आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 54
स्वयंवर में दमयन्ती द्वारा नल का वरण
राजा भीम स्वयंवर का आयोजन करते हैं और राजा सभामण्डप में एकत्र होते हैं; उनमें चारों देवताओं के साथ नल भी हैं। दमयन्ती अपने सामने एक-से रूप वाले पाँच पुरुषों को देखती है और नल को न पहचान पाने पर अपने प्रेम के सत्य की दुहाई देकर देवताओं से उन्हें प्रकट करने की प्रार्थना करती है। देवता अपने लक्षण प्रकट करते हैं — उनकी छाया नहीं पड़ती, उन्हें पसीना नहीं आता, पलकें नहीं झपकतीं और वे भूमि को नहीं छूते, जबकि नल में ये सब मानवीय लक्षण हैं — और दमयन्ती नल के गले में माला डाल देती है। देवता नल को आठ वर देते हैं; नल दमयन्ती से विवाह करके अपने नगर लौटते हैं, यज्ञ करते हैं, धर्मपूर्वक राज्य करते हैं और इन्द्रसेन नामक पुत्र और इन्द्रसेना नामक कन्या के पिता बनते हैं।
बृहदश्व उवाच
श्लोक 1 (3.54.1)
अथ काले शुभे प्राप्ते तिथौ पुण्ये क्षणे तथा । आजुहाव महीपालान्भीमो राजा स्वयंवरे ॥
atha kāle śubhe prāpte tithau puṇye kṣaṇe tathā | ājuhāva mahīpālānbhīmo rājā svayaṃvare
फिर शुभ समय आने पर, पवित्र तिथि और शुभ मुहूर्त में राजा भीम ने राजाओं को स्वयंवर के लिए आमन्त्रित किया।
श्लोक 2 (3.54.2)
तच्छ्रुत्वा पृथिवीपालाः सर्वे हृच्छयपीडिताः । त्वरिताः समुपाजग्मुर्दमयन्तीमभीप्सवः ॥
tacchrutvā pṛthivīpālāḥ sarve hṛcchayapīḍitāḥ | tvaritāḥ samupājagmurdamayantīmabhīpsavaḥ
यह सुनकर कामपीड़ा से व्याकुल सब राजा दमयन्ती को पाने की इच्छा से शीघ्रता से आ पहुँचे।
श्लोक 3 (3.54.3)
कनकस्तम्भरुचिरं तोरणेन विराजितम् । विविशुस्ते नृपा रङ्गं महासिंह इवाचलम् ॥
kanakastambharuciraṃ toraṇena virājitam | viviśuste nṛpā raṅgaṃ mahāsiṃha ivācalam
सोने के खम्भों से सुशोभित और तोरण से सजे उस रंगमण्डप में राजाओं ने वैसे ही प्रवेश किया जैसे कोई महान सिंह पर्वत में प्रवेश करता है।
श्लोक 4 (3.54.4)
तत्रासनेषु विविधेष्वासीनाः पृथिवीक्षितः । सुरभिस्रग्धराः सर्वे प्रमृष्टमणिकुण्डलाः ॥
tatrāsaneṣu vividheṣvāsīnāḥ pṛthivīkṣitaḥ | surabhisragdharāḥ sarve pramṛṣṭamaṇikuṇḍalāḥ
वहाँ वे सब राजा तरह-तरह के आसनों पर बैठे; सबने सुगन्धित मालाएँ और चमचमाते मणिजटित कुण्डल पहन रखे थे।
श्लोक 5 (3.54.5)
तां राजसमितिं पूर्णां नागैर्भोगवतीमिव । संपूर्णां पुरुषव्याघ्रैर्व्याघ्रैर्गिरिगुहामिव । प्रविवेश नलो देवैः पुण्यश्लोको नराधिपः ॥
tāṃ rājasamitiṃ pūrṇāṃ nāgairbhogavatīmiva | saṃpūrṇāṃ puruṣavyāghrairvyāghrairgiriguhāmiva | praviveśa nalo devaiḥ puṇyaśloko narādhipaḥ
राजाओं की वह सभा वैसे ही भरी थी जैसे भोगवती पुरी नागों से भरी रहती है, और पुरुषसिंहों से वैसे ही भरी थी जैसे पर्वत की गुफा बाघों से। उसमें पुण्यकीर्ति नरेश नल ने देवताओं के साथ प्रवेश किया।
