आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 60
दमयन्ती, अजगर और व्याध
बृहदश्व नल की कथा आगे सुनाते हैं। दमयन्ती वन में अकेली जागती है और विलाप करती हुई नल को पागलों की तरह खोजती है; वह उस प्राणी को शाप देती है जिसके शाप से नल की यह दुर्दशा हुई। एक विशाल अजगर उसे जकड़ लेता है, फिर भी उसे अपने से अधिक नल की चिन्ता रहती है। एक व्याध अजगर को मारकर उसे छुड़ाता है, पर जब वह उसे काम-भाव से फुसलाने लगता है, तो दमयन्ती के शाप से वह आग से जले वृक्ष की भाँति मरकर गिर पड़ता है।
बृहदश्व उवाच
श्लोक 1 (3.60.1)
अपक्रान्ते नले राजन्दमयन्ती गतक्लमा । अबुध्यत वरारोहा संत्रस्ता विजने वने ॥
apakrānte nale rājandamayantī gataklamā | abudhyata varārohā saṃtrastā vijane vane
हे राजन्! नल के चले जाने के बाद दमयन्ती की थकान मिटी और वह सुन्दरी जागी। निर्जन वन में अपने को अकेला पाकर वह भयभीत हो उठी।
श्लोक 2 (3.60.2)
अपश्यमाना भर्तारं शोकदुःखसमन्विता । प्राक्रोशदुच्चैः संत्रस्ता महाराजेति नैषधम् ॥
apaśyamānā bhartāraṃ śokaduḥkhasamanvitā | prākrośaduccaiḥ saṃtrastā mahārājeti naiṣadham
पति को न देखकर वह शोक और दुःख से भर गई और भयभीत होकर 'हे महाराज!' कहती हुई निषधराज को ऊँचे स्वर में पुकारने लगी।
दमयन्त्युवाच
श्लोक 3 (3.60.3)
हा नाथ हा महाराज हा स्वामिन्किं जहासि माम् । हा हताऽस्मि विनष्टाऽस्मि भीताऽस्मि विजने वने ॥
hā nātha hā mahārāja hā svāminkiṃ jahāsi mām | hā hatā'smi vinaṣṭā'smi bhītā'smi vijane vane
"हा नाथ! हा महाराज! हा स्वामी! आप मुझे क्यों छोड़ रहे हैं? हाय, मैं मारी गई, मैं नष्ट हो गई; इस सूने वन में मुझे बड़ा भय लग रहा है।
श्लोक 4 (3.60.4)
ननु नाम महाराज धर्मज्ञः सत्यवागसि । कथंविधस्त्वं हि तथा सुप्तामुत्सृज्य मां गतः ॥
nanu nāma mahārāja dharmajñaḥ satyavāgasi | kathaṃvidhastvaṃ hi tathā suptāmutsṛjya māṃ gataḥ
महाराज, आप तो धर्म को जानने वाले और सत्य बोलने वाले हैं। फिर ऐसे होकर भी आप मुझ सोती हुई को इस तरह छोड़कर कैसे चले गए?
श्लोक 5 (3.60.5)
कथमुत्सृज्यगन्ताऽसि वश्यां भार्यामनुव्रताम् । विशेषतो नापकृतः परेणापकृतो ह्यसि ॥
kathamutsṛjyagantā'si vaśyāṃ bhāryāmanuvratām | viśeṣato nāpakṛtaḥ pareṇāpakṛto hyasi
अपनी आज्ञाकारिणी, अनुरक्त पत्नी को छोड़कर आप कैसे जा सकते हैं, विशेषकर तब, जब मैंने आपका कोई अपकार नहीं किया? आपका अपकार तो किसी दूसरे ने किया है।
श्लोक 6 (3.60.6)
शक्यसे न गिरः सत्याः कर्तुं मयि नरेश्वर । यास्त्वया लोकपालानां सन्निधौ कथिताः पुरा ॥
śakyase na giraḥ satyāḥ kartuṃ mayi nareśvara | yāstvayā lokapālānāṃ sannidhau kathitāḥ purā
हे नरेश्वर, लोकपालों के सामने आपने पहले जो वचन कहे थे, क्या आप उन्हें मेरे प्रति सत्य नहीं कर सकते?
