आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 62
सार्थ का विनाश और चेदि नगर में दमयन्ती
दमयन्ती व्यापारियों के सार्थ के साथ आगे बढ़ती है। आधी रात को, जब सार्थ एक कमल-सरोवर के किनारे सो रहा होता है, जंगली हाथियों का झुंड उसे रौंद डालता है; बचे हुए लोग अपने साथ आई उस अनोखी स्त्री को दोषी ठहराते हैं, और दमयन्ती यह विलाप करती हुई भाग जाती है कि किसी पूर्वजन्म के पाप ने, या स्वयंवर में ठुकराए गए देवताओं के कोप ने, उस पर यह विपत्ति डाली है। कुछ बचे हुए ब्राह्मणों के साथ वह चेदिराज सुबाहु के नगर पहुँचती है, जहाँ राजमाता उसे आश्रय देती हैं। स्वयं को सैरन्ध्री बताकर दमयन्ती अपनी कथा कहती है, कड़ी शर्तों पर रहना स्वीकार करती है, और राजकुमारी सुनन्दा के साथ रहती हुई निरन्तर नल का चिन्तन करती है।
बृहदश्व उवाच
श्लोक 1 (3.62.1)
सा तच्छ्रुत्वाऽनवद्याङ्गी सार्थवाहवचस्तदा । जगाम सह तेनैव सार्थेन पतिलालसा ॥
sā tacchrutvā'navadyāṅgī sārthavāhavacastadā | jagāma saha tenaiva sārthena patilālasā
सार्थ के मुखिया की बात सुनकर निर्दोष अंगों वाली दमयन्ती पति से मिलने की लालसा लिए उसी सार्थ के साथ चल पड़ी।
श्लोक 2 (3.62.2)
अथ काले बहुतिथे वने महति दारुणे । तटाकं सर्वतोभद्रं पद्मसौगन्धिकायुतम् ॥
atha kāle bahutithe vane mahati dāruṇe | taṭākaṃ sarvatobhadraṃ padmasaugandhikāyutam
फिर बहुत दिनों के बाद, एक विशाल और भयानक वन में, व्यापारियों को एक सरोवर दिखाई दिया, जो चारों ओर से सुन्दर था और कमलों तथा सुगन्धित कुमुदों से भरा था,
श्लोक 3 (3.62.3)
ददृशुर्वणिजो रम्यं प्रभूतयवसेन्धनम् । बहुमूलफलोपेतं नानापक्षिनिषेवितम् ॥
dadṛśurvaṇijo ramyaṃ prabhūtayavasendhanam | bahumūlaphalopetaṃ nānāpakṣiniṣevitam
वह मनोहर स्थान घास और ईंधन से भरपूर था, कन्द-मूल और फलों से सम्पन्न था, और वहाँ अनेक प्रकार के पक्षी रहते थे।
श्लोक 4 (3.62.4)
तं दृष्ट्वा मृष्टसलिलं मनोहारि सुशीतलम् । सुपरिश्रान्तवाहास्ते निवेशाय मनो दधुः ॥
taṃ dṛṣṭvā mṛṣṭasalilaṃ manohāri suśītalam | supariśrāntavāhāste niveśāya mano dadhuḥ
उसका स्वच्छ, मनोहर और शीतल जल देखकर, जिनके वाहन-पशु बुरी तरह थक चुके थे, उन व्यापारियों ने वहीं डेरा डालने का निश्चय किया।
श्लोक 5 (3.62.5)
संमते सार्थवाहस्य विविशुर्वनमुत्तमम् । उवास सार्थः सुमहान्निशामासाद्य पद्मिनीम् ॥
saṃmate sārthavāhasya viviśurvanamuttamam | uvāsa sārthaḥ sumahānniśāmāsādya padminīm
सार्थ के मुखिया की अनुमति से वे उस उत्तम वन में प्रविष्ट हुए, और वह विशाल सार्थ कमल-सरोवर के पास पहुँचकर रात भर के लिए वहीं ठहर गया।
श्लोक 6 (3.62.6)
अथार्धरात्रसमये निःशब्दे तिमिरे तदा । सुप्ते सार्थे परिश्रान्ते हस्तियूथमुपागमत् । पानीयार्थं गिरितटान्मदप्रस्रवणाविलम् ॥
athārdharātrasamaye niḥśabde timire tadā | supte sārthe pariśrānte hastiyūthamupāgamat | pānīyārthaṃ giritaṭānmadaprasravaṇāvilam
तब आधी रात के समय, जब चारों ओर सन्नाटा और अँधेरा था और थका हुआ सार्थ सो रहा था, मद की धारा से मलिन हाथियों का एक झुंड जल पीने के लिए पर्वत की ढलान से उतर आया।
श्लोक 7 (3.62.7)
अथापश्यत सार्थं तं सार्थजान्सुबहून्गजान् ॥
athāpaśyata sārthaṃ taṃ sārthajānsubahūngajān
उस झुंड ने सार्थ को और उसके बहुत-से हाथियों को देखा।
श्लोक 8 (3.62.8)
ते तान्ग्राम्यगजान्दृष्ट्वा सर्वे वनगजास्तदा । समाद्रवन्त वेगेन जिघांसन्तो मदोत्कटाः ॥
