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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 61

वन में दमयन्ती की खोज

व्याध के मारे जाने के बाद भयानक वन में अकेली दमयन्ती नल के लिए विलाप करती है, उन्हें उनके वचन की याद दिलाती है, और पहले एक व्याघ्र से तथा फिर एक विशाल पर्वत से पूछती है कि क्या उन्होंने नल को देखा है। वह तपस्वियों के एक आश्रम में पहुँचकर अपना परिचय देती है, और वे भविष्यवाणी करते हैं कि वह नल को फिर अपने राज्य पर शासन करते देखेगी; फिर तपस्वी और आश्रम उसकी आँखों के सामने अदृश्य हो जाते हैं। एक अशोक वृक्ष से शोक मिटाने की विनती करने के बाद वह एक व्यापारी-दल के पास पहुँचती है, जिसके लोग उसे देवी या राक्षसी समझते हैं; दल का नेता शुचि बताता है कि उसने नल को नहीं देखा और यह दल चेदिराज सुबाहु के देश जा रहा है।

अध्याय 60अध्याय-सूचीअध्याय 62

बृहदश्व उवाच

श्लोक 1 (3.61.1)

सा निहत्य मृगव्याधं प्रतस्थे कमलेक्षणा । वनं प्रतिभयं शून्यं झिल्लिकागणनादितम् ॥

sā nihatya mṛgavyādhaṃ pratasthe kamalekṣaṇā | vanaṃ pratibhayaṃ śūnyaṃ jhillikāgaṇanāditam

उस व्याध को मारकर वह कमलनयनी आगे चल पड़ी और एक भयानक, सुनसान वन में पहुँची, जो झींगुरों के झुंडों की तीखी झनकार से गूँज रहा था।

श्लोक 2 (3.61.2)

सिंहद्वीपिरुरुव्याघ्रवराहर्क्षगणैर्युतम् । नानापक्षिगणाकीर्णं म्लेच्छतस्करसेवितम् ॥

siṃhadvīpiruruvyāghravarāharkṣagaṇairyutam | nānāpakṣigaṇākīrṇaṃ mlecchataskarasevitam

वह वन सिंहों, चीतों, रुरु मृगों, बाघों, सूअरों और रीछों के झुंडों से भरा था, अनेक प्रकार के पक्षियों से व्याप्त था और म्लेच्छों तथा चोरों का अड्डा था।

श्लोक 3 (3.61.3)

सालवेणुधवाश्वत्थतिन्दुकेङ्गुदिकिंशुकैः । अर्जुनारिष्टसंछन्नं स्यन्दनैश्च सशाल्मलैः ॥

sālaveṇudhavāśvatthatindukeṅgudikiṃśukaiḥ | arjunāriṣṭasaṃchannaṃ syandanaiśca saśālmalaiḥ

वह साल, बाँस, धव, अश्वत्थ (पीपल), तिन्दुक, इङ्गुदी और किंशुक के वृक्षों से, अर्जुन और अरिष्ट से, तथा स्यन्दन और शाल्मली (सेमल) से ढका हुआ था।

श्लोक 4 (3.61.4)

जम्ब्वाम्रलोध्रखदिरशाकवेत्रसमाकुलम् । पद्मकामलकप्लक्षकदम्बोदुम्बरावृतम् ॥

jambvāmralodhrakhadiraśākavetrasamākulam | padmakāmalakaplakṣakadambodumbarāvṛtam

वह जामुन, आम, लोध्र, खदिर (खैर), शाक (सागौन) और बेंत से भरा था, और पद्मक, आँवला, प्लक्ष (पाकड़), कदम्ब तथा उदुम्बर (गूलर) से घिरा था।

श्लोक 5 (3.61.5)

बदरीबिल्वसंछन्नं न्यग्रोधैश्च समाकुलम् । प्रियालतालखर्जूरहरीतकिबिभीतकैः ॥

badarībilvasaṃchannaṃ nyagrodhaiśca samākulam | priyālatālakharjūraharītakibibhītakaiḥ

वह बेर और बेल से ढका था, बरगदों से भरा था, और प्रियाल, ताड़, खजूर, हरड़ और बहेड़ा के वृक्षों से युक्त था।

श्लोक 6 (3.61.6)

नानाधातुशतैर्नद्धान्विविधानपि चाचलान् । निकुञ्जान्पक्षिसंघुष्टान्दरीश्चाद्भुतदर्शनाः ॥

nānādhātuśatairnaddhānvividhānapi cācalān | nikuñjānpakṣisaṃghuṣṭāndarīścādbhutadarśanāḥ

उसने सैकड़ों धातुओं से जड़े अनेक प्रकार के पर्वत, पक्षियों के कलरव से गूँजते कुञ्ज और देखने में अद्भुत गुफाएँ देखीं;

श्लोक 7 (3.61.7)

नदीः सरांसि वापीश्च विविधांश्चरतो द्विजान् । सा बहून्भीमरूपांश्च पिशाचोरगराक्षसान् ॥

nadīḥ sarāṃsi vāpīśca vividhāṃścarato dvijān | sā bahūnbhīmarūpāṃśca piśācoragarākṣasān

नदियाँ, सरोवर और बावड़ियाँ, इधर-उधर विचरते नाना प्रकार के पक्षी, और भयानक रूप वाले अनेक पिशाच, सर्प तथा राक्षस भी;

श्लोक 8 (3.61.8)

पल्वलानि तटाकानि गिरिकूटानि सर्वशः । सरित्सरांसि च तदा ददर्शाद्भुतदर्शनान् ॥

palvalāni taṭākāni girikūṭāni sarvaśaḥ | saritsarāṃsi ca tadā dadarśādbhutadarśanān

चारों ओर छोटे जलाशय, तालाब और पर्वत-शिखर, तथा नदियाँ और सरोवर; ये सब अद्भुत दृश्य उसने तब देखे।

श्लोक 9 (3.61.9)

यूथशो ददृशे चात्र विदर्भाधिपनन्दिनी । महिषान्वराहान्गोमायूनृक्षवानरपन्नगान् ॥

yūthaśo dadṛśe cātra vidarbhādhipanandinī | mahiṣānvarāhāngomāyūnṛkṣavānarapannagān

वहाँ विदर्भराज की पुत्री ने झुंड के झुंड भैंसे, सूअर, गीदड़, रीछ, वानर और सर्प देखे।

श्लोक 10 (3.61.10)

तेजसा यशसा लक्ष्म्या स्थित्या च परया युता । वैदर्भी विचचारैका नलमन्वेषती तदा ॥

tejasā yaśasā lakṣmyā sthityā ca parayā yutā | vaidarbhī vicacāraikā nalamanveṣatī tadā

तेज, यश, शोभा और परम धैर्य से युक्त वह विदर्भकुमारी तब नल को खोजती हुई अकेली विचरती रही।

श्लोक 11 (3.61.11)

नाबिभ्यत्सा नृपसुता भैमी तत्राथ कस्यचित् । दारुणामटवीं प्राप्य भर्तृव्यसनकर्शिता ॥

nābibhyatsā nṛpasutā bhaimī tatrātha kasyacit | dāruṇāmaṭavīṃ prāpya bhartṛvyasanakarśitā

उस भयंकर वन में पहुँचकर भी, पति के संकट से दुर्बल हुई वह राजकुमारी भैमी वहाँ किसी से नहीं डरी।

श्लोक 12 (3.61.12)

विदर्भतनया राजन्विललाप सुदुःखिता । भर्तृशोकपरीताङ्गी शिलातलमथाश्रिता ॥

vidarbhatanayā rājanvilalāpa suduḥkhitā | bhartṛśokaparītāṅgī śilātalamathāśritā

हे राजन्, तब अत्यन्त दुःखी विदर्भकुमारी, जिसका अंग-अंग पति के शोक से घिरा था, एक शिला पर बैठकर विलाप करने लगी।

दमयन्त्युवाच

श्लोक 13 (3.61.13)

सिंहोरस्क महाबाहो निषधानां जनाधिप । क्व नु राजन्गतोऽसि त्वं त्यक्त्वा मां विजने वने ॥

siṃhoraska mahābāho niṣadhānāṃ janādhipa | kva nu rājangato'si tvaṃ tyaktvā māṃ vijane vane

हे सिंह जैसे वक्ष वाले, महाबाहु, निषधों के जनाधिप! हे राजन्, मुझे इस निर्जन वन में छोड़कर तुम कहाँ चले गए?

श्लोक 14 (3.61.14)

अश्वमेधादिभिर्वीर क्रतुभिश्चाप्तदक्षिणैः । कथमिष्ट्वा नरव्याघ्र मयि मिथ्या प्रवर्तसे ॥

aśvamedhādibhirvīra kratubhiścāptadakṣiṇaiḥ | kathamiṣṭvā naravyāghra mayi mithyā pravartase

हे वीर, हे नरव्याघ्र, तुमने पर्याप्त दक्षिणा वाले अश्वमेध आदि यज्ञ किए हैं; फिर मेरे प्रति असत्य आचरण कैसे कर रहे हो?

