आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 50
स्वर्णहंस का दौत्य: नल और दमयन्ती
बृहदश्व निषध देश के राजा नल का वर्णन करते हैं, जो गुणों और रूप में अद्वितीय थे, और विदर्भ के राजा भीम का, जिन्हें दमन ऋषि के वरदान से तीन पुत्र और दमयन्ती नाम की कन्या प्राप्त हुई, जो लोकों में सबसे सुन्दर थी। एक-दूसरे के गुण सुनकर नल और दमयन्ती बिना देखे ही प्रेम में पड़ जाते हैं। नल एक स्वर्ण-पंखों वाले हंस को पकड़ लेते हैं; हंस छोड़े जाने के बदले दमयन्ती को उनकी पत्नी बनाने का वचन देता है, विदर्भ जाकर दमयन्ती के सामने नल की प्रशंसा करता है और उसका उत्तर नल तक पहुँचा देता है।
बृहदश्व उवाच
श्लोक 1 (3.50.1)
आसीद्राजा नलो नाम वीरसेनसुतो बली । उपपन्नो गुणैरिष्टै रूपवानश्वकोविदः ॥
āsīdrājā nalo nāma vīrasenasuto balī | upapanno guṇairiṣṭai rūpavānaśvakovidaḥ
वीरसेन के बलवान पुत्र नल नाम के एक राजा थे। वे सभी वांछित गुणों से युक्त, रूपवान और अश्वविद्या में निपुण थे।
श्लोक 2 (3.50.2)
यज्वा दानपतिर्दक्षः सदा शीलपुरस्कृतः । अतिष्ठन्मनुजेन्द्राणां मूर्ध्नि देवपतिर्यथा । उपर्युपरि सर्वेषामादित्य इव तेजसा ॥
yajvā dānapatirdakṣaḥ sadā śīlapuraskṛtaḥ | atiṣṭhanmanujendrāṇāṃ mūrdhni devapatiryathā | uparyupari sarveṣāmāditya iva tejasā
वे यज्ञ करने वाले, उदार दानी, कुशल और सदा सदाचार को आगे रखने वाले थे। वे सब नरेशों के सिर पर वैसे ही विराजते थे जैसे देवराज, और तेज में सूर्य की भाँति सबसे ऊपर थे।
श्लोक 3 (3.50.3)
ब्रह्मण्यो वेदविच्छूरो निषधेषु महीपतिः । अक्षप्रियः सत्यवादी महानक्षौहिणीपतिः ॥
brahmaṇyo vedavicchūro niṣadheṣu mahīpatiḥ | akṣapriyaḥ satyavādī mahānakṣauhiṇīpatiḥ
निषध देश के वे राजा ब्राह्मणों के भक्त, वेदों के ज्ञाता और शूरवीर थे; उन्हें पासे प्रिय थे, वे सत्यवादी थे और एक विशाल अक्षौहिणी सेना के स्वामी थे।
श्लोक 4 (3.50.4)
ईप्सितो नरनारीणामुदारः संयतेन्द्रियः । रक्षिता धन्विनां श्रेष्ठः साक्षादिव मनुः स्वयम् ॥
īpsito naranārīṇāmudāraḥ saṃyatendriyaḥ | rakṣitā dhanvināṃ śreṣṭhaḥ sākṣādiva manuḥ svayam
स्त्री-पुरुष सभी उन्हें चाहते थे; वे उदार, जितेन्द्रिय, रक्षक और धनुर्धरों में श्रेष्ठ थे — मानो स्वयं मनु ही साक्षात् हों।
श्लोक 5 (3.50.5)
तथैवासीद्विदर्भेषु भीमो भीमपराक्रमः । शूरः सर्वगुणैर्युक्तः प्रजाकामः स चाप्रजाः ॥
tathaivāsīdvidarbheṣu bhīmo bhīmaparākramaḥ | śūraḥ sarvaguṇairyuktaḥ prajākāmaḥ sa cāprajāḥ