श्लोक 7 (3.60.7)
नाकाले विहितो मृत्युर्मर्त्यानां पुरुषर्षभ । यत्र कान्ता त्वयोत्सृष्टा मुहूर्तमपि जीवति ॥
nākāle vihito mṛtyurmartyānāṃ puruṣarṣabha | yatra kāntā tvayotsṛṣṭā muhūrtamapi jīvati
हे पुरुषश्रेष्ठ, मनुष्यों की मृत्यु नियत समय से पहले नहीं आती; तभी तो आपके द्वारा त्यागी गई आपकी प्रिया एक क्षण भी जीवित है।
श्लोक 8 (3.60.8)
पर्याप्तः परिहासोऽयमेतावान्पुरुषर्षभ । भृशं भीतास्मि दुर्धर्ष दर्शयात्मानमीश्वर ॥
paryāptaḥ parihāso'yametāvānpuruṣarṣabha | bhṛśaṃ bhītāsmi durdharṣa darśayātmānamīśvara
हे पुरुषश्रेष्ठ, यह हँसी-ठिठोली बहुत हो चुकी। हे दुर्धर्ष, मैं बहुत डर गई हूँ। हे स्वामी, मुझे दर्शन दीजिए।
श्लोक 9 (3.60.9)
दृश्यसे दृश्यसे राजन्नेष तिष्ठसि नैषध । आवार्य गुल्मैरात्मानं किं मां न प्रतिभाषसे ॥
dṛśyase dṛśyase rājanneṣa tiṣṭhasi naiṣadha | āvārya gulmairātmānaṃ kiṃ māṃ na pratibhāṣase
मैं आपको देख रही हूँ, देख रही हूँ, राजन्! निषधराज, आप वहाँ खड़े हैं। झाड़ियों की ओट में अपने को छिपाकर आप मुझे उत्तर क्यों नहीं देते?
श्लोक 10 (3.60.10)
नृशंसं वत राजेन्द्र यन्मामेवंगतामिह । विलपन्तीं समालिङ्ग्य नाश्वासयसि पार्थिव ॥
nṛśaṃsaṃ vata rājendra yanmāmevaṃgatāmiha | vilapantīṃ samāliṅgya nāśvāsayasi pārthiva
हाय राजेन्द्र, यह कितनी निष्ठुरता है कि इस दशा में यहाँ विलाप करती हुई मुझे आप गले लगाकर ढाढ़स नहीं बँधाते, हे पृथ्वीपति!
