आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 53
देवदूत नल को दमयन्ती का उत्तर
दमयन्ती स्वयं को नल को समर्पित करती है और कहती है कि ठुकराए जाने पर वह प्राण दे देगी। नल उससे किसी देवता को चुनने का आग्रह करता है, अग्नि, यम, इन्द्र और वरुण की बारी-बारी से प्रशंसा करता है, और कहता है कि दूत होकर वह अपना स्वार्थ नहीं साध सकता। दमयन्ती उपाय सुझाती है कि नल और देवता सब उसके स्वयंवर में आएँ, जहाँ वह उनके सामने ही नल को वरेगी, जिससे नल पर कोई दोष न आए। नल लौटकर देवताओं को सारी बात ज्यों की त्यों बता देता है।
बृहदश्व उवाच
श्लोक 1 (3.53.1)
सा नमस्कृत्य देवेभ्यः प्रहस्य नलमब्रवीत् । प्रणयस्व यथाश्रद्धं राजन्किं करवाणि ते ॥
sā namaskṛtya devebhyaḥ prahasya nalamabravīt | praṇayasva yathāśraddhaṃ rājankiṃ karavāṇi te
देवताओं को नमस्कार करके दमयन्ती ने हँसते हुए नल से कहा — "हे राजन्, अपनी इच्छा के अनुसार मुझसे विवाह करो। बताओ, मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ?
दमयन्त्युवाच
श्लोक 2 (3.53.2)
अहं चैव हि यच्चान्यन्ममास्ति वसु किंचन । तत्सर्वं तव विस्रब्धं कुरु प्रणयमीश्वर ॥
ahaṃ caiva hi yaccānyanmamāsti vasu kiṃcana | tatsarvaṃ tava visrabdhaṃ kuru praṇayamīśvara
मैं स्वयं और मेरा जो कुछ भी धन है, वह सब तुम्हारा है। हे स्वामी, निःशंक होकर मुझसे विवाह करो।
श्लोक 3 (3.53.3)
हंसानां वचनं यत्तु तन्मां दहति पार्थिव । त्वत्कृते हि मया वीर राजानः सन्निपातिताः ॥
haṃsānāṃ vacanaṃ yattu tanmāṃ dahati pārthiva | tvatkṛte hi mayā vīra rājānaḥ sannipātitāḥ
हे राजन्, हंसों ने जो बात कही थी, वह मुझे जला रही है। हे वीर, तुम्हारे ही लिए मैंने राजाओं को एकत्र करवाया है।
श्लोक 4 (3.53.4)
यदि त्वं भजमानां मां प्रत्याख्यास्यसि मानद । विषमग्निं जलं रज्जुमास्थास्ये तव कारणात् ॥
yadi tvaṃ bhajamānāṃ māṃ pratyākhyāsyasi mānada | viṣamagniṃ jalaṃ rajjumāsthāsye tava kāraṇāt
हे मानद, यदि तुम मुझ अनुरागिनी को ठुकरा दोगे, तो तुम्हारे कारण मैं विष, अग्नि, जल या फाँसी का सहारा लूँगी।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 5 (3.53.5)
एवमुक्तस्तु वैदर्भ्या नलस्तां प्रत्युवाच ह । तिष्ठत्सु लोकपालेषु कथं मानुषमिच्छसि ॥
evamuktastu vaidarbhyā nalastāṃ pratyuvāca ha | tiṣṭhatsu lokapāleṣu kathaṃ mānuṣamicchasi
विदर्भकुमारी के ऐसा कहने पर नल ने उत्तर दिया — "जब लोकपाल उपस्थित हैं, तब तुम एक मनुष्य को क्यों चाहती हो?