श्लोक 6 (3.54.6)
तत्र स्म पीना दृश्यन्ते बाहवः परिघोपमाः । आकारवर्णसुश्लक्ष्णाः पञ्चशीर्षा इवोरगाः ॥
tatra sma pīnā dṛśyante bāhavaḥ parighopamāḥ | ākāravarṇasuślakṣṇāḥ pañcaśīrṣā ivoragāḥ
वहाँ परिघ के समान पुष्ट भुजाएँ दिखाई देती थीं, जो आकार और वर्ण में सुन्दर और अत्यन्त चिकनी थीं, मानो पाँच फनों वाले सर्प हों।
श्लोक 7 (3.54.7)
सुकेशान्तानि चारूणि सुनासानि शुभानि च । मुखानि राज्ञां शोभन्ते नक्षत्राणि यथा दिवि ॥
sukeśāntāni cārūṇi sunāsāni śubhāni ca | mukhāni rājñāṃ śobhante nakṣatrāṇi yathā divi
सुन्दर केशों और सुघड़ नासिका वाले राजाओं के मनोहर, शुभ मुख आकाश के नक्षत्रों की भाँति शोभा पा रहे थे।
श्लोक 8 (3.54.8)
दमयन्ती ततो रङ्गं प्रविवेश शुभानना । मुष्णन्ती प्रभया राज्ञां चक्षूंषि च मनांसि च ॥
damayantī tato raṅgaṃ praviveśa śubhānanā | muṣṇantī prabhayā rājñāṃ cakṣūṃṣi ca manāṃsi ca
तब सुन्दर मुख वाली दमयन्ती ने रंगमण्डप में प्रवेश किया, जो अपनी प्रभा से राजाओं के नेत्र और मन चुरा रही थी।
श्लोक 9 (3.54.9)
तस्या गात्रेषु पतिता तेषां दृष्टिर्महात्मनाम् । तत्रतत्रैव सक्ताऽभून्न चचाल च पश्यताम् ॥
tasyā gātreṣu patitā teṣāṃ dṛṣṭirmahātmanām | tatratatraiva saktā'bhūnna cacāla ca paśyatām
उन महान राजाओं की दृष्टि उसके अंगों पर पड़ी, और जहाँ पड़ी वहीं जम गई; देखते हुए वह वहाँ से हटी ही नहीं।
श्लोक 10 (3.54.10)
ततः संकीर्त्यमानेषु राज्ञां नामसु भारत । ददर्श भैमी पुरुषान्पञ्च तुल्याकृतीनिह ॥
tataḥ saṃkīrtyamāneṣu rājñāṃ nāmasu bhārata | dadarśa bhaimī puruṣānpañca tulyākṛtīniha
हे भारत, फिर जब राजाओं के नाम पुकारे जा रहे थे, तब भीमकुमारी ने वहाँ एक-सी आकृति वाले पाँच पुरुषों को देखा।
श्लोक 11 (3.54.11)
तान्समीक्ष्य ततः सर्वान्निर्विशेषाकृतीन्स्थितान् । संदेहादथ वैदर्भी नाभ्यजानान्नलं नृपम् ॥
tānsamīkṣya tataḥ sarvānnirviśeṣākṛtīnsthitān | saṃdehādatha vaidarbhī nābhyajānānnalaṃ nṛpam
उन सबको बिना किसी भेद के एक-सी आकृति में खड़े देखकर विदर्भकुमारी सन्देह में पड़ गई और राजा नल को पहचान न सकी।
श्लोक 12 (3.54.12)
निर्विशेषवयोवेषरूपाणां तत्र सा शुभा । यंयं हि ददृशे तेषां तंतं मेने नलं नृपम् । सा चिन्तयन्ती बुद्ध्याऽथ तर्कयामास भामिनी ॥
nirviśeṣavayoveṣarūpāṇāṃ tatra sā śubhā | yaṃyaṃ hi dadṛśe teṣāṃ taṃtaṃ mene nalaṃ nṛpam | sā cintayantī buddhyā'tha tarkayāmāsa bhāminī
उनकी आयु, वेश और रूप में कोई भेद न होने से वह सुन्दरी उनमें से जिसे भी देखती, उसी को राजा नल समझ लेती। तब वह भामिनी मन में सोचती हुई तर्क करने लगी —
श्लोक 13 (3.54.13)
कथं नु देवाञ्जानीयां कथं विद्यां नलं नृपम् । एवं संचिन्तयन्ती सा वैदर्भी भृशदुःखिता ॥