श्लोक 15 (3.61.15)

यत्त्वयोक्तं नरश्रेष्ठ मत्समक्षं महाद्युते । कर्तुमर्हसि कल्याण तदृतं पार्थिवर्षभ ॥

yattvayoktaṃ naraśreṣṭha matsamakṣaṃ mahādyute | kartumarhasi kalyāṇa tadṛtaṃ pārthivarṣabha

हे नरश्रेष्ठ, हे महातेजस्वी, हे कल्याणमय, हे राजश्रेष्ठ, तुमने मेरे सामने जो कहा था, उसे सत्य करना तुम्हें उचित है।

श्लोक 16 (3.61.16)

यच्चोक्तं विहगैर्हंसैः समीपे तव भूमिप । मत्सकाशे च तैरुक्तं तदवेक्षितुमर्हसि ॥

yaccoktaṃ vihagairhaṃsaiḥ samīpe tava bhūmipa | matsakāśe ca tairuktaṃ tadavekṣitumarhasi

हे भूपाल, उन हंस पक्षियों ने तुम्हारे पास जो कहा था, और मेरे पास भी जो कहा था, उस पर भी ध्यान दो।

श्लोक 17 (3.61.17)

चत्वार एकतो वेदाः साङ्गोपाङ्गाः सविस्तराः । स्वधीता मनुजव्याघ्र सत्यमेकं किलैकतः ॥

catvāra ekato vedāḥ sāṅgopāṅgāḥ savistarāḥ | svadhītā manujavyāghra satyamekaṃ kilaikataḥ

हे नरव्याघ्र, कहते हैं कि अंगों और उपांगों सहित विस्तार से भली-भाँति पढ़े गए चारों वेद एक ओर हैं, और अकेला सत्य दूसरी ओर।

श्लोक 18 (3.61.18)

तस्मादर्हसि शत्रुघ्न सत्यं कर्तुं नरेश्वर । उक्तवानसि यद्वीर मत्सकाशे पुरा वचः ॥

tasmādarhasi śatrughna satyaṃ kartuṃ nareśvara | uktavānasi yadvīra matsakāśe purā vacaḥ

इसलिए हे शत्रुघ्न, हे नरेश्वर, हे वीर, तुमने पहले मुझसे जो वचन कहे थे, उन्हें सत्य करो।

श्लोक 19 (3.61.19)

हा वीर ननु नामाहमिष्टा किल तवानघ । अस्यामटव्यां घोरायां किं मां न प्रतिभाषसे ॥

hā vīra nanu nāmāhamiṣṭā kila tavānagha | asyāmaṭavyāṃ ghorāyāṃ kiṃ māṃ na pratibhāṣase

हा वीर, हे निष्पाप, मैं तो तुम्हारी प्रिया थी न, ऐसा ही तो तुम कहते थे! इस भयानक वन में तुम मुझे उत्तर क्यों नहीं देते?

श्लोक 20 (3.61.20)

भर्त्सयत्येष मां रौद्रो व्यात्तास्यो दारुणाकृतिः । अरण्यराट् क्षुधाविष्टः किं मां न त्रातुमर्हसि ॥

bhartsayatyeṣa māṃ raudro vyāttāsyo dāruṇākṛtiḥ | araṇyarāṭ kṣudhāviṣṭaḥ kiṃ māṃ na trātumarhasi

मुँह फाड़े, भयंकर आकार वाला, भूख से व्याकुल यह क्रूर वनराज मुझे धमका रहा है। क्या तुम मेरी रक्षा नहीं करोगे?

श्लोक 21 (3.61.21)

न मे त्वदन्या काचिद्धि प्रियाऽस्तीत्यब्रवीस्तदा । तामृतां कुरु कल्याण पुरोक्तां भारतीं नृप ॥

na me tvadanyā kāciddhi priyā'stītyabravīstadā | tāmṛtāṃ kuru kalyāṇa puroktāṃ bhāratīṃ nṛpa

तुमने तब कहा था, "तुम्हारे सिवा मुझे कोई दूसरी प्रिय नहीं है।" हे कल्याणमय नरेश, पहले कही हुई उस वाणी को सत्य करो।

श्लोक 22 (3.61.22)

उन्मत्तां विलपन्तीं मां भार्यामिष्टां नराधिप । ईप्सितामीप्सितोऽसि त्वं किं मां न प्रतिभाषसे ॥

unmattāṃ vilapantīṃ māṃ bhāryāmiṣṭāṃ narādhipa | īpsitāmīpsito'si tvaṃ kiṃ māṃ na pratibhāṣase

हे नराधिप, मैं तुम्हारी प्रिय पत्नी हूँ और पागल-सी होकर विलाप कर रही हूँ। मैं तुम्हें प्रिय थी और तुम मुझे प्रिय हो; फिर तुम मुझे उत्तर क्यों नहीं देते?

श्लोक 23 (3.61.23)

कृशां दीनां विवर्णां च मलिनां वसुधाधिप । वस्त्रार्धप्रावृतामेकां विलपन्तीमनाथवत् ॥

kṛśāṃ dīnāṃ vivarṇāṃ ca malināṃ vasudhādhipa | vastrārdhaprāvṛtāmekāṃ vilapantīmanāthavat

हे वसुधाधिप, मैं दुबली, दीन, कान्तिहीन और मलिन हो गई हूँ, आधे वस्त्र से ढकी, अकेली, अनाथ की भाँति विलाप कर रही हूँ;

श्लोक 24 (3.61.24)

यूथभ्रष्टामिवैकां मां हरिणीं पृथुलोचन । न मानयसि मामार्य रुदन्तीमरिकर्शन ॥

yūthabhraṣṭāmivaikāṃ māṃ hariṇīṃ pṛthulocana | na mānayasi māmārya rudantīmarikarśana

हे विशाल नेत्रों वाले, मैं झुंड से बिछड़ी अकेली हिरनी जैसी हूँ; हे आर्य, हे शत्रुसंहारक, मैं रो रही हूँ, फिर भी तुम मेरी सुध नहीं लेते।

श्लोक 25 (3.61.25)

महाराज महारण्ये मामिहैकाकिनीं सतीम् । आभाषमाणां स्वां पत्नीं किं मां न प्रतिभाषसे ॥

mahārāja mahāraṇye māmihaikākinīṃ satīm | ābhāṣamāṇāṃ svāṃ patnīṃ kiṃ māṃ na pratibhāṣase

हे महाराज, इस महावन में मैं अकेली हूँ, तुम्हारी अपनी पत्नी, तुम्हें पुकार रही हूँ; तुम मुझे उत्तर क्यों नहीं देते?

श्लोक 26 (3.61.26)

कुलशीलोपसंपन्नां चारुसर्वाङ्गशोभनाम् । अनुव्रतां महाराज किं मां न प्रतिभाषसे ॥

kulaśīlopasaṃpannāṃ cārusarvāṅgaśobhanām | anuvratāṃ mahārāja kiṃ māṃ na pratibhāṣase

हे महाराज, मैं उत्तम कुल और शील से सम्पन्न हूँ, मेरे सभी अंग सुन्दर हैं, और मैं तुम्हारी अनुगामिनी हूँ; तुम मुझे उत्तर क्यों नहीं देते?

श्लोक 27 (3.61.27)

नाद्य त्वां प्रतिपश्यामि गिरावस्मिन्नरोत्तम । वने चास्मिन्महाघोरे सिंहव्याघ्रनिषेविते ॥

nādya tvāṃ pratipaśyāmi girāvasminnarottama | vane cāsminmahāghore siṃhavyāghraniṣevite

हे नरोत्तम, आज मैं तुम्हें न इस पर्वत पर देख पा रही हूँ, न सिंहों और बाघों से भरे इस अत्यन्त भयानक वन में,

श्लोक 28 (3.61.28)

शयानमुपविष्टं वा स्थितं वा निषधाधिप । प्रस्थितं वा नरश्रेष्ठ मम शोकनिबर्हण ॥

śayānamupaviṣṭaṃ vā sthitaṃ vā niṣadhādhipa | prasthitaṃ vā naraśreṣṭha mama śokanibarhaṇa

न लेटे हुए, न बैठे हुए, न खड़े हुए और न जाते हुए, हे निषधपति, हे नरश्रेष्ठ, हे मेरे शोक को मिटाने वाले।

श्लोक 29 (3.61.29)

कं नु पृच्छामि दुःखार्ता त्वदर्थे शोककर्शिता । कच्चिद्दृष्टस्त्वयाऽरण्ये संगत्येति नलो नृपः ॥

kaṃ nu pṛcchāmi duḥkhārtā tvadarthe śokakarśitā | kacciddṛṣṭastvayā'raṇye saṃgatyeti nalo nṛpaḥ

तुम्हारे लिए दुःख से पीड़ित और शोक से दुर्बल मैं किससे पूछूँ, "क्या तुम इस वन में राजा नल से मिले हो, उन्हें देखा है?"

श्लोक 30 (3.61.30)

को नु मे कथयेदद्य वनेऽस्मिन्विष्ठितं नृपम् । अभिरूपं महात्मानं परव्यूहविनाशनम् ॥

ko nu me kathayedadya vane'sminviṣṭhitaṃ nṛpam | abhirūpaṃ mahātmānaṃ paravyūhavināśanam

आज कौन मुझे बताएगा कि सुन्दर, महात्मा और शत्रु-व्यूहों का विनाश करने वाले राजा इस वन में कहाँ ठहरे हैं?

श्लोक 31 (3.61.31)

यमन्वेषसि राजानं नलं पद्मनिभेक्षणम् । अयं स इति कस्याद्य श्रोष्यामि मधुरां गिरम् ॥

yamanveṣasi rājānaṃ nalaṃ padmanibhekṣaṇam | ayaṃ sa iti kasyādya śroṣyāmi madhurāṃ giram

आज किसके मुख से मैं यह मधुर वाणी सुनूँगी, "जिन कमलनयन राजा नल को तुम खोज रही हो, ये रहे वे"?