te tāngrāmyagajāndṛṣṭvā sarve vanagajāstadā | samādravanta vegena jighāṃsanto madotkaṭāḥ
उन पालतू हाथियों को देखकर सारे जंगली हाथी, मद से उन्मत्त होकर, उन्हें मार डालने की इच्छा से वेग से उन पर टूट पड़े।
श्लोक 9 (3.62.9)
तेषामापततां वेगः करिणां दुःसहोऽभवत् । नगाग्रादिव शीर्णानां शृङ्गाणां पततां क्षितौ । स्पन्दतामपि नागानां मार्गा नष्टा वनोद्भवाः ॥
teṣāmāpatatāṃ vegaḥ kariṇāṃ duḥsaho'bhavat | nagāgrādiva śīrṇānāṃ śṛṅgāṇāṃ patatāṃ kṣitau | spandatāmapi nāgānāṃ mārgā naṣṭā vanodbhavāḥ
उन झपटते हाथियों का वेग असहनीय था, मानो पर्वत की चोटी से टूटकर शिखर धरती पर गिर रहे हों; हाथियों के आगे बढ़ते ही वन के मार्ग मिट गए।
श्लोक 10 (3.62.10)
मार्गं संरुध्य संसुप्तं पद्मिन्याः सार्थमुत्तमम् । ते तं ममर्दुः सहसा वेष्टमानं महीतले ॥
mārgaṃ saṃrudhya saṃsuptaṃ padminyāḥ sārthamuttamam | te taṃ mamarduḥ sahasā veṣṭamānaṃ mahītale
मार्ग रोककर वे कमल-सरोवर के पास सोए उस उत्तम सार्थ पर अचानक टूट पड़े और धरती पर छटपटाते हुए उसे रौंद डाला।
श्लोक 11 (3.62.11)
महारवं प्रमुञ्चन्तो वध्यन्ते शरणार्थिनः । वनगुल्मांश्च धावन्तो निद्रया महतो भयात् ॥
mahāravaṃ pramuñcanto vadhyante śaraṇārthinaḥ | vanagulmāṃśca dhāvanto nidrayā mahato bhayāt
ज़ोर-ज़ोर से चीखते, शरण खोजते लोग मारे जाने लगे; कुछ नींद से अचेत और महान भय से व्याकुल होकर झाड़ियों की ओर भागे।
श्लोक 12 (3.62.12)
केचिद्दन्तैः करैः केचित्केचित्पद्भ्यां हता गजैः ॥
keciddantaiḥ karaiḥ kecitkecitpadbhyāṃ hatā gajaiḥ
कुछ हाथियों के दाँतों से, कुछ उनकी सूँड़ों से और कुछ उनके पैरों से मारे गए।
श्लोक 13 (3.62.13)
निहतोष्ट्राश्वबहुलाः पदातिजनसंकुलाः । भयादाधावमानाश्च परस्परहतास्तदा ॥
nihatoṣṭrāśvabahulāḥ padātijanasaṃkulāḥ | bhayādādhāvamānāśca parasparahatāstadā
बहुत-से ऊँट और घोड़े मारे गए, और पैदल लोगों की भीड़ भय से इधर-उधर भागती हुई आपस में ही एक-दूसरे को मारने लगी।
श्लोक 14 (3.62.14)
घोरान्नादान्विमुञ्चन्तो निपेतुर्धरणीतले । वृक्षेष्वासज्यसंभग्नाः पतिता विषमेषु च ॥
ghorānnādānvimuñcanto nipeturdharaṇītale | vṛkṣeṣvāsajyasaṃbhagnāḥ patitā viṣameṣu ca
भयानक चीत्कार करते हुए वे धरती पर गिर पड़े; कुछ पेड़ों में फँसकर कुचल गए, और कुछ ऊबड़-खाबड़ गड्ढों में जा गिरे।
श्लोक 15 (3.62.15)
एवंप्रकारैर्बहुभिर्दैवेनाक्रम्य हस्तिभिः । राजन्विनिहतं सर्वं समृद्धं सार्थमण्डलम् ॥
evaṃprakārairbahubhirdaivenākramya hastibhiḥ | rājanvinihataṃ sarvaṃ samṛddhaṃ sārthamaṇḍalam
हे राजन्, इस प्रकार अनेक ढंगों से, दैववश आक्रमण करके उन हाथियों ने सार्थ के उस समृद्ध समूह का पूरी तरह विनाश कर दिया।
श्लोक 16 (3.62.16)
आरावः सुमहांश्चासीत्त्रैलोक्यभयकारकः । एषोऽग्निरुत्थितः कष्टस्त्रायध्वं धावताऽधुना ॥
ārāvaḥ sumahāṃścāsīttrailokyabhayakārakaḥ | eṣo'gnirutthitaḥ kaṣṭastrāyadhvaṃ dhāvatā'dhunā
ऐसा भीषण कोलाहल उठा जो तीनों लोकों को भयभीत कर दे — "यह आग भड़क उठी है, हाय विपत्ति! बचाओ! अब भागो!"
श्लोक 17 (3.62.17)
रत्नराशिर्विशीर्णोऽयं गृह्णीध्वं किं प्रधावत । सामान्यमेतद्द्रविणं न मिथ्या वचनं मम ॥
ratnarāśirviśīrṇo'yaṃ gṛhṇīdhvaṃ kiṃ pradhāvata | sāmānyametaddraviṇaṃ na mithyā vacanaṃ mama
"यह रत्नों का ढेर बिखर गया है — उठा लो! क्यों भाग रहे हो? यह धन सबका है, मेरी बात झूठी नहीं है!"
