दुर्धर्ष वीर! छल का सहारा लिए बिना भी तुम उस पापी निश्चय वाले सुयोधन को उसके साथियों सहित मारोगे।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 39 (3.49.39)
एवं ब्रुवति भीमं तु धर्मराजे युधिष्ठिरे । आजगाम महाभागो बृहदश्वो महानृषिः ॥
evaṃ bruvati bhīmaṃ tu dharmarāje yudhiṣṭhire | ājagāma mahābhāgo bṛhadaśvo mahānṛṣiḥ
जब धर्मराज युधिष्ठिर भीम से यह कह रहे थे, तभी महाभाग महर्षि बृहदश्व वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 40 (3.49.40)
तमभिप्रेक्ष्य धर्मात्मा संप्राप्तं धर्मचारिणम् । शास्त्रवन्मधुपर्केण पूजयामास धर्मराट् ॥
tamabhiprekṣya dharmātmā saṃprāptaṃ dharmacāriṇam | śāstravanmadhuparkeṇa pūjayāmāsa dharmarāṭ
उस धर्माचारी ऋषि को आया देखकर धर्मात्मा धर्मराज ने शास्त्र-विधि से मधुपर्क द्वारा उनका पूजन किया।
श्लोक 41 (3.49.41)
आश्वस्तं चैनमासीनमुपासीनो युधिष्ठिरः । अभिप्रेक्ष्य महाबाहुः कृपणं बह्वभाषत ॥
āśvastaṃ cainamāsīnamupāsīno yudhiṣṭhiraḥ | abhiprekṣya mahābāhuḥ kṛpaṇaṃ bahvabhāṣata
जब ऋषि विश्राम करके बैठ गए, तब उनके पास बैठे महाबाहु युधिष्ठिर उनकी ओर देखकर दीन भाव से बहुत कुछ कहने लगे —
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 42 (3.49.42)
अक्षद्यूते च भगवन्धनं राज्यं च मे हृतम् । आहूय निकृतिप्रज्ञैः कितवैरक्षकोविदैः ॥
akṣadyūte ca bhagavandhanaṃ rājyaṃ ca me hṛtam | āhūya nikṛtiprajñaiḥ kitavairakṣakovidaiḥ
भगवन्, छल में निपुण, पासों के जानकार जुआरियों ने मुझे बुलाकर जुए में मेरा धन और राज्य हर लिया।
श्लोक 43 (3.49.43)
अनक्षज्ञस्य हि सतो निकृत्या पापनिश्चयैः । भार्या च मे सभां नीता प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ॥
anakṣajñasya hi sato nikṛtyā pāpaniścayaiḥ | bhāryā ca me sabhāṃ nītā prāṇebhyo'pi garīyasī
मैं पासों का जानकार नहीं हूँ, और उन पापी निश्चय वालों ने छल से मेरी उस पत्नी को सभा में घसीट मँगाया जो मुझे प्राणों से भी प्यारी है।
श्लोक 44 (3.49.44)
पुनर्द्यूतेन मां जित्वा वनवासं सुदारुणम् । प्राव्राजयन्महारण्यमजिनैः परिवारितम् ॥
punardyūtena māṃ jitvā vanavāsaṃ sudāruṇam | prāvrājayanmahāraṇyamajinaiḥ parivāritam
फिर से जुए में मुझे जीतकर उन्होंने मृगचर्म पहनाकर मुझे महावन में भयंकर वनवास के लिए भेज दिया।
श्लोक 45 (3.49.45)
अहं वने दुर्वसतीर्वसन्परमदुःखितः । अक्षद्यूताभिषङ्गेण गिरः शृण्वन्सुदारुणाः ॥
ahaṃ vane durvasatīrvasanparamaduḥkhitaḥ | akṣadyūtābhiṣaṅgeṇa giraḥ śṛṇvansudāruṇāḥ
वन में कष्टमय निवास करता हुआ, अत्यन्त दुःखी मैं, पासों के प्रति अपनी आसक्ति के कारण कठोर बातें सुनता रहता हूँ।
श्लोक 46 (3.49.46)
आर्तानां सुहृदां वाचो द्यूतप्रभृति शंसताम् । अहं हृदि श्रिताः स्मृत्वा सर्वरात्रीर्विचिन्तयन् ॥
ārtānāṃ suhṛdāṃ vāco dyūtaprabhṛti śaṃsatām | ahaṃ hṛdi śritāḥ smṛtvā sarvarātrīrvicintayan
जुए के समय से लेकर सब कुछ कहने वाले दुःखी मित्रों की बातें, जो मेरे हृदय में बैठ गई हैं, याद करके मैं सारी-सारी रात चिन्ता में बिताता हूँ।
श्लोक 47 (3.49.47)
यस्मिंश्च वयमायत्ताः सदा गाण्डीवधन्वनि । स चेन्द्रलोकं गतवानस्त्रहेतोर्महाबलः ॥
yasmiṃśca vayamāyattāḥ sadā gāṇḍīvadhanvani | sa cendralokaṃ gatavānastrahetormahābalaḥ
और जिस गाण्डीवधारी पर हम सदा निर्भर रहे हैं, वह महाबली अस्त्रों के लिए इन्द्रलोक चला गया है।
श्लोक 48 (3.49.48)
विना महात्मना तेन गतसत्व इवास्महे । कदा द्रक्ष्यामि बीभत्सुं कृतास्त्रं पुनरागतम् ॥
vinā mahātmanā tena gatasatva ivāsmahe | kadā drakṣyāmi bībhatsuṃ kṛtāstraṃ punarāgatam
उस महात्मा के बिना हम मानो निष्प्राण-से हो गए हैं। कब मैं अस्त्रविद्या पाकर लौटे बीभत्सु को फिर देखूँगा?
