आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 51
दमयन्ती के स्वयंवर के लिए देवताओं का प्रस्थान
हंस का संदेश सुनकर नल के लिए व्याकुल दमयन्ती पीली पड़ जाती है और उसकी नींद उड़ जाती है। उसकी दशा जानकर पिता भीम उसके स्वयंवर की घोषणा करते हैं, और सब ओर से राजा विदर्भ में आ जुटते हैं। स्वर्ग में इन्द्र अपने यहाँ आए नारद और पर्वत ऋषियों से पूछते हैं कि वीर राजा अब उनके लोक में अतिथि बनकर क्यों नहीं आते; नारद उन्हें अनुपम सुन्दरी दमयन्ती के आगामी स्वयंवर के बारे में बताते हैं। इन्द्र और अग्नि सहित लोकपाल विदर्भ की ओर चल पड़ते हैं; मार्ग में वे कामदेव के समान तेजस्वी नल को देखते हैं और आकाश से उतरकर उनसे अपना दूत बनने को कहते हैं।
बृहदश्व उवाच
श्लोक 1 (3.51.1)
दमयन्ती तु तच्छ्रुत्वा वचो हंसस्य भारत । तदा प्रभृति न स्वस्था नलं प्रति बभूव सा ॥
damayantī tu tacchrutvā vaco haṃsasya bhārata | tadā prabhṛti na svasthā nalaṃ prati babhūva sā
भारत, हंस की वह बात सुनकर उसी समय से दमयन्ती नल के कारण अस्वस्थ-सी रहने लगी।
श्लोक 2 (3.51.2)
ततश्चिन्तापरा दीना विवर्णवदना कृशा । बभूव दमयन्ती तु निःश्वासपरमा तदा ॥
tataścintāparā dīnā vivarṇavadanā kṛśā | babhūva damayantī tu niḥśvāsaparamā tadā
दमयन्ती चिन्ता में डूबी और उदास रहने लगी; उसका मुख फीका पड़ गया, वह दुबली हो गई और बस लम्बी साँसें भरती रहती।
श्लोक 3 (3.51.3)
ऊर्ध्वदृष्टिर्ध्यानपरा बभूवोन्मत्तदर्शना । पाण्डुवर्णा क्षणेनाथ हृच्छयाविष्टचेतना ॥
ūrdhvadṛṣṭirdhyānaparā babhūvonmattadarśanā | pāṇḍuvarṇā kṣaṇenātha hṛcchayāviṣṭacetanā
वह ऊपर की ओर ताकती, ध्यान में खोई रहती और उन्मत्त-सी दिखती; क्षण भर में उसका रंग पीला पड़ जाता, उसका मन प्रेम से भरा था।
श्लोक 4 (3.51.4)
न शय्यासनभोगेषु रतिं विन्दति कर्हिचित् । न नक्तं न दिवा शेते हाहेति रुदती मुहुः ॥
na śayyāsanabhogeṣu ratiṃ vindati karhicit | na naktaṃ na divā śete hāheti rudatī muhuḥ
उसे शय्या, आसन और भोगों में कभी कोई रुचि न रहती; वह न रात को सोती, न दिन में, बार-बार 'हाय-हाय' कहकर रोती रहती।
श्लोक 5 (3.51.5)
तामस्वस्थां तदाकारां सख्यस्ता जज्ञुरिङ्गितैः ॥
tāmasvasthāṃ tadākārāṃ sakhyastā jajñuriṅgitaiḥ
उसकी चेष्टाओं से सखियों ने समझ लिया कि वह अस्वस्थ है और किस दशा में है।
श्लोक 6 (3.51.6)
ततो विदर्भपतये दमयन्त्याः सखीजनः । न्यवेदयत्तामस्वस्थां दमयन्तीं नरेश्वर ॥
tato vidarbhapataye damayantyāḥ sakhījanaḥ | nyavedayattāmasvasthāṃ damayantīṃ nareśvara
नरेश्वर, तब दमयन्ती की सखियों ने विदर्भराज को बताया कि दमयन्ती अस्वस्थ है।
श्लोक 7 (3.51.7)
तच्छ्रुत्वा नृपतिर्भीमो दमयन्तीसखीगणात् । किमर्थं दुहिता मेऽद्य नातिस्वस्थेव लक्ष्यते ॥
tacchrutvā nṛpatirbhīmo damayantīsakhīgaṇāt | kimarthaṃ duhitā me'dya nātisvastheva lakṣyate
दमयन्ती की सखियों से यह सुनकर राजा भीम सोचने लगे, "आज मेरी बेटी इतनी अस्वस्थ-सी क्यों दिखाई देती है?"
