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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 56

कलि का नल में प्रवेश और पुष्कर के साथ द्यूत

द्वापर के साथ समझौता करने के बारह वर्ष बाद, जब नल पैर धोए बिना संध्या करने बैठते हैं, तब कलि को अवसर मिल जाता है और वह उनमें प्रवेश कर जाता है। फिर कलि नल के भाई पुष्कर को जुए की चुनौती देने के लिए उकसाता है और स्वयं श्रेष्ठ पासा बन जाता है। कलि से आविष्ट नल अपना धन हारते जाते हैं; मंत्री और पुरवासी उन्हें रोकने आते हैं और दमयन्ती उनसे मिलने की विनती करती है, पर नल कुछ उत्तर नहीं देते, और जुआ महीनों तक चलता रहता है।

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बृहदश्व उवाच

श्लोक 1 (3.56.1)

एवं स समयं कृत्वा द्वापरेण कलिः सह । आजगाम ततस्तत्र यत्र राजा स नैषधः ॥

evaṃ sa samayaṃ kṛtvā dvāpareṇa kaliḥ saha | ājagāma tatastatra yatra rājā sa naiṣadhaḥ

द्वापर के साथ इस प्रकार समझौता करके कलि वहाँ आया जहाँ निषध के राजा नल थे।

श्लोक 2 (3.56.2)

स नित्यमन्तरप्रेक्षी निषधेष्ववसच्चिरम् । अथास्य द्वादशे वर्षे ददर्श कलिरन्तरम् ॥

sa nityamantaraprekṣī niṣadheṣvavasacciram | athāsya dvādaśe varṣe dadarśa kalirantaram

छिद्र की ताक में रहता हुआ वह बहुत समय तक निषध देश में रहा। फिर बारहवें वर्ष में कलि को अवसर दिखाई दे गया।

श्लोक 3 (3.56.3)

कृत्वा मूत्रमुपस्पृश्य संध्यामन्वास्त नैषधः । अकृत्वा पादयोः शौचं तत्रैनं कलिराविशत् ॥

kṛtvā mūtramupaspṛśya saṃdhyāmanvāsta naiṣadhaḥ | akṛtvā pādayoḥ śaucaṃ tatrainaṃ kalirāviśat

मूत्र-त्याग के बाद नैषध ने आचमन किया और पैर धोए बिना संध्या-उपासना करने बैठ गए; वहीं कलि ने उनमें प्रवेश कर लिया।

श्लोक 4 (3.56.4)

स समाविश्य च नलं समीपं पुष्करस्य च । गत्वा पुष्करमाहेदमेहि दीव्य नलेन वै ॥

sa samāviśya ca nalaṃ samīpaṃ puṣkarasya ca | gatvā puṣkaramāhedamehi dīvya nalena vai

नल में प्रवेश करके कलि पुष्कर के पास भी गया और उससे बोला — "आओ, नल के साथ जुआ खेलो।

कलिरुवाच

श्लोक 5 (3.56.5)

अक्षद्यूते नलं जेता भवान्हि सहितो मया । निषधान्प्रतिपद्यस्व जित्वा राज्यं नलं नृपम् ॥

akṣadyūte nalaṃ jetā bhavānhi sahito mayā | niṣadhānpratipadyasva jitvā rājyaṃ nalaṃ nṛpam

मेरी सहायता से तुम पासों के खेल में नल को जीत लोगे। राजा नल से राज्य जीतकर निषध देश को अपना बना लो।"

बृहदश्व उवाच

श्लोक 6 (3.56.6)

एवमुक्तस्तु कलिना पुष्करो नलमभ्ययात् । कलिश्चैव वृषो भूत्वा तं वै पुष्करमन्वयात् ॥

evamuktastu kalinā puṣkaro nalamabhyayāt | kaliścaiva vṛṣo bhūtvā taṃ vai puṣkaramanvayāt

कलि के ऐसा कहने पर पुष्कर नल के पास गया, और कलि भी पासों में श्रेष्ठ 'वृष' बनकर पुष्कर के पीछे-पीछे चला।