श्लोक 49 (3.49.49)
इति सर्वे महेष्वासं चिन्तयाना धनंजयम् । अनेन तु विषण्णोऽहं कारणेन सहानुजः ॥
iti sarve maheṣvāsaṃ cintayānā dhanaṃjayam | anena tu viṣaṇṇo'haṃ kāraṇena sahānujaḥ
इस प्रकार हम सब महाधनुर्धर धनंजय का ही चिन्तन करते रहते हैं। पर मैं अपने छोटे भाइयों सहित इस कारण से उदास हूँ —
श्लोक 50 (3.49.50)
वनवासान्निवृत्तं मां पुनस्ते पापबुद्धयः । जानन्तः प्रीयमाणा वै देवने भ्रातृभिः सह । द्यूतेनैवाह्वयिष्यन्ति बलादक्षेषु तद्विदः ॥
vanavāsānnivṛttaṃ māṃ punaste pāpabuddhayaḥ | jānantaḥ prīyamāṇā vai devane bhrātṛbhiḥ saha | dyūtenaivāhvayiṣyanti balādakṣeṣu tadvidaḥ
जब मैं वनवास से लौटूँगा, तब वे पापबुद्धि लोग मेरी दुर्बलता जानकर, अपने भाइयों के साथ जुए में आनन्द लेते हुए, पासों के जानकार होने के कारण बलपूर्वक मुझे फिर जुए के लिए बुलाएँगे।
श्लोक 51 (3.49.51)
आहूतश्च पुनर्द्यूते नास्मि शक्तो निवर्तितुम् । पणे च मम नात्यर्थं वसु किंचन विद्यते ॥
āhūtaśca punardyūte nāsmi śakto nivartitum | paṇe ca mama nātyarthaṃ vasu kiṃcana vidyate
जुए के लिए फिर बुलाए जाने पर मैं पीछे नहीं हट सकता; और दाँव पर लगाने के लिए मेरे पास अब कोई विशेष धन भी नहीं है।
श्लोक 52 (3.49.52)
एतत्सर्वमनुध्यायंश्चिन्तयानो दिवानिशम् । न मत्तो दुःखिततरः पुमानस्तीह कश्चन ॥
etatsarvamanudhyāyaṃścintayāno divāniśam | na matto duḥkhitataraḥ pumānastīha kaścana
यह सब सोचते हुए, दिन-रात चिन्ता करते हुए मुझे लगता है कि यहाँ मुझसे अधिक दुःखी कोई मनुष्य नहीं है।
श्लोक 53 (3.49.53)
नास्ति राजा मया कश्चिदल्पभाग्यतरो भुवि । भवता दृष्टपूर्वो वा श्रुतपूर्वोऽपि वा क्वचित् । न मत्तो दुःखिततरः पुमानस्तीति मे मतिः ॥
nāsti rājā mayā kaścidalpabhāgyataro bhuvi | bhavatā dṛṣṭapūrvo vā śrutapūrvo'pi vā kvacit | na matto duḥkhitataraḥ pumānastīti me matiḥ
मेरी समझ में पृथ्वी पर ऐसा कोई राजा नहीं, जिसे आपने कहीं देखा या सुना हो, जो मुझसे अधिक अभागा हो। मेरा विश्वास है कि मुझसे अधिक दुःखी कोई पुरुष नहीं है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 54 (3.49.54)
एवं ब्रुवन्तं दुःखार्तमुवाच भगवानृषिः । शोकं व्यपनुदन्राज्ञो धर्मराजस्य धीमतः ॥
evaṃ bruvantaṃ duḥkhārtamuvāca bhagavānṛṣiḥ | śokaṃ vyapanudanrājño dharmarājasya dhīmataḥ
दुःख से पीड़ित होकर ऐसा कहते हुए बुद्धिमान धर्मराज का शोक दूर करते हुए भगवान् ऋषि बोले —
बृहदश्व उवाच
श्लोक 55 (3.49.55)
न विषादे मनः कार्यं त्वया बुद्धिमतां वर । आगमिष्यति बीभत्सुरमित्रांश्च विजेष्यते ॥
na viṣāde manaḥ kāryaṃ tvayā buddhimatāṃ vara | āgamiṣyati bībhatsuramitrāṃśca vijeṣyate
बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, तुम्हें मन को विषाद में नहीं डालना चाहिए। बीभत्सु लौट आएगा और शत्रुओं को जीत लेगा।
श्लोक 56 (3.49.56)
यद्ब्रवीषि महाराज न मत्तो विद्यते क्वचित् । अल्पभाग्यतरः कश्चित्पुमानस्तीति पाण्डव ॥
yadbravīṣi mahārāja na matto vidyate kvacit | alpabhāgyataraḥ kaścitpumānastīti pāṇḍava
