आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 58
राज्य हारकर नल का वन-गमन
पुष्कर नल का बचा हुआ राज्य और धन भी जीत लेता है और उपहास करते हुए दमयन्ती को अगला दाँव बनाने को कहता है; नल केवल अपने वस्त्र और दमयन्ती के आभूषण दाँव पर रखते हैं, अपने गहने उतार देते हैं और एक ही वस्त्र में नगर से निकल पड़ते हैं, दमयन्ती उनके पीछे चलती है। पुष्कर किसी को भी उनकी सहायता करने से रोक देता है, और तीन रात बाद दोनों वन में भटकने लगते हैं। वहाँ नल अपने एकमात्र वस्त्र से कुछ सुनहरे पक्षियों को पकड़ना चाहते हैं, पर वे पासे निकलते हैं और वस्त्र लेकर उड़ जाते हैं। फिर नल बार-बार दमयन्ती को विदर्भ के मार्ग दिखाते हैं; दमयन्ती, यह आशंका करके कि वे उसे छोड़ना चाहते हैं, उनसे साथ-साथ अपने पिता के घर चलने की विनती करती है।
बृहदश्व उवाच
श्लोक 1 (3.58.1)
ततस्तु याते वार्ष्णेये पुण्यश्लोकस्य दीव्यतः । पुष्करेण हृतं राज्यं यच्चापि वसु किंचन ॥
tatastu yāte vārṣṇeye puṇyaślokasya dīvyataḥ | puṣkareṇa hṛtaṃ rājyaṃ yaccāpi vasu kiṃcana
वार्ष्णेय के चले जाने के बाद, खेलते हुए पुण्यश्लोक नल का राज्य और जो कुछ भी धन बचा था, वह पुष्कर ने जीत लिया।
श्लोक 2 (3.58.2)
हृतराज्यं नलं राजन्प्रहसन्पुष्करोऽब्रवीत् । द्यूतं प्रवर्ततां भूयः प्रतिपाणोऽस्ति कस्तव ॥
hṛtarājyaṃ nalaṃ rājanprahasanpuṣkaro'bravīt | dyūtaṃ pravartatāṃ bhūyaḥ pratipāṇo'sti kastava
हे राजन्, राज्य हार चुके नल से पुष्कर ने हँसते हुए कहा — "जुआ फिर चले। पर तुम्हारे पास दाँव पर लगाने को अब क्या है?
पुष्कर उवाच
श्लोक 3 (3.58.3)
शिष्टा ते दमयन्त्येका सर्वमन्यद्धृतं मया । दमयन्त्याः पणः साधु वर्ततां यदि मन्यसे ॥
śiṣṭā te damayantyekā sarvamanyaddhṛtaṃ mayā | damayantyāḥ paṇaḥ sādhu vartatāṃ yadi manyase
तुम्हारे पास अकेली दमयन्ती बची है, बाकी सब मैंने जीत लिया है। यदि तुम ठीक समझो तो अब दमयन्ती को दाँव पर लगाओ।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 4 (3.58.4)
पुष्करेणैवमुक्तस्य पुण्यश्लोकस्य मन्युना । व्यदीर्यतेव हृदयं न चैनं किंचिदब्रवीत् ॥
puṣkareṇaivamuktasya puṇyaślokasya manyunā | vyadīryateva hṛdayaṃ na cainaṃ kiṃcidabravīt
पुष्कर के ऐसा कहने पर पुण्यश्लोक का हृदय क्रोध से मानो फट गया, फिर भी उन्होंने उससे कुछ नहीं कहा।
श्लोक 5 (3.58.5)
ततः पुष्करमालोक्य नलः परममन्युमान् । उवाच विद्यतेऽन्यच्च धनं मम नराधम ॥
tataḥ puṣkaramālokya nalaḥ paramamanyumān | uvāca vidyate'nyacca dhanaṃ mama narādhama
तब अत्यंत क्रुद्ध नल ने पुष्कर की ओर देखकर कहा — "नराधम, मेरे पास और भी धन है।"
श्लोक 6 (3.58.6)