श्लोक 32 (3.61.32)

अरण्यराडयं श्रीमांश्चतुर्दंष्ट्रो महाहनुः । शार्दूलोऽभिमुखोऽभ्येति पृच्छाम्येनमशङ्किता ॥

araṇyarāḍayaṃ śrīmāṃścaturdaṃṣṭro mahāhanuḥ | śārdūlo'bhimukho'bhyeti pṛcchāmyenamaśaṅkitā

यह शोभायमान वनराज, चार दाढ़ों और बड़े जबड़ों वाला व्याघ्र, सीधा मेरी ओर आ रहा है। मैं निःशंक होकर इसी से पूछती हूँ।

श्लोक 33 (3.61.33)

भवान्मृगाणामधिपस्त्वमस्मिन्कानने प्रभुः । विदर्भराजतनयां दमयन्तीति विद्धि माम् ॥

bhavānmṛgāṇāmadhipastvamasminkānane prabhuḥ | vidarbharājatanayāṃ damayantīti viddhi mām

आप पशुओं के अधिपति हैं, इस वन के स्वामी हैं। मुझे विदर्भराज की पुत्री दमयन्ती जानिए,

श्लोक 34 (3.61.34)

निषधाधिपतेर्भार्यां नलस्यामित्रघातिनः । पतिमन्वेषतीमेकां कृपणां शोककर्शिताम् ॥

niṣadhādhipaterbhāryāṃ nalasyāmitraghātinaḥ | patimanveṣatīmekāṃ kṛpaṇāṃ śokakarśitām

शत्रुओं का नाश करने वाले निषधराज नल की पत्नी, जो दीन और शोक से दुर्बल होकर अकेली अपने पति को खोज रही है।

श्लोक 35 (3.61.35)

आश्वासय मृगेन्द्रेह यदि दृष्टस्त्वया नलः । सिंहस्कन्धो महाबाहुः पद्मपत्रनिभेक्षणः ॥

āśvāsaya mṛgendreha yadi dṛṣṭastvayā nalaḥ | siṃhaskandho mahābāhuḥ padmapatranibhekṣaṇaḥ

हे मृगेन्द्र, यदि आपने यहाँ नल को देखा हो, जिनके कंधे सिंह जैसे, भुजाएँ विशाल और नेत्र कमलदल जैसे हैं, तो मुझे ढाढ़स बँधाइए।

श्लोक 36 (3.61.36)

अथवाऽरण्यनृपते नलं यदि न शंससि । मां खादय मृगश्रेष्ठ दुःखादस्माद्विमोचय ॥

athavā'raṇyanṛpate nalaṃ yadi na śaṃsasi | māṃ khādaya mṛgaśreṣṭha duḥkhādasmādvimocaya

अथवा हे वनराज, यदि आप नल के विषय में नहीं बताते, तो हे मृगश्रेष्ठ, मुझे खा लीजिए और इस दुःख से छुटकारा दीजिए।

श्लोक 37 (3.61.37)

श्रुत्वाऽरण्ये विलपितं ममैष मृगराट् स्वयम् । यात्येष मृष्टसलिलामापगां सागरोपमाम् ॥

śrutvā'raṇye vilapitaṃ mamaiṣa mṛgarāṭ svayam | yātyeṣa mṛṣṭasalilāmāpagāṃ sāgaropamām

वन में मेरा विलाप सुनकर यह मृगराज अपने-आप ही मीठे जल वाली, सागर जैसी उस नदी की ओर चला जा रहा है।

श्लोक 38 (3.61.38)

इमं शिलोच्चयं पृच्छे शृङ्गैर्बहुभिरुच्छ्रितैः । विराजितं दिवस्पृग्भिर्नैकवर्णैर्मनोरमैः ॥

imaṃ śiloccayaṃ pṛcche śṛṅgairbahubhirucchritaiḥ | virājitaṃ divaspṛgbhirnaikavarṇairmanoramaiḥ

मैं इस पर्वत से पूछूँगी, जो आकाश को छूते, बहुरंगी और मनोहर अनेक ऊँचे शिखरों से सुशोभित है,

श्लोक 39 (3.61.39)

नानाधातुसमाकीर्णं विविधोपलभूषितम् । अस्यारण्यस्य महतः केतुभूतमिवोच्छ्रितम् ॥

nānādhātusamākīrṇaṃ vividhopalabhūṣitam | asyāraṇyasya mahataḥ ketubhūtamivocchritam

जो नाना धातुओं से भरा है, अनेक प्रकार के पत्थरों से सजा है, और इस विशाल वन की ध्वजा के समान ऊँचा उठा है,

श्लोक 40 (3.61.40)

सिंहशार्दूलमातङ्गवराहर्क्षमृगायुतम् । पतत्रिभिर्बहुविधैः समन्तादनुनादितम् ॥

siṃhaśārdūlamātaṅgavarāharkṣamṛgāyutam | patatribhirbahuvidhaiḥ samantādanunāditam

जो सिंहों, बाघों, हाथियों, सूअरों, रीछों और मृगों से भरा है, और चारों ओर नाना प्रकार के पक्षियों के स्वर से गूँजता है,

श्लोक 41 (3.61.41)

किंशुकाशोकबकुलपुन्नागैरुपशोभितम् । कर्णिकारधवप्लक्षैः सुपुष्पैरुपशोभितम् ॥

kiṃśukāśokabakulapunnāgairupaśobhitam | karṇikāradhavaplakṣaiḥ supuṣpairupaśobhitam

जो किंशुक, अशोक, बकुल और पुन्नाग के वृक्षों से सुशोभित है, और खूब खिले हुए कर्णिकार, धव तथा प्लक्ष से भी शोभित है,

श्लोक 42 (3.61.42)

सरिद्भिः सविहङ्गाभिः शिखरैश्च समाकुलम् । पृथिव्या रुचिराकारं चूडामणिमिव स्थितम् । गिरिराजमिमं तावत्पृच्छामि नृपतिं प्रति ॥

saridbhiḥ savihaṅgābhiḥ śikharaiśca samākulam | pṛthivyā rucirākāraṃ cūḍāmaṇimiva sthitam | girirājamimaṃ tāvatpṛcchāmi nṛpatiṃ prati

जो पक्षियों से भरी नदियों और शिखरों से व्याप्त है, और पृथ्वी के सुन्दर चूड़ामणि के समान स्थित है; इसी गिरिराज से मैं राजा के विषय में पूछती हूँ।

श्लोक 43 (3.61.43)

भगवन्नचलश्रेष्ठ दिव्यदर्शन विश्रुत । शरण्य बहुकल्याण नमस्तेऽस्तु महीधर ॥

bhagavannacalaśreṣṭha divyadarśana viśruta | śaraṇya bahukalyāṇa namaste'stu mahīdhara

हे भगवन्, हे पर्वतश्रेष्ठ, हे दिव्यदर्शन, हे विख्यात, हे शरणदाता, हे बहुकल्याणकारी, हे महीधर, आपको नमस्कार है।

श्लोक 44 (3.61.44)

प्रणमे त्वाऽभिगम्याहं राजपुत्रीं निबोध माम् । राजस्नुषां राजभार्यां दमयन्तीति विश्रुताम् ॥

praṇame tvā'bhigamyāhaṃ rājaputrīṃ nibodha mām | rājasnuṣāṃ rājabhāryāṃ damayantīti viśrutām

आपके पास आकर मैं आपको प्रणाम करती हूँ। मुझे राजपुत्री, राजा की पुत्रवधू और राजा की पत्नी जानिए, जो दमयन्ती नाम से प्रसिद्ध है।

श्लोक 45 (3.61.45)

राजा विदर्भाधिपतिः पिता मम महारथः । भीमो नाम क्षितिपतिश्चातुर्वर्ण्यस्य रक्षिता ॥

rājā vidarbhādhipatiḥ pitā mama mahārathaḥ | bhīmo nāma kṣitipatiścāturvarṇyasya rakṣitā

मेरे पिता विदर्भ के अधिपति, महारथी राजा भीम हैं, जो चारों वर्णों के रक्षक हैं।

श्लोक 46 (3.61.46)

राजसूयाश्वमेधानां क्रतूनां दक्षिणावताम् । आहर्ता पार्थिवश्रेष्ठः पृथुचार्वञ्चितेक्षणः ॥

rājasūyāśvamedhānāṃ kratūnāṃ dakṣiṇāvatām | āhartā pārthivaśreṣṭhaḥ pṛthucārvañcitekṣaṇaḥ

उन श्रेष्ठ राजा ने भरपूर दक्षिणा वाले राजसूय और अश्वमेध यज्ञ किए हैं; उनके नेत्र विशाल, सुन्दर और मनोहर हैं।

श्लोक 47 (3.61.47)

ब्रह्मण्यः साधुवृत्तश्च सत्यवागनसूयकः । शीलवान्वीर्यसंपन्नः पृथुश्रीर्धर्मविच्छुचिः ॥

brahmaṇyaḥ sādhuvṛttaśca satyavāganasūyakaḥ | śīlavānvīryasaṃpannaḥ pṛthuśrīrdharmavicchuciḥ

वे ब्राह्मणों के हितैषी, सदाचारी, सत्यवादी, ईर्ष्या से रहित, शीलवान्, पराक्रमी, महान् ऐश्वर्य वाले, धर्मज्ञ और पवित्र हैं।

श्लोक 48 (3.61.48)

सम्यग्गोप्ता विदर्भाणां निर्जितारिगणः प्रभुः । तस्य मां विद्धि तनयां भगवंस्त्वामुपस्थिताम् ॥

samyaggoptā vidarbhāṇāṃ nirjitārigaṇaḥ prabhuḥ | tasya māṃ viddhi tanayāṃ bhagavaṃstvāmupasthitām

वे विदर्भवासियों की भली-भाँति रक्षा करते हैं और शत्रुसमूहों को जीत चुके स्वामी हैं। हे भगवन्, मुझे उन्हीं की पुत्री जानिए, जो आपके सामने खड़ी है।

श्लोक 49 (3.61.49)

