Skip to main content

आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 63

कर्कोटक द्वारा नल का रूप-परिवर्तन

दमयन्ती को छोड़ने के बाद नल एक दावानल के पास पहुँचते हैं और उसके भीतर से अपना नाम पुकारती एक आवाज़ सुनते हैं। वे नागराज कर्कोटक को बचाते हैं, जिसे एक ऋषि ने शाप दिया था कि जब तक नल उसे उठाकर न ले जाएँ, वह अचल पड़ा रहेगा। कर्कोटक दसवें पग पर नल को डसकर उनका रूप बदल देता है ताकि कोई उन्हें पहचान न सके, और बताता है कि उसका विष नल में बसे कलि को पीड़ा देगा, जबकि नल स्वयं विष, हिंसक पशुओं और शत्रुओं से सुरक्षित रहेंगे। वह नल को बाहुक नामक सारथि बनकर अयोध्या के राजा ऋतुपर्ण के पास जाने को कहता है, ताकि वे अश्वविद्या के बदले द्यूतविद्या पा सकें; वह वचन देता है कि नल को पत्नी, सन्तान और राज्य फिर मिलेंगे, और उनका असली रूप लौटाने के लिए उन्हें दो दिव्य वस्त्र देता है।

अध्याय 62अध्याय-सूचीअध्याय 64

बृहदश्व उवाच

श्लोक 1 (3.63.1)

उत्सृज्य दमयन्तीं तु नलो राजा विशांपते । ददर्श दावं दह्यन्तं महान्तं गहने वने ॥

utsṛjya damayantīṃ tu nalo rājā viśāṃpate | dadarśa dāvaṃ dahyantaṃ mahāntaṃ gahane vane

हे प्रजानाथ, दमयन्ती को छोड़ देने के बाद राजा नल ने घने वन में एक विशाल दावानल धधकते देखा।

श्लोक 2 (3.63.2)

तत्र शुश्राव शब्दंवै मध्ये भूतस्य कस्यचित् । अभिधाव नलेत्युच्चैः पुण्यश्लोकेति चासकृत् ॥

tatra śuśrāva śabdaṃvai madhye bhūtasya kasyacit | abhidhāva naletyuccaiḥ puṇyaśloketi cāsakṛt

उसके बीच से उन्होंने किसी प्राणी की आवाज़ सुनी, जो ऊँचे स्वर में बार-बार पुकार रहा था — "नल, दौड़कर आओ! हे पुण्यश्लोक!"

श्लोक 3 (3.63.3)

मा भैरिति नलश्चोक्त्वा मध्यमग्नेः प्रविश्य तम् । ददर्श नागराजानं शयानं कुण्डलीकृतम् ॥

mā bhairiti nalaścoktvā madhyamagneḥ praviśya tam | dadarśa nāgarājānaṃ śayānaṃ kuṇḍalīkṛtam

"डरो मत" कहकर नल उस अग्नि के बीच में प्रवेश कर गए और वहाँ उन्होंने कुण्डली मारकर पड़े नागराज को देखा।

श्लोक 4 (3.63.4)

स नागः प्राञ्जलिर्भूत्वा वेपमानो नलं तदा । उवाच मां विद्धिराजन्नागं कर्कोटकं नृप ॥

sa nāgaḥ prāñjalirbhūtvā vepamāno nalaṃ tadā | uvāca māṃ viddhirājannāgaṃ karkoṭakaṃ nṛpa

उस नाग ने काँपते हुए हाथ जोड़कर नल से कहा — "हे राजन्, हे नरेश, मुझे कर्कोटक नाग जानिए।"

कर्कोटक उवाच

श्लोक 5 (3.63.5)

मया प्रलब्धो ब्रह्मर्षिरनागाः सुमहातपाः । तेन मन्युपरीतेन शप्तोऽस्मि मनुजाधिप ॥

mayā pralabdho brahmarṣiranāgāḥ sumahātapāḥ | tena manyuparītena śapto'smi manujādhipa

"मैंने एक निरपराध, महान तपस्वी ब्रह्मर्षि को छला था; हे मनुजेश्वर, उन्होंने क्रोध में भरकर मुझे शाप दे दिया —"