नल उवाच
श्लोक 6 (3.53.6)
येषामहं लोककृतामीश्वराणां महात्मनाम् । न पादरजसा तुल्यो मनस्ते तेषु वर्तताम् ॥
yeṣāmahaṃ lokakṛtāmīśvarāṇāṃ mahātmanām | na pādarajasā tulyo manaste teṣu vartatām
उन महात्मा, लोकों के रचयिता ईश्वरों के चरणों की धूल के बराबर भी मैं नहीं हूँ। तुम्हारा मन उन्हीं में लगे।
श्लोक 7 (3.53.7)
विप्रियं ह्याचरन्मर्त्यो देवानां मृत्युमृच्छति । त्राहि मामनवद्याङ्गि वरयस्व सुरोत्तमान् ॥
vipriyaṃ hyācaranmartyo devānāṃ mṛtyumṛcchati | trāhi māmanavadyāṅgi varayasva surottamān
जो मनुष्य देवताओं का अप्रिय करता है, वह मृत्यु को प्राप्त होता है। हे निर्दोष अंगों वाली, मेरी रक्षा करो और श्रेष्ठ देवताओं को वरो।
श्लोक 8 (3.53.8)
विरजांसि च वासांसि दिव्याश्चित्राः स्रजस्तथा । भूषणानि तु दिव्यानि देवान्प्राप्य तु भुङ्क्ष्व वै ॥
virajāṃsi ca vāsāṃsi divyāścitrāḥ srajastathā | bhūṣaṇāni tu divyāni devānprāpya tu bhuṅkṣva vai
देवताओं को पाकर निर्मल वस्त्रों, अद्भुत दिव्य मालाओं और दिव्य आभूषणों का सुख भोगो।
श्लोक 9 (3.53.9)
य इमां पृथिवीं कृत्स्नां संक्षिप्य ग्रसते पुनः । हुताशमीशं देवानां का तं न वरयेत्पतिम् ॥
ya imāṃ pṛthivīṃ kṛtsnāṃ saṃkṣipya grasate punaḥ | hutāśamīśaṃ devānāṃ kā taṃ na varayetpatim
जो इस सम्पूर्ण पृथ्वी को समेटकर फिर से निगल लेते हैं, देवताओं के उन स्वामी अग्निदेव को कौन स्त्री पति के रूप में न चुनेगी?
श्लोक 10 (3.53.10)
यस्य दण्डभयात्सर्वे भूतग्रामाः समागताः । धर्ममेवानुरुध्यन्ति का तं न वरयेत्पतिम् ॥
yasya daṇḍabhayātsarve bhūtagrāmāḥ samāgatāḥ | dharmamevānurudhyanti kā taṃ na varayetpatim
जिनके दण्ड के भय से सारे प्राणी-समूह एकत्र होकर धर्म का ही अनुसरण करते हैं, उन (यम) को कौन स्त्री पति के रूप में न चुनेगी?
श्लोक 11 (3.53.11)
धर्मात्मानं महात्मानं दैत्यदानवमर्दनम् । महेन्द्रं सर्वदेवानां का तं न वरयेत्पतिम् ॥
dharmātmānaṃ mahātmānaṃ daityadānavamardanam | mahendraṃ sarvadevānāṃ kā taṃ na varayetpatim
धर्मात्मा, महात्मा, दैत्यों और दानवों का संहार करने वाले, सब देवताओं के स्वामी महेन्द्र को कौन स्त्री पति के रूप में न चुनेगी?
श्लोक 12 (3.53.12)
क्रियतामविशङ्केन मनसा यदि मन्यसे । वरुणं लोकपालानां सुहृद्वाक्यमिदं शृणु ॥
kriyatāmaviśaṅkena manasā yadi manyase | varuṇaṃ lokapālānāṃ suhṛdvākyamidaṃ śṛṇu
अथवा यदि तुम्हारा मन हो, तो लोकपालों में से वरुण को निःशंक होकर चुन लो। एक हितैषी की यह बात सुनो।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 13 (3.53.13)
नैषधेनैवमुक्ता सा दमयन्ती वचोऽब्रवीत् । समाप्लुताभ्यां नेत्राभ्यां शोकजेनाथ वारिणा ॥
naiṣadhenaivamuktā sā damayantī vaco'bravīt | samāplutābhyāṃ netrābhyāṃ śokajenātha vāriṇā
निषधराज के ऐसा कहने पर दमयन्ती शोक के आँसुओं से भरी आँखों के साथ बोली —
दमयन्त्युवाच
श्लोक 14 (3.53.14)
देवेभ्योऽहं नमस्कृत्य सर्वेभ्यः पृथिवीपते । वृणे त्वामेव भर्तारं सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥
devebhyo'haṃ namaskṛtya sarvebhyaḥ pṛthivīpate | vṛṇe tvāmeva bhartāraṃ satyametadbravīmi te
"हे पृथ्वीपति, सब देवताओं को नमस्कार करके मैं तुम्हें ही अपना पति चुनती हूँ। यह मैं तुमसे सच कहती हूँ।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 15 (3.53.15)
तामुवाच ततो राजा वेपमानां कृताञ्जलिम् । दौत्येनागत्य कल्याणि नोत्सहे स्वार्थमीप्सितं ॥
tāmuvāca tato rājā vepamānāṃ kṛtāñjalim | dautyenāgatya kalyāṇi notsahe svārthamīpsitaṃ
तब राजा ने काँपती हुई, हाथ जोड़े खड़ी दमयन्ती से कहा — "हे कल्याणी, मैं दूत बनकर आया हूँ; अपना मनचाहा स्वार्थ साधने का साहस मैं नहीं कर सकता।
नल उवाच
श्लोक 16 (3.53.16)
कथं ह्यहं प्रतिश्रुत्य देवतानां विशेषतः । परार्थे यत्नमारभ्य कथं स्वार्थमिहोत्सहे ॥
kathaṃ hyahaṃ pratiśrutya devatānāṃ viśeṣataḥ | parārthe yatnamārabhya kathaṃ svārthamihotsahe
प्रतिज्ञा करके — और वह भी विशेषकर देवताओं से — दूसरे के लिए प्रयत्न आरम्भ करके, मैं यहाँ अपना स्वार्थ कैसे साध सकता हूँ?