निषधेषु महाराजः श्वशुरो मे नरोत्तमः । गृहीतनामा विख्यातो वीरसेन इति स्म ह ॥

niṣadheṣu mahārājaḥ śvaśuro me narottamaḥ | gṛhītanāmā vikhyāto vīrasena iti sma ha

निषध देश में मेरे श्वसुर महाराज वीरसेन थे, जो नरों में श्रेष्ठ, आदर से स्मरण किए जाने वाले और विख्यात थे।

श्लोक 50 (3.61.50)

तस्य राज्ञः सुतो वीरः श्रीमान्सत्यपराक्रमः । क्रमप्राप्तं पितुः स्वं यो राज्यं समनुशास्ति ह ॥

tasya rājñaḥ suto vīraḥ śrīmānsatyaparākramaḥ | kramaprāptaṃ pituḥ svaṃ yo rājyaṃ samanuśāsti ha

उन राजा के वीर, श्रीमान् और सच्चे पराक्रम वाले पुत्र पिता से क्रमशः प्राप्त अपने राज्य का शासन करते हैं।

श्लोक 51 (3.61.51)

नलो नामारिहा श्यामः पुण्यश्लोक इति श्रुतः । ब्रह्मण्यो वेदविद्वाग्मी पुण्यकृत्सोमपोऽग्निचित् ॥

nalo nāmārihā śyāmaḥ puṇyaśloka iti śrutaḥ | brahmaṇyo vedavidvāgmī puṇyakṛtsomapo'gnicit

उनका नाम नल है; वे शत्रुओं का संहार करने वाले, श्यामवर्ण और "पुण्यश्लोक" नाम से प्रसिद्ध हैं; ब्राह्मणों के हितैषी, वेदवेत्ता, वाक्पटु, पुण्यकर्मा, सोमपान करने वाले और अग्निचयन करने वाले हैं।

श्लोक 52 (3.61.52)

यष्टा दाता च योद्धा च सम्यक्चैव प्रशासिता । तस्य मामचलश्रेष्ठ विद्धि भार्यामिहागताम् ॥

yaṣṭā dātā ca yoddhā ca samyakcaiva praśāsitā | tasya māmacalaśreṣṭha viddhi bhāryāmihāgatām

वे यज्ञ करने वाले, दानी, योद्धा और उचित रीति से शासन करने वाले हैं। हे पर्वतश्रेष्ठ, मुझे उन्हीं की पत्नी जानिए, जो यहाँ आई है,

श्लोक 53 (3.61.53)

त्यक्तश्रियं भर्तृहीनामनाथां व्यसनान्विताम् । अन्वेषमाणां भर्तारं नलं नरवरोत्तमम् ॥

tyaktaśriyaṃ bhartṛhīnāmanāthāṃ vyasanānvitām | anveṣamāṇāṃ bhartāraṃ nalaṃ naravarottamam

श्रीहीन, पतिविहीन, अनाथ और संकट में पड़ी हुई, जो नरश्रेष्ठ अपने पति नल को खोज रही है।

श्लोक 54 (3.61.54)

खमुल्लिखद्भिरेतैर्हि त्वया शृङ्गशतैर्नृपः । कच्चिद्दृष्टोऽचलश्रेष्ठ वनेऽस्मिन्दारुणे नलः ॥

khamullikhadbhiretairhi tvayā śṛṅgaśatairnṛpaḥ | kacciddṛṣṭo'calaśreṣṭha vane'smindāruṇe nalaḥ

हे पर्वतश्रेष्ठ, आकाश को कुरेदते अपने इन सैकड़ों शिखरों से क्या आपने इस भयानक वन में राजा नल को देखा है?

श्लोक 55 (3.61.55)

विक्रान्तः सत्त्ववान्वीरो भर्ता मम महायशाः । निषधानामधिपतिः कच्चिद्दृष्टस्त्वया नलः ॥

vikrāntaḥ sattvavānvīro bhartā mama mahāyaśāḥ | niṣadhānāmadhipatiḥ kacciddṛṣṭastvayā nalaḥ

मेरे पति पराक्रमी, धैर्यवान्, वीर और महायशस्वी हैं, निषधों के अधिपति हैं; क्या आपने नल को देखा है?

श्लोक 56 (3.61.56)

किं मां विलपतीमेकां पर्वतश्रेष्ठ विह्वलाम् । गिरा नाश्वासयस्यद्य स्वां सुतामिव दुःखिताम् ॥

kiṃ māṃ vilapatīmekāṃ parvataśreṣṭha vihvalām | girā nāśvāsayasyadya svāṃ sutāmiva duḥkhitām

हे पर्वतश्रेष्ठ, मैं अकेली और व्याकुल होकर विलाप कर रही हूँ; अपनी दुःखी पुत्री की भाँति आप आज मुझे वाणी से सान्त्वना क्यों नहीं देते?

श्लोक 57 (3.61.57)

वीर विक्रान्त धर्मज्ञ सत्यसंध महीपते । यद्यस्यस्मिन्वने राजन्दर्शयात्मानमात्मना ॥

vīra vikrānta dharmajña satyasaṃdha mahīpate | yadyasyasminvane rājandarśayātmānamātmanā

हे वीर, हे पराक्रमी, हे धर्मज्ञ, हे सत्यप्रतिज्ञ महीपति! हे राजन्, यदि तुम इस वन में हो तो स्वयं को मुझे दिखाओ।

श्लोक 58 (3.61.58)

कदा सुस्निग्धगम्भीरां जीमूतस्वनसन्निभाम् । श्रोष्यामि नैषधस्याहं वाचं ताममृतोपमाम् ॥

kadā susnigdhagambhīrāṃ jīmūtasvanasannibhām | śroṣyāmi naiṣadhasyāhaṃ vācaṃ tāmamṛtopamām

कब मैं निषधराज की वह स्नेह भरी, गम्भीर, मेघ-गर्जन जैसी और अमृत के समान वाणी सुनूँगी,

श्लोक 59 (3.61.59)

वैदर्भ्येहीति विस्पष्टां शुभां राज्ञो महात्मनः । आत्माभिधायिनीमृद्धां मम शोकविनाशिनीम् ॥

vaidarbhyehīti vispaṣṭāṃ śubhāṃ rājño mahātmanaḥ | ātmābhidhāyinīmṛddhāṃ mama śokavināśinīm

उस महात्मा राजा की वह स्पष्ट और मंगलमयी वाणी, "वैदर्भी, आओ!", जो मुझे अपनी कहकर पुकारती है, जो भरी-पूरी है और मेरे शोक को मिटा देने वाली है?

बृहदश्व उवाच

श्लोक 60 (3.61.60)

इति सा तं गिरिश्रेष्ठमुक्त्वा पार्थिवनन्दिनी । दमयन्ती ततो भूयो जगाम दिशमुत्तराम् ॥

iti sā taṃ giriśreṣṭhamuktvā pārthivanandinī | damayantī tato bhūyo jagāma diśamuttarām

उस श्रेष्ठ पर्वत से ऐसा कहकर राजकुमारी दमयन्ती फिर उत्तर दिशा की ओर चल पड़ी।

श्लोक 61 (3.61.61)

सा गत्वा त्रीनहोरात्रान्ददर्श परमाङ्गना । तापसारण्यमतुलं दिव्यकाननशोभितम् ॥

sā gatvā trīnahorātrāndadarśa paramāṅganā | tāpasāraṇyamatulaṃ divyakānanaśobhitam

तीन दिन और तीन रात चलने के बाद उस श्रेष्ठ नारी ने तपस्वियों का एक अनुपम वन देखा, जो दिव्य उपवनों से शोभित था,

श्लोक 62 (3.61.62)

वसिष्ठभृग्वत्रिसमैस्तापसैरुपशोभितम् । नियतैः संयताहारैर्दमशौचसमन्वितैः ॥

vasiṣṭhabhṛgvatrisamaistāpasairupaśobhitam | niyataiḥ saṃyatāhārairdamaśaucasamanvitaiḥ

जो वसिष्ठ, भृगु और अत्रि जैसे तपस्वियों से सुशोभित था, जो नियमों का पालन करने वाले, मिताहारी तथा इन्द्रियनिग्रह और शौच से युक्त थे,

श्लोक 63 (3.61.63)

अब्भक्षैर्वायुभक्षैश्च पत्राहारैस्तथैव च । जितेन्द्रियैर्महाभागैः स्वर्गमार्गदिदृक्षुभिः ॥

abbhakṣairvāyubhakṣaiśca patrāhāraistathaiva ca | jitendriyairmahābhāgaiḥ svargamārgadidṛkṣubhiḥ

जो केवल जल, वायु या पत्ते खाकर रहते थे, जितेन्द्रिय और महाभाग थे, और स्वर्ग का मार्ग देखने की इच्छा रखते थे।

श्लोक 64 (3.61.64)

वल्कलाजिनसंवीतैर्मुनिभिः संयतेन्द्रियैः । तापसाध्युषितं रम्यं ददर्शाश्रममण्डलम् ॥

valkalājinasaṃvītairmunibhiḥ saṃyatendriyaiḥ | tāpasādhyuṣitaṃ ramyaṃ dadarśāśramamaṇḍalam

उसने वल्कल और मृगचर्म पहने संयमी मुनियों और तपस्वियों से बसा एक रमणीय आश्रम-मण्डल देखा।

श्लोक 65 (3.61.65)

नानामृगगणैर्जुष्टं शाखामृगगणायुतम् । तापसैः समुपेतं च सा दृष्ट्वैव समाश्वसत् ॥

nānāmṛgagaṇairjuṣṭaṃ śākhāmṛgagaṇāyutam | tāpasaiḥ samupetaṃ ca sā dṛṣṭvaiva samāśvasat