श्लोक 6 (3.63.6)

तिष्ठ त्वं स्थावर इव यावदेति नलः क्वचित् । इतो नेता हि तत्र त्वं शापान्मोक्ष्यसि मत्कृतात् ॥

tiṣṭha tvaṃ sthāvara iva yāvadeti nalaḥ kvacit | ito netā hi tatra tvaṃ śāpānmokṣyasi matkṛtāt

"'तुम किसी अचल वस्तु की तरह यहीं पड़े रहो, जब तक नल इधर न आएँ। वही तुम्हें यहाँ से ले जाएँगे, और वहाँ तुम मेरे शाप से छूट जाओगे।'"

श्लोक 7 (3.63.7)

तस्य शापान्न शक्नोमि पदाद्विचलितुं पदम् । उपदेक्ष्यामि ते श्रेयस्त्रातुमर्हति मां भवान् ॥

tasya śāpānna śaknomi padādvicalituṃ padam | upadekṣyāmi te śreyastrātumarhati māṃ bhavān

"उनके शाप के कारण मैं इस स्थान से एक पग भी नहीं हिल सकता। मैं आपको आपके कल्याण की बात बताऊँगा; आप मेरी रक्षा करें।"

श्लोक 8 (3.63.8)

सखा च ते भविष्यामि मत्समो नास्ति पन्नगः । लघुश्च ते भविष्यामि शीघ्रमादाय गच्छ माम् ॥

sakhā ca te bhaviṣyāmi matsamo nāsti pannagaḥ | laghuśca te bhaviṣyāmi śīghramādāya gaccha mām

"मैं आपका मित्र बनूँगा — मेरे समान कोई नाग नहीं है। मैं आपके लिए हल्का हो जाऊँगा; मुझे शीघ्र उठाकर ले चलिए।"

बृहदश्व उवाच

श्लोक 9 (3.63.9)

एवमुक्त्वा स नागेन्द्रो बभूवाङ्गुष्ठमात्रकः । तं गृहीत्वा नलः प्रायाद्देशं दावविवर्जितम् ॥

evamuktvā sa nāgendro babhūvāṅguṣṭhamātrakaḥ | taṃ gṛhītvā nalaḥ prāyāddeśaṃ dāvavivarjitam

यह कहकर वह नागराज अँगूठे भर का हो गया। उसे उठाकर नल ऐसे स्थान पर गए जहाँ आग नहीं थी।

श्लोक 10 (3.63.10)

आकाशदेशमासाद्य विमुक्तं कृष्णवर्त्मना । उत्स्रष्टुकामं तं नागः पुनः कर्कोटकोऽब्रवीत् ॥

ākāśadeśamāsādya vimuktaṃ kṛṣṇavartmanā | utsraṣṭukāmaṃ taṃ nāgaḥ punaḥ karkoṭako'bravīt

आग से अछूते एक खुले स्थान पर पहुँचकर नल उसे नीचे छोड़ने ही वाले थे कि कर्कोटक नाग फिर बोला —

कर्कोटक उवाच

श्लोक 11 (3.63.11)

पदानि गणयन्गच्छ स्वानि नैषध कानिचित् । तत्रतेऽहं महाबाहो श्रेयो धास्यामि यत्परम् ॥

padāni gaṇayangaccha svāni naiṣadha kānicit | tatrate'haṃ mahābāho śreyo dhāsyāmi yatparam

"हे निषधराज, अपने कुछ पग गिनते हुए चलिए। वहाँ, हे महाबाहु, मैं आपका परम कल्याण करूँगा।"

बृहदश्व उवाच

श्लोक 12 (3.63.12)

ततः संख्यातुमारब्धमदशद्दशमे पदे । तस्य दष्टस्य तद्रूपं क्षिप्रमन्तरधीयत ॥

tataḥ saṃkhyātumārabdhamadaśaddaśame pade | tasya daṣṭasya tadrūpaṃ kṣipramantaradhīyata

नल ने गिनना आरम्भ किया, और दसवें पग पर नाग ने उन्हें डस लिया; डसते ही उनका वह रूप तुरन्त लुप्त हो गया।

