आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 57
दमयन्ती का अपनी संतान को विदर्भ भेजना
नल को जुए में डूबा देखकर दमयन्ती अपनी धाय बृहत्सेना को उनके नाम से मंत्रियों को बुलाने भेजती है, पर नल उनसे नहीं मिलते। विनाश की आशंका से वह सारथी वार्ष्णेय को बुलाकर उससे कहती है कि वह उसकी दोनों संतानों — इन्द्रसेना और इन्द्रसेन — को नल के घोड़ों और रथ सहित उसके पिता की नगरी कुण्डिन पहुँचा दे। वार्ष्णेय ऐसा ही करता है, राजा भीम से विदा लेता है, और भटकता हुआ अयोध्या पहुँचकर राजा ऋतुपर्ण का सारथी बन जाता है।
बृहदश्व उवाच
श्लोक 1 (3.57.1)
दमयन्ती ततो दृष्ट्वा पुण्यश्लोकं नराधिपम् । उन्मत्तवदनुन्मत्ता देवने कृतचेतसम् ॥
damayantī tato dṛṣṭvā puṇyaślokaṃ narādhipam | unmattavadanunmattā devane kṛtacetasam
तब स्वयं सचेत रहने वाली दमयन्ती ने देखा कि पुण्यश्लोक नरेश उन्मत्त की भाँति अपना मन जुए में ही लगाए हुए हैं।
श्लोक 2 (3.57.2)
भयशोकसमाविष्टा राजन्भीमसुता ततः । चिन्तयामास तत्कार्यं सुमहत्पार्थिवं प्रति ॥
bhayaśokasamāviṣṭā rājanbhīmasutā tataḥ | cintayāmāsa tatkāryaṃ sumahatpārthivaṃ prati
हे राजन्, भय और शोक से घिरी भीमसुता ने तब सोचा कि राजा के लिए उसे कौन-सा बड़ा कार्य करना चाहिए।
श्लोक 3 (3.57.3)
सा शङ्कमाना तत्पापं चिकीर्षन्ती च तत्प्रियम् । नलं च हृतसर्वस्वमुपलभ्येदमब्रवीत् ॥
sā śaṅkamānā tatpāpaṃ cikīrṣantī ca tatpriyam | nalaṃ ca hṛtasarvasvamupalabhyedamabravīt
उस अनर्थ की आशंका करती हुई और उनका भला करना चाहती हुई, नल को सर्वस्व हारा हुआ जानकर उसने यह कहा
श्लोक 4 (3.57.4)
बृहत्सेनामतियशां तां धात्रीं परिचारिकाम् । हितां सर्वार्थकुशलामनुरक्तां सुभाषिताम् ॥
bṛhatsenāmatiyaśāṃ tāṃ dhātrīṃ paricārikām | hitāṃ sarvārthakuśalāmanuraktāṃ subhāṣitām
अपनी धाय और सेविका बृहत्सेना से, जो अत्यंत यशस्विनी, हितैषिणी, सब कार्यों में कुशल, अनुरक्त और मधुरभाषिणी थी —
दमयन्त्युवाच
श्लोक 5 (3.57.5)
बृहत्सेने व्रजामात्यानानाय्य नलशासनात् । आचक्ष्व यद्धृतं द्रव्यमवशिष्टं च यद्वसु ॥
bṛhatsene vrajāmātyānānāyya nalaśāsanāt | ācakṣva yaddhṛtaṃ dravyamavaśiṣṭaṃ ca yadvasu
"बृहत्सेने, जाओ, नल की आज्ञा से मंत्रियों को बुला लाओ और उन्हें बताओ कि कितना धन हारा जा चुका है और कितना शेष है।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 6 (3.57.6)
इत्येवं सा समादिष्टा बृहत्सेना नरेश्वर । उवाच देव्या वचनं मन्त्रिणां सा समीपतः ॥