श्लोक 8 (3.51.8)
स समीक्ष्य महीपालः स्वां सुतां प्राप्तयौवनाम् । अपश्यदात्मना कार्यं दमयन्त्याः स्वयंवरम् ॥
sa samīkṣya mahīpālaḥ svāṃ sutāṃ prāptayauvanām | apaśyadātmanā kāryaṃ damayantyāḥ svayaṃvaram
अपनी पुत्री को युवावस्था में पहुँची देखकर राजा ने स्वयं समझ लिया कि अब दमयन्ती का स्वयंवर करना कर्तव्य है।
श्लोक 9 (3.51.9)
स सन्निपातयामास महीपालान्विशांपतिः । एषोऽनुभूयतां वीराः स्वयंवर इति प्रभो ॥
sa sannipātayāmāsa mahīpālānviśāṃpatiḥ | eṣo'nubhūyatāṃ vīrāḥ svayaṃvara iti prabho
प्रभो, प्रजापालक राजा ने सब राजाओं को बुलवाया — "वीरो, आइए और इस स्वयंवर को देखिए।"
श्लोक 10 (3.51.10)
श्रुत्वा तु पार्थिवाः सर्वे दमयन्त्याः स्वयंवरम् । अभिजग्मुस्ततो वीरा राजानो भीमशासनात् ॥
śrutvā tu pārthivāḥ sarve damayantyāḥ svayaṃvaram | abhijagmustato vīrā rājāno bhīmaśāsanāt
दमयन्ती के स्वयंवर का समाचार सुनकर सभी वीर राजा भीम के बुलावे पर वहाँ आ पहुँचे,
श्लोक 11 (3.51.11)
हस्त्यश्वरथघोषेण नादयन्तो वसुंधराम् । विचित्रमाल्याभरणैर्बलैर्दृश्यैः स्वलंकृतैः ॥
hastyaśvarathaghoṣeṇa nādayanto vasuṃdharām | vicitramālyābharaṇairbalairdṛśyaiḥ svalaṃkṛtaiḥ
हाथियों, घोड़ों और रथों के शोर से धरती को गुँजाते हुए, रंग-बिरंगी मालाओं और आभूषणों से सजी सुन्दर सेनाओं के साथ।
श्लोक 12 (3.51.12)
तेषां भीमो महाबाहुः पार्थिवानां महात्मनाम् । यथार्हमकरोत्पूजां तेऽवसंस्तत्र पूजिताः ॥
teṣāṃ bhīmo mahābāhuḥ pārthivānāṃ mahātmanām | yathārhamakarotpūjāṃ te'vasaṃstatra pūjitāḥ
महाबाहु भीम ने उन महात्मा राजाओं का यथायोग्य सत्कार किया, और वे सम्मानित होकर वहाँ ठहरे।
श्लोक 13 (3.51.13)
एतस्मिन्नेव काले तु सुराणामृषिसत्तमौ । अटमानौ महात्मानाविन्द्रलोकमितो गतौ ॥
etasminneva kāle tu surāṇāmṛṣisattamau | aṭamānau mahātmānāvindralokamito gatau
उसी समय देवताओं के दो श्रेष्ठ ऋषि, वे महात्मा, विचरण करते हुए यहाँ से इन्द्रलोक गए —
श्लोक 14 (3.51.14)
नारदः पर्वतश्चैव महाप्राज्ञौ महाव्रतौ । देवराजस्य भवनं विविशाते सुपूजितौ ॥
nāradaḥ parvataścaiva mahāprājñau mahāvratau | devarājasya bhavanaṃ viviśāte supūjitau
नारद और पर्वत — दोनों महाबुद्धिमान और महाव्रती। भली-भाँति पूजित होकर उन्होंने देवराज के भवन में प्रवेश किया।
श्लोक 15 (3.51.15)
तावर्चयित्वा मघवा ततः कुशलमव्ययम् । पप्रच्छानामयं चापि तयोः सर्वगतं विभुः ॥
tāvarcayitvā maghavā tataḥ kuśalamavyayam | papracchānāmayaṃ cāpi tayoḥ sarvagataṃ vibhuḥ
मघवा (इन्द्र) ने उनका पूजन किया, और फिर उस सर्वव्यापी प्रभु ने उनसे सब प्रकार की अक्षुण्ण कुशल और आरोग्य पूछा।
नारद उवाच
श्लोक 16 (3.51.16)
