आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 52
देवताओं का दूत बनकर नल का दमयन्ती के पास जाना
चारों देवताओं की सेवा का वचन देने के बाद नल को पता चलता है कि वे इन्द्र, अग्नि, वरुण और यम हैं और चाहते हैं कि वह दमयन्ती के पास उनका विवाह-प्रस्ताव लेकर जाए। नल कहता है कि वह स्वयं उससे प्रेम करता है, पर इन्द्र उसे उसके वचन से बाँध देते हैं और उसे पहरेदारों के लिए अदृश्य कर देते हैं। नल दमयन्ती के महल में पहुँचता है, जहाँ उसकी सखियाँ उसका रूप देखकर अवाक् रह जाती हैं; दमयन्ती के पूछने पर वह अपना नाम बताकर देवताओं का संदेश सुनाता है।
बृहदश्व उवाच
श्लोक 1 (3.52.1)
तेभ्यः प्रतिज्ञाय नलः करिष्य इति भारत । अथैतान्परिपप्रच्छ कृताञ्जलिरुपस्थितः ॥
tebhyaḥ pratijñāya nalaḥ kariṣya iti bhārata | athaitānparipapraccha kṛtāñjalirupasthitaḥ
हे भारत! उनसे 'मैं करूँगा' ऐसी प्रतिज्ञा करके नल हाथ जोड़कर उनके सामने खड़े हुए और फिर उनसे पूछा —
नल उवाच
श्लोक 2 (3.52.2)
के वै भवन्तः कश्चासौ यस्याहं दूत ईप्सितः । किंच तत्र मया कार्यं कथयध्वं यथातथम् ॥
ke vai bhavantaḥ kaścāsau yasyāhaṃ dūta īpsitaḥ | kiṃca tatra mayā kāryaṃ kathayadhvaṃ yathātatham
"आप लोग कौन हैं? और वह कौन है जिसका दूत आप मुझे बनाना चाहते हैं? वहाँ मुझे क्या करना होगा? यह मुझे ठीक-ठीक बताइए।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 3 (3.52.3)
एवमुक्ते नैषधेन मघवानभ्यभाषत । अमरान्वै निबोधास्मान्दमयन्त्यर्थमागतान् ॥
evamukte naiṣadhena maghavānabhyabhāṣata | amarānvai nibodhāsmāndamayantyarthamāgatān
निषधराज के ऐसा कहने पर मघवा (इन्द्र) बोले — "हमें देवता जानो, जो दमयन्ती के लिए यहाँ आए हैं।
इन्द्र उवाच
श्लोक 4 (3.52.4)
अहमिन्द्रोऽयमग्निश्च तथैवायमपांपतिः । शरीरान्तकरो नॄणां यमोऽयमपि पार्थिव ॥
ahamindro'yamagniśca tathaivāyamapāṃpatiḥ | śarīrāntakaro nṝṇāṃ yamo'yamapi pārthiva
मैं इन्द्र हूँ, ये अग्नि हैं, और ये जल के स्वामी (वरुण) हैं; और हे राजन्, ये मनुष्यों के शरीर का अन्त करने वाले यम हैं।
श्लोक 5 (3.52.5)
त्वं वै समागतानस्मान्दमयन्त्यै निवेदय । लोकपाला महेन्द्राद्याः समायान्ति दिदृक्षवः ॥
tvaṃ vai samāgatānasmāndamayantyai nivedaya | lokapālā mahendrādyāḥ samāyānti didṛkṣavaḥ
तुम दमयन्ती को हमारे आगमन की सूचना दो और कहो — 'महेन्द्र आदि लोकपाल तुम्हें देखने की इच्छा से आ रहे हैं।'
श्लोक 6 (3.52.6)
