आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 59
सोती हुई दमयन्ती को छोड़कर नल का चले जाना
विपत्ति की दशा में नल विदर्भ जाने से मना कर देते हैं। एक ही वस्त्र में लिपटे दोनों एक विश्रामशाला में पहुँचकर भूमि पर सो जाते हैं। जागते हुए नल कलि के प्रभाव में यह मान बैठते हैं कि उनके बिना दमयन्ती अधिक सुखी रहेगी; वे एक तलवार पाकर वस्त्र को आधा काट लेते हैं और अनिर्णय की पीड़ा में बार-बार जाकर लौटने के बाद अंततः उसे वन में सोती हुई छोड़कर चले जाते हैं।
बृहदश्व उवाच
श्लोक 1 (3.59.1)
इत्युक्तः स तदा देव्या नलो वचनमब्रवीत् ॥
ityuktaḥ sa tadā devyā nalo vacanamabravīt
देवी के ऐसा कहने पर नल ने यह वचन कहा —
नल उवाच
श्लोक 2 (3.59.2)
यथा राज्यं तव पितुस्तथा मम न संशयः । न तु तत्र गमिष्यामि विषमस्थः कथंचन ॥
yathā rājyaṃ tava pitustathā mama na saṃśayaḥ | na tu tatra gamiṣyāmi viṣamasthaḥ kathaṃcana
"निःसंदेह, तुम्हारे पिता का राज्य जैसे उनका है, वैसे ही मेरा भी है। परंतु इस विपत्ति की दशा में मैं वहाँ किसी प्रकार नहीं जाऊँगा।
श्लोक 3 (3.59.3)
कथं समृद्धो गत्वाऽहं तव हर्षविवर्धनः । परिद्यूनो गमिष्यामि तव शोकविवर्धनः ॥
kathaṃ samṛddho gatvā'haṃ tava harṣavivardhanaḥ | paridyūno gamiṣyāmi tava śokavivardhanaḥ
एक समय मैं समृद्ध होकर तुम्हारा हर्ष बढ़ाता हुआ वहाँ गया था; अब सब कुछ हारकर तुम्हारा शोक बढ़ाने के लिए मैं वहाँ कैसे जाऊँ?"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 4 (3.59.4)
इति ब्रुवन्नलो राजा दमयन्तीं पुनः पुनः । सान्त्वयामास कल्याणीं वाससोर्धेन संवृताम् ॥
iti bruvannalo rājā damayantīṃ punaḥ punaḥ | sāntvayāmāsa kalyāṇīṃ vāsasordhena saṃvṛtām
इस प्रकार बार-बार कहते हुए राजा नल ने आधे वस्त्र से ढकी कल्याणी दमयन्ती को सान्त्वना दी।
श्लोक 5 (3.59.5)
तावेकवस्त्रसंवीतावटमानावितस्ततः । क्षुत्पिपासापरिश्रान्तौ सभां कांचिदुपेयतुः ॥
tāvekavastrasaṃvītāvaṭamānāvitastataḥ | kṣutpipāsāpariśrāntau sabhāṃ kāṃcidupeyatuḥ
एक ही वस्त्र में लिपटे, इधर-उधर भटकते, भूख-प्यास से थके हुए वे दोनों एक विश्रामशाला में पहुँचे।
श्लोक 6 (3.59.6)
तां सभामुपसंप्राप्य तदा स निषधाधिपः । वैदर्भ्या सहितो राजा निषसाद महीतले ॥
tāṃ sabhāmupasaṃprāpya tadā sa niṣadhādhipaḥ | vaidarbhyā sahito rājā niṣasāda mahītale
उस विश्रामशाला में पहुँचकर निषधराज वैदर्भी के साथ भूमि पर ही बैठ गए।
श्लोक 7 (3.59.7)
स वै विवस्त्रो मलिनो विवर्णः पांसुगुण्ठितः । दमयन्त्या सह श्रान्तः सुष्वाप धरणीतले ॥
sa vai vivastro malino vivarṇaḥ pāṃsuguṇṭhitaḥ | damayantyā saha śrāntaḥ suṣvāpa dharaṇītale
वस्त्रहीन, मलिन, कान्तिहीन और धूल से सने हुए वे थककर दमयन्ती के साथ धरती पर सो गए।
श्लोक 8 (3.59.8)
ततः स्ववसनस्यान्तं दमयन्ती विशांपते । भूमावास्तीर्य सुष्वाप पतिमालिङ्ग्य शोभना ॥
tataḥ svavasanasyāntaṃ damayantī viśāṃpate | bhūmāvāstīrya suṣvāpa patimāliṅgya śobhanā
