आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 55
नल के विनाश के लिए कलि की प्रतिज्ञा
स्वयंवर से लौटते हुए देवताओं को कलि और द्वापर मिलते हैं, जो वहीं जा रहे थे। इन्द्र कलि को बताते हैं कि दमयन्ती नल को पहले ही वर चुकी है; इस पर कलि क्रोधित होता है कि उसने देवताओं को छोड़कर एक मनुष्य को चुना, और उसे दण्ड देने की माँग करता है। देवता उत्तर देते हैं कि उसने उनकी अनुमति से ही वरण किया है, नल की विद्या और सद्गुणों की प्रशंसा करते हैं और चेतावनी देते हैं कि नल को शाप देने वाला स्वयं नष्ट होकर नरक में डूबेगा। देवताओं के चले जाने पर कलि प्रतिज्ञा करता है कि वह नल में प्रवेश करके उसे राज्य से भ्रष्ट कर देगा, और द्वापर से पासों में प्रवेश करके सहायता करने को कहता है।
बृहदश्व उवाच
श्लोक 1 (3.55.1)
वृते तु नैषधे भैम्या लोकपाला महौजसः । यान्तो ददृशुरायान्तं द्वापरं कलिना सह ॥
vṛte tu naiṣadhe bhaimyā lokapālā mahaujasaḥ | yānto dadṛśurāyāntaṃ dvāparaṃ kalinā saha
भीमकुमारी द्वारा निषधराज का वरण हो जाने पर जब महातेजस्वी लोकपाल लौट रहे थे, तब उन्होंने कलि के साथ द्वापर को आते देखा।
श्लोक 2 (3.55.2)
अथाब्रवीत्कलिं शक्रः संप्रेक्ष्य बलवृत्रहा । द्वापरेण सहायेन कले ब्रूहि क्व यास्यसि ॥
athābravītkaliṃ śakraḥ saṃprekṣya balavṛtrahā | dvāpareṇa sahāyena kale brūhi kva yāsyasi
तब बल और वृत्र के संहारक शक्र ने कलि को देखकर उससे कहा — "हे कलि, द्वापर को साथ लेकर तुम कहाँ जा रहे हो, बताओ।"
श्लोक 3 (3.55.3)
ततोऽब्रवीत्कलिः शक्रं दमयन्त्याः स्वयंवरम् । गत्वा हि वरयिष्ये तां मनो हि मम तां गतम् ॥
tato'bravītkaliḥ śakraṃ damayantyāḥ svayaṃvaram | gatvā hi varayiṣye tāṃ mano hi mama tāṃ gatam
तब कलि ने शक्र से कहा — "मैं दमयन्ती के स्वयंवर में जाकर उसका वरण करूँगा, क्योंकि मेरा मन उसी पर लगा है।"
श्लोक 4 (3.55.4)
तमब्रवीत्प्रहस्येन्द्रो निर्वृत्तः स स्वयंवरः । वृतस्तया नलो राजा पतिरस्मत्समीपतः ॥
tamabravītprahasyendro nirvṛttaḥ sa svayaṃvaraḥ | vṛtastayā nalo rājā patirasmatsamīpataḥ
इन्द्र ने हँसकर उससे कहा — "वह स्वयंवर तो समाप्त हो गया। उसने हमारे सामने ही राजा नल को पति चुन लिया है।"
श्लोक 5 (3.55.5)
एवमुक्तस्तु शक्रेण कलिः कोपसमन्वितः । देवानामन्त्र्य तान्सर्वानुवाचेदं वचस्तदा ॥
evamuktastu śakreṇa kaliḥ kopasamanvitaḥ | devānāmantrya tānsarvānuvācedaṃ vacastadā
शक्र के ऐसा कहने पर क्रोध से भरे कलि ने उन सब देवताओं को सम्बोधित करके यह बात कही —
कलिरुवाच
श्लोक 6 (3.55.6)
देवानां मानुषं मध्ये यत्सा पतिमविन्दत । ननु तस्या भवेन्न्याय्यं विपुलं दण्डधारणम् ॥
devānāṃ mānuṣaṃ madhye yatsā patimavindata | nanu tasyā bhavennyāyyaṃ vipulaṃ daṇḍadhāraṇam
"उसने देवताओं के बीच एक मनुष्य को पति चुना है, अतः उसे भारी दण्ड मिलना ही उचित है।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 7 (3.55.7)
एवमुक्ते तु कलिना प्रत्यूचुस्ते दिवौकसः । अस्माभिः समनुज्ञाते दमयन्त्या नलो वृतः ॥
evamukte tu kalinā pratyūcuste divaukasaḥ | asmābhiḥ samanujñāte damayantyā nalo vṛtaḥ