श्लोक 17 (3.53.17)
एष धर्मो यदि स्वार्थो ममापि भविता ततः । एवं स्वार्थं करिष्यामि तथा भद्रे विधीयताम् ॥
eṣa dharmo yadi svārtho mamāpi bhavitā tataḥ | evaṃ svārthaṃ kariṣyāmi tathā bhadre vidhīyatām
यदि धर्म का पालन करते हुए मेरा स्वार्थ सिद्ध हो, तो वह मेरा भी होगा। इसी प्रकार मैं अपना स्वार्थ साधूँगा; हे भद्रे, ऐसा ही उपाय करो।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 18 (3.53.18)
ततो बाष्पाकुलां वाचं दमयन्ती शुचिस्मिता । प्रत्याहरन्ती शनकैर्नलं राजानमब्रवीत् ॥
tato bāṣpākulāṃ vācaṃ damayantī śucismitā | pratyāharantī śanakairnalaṃ rājānamabravīt
तब पवित्र मुस्कान वाली दमयन्ती आँसुओं से रुँधे स्वर में धीरे-धीरे उत्तर देती हुई राजा नल से बोली —
दमयन्त्युवाच
श्लोक 19 (3.53.19)
अस्त्युपायो मया दृष्टो निरपायो नरेश्वर । येन दोषो न भविता तव राजन्कथंचन ॥
astyupāyo mayā dṛṣṭo nirapāyo nareśvara | yena doṣo na bhavitā tava rājankathaṃcana
"हे नरेश्वर, मैंने एक निर्दोष उपाय सोचा है, जिससे हे राजन्, तुम पर किसी प्रकार का दोष नहीं आएगा।
श्लोक 20 (3.53.20)
त्वं चैव हि नरश्रेष्ठ देवाश्चेन्द्रपुरोगमाः । आयान्तु सहिताः सर्वे मम यत्र स्वयंवरः ॥
tvaṃ caiva hi naraśreṣṭha devāścendrapurogamāḥ | āyāntu sahitāḥ sarve mama yatra svayaṃvaraḥ
हे नरश्रेष्ठ, तुम और इन्द्र आदि देवता — सब एक साथ वहाँ आओ जहाँ मेरा स्वयंवर होगा।
श्लोक 21 (3.53.21)
ततोऽहं लोकपालानां सन्निधौ त्वां नरेश्वर । वरयिष्ये नरव्याघ्र नैवं दोषो भविष्यति ॥
tato'haṃ lokapālānāṃ sannidhau tvāṃ nareśvara | varayiṣye naravyāghra naivaṃ doṣo bhaviṣyati
तब हे नरेश्वर, हे पुरुषसिंह, लोकपालों की उपस्थिति में मैं तुम्हें वरूँगी; इस प्रकार कोई दोष नहीं होगा।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 22 (3.53.22)
एवमुक्तस्तु वैदर्भ्या नलो राजा विशांपते । आजगाम पुनस्तत्र यत्र देवाः समागताः ॥
evamuktastu vaidarbhyā nalo rājā viśāṃpate | ājagāma punastatra yatra devāḥ samāgatāḥ
हे प्रजानाथ, विदर्भकुमारी के ऐसा कहने पर राजा नल फिर वहाँ लौट आए जहाँ देवता एकत्र थे।
श्लोक 23 (3.53.23)
तमपश्यंस्तथाऽऽयान्तं लोकपाला महेश्वराः । दृष्ट्वा चैनं ततोऽपृच्छन्वृत्तान्तं सर्वमेव तम् ॥
tamapaśyaṃstathā''yāntaṃ lokapālā maheśvarāḥ | dṛṣṭvā cainaṃ tato'pṛcchanvṛttāntaṃ sarvameva tam
उन महान ईश्वर लोकपालों ने उन्हें आते देखा, और देखकर उनसे सारा वृत्तान्त पूछा —
देवा ऊचुः
श्लोक 24 (3.53.24)
कच्चिद्दृष्टा त्वया राजन्दमयन्ती शुचिस्मिता । किमब्रवीच्च नः सर्वान्वद भूमिपतेऽनघ ॥