श्लोक 13 (3.63.13)

स दृष्ट्वा विस्मितस्तस्थावात्मानं विकृतं नलः । स्वरूपधारिणं नागं ददर्श स महीपतिः ॥

sa dṛṣṭvā vismitastasthāvātmānaṃ vikṛtaṃ nalaḥ | svarūpadhāriṇaṃ nāgaṃ dadarśa sa mahīpatiḥ

अपने को बदला हुआ देखकर नल विस्मित खड़े रह गए; और राजा ने नाग को उसके अपने रूप में देखा।

श्लोक 14 (3.63.14)

ततः कर्कोटको नागः सान्त्वयन्नलमब्रवीत् । मया तेऽन्तर्हितं रूपं न त्वां विद्युर्जना इति ॥

tataḥ karkoṭako nāgaḥ sāntvayannalamabravīt | mayā te'ntarhitaṃ rūpaṃ na tvāṃ vidyurjanā iti

तब कर्कोटक नाग ने नल को सान्त्वना देते हुए कहा — "मैंने आपका रूप छिपा दिया है, ताकि लोग आपको पहचान न सकें।"

कर्कोटक उवाच

श्लोक 15 (3.63.15)

यत्कृते चासि निकृतो दुःखेन महता नल । विषेण स मदीयेन त्वयि दुःखं निवत्स्यति ॥

yatkṛte cāsi nikṛto duḥkhena mahatā nala | viṣeṇa sa madīyena tvayi duḥkhaṃ nivatsyati

"और हे नल, जिसके कारण आप छले गए और महान दुःख में पड़े, वह मेरे विष से पीड़ित होकर आपके भीतर दुःखपूर्वक रहेगा।"

श्लोक 16 (3.63.16)

विषेण संवृतैर्गात्रैर्यावत्त्वां न विमोक्ष्यति । तावत्तु त्वां महाराज क्लेशेऽस्मिन्स नियोक्ष्यति ॥

viṣeṇa saṃvṛtairgātrairyāvattvāṃ na vimokṣyati | tāvattu tvāṃ mahārāja kleśe'sminsa niyokṣyati

"हे महाराज, जब तक मेरे विष से व्याप्त अंगों वाला वह आपको नहीं छोड़ता, तब तक वह आपको इसी क्लेश में रखेगा।"

श्लोक 17 (3.63.17)

अनागा येन निकृतस्त्वमनर्हो जनाधिप । क्रोधादसूययित्वा तं रक्षा मे भवतः कृता ॥

anāgā yena nikṛtastvamanarho janādhipa | krodhādasūyayitvā taṃ rakṣā me bhavataḥ kṛtā

"हे जनेश्वर, जिसने आप जैसे निरपराध व्यक्ति को अकारण छला, उस पर क्रोध और रोष के कारण मैंने आपकी यह रक्षा की है।"

श्लोक 18 (3.63.18)

न ते भयं नरव्याघ्र दंष्ट्रिभ्यः शत्रुतोऽपि वा । ब्रह्मवित्त्वं च भविता मत्प्रसादान्नराधिप ॥

na te bhayaṃ naravyāghra daṃṣṭribhyaḥ śatruto'pi vā | brahmavittvaṃ ca bhavitā matprasādānnarādhipa

"हे नरश्रेष्ठ, आपको दाँतों वाले हिंसक जीवों से या शत्रुओं से कोई भय नहीं रहेगा; और हे नराधिप, मेरी कृपा से आप ब्रह्मज्ञानी होंगे।"

श्लोक 19 (3.63.19)

राजन्विषनिमित्ता च न ते पीडा भविष्यति । संग्रामेषु च राजेन्द्रशश्वज्जयमवाप्स्यसि ॥

rājanviṣanimittā ca na te pīḍā bhaviṣyati | saṃgrāmeṣu ca rājendraśaśvajjayamavāpsyasi

"हे राजन्, विष के कारण आपको कोई पीड़ा नहीं होगी, और हे राजेन्द्र, संग्रामों में आप सदा विजय पाएँगे।"

श्लोक 20 (3.63.20)