इसी प्रकार विदर्भ देश में भयंकर पराक्रम वाले भीम नाम के राजा थे। वे शूरवीर और सर्वगुणसम्पन्न थे; उन्हें संतान की कामना थी, पर संतान नहीं थी।
श्लोक 6 (3.50.6)
स प्रजार्थे परं यत्नमकरोत्सुसमाहितः । तमभ्यगच्छद्ब्रह्मर्षिर्दमनो नाम भारत ॥
sa prajārthe paraṃ yatnamakarotsusamāhitaḥ | tamabhyagacchadbrahmarṣirdamano nāma bhārata
उन्होंने एकाग्रचित्त होकर संतान के लिए बड़ा प्रयत्न किया। भारत, तब दमन नाम के एक ब्रह्मर्षि उनके पास आए।
श्लोक 7 (3.50.7)
तं स भीमः प्रजाकामस्तोषयामास धर्मवित् । महिष्या सह राजेन्द्र सत्कारेण सुवर्चसम् ॥
taṃ sa bhīmaḥ prajākāmastoṣayāmāsa dharmavit | mahiṣyā saha rājendra satkāreṇa suvarcasam
राजेन्द्र, संतान की इच्छा रखने वाले धर्मज्ञ भीम ने अपनी रानी के साथ आदर-सत्कार करके उन तेजस्वी ऋषि को प्रसन्न किया।
श्लोक 8 (3.50.8)
तस्मै प्रसन्नो दमनः सभार्याय वरं ददौ । कन्यारत्नं कुमारांश्च त्रीनुदारान्महायशाः ॥
tasmai prasanno damanaḥ sabhāryāya varaṃ dadau | kanyāratnaṃ kumārāṃśca trīnudārānmahāyaśāḥ
प्रसन्न होकर महायशस्वी दमन ने पत्नी सहित राजा को वर दिया — एक कन्यारत्न और तीन उदार पुत्र —
श्लोक 9 (3.50.9)
दमयन्तीं दमं दान्तं दमनं च सुवर्चसम् । उपपन्नान्गुणैः सर्वैर्भीमान्भीमपराक्रमान् ॥
damayantīṃ damaṃ dāntaṃ damanaṃ ca suvarcasam | upapannānguṇaiḥ sarvairbhīmānbhīmaparākramān
दमयन्ती, दम, दान्त और तेजस्वी दमन — ये सब सभी गुणों से सम्पन्न, भयंकर और भयंकर पराक्रम वाले थे।
श्लोक 10 (3.50.10)
दमयन्ती तु रूपेण तेजसा वपुषा श्रिया । सौभाग्येन च लोकेषु यशः प्राप सुमध्यमा ॥
damayantī tu rūpeṇa tejasā vapuṣā śriyā | saubhāgyena ca lokeṣu yaśaḥ prāpa sumadhyamā
सुन्दर कटि वाली दमयन्ती ने अपने रूप, तेज, देह-सौन्दर्य, शोभा और सौभाग्य से सभी लोकों में यश पाया।
श्लोक 11 (3.50.11)
अथ तां वयसि प्राप्ते दासीनां समलंकृतम् । शतं सखीनां च तदा पर्युपास्ते शचीमिव ॥
atha tāṃ vayasi prāpte dāsīnāṃ samalaṃkṛtam | śataṃ sakhīnāṃ ca tadā paryupāste śacīmiva
जब वह युवावस्था को प्राप्त हुई, तब सौ सजी-धजी दासियाँ और सौ सखियाँ उसकी वैसे ही सेवा करती थीं जैसे शची की।
श्लोक 12 (3.50.12)
तत्र स्म राजते भैमी सर्वाभरणभूषिता । सखीमध्येऽनवद्याङ्गी विद्युत्सौदामनी यथा ॥
tatra sma rājate bhaimī sarvābharaṇabhūṣitā | sakhīmadhye'navadyāṅgī vidyutsaudāmanī yathā