kathaṃ nu devāñjānīyāṃ kathaṃ vidyāṃ nalaṃ nṛpam | evaṃ saṃcintayantī sā vaidarbhī bhṛśaduḥkhitā
"मैं देवताओं को कैसे पहचानूँ? राजा नल को कैसे जानूँ?" इस प्रकार सोचती हुई अत्यन्त दुःखी विदर्भकुमारी
श्लोक 14 (3.54.14)
श्रुतानि देवलिङ्गानि तर्कयामास भारत । देवानां यानि लिङ्गानि स्थविरेभ्यः श्रुतानि मे ॥
śrutāni devaliṅgāni tarkayāmāsa bhārata | devānāṃ yāni liṅgāni sthavirebhyaḥ śrutāni me
हे भारत, देवताओं के उन लक्षणों पर विचार करने लगी जो उसने सुने थे — "देवताओं के जो लक्षण मैंने बड़े-बूढ़ों से सुने हैं,
श्लोक 15 (3.54.15)
तानीह तिष्ठतां भूमावेकस्यापि न लक्षये । एवं विचिन्त्य बहुधा विचार्य च पुनः पुनः ॥
tānīha tiṣṭhatāṃ bhūmāvekasyāpi na lakṣaye | evaṃ vicintya bahudhā vicārya ca punaḥ punaḥ
उनमें से एक भी लक्षण यहाँ भूमि पर खड़े इनमें से किसी एक में भी मुझे दिखाई नहीं देता।" इस प्रकार बहुत तरह से सोचकर और बार-बार विचार करके
श्लोक 16 (3.54.16)
शरणं प्रति देवानां प्राप्तकालममन्यत । वाचा च मनसा चैव नमस्कारं प्रयुज्य सा ॥
śaraṇaṃ prati devānāṃ prāptakālamamanyata | vācā ca manasā caiva namaskāraṃ prayujya sā
उसने समझा कि अब देवताओं की शरण में जाने का समय आ गया है। वाणी और मन से नमस्कार करके
श्लोक 17 (3.54.17)
देवेभ्यः प्राञ्जलिर्भूत्वा वेपमानेदमब्रवीत् । हंसानां वचनं श्रुत्वा यथा मे नैषधो वृतः । पतित्वे तेन सत्येन देवास्तं प्रदिशन्तु मे ॥
devebhyaḥ prāñjalirbhūtvā vepamānedamabravīt | haṃsānāṃ vacanaṃ śrutvā yathā me naiṣadho vṛtaḥ | patitve tena satyena devāstaṃ pradiśantu me
उसने देवताओं के सामने हाथ जोड़कर काँपते हुए कहा — "हंसों की बात सुनकर जैसे मैंने निषधराज को पति रूप में वरा है, उस सत्य के बल से देवता मुझे उन्हें दिखा दें।
दमयन्त्युवाच
श्लोक 18 (3.54.18)
मनसा वचसा चैव यथा नातिचराम्यहम् । तेन सत्येन विबुधास्तमेव प्रदिशन्तु मे ॥
manasā vacasā caiva yathā nāticarāmyaham | tena satyena vibudhāstameva pradiśantu me
जैसे मैंने मन और वाणी से कभी उनका उल्लंघन नहीं किया, उस सत्य के बल से देवता मुझे उन्हीं को दिखा दें।
श्लोक 19 (3.54.19)
यथा देवैः स मे भर्ता विहितो निषधाधिपः । तेन सत्येन मे देवास्तमेव प्रदिशन्तु मे ॥
yathā devaiḥ sa me bhartā vihito niṣadhādhipaḥ | tena satyena me devāstameva pradiśantu me
जैसे देवताओं ने ही निषधराज को मेरा पति निश्चित किया है, उस सत्य के बल से देवता मुझे उन्हीं को दिखा दें।
श्लोक 20 (3.54.20)
यथेदं व्रतमारब्धं नलस्याराधने मया । तेन सत्येन मे देवास्तमेव प्रदिशन्तु मे ॥
yathedaṃ vratamārabdhaṃ nalasyārādhane mayā | tena satyena me devāstameva pradiśantu me
जैसे मैंने नल की आराधना के लिए यह व्रत आरम्भ किया है, उस सत्य के बल से देवता मुझे उन्हीं को दिखा दें।