ityevaṃ sā samādiṣṭā bṛhatsenā nareśvara | uvāca devyā vacanaṃ mantriṇāṃ sā samīpataḥ
हे नरेश्वर, इस प्रकार आदेश पाकर बृहत्सेना ने मंत्रियों के पास जाकर उन्हें रानी का संदेश सुनाया।
श्लोक 7 (3.57.7)
ततस्ते मन्त्रिणः सर्वे विज्ञाय नलशासनम् । अपि नो भागधेयं स्यादित्युक्त्वा पुनराव्रजन् ॥
tataste mantriṇaḥ sarve vijñāya nalaśāsanam | api no bhāgadheyaṃ syādityuktvā punarāvrajan
तब सब मंत्री इसे नल की आज्ञा जानकर "शायद हमारा भाग्य जागे" कहते हुए फिर लौट आए।
श्लोक 8 (3.57.8)
तास्तु सर्वाः प्रकृतयो द्वितीयं समुपस्थिताः । न्यवेदयद्भीमसुता न च तत्प्रत्यनन्दत ॥
tāstu sarvāḥ prakṛtayo dvitīyaṃ samupasthitāḥ | nyavedayadbhīmasutā na ca tatpratyanandata
जब सारी प्रजा दूसरी बार आकर उपस्थित हुई, तब भीमसुता ने नल को इसकी सूचना दी, परंतु उन्होंने उसका स्वागत नहीं किया।
श्लोक 9 (3.57.9)
वाक्यमप्रतिनन्दन्तं भर्तारमभिवीक्ष्य सा । दमयन्ती पुनर्वेश्म व्रीडिता प्रविवेश ह ॥
vākyamapratinandantaṃ bhartāramabhivīkṣya sā | damayantī punarveśma vrīḍitā praviveśa ha
पति को अपनी बात का अभिनन्दन न करते देख दमयन्ती लज्जित होकर फिर महल के भीतर चली गई।
श्लोक 10 (3.57.10)
निशाम्य सततं चाक्षान्पुण्यश्लोकपराङ्मुखान् । नलं च हृतसर्वस्वं धात्रीं पुनरुवाच ह ॥
niśāmya satataṃ cākṣānpuṇyaślokaparāṅmukhān | nalaṃ ca hṛtasarvasvaṃ dhātrīṃ punaruvāca ha
यह सुनकर कि पासे निरंतर पुण्यश्लोक के विरुद्ध पड़ रहे हैं और नल अपना सर्वस्व हार चुके हैं, उसने फिर धाय से कहा —
दमयन्त्युवाच
श्लोक 11 (3.57.11)
बृहत्सेने पुनर्गच्छ वार्ष्णेयं नलशासनात् । सूतमानय कल्याणि महत्कार्यमुपस्थितम् ॥
bṛhatsene punargaccha vārṣṇeyaṃ nalaśāsanāt | sūtamānaya kalyāṇi mahatkāryamupasthitam
"कल्याणी बृहत्सेने, फिर जाओ और नल की आज्ञा से सारथी वार्ष्णेय को बुला लाओ; एक बड़ा काम आ पड़ा है।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 12 (3.57.12)
बृहत्सेना तु सा श्रुत्वा दमयन्त्याः प्रभाषितम् । वार्ष्णेयमानयामास पुरुषैराप्तकारिभिः ॥
bṛhatsenā tu sā śrutvā damayantyāḥ prabhāṣitam | vārṣṇeyamānayāmāsa puruṣairāptakāribhiḥ
दमयन्ती की बात सुनकर बृहत्सेना ने विश्वस्त सेवकों द्वारा वार्ष्णेय को बुलवा लिया।
श्लोक 13 (3.57.13)
वार्ष्णेयं तु ततो भैमी सान्त्वयञ्छ्लक्ष्णया गिरा । उवाच देशकालज्ञा प्राप्तकालमनिन्दिता ॥
vārṣṇeyaṃ tu tato bhaimī sāntvayañchlakṣṇayā girā | uvāca deśakālajñā prāptakālamaninditā