श्लोक 18 (3.62.18)
पुनरेवाभिधास्यामि चिन्तयध्वं सुकातराः । एवमेवाभिभाषन्तो विद्रवन्ति भयात्तदा ॥
punarevābhidhāsyāmi cintayadhvaṃ sukātarāḥ | evamevābhibhāṣanto vidravanti bhayāttadā
"मैं फिर कहता हूँ — सोचो, अरे डरपोको!" ऐसी बातें चिल्लाते हुए वे भय से भाग रहे थे।
श्लोक 19 (3.62.19)
तस्मिंस्तथा वर्तमाने दारुणे जनसंक्षये । दमयन्ती च बुबुधे भयसंत्रस्तमानसा । अपश्यद्वैशसं तत्र सर्वलोकभयंकरम् ॥
tasmiṃstathā vartamāne dāruṇe janasaṃkṣaye | damayantī ca bubudhe bhayasaṃtrastamānasā | apaśyadvaiśasaṃ tatra sarvalokabhayaṃkaram
जब वह भयंकर जनसंहार हो रहा था, तब दमयन्ती भी भय से काँपते मन के साथ जाग उठी और उसने वहाँ सारे संसार को भयभीत करने वाला वह संहार देखा।
श्लोक 20 (3.62.20)
अदृष्टपूर्वं तद्दृष्ट्वा बाला पद्मनिभेक्षणा । संसक्तवदनाश्वासा उत्तस्थौ भयविह्वला ॥
adṛṣṭapūrvaṃ taddṛṣṭvā bālā padmanibhekṣaṇā | saṃsaktavadanāśvāsā uttasthau bhayavihvalā
ऐसा दृश्य, जैसा उसने पहले कभी नहीं देखा था, देखकर वह कमल-नयनी युवती भय से विह्वल होकर उठ खड़ी हुई; उसकी साँस गले में अटक गई थी।
श्लोक 21 (3.62.21)
ये तु तत्र विनिर्मुक्ताः सार्थात्केचिदविक्षताः । तेऽब्रुवन्सहिताः सर्वे कस्येदं कर्मणः फलम् ॥
ye tu tatra vinirmuktāḥ sārthātkecidavikṣatāḥ | te'bruvansahitāḥ sarve kasyedaṃ karmaṇaḥ phalam
सार्थ के जो लोग बिना घायल हुए बच निकले थे, वे सब मिलकर कहने लगे — "यह किसके कर्म का फल है?"
सार्थिका ऊचुः
श्लोक 22 (3.62.22)
नूनं न पूजितोऽस्माभिर्मणिभद्रो महायशाः । तथा यक्षाधिपः श्रीमान्न वै वैश्रवणः प्रभुः ॥
nūnaṃ na pūjito'smābhirmaṇibhadro mahāyaśāḥ | tathā yakṣādhipaḥ śrīmānna vai vaiśravaṇaḥ prabhuḥ
"निश्चय ही हमने महायशस्वी मणिभद्र की पूजा नहीं की, और न ही यक्षों के स्वामी, श्रीमान् प्रभु वैश्रवण (कुबेर) की।"
श्लोक 23 (3.62.23)
न पूजा विघ्नकर्तॄणामथवा प्रथमं कृता ॥
na pūjā vighnakartṝṇāmathavā prathamaṃ kṛtā
"अथवा हमने पहले विघ्न डालने वाले देवताओं की पूजा नहीं की।"
श्लोक 24 (3.62.24)
शकुनानां फलं वाऽथ विपरीतमिदं ध्रुवम् । ग्रहा न विपरीतास्तु किमन्यदिदमागतम् ॥
śakunānāṃ phalaṃ vā'tha viparītamidaṃ dhruvam | grahā na viparītāstu kimanyadidamāgatam
"या निश्चय ही यह अपशकुनों का उलटा फल है। ग्रह तो प्रतिकूल नहीं हैं — फिर और क्या कारण है जो यह विपत्ति आ पड़ी?"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 25 (3.62.25)
अपरे त्वब्रुवन्दीना ज्ञातिद्रव्यविनाकृताः । याऽसावद्य महासार्थे नारी ह्युन्मत्तदर्शना ॥
apare tvabruvandīnā jñātidravyavinākṛtāḥ | yā'sāvadya mahāsārthe nārī hyunmattadarśanā
दूसरे लोग, जो अपने स्वजनों और धन से वंचित होकर दीन हो गए थे, बोले — "वह स्त्री जो आज हमारे इस बड़े सार्थ में पागल-सी दिखती हुई आई थी —"
सार्थिका ऊचुः
श्लोक 26 (3.62.26)
प्रविष्टा विकृताकारा कृत्वा रूपममानुषम् । तयैवं विहिता पूर्वं माया परमदारुणा ॥
praviṣṭā vikṛtākārā kṛtvā rūpamamānuṣam | tayaivaṃ vihitā pūrvaṃ māyā paramadāruṇā
"वह विकृत रूप में, अमानवीय आकार धारण करके भीतर आई थी। उसी ने पहले से यह अत्यन्त भयानक माया रची थी।"
श्लोक 27 (3.62.27)
राक्षसी वा ध्रुवं यक्षी पिशाची वा भयंकरी । तस्याः सर्वमिदं पापं नात्र कार्या विचारणा ॥
rākṣasī vā dhruvaṃ yakṣī piśācī vā bhayaṃkarī | tasyāḥ sarvamidaṃ pāpaṃ nātra kāryā vicāraṇā
"वह निश्चय ही कोई राक्षसी, यक्षिणी या भयंकर पिशाचिनी है। यह सारा पाप उसी का है, इसमें कुछ सोचने की बात नहीं।"
श्लोक 28 (3.62.28)
यदि पश्याम तां पापां सार्थघ्नीं नैकदुःखदाम् । लोष्टभिः पांसुभिश्चैव तृणैः काष्ठैश्च मुष्टिभिः । अवश्यमेव हन्यामः सार्थस्य किल कृत्यकाम् ॥