वहाँ सब आभूषणों से सजी, निर्दोष अंगों वाली भीमकुमारी सखियों के बीच वैसे ही चमकती थी जैसे बादलों में बिजली।
श्लोक 13 (3.50.13)
अतीव रूपसंपन्ना श्रीरिवायतलोचना । न देवेषु न यक्षेषु तादृग्रूपवती क्वचित् ॥
atīva rūpasaṃpannā śrīrivāyatalocanā | na deveṣu na yakṣeṣu tādṛgrūpavatī kvacit
वह अत्यन्त रूपवती और लक्ष्मी के समान विशाल नेत्रों वाली थी। न देवताओं में, न यक्षों में कहीं वैसी रूपवती थी,
श्लोक 14 (3.50.14)
मानुषेष्वपि चान्येषु दृष्टपूर्वाऽथवा श्रुता । चित्तप्रमाथिनी बाला देवानामपि सुन्दरी ॥
mānuṣeṣvapi cānyeṣu dṛṣṭapūrvā'thavā śrutā | cittapramāthinī bālā devānāmapi sundarī
और न मनुष्यों या दूसरे प्राणियों में ऐसी कोई पहले देखी या सुनी गई थी। वह बाला मन को मथ देने वाली और देवताओं की दृष्टि में भी सुन्दर थी।
श्लोक 15 (3.50.15)
नलश्च नरशार्दूलो रूपेणाप्रतिमो भुवि । कंदर्प इव रूपेण मूर्तिमानभवत्स्वयम् ॥
nalaśca naraśārdūlo rūpeṇāpratimo bhuvi | kaṃdarpa iva rūpeṇa mūrtimānabhavatsvayam
और नरश्रेष्ठ नल रूप में पृथ्वी पर अनुपम थे; रूप में वे मानो स्वयं देहधारी कामदेव थे।
श्लोक 16 (3.50.16)
तस्याः समीपे तु नलं प्रशशंसुः कुतूहलात् । नैषधस्य समीपे तु दमयन्तीं पुनः पुनः ॥
tasyāḥ samīpe tu nalaṃ praśaśaṃsuḥ kutūhalāt | naiṣadhasya samīpe tu damayantīṃ punaḥ punaḥ
लोग कौतूहलवश दमयन्ती के पास नल की प्रशंसा करते, और निषधराज नल के पास बार-बार दमयन्ती की।
श्लोक 17 (3.50.17)
तयोरदृष्टः कामोऽभूच्छृण्वतोः सततं गुणान् । अन्योन्यं प्रति कौन्तेय स व्यवर्धत हृच्छयः ॥
tayoradṛṣṭaḥ kāmo'bhūcchṛṇvatoḥ satataṃ guṇān | anyonyaṃ prati kaunteya sa vyavardhata hṛcchayaḥ
कुन्तीनन्दन, निरन्तर एक-दूसरे के गुण सुनते-सुनते बिना देखे ही उनमें प्रेम जाग उठा और एक-दूसरे के प्रति उनके हृदय का अनुराग बढ़ता गया।
श्लोक 18 (3.50.18)
अशक्नवन्नलः कामं तदा धारयितुं हृदा । अन्तःपुरसमीपस्थे वन आस्ते रहोगतः ॥
aśaknavannalaḥ kāmaṃ tadā dhārayituṃ hṛdā | antaḥpurasamīpasthe vana āste rahogataḥ
जब नल अपने हृदय में उस काम-भाव को और न रोक सके, तब वे अन्तःपुर के पास के उपवन में एकान्त में जाकर बैठ गए।
श्लोक 19 (3.50.19)
स ददर्श ततो हंसाञ्जातरूपपरिच्छदान् । वने विचरतां तेषामेकं जग्राह पक्षिणम् ॥
sa dadarśa tato haṃsāñjātarūpaparicchadān | vane vicaratāṃ teṣāmekaṃ jagrāha pakṣiṇam