पणरूपेण निक्षिप्य पुण्यश्लोकः सुदुर्मनाः । उत्तरीयं तथा वस्त्रं तस्याश्चाभरणानि च । उत्सृज्य सर्वगात्रेभ्यो भूषणानि महायशाः ॥
paṇarūpeṇa nikṣipya puṇyaślokaḥ sudurmanāḥ | uttarīyaṃ tathā vastraṃ tasyāścābharaṇāni ca | utsṛjya sarvagātrebhyo bhūṣaṇāni mahāyaśāḥ
और अत्यंत खिन्न मन वाले पुण्यश्लोक ने अपना उत्तरीय, अपना वस्त्र और दमयन्ती के आभूषण दाँव पर रख दिए; फिर उस महायशस्वी राजा ने अपने सब अंगों से आभूषण उतार दिए,
श्लोक 7 (3.58.7)
एकवासा ह्यसंवीतः सुहृच्छोकविवर्धनः । निश्चक्राम ततो राजा त्यक्त्वा सुविपुलां श्रियम् ॥
ekavāsā hyasaṃvītaḥ suhṛcchokavivardhanaḥ | niścakrāma tato rājā tyaktvā suvipulāṃ śriyam
और केवल एक वस्त्र पहने, बिना उत्तरीय के, सुहृदों का शोक बढ़ाते हुए, वह राजा अपनी विशाल राजलक्ष्मी छोड़कर निकल पड़े।
श्लोक 8 (3.58.8)
दमयन्त्येकवस्त्राऽथ गच्छन्तं पृष्ठतोऽन्वगात् । स तया नगराभ्याशे त्रिरात्रं नैषधोऽवसत् ॥
damayantyekavastrā'tha gacchantaṃ pṛṣṭhato'nvagāt | sa tayā nagarābhyāśe trirātraṃ naiṣadho'vasat
एक ही वस्त्र में दमयन्ती जाते हुए नल के पीछे-पीछे चल दी। उसके साथ नैषध तीन रात नगर के पास ठहरे।
श्लोक 9 (3.58.9)
पुष्करस्तु महाराज घोषयामास वै पुरे । नले यः सम्यगातिष्ठेत्स गच्छेद्वध्यतां मम ॥
puṣkarastu mahārāja ghoṣayāmāsa vai pure | nale yaḥ samyagātiṣṭhetsa gacchedvadhyatāṃ mama
महाराज, पुष्कर ने नगर में घोषणा करवा दी — "जो कोई नल के साथ अच्छा व्यवहार करेगा, वह मेरे द्वारा मारा जाएगा।"
श्लोक 10 (3.58.10)
पुष्करस्य तु वाक्येन तस्य विद्वेषणेन च । पौरा न तस्य सत्कारं कृतवन्तो युधिष्ठिर ॥
puṣkarasya tu vākyena tasya vidveṣaṇena ca | paurā na tasya satkāraṃ kṛtavanto yudhiṣṭhira
हे युधिष्ठिर, पुष्कर के आदेश और नल के प्रति उसके द्वेष के कारण पुरवासियों ने नल का कोई सत्कार नहीं किया।
श्लोक 11 (3.58.11)
स तथा नगराभ्याशे सत्कारार्हो न सत्कृतः । त्रिरात्रमुषितो राजा जलमात्रेण वर्तयन् ॥
sa tathā nagarābhyāśe satkārārho na satkṛtaḥ | trirātramuṣito rājā jalamātreṇa vartayan
इस प्रकार सत्कार के योग्य होते हुए भी सत्कार न पाकर राजा नगर के पास तीन रात केवल जल पीकर रहे।
श्लोक 12 (3.58.12)
पीड्यमानः क्षुधा तत्र फलमूलानि कर्षयन् । प्रातिष्ठत ततो राजा दमयन्ती तमन्वगात् ॥
pīḍyamānaḥ kṣudhā tatra phalamūlāni karṣayan | prātiṣṭhata tato rājā damayantī tamanvagāt
वहाँ भूख से पीड़ित होकर फल-मूल खोदते-बटोरते हुए राजा आगे चल पड़े, और दमयन्ती उनके पीछे-पीछे चली।
श्लोक 13 (3.58.13)
क्षुधया पीड्यमानस्तु नलो बहुतिथेऽहनि । अपश्यच्छकुनान्कांश्चिद्धिरण्यसदृशच्छदान् ॥
kṣudhayā pīḍyamānastu nalo bahutithe'hani | apaśyacchakunānkāṃściddhiraṇyasadṛśacchadān