तब देश और काल को समझने वाली अनिन्दिता भैमी ने कोमल वाणी से वार्ष्णेय को सान्त्वना देते हुए समयोचित बात कही —
दमयन्त्युवाच
श्लोक 14 (3.57.14)
जानीषे त्वं यथा राजा सम्यग्वृत्तः सदा त्वयि । तस्य त्वं विषमस्थस्य साहाय्यं कर्तुमर्हसि ॥
jānīṣe tvaṃ yathā rājā samyagvṛttaḥ sadā tvayi | tasya tvaṃ viṣamasthasya sāhāyyaṃ kartumarhasi
"तुम जानते हो कि राजा ने सदा तुम्हारे साथ कितना अच्छा व्यवहार किया है। अब वे संकट में हैं, तुम्हें उनकी सहायता करनी चाहिए।
श्लोक 15 (3.57.15)
यथायथा हि नृपतिः पुष्करेणैव जीयते । तथातथाऽस्य वै द्यूते रागो भूयोऽभिवर्धते ॥
yathāyathā hi nṛpatiḥ puṣkareṇaiva jīyate | tathātathā'sya vai dyūte rāgo bhūyo'bhivardhate
राजा पुष्कर से जितना-जितना हारते हैं, जुए के प्रति उनकी आसक्ति उतनी-उतनी ही बढ़ती जाती है।
श्लोक 16 (3.57.16)
यथा च पुष्करस्याक्षाः पतन्ति वशवर्तिनः । तथा विपर्ययश्चापि नलस्याक्षेषु दृश्यते ॥
yathā ca puṣkarasyākṣāḥ patanti vaśavartinaḥ | tathā viparyayaścāpi nalasyākṣeṣu dṛśyate
पुष्कर के पासे उसकी इच्छा के अनुसार पड़ते हैं, जबकि नल के पासों में ठीक उलटा दिखाई देता है।
श्लोक 17 (3.57.17)
सुहृत्स्वजनवाक्यानि यथाऽयं न शृणोति च । ममापि च तथा वाक्यं नाभिनन्दति नैषध ॥
suhṛtsvajanavākyāni yathā'yaṃ na śṛṇoti ca | mamāpi ca tathā vākyaṃ nābhinandati naiṣadha
जैसे ये अपने सुहृदों और स्वजनों की बातें नहीं सुनते, वैसे ही, हे निषधवासी, मेरी बात का भी आदर नहीं करते।
श्लोक 18 (3.57.18)
यथा राज्ञः प्रदीप्तानां भाग्यानामद्य सारथे । नूनं मन्ये न शेषोस्ति नैषधस्य महात्मनः ॥
yathā rājñaḥ pradīptānāṃ bhāgyānāmadya sārathe | nūnaṃ manye na śeṣosti naiṣadhasya mahātmanaḥ
सारथे, मुझे लगता है कि महात्मा निषधराज के उस देदीप्यमान सौभाग्य में से आज निश्चय ही कुछ भी शेष नहीं रहा।
श्लोक 19 (3.57.19)
यत्तु मे वचनं राजा नाभिनन्दति मोहितः । शरणं त्वां प्रपन्नाऽस्मि सारथे कुरु मद्वचः । न हि मे शुध्यते भावो विनाशं प्रति सारथे ॥
yattu me vacanaṃ rājā nābhinandati mohitaḥ | śaraṇaṃ tvāṃ prapannā'smi sārathe kuru madvacaḥ | na hi me śudhyate bhāvo vināśaṃ prati sārathe
चूँकि मोहग्रस्त राजा मेरी बात नहीं मानते, इसलिए सारथे, मैं तुम्हारी शरण में आई हूँ — मेरा कहा करो। सारथे, विनाश की आशंका से मेरा मन शांत नहीं है।
श्लोक 20 (3.57.20)
नलस्य दयितानश्वान्योजयित्वा मनोजवान् । रथमारोप्य मिथुनं कुण्डिनं यातुमर्हसि ॥