अनेक मृगों के झुंडों से सेवित, वानरों के समूहों से भरा और तपस्वियों से युक्त उस आश्रम को देखते ही उसे ढाढ़स बँधा।

श्लोक 66 (3.61.66)

सुभ्रूः सुकेशी सुश्रोणी सुकुचा सुद्विजानना । वर्चस्विनी सुप्रतिष्ठा स्वसितायतलोचना ॥

subhrūḥ sukeśī suśroṇī sukucā sudvijānanā | varcasvinī supratiṣṭhā svasitāyatalocanā

सुन्दर भौंहों, सुन्दर केशों, सुन्दर नितम्बों और सुन्दर स्तनों वाली, सुन्दर दाँतों से युक्त मुख वाली, तेजस्विनी, सुगठित और बड़ी-बड़ी काली आँखों वाली,

श्लोक 67 (3.61.67)

सा विवेशाश्रमपदं वीरसेनसुतप्रिया । योषिद्रत्नं महाभागा दमयन्ती तपस्विनी ॥

sā viveśāśramapadaṃ vīrasenasutapriyā | yoṣidratnaṃ mahābhāgā damayantī tapasvinī

वीरसेनपुत्र नल की प्रिया, नारियों में रत्न, महाभागा और दुखियारी दमयन्ती ने उस आश्रम में प्रवेश किया।

श्लोक 68 (3.61.68)

साऽभिवाद्य तपोवृद्धान्विनयावनता स्थिता । स्वागतं त इति प्रोक्ता तैः सर्वैस्तापसोत्तमैः ॥

sā'bhivādya tapovṛddhānvinayāvanatā sthitā | svāgataṃ ta iti proktā taiḥ sarvaistāpasottamaiḥ

तप में बढ़े-चढ़े उन वृद्ध तपस्वियों को प्रणाम करके वह विनय से झुकी खड़ी रही, और उन सभी श्रेष्ठ तपस्वियों ने उससे कहा, "तुम्हारा स्वागत है।"

श्लोक 69 (3.61.69)

पूजां चास्या यथान्यायं कृत्वा तत्र तपोधनाः । आस्यतामित्यथोचुस्ते ब्रूहि किं करवामहे ॥

pūjāṃ cāsyā yathānyāyaṃ kṛtvā tatra tapodhanāḥ | āsyatāmityathocuste brūhi kiṃ karavāmahe

वहाँ उन तपोधनों ने उसका यथोचित सत्कार किया और फिर कहा, "बैठो। बताओ, हम तुम्हारे लिए क्या करें?"

श्लोक 70 (3.61.70)

तानुवाच वरारोहा कच्चिद्भगवतामिह । तपःस्वग्निषु धर्मेषु मृगपक्षिषु चानघाः ॥

tānuvāca varārohā kaccidbhagavatāmiha | tapaḥsvagniṣu dharmeṣu mṛgapakṣiṣu cānaghāḥ

उस सुन्दरी ने उनसे कहा, "हे भगवानो, हे निष्पाप मुनियो, क्या यहाँ आपके तप, अग्नियों, धर्म-कर्मों और मृगों तथा पक्षियों में

श्लोक 71 (3.61.71)

कुशलं वो महाभागाः स्वधर्माचरणेषु च । तैरुक्ता कुशलं भद्रे सर्वत्रेति यशस्विनी ॥

kuśalaṃ vo mahābhāgāḥ svadharmācaraṇeṣu ca | tairuktā kuśalaṃ bhadre sarvatreti yaśasvinī

और अपने धर्म के आचरण में सब कुशल है, हे महाभागो?" उन्होंने उस यशस्विनी से कहा, "भद्रे, सब ओर कुशल है।"

तापसा ऊचुः

श्लोक 72 (3.61.72)

ब्रूहि सर्वानवद्याङ्गि का त्वं किंच चिकीर्षसि । दृष्ट्वैव ते परंरूपं द्युतिं च परमामिह ॥

brūhi sarvānavadyāṅgi kā tvaṃ kiṃca cikīrṣasi | dṛṣṭvaiva te paraṃrūpaṃ dyutiṃ ca paramāmiha

हे सर्वांगसुन्दरी, बताओ, तुम कौन हो और क्या करना चाहती हो? यहाँ तुम्हारा परम रूप और परम कान्ति देखकर

श्लोक 73 (3.61.73)

विस्मयो नः समुत्पन्नः समाश्वसिहि मा शुचः । अस्यारण्यस्य देवी त्वमुताहोऽस्य महीभृतः । अस्याश्च नद्याः कल्याणि वद सत्यमनिन्दिते ॥

vismayo naḥ samutpannaḥ samāśvasihi mā śucaḥ | asyāraṇyasya devī tvamutāho'sya mahībhṛtaḥ | asyāśca nadyāḥ kalyāṇi vada satyamanindite

हम विस्मित हो गए हैं। धीरज धरो, शोक मत करो। हे कल्याणी, क्या तुम इस वन की देवी हो, या इस पर्वत की, या इस नदी की? हे अनिन्दिते, सच-सच बताओ।

बृहदश्व उवाच

श्लोक 74 (3.61.74)

साऽब्रवीत्तानृषीन्नाहमरण्यस्यास्य देवता । न चाप्यस्य गिरेर्विप्रा नैव नद्याश्च देवता ॥

sā'bravīttānṛṣīnnāhamaraṇyasyāsya devatā | na cāpyasya girerviprā naiva nadyāśca devatā

उसने उन ऋषियों से कहा, "हे विप्रो, मैं न इस वन की देवी हूँ, न इस पर्वत की, और न ही इस नदी की देवी हूँ।"

दमयन्त्युवाच

श्लोक 75 (3.61.75)

मानुषीं मां विजानीत यूयं सर्वे तपोधनाः । विस्तरेणाभिधास्यामि तन्मे शृणुत सर्वशः ॥

mānuṣīṃ māṃ vijānīta yūyaṃ sarve tapodhanāḥ | vistareṇābhidhāsyāmi tanme śṛṇuta sarvaśaḥ

हे तपोधनो, आप सब मुझे मानवी जानिए। मैं विस्तार से सब कुछ बताऊँगी; मेरी पूरी बात सुनिए।

श्लोक 76 (3.61.76)

विदर्भेषु महीपालो भीमो नाम महीपतिः । तस्य मां तनयां सर्वे जानीत द्विजसत्तमाः ॥

vidarbheṣu mahīpālo bhīmo nāma mahīpatiḥ | tasya māṃ tanayāṃ sarve jānīta dvijasattamāḥ

विदर्भ देश में भीम नाम के एक राजा हैं, जो पृथ्वी के पालक हैं। हे द्विजश्रेष्ठो, आप सब मुझे उन्हीं की पुत्री जानिए।

श्लोक 77 (3.61.77)

निषधाधिपतिर्धीमान्नलो नाम महायशाः । वीरः संग्रामजिद्विद्वान्मम भर्ता विशांपतिः ॥

niṣadhādhipatirdhīmānnalo nāma mahāyaśāḥ | vīraḥ saṃgrāmajidvidvānmama bhartā viśāṃpatiḥ

निषधों के बुद्धिमान् अधिपति, महायशस्वी नल, जो वीर, संग्राम में विजयी, विद्वान् और प्रजापालक हैं, मेरे पति हैं।

श्लोक 78 (3.61.78)

देवताभ्यर्चनपरो द्विजातिजनवत्सलः । गोप्ता निषधवंशस्य महातेजा महाबलः ॥

devatābhyarcanaparo dvijātijanavatsalaḥ | goptā niṣadhavaṃśasya mahātejā mahābalaḥ

वे देवताओं की पूजा में तत्पर, द्विजों पर स्नेह रखने वाले, निषध वंश के रक्षक, महातेजस्वी और महाबली हैं;

श्लोक 79 (3.61.79)

सत्यवान्धर्मवित्प्राज्ञः सत्यसंधोऽरिमर्दनः । ब्रह्मण्यो दैवतपरः श्रीमान्परपुरंजयः ॥

satyavāndharmavitprājñaḥ satyasaṃdho'rimardanaḥ | brahmaṇyo daivataparaḥ śrīmānparapuraṃjayaḥ

सत्यवान्, धर्मज्ञ, बुद्धिमान्, सत्यप्रतिज्ञ, शत्रुओं को कुचलने वाले, ब्राह्मणों के हितैषी, देवभक्त, श्रीमान् और शत्रुनगरों को जीतने वाले हैं।

श्लोक 80 (3.61.80)

नलो नाम नृपश्रेष्ठो देवराजसमद्युतिः । मम भर्ता विशालाक्षः पूर्णेन्दुवदनोऽरिहा ॥

nalo nāma nṛpaśreṣṭho devarājasamadyutiḥ | mama bhartā viśālākṣaḥ pūrṇenduvadano'rihā

नल नाम के वे श्रेष्ठ राजा, जिनकी कान्ति देवराज इन्द्र के समान है, मेरे पति हैं; उनके नेत्र विशाल हैं, मुख पूर्ण चन्द्रमा जैसा है और वे शत्रुओं का संहार करने वाले हैं;

श्लोक 81 (3.61.81)

आहर्ता क्रतुमुख्यानां वेदवेदाङ्गपारगः । सपत्नानां मृधे हन्ता रविसोमसमप्रभः ॥

āhartā kratumukhyānāṃ vedavedāṅgapāragaḥ | sapatnānāṃ mṛdhe hantā ravisomasamaprabhaḥ

वे श्रेष्ठ यज्ञों के करने वाले, वेदों और वेदांगों के पारंगत, युद्ध में शत्रुओं का वध करने वाले और सूर्य तथा चन्द्रमा के समान तेजस्वी हैं।