आवयोः कुशलं देव सर्वत्रगतमीश्वर । लोके च मघवन्कृत्स्ने नृपाः कुशलिनो विभो ॥
āvayoḥ kuśalaṃ deva sarvatragatamīśvara | loke ca maghavankṛtsne nṛpāḥ kuśalino vibho
हे देव, ईश्वर, हम दोनों का सब ओर कुशल है; और मघवन्, प्रभो, सारे लोक में राजा भी कुशल से हैं।
बृहदश्व उवाच
श्लोक 17 (3.51.17)
नारदस्य वचः श्रुत्वा पप्रच्छ बलवृत्रहा । धर्मज्ञाः पृथिवीपालास्त्यक्तजीवितयोधिनः ॥
nāradasya vacaḥ śrutvā papraccha balavṛtrahā | dharmajñāḥ pṛthivīpālāstyaktajīvitayodhinaḥ
नारद की बात सुनकर बल और वृत्र के संहारक इन्द्र ने पूछा — जो धर्मज्ञ राजा प्राणों का मोह छोड़कर युद्ध करते हैं,
इन्द्र उवाच
श्लोक 18 (3.51.18)
शस्त्रेण निधनं काले ये गच्छन्त्यपराङ्मुखाः । अयं लोकोऽक्षयस्तेषां यथैव मम कामधुक् ॥
śastreṇa nidhanaṃ kāle ye gacchantyaparāṅmukhāḥ | ayaṃ loko'kṣayasteṣāṃ yathaiva mama kāmadhuk
जो समय आने पर पीठ दिखाए बिना शस्त्र से मृत्यु पाते हैं — उनके लिए यह लोक अक्षय है और मेरी ही तरह उनकी सब कामनाएँ पूरी करता है।
श्लोक 19 (3.51.19)
क्व नु ते क्षत्रियाः शूरा नहि पश्यामि तानहम् । आगच्छतो महीपालान्दयितानतिथीन्मम ॥
kva nu te kṣatriyāḥ śūrā nahi paśyāmi tānaham | āgacchato mahīpālāndayitānatithīnmama
वे शूरवीर क्षत्रिय कहाँ हैं? मुझे अपने वे प्रिय अतिथि राजा आते हुए दिखाई नहीं देते।
बृहदश्व उवाच
श्लोक 20 (3.51.20)
एवमुक्तस्तु शक्रेण नारदः प्रत्यभाषत । शृणु मे मघवन्येन न दृश्यन्ते महीक्षितः ॥
evamuktastu śakreṇa nāradaḥ pratyabhāṣata | śṛṇu me maghavanyena na dṛśyante mahīkṣitaḥ
शक्र के ऐसा कहने पर नारद ने उत्तर दिया — मघवन्, सुनिए कि राजा क्यों दिखाई नहीं देते।
नारद उवाच
श्लोक 21 (3.51.21)
विदर्भराज्ञो दुहिता दमयन्तीति विश्रुता । रूपेण समतिक्रान्ता पृथिव्यां सर्वयोषितः ॥
vidarbharājño duhitā damayantīti viśrutā | rūpeṇa samatikrāntā pṛthivyāṃ sarvayoṣitaḥ
विदर्भराज की पुत्री दमयन्ती नाम से विख्यात है; रूप में वह पृथ्वी की सब स्त्रियों से बढ़कर है।
श्लोक 22 (3.51.22)
तस्याः स्वयंवरः शक्र भविता नचिरादिव । तत्र गच्छन्ति राजानो राजपुत्राश्च सर्वशः ॥
tasyāḥ svayaṃvaraḥ śakra bhavitā nacirādiva | tatra gacchanti rājāno rājaputrāśca sarvaśaḥ
शक्र, उसका स्वयंवर शीघ्र ही होने वाला है, और सब ओर से राजा और राजकुमार वहाँ जा रहे हैं।
श्लोक 23 (3.51.23)
तां रत्नभूतां लोकस्य प्रार्थयन्तो महीक्षितः । काङ्क्षन्ति स्म विशेषेण बलवृत्रनिषूदन ॥
tāṃ ratnabhūtāṃ lokasya prārthayanto mahīkṣitaḥ | kāṅkṣanti sma viśeṣeṇa balavṛtraniṣūdana
बल और वृत्र के संहारक, जगत् की रत्नस्वरूपा उस कन्या को पाने के इच्छुक राजा विशेष रूप से उसी की कामना कर रहे हैं।