श्लोक 7 (3.56.7)

आसाद्य तु नलं वीरं पुष्करः परवीरहा । दीव्यावेत्यब्रवीद्भ्राता वृषेणेति मुहुर्मुहुः ॥

āsādya tu nalaṃ vīraṃ puṣkaraḥ paravīrahā | dīvyāvetyabravīdbhrātā vṛṣeṇeti muhurmuhuḥ

वीर नल के पास पहुँचकर शत्रुवीरों का संहार करने वाला उनका भाई पुष्कर बार-बार कहने लगा — "आओ, वृष-पासे से हम दोनों खेलें।"

श्लोक 8 (3.56.8)

न चक्षमे ततो राजा समाह्वानं महामनाः । वैदर्भ्याः प्रेक्षमाणायाः प्राप्तकालममन्यत ॥

na cakṣame tato rājā samāhvānaṃ mahāmanāḥ | vaidarbhyāḥ prekṣamāṇāyāḥ prāptakālamamanyata

महामना राजा उस चुनौती को सहन न कर सके; विदर्भकुमारी के देखते-देखते उन्होंने इसे उचित अवसर मान लिया।

श्लोक 9 (3.56.9)

ततः स राज्ञा सहसा देवितुं संप्रचक्रमे । भ्रात्रा देवाभिभूतेन दैवाविष्टो जनाधिपः ॥

tataḥ sa rājñā sahasā devituṃ saṃpracakrame | bhrātrā devābhibhūtena daivāviṣṭo janādhipaḥ

तब पुष्कर ने सहसा अपने भाई राजा नल के साथ खेलना आरम्भ कर दिया, जो उस देवता (कलि) से अभिभूत थे; वह नरपति दैव के वश में हो चुके थे।

श्लोक 10 (3.56.10)

हिरण्यस्य सुवर्णस्य यानयुग्यस्य वाससाम् । आविष्टः कलिना द्यूते जीयते स्म नलस्तदा ॥

hiraṇyasya suvarṇasya yānayugyasya vāsasām | āviṣṭaḥ kalinā dyūte jīyate sma nalastadā

कलि से आविष्ट नल तब जुए में सोना, स्वर्ण के आभूषण, वाहन और उनमें जुतने वाले पशु तथा वस्त्र हारते चले गए।

श्लोक 11 (3.56.11)

तमक्षमदसंमत्तं सुहृदां न तु कश्चन । निवारणेऽभवच्छक्तो दीव्यमानमरिंदमम् ॥

tamakṣamadasaṃmattaṃ suhṛdāṃ na tu kaścana | nivāraṇe'bhavacchakto dīvyamānamariṃdamam

पासों के मद में उन्मत्त होकर खेलते हुए उस शत्रुदमन राजा को रोकने में उनके सुहृदों में से कोई भी समर्थ नहीं हुआ।

श्लोक 12 (3.56.12)

ततः पौरजनाः सर्वे मन्त्रिभिः सह भारत । राजानं द्रष्टुमागच्छन्निवारयितुमातुरम् ॥

tataḥ paurajanāḥ sarve mantribhiḥ saha bhārata | rājānaṃ draṣṭumāgacchannivārayitumāturam

हे भारत, तब सब पुरवासी मंत्रियों के साथ उस संकटग्रस्त राजा से मिलने और उन्हें रोकने के लिए आए।

श्लोक 13 (3.56.13)

ततः सूत उपागम्य दमयन्त्यै न्यवेदयत् । एष पौरजनो देवि द्वारि तिष्ठति कार्यवान् ॥

tataḥ sūta upāgamya damayantyai nyavedayat | eṣa paurajano devi dvāri tiṣṭhati kāryavān

तब सारथी ने आकर दमयन्ती से निवेदन किया — "देवि, ये पुरवासी किसी आवश्यक कार्य से द्वार पर खड़े हैं।

सूत उवाच

श्लोक 14 (3.56.14)