श्लोक 82 (3.61.82)

स कैश्चिन्निकृतिप्रज्ञैरनार्यैरकृतात्मभिः । आहूय पृथिवीपालः सत्यधर्मपरायणः । देवने कुशलैर्जिह्मैर्जितो राज्यं वसूनि च ॥

sa kaiścinnikṛtiprajñairanāryairakṛtātmabhiḥ | āhūya pṛthivīpālaḥ satyadharmaparāyaṇaḥ | devane kuśalairjihmairjito rājyaṃ vasūni ca

सत्य और धर्म में तत्पर उन पृथ्वीपालक को कुछ छल-बुद्धि वाले, अनार्य, अजितात्मा, जुए में निपुण कुटिल लोगों ने बुलाकर उनका राज्य और धन जीत लिया।

श्लोक 83 (3.61.83)

तस्य मामवगच्छध्वं भार्यां राजर्षभस्य वै । दमयन्तीति विख्यातां भर्तुर्दर्शनलालसाम् ॥

tasya māmavagacchadhvaṃ bhāryāṃ rājarṣabhasya vai | damayantīti vikhyātāṃ bharturdarśanalālasām

मुझे उन्हीं राजश्रेष्ठ की पत्नी जानिए, जो दमयन्ती नाम से प्रसिद्ध है और अपने पति के दर्शन के लिए लालायित है।

श्लोक 84 (3.61.84)

सा वनानि गिरींश्चैव सरांसि सरितस्तथा । पल्वलानि च सर्वाणि तथाऽरण्यानि सर्वशः ॥

sā vanāni girīṃścaiva sarāṃsi saritastathā | palvalāni ca sarvāṇi tathā'raṇyāni sarvaśaḥ

वनों और पर्वतों में, सरोवरों और नदियों में, सब तालाबों में और सारे जंगलों में

श्लोक 85 (3.61.85)

अन्वेषमाणा भर्तारं नलं रणविशारदम् । महात्मानं कृतास्त्रं च विचरामीह दुःखिता ॥

anveṣamāṇā bhartāraṃ nalaṃ raṇaviśāradam | mahātmānaṃ kṛtāstraṃ ca vicarāmīha duḥkhitā

युद्धकुशल, महात्मा और अस्त्रविद्या में निपुण अपने पति नल को खोजती हुई मैं दुःखी होकर यहाँ भटक रही हूँ।

श्लोक 86 (3.61.86)

कच्चिद्भगवतां रम्यं तपोवनमिदं नृपः । भवेत्प्राप्तो नलो नाम निषधानां जनाधिपः ॥

kaccidbhagavatāṃ ramyaṃ tapovanamidaṃ nṛpaḥ | bhavetprāpto nalo nāma niṣadhānāṃ janādhipaḥ

हे भगवानो, क्या निषधों के जनाधिप राजा नल आपके इस रमणीय तपोवन में आए हैं?

श्लोक 87 (3.61.87)

यत्कृतेऽहमिदं दुःखं प्रपन्ना भृशदारुणम् । वनं प्रतिभयं घोरं शार्दूलमृगसेवितम् ॥

yatkṛte'hamidaṃ duḥkhaṃ prapannā bhṛśadāruṇam | vanaṃ pratibhayaṃ ghoraṃ śārdūlamṛgasevitam

उन्हीं के कारण मैं इस अत्यन्त दारुण दुःख में पड़ी हूँ और बाघों तथा वन्य पशुओं से भरे इस भयानक, घोर वन में आई हूँ।

श्लोक 88 (3.61.88)

यदि कैश्चिदहोरात्रैर्न द्रक्ष्यामि नलं नृपम् । आत्मानं श्रेयसा योक्ष्ये देहस्यास्य विमोक्षणात् ॥

yadi kaiścidahorātrairna drakṣyāmi nalaṃ nṛpam | ātmānaṃ śreyasā yokṣye dehasyāsya vimokṣaṇāt

यदि कुछ दिनों और रातों में मैं राजा नल को नहीं देख पाई, तो इस देह को त्यागकर मैं स्वयं को परम श्रेय से जोड़ लूँगी।

श्लोक 89 (3.61.89)

को नु मे जीवितेनार्थस्तमृते पुरुषर्षभम् । कथं भविष्याम्यद्याहं भर्तृशोकाभिपीडिता ॥

ko nu me jīvitenārthastamṛte puruṣarṣabham | kathaṃ bhaviṣyāmyadyāhaṃ bhartṛśokābhipīḍitā

उन पुरुषश्रेष्ठ के बिना मेरे जीवन का क्या प्रयोजन? पति के शोक से पीड़ित मैं अब कैसे जी पाऊँगी?

बृहदश्व उवाच

श्लोक 90 (3.61.90)

तथा विलपतीमेकामरण्ये भीमनन्दिनीम् । दमयन्तीमथोचुस्ते तापसाः सत्यवादिनः ॥

tathā vilapatīmekāmaraṇye bhīmanandinīm | damayantīmathocuste tāpasāḥ satyavādinaḥ

वन में अकेली इस प्रकार विलाप करती भीमपुत्री दमयन्ती से तब उन सत्यवादी तपस्वियों ने कहा:

तापसा ऊचुः

श्लोक 91 (3.61.91)

उदर्कस्तव कल्याणि कल्याणो भविता शुभे । वयं पश्याम तपसा क्षिप्रं द्रक्ष्यसि नैषधम् ॥

udarkastava kalyāṇi kalyāṇo bhavitā śubhe | vayaṃ paśyāma tapasā kṣipraṃ drakṣyasi naiṣadham

हे कल्याणी, हे शुभे, तुम्हारा भविष्य मंगलमय होगा। हम तप के बल से देख रहे हैं कि तुम शीघ्र ही निषधराज को देखोगी।

श्लोक 92 (3.61.92)

निषधानामधिपतिं नलं रिपुनिपातिनम् । भैमि धर्मभृतां श्रेष्ठं द्रक्ष्यसे विगतज्वरम् ॥

niṣadhānāmadhipatiṃ nalaṃ ripunipātinam | bhaimi dharmabhṛtāṃ śreṣṭhaṃ drakṣyase vigatajvaram

हे भैमी, तुम निषधों के अधिपति, शत्रुओं को गिराने वाले, धर्मात्माओं में श्रेष्ठ नल को सन्ताप से मुक्त देखोगी,

श्लोक 93 (3.61.93)

विमुक्तं सर्वपापेभ्यः सर्वरत्नसमन्वितम् । तदेव नगरं श्रेष्ठं प्रशासतमरिन्दमम् ॥

vimuktaṃ sarvapāpebhyaḥ sarvaratnasamanvitam | tadeva nagaraṃ śreṣṭhaṃ praśāsatamarindamam

सब पापों से मुक्त, सब रत्नों से सम्पन्न, और उसी श्रेष्ठ नगर पर शासन करते हुए उन शत्रुदमन को।

श्लोक 94 (3.61.94)

द्विषतां भयकर्तारं सुहृदां शोकनाशनम् । पतिमेष्यसि कल्याणि कल्याणाभिजनं नृपम् ॥

dviṣatāṃ bhayakartāraṃ suhṛdāṃ śokanāśanam | patimeṣyasi kalyāṇi kalyāṇābhijanaṃ nṛpam

हे कल्याणी, तुम अपने उस उत्तम कुल वाले राजा पति को फिर पाओगी, जो शत्रुओं को भय देने वाले और मित्रों का शोक मिटाने वाले हैं।

बृहदश्व उवाच

श्लोक 95 (3.61.95)

एवमुक्त्वा नलस्येष्टां महिषीं पार्थिवात्मजाम् । अन्तर्हितास्तापसास्ते साग्निहोत्राश्रमास्तथा ॥

evamuktvā nalasyeṣṭāṃ mahiṣīṃ pārthivātmajām | antarhitāstāpasāste sāgnihotrāśramāstathā

नल की प्रिय रानी उस राजकुमारी से ऐसा कहकर वे तपस्वी अपने अग्निहोत्रों और आश्रमों सहित अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 96 (3.61.96)

सा दृष्ट्वा महदाश्चर्यं विस्मिता ह्यभवत्तदा । दमयन्त्यनवद्याङ्गी वीरसेननृपस्नुषा ॥

sā dṛṣṭvā mahadāścaryaṃ vismitā hyabhavattadā | damayantyanavadyāṅgī vīrasenanṛpasnuṣā

यह महान् आश्चर्य देखकर राजा वीरसेन की पुत्रवधू, निर्दोष अंगों वाली दमयन्ती विस्मित हो गई।

श्लोक 97 (3.61.97)

चिन्तयामास वैदर्भी किमेतद्दृष्टवत्यहम् ॥

cintayāmāsa vaidarbhī kimetaddṛṣṭavatyaham

विदर्भकुमारी सोचने लगी, "यह मैंने क्या देखा?"

दमयन्त्युवाच

श्लोक 98 (3.61.98)

किं नु स्वप्नो मया दृष्टः कोऽयं विधिरिहाभवत् । क्व नु ते तापसाः सर्वे क्व तदाश्रममण्डलम् ॥

kiṃ nu svapno mayā dṛṣṭaḥ ko'yaṃ vidhirihābhavat | kva nu te tāpasāḥ sarve kva tadāśramamaṇḍalam

क्या मैंने कोई स्वप्न देखा? यहाँ यह कैसी घटना हुई? वे सब तपस्वी कहाँ गए, वह आश्रम-मण्डल कहाँ है?