श्लोक 21 (3.54.21)
स्वं चैव रूपं पुष्यन्तु लोकपाला महेश्वराः । यथाऽहमभिजानीयां पुण्यश्लोकं नराधिपम् ॥
svaṃ caiva rūpaṃ puṣyantu lokapālā maheśvarāḥ | yathā'hamabhijānīyāṃ puṇyaślokaṃ narādhipam
महान ईश्वर लोकपाल अपना-अपना वास्तविक रूप धारण करें, जिससे मैं पुण्यकीर्ति नरेश को पहचान सकूँ।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 22 (3.54.22)
निशम्य दमयन्त्यास्तत्करुणं परिदेवितम् । निश्चयं परमं तथ्यमनुरागं च नैषधे ॥
niśamya damayantyāstatkaruṇaṃ paridevitam | niścayaṃ paramaṃ tathyamanurāgaṃ ca naiṣadhe
दमयन्ती का वह करुण विलाप सुनकर, और निषधराज के प्रति उसका दृढ़, सच्चा निश्चय और अनुराग देखकर,
श्लोक 23 (3.54.23)
मनोविशुद्धिं बुद्धिं च भक्तिं रागं च नैषधे । यथोक्तं चक्रिरे देवाः सामर्थ्यं लिङ्गधारणे ॥
manoviśuddhiṃ buddhiṃ ca bhaktiṃ rāgaṃ ca naiṣadhe | yathoktaṃ cakrire devāḥ sāmarthyaṃ liṅgadhāraṇe
तथा उसके मन की शुद्धता, बुद्धि, भक्ति और निषधराज के प्रति प्रेम को जानकर देवताओं ने उसके कहे अनुसार अपने लक्षण धारण करने की शक्ति प्रकट की।
श्लोक 24 (3.54.24)
साऽपश्यद्विबुधान्सर्वानस्वेदान्स्तब्धलोचनान् । अम्लानस्रग्रजोहीनान्स्थितानस्पृशतः क्षितिम् ॥
sā'paśyadvibudhānsarvānasvedānstabdhalocanān | amlānasragrajohīnānsthitānaspṛśataḥ kṣitim
उसने देखा कि सब देवता पसीने से रहित हैं, उनकी आँखें अपलक हैं, उनकी मालाएँ मुरझाई नहीं हैं और उन पर धूल नहीं है, और वे भूमि को छुए बिना खड़े हैं।
श्लोक 25 (3.54.25)
छायाद्वितीयो म्लानस्रग्रजःस्वेदसमन्वितः । भूमिष्ठो नैषधश्चैव निमेषेण च सूचितः ॥
chāyādvitīyo mlānasragrajaḥsvedasamanvitaḥ | bhūmiṣṭho naiṣadhaścaiva nimeṣeṇa ca sūcitaḥ
और निषधराज छाया सहित, मुरझाई माला वाले, धूल और पसीने से युक्त, भूमि पर खड़े और पलकें झपकाते हुए पहचान में आ गए।
श्लोक 26 (3.54.26)
सा समीक्ष्य तु तान्देवान्पुण्यश्लोकं च भारत । नैषधं वरयामास भैमी धर्मेण पाण्डव ॥
sā samīkṣya tu tāndevānpuṇyaślokaṃ ca bhārata | naiṣadhaṃ varayāmāsa bhaimī dharmeṇa pāṇḍava
हे भारत, उन देवताओं और पुण्यकीर्ति राजा को देखकर, हे पाण्डुनन्दन, भीमकुमारी ने धर्म के अनुसार निषधराज का वरण किया।
श्लोक 27 (3.54.27)
विलज्जमाना वस्त्रान्तं जग्राहायतलोचना । स्कन्धदेशेऽसृजत्तस्य स्रजं परमशोभनाम् ॥
vilajjamānā vastrāntaṃ jagrāhāyatalocanā | skandhadeśe'sṛjattasya srajaṃ paramaśobhanām
लजाती हुई उस विशाल नेत्रों वाली ने उनके वस्त्र का छोर पकड़ा और उनके कन्धों पर एक अत्यन्त सुन्दर माला डाल दी।
श्लोक 28 (3.54.28)
वरयामास चैवैनं पतित्वे वरवर्णिनी । ततो हाहेति सहसा मुक्तः शब्दो नराधिपैः ॥
varayāmāsa caivainaṃ patitve varavarṇinī | tato hāheti sahasā muktaḥ śabdo narādhipaiḥ