महाराज पाण्डुनन्दन, तुम कहते हो कि कहीं भी कोई पुरुष तुमसे अधिक अभागा नहीं है।
श्लोक 57 (3.49.57)
अत्र ते वर्णयिष्यामि यदि शुश्रूषसेऽनघ । यस्त्वत्तो दुःखिततरो राजाऽऽसीत्पृथिवीपते ॥
atra te varṇayiṣyāmi yadi śuśrūṣase'nagha | yastvatto duḥkhitataro rājā''sītpṛthivīpate
निष्पाप पृथ्वीपति, यदि सुनना चाहो तो इस विषय में मैं तुम्हें ऐसे राजा के बारे में बताऊँगा जो तुमसे भी अधिक दुःखी था।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 58 (3.49.58)
अथैनमब्रवीद्राजा ब्रवीतु भगवानिति । इमामवस्थां संप्राप्तं श्रोतुमिच्छामि पार्थिवम् ॥
athainamabravīdrājā bravītu bhagavāniti | imāmavasthāṃ saṃprāptaṃ śrotumicchāmi pārthivam
तब राजा ने उनसे कहा, "भगवन्, कहिए। मैं ऐसी दशा को प्राप्त हुए उस राजा के विषय में सुनना चाहता हूँ।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 59 (3.49.59)
शृणु राजन्नवहितः सह भ्रातृभिरच्युत । यस्त्वत्तो दुःखिततरो राजाऽऽसीत्पृथिवीपते ॥
śṛṇu rājannavahitaḥ saha bhrātṛbhiracyuta | yastvatto duḥkhitataro rājā''sītpṛthivīpate
अच्युत राजन्, अपने भाइयों के साथ ध्यान से सुनो, पृथ्वीपते, उस राजा की कथा जो तुमसे भी अधिक दुःखी था।
श्लोक 60 (3.49.60)
निषधेषु महीपालो वीरसेन इति श्रुतः । तस्य पुत्रोऽभवन्नाम्ना नलो धर्मार्थकोविदः ॥
niṣadheṣu mahīpālo vīrasena iti śrutaḥ | tasya putro'bhavannāmnā nalo dharmārthakovidaḥ
निषध देश में वीरसेन नाम से प्रसिद्ध एक राजा थे। उनके नल नामक पुत्र हुए, जो धर्म और अर्थ के ज्ञाता थे।
श्लोक 61 (3.49.61)
स निकृत्या जितो राजा पुष्करेणेति नः श्रुतम् । वनवासं सुदुःखार्तो भार्यया न्यवसत्सह ॥
sa nikṛtyā jito rājā puṣkareṇeti naḥ śrutam | vanavāsaṃ suduḥkhārto bhāryayā nyavasatsaha
हमने सुना है कि उस राजा को पुष्कर ने छल से हरा दिया, और वह अत्यन्त दुःखी होकर अपनी पत्नी के साथ वन में रहा।
श्लोक 62 (3.49.62)
न तस्य दासा न रथो न भ्राता न च बान्धवाः । वने निवसतो राजन्नश्रूयन्त कदाचन ॥
na tasya dāsā na ratho na bhrātā na ca bāndhavāḥ | vane nivasato rājannaśrūyanta kadācana
राजन्, वन में रहते हुए उसके पास न दास थे, न रथ, न भाई, न बन्धु-बान्धव — कभी किसी का नाम तक न सुना गया।
श्लोक 63 (3.49.63)
भवान्हि संवृतो वीरैर्भ्रातृभिर्देवसंमितैः । ब्रह्मकल्पैर्द्विजाग्र्यैश्च तस्मान्नार्हसि शोचितुम् ॥
bhavānhi saṃvṛto vīrairbhrātṛbhirdevasaṃmitaiḥ | brahmakalpairdvijāgryaiśca tasmānnārhasi śocitum
पर तुम तो देवताओं के समान वीर भाइयों और ब्रह्मा के समान श्रेष्ठ ब्राह्मणों से घिरे हो; इसलिए तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 64 (3.49.64)
विस्तरेणाहमिच्छामि नलस्य सुमहात्मनः । चरितं वदतां श्रेष्ठ तन्ममाख्यातुमर्हसि ॥
vistareṇāhamicchāmi nalasya sumahātmanaḥ | caritaṃ vadatāṃ śreṣṭha tanmamākhyātumarhasi
मैं महात्मा नल का चरित्र विस्तार से सुनना चाहता हूँ। वक्ताओं में श्रेष्ठ, कृपया उसे मुझे सुनाइए।