श्लोक 11 (3.60.11)
न शोचाम्यहमात्मानं न चान्यदपि किंचन । कथं नु भवितास्येक इति त्वां नृप शोचये ॥
na śocāmyahamātmānaṃ na cānyadapi kiṃcana | kathaṃ nu bhavitāsyeka iti tvāṃ nṛpa śocaye
मैं न अपने लिए शोक करती हूँ, न किसी और बात के लिए। हे नृप, मुझे तो आपकी चिन्ता है कि आप अकेले कैसे रहेंगे।
श्लोक 12 (3.60.12)
कथं नु राजंस्तृषितः क्षुधितः श्रमकर्शितः । सायाह्ने वृक्षमूलेषु मामपश्यन्भविष्यसि ॥
kathaṃ nu rājaṃstṛṣitaḥ kṣudhitaḥ śramakarśitaḥ | sāyāhne vṛkṣamūleṣu māmapaśyanbhaviṣyasi
हे राजन्, प्यासे, भूखे और थकान से चूर होकर, साँझ के समय वृक्षों की जड़ के पास मुझे न पाकर आपकी क्या दशा होगी?"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 13 (3.60.13)
ततः सा तीव्रशोकार्ता प्रदीप्तेव च मन्युना । इतश्चेतश्च रुदती पर्यधावत दुःखिता ॥
tataḥ sā tīvraśokārtā pradīpteva ca manyunā | itaścetaśca rudatī paryadhāvata duḥkhitā
तब तीव्र शोक से पीड़ित और मानो दुःख की आग में जलती हुई वह रोती-बिलखती इधर-उधर दौड़ने लगी।
श्लोक 14 (3.60.14)
मुहुरुत्पतते बाला मुहुः पतति विह्वला । मुहुरालीयते भीता मुहुः क्रोशति रोदिति ॥
muhurutpatate bālā muhuḥ patati vihvalā | muhurālīyate bhītā muhuḥ krośati roditi
वह बाला बार-बार उछल पड़ती, बार-बार व्याकुल होकर गिर पड़ती, बार-बार डरकर दुबक जाती और बार-बार चिल्लाती और रोती थी।
श्लोक 15 (3.60.15)
अतीव शोकसंतप्ता मुहुर्निःश्वस्य विह्वला । उवाच भैमी निःश्वस्य रोदमाना पतिव्रता ॥
atīva śokasaṃtaptā muhurniḥśvasya vihvalā | uvāca bhaimī niḥśvasya rodamānā pativratā
अत्यन्त शोक से सन्तप्त, व्याकुल होकर बार-बार उसाँसें भरती हुई पतिव्रता भैमी रोते-रोते लम्बी साँस लेकर बोली:
दमयन्त्युवाच
श्लोक 16 (3.60.16)
यस्याभिशापाद्दुःखार्तो नैष नन्दति नैषधः । तस्य भूतस्य तद्दुःखाद्दुःखमभ्यधिकं भवेत् ॥
yasyābhiśāpādduḥkhārto naiṣa nandati naiṣadhaḥ | tasya bhūtasya tadduḥkhādduḥkhamabhyadhikaṃ bhavet
"जिस प्राणी के शाप से ये निषधराज दुःख से पीड़ित होकर आनन्द खो बैठे हैं, उसे उनके दुःख से भी बढ़कर दुःख मिले।
श्लोक 17 (3.60.17)
अपापचेतसं पापो य एवं कृतवान्नलम् । तस्माद्दुःखतरं प्राप्य जीवत्वसुखजीविकाम् ॥
apāpacetasaṃ pāpo ya evaṃ kṛtavānnalam | tasmādduḥkhataraṃ prāpya jīvatvasukhajīvikām
जिस पापी ने निष्पाप हृदय वाले नल की यह दशा की है, वह उससे भी अधिक दुःख पाकर सुखहीन जीवन जिए।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 18 (3.60.18)
एवं तु विलपन्ती सा राज्ञो भार्या महात्मनः । अन्वेषति स्म भर्तारं वने श्वापदसेविते ॥