इस प्रकार उस सुन्दरी ने उन्हें पति रूप में वर लिया। तब राजाओं के मुख से सहसा 'हाय, हाय!' का स्वर निकल पड़ा,
श्लोक 29 (3.54.29)
देवैर्महर्षिभिस्तत्र साधुसाध्विति भारत । विस्मितैरीरितः शब्दः प्रशंसद्भिर्नलं नृपम् ॥
devairmaharṣibhistatra sādhusādhviti bhārata | vismitairīritaḥ śabdaḥ praśaṃsadbhirnalaṃ nṛpam
और हे भारत, वहाँ देवताओं और महर्षियों ने विस्मित होकर राजा नल की प्रशंसा करते हुए 'साधु, साधु!' का घोष किया।
श्लोक 30 (3.54.30)
दमयन्तीं तु कौरव्य वीरसेनसुतो नृपः । आश्वासयद्वरारोहां प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥
damayantīṃ tu kauravya vīrasenasuto nṛpaḥ | āśvāsayadvarārohāṃ prahṛṣṭenāntarātmanā
हे कौरव्य, तब वीरसेन के पुत्र राजा नल ने प्रसन्न हृदय से सुन्दरी दमयन्ती को आश्वासन दिया —
नल उवाच
श्लोक 31 (3.54.31)
यत्त्वं भजसि कल्याणि पुमांसं देवसन्निधौ । तस्मान्मां विद्धि भर्तारमेतत्ते वचने रतम् ॥
yattvaṃ bhajasi kalyāṇi pumāṃsaṃ devasannidhau | tasmānmāṃ viddhi bhartārametatte vacane ratam
"हे कल्याणी, क्योंकि तुमने देवताओं के सामने एक मनुष्य को अपनाया है, इसलिए मुझे अपना पति जानो, जो सदा तुम्हारी बात में अनुरक्त रहेगा।
श्लोक 32 (3.54.32)
यावच्च मे धरिष्यन्ति प्राणा देहे शुचिस्मिते । तावत्त्वयि भविष्यामि सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥
yāvacca me dhariṣyanti prāṇā dehe śucismite | tāvattvayi bhaviṣyāmi satyametadbravīmi te
हे पवित्र मुस्कान वाली, जब तक मेरे शरीर में प्राण रहेंगे, तब तक मैं तुम्हारा ही रहूँगा। यह मैं तुमसे सच कहता हूँ।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 33 (3.54.33)
दमयन्ती तथा वाग्भिरभिनन्द्य कृताञ्जलिः ॥
damayantī tathā vāgbhirabhinandya kṛtāñjaliḥ
दमयन्ती ने भी हाथ जोड़कर अपनी वाणी से उनका अभिनन्दन किया।
श्लोक 34 (3.54.34)
तौ परस्परतः प्रीतौ दृष्ट्वा त्वग्निपुरोगमान् । तानेव शरणं देवाञ्जग्मतुर्मनसा तदा ॥
tau parasparataḥ prītau dṛṣṭvā tvagnipurogamān | tāneva śaraṇaṃ devāñjagmaturmanasā tadā
और एक-दूसरे से प्रसन्न उन दोनों ने अग्नि आदि देवताओं को देखकर मन ही मन उन्हीं की शरण ली।
श्लोक 35 (3.54.35)
वृते तु नैषधे भैम्या लोकपाला महौजसः । प्रहृष्टमनसः सर्वे नलायाष्टौ वरान्ददुः ॥
vṛte tu naiṣadhe bhaimyā lokapālā mahaujasaḥ | prahṛṣṭamanasaḥ sarve nalāyāṣṭau varāndaduḥ
भीमकुमारी द्वारा निषधराज का वरण हो जाने पर सब महातेजस्वी लोकपालों ने प्रसन्न मन से नल को आठ वर दिए।
श्लोक 36 (3.54.36)
प्रत्यक्षदर्शनं यज्ञे गतिं चानुत्तमां शुभाम् । नैषधाय ददौ शक्रः प्रीयमाणः शचीपतिः ॥
pratyakṣadarśanaṃ yajñe gatiṃ cānuttamāṃ śubhām | naiṣadhāya dadau śakraḥ prīyamāṇaḥ śacīpatiḥ