कलि के ऐसा कहने पर उन स्वर्गवासियों ने उत्तर दिया — "हमारी अनुमति से ही दमयन्ती ने नल का वरण किया है।
देवा ऊचुः
श्लोक 8 (3.55.8)
का हि सर्वगुणोपेतं नाश्रयेत नलं नृपम् । यो वेद धर्मानखिलान्यथावच्चरितव्रतः ॥
kā hi sarvaguṇopetaṃ nāśrayeta nalaṃ nṛpam | yo veda dharmānakhilānyathāvaccaritavrataḥ
भला कौन स्त्री समस्त गुणों से सम्पन्न राजा नल का आश्रय न लेगी, जो सम्पूर्ण धर्मों को ठीक-ठीक जानते हैं और विधिपूर्वक व्रतों का पालन करते हैं,
श्लोक 9 (3.55.9)
योऽधीते चतुरो वेदान्सर्वानाख्यानपञ्चमान् । अहिंसानिरतो यश्च सत्यवादी दृढव्रतः ॥
yo'dhīte caturo vedānsarvānākhyānapañcamān | ahiṃsānirato yaśca satyavādī dṛḍhavrataḥ
जिन्होंने चारों वेदों का और पाँचवें के रूप में आख्यानों का भी अध्ययन किया है, जो अहिंसा में तत्पर, सत्यवादी और दृढ़व्रती हैं,
श्लोक 10 (3.55.10)
यस्मिन्दाक्ष्यं धृतिर्ज्ञानं तपः शौचं दमः शमः । ध्रुवाणि पुरुषव्याघ्रे लोकपालसमे नृपे ॥
yasmindākṣyaṃ dhṛtirjñānaṃ tapaḥ śaucaṃ damaḥ śamaḥ | dhruvāṇi puruṣavyāghre lokapālasame nṛpe
और उस पुरुषसिंह, लोकपालों के समान राजा में दक्षता, धैर्य, ज्ञान, तप, शौच, इन्द्रियनिग्रह और शान्ति स्थिर रूप से विद्यमान हैं?
श्लोक 11 (3.55.11)
एवंरूपं नलं यो वै कामयेच्छपितुं कले । आत्मानं स शपेन्मूढो हन्यादात्मानमात्मना ॥
evaṃrūpaṃ nalaṃ yo vai kāmayecchapituṃ kale | ātmānaṃ sa śapenmūḍho hanyādātmānamātmanā
हे कलि, ऐसे नल को जो शाप देना चाहे, वह मूर्ख अपने को ही शाप देता है और अपने ही हाथों अपना नाश करता है।
श्लोक 12 (3.55.12)
एवंगुणं नलं यो वै कामयेच्छपितुं कले । कृच्छ्रे स नरके मज्जेदगाधे विपुले ह्रदे ॥
evaṃguṇaṃ nalaṃ yo vai kāmayecchapituṃ kale | kṛcchre sa narake majjedagādhe vipule hrade
हे कलि, ऐसे गुणों वाले नल को जो शाप देना चाहे, वह अथाह और विशाल सरोवर-जैसे भयंकर नरक में डूबेगा।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 13 (3.55.13)
एवमुक्त्वा कलिं देवा द्वापरं च दिवं ययुः । ततो गतेषु देवेषु कलिर्द्वापरमब्रवीत् ॥
evamuktvā kaliṃ devā dvāparaṃ ca divaṃ yayuḥ | tato gateṣu deveṣu kalirdvāparamabravīt
कलि और द्वापर से ऐसा कहकर देवता स्वर्ग चले गए। देवताओं के चले जाने पर कलि ने द्वापर से कहा —
कलिरुवाच
श्लोक 14 (3.55.14)
संयन्तुं नोत्सहे कोपं नले वत्स्यामि द्वापर । भ्रंशयिष्यामि तं राज्यान्न भैम्या सह रंस्यते ॥
saṃyantuṃ notsahe kopaṃ nale vatsyāmi dvāpara | bhraṃśayiṣyāmi taṃ rājyānna bhaimyā saha raṃsyate
"हे द्वापर, मैं अपने क्रोध को रोक नहीं सकता। मैं नल में निवास करूँगा। मैं उसे राज्य से भ्रष्ट कर दूँगा, और वह भीमकुमारी के साथ सुख नहीं भोग सकेगा।
श्लोक 15 (3.55.15)
त्वमप्यक्षान्समाविश्य साहाय्यं कर्तुमर्हसि । मम प्रियकृते ह्यस्मिन्कृतवांश्च भविष्यसि ॥
tvamapyakṣānsamāviśya sāhāyyaṃ kartumarhasi | mama priyakṛte hyasminkṛtavāṃśca bhaviṣyasi
तुम भी पासों में प्रवेश करके मेरी सहायता करो। मेरा यह प्रिय कार्य पूरा होने पर तुम भी कृतकृत्य हो जाओगे।"