evaṃ tu vilapantī sā rājño bhāryā mahātmanaḥ | anveṣati sma bhartāraṃ vane śvāpadasevite
इस प्रकार विलाप करती हुई महात्मा राजा की वह पत्नी हिंसक पशुओं से भरे वन में अपने पति को खोजती फिरी।
श्लोक 19 (3.60.19)
उन्मत्तवद्भीमसुता विलपन्ती ततस्ततः । हाहा राजन्निति मुहुरितश्चेतश्च धावति ॥
unmattavadbhīmasutā vilapantī tatastataḥ | hāhā rājanniti muhuritaścetaśca dhāvati
पगली की भाँति भीम की पुत्री विलाप करती हुई जहाँ-तहाँ भटकती रही और 'हा राजन्! हा राजन्!' पुकारती हुई बार-बार इधर-उधर दौड़ती रही।
श्लोक 20 (3.60.20)
तां शुष्यमाणामत्यर्थं कुररीमिव वाशतीम् । करुणं बहुशोचन्तीं विलपन्तीं सुमध्यमाम् ॥
tāṃ śuṣyamāṇāmatyarthaṃ kurarīmiva vāśatīm | karuṇaṃ bahuśocantīṃ vilapantīṃ sumadhyamām
वह अत्यन्त शोक से सूखती जा रही थी, कुररी पक्षी की भाँति चीत्कार कर रही थी और करुण स्वर में बहुत शोक कर रही थी। इस प्रकार वह पतली कमर वाली सुन्दरी विलाप करती जा रही थी।
श्लोक 21 (3.60.21)
सहसाऽभ्यागतां भैमीमभ्याशपरिवर्तिनीम् । जग्राहाजगरो ग्राहो महाकायः क्षुधान्वितः ॥
sahasā'bhyāgatāṃ bhaimīmabhyāśaparivartinīm | jagrāhājagaro grāho mahākāyaḥ kṣudhānvitaḥ
अचानक जब भैमी पास ही पड़े एक विशालकाय, भूखे अजगर के निकट जा पहुँची, तो उस अजगर ने उसे जकड़ लिया।
श्लोक 22 (3.60.22)
सा ग्रस्यमाना ग्रहेण शोकेन च पराजिता । नात्मानं शोचति तथा यथा शोचति नैषधम् ॥
sā grasyamānā graheṇa śokena ca parājitā | nātmānaṃ śocati tathā yathā śocati naiṣadham
अजगर के निगले जाते हुए और शोक से हारी हुई भी वह अपने लिए उतना शोक नहीं कर रही थी, जितना निषधराज के लिए।
दमयन्त्युवाच
श्लोक 23 (3.60.23)
हा नाथ मामिह वने ग्रस्यमानामनागसम् । ग्राहेणानेन विजने किमर्थं नानुधावसि ॥
hā nātha māmiha vane grasyamānāmanāgasam | grāheṇānena vijane kimarthaṃ nānudhāvasi
"हा नाथ! इस वन में, इस निर्जन स्थान पर, यह अजगर मुझ निरपराध को निगल रहा है; आप दौड़कर मेरे पास क्यों नहीं आते?
श्लोक 24 (3.60.24)
कथं भविष्यसि पुनर्मामनुस्मृत्य नैषध । कथं भवाञ्जगामाद्य मामुत्सृज्य वने प्रभो । पापान्मुक्तः पुनर्लब्ध्वा बुद्धिं चेतो धनानि च ॥
kathaṃ bhaviṣyasi punarmāmanusmṛtya naiṣadha | kathaṃ bhavāñjagāmādya māmutsṛjya vane prabho | pāpānmuktaḥ punarlabdhvā buddhiṃ ceto dhanāni ca
हे निषधराज, आगे चलकर मुझे याद करके आपकी क्या दशा होगी? हे प्रभु, आज आप मुझे वन में छोड़कर कैसे चले गए? जब आप पाप से मुक्त होकर फिर से बुद्धि, चित्त और धन पा लेंगे, तब आपका क्या होगा?