बहुत दिनों के बाद भूख से पीड़ित नल ने कुछ पक्षी देखे जिनके पंख सोने जैसे थे।
श्लोक 14 (3.58.14)
स चिन्तयामास तदा निषधाधिपतिर्बली । अस्ति भक्ष्यो ममाद्यापि वसु चेदं भविष्यति ॥
sa cintayāmāsa tadā niṣadhādhipatirbalī | asti bhakṣyo mamādyāpi vasu cedaṃ bhaviṣyati
तब बलवान निषधराज ने सोचा — "आज मेरे लिए यह भोजन है, और यह धन भी बन जाएगा।"
श्लोक 15 (3.58.15)
ततस्तानन्तरीयेण वाससा स समावृणोत् । तस्य तद्वस्त्रमादाय सर्वे जग्मुर्विहायसा ॥
tatastānantarīyeṇa vāsasā sa samāvṛṇot | tasya tadvastramādāya sarve jagmurvihāyasā
तब उन्होंने अपने पहने हुए वस्त्र से उन्हें ढक दिया; परंतु वे सब उनका वह वस्त्र लेकर आकाश में उड़ गए।
श्लोक 16 (3.58.16)
उत्पतन्तः खगा वाक्यमेतदाहुस्ततो नलम् । दृष्ट्वा दिग्वाससं भूमौ स्थितं दीनमधोमुखम् ॥
utpatantaḥ khagā vākyametadāhustato nalam | dṛṣṭvā digvāsasaṃ bhūmau sthitaṃ dīnamadhomukham
ऊपर उड़ते हुए उन पक्षियों ने नल को भूमि पर नग्न, दीन और नीचे मुँह किए खड़े देखा और उनसे यह कहा —
अक्षा ऊचुः
श्लोक 17 (3.58.17)
वयमक्षाः सुदुर्बुद्धे तव वासो जिहीर्षवः । आगता न हि नः प्रीतिः सवाससि गते त्वयि ॥
vayamakṣāḥ sudurbuddhe tava vāso jihīrṣavaḥ | āgatā na hi naḥ prītiḥ savāsasi gate tvayi
"मूर्ख, हम वही पासे हैं! तुम्हारा वस्त्र भी छीनने की इच्छा से हम आए थे, क्योंकि तुम्हारा वस्त्र पहने हुए चले जाना हमें अच्छा नहीं लगा।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 18 (3.58.18)
तान्समीक्ष्य गतानक्षानात्मानं च विवाससम् । पुण्यश्लोकस्तदा राजा दमयन्तीमथाब्रवीत् ॥
tānsamīkṣya gatānakṣānātmānaṃ ca vivāsasam | puṇyaślokastadā rājā damayantīmathābravīt
पासों को उड़ जाते देख और स्वयं को वस्त्रहीन पाकर राजा पुण्यश्लोक ने तब दमयन्ती से कहा —
नल उवाच
श्लोक 19 (3.58.19)
येषां प्रकोपादैश्वर्यान्प्रच्युतोऽहमनिन्दिते । प्राणयात्रां न विन्देयं दुःखितः क्षुधयाऽन्वितः ॥
yeṣāṃ prakopādaiśvaryānpracyuto'hamanindite | prāṇayātrāṃ na vindeyaṃ duḥkhitaḥ kṣudhayā'nvitaḥ
"अनिन्दिते, जिनके कोप से मैं अपने ऐश्वर्य से गिर गया हूँ, और दुःखी तथा भूखा होकर प्राण बचाने का साधन भी नहीं पा रहा,
श्लोक 20 (3.58.20)
येषां कृते न सत्कारमकुर्वन्मयि नैषधाः । इमे ते शकुना भूत्वा वासश्चापहरन्ति मे ॥
yeṣāṃ kṛte na satkāramakurvanmayi naiṣadhāḥ | ime te śakunā bhūtvā vāsaścāpaharanti me
जिनके कारण निषधवासियों ने मेरा सत्कार नहीं किया, वे ही पक्षी बनकर मेरा वस्त्र भी उड़ा ले जा रहे हैं।
श्लोक 21 (3.58.21)
वैषम्यं परमं प्राप्तो दुःखितो गतचेतनः । भर्ता तेऽहं निबोधेदं वचनं हितमात्मनः ॥