हे प्रजानाथ, तब सुन्दरी दमयन्ती अपने वस्त्र का छोर भूमि पर बिछाकर पति का आलिंगन करके सो गई।
श्लोक 9 (3.59.9)
दमयन्त्यपि कल्याणी निद्रयाऽपहृता ततः । सहसा दुःखमासाद्य सुकुमारी तपस्विनी ॥
damayantyapi kalyāṇī nidrayā'pahṛtā tataḥ | sahasā duḥkhamāsādya sukumārī tapasvinī
सहसा दुःख में पड़ी हुई वह सुकुमारी, दीन और कल्याणी दमयन्ती भी तब नींद के वश में हो गई।
श्लोक 10 (3.59.10)
सुप्तायां दमयन्त्यां तु नलो राजा विशांपते । शोकोन्मथितचित्तः सन्न स्म शेते यथा पुरा ॥
suptāyāṃ damayantyāṃ tu nalo rājā viśāṃpate | śokonmathitacittaḥ sanna sma śete yathā purā
हे प्रजानाथ, दमयन्ती के सो जाने पर शोक से मथे हुए चित्त वाले राजा नल पहले की भाँति सो न सके।
श्लोक 11 (3.59.11)
स तद्राज्यापहरणं सुहृत्त्यागं च सर्वशः । वने च तं परिध्वंसं प्रेक्ष्य चिन्तामुपेयिवान् ॥
sa tadrājyāpaharaṇaṃ suhṛttyāgaṃ ca sarvaśaḥ | vane ca taṃ paridhvaṃsaṃ prekṣya cintāmupeyivān
राज्य का छिन जाना, सब सुहृदों का छूट जाना और वन में अपनी यह दुर्दशा देखकर वे चिन्ता में पड़ गए —
नल उवाच
श्लोक 12 (3.59.12)
किं नु मे स्यादिदं कृत्वा किंनु मे स्यादकुर्वतः । किंनु मे मरणं श्रेयः परित्यागो जनस्य वा ॥
kiṃ nu me syādidaṃ kṛtvā kiṃnu me syādakurvataḥ | kiṃnu me maraṇaṃ śreyaḥ parityāgo janasya vā
"यह करने से मेरा क्या होगा, और न करने से क्या होगा? क्या मेरे लिए मर जाना श्रेष्ठ है, या अपनी पत्नी को छोड़ देना?
श्लोक 13 (3.59.13)
मामियं ह्यनुरक्तैवं दुःखमाप्नोति मत्कृते । मद्विहीना त्वियं गच्छेत्कदाचित्स्वजनं प्रति ॥
māmiyaṃ hyanuraktaivaṃ duḥkhamāpnoti matkṛte | madvihīnā tviyaṃ gacchetkadācitsvajanaṃ prati
यह मुझसे इतना प्रेम करती है कि मेरे कारण दुःख पा रही है; मुझसे अलग होकर शायद यह कभी अपने स्वजनों के पास चली जाए।
श्लोक 14 (3.59.14)
मया निःसंशयं दुःखमियं प्राप्स्यत्यनुव्रता । उत्सर्गे संशयः स्यात्तु विन्देतापि सुखं क्वचित् ॥
mayā niḥsaṃśayaṃ duḥkhamiyaṃ prāpsyatyanuvratā | utsarge saṃśayaḥ syāttu vindetāpi sukhaṃ kvacit
मेरे साथ रहकर यह अनुव्रता निःसंदेह दुःख ही पाएगी; छोड़ देने पर संभव है कि इसे कहीं सुख मिल जाए।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 15 (3.59.15)
स विनिश्चित्य बहुधा विचार्य च पुनःपुनः । उत्सर्गेऽमन्यत श्रेयो दमयन्त्या नराधिप ॥
sa viniścitya bahudhā vicārya ca punaḥpunaḥ | utsarge'manyata śreyo damayantyā narādhipa
हे नरेश, अनेक प्रकार से निश्चय करके और बार-बार विचार करके उन्होंने दमयन्ती को छोड़ देना ही श्रेयस्कर माना।
नल उवाच
श्लोक 16 (3.59.16)
न चैषा तेजसा शक्या कैश्चिद्धर्षयितुं पथि । यशस्विनी महाभागा मद्भक्तेयं पतिव्रता ॥
na caiṣā tejasā śakyā kaiściddharṣayituṃ pathi | yaśasvinī mahābhāgā madbhakteyaṃ pativratā