श्लोक 25 (3.60.25)
श्रान्तस्य ते क्षुधार्तस्य परिग्लानस्य नैषध । कः श्रमं राजशार्दूल नाशयिष्यति तेऽनघ ॥
śrāntasya te kṣudhārtasya pariglānasya naiṣadha | kaḥ śramaṃ rājaśārdūla nāśayiṣyati te'nagha
हे निषधराज, जब आप थके-माँदे, भूख से व्याकुल और शिथिल होंगे, तब हे राजसिंह, हे निष्पाप, आपकी थकान कौन मिटाएगा?"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 26 (3.60.26)
तामकस्मान्मृगव्याधो विचरन्गहने वने । आक्रन्दमानां संश्रुत्य जवेनाभिससार ह ॥
tāmakasmānmṛgavyādho vicarangahane vane | ākrandamānāṃ saṃśrutya javenābhisasāra ha
संयोग से घने वन में घूमता हुआ एक व्याध उसका आर्तनाद सुनकर तेज़ी से उसकी ओर दौड़ा।
श्लोक 27 (3.60.27)
तां तु दृष्ट्वा तथा ग्रस्तामुरगेणायतेक्षणाम् । त्वरमाणो मृगव्याधः संचरन्गहने वने । समभिक्रम्य वेगेन सत्वरः स वनेचरः ॥
tāṃ tu dṛṣṭvā tathā grastāmurageṇāyatekṣaṇām | tvaramāṇo mṛgavyādhaḥ saṃcarangahane vane | samabhikramya vegena satvaraḥ sa vanecaraḥ
विशाल नेत्रों वाली उस स्त्री को इस प्रकार सर्प से ग्रस्त देखकर घने वन में विचरने वाला वह व्याध, वह वनवासी, बड़ी तेज़ी से झपटकर उसके पास पहुँचा।
श्लोक 28 (3.60.28)
मुखे तं पाटयामास शस्त्रेण निशितेन च । निर्विचेष्टं भुजङ्गं तं विशस्य मृगजीवनः ॥
mukhe taṃ pāṭayāmāsa śastreṇa niśitena ca | nirviceṣṭaṃ bhujaṅgaṃ taṃ viśasya mṛgajīvanaḥ
उस व्याध ने तीखे शस्त्र से अजगर का मुँह चीर डाला और उसे काटकर निश्चेष्ट कर दिया।
श्लोक 29 (3.60.29)
मोक्षयित्वा स तां व्याधः प्रक्षाल्य सलिलेन ह । समाश्वास्य कृताहारामथ पप्रच्छ भारत ॥
mokṣayitvā sa tāṃ vyādhaḥ prakṣālya salilena ha | samāśvāsya kṛtāhārāmatha papraccha bhārata
हे भारत, उसे छुड़ाकर व्याध ने जल से उसे धोया, ढाढ़स बँधाया और भोजन कराया; फिर उससे पूछा।
व्याध उवाच
श्लोक 30 (3.60.30)
कस्य त्वं मृगशावाक्षि कथं चास्यागता वनम् । कथं चेदं महत्कृच्छ्रं प्राप्तवत्यसि भामिनि ॥
kasya tvaṃ mṛgaśāvākṣi kathaṃ cāsyāgatā vanam | kathaṃ cedaṃ mahatkṛcchraṃ prāptavatyasi bhāmini
"हे मृगछौने जैसी आँखों वाली, तुम किसकी पत्नी हो? इस वन में कैसे आई हो? और हे भामिनी, इस घोर संकट में कैसे पड़ गई?"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 31 (3.60.31)
दमयन्ती तथा तेन पृच्छ्यमाना विशांपते । सर्वमेतद्यथावृत्तमाचचक्षेऽस्य भारत ॥
damayantī tathā tena pṛcchyamānā viśāṃpate | sarvametadyathāvṛttamācacakṣe'sya bhārata
हे प्रजापालक, उसके इस प्रकार पूछने पर दमयन्ती ने, हे भारत, जो कुछ जैसा घटा था, सब उसे बता दिया।
श्लोक 32 (3.60.32)
तामर्धवस्त्रसंवीतां पीनश्रोणिपयोधराम् । सुकुमारानवद्याङ्गीं पूर्णचन्द्रनिभाननाम् ॥