vaiṣamyaṃ paramaṃ prāpto duḥkhito gatacetanaḥ | bhartā te'haṃ nibodhedaṃ vacanaṃ hitamātmanaḥ
मैं घोर विपत्ति में पड़ गया हूँ, दुःखी हूँ और मेरी चेतना खो गई है। मैं तुम्हारा पति हूँ; अपने हित की यह बात सुनो।
श्लोक 22 (3.58.22)
एते गच्छन्ति बहवः पन्थानो दक्षिणापथम् । अवन्तीमृक्षवन्तं च समतिक्रम्य पर्वतम् ॥
ete gacchanti bahavaḥ panthāno dakṣiṇāpatham | avantīmṛkṣavantaṃ ca samatikramya parvatam
ये बहुत-से मार्ग अवन्ती और ऋक्षवान पर्वत को पार करके दक्षिणापथ की ओर जाते हैं।
श्लोक 23 (3.58.23)
एष विन्ध्यो महाशैलः पयोष्णी च समुद्रगा । आश्रमाश्च महर्षीणां बहुमूलफलान्विताः ॥
eṣa vindhyo mahāśailaḥ payoṣṇī ca samudragā | āśramāśca maharṣīṇāṃ bahumūlaphalānvitāḥ
यह महान विन्ध्य पर्वत है, और यह समुद्र की ओर बहने वाली पयोष्णी नदी है; और ये महर्षियों के आश्रम हैं, जहाँ बहुत-से कंद-मूल और फल हैं।
श्लोक 24 (3.58.24)
एष पन्था विदर्भाणामेष यास्यति कोसलान् । अतःपरं च देशोऽयं दक्षिणो दक्षिणापथः ॥
eṣa panthā vidarbhāṇāmeṣa yāsyati kosalān | ataḥparaṃ ca deśo'yaṃ dakṣiṇo dakṣiṇāpathaḥ
यह विदर्भ देश का मार्ग है, यह कोसल देश को जाएगा; और इनके आगे यह दक्षिणी प्रदेश, दक्षिणापथ है।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 25 (3.58.25)
एतद्वाक्यं नलो राजा दमयन्तीं समाहितः । उवाचासकृदार्तो हि भैमीमुद्दिश्य भारत ॥
etadvākyaṃ nalo rājā damayantīṃ samāhitaḥ | uvācāsakṛdārto hi bhaimīmuddiśya bhārata
हे भारत, दुःख में डूबे हुए राजा नल ने एकाग्र मन से भैमी को लक्ष्य करके यही बात दमयन्ती से बार-बार कही।
श्लोक 26 (3.58.26)
ततः सा वाष्पकलया वाचा दुःखेन कर्शिता । उवाच दमयन्ती तं नैषधं करुणं वचः ॥
tataḥ sā vāṣpakalayā vācā duḥkhena karśitā | uvāca damayantī taṃ naiṣadhaṃ karuṇaṃ vacaḥ
तब दुःख से कृश दमयन्ती ने आँसुओं से रुँधी वाणी में नैषध से ये करुण वचन कहे —
दमयन्त्युवाच
श्लोक 27 (3.58.27)
उद्वेपते मे हृदयं सीदन्त्यङ्गानि सर्वशः । तव पार्थिव संकल्पं चिन्तयन्त्याः पुनः पुनः ॥
udvepate me hṛdayaṃ sīdantyaṅgāni sarvaśaḥ | tava pārthiva saṃkalpaṃ cintayantyāḥ punaḥ punaḥ
"हे राजन्, आपके इस संकल्प के बारे में बार-बार सोचकर मेरा हृदय काँप उठता है और मेरे सब अंग शिथिल हो जाते हैं।
श्लोक 28 (3.58.28)
हृतराज्यं हृतद्रव्यं विवस्त्रं क्षुच्छ्रमान्वितम् । कथमुत्सृज्य गच्छेयमहं त्वां निर्जने वने ॥
hṛtarājyaṃ hṛtadravyaṃ vivastraṃ kṣucchramānvitam | kathamutsṛjya gaccheyamahaṃ tvāṃ nirjane vane
आपका राज्य छिन गया, धन छिन गया, आप वस्त्रहीन हैं, भूख और थकान से घिरे हैं — ऐसे में इस निर्जन वन में आपको छोड़कर मैं कैसे जा सकती हूँ?