प्राप्तुमिच्छन्ति देवास्त्वां शक्रोऽग्निर्वरुणो यमः । तेषामन्यतमं देवं पतित्वे वरयस्व ह ॥
prāptumicchanti devāstvāṃ śakro'gnirvaruṇo yamaḥ | teṣāmanyatamaṃ devaṃ patitve varayasva ha
'शक्र, अग्नि, वरुण और यम — ये देवता तुम्हें पाना चाहते हैं। इनमें से किसी एक देवता को पति के रूप में चुन लो।'"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 7 (3.52.7)
एवमुक्तः स शक्रेण नलः प्राञ्जलिरब्रवीत् । एकार्थसमवेतं मां न प्रेषयितुमर्हथ ॥
evamuktaḥ sa śakreṇa nalaḥ prāñjalirabravīt | ekārthasamavetaṃ māṃ na preṣayitumarhatha
शक्र के ऐसा कहने पर नल ने हाथ जोड़कर कहा — "मैं भी इसी प्रयोजन से यहाँ आया हूँ, अतः आपको मुझे (दूत बनाकर) नहीं भेजना चाहिए।
नल उवाच
श्लोक 8 (3.52.8)
कथं हि जातसंकल्पः स्त्रियमुत्सृजते पुमान् । परार्थमीदृशं वक्तुं तद्वै पश्यामरेश्वर ॥
kathaṃ hi jātasaṃkalpaḥ striyamutsṛjate pumān | parārthamīdṛśaṃ vaktuṃ tadvai paśyāmareśvara
जिस पुरुष का मन किसी स्त्री पर लग चुका हो, वह भला उसे कैसे छोड़ सकता है और दूसरे के लिए उससे ऐसी बात कैसे कह सकता है? हे देवेश्वर, इस पर विचार कीजिए।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 9 (3.52.9)
एवमुक्तो नैषधेन मघवान्पुनरब्रवीत् । करिष्य इति संश्रुत्य पूर्वमस्मासु नैषध । न करिष्यसि कस्मात्त्वं व्रज नैषध माचिरम् ॥
evamukto naiṣadhena maghavānpunarabravīt | kariṣya iti saṃśrutya pūrvamasmāsu naiṣadha | na kariṣyasi kasmāttvaṃ vraja naiṣadha māciram
निषधराज के ऐसा कहने पर मघवा ने फिर कहा — "हे नैषध, पहले तुमने हमसे 'मैं करूँगा' कहकर वचन दिया था; अब क्यों नहीं करोगे? हे नैषध, बिना देर किए जाओ।
इन्द्र उवाच
श्लोक 10 (3.52.10)
स वै त्वमागतानस्मान्दमयन्त्यै निवेदय । श्रेयसा योक्ष्यसे हि त्वं कुर्वन्नमरशासनम् ॥
sa vai tvamāgatānasmāndamayantyai nivedaya | śreyasā yokṣyase hi tvaṃ kurvannamaraśāsanam
तुम दमयन्ती को हमारे आगमन की सूचना दो। देवताओं की आज्ञा का पालन करके तुम निश्चय ही कल्याण के भागी बनोगे।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 11 (3.52.11)
एवमुक्तः स देवैस्तैर्नैषधः पुनरब्रवीत् । सुरक्षितानि वेश्मानि प्रवेष्टुं कथमुत्सहे ॥
evamuktaḥ sa devaistairnaiṣadhaḥ punarabravīt | surakṣitāni veśmāni praveṣṭuṃ kathamutsahe
उन देवताओं के ऐसा कहने पर निषधराज फिर बोले — "वहाँ के भवन भली-भाँति सुरक्षित हैं; मैं उनमें कैसे प्रवेश कर सकूँगा?"