tāmardhavastrasaṃvītāṃ pīnaśroṇipayodharām | sukumārānavadyāṅgīṃ pūrṇacandranibhānanām
वह आधे वस्त्र से ढकी थी; उसके नितम्ब और स्तन पुष्ट थे, अंग कोमल और निर्दोष थे, और मुख पूर्ण चन्द्रमा के समान था।
श्लोक 33 (3.60.33)
अरालपक्ष्मनयनां तथा मधुरभाषिणीम् । लक्षयित्वा मृगव्याधः कामस्य वशमीयिवान् ॥
arālapakṣmanayanāṃ tathā madhurabhāṣiṇīm | lakṣayitvā mṛgavyādhaḥ kāmasya vaśamīyivān
उसकी आँखों की पलकें घुमावदार और सुन्दर थीं, और उसकी वाणी मधुर थी। यह सब देखकर वह व्याध काम के वश में हो गया।
श्लोक 34 (3.60.34)
तामथ श्लक्ष्णया वाचा लुब्धको मृदुपूर्वया । सान्त्वयामास कामार्तस्तदबुध्यत भामिनी ॥
tāmatha ślakṣṇayā vācā lubdhako mṛdupūrvayā | sāntvayāmāsa kāmārtastadabudhyata bhāminī
तब काम से पीड़ित वह शिकारी चिकनी-चुपड़ी, कोमल बातों से उसे फुसलाने लगा; भामिनी दमयन्ती उसका आशय समझ गई।
श्लोक 35 (3.60.35)
दमयन्त्यपि तं दुष्टमुपलभ्य पतिव्रता । तीव्ररोषसमाविष्टा प्रजज्वालेव मन्युना ॥
damayantyapi taṃ duṣṭamupalabhya pativratā | tīvraroṣasamāviṣṭā prajajvāleva manyunā
पतिव्रता दमयन्ती ने भी उसकी दुष्टता भाँप ली; वह तीव्र रोष से भर गई और मानो क्रोध से जल उठी।
श्लोक 36 (3.60.36)
स तु पापमतिः क्षुद्रः प्रधर्षयितुमातुरः । दुर्धर्षां तर्कयामास दीप्तामग्निशिखामिव ॥
sa tu pāpamatiḥ kṣudraḥ pradharṣayitumāturaḥ | durdharṣāṃ tarkayāmāsa dīptāmagniśikhāmiva
किन्तु वह पापबुद्धि नीच उस पर बलपूर्वक अत्याचार करने को आतुर होकर उसी के विषय में सोचने लगा, यद्यपि वह प्रज्वलित अग्निशिखा के समान अजेय थी।
श्लोक 37 (3.60.37)
दमयन्ती तु दुःखार्ता पतिराज्यविनाकृता । अतीतवाक्पथे काले शशापैनं रुषा किल ॥
damayantī tu duḥkhārtā patirājyavinākṛtā | atītavākpathe kāle śaśāpainaṃ ruṣā kila
पति और राज्य दोनों से वंचित, दुःख से पीड़ित दमयन्ती ने, जब बात शब्दों से रोकने की सीमा पार कर गई, तब क्रोध में भरकर उसे शाप दे दिया।
दमयन्त्युवाच
श्लोक 38 (3.60.38)
यथाऽहं नैषधादन्यं मनसाऽपि न चिन्तये । तथाऽयं पततां क्षुद्रः परासुर्मृगजीवनः ॥
yathā'haṃ naiṣadhādanyaṃ manasā'pi na cintaye | tathā'yaṃ patatāṃ kṣudraḥ parāsurmṛgajīvanaḥ
"यदि मैं निषधराज के सिवा किसी अन्य पुरुष का मन से भी चिन्तन नहीं करती, तो यह नीच व्याध प्राणहीन होकर गिर पड़े।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 39 (3.60.39)
उक्तमात्रे तु वचने तया स मृगजीवनः । व्यसुः पपात मेदिन्यामग्निदग्ध इव द्रुमः ॥
uktamātre tu vacane tayā sa mṛgajīvanaḥ | vyasuḥ papāta medinyāmagnidagdha iva drumaḥ
उसके वचन कहते ही वह व्याध प्राणहीन होकर आग से जले वृक्ष की भाँति धरती पर गिर पड़ा।