श्लोक 29 (3.58.29)
श्रान्तस्य ते क्षुधार्तस्य चिन्तयानस्य तत्सुखम् । वने घोरे महाराज नाशयिष्याम्यहं क्लमम् ॥
śrāntasya te kṣudhārtasya cintayānasya tatsukham | vane ghore mahārāja nāśayiṣyāmyahaṃ klamam
महाराज, इस भयानक वन में जब आप थके-माँदे और भूखे होकर बीते सुख का चिन्तन करेंगे, तब मैं आपकी थकान दूर करूँगी।
श्लोक 30 (3.58.30)
न च भार्यासमं किंचिन्नरस्यार्तस्य भेषजम् । नित्यं हि सर्वदुःखेषु सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥
na ca bhāryāsamaṃ kiṃcinnarasyārtasya bheṣajam | nityaṃ hi sarvaduḥkheṣu satyametadbravīmi te
दुःखी पुरुष के लिए सब दुःखों में सदा पत्नी के समान कोई औषधि नहीं है। मैं आपसे यह सत्य कहती हूँ।"
नल उवाच
श्लोक 31 (3.58.31)
एवमेतद्यथाऽऽत्थ त्वं दमयन्ति सुमध्यमे । नास्ति भार्यासमं मित्रं नरस्यार्तस्य भेषजम् ॥
evametadyathā''ttha tvaṃ damayanti sumadhyame | nāsti bhāryāsamaṃ mitraṃ narasyārtasya bheṣajam
"सुमध्यमे दमयन्ती, जैसा तुम कहती हो, बात ठीक वैसी ही है; दुःखी पुरुष के लिए पत्नी के समान न कोई मित्र है, न कोई औषधि।
श्लोक 32 (3.58.32)
न चाहं त्यक्तुकामस्त्वां किमलं भीरु शङ्कसे । त्यजेयमहमात्मानं न चैव त्वामनिन्दिते ॥
na cāhaṃ tyaktukāmastvāṃ kimalaṃ bhīru śaṅkase | tyajeyamahamātmānaṃ na caiva tvāmanindite
मैं तुम्हें छोड़ना नहीं चाहता; हे भीरु, तुम इतनी शंका क्यों करती हो? अनिन्दिते, मैं अपने आप को छोड़ दूँगा, पर तुम्हें नहीं।"
दमयन्त्युवाच
श्लोक 33 (3.58.33)
यदि मां त्वं महाराज न विहातुमिहेच्छसि । तत्किमर्थं विदर्भाणां पन्थाः समुपदिश्यते ॥
yadi māṃ tvaṃ mahārāja na vihātumihecchasi | tatkimarthaṃ vidarbhāṇāṃ panthāḥ samupadiśyate
"महाराज, यदि आप मुझे यहाँ छोड़ना नहीं चाहते, तो फिर मुझे विदर्भ का मार्ग क्यों बताया जा रहा है?
श्लोक 34 (3.58.34)
अवैमि चाहं नृपते न तु मां त्यक्तुमर्हसि । चेतसा त्वपकृष्टेन मां त्यजेथा महीपते ॥
avaimi cāhaṃ nṛpate na tu māṃ tyaktumarhasi | cetasā tvapakṛṣṭena māṃ tyajethā mahīpate
राजन्, मैं जानती हूँ कि आप मुझे नहीं छोड़ेंगे; परंतु हे महीपते, चित्त के भटक जाने पर आप मुझे छोड़ भी सकते हैं।
श्लोक 35 (3.58.35)
पन्थानं हि ममाभीक्ष्णमाख्यासि च नरोत्तम । अतो निमित्तं शोकं मे वर्धयस्यमरोपम ॥
panthānaṃ hi mamābhīkṣṇamākhyāsi ca narottama | ato nimittaṃ śokaṃ me vardhayasyamaropama
हे नरश्रेष्ठ, आप बार-बार मुझे मार्ग बताते हैं; हे देवतुल्य, इसी कारण आप मेरा शोक बढ़ा रहे हैं।
श्लोक 36 (3.58.36)
यदि चायमभिप्रायस्तव राजन्भविष्यति । सहितावेव गच्छावो विदर्भान्यदि मन्यसे ॥
yadi cāyamabhiprāyastava rājanbhaviṣyati | sahitāveva gacchāvo vidarbhānyadi manyase
राजन्, यदि आपका यही अभिप्राय है, तो आप उचित समझें तो हम दोनों साथ-साथ ही विदर्भ चलें।
श्लोक 37 (3.58.37)
विदर्भराजस्तत्र त्वां पूजयिष्यति मानद । तेन त्वं पूजितो राजन्सुखं वत्स्यसि नो गृहे ॥
vidarbharājastatra tvāṃ pūjayiṣyati mānada | tena tvaṃ pūjito rājansukhaṃ vatsyasi no gṛhe
हे मानद, वहाँ विदर्भराज आपका सम्मान करेंगे; राजन्, उनसे सम्मानित होकर आप हमारे घर में सुखपूर्वक रहेंगे।"