निवेद्यतां नैषधाय सर्वाः प्रकृतयः स्थिताः । अमृष्यमाणा व्यसनं राज्ञो धर्मार्थदर्शिनः ॥

nivedyatāṃ naiṣadhāya sarvāḥ prakṛtayaḥ sthitāḥ | amṛṣyamāṇā vyasanaṃ rājño dharmārthadarśinaḥ

निषधराज को सूचित किया जाए कि उनकी समस्त प्रजा यहाँ उपस्थित है। धर्म और अर्थ पर दृष्टि रखने वाले अपने राजा की यह विपत्ति उससे सही नहीं जा रही।"

बृहदश्व उवाच

श्लोक 15 (3.56.15)

ततः सा बाष्पकलया वाचा दुःखेन कर्शिता । उवाच नैषधं भैमी शोकोपहतचेतना ॥

tataḥ sā bāṣpakalayā vācā duḥkhena karśitā | uvāca naiṣadhaṃ bhaimī śokopahatacetanā

तब दुःख से कृश और शोक से व्याकुल-चित्त भैमी ने आँसुओं से रुँधी वाणी में नैषध से कहा —

दमयन्त्युवाच

श्लोक 16 (3.56.16)

राजन्पौरजनो द्वारि त्वां दिदृक्षुरवस्थितः । वृद्धैर्ब्राह्मणमुख्यैश्च वणिग्भिश्च समन्वितः ॥

rājanpaurajano dvāri tvāṃ didṛkṣuravasthitaḥ | vṛddhairbrāhmaṇamukhyaiśca vaṇigbhiśca samanvitaḥ

"राजन्, पुरवासी आपके दर्शन की इच्छा से द्वार पर खड़े हैं; उनके साथ वृद्धजन, प्रमुख ब्राह्मण और व्यापारी भी हैं।

बृहदश्व उवाच

श्लोक 17 (3.56.17)

आगतं सहितं राजंस्त्वत्प्रसादावलम्बनम् । तं द्रष्टुमर्हसीत्येवं पुनः पुनरभाषत ॥

āgataṃ sahitaṃ rājaṃstvatprasādāvalambanam | taṃ draṣṭumarhasītyevaṃ punaḥ punarabhāṣata

हे राजन्, वे सब आपकी कृपा का आसरा लेकर एक साथ आए हैं। आपको उनसे मिलना चाहिए।" — यह बात वह बार-बार कहती रही।

श्लोक 18 (3.56.18)

तां तथा रुचिरापाङ्गीं विलपन्तीं तथाविधाम् । आविष्टः कलिना राजा नाभ्यभाषत किंचन ॥

tāṃ tathā rucirāpāṅgīṃ vilapantīṃ tathāvidhām | āviṣṭaḥ kalinā rājā nābhyabhāṣata kiṃcana

किंतु कलि से आविष्ट राजा ने इस प्रकार विलाप करती उस सुन्दर नेत्रों वाली से कुछ भी नहीं कहा।

श्लोक 19 (3.56.19)

ततस्ते मन्त्रिणः सर्वे ते चैव पुरवासिनः । नायमस्तीति दुःखार्ता व्रीडिता जग्मुरालयान् ॥

tataste mantriṇaḥ sarve te caiva puravāsinaḥ | nāyamastīti duḥkhārtā vrīḍitā jagmurālayān

तब वे सब मंत्री और पुरवासी दुःखी और लज्जित होकर "अब यह वह नहीं रहा" कहते हुए अपने-अपने घर चले गए।

श्लोक 20 (3.56.20)

तथा तदभवद्द्यूतं पुष्करस्य नलस्य च । युधिष्ठिर बहून्मासान्पुण्यश्लोकस्त्वजीयत ॥

tathā tadabhavaddyūtaṃ puṣkarasya nalasya ca | yudhiṣṭhira bahūnmāsānpuṇyaślokastvajīyata

हे युधिष्ठिर, इस प्रकार पुष्कर और नल का वह जुआ बहुत महीनों तक चलता रहा, और पुण्यश्लोक नल हारते ही गए।

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