yadi paśyāma tāṃ pāpāṃ sārthaghnīṃ naikaduḥkhadām | loṣṭabhiḥ pāṃsubhiścaiva tṛṇaiḥ kāṣṭhaiśca muṣṭibhiḥ | avaśyameva hanyāmaḥ sārthasya kila kṛtyakām
"यदि हम उस पापिनी को, सार्थ का नाश करने वाली और अनेक दुःख देने वाली को देख लें, तो ढेलों, धूल, तिनकों, लकड़ियों और मुक्कों से अवश्य ही उसे मार डालेंगे — वही इस सार्थ की कृत्या है!"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 29 (3.62.29)
दमयन्ती तु तच्छ्रुत्वा वाक्यं तेषां सुदारुणम् । ह्रीता भीता च संविग्ना प्राद्रवद्यत्र काननम् ॥
damayantī tu tacchrutvā vākyaṃ teṣāṃ sudāruṇam | hrītā bhītā ca saṃvignā prādravadyatra kānanam
उनकी यह अत्यन्त कठोर बात सुनकर दमयन्ती लज्जित, भयभीत और व्याकुल होकर वन की ओर भाग गई,
श्लोक 30 (3.62.30)
आशङ्कमाना तत्पापमात्मानं पर्यदेवयत् ॥
āśaṅkamānā tatpāpamātmānaṃ paryadevayat
और यह आशंका करती हुई कि वह पाप उसी का है, वह अपने ऊपर विलाप करने लगी —
दमयन्त्युवाच
श्लोक 31 (3.62.31)
अहो ममोपरि विधेः संरम्भो दारुणो महान् । नानुबध्नाति कुशलं कस्येदं कर्मणः फलम् ॥
aho mamopari vidheḥ saṃrambho dāruṇo mahān | nānubadhnāti kuśalaṃ kasyedaṃ karmaṇaḥ phalam
"हाय, मुझ पर विधाता का कितना बड़ा और कठोर कोप है! कोई भी शुभ मेरे साथ नहीं टिकता। यह किसके कर्म का फल है?"
श्लोक 32 (3.62.32)
न स्मराम्यशुभं किंचित्कृतं कस्यचिदण्वपि । कर्मणा मनसा वाचा कस्येदं कर्मणः फलम् ॥
na smarāmyaśubhaṃ kiṃcitkṛtaṃ kasyacidaṇvapi | karmaṇā manasā vācā kasyedaṃ karmaṇaḥ phalam
"मुझे याद नहीं कि मैंने कर्म, मन या वाणी से किसी का ज़रा-सा भी अहित किया हो। फिर यह किसके कर्म का फल है?"
श्लोक 33 (3.62.33)
नूनं जन्मान्तरकृतं पापं माऽऽपतितं महत् । अपश्चिमामिमां कष्टामापदं प्राप्तवत्यहम् ॥
nūnaṃ janmāntarakṛtaṃ pāpaṃ mā''patitaṃ mahat | apaścimāmimāṃ kaṣṭāmāpadaṃ prāptavatyaham
"निश्चय ही किसी दूसरे जन्म में किया गया कोई बड़ा पाप मुझ पर आ पड़ा है, जिससे मुझे यह चरम और कठोर विपत्ति मिली है —"
श्लोक 34 (3.62.34)
भर्तृराज्यापहरणं स्वजनाच्च पराजयः । भर्त्रा सह वियोगश्च तनयाभ्यां च विच्युतिः । निर्नाथता वने वासो बहुव्यालनिषेविते ॥
bhartṛrājyāpaharaṇaṃ svajanācca parājayaḥ | bhartrā saha viyogaśca tanayābhyāṃ ca vicyutiḥ | nirnāthatā vane vāso bahuvyālaniṣevite
"पति के राज्य का छिन जाना, अपने ही स्वजन के हाथों उनकी पराजय, पति से बिछोह, दोनों सन्तानों से विछोह, अनाथ हो जाना और हिंसक पशुओं से भरे वन में रहना।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 35 (3.62.35)
अथापरेद्युः संप्राप्ते हतशिष्टा जनास्तदा । वनगुल्माद्विनिष्क्रम्य शोचन्ते वैशसं कृतम् । भ्रातरं पितरं पुत्रं सखायं च नराधिप ॥
athāparedyuḥ saṃprāpte hataśiṣṭā janāstadā | vanagulmādviniṣkramya śocante vaiśasaṃ kṛtam | bhrātaraṃ pitaraṃ putraṃ sakhāyaṃ ca narādhipa
फिर अगले दिन, जो लोग बच गए थे वे झाड़ियों से निकलकर उस संहार पर शोक करने लगे — हे नराधिप, किसी ने भाई के लिए, किसी ने पिता, पुत्र या मित्र के लिए।
श्लोक 36 (3.62.36)
हन्यमाने तदा सार्थे दमयन्ती शुचिस्मिता । ब्राह्मणैः सहिता तत्रवने तु न विनाशिता ॥
hanyamāne tadā sārthe damayantī śucismitā | brāhmaṇaiḥ sahitā tatravane tu na vināśitā
जब सार्थ का विनाश हो रहा था, तब वहाँ वन में ब्राह्मणों के साथ रहने वाली मधुर मुस्कान वाली दमयन्ती नहीं मारी गई।
श्लोक 37 (3.62.37)
अशोचत्तत्र वैदर्भी किंनु मे दुष्कृतं कृतम् । योऽपि मे निर्जनेऽरण्ये संप्राप्तोऽयं जनार्णवः ॥