बृहदश्व उवाच
श्लोक 24 (3.51.24)
एतस्मिन्कथ्यमाने तु लोकपालाश्च साग्निकाः । आजग्मुर्देवराजस्य समीपममरोत्तमाः ॥
etasminkathyamāne tu lokapālāśca sāgnikāḥ | ājagmurdevarājasya samīpamamarottamāḥ
जब यह कहा जा रहा था, तभी अग्नि सहित लोकपाल, वे श्रेष्ठ देवता, देवराज के पास आ पहुँचे।
श्लोक 25 (3.51.25)
ततस्ते शुश्रुवुः सर्वे नारदस्य वचो महत् । श्रुत्वैव चाब्रुवन्हृष्टा गच्छामो वयमप्युत ॥
tataste śuśruvuḥ sarve nāradasya vaco mahat | śrutvaiva cābruvanhṛṣṭā gacchāmo vayamapyuta
उन सबने नारद की वह महत्त्वपूर्ण बात सुनी, और सुनते ही हर्षित होकर बोले, "हम भी चलेंगे।"
श्लोक 26 (3.51.26)
ततः सर्वे महाराज सगणाः सहवाहनाः । विदर्भानभिजग्मुस्ते यतः सर्वे महीक्षितः ॥
tataḥ sarve mahārāja sagaṇāḥ sahavāhanāḥ | vidarbhānabhijagmuste yataḥ sarve mahīkṣitaḥ
महाराज, तब वे सब अपने गणों और वाहनों के साथ विदर्भ देश की ओर चल पड़े, जहाँ सारे राजा एकत्र हो रहे थे।
श्लोक 27 (3.51.27)
नलोऽपि राजा कौन्तेय श्रुत्वा राज्ञां समागमम् । अभ्यगच्छददीनात्मा दमयन्तीमनुव्रतः ॥
nalo'pi rājā kaunteya śrutvā rājñāṃ samāgamam | abhyagacchadadīnātmā damayantīmanuvrataḥ
कुन्तीनन्दन, राजा नल भी राजाओं के उस समागम का समाचार सुनकर, दमयन्ती में अनुरक्त, उत्साहित मन से वहाँ चल पड़े।
श्लोक 28 (3.51.28)
अथ देवाः पथि नलं ददृशुर्भूतले स्थितम् । साक्षादिव स्थितं मूर्त्या मन्मथं रूपसंपदा ॥
atha devāḥ pathi nalaṃ dadṛśurbhūtale sthitam | sākṣādiva sthitaṃ mūrtyā manmathaṃ rūpasaṃpadā
तब देवताओं ने मार्ग में धरती पर खड़े नल को देखा, जो अपने रूप-सौन्दर्य से मानो साक्षात् देहधारी कामदेव थे।
श्लोक 29 (3.51.29)
तं दृष्ट्वा लोकपालास्ते भ्राजमानं यथा रविम् । तस्थुर्विगतसंकल्पा विस्मिता रूपसंपदा ॥
taṃ dṛṣṭvā lokapālāste bhrājamānaṃ yathā ravim | tasthurvigatasaṃkalpā vismitā rūpasaṃpadā
उन्हें सूर्य के समान चमकते देखकर वे लोकपाल ठिठक गए; उनकी आशा जाती रही और वे उनके रूप-वैभव पर चकित रह गए।
श्लोक 30 (3.51.30)
ततोऽन्तरिक्षे विष्टभ्य विमानानि दिवौकसः । अब्रुवन्नैषधं राजन्नवतीर्य नभस्तलात् ॥
tato'ntarikṣe viṣṭabhya vimānāni divaukasaḥ | abruvannaiṣadhaṃ rājannavatīrya nabhastalāt
राजन्, तब स्वर्गवासी देवताओं ने अपने विमान आकाश में रोके और आकाश से नीचे उतरकर निषधराज से कहा —
देवा ऊचुः
श्लोक 31 (3.51.31)
भो भो निषधराजेन्द्र नल सत्यव्रतो भवान् । अस्माकं कुरु साहाय्यं दूतो भव नरोत्तम ॥
bho bho niṣadharājendra nala satyavrato bhavān | asmākaṃ kuru sāhāyyaṃ dūto bhava narottama
हे निषधराजेन्द्र नल! आप सत्यव्रती हैं। हमारी सहायता कीजिए — नरश्रेष्ठ, हमारे दूत बनिए।