शचीपति शक्र ने प्रसन्न होकर निषधराज को यज्ञ में अपना प्रत्यक्ष दर्शन और परम उत्तम शुभ गति प्रदान की।
श्लोक 37 (3.54.37)
अग्निरात्मभवं प्रादाद्यत्र वाञ्छति नैषधः । लोकानात्मप्रभांश्चैव ददौ तस्मै हुताशनः ॥
agnirātmabhavaṃ prādādyatra vāñchati naiṣadhaḥ | lokānātmaprabhāṃścaiva dadau tasmai hutāśanaḥ
अग्नि ने वर दिया कि निषधराज जहाँ चाहें वहाँ वे स्वयं प्रकट हो जाएँ, और हुताशन ने उन्हें अपने ही समान प्रकाशमान लोक भी दिए।
श्लोक 38 (3.54.38)
यमस्त्वन्नरसं प्रादाद्धर्मे च परमां स्थितिम् । अपांपतिरपां भावं यत्र वाञ्छति नैषधः । स्रजश्चोत्तमगन्धाढ्याः सर्वे च मिथुनं ददुः ॥
yamastvannarasaṃ prādāddharme ca paramāṃ sthitim | apāṃpatirapāṃ bhāvaṃ yatra vāñchati naiṣadhaḥ | srajaścottamagandhāḍhyāḥ sarve ca mithunaṃ daduḥ
यम ने उन्हें अन्न में उत्तम रस और धर्म में परम निष्ठा प्रदान की। जलों के स्वामी (वरुण) ने वर दिया कि निषधराज जहाँ चाहें वहाँ जल प्रकट हो, और उत्तम सुगन्ध से भरी मालाएँ भी दीं। इस प्रकार सबने दो-दो वर दिए।
श्लोक 39 (3.54.39)
वरानेवं प्रदायास्य देवास्ते त्रिदिवं गताः । एतत्सर्वं नलोऽपश्यद्दमयन्ती च भारत । यथा स्वप्नं महाराज तथैव ददृशुर्जनाः ॥
varānevaṃ pradāyāsya devāste tridivaṃ gatāḥ | etatsarvaṃ nalo'paśyaddamayantī ca bhārata | yathā svapnaṃ mahārāja tathaiva dadṛśurjanāḥ
इस प्रकार उन्हें वर देकर वे देवता स्वर्ग चले गए। हे भारत, यह सब नल और दमयन्ती ने देखा; और हे महाराज, लोगों ने इसे वैसे ही देखा जैसे कोई स्वप्न देखता है।
श्लोक 40 (3.54.40)
ततः स्वयंवरं चक्रे भीमो राजाऽतिमानुषम् । समागतेषु सर्वेषु भूपालेषु विशांपते ॥
tataḥ svayaṃvaraṃ cakre bhīmo rājā'timānuṣam | samāgateṣu sarveṣu bhūpāleṣu viśāṃpate
तब हे प्रजानाथ, सब राजाओं के एकत्र होने पर राजा भीम ने एक अलौकिक स्वयंवर सम्पन्न किया।
श्लोक 41 (3.54.41)
दमयन्त्यपि तद्दृष्ट्वा राजमण्डलमृद्धिमत् । अन्वीक्ष्य नैषधं वव्रे भैमी धर्मेण भारत ॥
damayantyapi taddṛṣṭvā rājamaṇḍalamṛddhimat | anvīkṣya naiṣadhaṃ vavre bhaimī dharmeṇa bhārata
और हे भारत, भीमकुमारी दमयन्ती ने भी राजाओं के उस वैभवशाली मण्डल को देखकर और सबको भली-भाँति निहारकर धर्म के अनुसार निषधराज का वरण किया।
श्लोक 42 (3.54.42)
वृते च नैषधे भैम्या निवृत्ते च स्वयंवरे । सर्व एव महीपालाः प्रतिजग्मुर्यथागतम् ॥
vṛte ca naiṣadhe bhaimyā nivṛtte ca svayaṃvare | sarva eva mahīpālāḥ pratijagmuryathāgatam
भीमकुमारी द्वारा निषधराज का वरण हो जाने और स्वयंवर समाप्त होने पर सब राजा जैसे आए थे वैसे ही लौट गए।
श्लोक 43 (3.54.43)
पार्थिवाश्चानुभूयास्य विवाहं विस्मयान्विताः । दमयन्त्याश्च मुदिताः प्रतिजग्मुर्यथागतम् ॥
pārthivāścānubhūyāsya vivāhaṃ vismayānvitāḥ | damayantyāśca muditāḥ pratijagmuryathāgatam