श्लोक 99 (3.61.99)

क्व सा पुण्यजला रम्या नदी द्विजनिषेविता । क्व नु ते ह नगा हृद्याः फलपुष्पोपशोभिताः ॥

kva sā puṇyajalā ramyā nadī dvijaniṣevitā | kva nu te ha nagā hṛdyāḥ phalapuṣpopaśobhitāḥ

पवित्र जल वाली, पक्षियों से सेवित वह रमणीय नदी कहाँ है? फलों और फूलों से सुशोभित वे मनोहर वृक्ष कहाँ हैं?

बृहदश्व उवाच

श्लोक 100 (3.61.100)

इत्येवं नरशार्दूल विस्मिता कमलेक्षणा । ध्यात्वा चिरं भीमसुता दमयन्ती शुचिस्मिता । भर्तृशोकपरा दीना विवर्णवदनाऽभवत् ॥

ityevaṃ naraśārdūla vismitā kamalekṣaṇā | dhyātvā ciraṃ bhīmasutā damayantī śucismitā | bhartṛśokaparā dīnā vivarṇavadanā'bhavat

हे नरशार्दूल, इस प्रकार विस्मित हुई वह कमलनयनी, मधुर मुस्कान वाली भीमपुत्री दमयन्ती बहुत देर तक सोचती रही; फिर पति के शोक में डूबकर वह दीन हो गई और उसके मुख का रंग उतर गया।

श्लोक 101 (3.61.101)

सा गत्वाऽथापरां भूमिं बाष्पसंदिग्धया गिरा । विललापाश्रुपूर्णाक्षी दृष्ट्वाऽशोकतरुं ततः ॥

sā gatvā'thāparāṃ bhūmiṃ bāṣpasaṃdigdhayā girā | vilalāpāśrupūrṇākṣī dṛṣṭvā'śokataruṃ tataḥ

फिर दूसरे स्थान पर जाकर, आँसुओं से भरी आँखों वाली उसने एक अशोक वृक्ष देखा और आँसुओं से रुँधी वाणी में विलाप करने लगी।

श्लोक 102 (3.61.102)

उपगम्य तरुश्रेष्ठमशोकं पुष्पितं वने । पल्लवापीडितं हृद्यं विहङ्गैरनुनादितम् ॥

upagamya taruśreṣṭhamaśokaṃ puṣpitaṃ vane | pallavāpīḍitaṃ hṛdyaṃ vihaṅgairanunāditam

वह वन में खिले हुए उस श्रेष्ठ वृक्ष अशोक के पास गई, जो नये पत्तों से अलंकृत, मनोहर और पक्षियों के कलरव से गूँजता था।

दमयन्त्युवाच

श्लोक 103 (3.61.103)

अहो बतायमगमः श्रीमानस्मिन्वनान्तरे । आपीडैर्बहुभिर्भाति श्रीमान्पर्वतराडिव ॥

aho batāyamagamaḥ śrīmānasminvanāntare | āpīḍairbahubhirbhāti śrīmānparvatarāḍiva

अहा, वन के भीतर यह वृक्ष कितना शोभायमान है! अनेक पुष्प-मुकुटों से यह किसी शोभायमान पर्वतराज के समान चमक रहा है।

श्लोक 104 (3.61.104)

विशोकां कुरु मां क्षिप्रमशोक प्रियदर्शन । वीतशोकभयाबाधं कच्चित्त्वं दृष्टवान्नृपम् ॥

viśokāṃ kuru māṃ kṣipramaśoka priyadarśana | vītaśokabhayābādhaṃ kaccittvaṃ dṛṣṭavānnṛpam

हे प्रियदर्शन अशोक, मुझे शीघ्र शोकरहित कर दो! क्या तुमने शोक, भय और बाधा से रहित राजा को देखा है?

श्लोक 105 (3.61.105)

नलं नामारिदमनं दमयन्त्याः प्रियं पतिम् । निषधानामधिपतिं दृष्टवानसि मे प्रियम् ॥

nalaṃ nāmāridamanaṃ damayantyāḥ priyaṃ patim | niṣadhānāmadhipatiṃ dṛṣṭavānasi me priyam

क्या तुमने शत्रुओं का दमन करने वाले नल को, दमयन्ती के प्रिय पति, निषधों के अधिपति, मेरे प्रियतम को देखा है?

श्लोक 106 (3.61.106)

एकवस्त्रार्धसंवीतं सुकुमारतनुत्वचम् । व्यसनेनार्दितं वीरमरण्यमिदमागतम् ॥

ekavastrārdhasaṃvītaṃ sukumāratanutvacam | vyasanenārditaṃ vīramaraṇyamidamāgatam

एक ही वस्त्र के आधे भाग में लिपटे, कोमल शरीर और त्वचा वाले, संकट से पीड़ित उस वीर को, जो इस वन में आए हैं?

श्लोक 107 (3.61.107)

यथा विशोका गच्छेयमशोकनग तत्कुरु । सत्यनामा भवाशोक मम शोकविनाशनात् ॥

yathā viśokā gaccheyamaśokanaga tatkuru | satyanāmā bhavāśoka mama śokavināśanāt

हे अशोक वृक्ष, ऐसा करो कि मैं शोकरहित होकर यहाँ से जाऊँ। हे अशोक, मेरे शोक का नाश करके अपना नाम सार्थक करो।

बृहदश्व उवाच

श्लोक 108 (3.61.108)

एवं साऽशोकवृक्षं तमार्ता वै परिगम्य ह । जगाम दारुणतरं देशं भैमी वराङ्गना ॥

evaṃ sā'śokavṛkṣaṃ tamārtā vai parigamya ha | jagāma dāruṇataraṃ deśaṃ bhaimī varāṅganā

इस प्रकार दुःखी, सुन्दर भैमी ने उस अशोक वृक्ष की परिक्रमा की और फिर एक और भी भयानक प्रदेश में चली गई।

श्लोक 109 (3.61.109)

सा ददर्श नगान्नैकान्नैकाश्च सरितस्तथा । नैकांश्च पर्वतान्रम्यान्नैकांश्च मृगपक्षिणः ॥

sā dadarśa nagānnaikānnaikāśca saritastathā | naikāṃśca parvatānramyānnaikāṃśca mṛgapakṣiṇaḥ

उसने अनेक वृक्ष, अनेक नदियाँ, अनेक रमणीय पर्वत और अनेक पशु-पक्षी देखे,

श्लोक 110 (3.61.110)

कन्दरांश्च नितम्बांश्च नदीश्चाद्भुतदर्शनाः । ददर्श तान्भीमसुता पतिमन्वेषती तदा ॥

kandarāṃśca nitambāṃśca nadīścādbhutadarśanāḥ | dadarśa tānbhīmasutā patimanveṣatī tadā

गुफाएँ, पर्वतों की ढलानें और अद्भुत दिखने वाली नदियाँ; पति को खोजती हुई भीमपुत्री ने ये सब देखे।

श्लोक 111 (3.61.111)

गत्वा प्रकृष्टमध्वानं दमयन्ती शुचिस्मिता । ददर्शाथ महासार्थं हस्त्यश्वरथसंकुलम् ॥

gatvā prakṛṣṭamadhvānaṃ damayantī śucismitā | dadarśātha mahāsārthaṃ hastyaśvarathasaṃkulam

बहुत लम्बा मार्ग तय करने के बाद मधुर मुस्कान वाली दमयन्ती ने हाथियों, घोड़ों और रथों से भरा एक बड़ा व्यापारी-दल देखा,

श्लोक 112 (3.61.112)

उत्तरन्तं नदीं रम्यां प्रसन्नसलिलां शुभाम् । सुशीततोयां विस्तीर्णां ह्रदिनीं वेतसैर्वृताम् ॥

uttarantaṃ nadīṃ ramyāṃ prasannasalilāṃ śubhām | suśītatoyāṃ vistīrṇāṃ hradinīṃ vetasairvṛtām

जो एक रमणीय नदी को पार कर रहा था; वह नदी स्वच्छ जल वाली, सुन्दर, चौड़ी, अत्यन्त शीतल जल वाली, गहरे कुण्डों से युक्त और बेंत की झाड़ियों से घिरी थी,

श्लोक 113 (3.61.113)

प्रोद्घुष्टां क्रौञ्चकुररैश्चक्रवाकोपकूजिताम् । कूर्मग्राहझषाकीर्णां विपुलद्वीपशोभिताम् ॥

prodghuṣṭāṃ krauñcakuraraiścakravākopakūjitām | kūrmagrāhajhaṣākīrṇāṃ vipuladvīpaśobhitām

वह क्रौञ्च और कुरर पक्षियों के स्वर से गूँजती, चकवों के कूजन से भरी, कछुओं, ग्राहों और मछलियों से भरी और विशाल द्वीपों से सुशोभित थी।

श्लोक 114 (3.61.114)

सा दृष्ट्वैव महासार्थं नलपत्नी यशस्विनी । उपसर्प्य वरारोहा जनमध्यं विवेश ह ॥

sā dṛṣṭvaiva mahāsārthaṃ nalapatnī yaśasvinī | upasarpya varārohā janamadhyaṃ viveśa ha

उस बड़े दल को देखते ही नल की यशस्विनी, सुन्दर पत्नी उसके पास गई और लोगों के बीच जा पहुँची।

श्लोक 115 (3.61.115)

उन्मत्तरूपा शोकार्ता तथा वस्त्रार्धसंवृता । कृशा विवर्णा मलिना पांसुध्वस्तशिरोरुहा ॥

unmattarūpā śokārtā tathā vastrārdhasaṃvṛtā | kṛśā vivarṇā malinā pāṃsudhvastaśiroruhā

वह पागल-सी दिख रही थी, शोक से पीड़ित, आधे वस्त्र से ढकी, दुबली, फीकी और मलिन; उसके केश बिखरे और धूल से भरे थे।