श्लोक 12 (3.52.12)
प्रवेक्ष्यसीति तं शक्रः पुनरेवाभ्यभाषत । जगाम स तथेत्युक्त्वा दमयन्त्या निवेशनम् ॥
pravekṣyasīti taṃ śakraḥ punarevābhyabhāṣata | jagāma sa tathetyuktvā damayantyā niveśanam
शक्र ने उनसे फिर कहा — "तुम प्रवेश कर लोगे।" तब 'ऐसा ही हो' कहकर नल दमयन्ती के महल की ओर चल पड़े।
श्लोक 13 (3.52.13)
ददर्श तत्र वैदर्भीं सखीगणसमावृताम् । देदीप्यमानां वपुषा श्रिया च वरवर्णिनीम् ॥
dadarśa tatra vaidarbhīṃ sakhīgaṇasamāvṛtām | dedīpyamānāṃ vapuṣā śriyā ca varavarṇinīm
वहाँ उन्होंने सखियों से घिरी हुई विदर्भकुमारी को देखा, वह सुन्दरी अपने शरीर की शोभा और कान्ति से दमक रही थी;
श्लोक 14 (3.52.14)
अतीव सुकुमाराङ्गीं तनुमध्यां सुलोचनाम् । आक्षिपन्तीमिव च तां शशिनं स्वेन तेजसा ॥
atīva sukumārāṅgīṃ tanumadhyāṃ sulocanām | ākṣipantīmiva ca tāṃ śaśinaṃ svena tejasā
उसके अंग अत्यन्त कोमल थे, कमर पतली और नेत्र सुन्दर थे; वह मानो अपने तेज से चन्द्रमा को भी फीका कर रही थी।
श्लोक 15 (3.52.15)
तस्य दृष्ट्वैव ववृधे कामस्तां चारुहासिनीम् । सत्यं चिकीर्षमाणस्तु धारयामास हृच्छयम् ॥
tasya dṛṣṭvaiva vavṛdhe kāmastāṃ cāruhāsinīm | satyaṃ cikīrṣamāṇastu dhārayāmāsa hṛcchayam
उस मधुर मुस्कान वाली को देखते ही नल के मन में कामना बढ़ गई, किन्तु सत्य का पालन करने की इच्छा से उन्होंने हृदय के प्रेम को रोक रखा।
श्लोक 16 (3.52.16)
ततस्ता नैषधं दृष्ट्वा संभ्रान्ताः परमाङ्गनाः । आसनेभ्यः समुत्पेतुस्तेजसा तस्य धर्षिताः ॥
tatastā naiṣadhaṃ dṛṣṭvā saṃbhrāntāḥ paramāṅganāḥ | āsanebhyaḥ samutpetustejasā tasya dharṣitāḥ
तब वे सुन्दर स्त्रियाँ निषधराज को देखकर घबरा गईं और उनके तेज से अभिभूत होकर अपने आसनों से उठ खड़ी हुईं।
श्लोक 17 (3.52.17)
प्रशशंसुश्च सुप्रीता नलं ता विस्मयान्विताः । न चैनमभ्यभाषन्त मनोभिस्त्वभ्यपूजयन् ॥
praśaśaṃsuśca suprītā nalaṃ tā vismayānvitāḥ | na cainamabhyabhāṣanta manobhistvabhyapūjayan
विस्मय और प्रसन्नता से भरी वे स्त्रियाँ नल की प्रशंसा करने लगीं। उन्होंने उनसे कुछ कहा नहीं, पर मन ही मन उनका सम्मान किया —
श्लोक 18 (3.52.18)
अहो रूपमहो कान्तिरहो धैर्यं महात्मनः । कोऽयं देवोऽथवा यक्षो गन्धर्वो वा भविष्यति ॥
aho rūpamaho kāntiraho dhairyaṃ mahātmanaḥ | ko'yaṃ devo'thavā yakṣo gandharvo vā bhaviṣyati
"अहा, कैसा रूप! कैसी कान्ति! इस महात्मा का कैसा धैर्य! यह कौन होगा — कोई देवता, यक्ष या गन्धर्व?"