"मार्ग में कोई भी इसका तिरस्कार नहीं कर सकेगा, क्योंकि इसका तेज इसकी रक्षा करेगा; यह यशस्विनी, महाभागा, मेरी भक्त और पतिव्रता है।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 17 (3.59.17)
एवं तस्य तदा बुद्धिर्दमयन्त्यां न्यवर्तत । कलिना दुष्टभावेन दमयन्त्या विसर्जने ॥
evaṃ tasya tadā buddhirdamayantyāṃ nyavartata | kalinā duṣṭabhāvena damayantyā visarjane
इस प्रकार दुष्टभाव वाले कलि के कारण दमयन्ती के विषय में उनकी बुद्धि उसे त्याग देने की ओर मुड़ गई।
श्लोक 18 (3.59.18)
सोऽवस्त्रतामात्मनश्च तस्याश्चाप्येकवस्त्रताम् । चिन्तयित्वाऽध्यगाद्राजा वस्त्रार्धस्यावकर्तनम् ॥
so'vastratāmātmanaśca tasyāścāpyekavastratām | cintayitvā'dhyagādrājā vastrārdhasyāvakartanam
अपनी वस्त्रहीनता और उसके एक ही वस्त्र का विचार करके राजा ने उस वस्त्र का आधा भाग काट लेने का निश्चय किया।
श्लोक 19 (3.59.19)
कथं वासो विकर्तेयं न च बुद्ध्येत मे प्रिया । विचिन्त्यैवं नलो राजा सभां पर्यचरत्तदा ॥
kathaṃ vāso vikarteyaṃ na ca buddhyeta me priyā | vicintyaivaṃ nalo rājā sabhāṃ paryacarattadā
"मैं यह वस्त्र कैसे काटूँ कि मेरी प्रिया जाग न जाए?" — ऐसा सोचकर राजा नल उस विश्रामशाला में इधर-उधर घूमने लगे।
श्लोक 20 (3.59.20)
परिधावन्नथ नल इतश्चेतश्च भारत । आससाद सभोद्देशे विकोशं खड्गमुत्तमम् ॥
paridhāvannatha nala itaścetaśca bhārata | āsasāda sabhoddeśe vikośaṃ khaḍgamuttamam
हे भारत, इधर-उधर दौड़ते हुए नल को विश्रामशाला के एक भाग में म्यान से बाहर पड़ी एक उत्तम तलवार मिल गई।
श्लोक 21 (3.59.21)
तेनार्धं वाससश्छित्त्वा निवस्य च परंतपः । सुप्तामुत्सृज्य वैदर्भीं प्राद्रवद्गतचेतनाम् ॥
tenārdhaṃ vāsasaśchittvā nivasya ca paraṃtapaḥ | suptāmutsṛjya vaidarbhīṃ prādravadgatacetanām
उस शत्रुतापन ने उससे आधा वस्त्र काटकर पहन लिया और बेसुध सोई हुई वैदर्भी को छोड़कर भाग चले।
श्लोक 22 (3.59.22)
ततो निबद्धहृदयः पुनरागम्य तां सभाम् । दमयन्तीं तदा दृष्ट्वा रुरोद निषधाधिपः ॥
tato nibaddhahṛdayaḥ punarāgamya tāṃ sabhām | damayantīṃ tadā dṛṣṭvā ruroda niṣadhādhipaḥ
फिर हृदय के बँधे होने से वे लौटकर उसी विश्रामशाला में आए, और वहाँ दमयन्ती को देखकर निषधराज रो पड़े।
नल उवाच
श्लोक 23 (3.59.23)
यां न वायुर्न चादित्यः पुरा पश्यति मे प्रियाम् । सेयमद्य सभामध्ये शेते भूमावनाथवत् ॥
yāṃ na vāyurna cādityaḥ purā paśyati me priyām | seyamadya sabhāmadhye śete bhūmāvanāthavat
"मेरी जिस प्रिया को पहले वायु और सूर्य ने भी कभी नहीं देखा था, वही आज इस विश्रामशाला के बीच अनाथ की भाँति भूमि पर सो रही है।
श्लोक 24 (3.59.24)
इयं वस्त्रावकर्तेन संवीता चारुहासिनी । उन्मत्तेव मया हीना कथं बुद्ध्वा भविष्यति ॥
iyaṃ vastrāvakartena saṃvītā cāruhāsinī | unmatteva mayā hīnā kathaṃ buddhvā bhaviṣyati
कटे हुए वस्त्र में लिपटी यह मधुर मुस्कान वाली, मेरे बिना जागने पर पगली-सी होकर किस दशा को पहुँचेगी?