श्लोक 116 (3.61.116)

तां दृष्ट्वा तत्र मनुजाः केचिद्भीताः प्रदुद्रुवुः । केचिच्चिन्तापरास्तस्थुः केचित्तत्र विचुक्रुशुः ॥

tāṃ dṛṣṭvā tatra manujāḥ kecidbhītāḥ pradudruvuḥ | keciccintāparāstasthuḥ kecittatra vicukruśuḥ

उसे देखकर वहाँ कुछ लोग डरकर भाग गए, कुछ चिन्ता में पड़े खड़े रह गए, और कुछ चिल्लाने लगे।

श्लोक 117 (3.61.117)

प्रहसन्ति स्म तां केचिदभ्यसूयन्ति चापरे । कुर्वन्त्यस्यां दयां केचित्पप्रच्छुश्चापि भारत ॥

prahasanti sma tāṃ kecidabhyasūyanti cāpare | kurvantyasyāṃ dayāṃ kecitpapracchuścāpi bhārata

हे भारत, कुछ उसकी हँसी उड़ाने लगे, कुछ उसकी निन्दा करने लगे, और कुछ ने उस पर दया करके उससे पूछा:

सार्थिका ऊचुः

श्लोक 118 (3.61.118)

काऽसि कस्यासि कल्याणि किं वा मृगयसे वने । त्वां दृष्ट्वा व्यथिताः स्मेह कच्चित्त्वमसि मानुषी ॥

kā'si kasyāsi kalyāṇi kiṃ vā mṛgayase vane | tvāṃ dṛṣṭvā vyathitāḥ smeha kaccittvamasi mānuṣī

हे कल्याणी, तुम कौन हो, किसकी हो? वन में क्या खोज रही हो? तुम्हें देखकर हम यहाँ घबरा गए हैं। क्या तुम मानवी हो?

श्लोक 119 (3.61.119)

वद सत्यं वनस्यास्य पर्वतस्याथवा दिशः । देवता त्वं हि कल्याणि त्वां वयं शरणं गताः ॥

vada satyaṃ vanasyāsya parvatasyāthavā diśaḥ | devatā tvaṃ hi kalyāṇi tvāṃ vayaṃ śaraṇaṃ gatāḥ

सच बताओ, क्या तुम इस वन की, इस पर्वत की या दिशाओं की देवी हो? हे कल्याणी, हम तुम्हारी शरण में आए हैं।

श्लोक 120 (3.61.120)

यक्षी वा राक्षसी वा त्वमुताहोऽसि सुराङ्गना । सर्वथा कुरु नः स्वस्ति रक्ष चास्माननिन्दिते ॥

yakṣī vā rākṣasī vā tvamutāho'si surāṅganā | sarvathā kuru naḥ svasti rakṣa cāsmānanindite

तुम यक्षिणी हो या राक्षसी, या फिर कोई देवांगना? जो भी हो, हमारा कल्याण करो और हमारी रक्षा करो, हे अनिन्दिते।

श्लोक 121 (3.61.121)

यथाऽयं सर्वथा सार्थः क्षेमी शीघ्रमितो व्रजेत् । तथा विधत्स्व कल्याणि यथा श्रेयो हि नो भवेत् ॥

yathā'yaṃ sarvathā sārthaḥ kṣemī śīghramito vrajet | tathā vidhatsva kalyāṇi yathā śreyo hi no bhavet

हे कल्याणी, ऐसा उपाय करो कि यह दल हर प्रकार से सकुशल शीघ्र यहाँ से आगे बढ़ जाए, और हमारा भला हो।

बृहदश्व उवाच

श्लोक 122 (3.61.122)

तथोक्ता तेन सार्थेन दमयन्ती नृपात्मजा । प्रत्युवाच ततः साध्वी भर्तृव्यसनपीडिता ॥

tathoktā tena sārthena damayantī nṛpātmajā | pratyuvāca tataḥ sādhvī bhartṛvyasanapīḍitā

उस दल के ऐसा कहने पर पति के संकट से पीड़ित साध्वी राजकुमारी दमयन्ती ने उत्तर दिया:

दमयन्त्युवाच

श्लोक 123 (3.61.123)

सार्थवाहं च सार्थं च जना ये चात्र केचन । युवस्थविरबालाश्च सार्थस्य च पुरोगमाः ॥

sārthavāhaṃ ca sārthaṃ ca janā ye cātra kecana | yuvasthavirabālāśca sārthasya ca purogamāḥ

हे सार्थवाह, हे यात्रीदल, और यहाँ जो भी लोग हैं, युवा, वृद्ध और बालक, तथा दल के आगे चलने वाले,

श्लोक 124 (3.61.124)

मानुषीं मां विजानीत मनुजाधिपतेः सुताम् । नृपस्नुषां राजभार्यां भर्तृदर्शनलालसाम् ॥

mānuṣīṃ māṃ vijānīta manujādhipateḥ sutām | nṛpasnuṣāṃ rājabhāryāṃ bhartṛdarśanalālasām

मुझे मानवी जानिए, एक राजा की पुत्री, एक राजा की पुत्रवधू और एक राजा की पत्नी, जो अपने पति के दर्शन को लालायित है।

श्लोक 125 (3.61.125)

विदर्भराण्मम पिता भर्ता राजा च नैषधः । नलो नाम महाभागस्तं मार्गाम्यपराजितम् ॥

vidarbharāṇmama pitā bhartā rājā ca naiṣadhaḥ | nalo nāma mahābhāgastaṃ mārgāmyaparājitam

विदर्भराज मेरे पिता हैं, और मेरे पति निषधराज महाभाग नल हैं। उन्हीं अपराजित को मैं खोज रही हूँ।

श्लोक 126 (3.61.126)

यदि जानीत नृपतिं क्षिप्रं शंसत मे प्रियम् । नलं पुरुषशार्दूलममित्रगणसूदनम् ॥

yadi jānīta nṛpatiṃ kṣipraṃ śaṃsata me priyam | nalaṃ puruṣaśārdūlamamitragaṇasūdanam

यदि आप राजा को जानते हों तो मुझे शीघ्र मेरे प्रियतम के बारे में बताइए, पुरुषसिंह, शत्रुसमूहों का संहार करने वाले नल के बारे में।

बृहदश्व उवाच

श्लोक 127 (3.61.127)

तामुवाचानवद्याङ्गीं सार्थस्य महतः प्रभुः । सार्थवाहः शुचिर्नाम शृणु कल्याणि मद्वचः ॥

tāmuvācānavadyāṅgīṃ sārthasya mahataḥ prabhuḥ | sārthavāhaḥ śucirnāma śṛṇu kalyāṇi madvacaḥ

उस बड़े दल के स्वामी, शुचि नाम के सार्थवाह ने उस सर्वांगसुन्दरी से कहा, "हे कल्याणी, मेरी बात सुनो।"

सार्थवाह उवाच

श्लोक 128 (3.61.128)

अहं सार्थस्य नेता वै सार्थवाहः शुचिस्मिते । मनुष्यं नलनामानं न पश्यामि यशस्विनि ॥

ahaṃ sārthasya netā vai sārthavāhaḥ śucismite | manuṣyaṃ nalanāmānaṃ na paśyāmi yaśasvini

हे शुचिस्मिते, मैं इस दल का नेता, सार्थवाह हूँ। हे यशस्विनी, मैंने नल नाम के किसी मनुष्य को नहीं देखा।

श्लोक 129 (3.61.129)

कुञ्जरद्वीपिमहिषशार्दूलर्क्षमृगानपि । पश्याम्यस्मिन्वने कृत्स्ने ह्यमनुष्यनिषेविते ॥

kuñjaradvīpimahiṣaśārdūlarkṣamṛgānapi | paśyāmyasminvane kṛtsne hyamanuṣyaniṣevite

इस पूरे वन में, जहाँ मनुष्य नहीं रहते, मैं हाथी, चीते, भैंसे, बाघ, रीछ और मृग तो देखता हूँ;

श्लोक 130 (3.61.130)

ऋते त्वां मानुषीं मर्त्यं न पश्यामि महावने । तथा नो यक्षराडद्य मणिभद्रः प्रसीदतु ॥

ṛte tvāṃ mānuṣīṃ martyaṃ na paśyāmi mahāvane | tathā no yakṣarāḍadya maṇibhadraḥ prasīdatu

पर तुम्हें छोड़कर, जो मानवी हो, मुझे इस महावन में कोई मनुष्य नहीं दिखता। इसलिए यक्षराज मणिभद्र आज हम पर प्रसन्न हों।

बृहदश्व उवाच

श्लोक 131 (3.61.131)

साऽब्रवीद्वणिजः सर्वान्सार्थवाहं च तं ततः । क्व नु यास्यति सार्थोऽयमेतदाख्यातुमर्हसि ॥

sā'bravīdvaṇijaḥ sarvānsārthavāhaṃ ca taṃ tataḥ | kva nu yāsyati sārtho'yametadākhyātumarhasi

तब उसने सब व्यापारियों से और उस सार्थवाह से कहा, "यह दल कहाँ जाएगा? कृपया यह बताइए।"

सार्थवाह उवाच

श्लोक 132 (3.61.132)

सार्थोऽयं चेदिराजस्य सुबाहोः सत्यदर्शिनः । क्षिप्रं जनपदं गन्ता लाभाय मनुजात्मजे ॥

sārtho'yaṃ cedirājasya subāhoḥ satyadarśinaḥ | kṣipraṃ janapadaṃ gantā lābhāya manujātmaje

हे मानवपुत्री, यह दल व्यापार के लिए शीघ्र ही सत्यदर्शी चेदिराज सुबाहु के देश को जाएगा।

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