वहाँ उन्होंने सोने के पंखों वाले कुछ हंस देखे, और उपवन में विचरते उन हंसों में से एक पक्षी को पकड़ लिया।
श्लोक 20 (3.50.20)
ततोऽन्तरिक्षगो वाचं व्याजहार नलं तदा । हन्तव्योऽस्मि न ते राजन्करिष्यामि तव प्रियम् ॥
tato'ntarikṣago vācaṃ vyājahāra nalaṃ tadā | hantavyo'smi na te rājankariṣyāmi tava priyam
तब उस आकाशचारी पक्षी ने नल से कहा, "राजन्, मुझे मत मारिए। मैं आपका प्रिय कार्य करूँगा।"
हंस उवाच
श्लोक 21 (3.50.21)
दमयन्तीसकाशे त्वां कथयिष्यामि नैषध । यथा त्वदन्यं पुरुषं न सा मंस्यति कर्हिचित् ॥
damayantīsakāśe tvāṃ kathayiṣyāmi naiṣadha | yathā tvadanyaṃ puruṣaṃ na sā maṃsyati karhicit
निषधराज, मैं दमयन्ती के पास आपकी ऐसी चर्चा करूँगा कि वह आपके सिवा किसी दूसरे पुरुष के विषय में कभी सोचेगी भी नहीं।
श्लोक 22 (3.50.22)
तव चैव यथा भार्या भविष्यति तथाऽनघ । विधास्यामि नरव्याघ्र सोऽनुजानातु मां भवान् ॥
tava caiva yathā bhāryā bhaviṣyati tathā'nagha | vidhāsyāmi naravyāghra so'nujānātu māṃ bhavān
निष्पाप नरश्रेष्ठ, मैं ऐसा उपाय करूँगा कि वह आपकी पत्नी बने। अब आप मुझे जाने की अनुमति दीजिए।
बृहदश्व उवाच
श्लोक 23 (3.50.23)
एवमुक्तस्ततो हंसमुत्ससर्ज महीपतिः । ते तु हंसाः समुत्पत्य विदर्भानगमंस्ततः ॥
evamuktastato haṃsamutsasarja mahīpatiḥ | te tu haṃsāḥ samutpatya vidarbhānagamaṃstataḥ
ऐसा कहे जाने पर राजा ने हंस को छोड़ दिया; और वे हंस उड़कर विदर्भ देश को चले गए।
श्लोक 24 (3.50.24)
विदर्भनगरीं गत्वा दमयन्त्यास्तदान्तिके । निपेतुस्ते गरुत्मन्तः सा ददर्शाथ तान्खगान् ॥
vidarbhanagarīṃ gatvā damayantyāstadāntike | nipetuste garutmantaḥ sā dadarśātha tānkhagān
विदर्भ नगरी में पहुँचकर वे पक्षी दमयन्ती के पास उतरे, और उसने उन पक्षियों को देखा।
श्लोक 25 (3.50.25)
सा तानद्भुतरूपान्वै दृष्ट्वा सखिगणावृता । हृष्टा ग्रहीतुं खगमांस्त्वरमाणोपचक्रमे ॥
sā tānadbhutarūpānvai dṛṣṭvā sakhigaṇāvṛtā | hṛṣṭā grahītuṃ khagamāṃstvaramāṇopacakrame
उन अद्भुत रूप वाले पक्षियों को देखकर सखियों से घिरी दमयन्ती प्रसन्न हो उठी और उन्हें पकड़ने के लिए झटपट आगे बढ़ी।
श्लोक 26 (3.50.26)
अथ हंसा विससृपुः सर्वतः प्रमदावने । एकैकशस्तदा कन्यास्तान्हंसान्समुपाद्रवन् ॥
atha haṃsā visasṛpuḥ sarvataḥ pramadāvane | ekaikaśastadā kanyāstānhaṃsānsamupādravan
तब हंस उस प्रमदावन में चारों ओर बिखर गए, और कन्याएँ एक-एक हंस के पीछे दौड़ पड़ीं।
श्लोक 27 (3.50.27)