aśocattatra vaidarbhī kiṃnu me duṣkṛtaṃ kṛtam | yo'pi me nirjane'raṇye saṃprāpto'yaṃ janārṇavaḥ
विदर्भकुमारी वहाँ शोक करने लगी — "मैंने ऐसा कौन-सा दुष्कर्म किया है? निर्जन वन में मुझे जो यह जनसमूह मिला था, वह भी"
दमयन्त्युवाच
श्लोक 38 (3.62.38)
स हतो हस्तियूथेन मन्दभाग्यान्ममैव तत् । प्राप्तव्यं सुचिरं दुःखं नूनमद्यापि वै मया ॥
sa hato hastiyūthena mandabhāgyānmamaiva tat | prāptavyaṃ suciraṃ duḥkhaṃ nūnamadyāpi vai mayā
"हाथियों के झुंड ने नष्ट कर दिया — और वह भी मेरे ही दुर्भाग्य से। निश्चय ही अभी मुझे बहुत समय तक दुःख भोगना है।"
श्लोक 39 (3.62.39)
नाप्राप्तकालो म्रियते श्रुतं वृद्धानुशासनम् । या नाहमद्य मृदिता हस्तियूथेन दुःखिता ॥
nāprāptakālo mriyate śrutaṃ vṛddhānuśāsanam | yā nāhamadya mṛditā hastiyūthena duḥkhitā
"जिसका समय नहीं आया, वह नहीं मरता — यह मैंने वृद्धों के उपदेश में सुना है — तभी तो मैं अभागिनी आज हाथियों के झुंड से कुचली नहीं गई।"
श्लोक 40 (3.62.40)
न ह्यदैवकृतंकिंचिन्नराणामिह विद्यते । न च मे बालभावेऽपि किंचित्पापकृतं कृतम् ॥
na hyadaivakṛtaṃkiṃcinnarāṇāmiha vidyate | na ca me bālabhāve'pi kiṃcitpāpakṛtaṃ kṛtam
"इस संसार में मनुष्यों के साथ ऐसा कुछ नहीं होता जो दैव का किया न हो। फिर भी मैंने बचपन में भी कोई पाप-कर्म नहीं किया,"
श्लोक 41 (3.62.41)
कर्मणा मनसा वाचा यदिदं दुःखमागतम् । मन्ये स्वयंवरकृते लोकपालाः समागताः ॥
karmaṇā manasā vācā yadidaṃ duḥkhamāgatam | manye svayaṃvarakṛte lokapālāḥ samāgatāḥ
"न कर्म से, न मन से, न वाणी से, जिसके कारण यह दुःख मुझ पर आता। मुझे लगता है कि मेरे स्वयंवर के लिए जो लोकपाल आए थे —"
श्लोक 42 (3.62.42)
प्रत्याख्याता मया तत्र नलस्यार्थाय देवताः । नूनं तेषां प्रभावेन वियोगं प्राप्तवत्यहम् ॥
pratyākhyātā mayā tatra nalasyārthāya devatāḥ | nūnaṃ teṣāṃ prabhāvena viyogaṃ prāptavatyaham
"वे देवता जिन्हें मैंने वहाँ नल के लिए ठुकरा दिया था — निश्चय ही उन्हीं के प्रभाव से मुझे यह वियोग मिला है।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 43 (3.62.43)
एवमादीनि दुःखार्ता सा विलप्य वराङ्गना । प्रलापानि तदा तानि दमयन्ती पतिव्रता ॥
evamādīni duḥkhārtā sā vilapya varāṅganā | pralāpāni tadā tāni damayantī pativratā
इस प्रकार और ऐसी ही अनेक बातें कहकर विलाप करती हुई, दुःख से पीड़ित वह सुन्दरी पतिव्रता दमयन्ती अपना शोक प्रकट करती रही,
श्लोक 44 (3.62.44)
हतशेषैः सह तदा ब्राह्मणैर्वेदपारगैः । अगच्छद्राजशार्दूल दुःखशोकपरायणा ॥
hataśeṣaiḥ saha tadā brāhmaṇairvedapāragaiḥ | agacchadrājaśārdūla duḥkhaśokaparāyaṇā
और फिर, हे राजसिंह, दुःख और शोक में डूबी वह बचे हुए वेदपारंगत ब्राह्मणों के साथ आगे चल पड़ी।
श्लोक 45 (3.62.45)
गच्छन्ती सा चिराद्बाला पुरमासादयन्महत् । सायाह्नि चेदिराजस्य सुबाहोः सत्यवादिनः ॥
gacchantī sā cirādbālā puramāsādayanmahat | sāyāhni cedirājasya subāhoḥ satyavādinaḥ
चलते-चलते बहुत समय के बाद वह युवती एक सन्ध्या को चेदि देश के सत्यवादी राजा सुबाहु के विशाल नगर में पहुँची।
श्लोक 46 (3.62.46)
सा तु तच्चारुसर्वाङ्गी सुबाहोस्तुङ्गगोपुरम् । वस्त्रार्धेन च संवीता प्रविवेश पुरोत्तमम् ॥
sā tu taccārusarvāṅgī subāhostuṅgagopuram | vastrārdhena ca saṃvītā praviveśa purottamam
आधे वस्त्र में लिपटी वह सर्वांगसुन्दरी सुबाहु के ऊँचे नगर-द्वार से होकर उस श्रेष्ठ नगर में प्रविष्ट हुई।
श्लोक 47 (3.62.47)
तां विह्वलां कृशां दीनां मुक्तकेशीममार्जिताम् । उन्मत्तामिव गच्छन्तीं ददृशुः पुरवासिनः ॥
tāṃ vihvalāṃ kṛśāṃ dīnāṃ muktakeśīmamārjitām | unmattāmiva gacchantīṃ dadṛśuḥ puravāsinaḥ