kacciddṛṣṭā tvayā rājandamayantī śucismitā | kimabravīcca naḥ sarvānvada bhūmipate'nagha
"हे राजन्, क्या तुमने पवित्र मुस्कान वाली दमयन्ती को देखा? और उसने हम सबके लिए क्या कहा? हे निष्पाप भूपति, हमें बताओ।"
नल उवाच
श्लोक 25 (3.53.25)
भवद्भिरहमादिष्टो दमयन्त्या निवेशनम् । प्रविष्टः सुमहाकक्ष्यं दण्डिभिः स्थविरैर्वृतम् ॥
bhavadbhirahamādiṣṭo damayantyā niveśanam | praviṣṭaḥ sumahākakṣyaṃ daṇḍibhiḥ sthavirairvṛtam
"आपकी आज्ञा से मैं दमयन्ती के उस भवन में गया, जिसकी विशाल ड्योढ़ी डंडाधारी वृद्ध पहरेदारों से घिरी थी।
श्लोक 26 (3.53.26)
प्रविशन्तं च मां तत्र न कश्चिद्दृष्टवान्नरः । ऋते तां पार्थिवसुतां भवतामेव तेजसा ॥
praviśantaṃ ca māṃ tatra na kaściddṛṣṭavānnaraḥ | ṛte tāṃ pārthivasutāṃ bhavatāmeva tejasā
भीतर जाते समय उस राजकुमारी को छोड़कर वहाँ किसी ने मुझे नहीं देखा; यह आपके ही तेज का प्रभाव था।
श्लोक 27 (3.53.27)
सख्यश्चास्या मया दृष्टास्ताभिश्चाप्युपलक्षितः । विस्मिताश्चाभवन्सर्वा दृष्ट्वा मां विबुधेश्वराः ॥
sakhyaścāsyā mayā dṛṣṭāstābhiścāpyupalakṣitaḥ | vismitāścābhavansarvā dṛṣṭvā māṃ vibudheśvarāḥ
मैंने उसकी सखियों को भी देखा और उन्होंने भी मुझे देखा; हे देवेश्वरो, मुझे देखकर वे सब विस्मित हो गईं।
श्लोक 28 (3.53.28)
वर्ण्यमानेषु च मया भवत्सु रुचिरानना । मामेव गतसंकल्पा वृणीते सा सुरोत्तमाः ॥
varṇyamāneṣu ca mayā bhavatsu rucirānanā | māmeva gatasaṃkalpā vṛṇīte sā surottamāḥ
हे श्रेष्ठ देवताओ, जब मैं आपका गुणगान कर रहा था, तब भी उस सुन्दर मुख वाली ने, जिसका मन मुझ पर लगा है, मुझे ही चुना।
श्लोक 29 (3.53.29)
अब्रवीच्चैव मां बाला आयान्तु सहिताः सुराः । त्वया सह नरव्याघ्र मम यत्र स्वयंवरः ॥
abravīccaiva māṃ bālā āyāntu sahitāḥ surāḥ | tvayā saha naravyāghra mama yatra svayaṃvaraḥ
और उस बाला ने मुझसे कहा — 'हे पुरुषसिंह, देवता तुम्हारे साथ वहाँ आएँ जहाँ मेरा स्वयंवर होगा।
श्लोक 30 (3.53.30)
तेषामहं संनिधौ त्वां वरयिष्यामि नैषध । एवं तव महाबाहो दोषो न भवितेति ह ॥
teṣāmahaṃ saṃnidhau tvāṃ varayiṣyāmi naiṣadha | evaṃ tava mahābāho doṣo na bhaviteti ha
वहाँ उनकी उपस्थिति में, हे नैषध, मैं तुम्हें वरूँगी। इस प्रकार हे महाबाहु, तुम पर कोई दोष नहीं आएगा।'
श्लोक 31 (3.53.31)
एतावदेव विबुधा यथावृत्तमुपाहृतम् । मया शेषे प्रमाणं तु भवन्तस्त्रिदशेश्वराः ॥
etāvadeva vibudhā yathāvṛttamupāhṛtam | mayā śeṣe pramāṇaṃ tu bhavantastridaśeśvarāḥ
हे देवताओ, जो कुछ जैसे हुआ, वह इतना ही है, जैसा मैंने बताया। आगे के लिए हे त्रिदशेश्वरो, आप ही प्रमाण हैं।"