nalasya dayitānaśvānyojayitvā manojavān | rathamāropya mithunaṃ kuṇḍinaṃ yātumarhasi
नल के प्रिय, मन के समान वेगवान घोड़ों को जोतकर, दोनों बच्चों को रथ पर बिठाओ और कुण्डिनपुर चले जाओ।
श्लोक 21 (3.57.21)
मम ज्ञातिषु निक्षिप्य दारकौ स्यन्दनं तथा । अश्वांश्चेमान्यथाकामं वस वाऽन्यत्र गच्छ वा ॥
mama jñātiṣu nikṣipya dārakau syandanaṃ tathā | aśvāṃścemānyathākāmaṃ vasa vā'nyatra gaccha vā
दोनों बच्चों को, रथ को और इन घोड़ों को मेरे स्वजनों के पास छोड़कर, फिर चाहो तो वहीं रहना या कहीं और चले जाना।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 22 (3.57.22)
दमयन्त्यास्तु तद्वाक्यं वार्ष्णेयो नलसारथिः । न्यवेदयदशेषेण नलामात्येषु मुख्यशः ॥
damayantyāstu tadvākyaṃ vārṣṇeyo nalasārathiḥ | nyavedayadaśeṣeṇa nalāmātyeṣu mukhyaśaḥ
नल के सारथी वार्ष्णेय ने दमयन्ती की वह बात पूरी-की-पूरी नल के प्रमुख मंत्रियों को बता दी।
श्लोक 23 (3.57.23)
तैः समेत्य विनिश्चित्य सोऽनुज्ञातो महीपते । ययौ मिथुनमारोप्य विदर्भांस्तेन वाहिना ॥
taiḥ sametya viniścitya so'nujñāto mahīpate | yayau mithunamāropya vidarbhāṃstena vāhinā
हे महीपते, उनसे मिलकर और निश्चय करके, अनुमति पाकर वह दोनों बच्चों को रथ पर बिठाकर उसी वाहन से विदर्भ चला गया।
श्लोक 24 (3.57.24)
हयांस्तत्र विनिक्षिप्य सूतो रथवरं च तम् । इन्द्रसेनां च तां कन्यामिन्द्रसेनं च बालकम् ॥
hayāṃstatra vinikṣipya sūto rathavaraṃ ca tam | indrasenāṃ ca tāṃ kanyāmindrasenaṃ ca bālakam
वहाँ सारथी ने घोड़ों, उस उत्तम रथ, कन्या इन्द्रसेना और बालक इन्द्रसेन को सौंप दिया,
श्लोक 25 (3.57.25)
आमन्त्र्य भीमं राजानमार्तः शोचन्नलं नृपम् । क्व नु यास्यामि मनसा चिन्तयानो मुहुर्मुहुः । अटमानस्ततोऽयोध्यां जगाम नगरीं तदा ॥
āmantrya bhīmaṃ rājānamārtaḥ śocannalaṃ nṛpam | kva nu yāsyāmi manasā cintayāno muhurmuhuḥ | aṭamānastato'yodhyāṃ jagāma nagarīṃ tadā
और राजा भीम से विदा लेकर, राजा नल के लिए शोक करता हुआ तथा बार-बार मन में सोचता हुआ कि "अब मैं कहाँ जाऊँ", वह भटकता हुआ अयोध्या नगरी पहुँचा।
श्लोक 26 (3.57.26)
ऋतुपर्णं स राजानमुपतस्थे सुदुःखितः । भृतिं च स ददौ चास्य सारथ्येन नियोजितः ॥
ṛtuparṇaṃ sa rājānamupatasthe suduḥkhitaḥ | bhṛtiṃ ca sa dadau cāsya sārathyena niyojitaḥ
अत्यंत दुःखी होकर वह राजा ऋतुपर्ण की सेवा में उपस्थित हुआ; ऋतुपर्ण ने उसे सारथी के काम पर रखकर वेतन दिया।