नगरवासियों ने उसे पागल-सी चलते देखा — व्याकुल, दुबली, दीन, खुले और बिना सँवारे बालों वाली।
श्लोक 48 (3.62.48)
प्रविशन्तीं तु तां दृष्ट्वा चेदिराजपुरीं तदा । अनुजग्मुस्तत्र बाला ग्रामिपुत्राः कुतूहलात् ॥
praviśantīṃ tu tāṃ dṛṣṭvā cedirājapurīṃ tadā | anujagmustatra bālā grāmiputrāḥ kutūhalāt
उसे चेदिराज के नगर में प्रवेश करते देखकर गाँव के लड़के कौतूहलवश उसके पीछे-पीछे चल पड़े।
श्लोक 49 (3.62.49)
सा तैः परिवृताऽगच्छत्समीपं राजवेश्मनः । तां प्रासादगताऽपश्यद्राजमाता जनैर्वृताम् ॥
sā taiḥ parivṛtā'gacchatsamīpaṃ rājaveśmanaḥ | tāṃ prāsādagatā'paśyadrājamātā janairvṛtām
उनसे घिरी हुई वह राजमहल के पास पहुँची। महल की छत पर खड़ी राजमाता ने उसे भीड़ से घिरा हुआ देखा।
श्लोक 50 (3.62.50)
धात्रीमुवाच गच्छैनामानयेह ममान्तिकम् । जनेन क्लिश्यते बाला दुःखिता शरणार्थिनी ॥
dhātrīmuvāca gacchaināmānayeha mamāntikam | janena kliśyate bālā duḥkhitā śaraṇārthinī
उन्होंने अपनी धाय से कहा — "जाओ, उसे मेरे पास ले आओ। लोग उस युवती को सता रहे हैं; वह दुःखी है और शरण चाहती है।"
राजमातोवाच
श्लोक 51 (3.62.51)
तादृग्रूपं च पश्यामि विद्योतयति मे गृहम् । उन्मत्तवेषा कल्याणी श्रीरिवायतलोचना ॥
tādṛgrūpaṃ ca paśyāmi vidyotayati me gṛham | unmattaveṣā kalyāṇī śrīrivāyatalocanā
"मैं उसमें ऐसा रूप देख रही हूँ कि वह मेरे घर को प्रकाशित कर रही है। पागलों जैसे वेश में होकर भी यह विशाल नेत्रों वाली कल्याणी साक्षात् लक्ष्मी-सी है।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 52 (3.62.52)
सा जनं वारयित्वा तं प्रासादतलमुत्तमम् । आरोप्य विस्मिता राजन्दमयन्तीमपृच्छत ॥
sā janaṃ vārayitvā taṃ prāsādatalamuttamam | āropya vismitā rājandamayantīmapṛcchata
भीड़ को हटवाकर उन्होंने उसे महल की उत्तम छत पर बुलवाया और, हे राजन्, विस्मित होकर दमयन्ती से पूछा —
राजमातोवाच
श्लोक 53 (3.62.53)
एवमप्यसुखाविष्टा बिभर्षि परमं वपुः । भासि विद्युदिवाभ्रेषु शंस मे काऽसिकस्य वा ॥
evamapyasukhāviṣṭā bibharṣi paramaṃ vapuḥ | bhāsi vidyudivābhreṣu śaṃsa me kā'sikasya vā
"इतने दुःख में डूबी होकर भी तुम परम सुन्दर रूप धारण किए हो; बादलों में बिजली की तरह चमक रही हो। मुझे बताओ, तुम कौन हो और किसकी हो?"
श्लोक 54 (3.62.54)
न हि ते मानुषं रूपं भूषणैरपि वर्जितम् । असहाया नरेभ्यश्च नोद्विजस्यमरप्रभे ॥
na hi te mānuṣaṃ rūpaṃ bhūṣaṇairapi varjitam | asahāyā narebhyaśca nodvijasyamaraprabhe
"आभूषणों से रहित होने पर भी तुम्हारा रूप मनुष्यों जैसा नहीं है। अकेली और असहाय होकर भी तुम पुरुषों से नहीं डरतीं, हे देवताओं जैसी कान्ति वाली।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 55 (3.62.55)
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या भैमी वचनमब्रवीत् । मानुषीं मां विजानीहि भर्तारं समनुव्रताम् ॥
tacchrutvā vacanaṃ tasyā bhaimī vacanamabravīt | mānuṣīṃ māṃ vijānīhi bhartāraṃ samanuvratām
उनकी बात सुनकर भीमकुमारी ने उत्तर दिया — "मुझे पति के प्रति समर्पित एक मानवी समझिए,"
दमयन्त्युवाच
श्लोक 56 (3.62.56)
सैरन्ध्रीं जातिसंपन्नां भुजिष्यां कामवासिनीम् । फलमूलाशनामेकां यत्रसायंप्रतिश्रयाम् ॥
sairandhrīṃ jātisaṃpannāṃ bhujiṣyāṃ kāmavāsinīm | phalamūlāśanāmekāṃ yatrasāyaṃpratiśrayām
"अच्छे कुल की एक सैरन्ध्री, एक सेविका, जो जहाँ चाहे वहीं रहती है, अकेली, फल-मूल खाकर जीती है, और जहाँ साँझ हो जाए वहीं आश्रय ले लेती है।"
श्लोक 57 (3.62.57)
असङ्ख्येयगुणो भर्ता मां च नित्यमनुव्रतः । भक्ताऽहमपि तं वीरं छायेवानुगता पथि ॥