दमयन्ती तु यं हंसं समुपाधावदन्तिके । स मानुषीं गिरं कृत्वा दमयन्तीमथाब्रवीत् ॥
damayantī tu yaṃ haṃsaṃ samupādhāvadantike | sa mānuṣīṃ giraṃ kṛtvā damayantīmathābravīt
दमयन्ती जिस हंस के पीछे पास ही दौड़ी, उसने मनुष्य की वाणी में दमयन्ती से कहा —
हंस उवाच
श्लोक 28 (3.50.28)
दमयन्ति नलो नाम निषधेषु महीपतिः । अश्विनोः सदृशो रूपे न समास्तस्य मानुषाः ॥
damayanti nalo nāma niṣadheṣu mahīpatiḥ | aśvinoḥ sadṛśo rūpe na samāstasya mānuṣāḥ
दमयन्ती, निषध देश में नल नाम के एक राजा हैं। वे रूप में अश्विनीकुमारों के समान हैं; मनुष्यों में कोई उनकी बराबरी का नहीं।
श्लोक 29 (3.50.29)
कन्दर्प इव रूपेण मूर्तिमानभवत्स्वयम् । तस्य वै यदि भार्या त्वं भवेथा वरवर्णिनि । सफलं ते भवेज्जन्म रूपं चेदं सुमध्यमे ॥
kandarpa iva rūpeṇa mūrtimānabhavatsvayam | tasya vai yadi bhāryā tvaṃ bhavethā varavarṇini | saphalaṃ te bhavejjanma rūpaṃ cedaṃ sumadhyame
रूप में वे मानो देहधारी कामदेव हैं। सुन्दरी, सुमध्यमे, यदि तुम उनकी पत्नी बनो तो तुम्हारा जन्म और यह रूप सफल हो जाए।
श्लोक 30 (3.50.30)
वयं हि देवगन्धर्वमनुष्योरगराक्षसान् । दृष्टवन्तो न चास्माभिर्दृष्टपूर्वस्तथाविधः ॥
vayaṃ hi devagandharvamanuṣyoragarākṣasān | dṛṣṭavanto na cāsmābhirdṛṣṭapūrvastathāvidhaḥ
हमने देवता, गन्धर्व, मनुष्य, नाग और राक्षस — सब देखे हैं, पर उनके जैसा कोई पहले कभी नहीं देखा।
श्लोक 31 (3.50.31)
त्वं चापि रत्नं नारीणां नरेषु च नलो वरः । विशिष्टाया विशिष्टेन संगमो गुणवान्भवेत् ॥
tvaṃ cāpi ratnaṃ nārīṇāṃ nareṣu ca nalo varaḥ | viśiṣṭāyā viśiṣṭena saṃgamo guṇavānbhavet
तुम नारियों में रत्न हो और नल पुरुषों में श्रेष्ठ हैं। विशिष्ट नारी का विशिष्ट पुरुष से मिलन गुणकारी होगा।
बृहदश्व उवाच
श्लोक 32 (3.50.32)
एवमुक्ता तु हंसेन दमयन्ती विशांपते । अब्रवीत्तत्र तं हंसं त्वमप्येवं नलं वद ॥
evamuktā tu haṃsena damayantī viśāṃpate | abravīttatra taṃ haṃsaṃ tvamapyevaṃ nalaṃ vada
प्रजानाथ, हंस के ऐसा कहने पर दमयन्ती ने वहाँ उस हंस से कहा, "तुम नल से भी ऐसा ही कहना।"
श्लोक 33 (3.50.33)
तथेत्युक्त्वाऽण्डजः कन्यां विदर्भस्य विशांपते । पुनरागम्य निषधान्नले सर्वं न्यवेदयत् ॥
tathetyuktvā'ṇḍajaḥ kanyāṃ vidarbhasya viśāṃpate | punarāgamya niṣadhānnale sarvaṃ nyavedayat
प्रजानाथ, विदर्भ की उस कन्या से 'ऐसा ही होगा' कहकर वह पक्षी निषध देश लौट आया और नल को सब कुछ बता दिया।