राजा लोग विस्मय के साथ उसका विवाह देखकर, दमयन्ती के लिए प्रसन्न होते हुए, जैसे आए थे वैसे ही लौट गए।
श्लोक 44 (3.54.44)
गतेषु पार्थिवेन्द्रेषु भीमः प्रीतो महामनाः । विवाहं कारयामास दमयन्त्या नलस्य च ॥
gateṣu pārthivendreṣu bhīmaḥ prīto mahāmanāḥ | vivāhaṃ kārayāmāsa damayantyā nalasya ca
राजाओं के चले जाने पर उदारचित्त भीम ने प्रसन्न होकर दमयन्ती और नल का विवाह सम्पन्न कराया।
श्लोक 45 (3.54.45)
उष्य तत्र तथाकामं नैषधो द्विपदां वरः । भीमेन समनुज्ञातो जगाम नगरं स्वकम् । अवाप्य नारीरत्नं तु पुण्यश्लोकोऽपि पार्थिवः ॥
uṣya tatra tathākāmaṃ naiṣadho dvipadāṃ varaḥ | bhīmena samanujñāto jagāma nagaraṃ svakam | avāpya nārīratnaṃ tu puṇyaśloko'pi pārthivaḥ
मनुष्यों में श्रेष्ठ निषधराज वहाँ इच्छानुसार रहकर भीम से अनुमति लेकर अपने नगर को चले गए। उस नारीरत्न को पाकर पुण्यकीर्ति राजा
श्लोक 46 (3.54.46)
रेमे सह तया राजञ्छच्येव बलवृत्रहा । अतीव मुदितो राजा भ्राजमानोऽंशुमानिव ॥
reme saha tayā rājañchacyeva balavṛtrahā | atīva mudito rājā bhrājamāno'ṃśumāniva
उसके साथ वैसे ही आनन्द करने लगे, हे राजन्, जैसे बल और वृत्र का वध करने वाले इन्द्र शची के साथ करते हैं। अत्यन्त प्रसन्न राजा सूर्य की भाँति दमकने लगे,
श्लोक 47 (3.54.47)
अरञ्जयत्प्रजा वीरो धर्मेण परिपालयन् । ईजे चाप्यश्वमेधेन ययातिरिव नाहुषः । अन्यैश्च बहुभिर्धीमान्क्रतुभिश्चाप्तदक्षिणैः ॥
arañjayatprajā vīro dharmeṇa paripālayan | īje cāpyaśvamedhena yayātiriva nāhuṣaḥ | anyaiśca bahubhirdhīmānkratubhiścāptadakṣiṇaiḥ
और उस वीर ने धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करते हुए उसे प्रसन्न रखा। उस बुद्धिमान राजा ने नहुषपुत्र ययाति की भाँति अश्वमेध यज्ञ किया, और बहुत-सी दक्षिणा वाले अनेक अन्य यज्ञ भी किए।
श्लोक 48 (3.54.48)
पुनश्च रमणीयेषु वनेषूपवनेषु च । दमयन्त्या सह नलो विजहारामरोपमः ॥
punaśca ramaṇīyeṣu vaneṣūpavaneṣu ca | damayantyā saha nalo vijahārāmaropamaḥ
फिर देवताओं के समान नल ने दमयन्ती के साथ रमणीय वनों और उपवनों में विहार किया।
श्लोक 49 (3.54.49)
जनयामास च ततो दमयन्त्यां महामनाः । इन्द्रसेनं सुतं चापि इन्द्रसेनां च कन्यकाम् ॥
janayāmāsa ca tato damayantyāṃ mahāmanāḥ | indrasenaṃ sutaṃ cāpi indrasenāṃ ca kanyakām
और फिर उस उदारचित्त राजा को दमयन्ती से इन्द्रसेन नामक पुत्र और इन्द्रसेना नामक कन्या प्राप्त हुई।
श्लोक 50 (3.54.50)
एवं स यजमानश्च विहरंश्च नराधिपः । ररक्ष वसुसंपूर्णां वसुधां वसुधाधिपः ॥
evaṃ sa yajamānaśca viharaṃśca narādhipaḥ | rarakṣa vasusaṃpūrṇāṃ vasudhāṃ vasudhādhipaḥ
इस प्रकार यज्ञ करते और विहार करते हुए उस पृथ्वीपति नरेश ने धन-धान्य से भरी पृथ्वी की रक्षा की।