asaṅkhyeyaguṇo bhartā māṃ ca nityamanuvrataḥ | bhaktā'hamapi taṃ vīraṃ chāyevānugatā pathi
"मेरे पति असंख्य गुणों वाले हैं और सदा मुझसे प्रेम करते रहे; और मैं भी उनके प्रति समर्पित होकर छाया की तरह मार्ग में उस वीर के पीछे-पीछे चली।"
श्लोक 58 (3.62.58)
तस्य दैवात्प्रसङ्गोऽभूदतिमात्रं सुदेवने । द्यूते स निर्जितश्चैव वनमेक उपेयिवान् ॥
tasya daivātprasaṅgo'bhūdatimātraṃ sudevane | dyūte sa nirjitaścaiva vanameka upeyivān
"दैववश उन्हें जुए का अत्यधिक व्यसन लग गया; द्यूत में हारकर वे अकेले वन को चले गए।"
श्लोक 59 (3.62.59)
तमेकवसनच्छन्नमुन्मत्तमिव विह्वलम् । आश्वासयन्ती भर्तारमहमप्यगमं वनम् ॥
tamekavasanacchannamunmattamiva vihvalam | āśvāsayantī bhartāramahamapyagamaṃ vanam
"वे एक ही वस्त्र ओढ़े थे, पागल-से व्याकुल थे; अपने पति को सान्त्वना देती हुई मैं भी उनके साथ वन को गई।"
श्लोक 60 (3.62.60)
स कदाचिद्वने वीरः कस्मिंश्चित्कारणान्तरे । क्षुत्परीतस्तु विमना वासश्चैकं व्यसर्जयत् ॥
sa kadācidvane vīraḥ kasmiṃścitkāraṇāntare | kṣutparītastu vimanā vāsaścaikaṃ vyasarjayat
"एक बार वन में किसी कारणवश भूख से पीड़ित और उदास होकर उस वीर ने अपना एकमात्र वस्त्र भी त्याग दिया।"
श्लोक 61 (3.62.61)
तमेकवसना नग्नमुन्मत्तवदचेतसम् । अनुव्रजन्ती बहुला न स्वपामि निशाः सदा ॥
tamekavasanā nagnamunmattavadacetasam | anuvrajantī bahulā na svapāmi niśāḥ sadā
"मैं स्वयं एक ही वस्त्र में, उन्मत्त के समान अचेत और निर्वस्त्र उनके पीछे-पीछे चलती रही, और बहुत-सी रातों तक मैं सो न सकी।"
श्लोक 62 (3.62.62)
ततो बहुतिथे काले सुप्तामुत्सृज्य मां क्वचित् । वाससोऽर्धं परिच्छिद्य त्यक्तवान्मामनागसम् ॥
tato bahutithe kāle suptāmutsṛjya māṃ kvacit | vāsaso'rdhaṃ paricchidya tyaktavānmāmanāgasam
"फिर बहुत समय बाद, जब मैं कहीं सो रही थी, उन्होंने मेरे वस्त्र का आधा भाग काट लिया और मुझ निरपराधिनी को छोड़कर चले गए।"
श्लोक 63 (3.62.63)
तं मार्गमाणा भर्तारं दह्यमाना दिवानिशम् । न विन्दाम्यमरप्रख्यं प्रियं प्राणेश्वरं प्रभुम् ॥
taṃ mārgamāṇā bhartāraṃ dahyamānā divāniśam | na vindāmyamaraprakhyaṃ priyaṃ prāṇeśvaraṃ prabhum
"दिन-रात शोक में जलती हुई मैं अपने पति को खोज रही हूँ, पर उन्हें — अपने देवतुल्य प्रियतम, अपने प्राणेश्वर, अपने स्वामी को — पा नहीं रही हूँ।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 64 (3.62.64)
इत्युक्त्वा साऽनवद्याङ्गी राजमातरमप्युत । स्थिताऽश्रुपरिपूर्णाक्षी वेपमाना सुदुःखिता ॥
ityuktvā sā'navadyāṅgī rājamātaramapyuta | sthitā'śruparipūrṇākṣī vepamānā suduḥkhitā
राजमाता से यह कहकर निर्दोष अंगों वाली दमयन्ती आँसुओं से भरी आँखों के साथ, काँपती हुई और अत्यन्त दुःखी होकर खड़ी रही।
श्लोक 65 (3.62.65)
तामश्रुपरिपूर्णाक्षीं विलपन्तीं तथा बहु । राजमाताऽब्रवीदार्ता भैमीमार्तस्वरां स्वयम् ॥
tāmaśruparipūrṇākṣīṃ vilapantīṃ tathā bahu | rājamātā'bravīdārtā bhaimīmārtasvarāṃ svayam
आँसुओं से भरी आँखों वाली, करुण स्वर में बहुत विलाप करती भीमकुमारी से राजमाता ने, जो स्वयं भी दुःखी थीं, कहा —
राजमातोवाच
श्लोक 66 (3.62.66)
वस त्वमिह कल्याणि प्रीतिर्मे परमा त्वयि । मृगयिष्यन्ति ते भद्रे भर्तारं पुरुषा मम ॥
vasa tvamiha kalyāṇi prītirme paramā tvayi | mṛgayiṣyanti te bhadre bhartāraṃ puruṣā mama
"कल्याणी, तुम यहीं रहो; मुझे तुमसे बड़ा स्नेह है। भद्रे, मेरे लोग तुम्हारे पति को खोजेंगे।"
श्लोक 67 (3.62.67)
अपि वा स्वयमागच्छेत्परिधावन्नितस्ततः । इहैव वसती भद्रे भर्तारमुपलप्स्यसे ॥
api vā svayamāgacchetparidhāvannitastataḥ | ihaiva vasatī bhadre bhartāramupalapsyase