गच्छ राजन्नितः सूतो बाहुकोऽहमिति ब्रुवन् । समीपमृतुपर्णस्य स हि वेदाक्षनैपुणम् ॥

gaccha rājannitaḥ sūto bāhuko'hamiti bruvan | samīpamṛtuparṇasya sa hi vedākṣanaipuṇam

"हे राजन्, यहाँ से 'मैं सारथि बाहुक हूँ' कहते हुए ऋतुपर्ण के पास जाइए, क्योंकि वे द्यूत में निपुण हैं —"

श्लोक 21 (3.63.21)

अयोध्यां नगरीं रम्यामद्य वै निषधेश्वर । स तेऽक्षहृदयं दाता राजाऽश्वहृदयेन वै ॥

ayodhyāṃ nagarīṃ ramyāmadya vai niṣadheśvara | sa te'kṣahṛdayaṃ dātā rājā'śvahṛdayena vai

"हे निषधेश्वर, आज ही रमणीय अयोध्या नगरी जाइए। वे राजा अश्वविद्या के बदले आपको द्यूत का रहस्य देंगे।"

श्लोक 22 (3.63.22)

इक्ष्वाकुकुलजः श्रीमान्मित्रं चैव भविष्यति । भविष्यसि यदाऽक्षज्ञः श्रेयसा योक्ष्यसे तदा ॥

ikṣvākukulajaḥ śrīmānmitraṃ caiva bhaviṣyati | bhaviṣyasi yadā'kṣajñaḥ śreyasā yokṣyase tadā

"इक्ष्वाकु कुल में जन्मे वे श्रीमान् राजा आपके मित्र बनेंगे। जब आप द्यूतविद्या जान लेंगे, तब आपका कल्याण होगा।"

श्लोक 23 (3.63.23)

संयोक्ष्यसे स्वदारैस्त्वं मा स्म शोके मनः कृथाः । राज्येन तनयाभ्यां च सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥

saṃyokṣyase svadāraistvaṃ mā sma śoke manaḥ kṛthāḥ | rājyena tanayābhyāṃ ca satyametadbravīmi te

"आप अपनी पत्नी से, अपने राज्य से और दोनों सन्तानों से फिर मिलेंगे — मन को शोक में मत डालिए। यह मैं आपसे सत्य कहता हूँ।"

श्लोक 24 (3.63.24)

स्वं रूपं च यदा द्रष्टुमिच्छेथास्त्वं नराधिप । संस्मर्तव्यस्तदा तेऽहंवासश्चेदं निवासयेः ॥

svaṃ rūpaṃ ca yadā draṣṭumicchethāstvaṃ narādhipa | saṃsmartavyastadā te'haṃvāsaścedaṃ nivāsayeḥ

"और हे नराधिप, जब आप अपना असली रूप देखना चाहें, तब मेरा स्मरण कीजिए और यह वस्त्र पहन लीजिए।"

बृहदश्व उवाच

श्लोक 25 (3.63.25)

अनेन वाससाच्छन्नः स्वं रूपं प्रतिपत्स्यसे । इत्युक्त्वा प्रददौ तस्मै दिव्यं वासोयुगं तदा ॥

anena vāsasācchannaḥ svaṃ rūpaṃ pratipatsyase | ityuktvā pradadau tasmai divyaṃ vāsoyugaṃ tadā

"इस वस्त्र को ओढ़ने पर आप अपना रूप फिर पा लेंगे।" यह कहकर उसने उन्हें दिव्य वस्त्रों का एक जोड़ा दिया।

श्लोक 26 (3.63.26)

एवं नलं च संदिश्य वासो दत्त्वा च कौरव । नागराजस्ततो राजंस्तत्रैवान्तरधीयत ॥

evaṃ nalaṃ ca saṃdiśya vāso dattvā ca kaurava | nāgarājastato rājaṃstatraivāntaradhīyata

हे कौरव, इस प्रकार नल को निर्देश देकर और वस्त्र देकर, हे राजन्, वह नागराज वहीं अन्तर्धान हो गया।

अध्याय 62अध्याय-सूचीअध्याय 64