श्लोक 25 (3.59.25)
कथमेका सती भैमी मया विरहिता शुभा । चरिष्यति वने घोरे मृगव्यालनिषेविते ॥
kathamekā satī bhaimī mayā virahitā śubhā | cariṣyati vane ghore mṛgavyālaniṣevite
मुझसे बिछुड़कर यह शुभ और सती भैमी अकेली इस हिंसक पशुओं और सर्पों से भरे भयानक वन में कैसे भटकेगी?
श्लोक 26 (3.59.26)
आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ समरुद्गणौ । रक्षन्तु त्वां महाभागे धर्मेणासि समावृता ॥
ādityā vasavo rudrā aśvinau samarudgaṇau | rakṣantu tvāṃ mahābhāge dharmeṇāsi samāvṛtā
हे महाभागे, आदित्य, वसु, रुद्र, दोनों अश्विनीकुमार और मरुद्गण तुम्हारी रक्षा करें; तुम धर्म से सुरक्षित हो।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 27 (3.59.27)
एवमुक्त्वा प्रियां भार्यां रूपेणाप्रतिमां भुवि । कलिनाऽपहृतज्ञानो नलः प्रातिष्ठदुद्यतः ॥
evamuktvā priyāṃ bhāryāṃ rūpeṇāpratimāṃ bhuvi | kalinā'pahṛtajñāno nalaḥ prātiṣṭhadudyataḥ
पृथ्वी पर रूप में अनुपम अपनी प्रिय पत्नी से ऐसा कहकर, कलि द्वारा बुद्धि हर लिए जाने पर नल उठकर चल पड़े।
श्लोक 28 (3.59.28)
गत्वागत्वा नलो राजा पुनरेति सभां मुहुः । आकृष्यमाणः कलिना सौहृदेनावकृष्यते ॥
gatvāgatvā nalo rājā punareti sabhāṃ muhuḥ | ākṛṣyamāṇaḥ kalinā sauhṛdenāvakṛṣyate
राजा नल बार-बार जाते और फिर लौटकर उस विश्रामशाला में आ जाते; कलि उन्हें खींचकर ले जाता और प्रेम उन्हें वापस खींच लाता।
श्लोक 29 (3.59.29)
द्विधेव हृदयं तस्य दुःखितस्याभवत्तदा । दोलेव मुहुरायाति याति चैव मुहुर्मुहुः ॥
dvidheva hṛdayaṃ tasya duḥkhitasyābhavattadā | doleva muhurāyāti yāti caiva muhurmuhuḥ
उस दुःखी राजा का हृदय मानो दो भागों में बँट गया; झूले की भाँति वह बार-बार आता और बार-बार जाता।
श्लोक 30 (3.59.30)
अवकृष्टस्तु कलिना मोहितः प्राद्रवन्नलः । सुप्तामुत्सृज्य तां भार्यां विलप्य करुणं बहु ॥
avakṛṣṭastu kalinā mohitaḥ prādravannalaḥ | suptāmutsṛjya tāṃ bhāryāṃ vilapya karuṇaṃ bahu
अंततः कलि द्वारा खींचे गए और मोहग्रस्त नल बहुत करुण विलाप करके अपनी सोती हुई पत्नी को छोड़कर भाग गए।
श्लोक 31 (3.59.31)
नष्टात्मा कलिनाऽऽविष्टस्तत्तद्विगणयन्मुहुः । जगामैकां वने शून्ये भार्यामुत्सृज्य मोहितः ॥
naṣṭātmā kalinā''viṣṭastattadvigaṇayanmuhuḥ | jagāmaikāṃ vane śūnye bhāryāmutsṛjya mohitaḥ
आत्मबोध खो चुके, कलि से आविष्ट, बार-बार उन बातों को सोचते हुए मोहग्रस्त नल अपनी पत्नी को उस सूने वन में अकेली छोड़कर चले गए।