श्लोक 19 (3.52.19)
न तास्तं शक्नुवन्ति स्म व्याहर्तुमपि किंचन । तेजसा धर्षितास्तस्य लज्जावत्यो वराङ्गनाः ॥
na tāstaṃ śaknuvanti sma vyāhartumapi kiṃcana | tejasā dharṣitāstasya lajjāvatyo varāṅganāḥ
वे सुन्दरियाँ उनसे एक शब्द भी नहीं कह सकीं; उनके तेज से अभिभूत होकर वे लज्जा से भर गईं।
श्लोक 20 (3.52.20)
अथैनं स्मयमानेव स्मितपूर्वाभिभाषिणी । दमयन्ती नलं वीरमभ्यभाषत विस्मिता ॥
athainaṃ smayamāneva smitapūrvābhibhāṣiṇī | damayantī nalaṃ vīramabhyabhāṣata vismitā
तब मुस्कराकर बोलने वाली दमयन्ती ने विस्मित होकर, मुस्कराते हुए, वीर नल से कहा —
दमयन्त्युवाच
श्लोक 21 (3.52.21)
कस्त्वं सर्वानवद्याङ्ग मम हृच्छयवर्धन । प्राप्तोऽस्यमरवद्वीर ज्ञातुमिच्छामि तेऽनघ ॥
kastvaṃ sarvānavadyāṅga mama hṛcchayavardhana | prāpto'syamaravadvīra jñātumicchāmi te'nagha
"हे सर्वांगसुन्दर, मेरे हृदय के प्रेम को बढ़ाने वाले, तुम कौन हो? हे वीर, तुम किसी देवता की भाँति यहाँ आ पहुँचे हो; हे निष्पाप, मैं जानना चाहती हूँ कि तुम कौन हो।
श्लोक 22 (3.52.22)
कथमागमनं चेह कथं चासि न लक्षितः । सुरक्षितं हि मे वेश्म राजा चैवोग्रशासनः ॥
kathamāgamanaṃ ceha kathaṃ cāsi na lakṣitaḥ | surakṣitaṃ hi me veśma rājā caivograśāsanaḥ
तुम यहाँ कैसे आए, और किसी ने तुम्हें देखा क्यों नहीं? मेरा भवन तो भली-भाँति सुरक्षित है, और राजा का शासन बड़ा कठोर है।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 23 (3.52.23)
एवमुक्तस्तु वैदर्भ्या नलस्तां प्रत्युवाच ह । नलं मां विद्धि कल्याणि देवदूतमिहागतम् ॥
evamuktastu vaidarbhyā nalastāṃ pratyuvāca ha | nalaṃ māṃ viddhi kalyāṇi devadūtamihāgatam
विदर्भकुमारी के ऐसा कहने पर नल ने उत्तर दिया — "हे कल्याणी, मुझे नल जानो, जो देवताओं का दूत बनकर यहाँ आया है।
नल उवाच
श्लोक 24 (3.52.24)
देवास्त्वां प्राप्तुमिच्छन्ति शक्रोऽग्निर्वरुणो यमः । तेषामन्यतमं देवं पतिं वरय शोभने ॥
devāstvāṃ prāptumicchanti śakro'gnirvaruṇo yamaḥ | teṣāmanyatamaṃ devaṃ patiṃ varaya śobhane
शक्र, अग्नि, वरुण और यम — ये देवता तुम्हें पाना चाहते हैं। हे शोभने, इनमें से किसी एक देवता को पति चुन लो।
श्लोक 25 (3.52.25)
तेषामेव प्रभावेण प्रविष्टोऽहमलक्षितः । प्रविशन्तं न मां कश्चिदपश्यन्नाप्यवारयत् ॥
teṣāmeva prabhāveṇa praviṣṭo'hamalakṣitaḥ | praviśantaṃ na māṃ kaścidapaśyannāpyavārayat
उन्हीं के प्रभाव से मैं बिना दिखे भीतर आ गया। भीतर आते हुए मुझे न किसी ने देखा, न किसी ने रोका।
श्लोक 26 (3.52.26)
एतदर्थमहं भद्रे प्रेषितः सुरसत्तमैः । एतच्छ्रुत्वा शुभे बुद्धिं प्रकुरुष्व यथेच्छसि ॥
etadarthamahaṃ bhadre preṣitaḥ surasattamaiḥ | etacchrutvā śubhe buddhiṃ prakuruṣva yathecchasi
हे भद्रे, इसी प्रयोजन से श्रेष्ठ देवताओं ने मुझे भेजा है। हे शुभे, यह सुनकर जैसा चाहो वैसा निर्णय करो।"