"अथवा इधर-उधर भटकते हुए वे स्वयं ही यहाँ आ जाएँ। भद्रे, यहीं रहते हुए तुम अपने पति को फिर पा लोगी।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 68 (3.62.68)
राजमातुर्वचः श्रुत्वा दमयन्ती वचोऽब्रवीत् । समयेनोत्सहे वस्तुं त्वयि वीरप्रजायिनि ॥
rājamāturvacaḥ śrutvā damayantī vaco'bravīt | samayenotsahe vastuṃ tvayi vīraprajāyini
राजमाता की बात सुनकर दमयन्ती ने कहा — "हे वीरों की जननी, मैं कुछ शर्तों पर आपके पास रह सकती हूँ।"
दमयन्त्युवाच
श्लोक 69 (3.62.69)
उच्छिष्टं नैव भुञ्जीयां न कुर्यां पादधावनम् । न चाहं पुरुषानन्यान्प्रभाषेयं कथंचन ॥
ucchiṣṭaṃ naiva bhuñjīyāṃ na kuryāṃ pādadhāvanam | na cāhaṃ puruṣānanyānprabhāṣeyaṃ kathaṃcana
"मैं किसी का जूठा नहीं खाऊँगी, किसी के पैर नहीं धोऊँगी, और पराए पुरुषों से किसी प्रकार बात नहीं करूँगी।"
श्लोक 70 (3.62.70)
प्रार्थयेद्यदि मां कश्चिद्दण्ड्यस्ते स पुमान्भवेत् । वध्यश्च तेऽसकृन्मन्द इतिमे व्रतमाहितम् ॥
prārthayedyadi māṃ kaściddaṇḍyaste sa pumānbhavet | vadhyaśca te'sakṛnmanda itime vratamāhitam
"यदि कोई पुरुष मुझसे प्रणय-याचना करे तो आप उसे दण्ड दें, और यदि वह मूर्ख बार-बार ऐसा करे तो आप उसे प्राणदण्ड दें — यही मेरा लिया हुआ व्रत है।"
श्लोक 71 (3.62.71)
भर्तुरन्वेषणार्थं तु पश्येयं ब्राह्मणानहम् । यद्येवमिह वत्स्यामि त्वत्सकाशे न संशयः । अतोऽन्यथा न मे वासो वर्तते हृदये क्वचित् ॥
bharturanveṣaṇārthaṃ tu paśyeyaṃ brāhmaṇānaham | yadyevamiha vatsyāmi tvatsakāśe na saṃśayaḥ | ato'nyathā na me vāso vartate hṛdaye kvacit
"और पति की खोज के लिए मैं ब्राह्मणों से मिल सकूँ। यदि ऐसा हो तो मैं निःसन्देह यहाँ आपके पास रहूँगी; अन्यथा मेरे मन में कहीं भी रहने की इच्छा नहीं है।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 72 (3.62.72)
इत्युक्ता दमयन्त्या तु राजमातेदमब्रवीत् । सर्वमेतत्करिष्यामि दिष्ट्या ते व्रतमीदृशम् ॥
ityuktā damayantyā tu rājamātedamabravīt | sarvametatkariṣyāmi diṣṭyā te vratamīdṛśam
दमयन्ती के ऐसा कहने पर राजमाता बोलीं — "मैं यह सब करूँगी। सौभाग्य की बात है कि तुम्हारा व्रत ऐसा है!"
श्लोक 73 (3.62.73)
एवमुक्त्वा ततो भैमीं राजमाता विशांपते । उवाचेदं दुहितरं सुनन्दां नाम भारत ॥
evamuktvā tato bhaimīṃ rājamātā viśāṃpate | uvācedaṃ duhitaraṃ sunandāṃ nāma bhārata
हे प्रजापालक, भीमकुमारी से ऐसा कहकर राजमाता ने, हे भारत, अपनी सुनन्दा नाम की पुत्री से यह कहा —
राजमातोवाच
श्लोक 74 (3.62.74)
सैरन्ध्रीमभिजानीष्व सुनन्दे देवरूपिणीम् । वयसा तुल्यतां प्राप्ता सखी तव भवत्वियम् । एतया सह मोदस्व निरुद्विग्नमनाः सदा ॥
sairandhrīmabhijānīṣva sunande devarūpiṇīm | vayasā tulyatāṃ prāptā sakhī tava bhavatviyam | etayā saha modasva nirudvignamanāḥ sadā
"सुनन्दा, इस देवी-सी रूपवती सैरन्ध्री को अपनी समझो। यह तुम्हारी ही आयु की है, यह तुम्हारी सखी बने। इसके साथ सदा निश्चिन्त होकर आनन्द से रहो।"
बृहदश्व उवाच
श्लोक 75 (3.62.75)
ततः परमसंहृष्टा सुनन्दा गृहमागमत् । दमयन्तीमुपादाय सखीभिः परिवारिता ॥
tataḥ paramasaṃhṛṣṭā sunandā gṛhamāgamat | damayantīmupādāya sakhībhiḥ parivāritā
तब अत्यन्त प्रसन्न सुनन्दा अपनी सखियों से घिरी हुई दमयन्ती को साथ लेकर अपने घर चली गई।
श्लोक 76 (3.62.76)
सहसा न्यवसद्राजन्राजपुत्र्या सुनन्दया । चिन्तयन्ती नलं वीरमनिशं वामलोचना ॥
sahasā nyavasadrājanrājaputryā sunandayā | cintayantī nalaṃ vīramaniśaṃ vāmalocanā
और हे राजन्, वहाँ सुन्दर नेत्रों वाली दमयन्ती राजकुमारी सुनन्दा के साथ रहने लगी, निरन्तर वीर नल का ही चिन्तन करती हुई।